Mundakopanoshad — पृष्ठ 91–100

Mundakopanoshad · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयवेवसत्यनिरूपण भी मीतर है । बाहर भी है । सर्वत्र - प्रविभक्तं विभक्तेषु के अनुसार एकरूप से व्याप्त है । इसीलिए तो ईशावास्योपनिषत् में इसके लिए -" तदेजति तत्रैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः " ॥ ' -यह कहा गया है । ' अनावरण: सर्वव्यापकः ' बाह्याभ्यन्तरः का यही प्रयं है । ५ - प्रजः ----- यह व्यय का नामान्तर है - जैसा कि पूर्व के नामप्रकरण से स्पष्ट हो जाता है । यद्यपि संवाद युगे युगे से उसे जन्म लेने वाला बतलाया जाता है । परन्तु विश्वास करना चाहिए कि वह प्रातिस्विकरूप से सर्वथा भजन्मा ही है । प्रकृति ( घर ) के साथ वह रहता है । प्रक्षर जन्म लेता है, अतएव तदविनाभूत भज पव्यय के लिए भी संभवामि युगे युगे - ये प्रक्षर निकल पड़ते हैं । यदि वह प्राति स्विकरूप से जन्म लेने वाला होता तो कभी उसके लिए प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया'-यह न कहा जाता । सारे जीव प्रक्षर के रूप! हैं न कि अव्यय के. क्योंकि भव्यय तो अजन्मा है, अज

है, प्रतएव इस प्रक्षर के लिए-" परेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम् ।

जोवमृतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् " ॥। 3

-यह कहा जाता है । इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने इसे न कहा है । ६- प्राणः --भक्षरप्राग, क्षरप्राण, परोरखाः प्राण, रविप्राण, विषणप्राण, प्रज्ञाप्राण, भूवप्रारण मादि - प्रादि संसार के प्राणमात्र उसमें रहते हैं, वह स्वयं प्रप्राण है । प्राणाधार है । अपि च - अव्यय प्राणरूप है । इस प्राण में अन्य व्ययप्रारण का प्रभाव है, अतएव जैसे सदस्वरूप प्राण असत् कहलाता है, एवमेव प्राणरूप ब्रव्यय अप्राण कहलाता है । ॐ प्रममा: ---? इन्द्रियमन, अनिन्द्वियमत भेदभिन्न वस्तुमान के मन इस कोषरूप प्रव्ययमन में रहते हैं । वह स्वयं क्षमता है । मन का श्राधार है । अपि च - यह श्वोवसीयसमनोरूप है । मन में मन का प्रभाव है, धतएव वह अमना: है । १ ईशावास्योप ० ५ । २ गीता ४।६ । ३ गीता ७।५ । [ ६७ ]

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदे वसत्यनिरूपण वह ज्योतिर्धन है, प्रसंग है । उस पर किसी का लेप नहीं चढता । वह सदा शुभ है एवं प्रक्षर से परे, वह पर ( अव्यय ) प्रतिष्ठित रहता है । १ विव्यः - ( सुसूक्ष्मः ) २ प्रमूर्त - ( परश्यः ) ३ पुरुषः - ( परिनि. ) ४ बाह्यभ्यन्तर: - ( अनावरणः ) ५ मज: - ( एतन्नामक. ) ६ मप्राणः -- ( प्राणविकलः प्राणरूपः ) ७ प्रमनाः - ( मनोविकलः मनोरूपः ) शुभ्रः - ( निलिप्तः - ज्योतिर्धनः ) - → अक्षराद परतः ( दिशि- सः ) परः ( म्ययः ) विद्यते इस प्रकार पूर्वधम्मोपपन्न ऐसे अव्यय को प्रादुर्भूत कर वह अक्षर क्षर द्वारा धागे के विविध भाव उत्पन्न करने में समर्थ होता है । अक्षर ने धव्यय को प्रादुर्भूत किया एवं उसकी सहायता से उसने क्षर द्वारा विविध भावों को उत्पन्न किया । वे विविधभाव मध्यात्म और प्रषिदेवस- दो भागों में विभक्त हुए । दूसरे शब्दों में उसने देवसत्य गमित दो प्रकार के ब्रह्मसत्य उत्पन्न किए । बस, उन्हीं दोनों का निरूपण

करते हुए ऋषि कहते हैं-“ एतस्माज्जायते धारणो मनः सर्वे प्रियाणि च ।

वं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ” ॥

प्राणः से वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञ एवं वैश्वानर - हिस्भ्ययनं सर्वशात्मक स्वोम्यत्रिलोकी के प्राय-प्राण प्रधान रूप से विवक्षित हैं । मन से प्रज्ञानरूप मन षभिप्रेत है एवं इन्द्रियाणि से ५ - ज्ञानेन्द्रियां, १- सम्मेन्द्रियाँ -ये १० इन्द्रियाँ प्रभिप्रेत हैं । शम्याधिक्यावर्थाविवयम् के अनुसार सर्वेन्द्रियाणि के सर्वशब्द को ज्ञानेन्द्रिय - कम्मेन्द्रियपरक लगाकर सार्थक करना ही उचित है । हम बतला पाए हैं कि मोकात्मा का प्रातमान प्रज्ञानमन से भविनाभूत रहता है एवं प्रज्ञानमन के प्रज्ञाप्राणरूप १० अर्थो का नाम ही १० इन्द्रियाँ हैं, अतएव भोकात्मा से वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ - मन- इन्द्रियाँ, इनका ग्रहण होता है । इन सब की समष्टि का नाम ही देवसत्य है, एवमेव प्रषिदेवतपक्ष में वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ तीन भाग्नेय-प्राण हैं । चन्द्रमा मन है । इसका भी देवसत्य में अन्तर्भाव है । इसीलिए तो एतद् वे देवसत्यं यच्चा मा: -[ ६५ ]

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण यह कहा जाता है एवं इन्द्रियाँ चान्द्रप्राण हैं । इस प्रकार प्रारणः - मन: -इन्द्रियाणि से आध्यात्मिक देवसत्य और माधिदैविक देवसत्य ही विवक्षित है । बाकी बचते हैं - ब्रह्मसत्य । उस ब्रह्मसत्य के लिए खं, वायुः, ज्योति:, प्रापः, पृथिवी कहा है । ऋषि को समान शब्दों से दोनों ( आध्यात्मिक- आधिदैविक ) का ग्रहण करना है । ऐसी भवस्था में यदि स्वयम्भू परमेष्ठी इत्यादि कहा जाता तो ईश्वरीय ब्रह्मसत्य का ही ग्रहण होता एवं यदि श्रव्यक्तादि कहा जाता तो प्राध्यात्मिक ब्रह्मसत्य का ही ग्रहण होता । प्रभोष्ट था दोनों का ग्रहण, प्रतएब खं - वायु: -ज्योतिः मादि कहा । खं ही स्वयम्भू है - यही भव्यक्त है । वायु ही परमेष्ठी है - यही महान है । ज्योति ही सूर्य है- यही विज्ञान है । प्रापः ही चन्द्रमा है - यही प्रज्ञान है । पृथिवी ही पृथिवी है - यही शरीर है । पृथिवी धौर चन्द्रमा के बीच में प्राण- मन- इन्द्रियमय ईश्वरीयदेवसत्य है एवं शरीर शोर प्रज्ञान के बीच में प्राध्यात्मिक मन - प्राण - इन्द्रियरूप देवसत्य है । इस प्रकार अव्यय के माधार पर उस प्रक्षर से प्राण - प्रापः - वाक् - पत्र - प्रभाव भेदभिन्न देवसत्यगमित पञ्चावयव ईश्वरीय ब्रह्मसत्य एवं आध्यात्मिक पञ्चावयव ब्रह्मसत्य उत्पन्न होता है । इन सबकी समष्टि ही सर्वम् है । इससे बाहर कुछ भी नहीं है । इस प्रकार ऋऋषि बहुत थोड़े शब्दों में मक्षर से होनेवाली सारी सत्यसृष्टि का स्वरूप बतला देते हैं ---१ खं स्वयम्भूः प्रव्यक्तः मनः - चन्द्रमाः ईश्वरीय-२ वायुः परमेष्ठी महत् ३ ज्योतिः सूय्यंः विज्ञानम् प्राणा: = वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ श्राग्नेयप्राणाः | देवसत्यम् इन्द्रियाणि = प्रज्ञा प्राणरूपाणि ४ भापः चन्द्रमाः प्रज्ञानम् ५ पृथिवी पृथिवी शरीरम् मनः = प्रज्ञानम् प्राणाः = वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञ प्राग्नेयप्रारणाः I - जैवदेवसत्यम् जं ० ब्रह्म इन्द्रियाणि १० इन्द्रियाणि ई ० ब्रह्म सबका ग्रहण कर लेने पर भी ऋषि को सन्तोष न हुमा, अतः बचे खुचों को ग्रहण करने के लिए उनके मुंह से - विश्वस्थ पारिणी - यह अक्षर निकल ही पड़े । रोदसी त्रिलोकी में जितने भी पदार्थ हैं - उन सबकी प्रतिष्ठा यह भूपृष्ठ है । यहाँ तक कि स्वयं साक्षी ईश्वर भी इसी पर प्रतिष्ठित है । यह सब उस अक्षर का ही विकास है । इस उपनिषत् को प्रधानरूप से ईश्वरीय देवरात्य का निरूपक बतलाया गया है, अतएव सुचीकटान्याय से दो - चार शब्दों में जंवसत्य का निरूपण कर अब विस्तार के साथ ईश्वरीय-देवसत्य का निरूपण प्रारम्भ करते हैं ---प्रय ईश्वरीयवेवसत्य निरूपणम्

" प्रग्निर्मूर्षा चक्षुषी चन्द्रसूयौ विशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः ।

वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्द्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ” ॥४ ॥

[ 8 ]

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facteruse ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण ईश्वरीय देवसत्य का स्वरूप ' कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' में विस्तार के साथ बतला दिया गया है; मतः यहाँ उसका स्मरणमात्र करा देना ही पर्याप्त होगा । वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञ को समष्टि ही जीवात्मा है । यही जीव देवसत्य है । इस जीव देवसत्य की ( मोक्तात्मा नाम से प्रसिद्ध जीवात्मा की ) प्रतिष्ठा श्रव्यक्त-महान् - विज्ञान - प्रज्ञान और शरीर है । देवसत्य स्वप्रतिष्ठारूप ब्रह्मसत्य से श्रभिन्न है । वैश्वानर - तेजस प्राश-जीव - देवसत्य ही यद्यपि जीवात्मा है, परन्तु इस प्रमिनभाव के कारण जीवात्मा के ग्रहण से ब्रह्यसस्य का भी ग्रहण हो जाता है । जीवसंस्था की व्याप्ति - अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, प्राज्ञ, तंजस, वैश्वानर, शरीर-इन पाठ अवयवों में रहती है । बस, ठीक इसी प्रकार यद्यपि ' ईश्वर ' वैश्वानर हिरण्यग में - सर्वश की समष्टि ही है - यही सर्वभूतान्तरात्मा नाम से प्रसिद्ध ईश्वर नाम से प्रसिद्ध देवसत्य है - यह ईश्वर - सुपणं उसी स्वयम्भू परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी रूप ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है, तथापि उसी अभिभाव के कारण देवसत्यरूप ईश्वर की व्याप्ति स्वयम्भू - परमेष्ठी सूय्यं - चन्द्रमा सर्वज्ञ- हिरण्यगर्भ वैश्वानर - पृथिवी - इन झाठों में मान ली जाती है । इसी प्रमितता को लक्ष्य में रखकर एस देवसत्यं यज्वन्द्यमाः - यह कहा जाता है । चन्द्रमा ब्रह्मसत्य का प्रवयव है । उसे देवसत्य बतलाने का एकमात्र तात्पम्यं यही है कि देवसत्य-ब्रह्मसत्य अभिन्न हैं । बस, इसी प्रभिन्न स्वरूप को लक्ष्य में रखते हुए प्रग्निर्मूर्द्धाः इत्यादि से देवसत्य का निरूपण प्रारम्भ किया जाता है । पृथिवीपिण्ड से निकलने वाला प्रमृतनाम से प्रसिद्ध चितेनिषेय भग्नि पृथिवी के २१ में पण तक व्याप्त रहता है । पिण्ड से ऊपर २१ तक व्याप्त रहने वाले इस अमृताग्नि के धन - तरल-विरल भेद से अग्नि - यम - भादित्य तीन भेद हो जाते हैं । ९ तक अग्नि है । १५ तक यमाग्नि है । २१ तक प्रादित्याग्नि है । २१ के ऊपर २७ तक मास्वरसोम है । ३३ तक दिक्सोम है । इस प्रकार पृथिवी के ३३ ग्रहणों में- अग्नि - यम- मादित्य मास्व रसोम दिक्सोम इन पांच देवताओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन पाँचों में दोनों सोम ( भा ० सो०- दि ० सो ० ) ' सोम ' है । इसका आदित्याग्नि से सम्बन्ध हो जाता है । सोम पर चित् का प्रतिबिम्ब पड़ता है । इससे सोम ज्ञानमय हो जाता है । इस ज्ञानमय सोम का २१ के स्थानीय प्रादित्याग्नि से प्रतिघनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है, प्रतएव इस प्रादित्याग्नि का नाम सर्वज्ञ हो जाता है । इसके नीचे का प्रान्तरिक्ष्य पञ्चदशस्थानीय याम्यवायु क्रियामय है । यहाँ ज्ञानभाग, कियामाग समान हैं । एक प्रकार से क्रियाभाग प्रधान है । यही क्रियाशक्तिरूप वायु हिरण्यगर्भ है । नीचे ज्ञानमात्रा अनुत्वण है । यही ६ स्थानीय भग्नि वैश्वानर है । वैश्वानर के नीचे पृथिवीपिण्ड है । पिण्ड पर पहले वैश्वानर है । ऊपर हिरण्यगर्भ है । उसके ऊपर सवंश है । तीनों श्रग्नि हैं । बस, भूमिपिण्ड पर प्रतिष्ठित वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सवंश इस प्रग्नित्रय की समष्टि ही वेषसत्य है । यही सर्वभूतान्तरात्मा साक्षी तुपणं ( ईश्वर ) है । इसके वैश्वानर - हिरण्यग में सर्वज्ञ तीन उषय हैं । तीनों में से चारों मोर सर्वत्र अर्क निकल रहे हैं । वे तीनों अर्क - त्रयो वा इमे त्रिवृतो लोकाः इस निगमश्रुति के धनुसार अपने - अपने स्थान में ( E - १५-२१ ) प्रतिष्ठित रहते हुए सारे त्रैलोक्य में अर्करूप से व्याप्त हो रहे हैं, प्रतएव इन तीनों को सहस्त्र कहा जाता है । सहस्र शब्दमण्डल से सम्बन्ध रखता है । दीप में से निकलने वाली गोल मण्डल बनाती हुई रश्मियाँ सहस्र हैं । उस मण्डल में चारों धोर रश्मियां व्याप्त हैं । सर्व ही सहस्र है । चूंकि वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ तीन उपथ हैं, तीनों में से चारों भोर रश्मियां निकल कर सारे त्रैलोक्य में व्याप्त हो रही हैं, अतएव हम इन तीनों को सहल कह सकते हैं । [ 80 ]

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facture ( creas ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण पहली साहस्री सर्वश है । इसका प्रतिष्ठास्थान छु नाम से प्रसिद्ध २१ वाँ महंगरण है । दूसरी साहली हिरण्यगर्भ है । इसकी प्रतिष्ठा पञ्चदश स्तोम है एवं तीसरी साहस्री वैश्वानर है । इसकी प्रतिष्ठा त्रिवृत्स्तीम है । इसके नीचे चित्य भूपिण्ड है । यही ईश्वर का शरीर है । सर्वज्ञ मस्तक है । यह प्राण - प्रधान है । हिरण्यगर्भ मध्य में होने से हृदय है । यह व्यानस्थानीय है । वैश्वानर पैर हैं । यह स्थानीय है । भूमि पर यह पादरूप वैश्वानरसाहस्री प्रतिष्ठित है । व्यान हृदयस्थ है । यहाँ मन रहता है । मन विज्ञान से भविनाभूत है । विज्ञान ही द्रष्टा होने से चक्षु कहलाता है, अतएव एतद्रूप हिरण्यगर्भ को हम चक्षुः साहनी कह सकते हैं! सर्वज्ञ मस्त कसाहस्री है । वैश्वानर पादसाहस्री है । बस, साहसीयरूप इसी वेवसत्य का निरूपण करती हुई यजुः श्रुति कहती है-साक्षी सुपर्णः " सहत्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स सुमि सर्वतः स्मृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् " - इति ॥ ' १ ] सहस्रशीर्षः सर्वशः २ सहस्राक्षः हिरण्यगर्भः याम्याग्नि: प्रारणप्रधानः धुलोक: --- २१ चिनिय व्यानप्रधानः अन्तरिक्षम् - १५ | पृथिवी ' उखा ' ३ सहस्रपात् वैश्वानरः वैश्वानराग्नि. पृथिवी- ६ महावेदरूपा भूमिः = चित्यपृथिवी = ' घषाढा ' वेदिरूपा * अपानप्रधानः हमारी उपनिषद - श्रुति इसी संहिता - श्रुति के अर्थ का दूसरे शब्दों में निरूपण कर रही है । सर्वज्ञरूप हावित्याग्नि ' द्यौं ' स्थानीय है । परमेष्ठ्य प्रापोमयमण्डल में सबसे पहले इसी दिव्य सावित्राग्नि का प्रादुर्भाव है । इसी भभिप्राय से खोर्या ग्रस्य ( अग्ने ) परमं जन्म कहा जाता है । त्रैलोक्य व्यापक वैश्वानर - पुरुष का वैश्वानर पार्थिव माग पाद है । प्रान्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भ छाती है एवं दिव्य सर्वज्ञ द्यौ है । एक ही वैश्वानर विराट् -पुरुष के तीन भवयव हैं । इसका द्यौ भाग ( तत्रस्थ अग्नि ) मूर्द्धा है । अतएव सूर्षा त्वाऽएव वैश्वानरस्य ( यद् खोः ) 3 - यह कहा जाता है । यही सहस्त्रशीर्ष भाग है एवं प्रत्यक्षदृष्ट चन्द्र-सूर्य्यबिम्ब इस पुरुष के चक्षु हैं । चक्षु मस्तक में होते हैं । मस्तक २१ पर प्रतिष्ठित सर्वज्ञ है । एक-विसो वा इतमादित्य के मनुसार यही सूय्यं है । यहीं कुछ नीचे चन्द्रमा है । दोनों से यह सारे विश्व का द्रष्टा बन रहा है । इसी चक्षुःप्रकाश से यह सबका साक्षी बन रहा है । इसीलिए इन्हें लोकचतुः कहा जाता है | बस - बिवस्परि प्रथमं जज्ञे चग्निः ० * वाला यही दिव्य प्रग्नि उस देवसत्य का मस्तक है । सूर्य - चन्द्रमा श्रख हैं एवं त्रैलोक्य में व्याप्त दिक्सोम इसकी श्रोत्रेन्द्रिय है । इसके वाक्माग से बेद १ यजुर्वेद ३१ । १ । २ शत ० ग्रा ० ६।२।३।३६ । ३ शत ० ब्रा ० १०।६।१।६ । ४ ऋग्वेद मं ० १०१४५।१ । [ en ]

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faatenure ( tra ण्ड ) प्रकट हुए मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्य निरूपण । ऋग् - यजुः साम तीन वेद हैं । सूर्य्यात्मक प्रादित्य प्रकृति के क्रम में ' वाक् ' स्थानीय है । वाक् मीतर मन है । वाक् ' प्राण - मन ' से अविनाभूत है, अतएव इसे ' वाक् ' के भीतर प्राण है । प्राण के कहा जाता है । ' अ ' मन है । ' उ ' प्राण है । जो तत्त्व ' अ ' और ' उ ' की याच्ञा करता है - स्वस्वरूप को प्रतिष्ठित रखने के लिए ' अ ' रूप मन ' उ ' रूप प्रारण की अपेक्षा रखता है वही प्रश्व उरच प्रयते- इस व्युत्पत्ति से ' वाक् ' कहलाता है । सूय्यं वाक् है - इसका तात्पय्यं यही है कि वह मनः प्रारण वाङ्मय है । जैसा कि प्रश्नोपनिषत् के ५ वें प्रश्न के माध्य में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वाक् से ऋग्वेद का प्रादुर्भाव है । प्रारण से यजुर्वेद का प्रादुर्भाव है । मन से सामवेद का प्रादुर्भाव है । इस प्रकार मन - प्राण- गर्भित वाक् - भाग ही वेदत्रयी का प्रादुर्भाविक है, प्रतएव सूर्य के लिए सेवा यी विद्यातपति - यह कहा जाता है । इस सौरवाङ्मय वेद को गायत्रीमात्रिक बेड कहा जाता है । यह वेद इस पुरुष से उत्पन्न हुमा है, मतएव इसे पौरुषेय वेद कहने के लिए तम्यार हैं । इससे मतिरिक्त एक पौ-रुषेय वेद भौर है, उससे यह पुरुष बना है । स्वयम्भूरूप बह्यसत्य का निःश्वासरूप वेद अपौरुषेय है । वह स्वयम्भू - वाक् से उत्पन्न होता है । उस वेद का वह्याग्नि से सम्बन्ध है । इसका वे सत्यरूप देवाग्नि से सम्बन्ध है । दोनों का मूल वाक् है, परन्तु वह भिन्न है - यह भिन्न है । यहाँ वाक् से सौरी - ऐ - द्रीवाक् प्रमि-प्रेत है । गायत्रीमात्रिक इसी से उत्पन्न होता है । सौरतेज गायत्री है । यही वेद की जननी है, मतएव गायत्री के लिए गायत्री वेदमातरम् यह कहा जाता है । इसके बाद भाता है अन्तरिक्ष । वायुरस्यम्त रिक्षे मित: ' -के भनुसार वायु भन्तरिक्ष में है । यही हिरण्यगर्भ है । यही व्यानवायु - प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान- इन पांच रूपों में परिणत होकर त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है - जैसा कि प्राणोपनिषत् ( प्रश्नोपनिषत् ) में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यही व्यानवायु त्रैलोक्य का हृदय हैं । पार्थिव मपान - सौरप्राण दोनों इसी व्यान के माश्रित हैं । जिस दिन हिरण्यगर्भरूप व्यान के साथ हृद्ग्रन्थि टूट जाएगी - उस दिन द्यावापृथिव्यात्मक सारा रोदसी विश्व ( जो कि ईश्वर का शरीर है ) नष्ट हो जाएगा । तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा? - के भनुसार इसी केन्द्रस्य हिरण्यगर्भप्रजापति के प्राधार पर सारा विश्व टिका हुआ है, अतएव इसी स्थान को हृदयस्थानस्थव्यान को - ( हृदयरूप व्यानात्मक हिरण्यगर्भ को ) हम इस साक्षी देवसत्य का विश्व कहने के लिए तय्यार हैं । विशति यत्र मात्मा यही विश्व का चिन है । वह विश्व में तभी तक प्रतिष्ठित है जब तक कि हृदयरूप व्यान प्रतिष्ठित है । विषय की विश्वता इसी हृदय पर प्रवलम्बित है, अतः हम इसे ही विश्व कहने के लिए तय्यार हैं । यही सहस्राक्ष-माग है एवं इसके पैरों से पृथिवी प्रतिष्ठित है । त्रिवृत्स्थान पृथिवी है । इसकी सत्ता वैश्वानर से है-यही इसके पैर हैं । यही वैश्वानर सहस्रपात् है - यही देवसत्य है - यही सारे भूतों का अन्तरात्मा बगता हुमा सर्वभूतान्तरात्मा नाम से प्रसिद्ध है । इसका वैश्वानर ' वैश्वानर ' बनता है । हिरण्यगर्भ ' तेजस ' बनता है । सवंश ' प्राज्ञ ' बनता है एवं भूमि ' शरीर ' बनता है । सूर्य्यं चन्द्रमा, चक्षु और मन बनते हैं । दिक् - सोम श्रोत्र बनते हैं । जैसी स्थिति उस साक्षी की है तदंशभूत मोक्ता की भी वहीं स्थिति है । उसका वैश्वानर १ ते ० ब्रा ० ३।११।१६ | २ यजुर्वेद ३१।१६ | [ २ ]

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द्वित tanusa ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य परावरात्मक ईश्वरीय देव सत्यनिरूपण यहाँ कभू बनता है । यह स्थूलशरीरामिमानी है । हिरण्यगर्भ ' तेजस ' बनता है - यह सूक्ष्म शरीराभिमानी है । सर्वज्ञ ' प्राज्ञ ' बनता है - यह कारण शरीराभिमानी है ' - इस पूर्वश्रुति में चन्द्र- सूय्यं ये दो ब्रह्मसत्य की वस्तु हैं । शेष देवसत्य हैं । देवसत्य त्रैलोक्य में व्याप्त है । रोदसी त्रिलोकी अवरार्घ्यं भाग है । मत्यंसूर्य्यं-चन्द्रमा पृथिवी तीनों मत्यं हैं । यही अपरब्रह्म है । देवसत्य अपरब्रह्मरूप है । सूय्यं से ऊपर परमेष्ठी-स्वयम्भूरूप परब्रह्म है । चूंकि देवसत्य श्रपरब्रह्म है एवं सूय्यं चन्द्रमा अपरब्रह्म की वस्तु हैं, प्रतएव ऋषि ने देवसत्य का निरूपण करते हुए सूर्य्य - चन्द्रमा का ग्रहण कर लिया है । पुरुषसूक्त कहता है कि सारा प्रपञ्च इसी से उत्पन्न हुआ है । स्वेदजादिसृष्टि, वेद, समुद्र, लोक, सब कुछ इसी से उत्पन्न हुए । बस, आगे के ५-६-७-८ - ९ इन मन्त्रों में इस देवसत्य से उत्पन्न होने वाली उसी सृष्टि का निरूपण है । ईश्वरीय सृष्टि निरूपण वह ईश्वरप्रजापति यज्ञरूप है । उस पाकयज्ञेश्वर की सृष्टि भी १- वेदयज्ञ, २- लोक, ३ - प्रजा, ४- पशु, ५ - प्रारण इन पांच भागों में विभक्त है । बस, भागे के प्रकरण में क्रमव्यत्यास से इन्हीं पाँच सृष्टियों का निरूपण है । इनमें हमारा पहला मन्त्र पशुसृष्टि का ही निरूपण करता है--" छन्दांसि, पोषा, प्रनानि सलिलान्यग्नयः क्रमात् । पञ्चैते पशवो नित्यं प्राणेष्वेते प्रतिष्ठिताः " ॥ -के अनुसार पशु कुल पाँच प्रकार के हैं । वयोनाथ छन्दपशु है । ब्रह्म - क्षत्र- विट्वीय्यं - वित्तादि पोष-पशु हैं । यज्ञान्न सप्तान्न- प्रपशु हैं! प्रागन्तुक व्यभिचारिधम्मं सलिलपशु है । पुरुष - प्रश्व - गो - अवि-मज पाँच प्रग्निपशु हैं । वैश्वानराग्नि पुरुष पशु है । पार्थिव खुरसात्मक प्रापोमय वरुणाग्नि ' धब्वपशु ' है! सौर रश्मिगत सावित्राग्नि गोपशु है । हरितप्राणाधार द्यावापृथिव्यात्मक ढं प्राणाग्नि मवि-पशु है । पार्थिव गायत्राग्नि प्रजपशु है । पाँचों पशु प्रग्निप्रधान होने से प्रग्मिरूप हैं । यह पञ्चविध भाग्यपशु उसी देवसत्य से उत्पन्न हुए हैं । इसी अग्निपशु लिए तस्माग्निः कहा है । वयोनाघरूप धन्यपशु, यज्ञ, सप्तरूप, पनपशु, भागन्तुक भावरूप सलिलपशु चारों का इसी अग्निपशु में अन्तर्भाव है । बाकी बचता है - पोषपशु । आगे का मन्त्रभाग इसी पोषपशु का निरूपण करता है-अग्नि का पोष सूय्यं है । पुष्टिकारक पदार्थ पोष है । सूय्यं प्रग्निमय है । यदि सूय्यं में से अग्नि निकलजाए तो सूय्यं श्रमी नष्ट हो जाए । भग्नि से ही यह पुष्ट हो रहा है, अतएव हम मग्नि को सूय्यं का पोष कहने के लिए तय्यार है । इससे उलटा भी है । सूर्य अग्नि का भी पोष है । पारमेष्ठप वरुणाग्नि सूर्य्यं का पोष है एवं त्रैलोक्य व्यापक रोदसीगत रुद्राग्नि का पोष सूर्य्य है । अग्नि सूय्यं का पोष हैं । इसलिए तो प्रग्ने मात्र मज रमासथ्यं रोहर्याद्दवि - कहा जाता है । यह अग्नि सूर्य्य से पहले उत्पन्न होता है । १ पेङ्गलोपनिषत् द्वितीय अध्याय । [ ६३ ]

पृष्ठ 98

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण यह अग्नि सौराग्नि का पिता है एवं रुद्राग्नि का पोष सूय्यं है । इसलिए भ्रयं ते योनिक स्वियो यतो जातो प्ररोचथाः १ - यह कहा जाता है । यह प्रग्नि सूर्य्यं का पुत्र है । इसी विज्ञान को श्रालङ्कारिक भाषा में समझाती हुई श्रुति कहती है-" स एष पिता पुत्रः । यदेषोऽग्निमसृजत तेनैषोऽग्नेः पिता । यवेत-मग्निः समदधात् तेनैतस्याग्निः पिता । उभयं हैतद् भवति पिता च पुत्रश्च ॥ " पाशुकाग्नि की समिवा ( पोष ) सूय्यं है । पांचों पाशुकाग्नि सूर्य्यरूप प्रग्निपोष से पुष्ट हैं । सूय्यं उस उत्पन्न मग्नि का समिघ है - पोष है । इसी अभिप्राय से कहा है-" समिधो यस्य ( पाशुकाग्नेः ) समिध: ( पोषः ) " । साथ ही में वह वारुणाग्नि सूय्यं का समिष है - यह भी समझ लेना चाहिए । सोम का पोष पर्ज्जन्य है । सर्वत्रव्याप्त दृष्टि का अधिष्ठाता वायुविशेष ही पर्जन्य है । इसका प्रादुर्भाव दिसोम से होता है । दिक्सोम का पोष यही पर्जन्य है । पोष पशु है । सोम इसका उपयोग करता है । वायु में सर्वश सोम भरा रहता है । इसीलिए तो वायु को ही सोम कह दिया जाता है । पृथिवी का पोष घोष है । भोष ऊष्मा है । प्रोषधियाँ अपने गर्भ में इस घोषपशु को धारणा करती हैं, प्रतएव घोषं बसे इस व्युत्पत्ति से इन्हें पौषषी कहा जाता है । प्रपि च - ये ही हमारे उवर में जाकर शरीर की गर्मी प्रतिष्ठित रखती हैं इसलिए भी इन्हें भोषघी कहा जाता है । प्रोष - तद्गभितमोषधियां दोनों पशु इसी पृथिवी से उत्पन्न होकर इसीके पोष बन रहे हैं एवं पुरुष का रेत स्त्री का पोष है । पुरुष स्त्री में इसका सिवन करता है । वही हुतरेस इस स्त्री के उदर को पुष्ट करता हुआ प्रजारूप में परिणत होता है । ब्राह्मण का पोष ब्रह्मविय्य है | क्षत्रिय का पोष क्षत्रवीय्यं है । वैश्य का पोष विश्वीर्य्य है । शूट का पोष विद पूषाप्राण है । प्रजा प्राणिमात्र का पोष है । तत्तत् प्राणी की तसत्प्रजा तसत्प्रया का पोष है । ब्रह्मवयं का गायत्राग्निरूप अग्निब्रह्म से सम्बन्ध है । शुतियत पनि शब्द में इस पोष का धन्तर्भाव है । क्षत्रवीय्यं का सावित्राग्निरूप सौर प्रग्नि से सम्बन्ध है । इस पोध का सूव्यंशब्द में प्रन्तर्भाव है । विश्वी का विश्वेदेवताओं से सम्बन्ध है । विश्वेदेव प्रापोमय हैं । सोम भाप: हैं । इस पोष का सोन शब्द में मन्तर्भाव है । पूषाप्राण पार्थिव है । यही शुद्र का प्रधिष्ठाता पोष हैं । इसका पृथिवी शब्द में धन्तर्मार्थ है । प्रजा रेतोमयी है । रेतोरूप प्रजा प्राणी का पोष हैं । इसका पुरुष शब्द में अन्तर्भाव है । इस प्रकार ' प्रग्नि - सूय्यं सोम - पृथिवी - पुरुष पांचों से ब्रह्मवीय्यं क्षत्रवीय्यं विड्वीय्यं सोद्वप्राण - अजारूप पाँचों पोष गतार्थ हो जाते हैं । पोषपशु का सर्वात्मना निरूपण करती हुई यह श्रुति मैथुनी सृष्टि के क्रमिक भवतार बतलाती है । ' छान्दोग्योपनिषत् ' में प्रजासृष्टि की मूलभूता जिस पञ्चाग्निविद्या का मसे विस्तार से निरूपण किया गया है, ऋषि एक ही मन्त्र से उस सारी विद्या का प्रतिपादन करा देते हैं । द्युलोकस्य प्रथमज सावित्राग्नि १ ऋग्वेद मं ० ३१२६११० । २ शत ० ब्रा ० ६।१।२।२६-२७ । [ ४ ]

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faatenure ( tra ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माष्य परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्य निरूपण भग्नि है । यह युलोक में रहता है । लोक लोकी को मभेद विवक्षा को आधार मान कर छु को ही अग्नि मान लिया जाता है । इसी के लिए - असो वाव लोको गौतमाग्निः १ - कहा है । इस दिव्य अग्नि को प्रज्वलित रखने वाला स्व - स्वरूप में प्रतिष्ठित रखने वाला वही सौर प्रादित्याग्नि है । प्रादित्य सर्वज्ञ है । यही पुरुष का शीर्ष भाग है । इसी से यह द्यु अग्नि उत्पन्न होता है । उत्पन्न होकर इसी समिघ से प्रज्वलित रहता है । सौरमण्डल दिव्यमण्डल है । इसका सूर्य्यं समिधा से समिद्ध है । बस, छान्दोग्य जिस इस अग्नि के लिए सौ वा लोको गौतमाग्निस्तस्थावित्य एव समित् ' - ये अक्षर कहे हैं, उसी के लिए उपनिषत् श्रुति ने तस्मादग्निः समिषो यस्य सूर्यः - यह कहा है । प्रारणदेवताओंों के व्यापार से चान्द्रसोम ( जो कि a नाम से प्रसिद्ध है ) इस अग्नि में धाहुत होता है । इस प्राहुति से भूतसोम उत्पन्न होता है । श्रद्धासोम प्राणरूप था, उसकी भाहुति से यह भूतसोम उत्पन्न हुआ । श्रद्धा प्राणरूप है, इसीलिए तो हम इसका प्रत्यक्ष करने में असमर्थ हैं । इस सोम से एक पर्ज्जन नाम का उत्पन्न होता है । वायु से ही यह प्रतिष्ठित है, प्रतएव वायु को इसकी समिघा कहा जाता है । पर्ज्जन्यवायु प्रग्नि है । इसमें वही सोम माहुत होता है । यह सोम पानी है । सोम ही स्वमपोऽजनयत् के अनुसार पानी बनता है । पर्ज्जन्य के भावार पर सोम पानी बनता है । यह पानी नमुचिप्राण के कारण पर्जन्यवायु के साथ बद्ध रहता है । प्रारणदेवतानों के मधिपति इन्द्र ( सौररश्मिगत विच्छेदक भासुरधम्मं विरोधी प्राग ) नमुचि का नाश करते हैं - उसी समय यह पानी पर्ज्जन - वायु द्वारा पार्थिव भग्नि में प्राहुत हो जाता है । इसी प्रिय से भूमि पञ्चम्या जिन्वन्ति - यह कहा जाता है । वही पानी पृथिवी के भग्नि में माहुत होकर षषि - वनस्पतिरूपन में परिणत होता है । इस अन्न की पुरुषाग्नि में भाद्भुति होती है । भर्थात् पुरुष इसे खाता है । इससे रस - प्रसृक्- मांस- मेदा- अस्थि मज्जा क्रम से वह हृत प्रतशुक्र बनता है । योषाग्नि ( स्त्री के गर्भगत रुधिराग्नि ) में इस रेत की माहुति होती है । इससे प्रजोत्पत्ति होती है । माहुतिद्रव्य रयि है । जहाँ प्राहुति होती है वह प्राणाग्नि है । प्रश्नोपनिषत् के बतलाए हुए रयिप्राणरूप प्रग्नि - सोम से ही सारा संसार बना है । श्रद्धा सोम - वृष्टि - प्रन रेत पांचों पानी हैं । इति तु पञ्चभ्यामाहुता यापः पुरुष सो मति के अनुसार पांचवीं प्राहुति में वही श्रद्धा प्रापः - क्रमशः सोम दृष्टि - मन- रेतरूप में परिणत होता हुआ प्रजारूप में परिणत होता है-१ -लोका नि २- पज्जैन्याग्नि- सोम ३- पार्थिवाग्नि - वृष्टि ४- पुरुषाग्नि --- मन्न ५ - योषाग्नि ---- रेत भाण रयि अग्नि सोम १ छान्दोग्योप ० ५ अ ० । ४ ख । १ । २ छान्दोग्योप ० ५।६।१ । [ ex ]

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण इससे ऋषि को बतलाना यही है कि जिस प्रजासृष्टि को तुमने प्रजापति से भिन्न समझ रखा है — यह तुम्हारी भूल है । वही तुम हो । पूर्वक्रमानुसार वही प्रजा बना हुआ है । बस, यह मन्त्र पोषप का निरूपण करता हुआ इसी प्रजासृष्टि के स्वरूप को हमारे सामने रखता है ॥। ५ ॥ वेद - यज्ञसृष्टि - निरूपण उसी के वाक्याग से तीनों वेद उत्पन्न होते हैं - जैसा कि चतुयं मन्त्र में बतलाया जा चुका है । उसी से दीक्षा - यज्ञ ऋतु संवत्सर - यजमान - लोक ( जिन लोकों में कि सूर्य्य भौर पवमानसोम प्रतिष्ठित हो रहा है ) उत्पन्न हुए हैं । दीखने में मन्त्र साधारण प्रतीत होता है । प्रक्षर बड़े सरत हैं क्योंकि ऋषियों की वाणी बडी ही सरल होती है । परन्तु भयं महागम्भीर है । वेद - यश- ऋतु - दक्षिणा संवत्सर - यजमान - सोक - दीक्षा भाषि सारे तत्व इतने कठिन हैं कि इनमें से प्रत्येक के निरूपण के लिए एक - एक स्वतन्त्र निबन्ध चाहिए । भाष्यकारों ने वेद में उपलब्ध भागत्रयविभक्त मन्त्रसंहिता, यज्ञ से अग्निहोत्रादि, असु से सग्रुप सोमयागादि ( मनुष्यकृत वैधयज्ञ मोर वैधऋतु ), संवत्सर से यज्ञ का काल ( जो कि काल- प्रधान यज्ञकर्म्म का अंग होते हुए कत्वयं है ), दक्षिणा से ऋत्विजों को दी जाने वाली नियमित दक्षिरणा, दीक्षा से भषिका समर्पण, यजमान से यशकर्ता मनुष्ययजमान, लोकों से यज्ञ से प्राप्त स्वर्गादि का ग्रहण किया है । हम इसका विरोध नहीं करते । हमारा तो प्रारम्भ से ही यह निश्चित सिद्धान्त है कि प्रायः बुति के मन्त्र मध्यात्म- अषिभूत प्रधिदेवत- इन तीनों पक्षों का निरूपण करते हैं । मनुष्यों का वषयश पश्चिभूत प्रपक्ष है । प्रकृति से होने वाला शारीरयज्ञ भाष्यात्मिकयज्ञ है एवं ईश्वरजगत् में होने वाला यश प्राषिदेविक प्रपच है । हमारा यह मन्त्र तीनों का समान रूप से निरूपण करता है । इन तीनों में प्रधानता friend की ही है क्योंकि सृष्टि का अधिष्ठाता वही है एवं यहाँ सृष्टि का ही निरूपण प्रक्रान्त है । सृष्टि के लिए वेद प्रपेक्षित है । ब्रह्म और यश इन दो भागों में ब्रह्म विभक्त है । मौलिकावस्था ब्रह्म है । यौगिकावस्था यज्ञ है । ब्रह्म ही यज्ञ में परिणत होता है । बिना बह्य के यश असम्भव है । ब्रह्य नाम है - वेदत्रयी का । ऋक् - यजुः साम का नाम ही ब्रह्म है । भारतस्य सृष्टि करता है परन्तु वेद को झागे रखकर । ऋक् - यजुः सामरूप त्रयीब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होकर ही वह यज्ञ करता है एवं यश लारा इस त्रयी का वितान कर सारा संसार बनाता है । इसी आधार पर— " वेदशब्देभ्य एवावो पृथक् संस्थाश्च निर्ममे " । ' - यह कहा जाता है । ईशोपनिषत् में विस्तार के साथ बतला दिया गया है कि संसार में उत्पन्न होने वाली वस्तुनों में सबसे पहले उत्पन्न होने वाला वेद है । वेद पर यज्ञ होता है । प्रग्नीषोमसमष्टि १ मनुस्मृति १।२१ । [ ६६ ]