Mundakopanoshad — पृष्ठ 21–30

Mundakopanoshad · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपमिषद्विज्ञानमाध्य पराविद्या निरूपण सकता है । हमारे जानने की तो यही वेदत्रयी है । इसके द्वारा उसे भले ही पहचान जाएँ । पहले प्राश्रय इसी का लेना पड़ता है । निष्कर्ष यही हुआ कि वेदत्रयी पहले प्रथर्वा में भाई, पथर्षा से बृहस्पति नाम के अंगिरा में भाई । अंगिरा से वाजानप्रेरक भरद्वाज में आई । इसी के द्वारा सूय्यंरूप अंगिरा में पूर्णरूप से उबुद्ध हुई । जो वेदनिधि गुप्त थी, वह सूम्यंरूप अंगिरा में प्रकट हो गई । विज्ञान प्रवृद्ध होने से जो शौनक ऋषि की तरह महाशाल होते हैं - वही इस अंगिरा से ( सूय्यं से ) वेदतस्व प्राप्त कर सकते हैं । यह है वेद का क्रमिक भवतार । यह है इस प्रकरण का पहला धाधिदैविक प्रथं । - * ----अध्यात्मपक्षा हमारे शरीर में ब्रह्म और देव भेद से ज्ञान दो प्रकार का हैं । ब्रह्म - ज्ञान ' ब्रह्म ' है - विष्यति है । देवज्ञान ज्ञान हैं जो चित् के धनुग्रह से सम्बन्ध रखता है । बह्मज्ञान मौलिक ज्ञान है । मानन्द, विज्ञान, मनोमय जो प्रध्यय का विद्याभाग है वही ब्रह्मज्ञान । इतर सारे ज्ञानों का यही ब्रह्मज्ञान आधार है एवं महान्, विज्ञान, प्रज्ञान इन तीनों का ज्ञान देवज्ञान है । इस देवज्ञान का ज्ञानपना उसी ब्रह्मज्ञान पर अवलम्बित है । इन तीनों ज्ञानों में भी क्रमिक भाव है । देवसत्यरूप भोक्तात्मा में प्रज्ञान ज्ञान पाता है । प्रज्ञान विज्ञानज्ञान से प्रकाशित है । विज्ञान महानुज्ञान से प्रकाशित है । महान् के ऊपर म्रयुक्त ब्रह्म है । इसके ऊपर प्रक्षर है । अक्षर के ऊपर अव्यय ब्रह्म है । प्रन्यय - ब्रह्म का प्रवतार सबसे पहले महान् में होता है । यद्यपि पहले उसका प्रागमन अक्षर में है । अनन्तर व्यक्त ब्रह्म में है, तद्वारा महान् में है । तयापि व्यक्तिभाव उसका महान् पर ही होता है । ऊपर तो वह अव्यक्त ही रहता है । महान, विज्ञान, प्रज्ञान तीनों देवमय हैं । विज्ञान के सम्बन्ध से महान भी देवतामयी मदिति से युक्त हो जाता है जैसा कि या प्रारलेन संभवत्यवितिदेवतामयी ' इस ' कट ' मन्त्र के निरूपण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वह प्रव्यक्तात्मा - अक्षरात्माविशिष्ट अव्यथब्रह्मज्ञान इन तीनों देवज्ञानों से प्रथमज है । प्रव्ययंरूप विज्ञान मध्यात्मपक्ष में बह्य है । यह अक्षर द्वारा स्वयम्भूरूप मव्यक्तब्रह्मा से युक्त रहता है, भतएव इसे ' ब्रह्मा ' कहा जा सकता है । तात्पम्यं यही है कि मध्यात्म में ब्रह्मा से वष्ययज्ञानमय प्रक्षर मय - मव्यक्तात्मा श्रभिप्रेत है । यही सारे बाष्यात्मिक जगत् का कर्ता है । चिदाभास ही प्राध्यात्मिक जगत् है । वह बित् यही ब्रह्मज्ञान है, मतएव हम इसे विश्वस्य कर्ता कह सकते हैं एवं यही गोप्ता है । इस बह्यकोष में यह धध्यात्मप्रपञ्च सुरक्षित है । इसका ज्येष्ठ पुत्र महानात्मा है । यह पारमेष्ठ्य भाग प्रथर्वा है । मम योनिर्महत्मा तस्मिन् गर्म वथाम्यहम् के अनुसार उस चिन्मय ब्रह्म का सर्व प्रथम इसी महान् पर भागमन होता है । वह चेतना इसी महदब्रह्म पर प्रतिष्ठित है । ब्रह्मविद्या से यहाँ प्रव्ययज्ञान ( चित् ) प्रमिप्रेत है । इसको महान् में प्रतिष्ठित करने वाला प्रव्यक्त ब्रह्मा है । इसका तात्पय्यं यही है कि प्रव्यय चिदज्ञान व्यक्त द्वारा महान् में प्रतिष्ठित होता है । महान् में माने वाला ब्रह्मविद्यारूप विज्ञान - महान् विज्ञान, प्रज्ञान ज्ञानरूप इतर देवविद्याओं की प्रतिष्ठा है । १ कठोप ० २।११७! २ गीता १४।३ । [ १३ ]

पृष्ठ 22

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venture ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्यानिरूपण प्रतएव इस चिज्ञान को हम ' सर्वविद्याओं को प्रतिष्ठा ' मानने के लिए तय्यार हैं । महान् के बाद विज्ञान है । विज्ञानात्मा सूर्य्य है । यह साक्षात् अंगिरा है । महान् प्रथर्वा अपने में पाई हुई उस ब्रह्मविद्या को सबसे पहले इसी अंगिरा में प्रतिष्ठित करता है । अर्थात् महान् द्वारा वह विज्ञान विज्ञान में माता है । भूतात्मा भारद्वाज है । भूतात्मा प्रन्नमय है, भतएव हम इसे मद्वाज कहने के लिए तय्यार हैं । वाज भन्न है । उसका मरण करने के कारण भूतात्मा भरद्वाज है । शरीर प्रग्नीषोममय पिण्ड है, मतएव शरीर सत्य है । जब तक भरद्वाजरूप भूतात्मा शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तब तक सत्यशरीर स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । सत्य शरीर का वहन चूंकि भूतात्मारूप भरद्वाज से होता है, प्रतएव हम इस के लिए स्वाहाय कह सकते हैं । ' सत्यवाह ' भारद्वाज के द्वारा वह ज्ञान अंगिरा में भ्राता है । वैश्वानर, तंजस, प्राक्ष में प्राज्ञभाग प्रादित्य है, भादित्य मंगिरा है । भूतात्मारूप भारद्वाज में भाया हुमा प्रष्यथ चैतन्यप्राशरूप अंगिरा में उल्बण होता है । इसी ज्ञान के सम्बन्ध से ' अंगिरारूप प्राश ' प्राप्त ( ज्ञानमय ) कहलाता है । इस प्रकार अध्यात्न- पक्ष में भी दोनों मन्त्रों का सर्वात्मना समन्वय हो जाता है । यह है इन मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ ॥। २ ॥ ३- प्राधिभौतिकपक्ष प्रापको यह सुनकर प्राश्चर्य होगा कि सुप्रसिद्ध बुखारा नाम के प्रदेश में जो कि पुष्कर का अपन स है, मनुष्य ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे । इनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथर्वा थे । ब्रह्मा ने सबसे पहले अपर्वा को ऐवविद्या का उपदेश दिया । ब्रह्मा द्वारा प्राप्त त्रयी - बिया के प्राधार पर प्रथर्वा ने ही सबसे पहले बेघयक्ष ( मनुष्य - यश ) का आविष्कार किया था । धरणि द्वारा मन्यन - प्रक्रिया के प्रथम प्राविधकर्ता एवं तदद्वारा यश के प्रवतक यही प्रथर्वा थे । जैसा कि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट हो जाता है-" यज्ञे रथर्वा प्रथम. पथस्तते ततः सूयों व्रतपा बेन पाजनि । आगा प्राजबुशना काव्यः सचा यमस्य जातमसृतं यजामहे ॥ इस मन्त्र का भी तीनों पक्षों में समान रूप से समन्वय होता है । प्रकृति में भी यज्ञ के प्रथम प्रवर्तक परमेष्ठी अथर्वा ही हैं । यश सृष्टि है । सृष्टि संसृष्टि है । यह धम्मं पानी का है । परमेष्ठी पोमय है । यज्ञ का प्रथम पथ प्रापोमय परमेष्ठी से ही बिसत होता है । इसके अनन्तर व्रतपा दीप्तिमान् सूय्यं प्रादुर्भूत हुए । सूय्यं साक्षात् अंगिरा हैं । परमेष्ठी के अनन्तर उस के पेट में सूर्य्य प्रकट होता है । घर अथर्वा से अंगिरा मौर मार्गद वंश चला था । कहना प्रकृत में यही है कि प्रथर्वा ने ही सबसे पहले विद्या का आविष्कार किया । यह विद्या प्रथर्वा के द्वारा अंगिरा में भाई तथा भंगिरा के द्वारा भरद्वाज में भाई । भरद्वाज ने इस विद्या के ' पर ' और ' भवर ' दो भेद किए । अवरविद्या, परविद्या भेद से मरद्वाज ने उस परम्परागत ब्रह्मविद्या को द्विधा विभक्त किया । प्रवरविद्या वेदविद्या हुई, परविद्या प्रक्षरविद्या नाम से प्रसिद्ध १ ऋग्वेद मं ० १।८३।५ । [ १४ ]

पृष्ठ 23

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण हुई । इन्हीं दोनों को ब्रह्मविद्या, देवविद्या नाम से भी व्यवहृत किया जाने लगा । ब्रह्मविद्या प्रर्थविद्या है । वेदविद्या - शब्दविद्या है । इस प्रकार हे विधे पेषितव्ये शभ्यवह्य परं च यत् के अनुसार भरद्वाज द्वारा वह विद्या - शब्दब्रह्म और परब्रह्म ( अर्थ - ब्रह्म ) दो भागों में विभक्त हुई । संहिता, ब्राह्मण, भारण्यक, उपनिषत्, सर्प, पिशाच, गन्धर्वादि उपवेद, ६ हों भंग, भादि सारी शब्द- राशि ' शब्द ब्रह्म ' कहलाई । यही भवरविद्या नाम से प्रसिद्ध हुई एवं परविद्या वह कहलाई- जिससे कि अक्षर जाना जाता है । इस प्रकार परम्परा से प्राप्त विद्या के दो विभाग कर भरद्वाज ने अपने प्रिय शिष्य अंगिरा को इस पद्मवर का चाचार्य बनाया । अंगिरा की ब्रह्मपर्वत् भारतवर्ष में थी । प्रभास क्षेत्र के पास विजन क्षेत्र है । यहीं से वृषद्वती नाम की नदी निकलती है । सामवेद में इस स्थान का धौर नदी का बड़े विरूप से निरूपण है । इसी विशन - क्षेत्र के पास परावर विद्यामेता महर्षि अंगिरा की ब्रह्मपर्षद थी । उधर गौनक- मार्गव थे । भृगु की ब्रह्मपर्यंत् ईरान में थी । ईरान में रहने वाले शौनक ने भारतवर्ष में रहने इसे अंगिरा की परावरविद्या की प्रशंसा सुनी । उनसे न रहा गया एवं वे उदारचेता शौनक झट समित्पाणि बनकर अंगिरा की सेवा में उपस्थित हो गए । यदि कोई संकुचित विचार का मनुष्य होता तो गर्व में प्राकर उपेक्षा करके बैठा रहता । परन्तु शौनक संकुचित विचारों के मनुष्य न ये । इसीलिए तो तत्कालीन विद्वानों ने उन्हें ' महाशास ' ' की उपाधि से विभूषित कर रखा था । ऐसे महालाल atch यथाविधि अंगिरा के समीप शिष्यरूप से उपसन्न हुए एवं विनीत भाव से समन करने लगे-" कस्मिन्तु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति " - इति ॥ ३ ॥

हे भगवन्! ऐसा वह कौन सा तस्य है, जिसे जानने पर सब कुछ विशास हो जाता है? महर्षि अंगिरा उत्तर देते हैं-" द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो अवन्ति परा चैव प्रपरा " ॥ ४ ॥

प्रश्न और उत्तर पर ध्यान दीजिए । शौनक प्रश्न करते हैं कि किसे जान लेने पर सब कुछ बाम जिया जाता है? उत्तर मिलता है - दो विद्या जानने की हैं । प्रश्न था - प्रमेय का । उत्तर होने लगा-प्रमाण का । ' विज्ञाते ' का मयं है - प्रत्यक्षीकृते शामविषयीभूते । ' जो तस्व विज्ञात होने पर इतर बारे प्रपञ्च का मी ज्ञान करवा देता है- यह बतसानो - इस प्रकार शौनक ' प्रमेय ' तत्व की जिज्ञासा रखते हैं । ऋग्वेदादि परविद्या एवं मक्षररूप पराविद्या दोनों उस प्रमेय का ज्ञान करवाने वाले प्रमाण हैं । परावरविद्या से उस प्रमेय का ज्ञान होता है । परावर विद्या साधन है, प्रमाण है । तज्जन्य ज्ञानसत्य साध्य है - प्रमेय है । प्रश्न था - प्रमेय का, उत्तर मिल रहा है प्रमाणसम्बन्धी । यह कैसी गड़बड़? कैसी १ जैसे भाजकल म ० म ० सी ० प्राई ० ई ० प्रादि भिन्न - भिन्न उपाधियां होती हैं एवमेव उस समय विशिष्ट विद्वान् को - ' महाशाल ' को उपाधि से विभूषित किया जाता था । [ १५ ]

पृष्ठ 24

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्या निरूपण अव्यवस्था? इस प्रकार साधारण दृष्टि से देखने पर उपोद्घात - संगति में पाक्षेप करने का अवसर प्रतीत होता है । परन्तु सूक्ष्मवृष्टि से विचार करने पर प्राक्षेप को कोई स्थान नहीं मिलता । वस्तुज्ञान में- ' प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति, प्रमाता ' ये चार खण्ड होते हैं । प्रमाता - प्रमाण- प्रमिति - प्रमेय इन चारों के समुदय का नाम ' प्रत्यक्ष ' है । घटमहं जानामि - इस घटप्रत्यक्ष में ( घट ज्ञान में ) धारमा प्रमाता है । इन्द्रिय प्रमाण हैं । घट प्रमेय है । घटं धानामि - यह प्रमिति है । चारों का अब प्रभेद हो जाता है, दूसरे शब्दों में चारों जब एकत्र समन्वित हो जाते हैं तब घटमहं जानामि - इत्याकारक पट - शान होता है । शान में प्रमाण - प्रमाता - प्रमेय प्रमिति चारों प्रमिल हैं, एक वस्तु हैं । प्रमाण और प्रमेय चूंकि प्रमिल हैं - एक वस्तु हैं, अतएव प्रमेयविषयक प्रश्न में प्रमाणविषय का उत्तर देना अनुचित नहीं कहा जा सकताः । प्रत्यक्ष, धनुमान, उपमान, शब्द भेद से प्रमाण चार प्रकार के हैं । इन बारों में से प्रकृत में. शब्दप्रमाण का ग्रहण है । शब्दप्रमाण द्वारा वह प्रमेय ज्ञात होता है । शब्दप्राणरूप पद्यपरविचा मौर इससे प्रमेय तत्व प्रभिन्न हैं । बस, इस प्रमिलता को लक्ष्य में रखकर हो कस्मिन्नु विज्ञाते सर्वमि विज्ञातं मयति- इस प्रमेयविषयक प्रश्न का-हे विवेदितव्ये इति स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा वेद अपरा च ॥४ ॥

इस प्रकार शब्दरूप प्रमाण को भागे रखकर अंगिरा उत्तर देते हैं । प्रपि च - मागे जाकर उत्तर प्रमेय का ही देने वाले हैं । प्रमेय के प्रसंग में परापरविधा पड़ती है । भतः प्रसंगागत उत्तर में प्रमाणरूप परापरविद्या का उल्लेख है । ऐसी अवस्था में पूर्व के प्राक्षेप का कोई मूल्य नहीं रह जाता । इस प्रकार उपोद्घात संगति में कोई बाधा नहीं पहुंचती । यह है - उपोषात संगति । शौनक का समाधान करते हुए अंगिरा परापरविद्या के भेद का निरूपण करते हुए कहते हैं वेदितव्य के सम्बन्ध में परा - मपरा दो विद्याएं वेदितव्य हैं । इन दोनों में अपराविद्या - ग्वेद यजुर्वेद सामवेद- प्रथर्षदेव, शिक्षा - कल्प - व्याकरण - निरुक्त छन्द - ज्योतिष, इतने भागों में विभक्त है । इस शब्दप्रपञ्च से शब्दग्रह्मरूपा पराविद्या का ज्ञान होता है एवं पराविद्या वह है जिससे कि अक्षर का ज्ञान होता है । हम बतना पाए हैं कि परब्रह्मविद्या पराविद्या है एवं शब्दब्रह्मविद्या अपराविद्या है । परब्रह्मविद्या में अव्यय - अक्षर - क्षर - विशेष हैं एवं ब्रह्मविद्या में - स्फोट- स्वर वर्ण विशेय हैं । शब्द - ज्ञान द्वारा जो वस्तुमान होता है, वह शाम शब्दब्रह्मज्ञान है एवं परीक्षा द्वारा उस शब्दजन्य शाम को प्रत्यक्ष कर लेने से जो ज्ञान होता है वह परब्रह्म ज्ञान है । गो शब्द के सुनते ही ' गौ ' का ज्ञान हुमा । ' ब्रह्म ' शब्द सुनते ही ' ब्रह्म ' का शाब्द बोध हुआ । प्रनन्तर मनननिदिध्यासन द्वारा उसका स्वरूपज्ञान हुमा । सारा शब्दप्रपञ्च केवल शाब्दबोध करवाता है । शाब्दबोधानन्तर यथार्थ ज्ञान तो ममननिदिध्यासन पर ही निर्भर 1 वहाँ शब्द की दोड़ नहीं है । यमेवैध वृणुते ० के अनुसार यह परब्रह्म - ज्ञान केवल गुरु द्वारा बतलाए हुए मार्ग से भात्मा द्वारा ही प्राप्त हो सकता है । सारे वेद - वेदाङ्ग सुन लो । इससे केवल शाब्द- ज्ञान होगा । दरखा का ज्ञान होगा । परब्रह्मरूप अक्षरब्रह्म का ज्ञान तो परा विद्यारूप भ्रात्मविद्या से ही होगा । वह मात्मविद्या शब्दब्रह्म से पृथक है । गुरूपदेशादि से ही गम्य है । उसको जानना ही असली जानना है । परब्रह्मविद्या शब्दविद्या से पृथक् है । स्वानुभर्वकगम्य है । मनननिदिध्यासन सापेक्ष है, मतएव [ १६ ]

पृष्ठ 25

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्यानिरूपण अंगिरा ने अपराविद्यावत् इसके लिए किसी ग्रन्थ का नाम नहीं लिया । श्रपि तु शब्दब्रह्मप्रतिपादक ग्रन्थों का उल्लेख कर भय परा यथा तदक्षरमधिगम्यते - इतना मात्र कह कर ही प्रक्षर का निरूपण प्रारम्भ कर दिया । उल्लेख करें किसका? जबकि परब्रह्मविद्या शब्दातीत केवल प्रात्मसंवेद्य है || ५ || बस, इसी अक्षरतत्त्व का निरूपण करते हुए अंगिरा कहते हैं--" यत्तददेश्यम्, प्रग्राह्यम्, प्रगोत्रम्, प्रवर्णम्, प्रचक्षुः श्रोत्रम् तदपारिण-पादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं, सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनि परिपश्यन्ति घोराः ” ॥६ ॥

इस मन्त्र में सत् पद का चार स्थानों में उल्मेल है । ये चारों तत्पद बड़े अभिप्राय से निर्दिष्ट हुए हैं । ऋषि को इन चारों से गुप्त रहस्य का प्रतिपादन करना है । ' यत् ' पद साकांक्ष है । उस साकांक्ष भाव की निवृत्ति ' तत् ' पद से की गई है । ' यत ' का ' जो तत्त्व प्रक्षर नाम से प्रसिद्ध है ' यह प्रर्थ है एवं ' तत् ' पद का ' वह अक्षर ऐसा है ऐसा है ' -यह घर्ष है । पहले तत् का अद्वेश्यम्, प्रगोत्रम्, प्रवर्णम् के साथ सम्बन्ध है । दूसरे ' तत् ' का प्रचक्षुः योगं के साथ सम्बन्ध है । तीसरे ' तत् ' का प्रपाणिपादम् नित्यं विभुं सर्वगतं, सुसुक्ष्म के साथ सम्बन्ध है— " परया विद्यया विज्ञेयं यदक्षरं तत् प्रवेश्यं प्रगोत्रम् प्रथम् । ( पुनश्च ) प्रचक्षुः श्रोत्रं तत् ( पुनश्च ) अपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं, सुसूक्ष्मं तत् । यत्- ( ईदृशं - पूर्वलक्षरणोपेतं ) भव्ययं, सूतयोनि सुप्रसिद्धं तस्यं-विद्वांसः परया विद्यया पश्यन्ति तदेवाक्षरम् " । मन्त्र का यही धन्वय है । मन, बुद्धि, चित्त, महंकार ये चारों अन्तःकरण हैं । मन प्रज्ञान है । बुद्धि विज्ञान है । चित्त शुद्ध सत्त्व है । महंकार महान् है । महद - शान अहंकार है । सस्वानुभव ( सुखानुभव ) चित्त है । निश्चयात्मक ज्ञान बुद्धि है । संकल्पात्मक ज्ञान मन है । ये चारों ज्ञान उस प्रक्षर ज्ञान के पेट में हैं । उस ज्ञान से ये चारों अन्तःकरण प्रकाशित हो रहे हैं । ये चारों उसके अंश हैं । इन चारों के भीतर वह प्रतिष्ठित है । इन चारों का रुख बाहर की पोर है, प्रतएव ये बाहर के विषयों का ही ग्रहण करने में समर्थ होते हैं । सर्वान्त रतम- मक्षरज्ञान - चिन्मूति इन चारों की अपेक्षा से प्रग्राह्य है । वह स्वयं विज्ञाता है । उस विज्ञाता को कौन जान सकता है? महदादि में जो जानने का सामय्यं है - वह इसी विज्ञाता - द्रष्टा - श्रोता - मन्ता - मन्तर्यामी अक्षर से प्राप्त हुआ है । ऐसी अवस्था में हम उस अक्षर को भवश्य ही इन चारों मन्तःकरणों से ' भग्राह्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । अग्राह्यम् का अन्तःकरणशून्य म् अन्तःकरणातीतम् - यह अर्थ है एवं प्रद्वेश्यम् का भयं है -दृश्यम् । वाक् प्रारण - चक्षु श्रोत्र - मन ( इन्द्रियमन ) ये पाँचों इन्द्रियाँ बहिष्करण हैं । वह पांचों से प्रतीत है । पराङ्मुख बहिष्करण अन्तर्मुख प्रक्षर कैसे देख सकते हैं? प्रद्दृश्यम् का अर्थ है - चक्षुषा प्रग्राह्यम् । यहाँ का चक्षुपद पञ्चेन्द्रिय का उपलक्षण है । वह भद्रेश्य है, अतएव उसके लिए न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य ० - इत्यादि कहा जाता है । [ १७ ]

पृष्ठ 26

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्या निरूपण श्रन्तर्बहिरिन्द्रियातीतम् - प्रद्रेश्यमग्राह्यम् - का यही तात्पर्य्यायं है । वह भगोत्र है । गोत्र शब्द है । शब्द वाक् है । वह तदगम्य है प्रर्थात् मनिर्वचनीय है, भवणं है, पर्यात् नीरूप है एवं प्रचक्षुश्रोत्र है-अर्थात् स्वयं इन्द्रिय- शून्य है- इन्द्रियों से ग्राह्य है एवं स्वयं मी इन्द्रिय- शून्य है । ज्ञानेन्द्रियविकल होने से मचक्षुः श्रोत्र है । कम्र्मेन्द्रियविफल होने से पाणिपाद है । वह नित्य है । व्यापक है । सर्वगत है । मर्यात् तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः के अनुसार वह सर्वबाह्य है सर्वान्तरित है । कदाचित् कोई प्रश्न करे कि परमाणु तो प्रतिसूक्ष्म है, निरवयव है । उसके भीतर यह कैसे घुस सकता हैं? इस प्राशंका को दूर करते हुए ऋषि आगे जाकर कहते हैं कि वह सुसूक्ष्म है । पर्थात् जिस परमाणु को तुम प्रवेशशून्य मानते हो, सूक्ष्म मानते हो - यह अक्षरतत्त्व उससे मी सूक्ष्म है, सूक्ष्मतम है । मतः परमाणुमें कैसे व्याप्त हुमा? अक्षर के सम्बन्ध में यह व्याप्तिविषयक संदेह व्यर्थ है । यही अक्षर-अव्यय है, यही भूतयोनि है अर्थात् क्षर है श्रव्यय ज्ञानरूप है । क्षर विकुर्वाण है, प्ररूप है । मध्यपतित - मक्षर कुर्वाण है । अक्षर से ही अव्यय का विकास होता है, इसी से भूतयोनि ( भूतोपादान-रूप ) क्षर का विकास होता है । प्रतएव हम अक्षर को ही अव्यय कह सकते हैं, अक्षर को ही क्षर नाम से प्रसिद्ध भूतयोनि कह सकते हैं । क्षरः सर्वाणि भूतामि ' के अनुसार भूतजात ' क्षर ' है । भूतसमूह पर व्याप्त रहने वाला कूटस्थतस्व ' अक्षर ' है । सर्वालम्बनतत्त्व प्रव्यय है । इस प्रकार भव्यय - प्रक्षर - क्षर छीनों के ग्रहण से सारे प्रपञ्च का ग्रहण हो जाता है । इनमें जो क्षर को जानता है वह अक्षर मोर भव्यय को नहीं जानता एवं बिना अक्षस्थान के अव्यय जाना नहीं जा सकता, क्योंकि प्रक्षर मध्यस्थ सेतु है । इस प्रकार क्षर और धव्यय दोनों ही धनुपयोगी हैं । परन्तु जो मध्यस्थ अक्षर को जान जाता है - वह क्षर धौर प्रव्यय को जानता हुआ सब कुछ जान जाता है । एतस्येवाक्षरं ब्रह्म ०२ - इत्यादि कठति के अनुसार अक्षर ही ब्रह्म ( क्षर ) है, यही पर ( भव्यय ) है । मागे धाने वाले मुण्डक में इसी विषय का विस्तार से निरूपण होने वाला है । अतः यहाँ प्रषिक न कह कर केवल यही कहना पर्याप्त समझते हैं कि जिसके जानने से सब कुछ जाम लिया जाता है, वह केवल परावर अक्षर ही है । इसी अभिप्राय से “ भिचते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः 1 क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे " ॥ यह कहा जाता है । इसीलिए ऋषि ने प्रक्षर के लिए तहव्ययं यद्भूतयोनि - कहा है । ' अग्राह्यम्-प्रगोत्रम् - चवणंम् - प्रचक्षुःश्श्रोत्रम् - मपाणिपादम् -- इतने धम्मं अक्षर के हैं एवं ' नित्यं विभुं सर्वगतम् - सुसूक्ष्मम् ' इतने धम्मं भव्यय के हैं । ' भूतयोनि ' क्षर है । इसी भेद को सूचित करने के लिए तीन स्थानों पर ' तत् ' का उल्लेख किया गया हैं-१ गीता १५।१६ । २ कठोप ० ११२।१६ । ३ मुण्डकोप ० २।२८ | [ १ ]

पृष्ठ 27

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verse ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्या निरूपण माण्डूक्य-अष्टम् भग्राहाम tarantia अलक्षणम मव्यपदेश्यम् एकात्मप्रत्ययसारम १- प्रदेश्यम् - चक्षुषा प्रग्राह्यम् ( वाक्प्राणादिवहिष्करण शून्यम् ) । २- प्राह्यम् - मनोबुद्धिचित्ताहंकारात्मकान्तः कर रणशून्यम् । ३- प्रगोत्रम् - पनिर्वचनीयम् भूतमात्रा शून्यम् । ( ४- अचक्षुः श्रोत्रम्- ज्ञानेन्द्रिय विकलम् - प्रज्ञामात्रा शून्यम् -ए - मपाणिपादम् -कम्मेन्द्रिय विकल्पम् प्राणमात्रा शून्यम् ६- निरयम् - भविनाशि ७- विभुम् व्यापकम् ८ - सर्वगतम् -- सर्वदाह्यम् - सर्वान्तरितम् १ - सुसूक्ष्मम्- परमाण्वादेरपि सूक्ष्मतमम् - मतएव सर्वत्र व्याप्तम् । १०- मव्ययम् - एतनामकम् अचिन्त्यम् प्रपवोपशमम ११ - भूतयोनिम् - क्षररूपम् १- मद्देश्यम् शरष्टम् --इन्द्रियातीतम् २- प्राथम् ३- भगोत्रम् } पनि चनीयम् ४- श्रचक्षुः श्रोत्रम् अलक्षणम् स्वयमपि इन्द्रियशून्यं निर्धर्मकम् -पाणिपादम् ६- नित्यम् ७- विभुम् ८- सर्वगतम् १०- अव्ययम् ११ - भूतयोनिम् [ १६ ] १ -ए २ - एतादथमव्ययम् ३ } –एतादृशं क्षरम्

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मुण्डक ( प्रथमखण्ड ) पराविद्या निरूपण मन्त्र के अक्षर - अक्षर में चमत्कार है । अव्यय और अक्षर अमृतरूप हैं । परन्तु क्षर विकुर्वाण होने से मभावान है । इसी भाव को सूचित करने के लिए ऋषि ने प्रक्षर और अव्यय के साथ तो ' तत् ' ' तत् ' कहा है परन्तु क्षररूप भूतयोनि के साथ ' यत् ' का सम्बन्ध किया है । अक्षर और अव्यय दोनों ही मृत है, सुसूक्ष्म है, मतएव प्रथमप्रायादि हैं । शुद्धरूप से श्रव्यय और अक्षर दोनों ही गोचर हैं -- प्रनिर्वचनीय हैं । हाँ, क्षररूप से हम इन दोनों को देख सकते हैं । अक्षर का क्षररूप देखा जा सकता है न कि अक्षर मौर श्रव्यय इसी गुप्त रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने -यह भूतयोनि परिपश्यन्ति बीरा: - कहा है अर्थात् उसके मूतयोनिरूप क्षर को ही धीर विद्वान् देखने में समर्थ होते हैं । इससे एक विद्या यह भी सिखलाई जाती है कि तुम अक्षर और भव्यय को भूतप्रपञ्च में ही प्राप्त कर सकते हो । प्रत्येक के मीटर क्षर 1 उसके भीतर अक्षर है । अक्षर के भीतर अव्यय है । इस मृतात्मतत्त्व को मूर्खमनुष्य प्रत्यक्षरष्ट भौतिक पदार्थों में नहीं देखते । परन्तु धीर विद्वान् पराविद्या से भूतयोनिरूप क्षर में उमें जान लेते हैं । इस प्रकार थोड़े से शब्दों से अंगिरा ने शौनक के

कमन्तु विज्ञाते भगवो सर्वमिदं विज्ञातं मयति -- इस प्रश्न का समाधान कर दिया ।

॥ ६ ॥

मन्त्र के मत में योनिम् कहा है । भूतयोनि को हमने क्षर बतलाया है । क्षर ही विश्व का उपादानकारण है । प्रक्षर निमित्तकारण है । परन्तु भ ह में प्रचापतेरात्मनो मर्त्यमा सोममृतम् -- इस सिद्धान्त के धनुसार क्षर अक्षरप्रजापति का ही प्रा er भाग है । अतः भूतयोनिरूप कार से उत्पन्न होने वाले विश्व को उसी प्रकार अक्षर से उत्पन्न होने वाला मान लिया जाता है - जैसे कि फौज का लड़ना--राजा का लड़ना मान लिया जाता है । अक्षर के स्वभागरूप भूतयोनि भर से विश्व उत्पन्न होता है, अतः हम कह सकते हैं कि अक्षर से ही विश्व उत्पन्न होता है । अक्षर को जानने से सब कुछ जाना जा सकता है - ऋषि को यह बतलाना है । इसके लिए ऋषि निम्नलिखित अक्षरविभूतिप्रकरण प्रारम्भ करते हैं । इसमें इनको यही बतलाना है कि सारा fare अक्षर से उत्पन्न हुआ है । अतः जैसे मिट्टी को जानने से सारा मृत्प्रपश्व विकास हो जाता है, एक स्वर्ण को जानने से कटककुण्डलादि सब प्राभूषणों का ज्ञान हो जाता है, एक त को जानने से पटमात्र के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, इसी प्रकार विश्वोपादानभूत उस प्रक्षर को जान लेने से सारा विश्व घोर विश्वातीत अध्ययतस्त्र दोनों का ज्ञान हो जाता है । इसी अभिप्राय को सक्ष्य में रखकर अक्षर की सर्वव्यापकता एवं उसका सर्वज्ञानपरत्व बतलाते हुए अंगिरा कहते हैं-" ययोर्णनाभिः सृजते गृहते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम् " ॥७ ॥

१ शत ० ग्रा ० १०/१३२ । [ २० ]

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seines ( ena ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्या निरूपण अक्षर कारण है, विश्व कार्य है । इस विश्वरूप कार्य एवं कारण रूप अक्षर की परस्पर समष्टि ही ' सर्वम् ' है । मक्षरकारण का विश्वकाय्यं के साथ अनन्त प्रकार का सम्बन्ध है । वैज्ञानिकों ने उन मनन्त कार्य्यं कारणसम्बन्धों का १३ प्रकार के काय्यं कारणों में समन्वय माना है । छान्दोग्य उपनिषत् में इन १३ कारणों का विस्तार के साथ निरूपण है । उन १३ हों में से प्रकृतमन्त्र में केवल तोन काम्यं-कारणों का उल्लेख हैं । भतः हम यहाँ उन सीन पर ही प्रषिक प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे-मकड़ी कारण है एवं मकड़ी से उत्पन्न होनेवाला जाल काय्यं है । पृथिवी कारण है- औषधि वनस्पति काय्यं हैं । पुरुष कारण है, केशलोम काव्यं हैं । तीनों ही कारण उपादान हैं । परन्तु तीनों में मन्तर है । पहले उर्णनामि को ही लीजिए । मकड़ी की नाभि में से जाल पैदा होता है । यह जाल उत्पन्न होकर प्रमवस्थान से पृथक रहता हैं एवं प्रभव में इसका विमयनत्व है भी घोर नहीं भी एवं प्रमय से पृथक् से चर भी है । इस प्रकार यहाँ प्रभवानासम्बनत्व, प्रभवविलयनत्वाविलयनत्व, प्रभव-पृथक् चरत्य है । मकड़ी का जाला मकड़ी से ( अपने प्रभव से ) प्रलग अधर रहता है । परन्तु मकड़ी उसे अपने में समेट लेती है । इसलिए हम इस काव्यं को प्रभव में विलीन होनेवाला मान सकते हैं एवं मकड़ी का जाना प्रभव से पृथक्चर भी है । उसे अलग भी किया जा सकता है । अब चलिए पोषषि वनस्पति की प्रोर । भोषधि वनस्पति में पौषधि वनस्पतियां प्रभव पृथिवी में घासम्बित रहती हैं एवं इसी में इनका विलय है । परन्तु हैं, ये पृथक् चर । पृथिवी भाग से अलग ही इनका निर्गम होता है । पृथिवीमूल में लम्बित रहती हुई प्रौषधि वनस्पतियाँ ऊपर बढ़ती हैं । यही इनका पृथक्चरत्व है । भव चलिए-केशलोम की भोर । इनका प्रभव में विलयन नहीं है एवं प्रभव से पृथक् चर हैं एवं प्रभवालम्बनत्वा-नालम्बनत्य दोनों हैं । इस प्रकार ऊर्णनाभि में प्रभवानालम्बनत्व है । प्रभवविलयना विलयनत्व है । मकड़ी चाहती है सो जाले को अपनी नाभि में ही लीन कर लेती है एवं उसकी प्रनिच्छा पर वह उसके बाहर ही रहता है एवं मकड़ी का जाला नाभि से ऊपर अलग रहता है, स्वतन्त्र संस्था बनाता है, प्रतएव हम इस जाल को ' प्रभव पृथक्चर ' कहने के लिए तय्यार हैं । प्रौषषि बोर वनस्पति में मकड़ी के जाल की अपेक्षा अन्तर है । प्रोषषि - वनस्पति घपने प्रभव पृथिवी में स्थान मालम्बित ही रहती हैं । काट कर अलग फेंक दो तब भी इनका घालम्बन वही पृथिवी रहेगी । मकड़ी का जाल जैसे मकड़ी के शरीर से अलग हो सकता है एवमेव ये श्रौषधि - वनस्पति कभी पृथिवी के शरीर से पृथक नहीं हो सकती एवं इनका विलयन पृथिवी में ही होता है । मकड़ी में विलयन प्रविलयन दोनों बातें रहती हैं । यहाँ केवल विलयन ही है एवं पृथक्चरत्व जाल धौर प्रौषधियों में समान है । पुरुष से उत्पन्न केशलोम में पालम्बन-त्वानालम्बनत्व दोनों धर्म्य हैं । मकड़ी में मनालम्बनस्य ही है । पृथिवी में धालम्बनत्व ही है । परन्तु यहाँ ( केशलोम में ) दोनों धम्मं हैं । जब तक केशलोम शरीर पर हैं तब तक तो ये प्रभवालम्बित हैं । शरीर से काट कर अलग फेंक देने पर प्रभवानालम्बित हैं । घोषधि को काट कर फेंकोगे तब भी उसका प्रालम्बन पृथिवी भवश्य ही रहेगी । मकड़ी का जाल पैदा होते ही अलग रहता है एवं केशलोम में जाल - प्रोषि की तरह प्रभवविलयनत्व भी नही है । हो, पृथक्चरत्व अवश्य है । इस प्रकार तीनों उपादान कारणों में कुछ - कुछ अन्तर है । पिता - पुत्र में भी उपादान कार्य्य - कारणभाव है । परन्तु यह उन तीनों से विलक्षण है । इसमें न पुत्र का प्रभव में ( पिता में ) भालम्बन है । न विलयन है । केवल पृथक्चरत्वमात्र है । [ २१ ]

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veness ( reads ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है । यह इन चारों से विलक्षण कार्य्य - कारणभाव है । घड़ा मिट्टी में मालम्बित है । इसका विलयन मिट्टी में ही होता है । परन्तु जाल, भौषधि, केशलोम, पुत्रवत् घड़ा मिट्टी से पृथक्चर नही है । वह्नि से विस्फुलिंग उत्पन्न होते हैं । यहाँ भी उपादान सम्बन्धी काय्यं-कारणभाव है । परन्तु यह पूर्व के पाँचों काय्यं कारणों से विलक्षण है । एक दीपशलाका से अन्य दीपक जल उठता है । उस धन्य दीपक के जलने का कारण दीपशलाका है । परन्तु शलाकाग्नि की जरा सी मात्र मी उस अन्य दीपक में प्रविष्ट नहीं होती है, परन्तु कारणता है । कुम्हारवत् निमित्तकारणता का भी ऐसे स्थल में समन्वय नहीं हो सकता एवं मृषादि की तरह उपादानकारणता का भी समन्वय नहीं हो सकता । इस प्रकार अनन्त प्रकार के विचित्र काम्कारणमाय हो जाते हैं । इतना होने पर भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उन सब काय्यं कारणों का अन्तर्भाव कुल १३ ही काय्र्यकारणों में हो जाता है । उन १३ हों में ऋषि न यहाँ ३ ( तीन ) काय्र्य्यं कारणों का उल्लेख किया है-प्रभवानालम्बनत्व १-२ प्रभवविलयनत्वाविलयनत्व • ' यथोमाभिः सृजते गहने च ' • प्रभवपृथकचरत्व प्रमवालम्बनत्व २- २ प्रभवविलयनस्व ( प्रभवट्टषक्चरख श्रमवालम्बनत्वानालम्बनस्थ ३-२ प्रमवाविलयनत्व अभयचरत्व प्रधानालम्बनत्क -- ' यथा पृथिव्यानविषयः संभवसि - ' यथा सतः पुरुषात् केोमानि Y प्रभवा विलयनत्व - ' यथा पितुः पुत्रः ' अभवपृथक्चरत्व प्रभवालम्बनस्व ५-प्रभव विलयनत्व → थथा मृत्सिहातो: ' प्रभवापृयकुचरत्व [ २२ }