Mundakopanoshad — पृष्ठ 121–130
Mundakopanoshad · पृष्ठ 121–130
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fastenure ( facta ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय रहने वाले पुररूप वाचस्पति, सूत्र आदि पशु हैं । महान् श्रात्मा है । रविप्राण प्राण हैं । सूय्यं, बृहस्पति-ब्रह्मणस्पति, सविता भादि पशु है । विज्ञानात्मा श्रात्मा है । विषणा प्राण प्राण है । पृथिवी, मंगल, बृहस्पति, शनि, बुध प्रादि पशु हैं । प्रज्ञान आत्मा है । प्रज्ञाप्रारण प्रारण है । २७ गंधर्व पशु हैं । शरीर मात्मा है । भूतप्राण प्राण है । पञ्चभूत पशु हैं । इस प्रकार प्रत्येक प्राकृतात्मा में मात्मा - प्राण- पशुरूप पद, पुनःपद, पुर ये तीन -तीन विभाग हो जाते हैं-अव्यक्त चारमा - पदम् पुरुषः १ - वरु १ - मव्यक्तपदम् वाक्प्रारणी प्रारण - पुनः पदम् - प्रकृतिः प्रजापतिः सूत्र, वाचस्पति आदि स्वयम्भू के पदार्थ पशु-- पुरम्--- - विकृतिः J महान मात्मा -- पदम् --- पुरुषः २- महत्त् २- महत्पत्रम् प्रारण प्रारण - पुनः पदम् - प्रकृतिः प्रजापतिः - बृहस्पति ब्रह्मणस्पतिः सविता पारमेष्ठद्य पदार्थ पशु - पुरम् - विकृतिः विज्ञान भ्रात्मा --- पदम्- " पुरुषः ३ - विज्ञानपदम् २ धिषणाप्राण पदार्थ ३ - विज्ञान प्राण- पुनः पदम् - प्रकृतिः प्रजापतिः • ग्रहादि सौरमण्डलस्थ पदार्थ प्रज्ञान पशु - पुरम् - विकृतिः आत्मा -- पदम् - - पुरुषः ४- प्रज्ञान ४- शानपदम् प्रज्ञाप्राण प्राण- पुनः पदम् - प्रकृतिः प्रजापतिः गंधर्व, अप्सरादि चान्द्र पदार्थ शरीर पशु - पुरम् - विकृतिः मात्मा -- पदम् -- पुरुषः ) ५- शरीरपदम् ५- शरीर भूतप्राण प्राणन्पुनःपदम् - प्रकृतिः प्रजापतिः . भूतभाग पार्थिव पदार्थ पशु - पुरम् - विकृतिः घामा पद है । पुनःपदरूप प्राण धौर पुररूप पशु दोनों का पदरूप प्रात्मा से भी ग्रहण कर लिया जाता है । इस प्रकार हमारे शरीर में ६ पद ( भात्मा ) हो जाते हैं । आगे जा कर इन ६ पदों के कुल ४ ही पद रह जाते हैं । इसका कारण पूर्व में बतला दिया गया है । भ्रव्ययाक्षरात्मक्षररूप प्रमृत नाम से प्रसिद्ध षोडशीमात्मा पहला पद है । अव्यक्त दूसरा पद हैं । महान् तीसरा पद हैं । यहाँ तक [ ११० ]
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द्विमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानाध्य Erecreate ( महान तक ) उस अमृतपद की व्याप्ति है । महत् व करम् के अनुसार प्रमृत के कुरूप की व्याप्ति महान् तक है । इसीलिए महत्पदको बहोर कहा जाता है, मतएव महत्पद से अव्यक्त-ve or you षद दोनों का ग्रहण हो जाता है । सूर्यरूप विज्ञान के ऊपर महत्- प्रव्यक्त - पुरुष तीन पत्र हैं । तीनों पराये हैं । तीनों का महत्वद से ग्रहण है । तीनों एक हैं - मिल हैं । यही उस विश्व-fat ट प्रजापति का मत भाग है । नीचे मर्त्यभाग है । सूय्यविज्ञान, चन्द्ररूप प्रज्ञान, पृथिवीरूप शरीर तीनों मर्त्यभाग हैं । इन्हीं तीनों को मृत्युमान् कहा जाता है । श्रोम् प्रजापति की म् - उ- रूप पृथिवी-चन्द्रमा - सूय्यं ( शरीर - प्रज्ञान - विज्ञान ) तीनों मृत्युमात्रा है । ऊपर का प्रमृतभाग अमृतमात्र है । तिलो मात्रा मृत्युमस्यः प्रयुक्ताः से मर्त्यरूप शरीर- प्रज्ञान - विज्ञान हो धभिप्रेत है । चोषी वही महत् ( भव्यक्त - पुरुष-विशिष्ट ) अभूतमात्रा है । इस प्रकार निम्नलिखित कुल ४ ही पद रह जाते हैं -परायं भाग [ १ - महत् पदम् ( श्रव्यक्तपत्र, पुरुषपवयुतम् ) -मात्रा २ - विज्ञानपदम् भ अपराध्यं भाग - ३ - प्रज्ञानपदम् उ --मत्यभाग ४ - मारीरपवम् म् J + श्रोम् मागे जा कर प्रणव धनुः शरो ह्यात्मा वा तल्लक्ष्यमुष्य से ऋषि जिस प्रणव को धनुष बतलाने । वाले हैं - वह यही प्रणव है । इस प्रावधनुष पर सभा हुधा तीर उभ रूप प्रज्ञान - विज्ञान है एवं मा मह पद ( महवार ) ही लक्ष्य बहा है । यस, धागे जा कर ऋषि जिस उपासना - कम्मर का उपदेश देने वाले हैं - उस उपासना कम्पं के लक्ष्यभूत चतुष्पद प्रणव का ही यमिः पदम् - इत्यादि मन्त्रः । में निरूपण हैं । यह मन्त्र उन्हीं चारों पदों का निरूपण करता है । सब से स्थूल पद शरीरपद हैं । शरीर पञ्चभूतमय हैं । हम इसे प्रांखों से देखते हैं । विद्वान् श्रविद्वान् सबके लिए पञ्चीकृत भूतमय शरीरपद ( स्थूलशरीर ) प्रत्यक्ष है । सब ही शरीर का चक्षुरिन्द्रिय से प्रत्यक्ष करने में समर्थ हैं । इसीलिए ऋषि ने इसे प्रावि: ( श्रद्धा प्रकट- प्रत्यक्ष का विषय ) कहा है । यही पहला प्रावि पर है | स्थूलशरीर के मनन्सर मनोमय सूक्ष्म शरीर है । मन प्राणमय है । मनोऽपिहनायास्यस्मिरीरे- ' प्रश्नोपनिषद ' के तृतीय प्रश्न में इस वाक्य के अर्थ में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि सारे शारीरप्राण मन के धाधार से शरीर में आते हैं । मन ही शारीर - प्राणप्रपत्र का प्रभव - प्रतिष्ठा -परायण है । यह प्राणमय मनरूप प्रज्ञानात्मा अथवा प्रज्ञानमय प्राणप्रपञ्च स्थूलशरीर के प्रतिसंनिहित है । शरीर भूत है-मन है । इसके भीतर पहली संस्था प्राणमय, प्रशानात्मक सूक्ष्मभरीर की है । चूंकि प्राणमय ज्ञानपद मशरीररूप आणिः पद के अतिसंनिहित है, प्रतएव ऋषि ने इस दूसरे पद के लिए कहा है । यही सूक्ष्म पद हैं । सूक्ष्म शरीर हैं । सूक्ष्मशरीर के भीतर कारणशरीर है । कारणशरीर विज्ञान ( बुद्धि ) -म है । विज्ञान सूर्य है । स्थूल सूक्ष्मरूप शरीरमन का कारण यही है । विज्ञान से ही अज्ञान प्रतिष्ठित । है । इसी से शरीर प्रतिष्ठित है । विज्ञानात्मा सौरप्राण है । यह प्राण सात - सात अवस्थाओं में परिणत रह कर शरीर की शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, बस्तिगुहा इन चार गुहाथों में प्रतिष्ठित रहता है । [ १ I
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fatteness ( antra ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय धात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम्- इस कठोपनिषत् श्रुति से यही विज्ञानात्मा, अभिप्रेत है । यही गुहा में रहने से गुहाचर हैं । गुहापद है । यही तीसरा पद है । शरीर में हृदयाकाश है । उसमें दभ्राकाश है । यहाँ हमारा ज्योतिपय शुभ्र महतपद है । इसी में अव्यक्त है । इसी में त्रिपुरुष पुरुष है । इसी में विज्ञान -प्रज्ञान शरीर | ज्ञान, क्रिया, अर्थ तीनों शक्तियाँ इसी में है । महदक्षर अक्षर है । अक्षर उस अव्यय की स्वाभाविकी शक्ति है । वह ज्ञान - बल - क्रियारूपा है । ज्ञान ज्ञानशक्ति हैं । इसके लिए ऋषि ने निमिषत् कहा है । बन अर्थ शक्ति है । बलसंघात ही वस्तु है । इसके लिए एजत् कहा है । क्रिया क्रियाशक्ति है । क्रिया प्राणव्यापार है, अतएव इसके लिए प्राचत् कहा है । एजत् से कम्पनभाव अभिप्रेत है । संसार के बलसंघातरूप सारे घर्थ ( पदार्थ ) यद्यपि स्थिर प्रतीत होते हैं, परन्तु उन्हें गतिशील समझना चाहिए । प्रतिक्षण उनमें संसरण ( कम्पन ) हो रहा है, इसीलिए तो कम्पनशील ( संसरणशील ) पदार्थ-समष्टिरूप विश्व को संसार कहा जाता है । भ्रयंमात्र गतिरूप हैं इसलिए ऋषि ने इन्हें एब्बत कहा है । क्रिया प्राणव्यापार है ही, इसके लिए प्रारणत् " कहना न्यायप्राप्त ही है 1 । श्रस्मदादि चेतन प्राणियों में निमेष व्यापार है, अतएव इनके लिए निमिवत् कहा है । प्राचीन प्राचाय्यों ने एजद का चलत्पक्ष्यारि, प्राणत् का प्राणापानादि मनुष्यश्वादि एवं निमिषत् का निमिवारिधियावत् यह अर्थ किया है । उन भों से हम पूते हैं कि क्या पक्षियों में प्राणापानादि नहीं है? क्या उनमें निमेषादि नहीं है? ऐसी अवस्था में क्या पूर्वव्याख्या यथार्थ है? | मस्तु, जो कुछ हो । पाषायं भी पूज्य हैं. उनके अनुयायी मी पूज्य हैं । उनकी समालोचना करने का हमें अधिकार नहीं है । यहाँ हमें केवल श्रुति के ऋतु अर्थ को पाठकों के सामने उपस्थित करना है । सारे प्रपञ्च से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' - के धनुसार ब्रह्मपदं चतुष्पात् है । उसमें महत् पढ ही मुख्य है । विज्ञान मोर महान् दोनों पद गुहाचर हैं । महत्पद भी गुहाचर नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञान भी गुहाचर ही है । इनमें इसीलिए गृहावरं नाम महत् पवम् कहा है । यह है - इस मन्त्र का दूसरा भयं । १- महत् पदम् - धात्मा - महानात्मा- अर्द्धमात्रा २ - गुहापदम् - ( कारणशरीरंम् - विज्ञामात्मा ) = म → धोम् ३ - संनिहितं पदम् - ( सूक्ष्मशरीरं - प्रज्ञात्मा ) = उ ४ - आदि: पदम् - ( स्थूलशरीरम् - शरीरात्मा ) म् तीसरे प्रकार से भी इसका निरूपण किया जा सकता है । ग्रव्यय ' धानन्द - विज्ञान - मन - प्राण - मन्त्र ( ब ) भेद से पचकोशात्मक है । पञ्चकोशात्मक भव्यय ही प्रक्षर है । वही क्षर है । वही प्राकृतात्मा है । वही देवसत्य है । वही सब कुछ है । बस, यह मन्त्र इसी अर्थ का निरूपण करता है । ' भ्रमृत-सत्य, देवस्य धात्मा के ये तीन विवत्तं हैं । षोडशीपुरुष अमृतात्मा है । पांच प्राकृतात्मा ब्रह्मसत्य हैं । १ को ० ब्रा ० २।१ । [ १२० ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माष्य ईश्वरप्राप्युपाये ब्रह्मसत्य के पृथिवीभाग से निकलने वाला श्रेधाविभक्त वश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ का समुच्चय देवसत्य है । ये ही तीनों भाग जीव में हैं । शरीर में वैश्वानर- तेजस -प्राज्ञरूप देवसत्य है । इस पर प्रज्ञान है । प्रज्ञान पर विज्ञान है । विज्ञान पर महान् है । महान् पर प्रव्यक्त है । इसमें षोडशीपुरुष है । यह मन्त्र इन्हीं ur ध्यात्मिक अमृत, ब्रह्मसस्य, देवसत्य का निरूपण करता है । देवसत्य जीव है । यह जीव प्रसंज्ञ, अन्तः संज्ञ, ससंज्ञ भेद से तीन प्रकार का है । धातुजीव! जिन्हें संसार जड़ समझता है - वे ) असंज्ञ वैश्वानरात्मक देवसत्य नामक जीव है । वृक्षादि ग्रन्तः संज्ञ हैं । ये वैश्वानर- तेजसरूप देवसत्य हैं । पशु, पक्षी, कृमि-कीट, मनुष्य ससंज्ञ हैं । ये वैश्वानर - तेजस प्राशरूप देवसत्य हैं । प्रसंज्ञ अर्थप्रधान वैश्वानर से युक्त रहने से रूप हैं । इन्हीं के लिए ऋषि ने एवत् कहा है । क्रियाप्रधान तेजस से युक्त होने के कारण वृक्षादि कियारूप हैं । इन्हीं के लिए प्रारषत् कहा है । ज्ञानप्रधान प्राशरूप हम ज्ञानमय हैं । हमारे लिए निमित् कहा है । पचेतन, महुंचेतन, चेतन तीन प्रकार के देवसत्य हैं । इन्हीं तीनों के लिए क्रमशः स्वादम्पतीम्याय को लक्ष्य में रख कर एजत्, प्राणत्, निमिषत् कहा है । देवसत्य के ऊपर ब्रह्मसत्य है । ब्रह्मसत्य के शरीर- प्रज्ञान - विज्ञान - महान् -भव्यक्त- ये पांच भेद हैं । पाँचों में महत् - मव्यक्त धभिन्न हैं । इन्हीं तारमा प्रतिष्ठित है । धमृत, भव्यक्त, महान् - इस प्रकार धमूत के लिए एवं ब्रह्मसत्य के प्रव्यक्त धौर महदमाग के लिए तो यहाँ महत्पद कहा है और विज्ञान के लिए गुहापद कहा है, प्रज्ञान के लिए संनिहितम् कहा है । शरीर के लिए भावि: कहा है । इस प्रकार इस मन्त्र के अर्थ में प्रमृत, ब्रह्मसत्य, देवसत्य तीमों का समावेश हो जाता है । इन तीनों में माधार प्रमृतभाग है । प्रमृतभाग में धव्यय - धक्षर - क्षर तीन भाग हैं । क्षर का घावार मक्षर है । अक्षर का माधार प्रव्यय है । उसकी पांच कलाएं हैं । उन पाँचों कलानों का विकास शरीर - प्राण-इन्द्रियमन - बुद्धि- महदरूप में होता है । शरीर भन्नमयकोश है । इसी के लिए प्रावि: कहा है । शरीर-विर्ता प्राण प्राणमयकोश है । इसी के लिए संनिहितम् कहा है एवं इन्द्रियमनबुद्धि मनोषयविज्ञानमय-कोश है । इसा के लिए गुहाचरम् कहा हे । महत् मानन्दमयकोश है । इसीलिए तो इसे सुषुप्तिसुख का विष्ठाता बतलाया है । महदक्षर धानन्दमय है । मानन्द अव्ययस्वरूप है । एतदालम्बनम् के धनुसार अमृत ब्रह्मसत्य वेवसत्य सब कुछ इसी में समर्पित है । सत्रूप रस, मसरूप बल- ये दोनों भी यही ज्ञान - संमय व्यय है । यह बुद्धि से प्रतीत है । धन - प्राण - मन - विज्ञान - मानन्द रूप प्रजाधों का यही पचकोशात्मक धव्यय प्राधार है-१- - श्रावि: पदम् = स्थूलशरीरम् - भूतमयम् - मनमयम्- धन्नमयकोश २- संनिहित पदम् = सूक्ष्मशरीरम् - प्राणमयम् - प्राणमयकोश ३ -- गुहापदम् === कारणशरीरम् - इन्द्रियमनोबुद्धिसंघात: - मनोमय विज्ञानमयकोश ४-- महत्पदम् ।= तुरीयम्- - त्रिगुणमयम् -- मानन्दमयकोश १ स्थूल शरीर प्राविः नाम से ही प्रसिद्ध है । जैसा कि एतरेय श्रुति कहती है - अथ यदुर्थः सब्वरीरम् तस्मादाबि: । आहि शरीरम् । ( ऐ ० प्रा ० २।३१६ ) इति । [ १२१ ]
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fature ( द्वितीयखण्ड ) gosht पनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय इनमें जो त्रिगुण महान् है इसी के लिए देवी हावा गुणमयी मय माया दुरत्यया “ यह कहा जाता है । यह है - इस मन्त्र का तीसरा भयं । प्रपि च महर्षि कठ ने उर्ध्वमूलोऽवाशास. ' - इत्यादि रूप से जिस श्वेत्य का निरूपण किया था, उसी का अक्षरमेद से महर्षि मुण्डक निरूपण करते हैं । मव्यय अश्वत्थ है । इसी धव्यय का अश्वत्यरूप इद्रियार्थमनोबुद्धिर्महान् पोरवमेव ब- इस रूप से सर्वत्र व्याप्त हैं । यह जवाव्ययाश्वत्थ का स्वरूप है । इन्द्रिय देवसत्य है । अर्थ ' भूमि, प्रापः मनल वायु, खं, ' भेद से पांच हैं । भांगे मन है । मन से परे अहंकाररूप महत् हैं । इन आठों की समष्टि को ही गीताचार्य -" भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे मिला प्रकृतिरष्टधा - " ॥ " ‘ अपरेयम् ’ – इस रूप से अपरा प्रकृति मानते हैं । इनमें पहले के पांचों का ' मयं ' से ग्रहण है । मड़-बुद्धि के लिए मनबुद्धि है । महंकार के लिए महत् है । बाकी प्रव्यक्त स्वयम्भू बचता है । वव्यतोऽक्षर इस्याहु: के अनुसार उसका प्रक्षर में अन्तर्भाव मान लिया जाता है । इन्द्रियां देवसत्य हैं । इनके लिए यहाँ एयत् - प्राणत् निमिषत् कहा है । अयं के लिए भाषि: कहा है । मन के लिए संनिहितम् कहा है । बुद्धि-के लिए ' गुहाचरं ' कहा है । महत् के लिए महत्पदम् कहा है । प्रव्यक्त भौर पौरुष इसी में समर्पित हैं । इस प्रकार इस मन्त्र की प्रश्वत्थपरता भी भली - भांति सिद्ध हो जाती है--( १ ) इन्द्रिय-} देवसत्यम् -- + > एजतु प्रानतु निमिषतु । प्राविः पवम् ( २ ) अर्थ संनिहितं पदम् ( ३ ) मन ब्राह्यत्यम् - अश्वरथ गुहापदम् ( ४ ) बुद्धि ( ५ ) महत् ( श्रव्यक्तं च ) महत्पदम् ( ( ६ ) पौरुषम् } धमृतम् गुढोत्मा थर्ववेद में इसी प्र r यत्य का स्कम्मरूप से बड़े विस्तार से कठ ने इसी के लिए-" इन्द्रियेभ्यः परा ार्याः -म्यश्च परं सुनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ महतः परमभ्यक् प्रयात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं fafsaq " 113 ug walÊN निरूपण किया गया है । भषिक जिज्ञासा रखने वालों को वह प्रकरण देखना चाहिए । वहाँ इस पर प्रकृत मन्त्र का निम्नलिखित स्वरूप है-१ कठोप ० २।६।१ । २ गीता ७।४ । ३ कठोप ० १ ३ | १०-११ । [ १२२ ]
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faatenure ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य " नाविः संनिहितं गुहा जरनाम महत् पदम् । तत्रेदं सर्वमार्पितमेजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम् ” । ' ईश्वरप्राप्युपाय यहाँ चर के स्थान में जरत्पाठ हैं । महान् परमेष्ठी है, प्रजापति है, सबमें वयोवृद्ध है । सब इससे पैदा होते हैं, अतएव वह जरत् नाम से प्रसिद्ध है । माविः संनिहितादि ससंज्ञ जीव का धम्म है, तः ससंज्ञों का तो याविः संनिहित- इस पूर्वार्द्ध से ही ग्रहण हो जाता है । शेष मन्तः संज्ञ वृक्षादि, प्रसंश धातु - ये दो प्रकार के जीव बचते हैं । उनके लिए एजत् प्रागत् कह दिया है । एक प्रकार से मानन्दादि पांच कोशों का तीसरे अर्थ में पूर्व में निरूपण किया जा चुका है । भद दूसरे प्रकार से इसका निरूपण करते हैं । समय - प्राणमय - मनोमय - विज्ञानमय - आनन्दमय-प्रम्ययात्मा पञ्चकोशात्मक है । अध्यात्मप्रपञ्च का जो भाग प्रन्नरस से उत्पन्न हो कर ( पारस की रस - असृक् - मांस - मेवा - अस्थि - मज्जा- शुक्र इन अवस्थामों से उत्पन्न हो कर ) उसी प्रशरस को ग्रहहः खेता हुधा ( धन खाता हुधा ) क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता रहता है, बालयुवा प्रौढा- वृद्धादिमवस्थानों में परिणत होता हुआ, विष्णुरूप अशनायाशक्ति के निर्बल हो जाने से, एवं रोमकूपों के विपुल हो जाने से रुद्रात्मक विशेषणधर्म्मा हृदयस्य इन्द्रशक्ति के प्रबल हो जाने से जो माग भन्त में भतयज्ञ के बंद हो जाने पर शीणं होता हुआ - इसी भूतमयी ( अन्नमयी ) पृथिवी में विलीन हो जाता है वही पहला अक्षमयः कोश है । इसी को स्थूलशरीर कहते हैं । इसी के लिए ऋषि ने प्राषि: कहा हैं । वाक् पाणि - - पाद - पायु-उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रिय प्राण हैं । प्राण- प्रपान समान व्यान उदान ये पाँच वायव्य प्राण हैं । एतनामक ' पिप्पलादोपनिषत् IR में प्रतिपादित गार्हपत्य - समान- विष्ण्य - दक्षिणा - उदान ग्राहवनीय नाम से प्रसिद्ध पाँच प्राग्नेय प्राणों का भी इन्हीं पाँच वायष्य प्राणों में ही अन्तर्भाव है । इन पाँच कम्र्मेन्द्रिय प्राण एवं पाँच प्राणों की समष्टि ही दूसरा प्राणमयकोश है । प्रत में रहने वाला भोज भाग ही यह प्राणमयकोश है । ww मयकोश पृथिवीलोक से सम्बन्ध रखता है, यह प्राणमयकोश प्रन्तरिक्ष से सम्बन्ध रखता है । पतु sta, after, रसना ( जिह्वा ), स्वक् ये पाँच ज्ञानेन्द्रियां हैं । इनका भालम्बन मन ( प्रज्ञान ) है । शानसह मन ही तीसरा मनोमय कोश है । यह बस में रहने वाला दिव्यसोमभाव है । प्रतगत स्थूल पार्थिवभाग सात धातुओं में परिरगत होकर स्थूलशरीर बनता है । तद्गत सूक्ष्म प्रान्तरिक्ष्य वायुभाग प्राण बनता है । तद्गत सूक्ष्मतम शुद्ध सोम ही मन बनता है । इसीलिए मन को भयं हि सोम्य मनः । - इत्यादि कहा जाता है । ज्ञानेन्द्रियों से युक्त बुद्धि विज्ञानमयकोश है । यह सौरभाग है । प्राणमय मनोमयं विज्ञानमय इस कोशजय की समष्टि ही सूक्ष्मशरीर है । इसी को लिङ्गशरीर भी कहा जाता है एवं महत् - मव्यक्तं प्रानम्बमयकोश है । महद ज्ञान मननुभूत है । स्वरूपतः इसका प्रज्ञान है । यही सुषुप्ति में स्वानुभर्वकगम्य होता है । यही कारण शरीर है । श्रव्ययात्मा को शरीर में ' धाने का कारण नम योनिर्महद् ब्रह्मा तस्मिन् १ अथर्ववेद १०१४।६।६ । २ प्रश्न सम्बन्ध से यह उपनिषत् ' प्रश्नोपनिषत् पिप्पलाद सम्बन्ध से पिप्पलादोपनिषद्, एवं.. ३ छान्दोग्योप ० ६ | ६।५ । प्राणप्रतिपादन सम्बन्ध से ' प्राणोपनिषत् ' कहलाई है । [ १२३ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीय खण्ड ) ईश्वरप्रत्युपाय गर्म दधाम्यहम् - के भनुसार भ्रव्यक्तनर्मित यही महान बनता है, अतएव इसे हम प्रवश्य ही कारणशरीर कहने के लिए तय्यार हैं । मात्मा और विश्वसमष्टि ईश्वर है । विश्व उस ईश्वर का शरीर है । उस विश्वशरीर का स्वयम्भु परमेष्ठी भाग कारणशरीर है । यहीं धानन्दमयकोश का विकास है । सुभ्यं विज्ञानमयकोश है । चन्द्रमा मनोमयकोस है । भ्रान्तरिक्ष्य वायु प्राणमयकोश है । तीनों की समष्टि ईश्वरात्मा का सूक्ष्मशरीर है । पृथिवी ww मयकोश है । यही उसका स्थूलशरीर है । यही स्थिति अध्यात्म में है । धव्यक्त और महान् ' कारण ' हैं । विज्ञान- प्रज्ञान - प्रारण ' सूक्ष्म ' है । शरीर ' स्थूल ' है । इस त्रिपुरी में तीन ब्रह्यपुरों में वह ब्रह्म रहता है । प्रकारान्तर से इसे धष्टपुरी भी कहा जाता है । ( १ ) पाँच अर्थमात्रा, ( २ ) पाँच ज्ञान, ( ३ ) पाँच कम्र्म्म, ( ४ ) मन - बुद्धि- चिल- महंकार- ये चार कारण, ( ५ ) पञ्चप्राण ( ६ ) काम, ( ७ ) कर्म्म, ( ८ ) तम - ये माठ पुर हैं - यष्टपुरी हैं । इसी में वह है । वह पञ्चकोशमय है । उसका विकास पूर्वात प्रकार से है । प्राषि. संनिहितम् ० - इसी प्रपच का निरूपण करता है--१- ईश्वरात्मा - ( ग्रव्ययाक्षरात्मक्षरमयः षोडशी ) -मानन्दमयकोशः } - कारणशरीरम् } - विश्वात्मा १- स्वयम्भूः महत्पदम् २- परमेष्ठी ३ - सूर्यः } - विज्ञानमय कोश: ' गृहापक्षम 1 ४- चन्द्रमाः } -मनोमयकोशः संनिहितम् { ५ - प्रन्तरिक्षम् } - प्राणमयकोशः -- सूक्ष्मशरीरम् - तस्य विश्वात्मकं शरीरम् ब क f { ६ - पृथिवी } -धन्नमयकोश: } —स्थूलशरीरम् } - शारीरात्मा . प्रजापतिः सोऽयंीयः प्रजापतिः ईश्वरः १-- प्रव्यक्त महत्पदम् १ - जीवात्मा - ( मव्ययाक्षरात्मक्षरमयः षोशी ) -धानन्दमयकोशः } - कारणशरीरम् २- महानात्मा ' ३ - विज्ञानात्मा } - विज्ञानमयको मः गुहापथम् [ ४- प्रज्ञानात्मा } -मनोमयकोशः - सूक्ष्मशरीरम् - तस्य शरीरात्मकं विश्वम् संनिहितम् { ५ - प्राणपञ्चक ) - प्राणमयकोशः मादिः पदम् { ६- शरीरम् } - असमय कोश: } - स्थूलशरीरम् [ १२४ ]
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facterush ( faatra ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य -यह है इस मन्त्र का पाँचवा अर्थ । ' १- ईश्वरात्मा १ – स्वयम्भूः २ परमेष्ठी ३- सूय्र्यः ४- चन्द्रमा ५ - अन्तरिक्षम् ६- पृथिवी १ - जीवात्मा १- प्रव्यक्तात्मा २- महानात्मा इ - विज्ञानात्मा ४- प्रज्ञानात्मा ५- प्राणारमा ६- शरीरम् } -मात्रा -भ } -म् } मात्रा } } -म् - श्रोमित्येवं ध्यायब प्रास्मानम् . + द्योमित्येवं ध्यायच ब्रात्मानम् इसी अभिप्राय से भागे जाकर ऋषि कहते हैं--" चमत्, यदणुभ्योऽणु, यस्मिंल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षर
ब्रह्म स प्रारणस्तषु वाङ्मनः । तदेतत् सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ” ॥
वह ' मचिमत् ' है - रश्मिवत् है, अर्थात् जैसे प्रचिमत् सूय्यं अपनी किरणों से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा हैं, एवमेव वह अपनी ज्ञानरश्मियों से सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । वह ज्योतिर्धन ( ज्ञानघन ) सर्वव्यापक तस्व है । वह है ज्योतिम्मंय धौर सर्वव्यापक, परन्तु है अणु से मणु, भ्रतएव ज्योतिर्म्मय होने पर भी वह हमें नहीं दीखता । सात तो लोक, सातों लोकों की प्रजा - तस्मिन् लोकाः खिताः सर्वे स १ पैङ्गलोपनिषत् के अनुसार यह अर्थ है । [ १२५ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) १ गीता ३।१५ । नामक प्रकरण । मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय ॥ इति ज्ञानयोगोपदेशः ॥ २ शत ० ब्रा ० १०।१।३।२ । [ १२६ } नात्येति कश्चन के अनुसार सारा प्रपञ्च उसी में प्रतिष्ठित है । वही तत्त्व ' अक्षर ' है वही ' ब्रह्म ' है । ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ', भ ह वै प्रजापतेरात्मनो मत्यंमासोत् सक्षममृतम् - के अनुसार उसी अक्षर का भाषा मर्त्यभाग ब्रह्म ( क्षर हैं । वही मन प्राण वाङ्मय है, अर्थात् ज्ञानशक्ति भी वही है । क्रियाशक्ति भी वही है | अर्थशक्ति भी वही है । श्रव्यय पुरुष की यही अक्षररूपा स्वाभाविकी ज्ञान - चल - क्रियारूपा पराशक्ति सर्वत्र व्याप्त हो रही है । यही सत्य है, अर्थात् ब्रह्म सत्य है । वही श्रमृत है - प्रमृतात्मा है । हे सोम्य! इसी को लक्ष्य बनाना चाहिए । हम प्रादेश करते है कि सर्वाधारभूत इस प्रक्षर को तुम पहचानो । इसे ज्ञान चक्षु से देखो । हमारा धात्मा ज्ञानकम्मंमय है । षोडशी पुरुष का नाम भात्मा है । इस षोडशी पुरुष में सर्वालम्बनभूत श्रव्ययतत्त्व की आनन्दादि पाँच कलाएं बतलाई गई हैं । इन पांचों में प्रानन्द - विज्ञान - मन विद्याभाग है - ज्ञानभाग है । मन - प्राण - वाक् कर्म्मभाग है । दोनों को समष्टि एक मात्मा है । यह ज्ञान-कर्म्ममय धव्ययात्मा अपनी परा और अपरा प्रकृति से ( प्रक्षर - मात्मक्षर से ) प्रविनाभूत होता हुआ हमारे विश्वशरीर में प्रतिष्ठित है । हम ज्ञान कम्र्म्ममय हैं । यदि हमने अपने जीवन में ज्ञान - कम्ममय मात्मा से काम - सप - श्रम द्वारा ज्ञान - कम्मसंवत् का पूर्णरूप से समय कर लिया तो पूर्णेश्वर की समता प्राप्त होने से हमारा जन्म लेना सफल हो गया । कैसे हम दोनों सम्पत्तियों को आत्मसात् करें? इसके लिए ऋषियों नेता वर्तमान के अनुसार शतायु हम मनुष्यों के १०० वर्षों को पहले ५०-५० इन दो भागों में विभक्त किया है । स्थूसारन्धतोन्याय से पहला ५० कम्मंप्रधान रखा गया है । उत्तर के ५० ज्ञानप्रधान रखे गए हूँ । पहले पचास में कम्मं सम्पत् का सञ्चय करना है । कम्मं भी बिना ज्ञान के निरर्थक है ----" ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाशात्वा किञ्चिदाचरेत् । प्रज्ञानेन प्रवृत्तानां स्खलनं स्यात् पदे - पवे " ॥ " --- के अनुसार कम्मर्थज्ञानसंचय करना मावश्यक हो जाता है । सच है, क्या लौकिक - व्याव-हारिक कर्म्म, क्या पारलौकिक अग्निहोत्रादि याज्ञिककम्में, दोनों ही ज्ञानसापेक्ष हैं । विना तदविषयक ज्ञान प्राप्त किए कर्म्म करना सम्भव है; अतएव इषियों ने प्रधान ५० वर्ष के २५-२५ के दो विग कर वाले । पहले २५ का नाम ब्रह्मवय्यं रखा, दूसरे २५ का नाम ग्राहस्थ्यं रखा । ब्रह्म ज्ञान है । धागे के २५ में इसे कम्मंप्रधान गार्हस्थ्य का पालन करना है- तदर्थ- ( कम्र्म्मार्थ ) यह पहले २५ वर्ष तक ' गुरुगृह में रह कर ब्रह्म का माचरण करता है । कम्मचिं ज्ञान - सम्पादन करता है । यहाँ का ज्ञान कर्मार्थ है । ज्ञान साधक है । कम्मं साध्य है । ५० वर्ष समाप्त हो गए । श्रात्मा के प्राघ्रे कम्र्म्म - माग पर इसने विजय प्राप्त करली । अब ५० वर्ष बच जाते हैं । इसमें ज्ञान संपत् प्राप्त करनी है । जैसे बिना ज्ञान के कम्मं असम्भव है - एवमेव बिना कम्मं के ( निवृत्तिकम् के ) ज्ञानोदय भी असम्भव है । ३ द्रष्टव्य पं ० मधुसूदन ओझा कृत गीताविज्ञानभाष्य प्रथमरहस्यकाण्डान्तर्गत ' संक्षिप्तगीता निर्माणहेतुः '
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय एतदर्थं ऋषियों ने इस ५० के भी २५ - २५ हिसाब से दो विभाग कर डाले । पहले २५ का नाम वान-प्रस्थ है । दूसरे का नाम संन्यास है । यहाँ ज्ञान साध्य है । कर्म्म साधक है । उस आत्मज्ञान के लिए धरव्य में जाकर उपासनारूप कम्मं करना पड़ता है । तब कहीं प्रोपनिषद - ज्ञान प्राप्त होता है । जैसे क के लिए प्रधान ब्राह्मणग्रन्थों का अध्ययन भावश्यक है, एवमेव ज्ञान के लिए भारण्यक धीर उपनिषद का अध्ययन आवश्यक है । यद्यपि कर्म्म उपासना - ज्ञानभेद से ब्राह्मण- प्रारण्यक उपनिषत् विभक्त हैं, तथापि उपासताप्रधान क्षारण्यक कर्म्म ज्ञानोपकारक है । निवृत्तिप्रधान है; प्रतएव उसका उपनिषद में ही धन्तम कर लिया जाता है । इसीलिए बृहदारण्यकोपनिषत् का यह व्यवहार सुसंगत प्रतीत होता है । कहना सारे प्रपञ्च से यही है कि भोपनिषत् - पुरुष को प्राप्त करने के लिए पहले प्रोपनिषद् -ज्ञान प्राप्त करना धावश्यक है । जिस शामब्रह्म को हम प्राप्त करना चाहते हैं वह कैसा है? सबसे पहले उसे जानना भावश्यक है । शब्द ब्रह्म के ज्ञान के अनन्तर अर्थ - ब्रह्म लक्ष्य बन सकता है । जिसका · हमः स्वरूप ही नहीं जानते, वह हमारा लक्ष्य कैसे बन सकता है? एतदर्थं ब्रह्मज्ञानरूप परब्रह्म की जिज्ञासा रखने वाले का यह पहला एवं प्रधान कर्तव्य हो जाता है कि वह सबसे पहले पारण्यक पर उपनिषदरूप शब्दब्रह्म का अध्ययन करे । प्रपशविद्या पराविद्या की साधिका है । अपराविद्या इम म्या है । पराविद्या गुरुगम्या है । अपराधिया के अनन्तर पराविद्या में प्रवेश हो सकता है अतएव नारद, कादि जितने भी ब्रह्मवेसा हुए हैं- उन्होंने पहले पूर्णरूप से वेद - वेदाङ्ग का अध्ययन करने के अगम्बर सनत्कुमार, श्रङ्गिरा मावि प्राप्त ऋषियों के पास पराविद्या की जिज्ञासा प्रकट की है । शब्यजनित महदक्षर ब्रह्मसम्बन्धी ज्ञान ही प्रोपनिषद् ज्ञान है । उपनिषत् के - ता हे. वि. बेडियाच्ये ० इस मन्त्र से प्रारम्भ कर द्वितीय मुण्डक के द्वितीयखण्ड के २ मन्त्र तक प्रसिस ने उड़ी औपनिषद का का शब्द द्वारा निरूपण किया है । बड़े विस्तार से उसका स्वरूप बतलाया स्वरूप - शाम हो गया । इसीलिए बागे जाकर ऋषि कहते हैं सतत् सत्यम् - समृतम् - तदेष्यं - सोम्य विद्धि! हे सोनक! हमने तुम्हें ब्रह्म का ( शब्दब्रह्म द्वारा तटस्थ लक्षख से ) स्वरूप, बतला दिया । तुम उसका स्वरूप- सम गए । देखो! वह ब्रह्म है । वह सत्य है । उसे निशाना बनायो । इसे अपना लक्ष्य समस्को । एक सेर - कुरुवंश के राजकुमार धनुष पर तीर चढाए खड़े हुए हैं, दूसरी घोर धनुविद्या के परम प्राचार्य were द्रोणाचार्य खड़े हैं । सामने एक तुक्ष है । उसकी एक ऊंची माला पर बनावटी मिट्टी की चिड़िया रखी है । -उसकी सोर इशारा करके द्वोण कहते हैं कि " राजकुमारो! देखो । सावधान हो कर देखो । वह सामने बिड़िया है । उसे अपना लक्ष्य समझो । लक्ष्य को ध्यान में रख कर धनुष पर पैने तीर को कान - तक तान कर इसका वेवन करो । " भाज यही लक्ष्यविद्या भगवान् प्रङ्गिरा शौनक को सिखा रहे हैं । उन्होंने पहले लक्ष्य का स्वरूप बतला दिया है । बस, लक्ष्यस्वरूप ही प्रोपनिषद् ज्ञान है । यह धनुः-स्थानीय है । प्रोपनिषद्ज्ञान धनुष है । मन तीर है । तीर विना धनुष के लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकता । एवमेव विना श्रोपनिषद्ज्ञान के ब्रह्म का ( लक्ष्य का ) स्वरूप अज्ञात रहता है, प्रतएव ऐसे ज्ञानरूप [ १२७ ]