Mundakopanoshad — पृष्ठ 131–140
Mundakopanoshad · पृष्ठ 131–140
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्युपाय धनुष को भाधार बनाए बिना मनरूप शर - लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रसमयं ही रहता है । यदि धनुष मजबूत है तो तीर का निशाने पर पहुँचना प्रवश्यम्भावी है । धनुष भी है - तीर भी है । परन्तु वह तीर यदि भोटा है तब भी कुछ नहीं । तीर सिल्ली पर पैनाया हुधा होना चाहिए । वह सिल्ली है - उपासना | कोरे शब्द - श्रवण से काम नहीं चल सकता । जब श्रोतव्यः - मन्तव्यः - निदिष्यासितव्यः हो जाता है, तब मामा प्रष्टव्य है । सुनो, मनन करो । मनन द्वारा उस ज्ञान को प्रात्मसात् करो । अन्तर्थ्याम बनायो । तब जाकर तुम्हारा मनरूप शर उस लक्ष्य वेष में समर्थ हो सकेगा । बभ्यासयोग उपासना है । खूब उपनिषत् बांचो । तब तक तुम्हारा मन कदापि स्थिर नहीं हो सकता जब तक कि संसार के इतर विषयों से मुख मोड़कर महर्निश उसी की मोर मन को न लगाया जाये । प्रोपनिषद् ज्ञान के समीप मन को बैठा दो । मन को उसके पास से मत हटने दो । चिरकाल के प्रयास के मनन्तर--" स तु दीर्घकालावरनैरन्तर्य्यसत्कार्य्यसेवितो भूमिः " । " — के अनुसार मन सचमुच सदा के लिए प्रोपनिषदज्ञान के उप प्रासित हो जाएगा । यही मन की उपायानिशितता है । वानप्रस्थ इसी उपासना के लिए नियत है । जब मनरूप वर उपासानिशिव हो जाता है तो वह महास्त्र बन जाता है - भर्थात् प्रभोष शस्त्र बन जाता है । यह बार खाली नहीं जाता । धनुष पर उपासानिशिक महास्त्र शर चढ गया । तीर कमान पर पड गया । तो संभयो । कान तक तीर संचो । प्रत्यक्षा को तानो एवं लक्ष्य धौर प्रपने भ्रात्मा को प्रभिल समझते हुए य पर दृष्टि रखते हुए तीर छोडकर लक्ष्यीभूत मक्षर को वेध डालो । द्रोणाचार्य धर्जुन से पूछते हैं कि अर्जुन! बतलाको तुम्हें लक्ष्य वीखा या नहीं? क्या तुम चिड़िया को देख रहे हो? धर्जुन का उतर | भगवन्! मैं आप को देखता हूँ, न वृक्ष को देखता हूँ, न चिड़िया देखता हूँ । देखता हूँ " बस चिड़िया के मस्तक को । इतर राजकुमारों के मुख से लक्ष्य के विषय में न आपको वृक्ष को, चिड़िया को सबको देख रहे हैं - यह निराशाजनक उत्तर सुन कर बिन हुए प्रोणाचार्य्यं मर्जुन के मुख से यह उत्तर सुनकर गदगद हो गए और उनके मुँह से निकल पड़ा कि शाबास बेटा! तुम निशाना मार सकोगे । तीर छोडो । द्रोण के मुख से तोर छोटों ये प्रक्षर निकलने भी न पाए थे कि तद-माता धर्जुन के हाथ से निकले हुए तीर ने चिड़िया का मस्तक काट कर जमीन पर गिरा दिया । यह है - तद्भावगतचेतसा का ज्वलन्त उदाहरण । जो धीर संसार के सारे काव्यों को छोड़कर धनन्ये-' बेता बनकर एकमात्र उसी में तल्लीन हो कर तीर चलाता है वही प्रक्षर वैध करने में समर्थ हो सकता है । ' धनुष पर तीर रखकर चला दो ' कहना सरल है, करना कठिन है । सुरस्य धारा निशिता सुरत्यया है । जरा चूके कि मरे । इसलिए दयालु ऋषि लक्ष्य वेधनोपयोगि उपासनाप्रधान उपदेश देते हुए कहते हैं कि जिस प्रक्षर का वेधन करने के लिए तुम तय्यार हुए हो- पहले वेषनोपयोगि- धनुष, पैना-तीर, एकाग्रता प्राप्त करो, तीर को तानना सीखो । जब इन सामग्रियों से सुसज्जित हो जाभो तब तीर चलाभो । औपनिषद्ज्ञान ही धनुष है । चिरकाल की उपासना से दृढ हुआ मन महास्त्र ( अमोघ ) शर १ पा ० यो ० सू ० १४ । [ १२६ }
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facteruse ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य है । मन को उस ओर प्रवरण रखना, तीर खंचना है । अन्यविषयोपेक्षापूर्विका मन की तल्लीनता-सद्भावगतचेतोभाव है । हमारा विश्वास हैं कि यदि तुम हमारे उपदेशानुसार करोगे तो अवश्य ही अक्षरलक्ष्य को वेध कर सकोगे । यह है - ममृतात्मरूप प्रक्षरप्राप्ति का पहला उपाय । इसे हम उपासना-मोन कहेंगे । यही एक प्रकार का लययोग है । इसी को योगशास्त्र में अमनस्क योग मी कहा जाता है । 113 11 रात - दिन सांसारिक विषयों में लिप्त रहने वाले हम साधारण कोटि के मनुष्यों के लिए तो इस पूर्व के उपासनायोग ने सदा के लिए प्रात्मज्ञान का द्वार बन्द कर दिया । न हम म्रपने चञ्चल मन को ऐसा कर सकते हैं एवं न ऐसी अवस्था में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । इस प्रकार दुस्तरमागं से मयमीत होकर आत्मज्ञान की घोर से निराश होकर लौटने वाले हम साधारण मनुष्यों को दयार्द्रचेता ऋषि कम्र्मप्रधान सरलमार्ग बतलाते हुए कहते हैं-" प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । ग्रप्रमतेम वेद्धव्यं शरवसन्मयो भवेत् " ॥ viofree- शामरूप धनुष प्राप्त करना हम संसारियों के लिए कठिन है । इसके लिए योग्यता चाहिए, मेघा चाहिए, योग्य गुरु चाहिए, मनुकूल भवस्था समय - साधन चाहिए । सब दुस्तर हैं । इसलिए ऋषि कहते हैं कि भाई! तुम और कुछ नहीं कर सकते, न जान सकते । परन्तु योन् यह एका-कर तुम ने बहुत बार सुना होगा । इस धनुष को प्राप्त करने में तुम्हें कठिनता न होगी । बस, सुप्र-सिद्ध - बतएव सुपरिचित इस प्रणव को तुम भपना धनुष बनायो एवं मनः प्राण वाङ्मय भ्रात्मा को तीर बनायो । लक्ष्य उसी ब्रह्माक्षर को समझो । सावधान होकर तीर छोडो । उसी समय शरवत् तुम्हारा आत्मा उसमें गढ़ जाएगा । धोम् यह शब्दग्रह्य है । यह प्रयं ब्रह्म ( अक्षर ) की प्राप्ति का साधक है । इसी पनिधाय से तो शम्बारिल निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ' - यह कहा जाता है । हम रात - दिन इंकार का कम्मं करते हैं । कम्मं करनेवाला ' हम ' रूप म्रात्मा है । स वा एष मात्मा वाङ्मयः प्राखमयो सोमक े - के अनुसार मनः प्राण वाङ्मय है । मनोभाय ज्ञानशक्ति का अधिष्ठाता है । इससे हमें ज्ञान होता है । प्राणभाग से चेष्टा होती है । वाग्भाग से शब्द, इतर कर्म होते हैं । हाथ - पैर से काम करना, मुंह से बोलना, यह सब श्रात्मा के वाक्माग का व्यापार है । यत्न प्राणभाग का व्यापार है । ग्रह प्राणव्यापार उस वाक्यापार का प्राधार है एवं दोनों का प्राधार ज्ञानमय मन है । इस प्रकार मनसा मनुते वाचा अभिवदले कर्म्मणा कुरुते तीन भागों में श्रात्म व्यापार समाप्त है । १ मैत्रायण्युप ० ६।२२ । २ शत ० ब ० १४१४ | ३ | १० । [ १२६ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय आत्मज्ञान का सबसे सरल उपाय है- मनोवाक्प्राणमय कम्र्मात्मा को प्रोम् की तरफ लगा देना । हम संसार के विषयों में लिप्त हैं । कोई हर्ज नहीं, दृष्टि सदा प्रोम् पर रहनी चाहिए । खाते - पीते-सोते - उठते - बैठते मजपा - जाप चलते रहना चाहिए । प्रोम् शब्द पर और तदर्थ पर ( तत्प्रतिपाद्य शंक्षर पर - दोनों पर ) भात्मयोग होना चाहिए । इस प्रकार तज्जपस्तदर्थभावनम् के अनुसार शब्दब्रह्मरूप नोम् नौर इसके भ्रर्थं पर यदि निरन्तर भ्रात्मयोग किया जाता है तो चिरकाल के बाद स्वत एव मात्मा विषयों से अलग हो जाता है एवं उस प्रक्षर - तत्व में लीन हो जाता है । घोर से घोर दुराचारी भी इस अपरूप कर्मयोग से संसार से निस्तार पा जाता है । वह दुराचार अवश्य करता है, परन्तु उसने अपने सारे दुराचार को ओम् पर डाल रखा है । वह सोचता है कि मैं कुछ नहीं कर रहा । जो हो रहा है, उसे देख रहा हूँ । धोम के पेट में सारा चर्चा चल रहा है । भच्छा बुरा जो कुछ होता है - उसी के बाधार पर हो रहा है । इसी को गीता में मात्मसमर्पयोग कहा है । इसी योग के माहात्म्य का वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं-" अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाकु " । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः " ॥ ' जीवनपर्य्यन्त भोम् के जप करते रहना एक प्रकार का कम्मयोग है । प्रश्नोपनिषत् में इसका बड़े विस्तार से निरूपण किया जा चुका है, अतः यहाँ इस विषय को हम अधिक नहीं बढाना चाहते । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि न उपनिषत् पढने की मावश्यकता है, न संसार के विषयों का परित्याग कर जंगल में जाकर उपासना पर मनरूप शर को तीक्ष्ण बनाने की प्रावश्यकता है! सुब कुछ काम करो । केवलम् पर दृष्टि रखो । परन्तु इस योग में भी इतना ध्यान भवश्य रखना पड़ेगा कि हम चूकें तो नहीं । हमारा कोई समय ऐसा तो नहीं निकल गया जिसमें हम ओम् को ल गए । उस पर निरन्तर ध्यान रहना चाहिए । कालान्तर में जैसे शर लक्ष्य में जाकर तन्मय हो जाता है वैसे ही तुम्हारा मात्मा - घोम् रूप शब्दब्रह्म से प्रतिपाद्य परब्रह्मरूप उस प्रक्षर में लीन हो जाएगा । जीवन- पय्र्यन्त प्रणव जप करनेवाला शरीरत्यागानन्तर उसी मव्ययमय प्रक्षरपुरुष में लीन हो जाता है । धनुगं होस्त्रोपनिषदं इस प्रतिकठिन श्रोत उपासनायोग का भगवान् के निम्नलिखित वचनों से मली - भाँति स्पष्टीकरण हो जाता है । इसी दुस्तरयोग का उपदेश देते हुए भगवान् कहते हैं-" योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ "
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ” ॥ 3
१ गीता ६।३० । २ गीता ६।१० । ३ गीता ६१२ । [ १३० ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय " प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मचित्तो युक्त श्रासीत मत्परः ” ॥ ' " यत्र चैवात्मना ( प्रज्ञाता ) ऽऽत्मानं ( अक्षरं ) पश्यत्रात्मनि तुष्यति ” ॥ इस प्रकार जब भगवान् ने धर्जुन को मनः संयमरूप उपासनायोग का उपदेश दिया तो अर्जुन
घबरा गया और कहने लगा--" थोऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थिति स्थिराम् ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्वाहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् " ॥
अर्जुन की प्राशंका यथार्थ थी । इस प्रश्न के उत्तर में भागे जाकर भगवान् को इसी प्रखवो धनुः खाना वाले सरल कम्र्म्मयोग का उपदेश देना पड़ा-" यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । विच्छन्तो ब्रह्मचय्यं चरन्ति तसे पदं संग्रहेस प्रवक्ष्ये " ॥ " —यह कहकर इसी प्रस्तुव पर मास्था रखने का उपदेश करते हुए भागे जाकर भगवान् कहते हैं--“ द्योमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरत्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः - इति " । " ३ गीता ६।३३-३४ । १ गीता ६।१४ । ४ मीता ८११ । २ गीता ६।२० । ५ गीता ८।१३-१४ । [ १३१ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय प्रोम् शब्दब्रह्म है । तत्प्रतिपाद्य मयं अम्पयाक्षररूप परब्रह्म है । भगवान् कहते हैं- मुंह से तो ओम् बोलो एवं उसके अयं पर, जो कि मां है, उसका हमरण रखो । उसके साथ मनोयोग रखो | इससे तुम्हारा उद्धार सम्भव है । यहाँ के ओम् का म्- भाग प्रज्ञानात्मा है । उ - भाग विज्ञानात्मा है । प्रभाग महानात्मा है । भर्द्धमात्रा वही प्रक्षर है । निरन्तर के अभ्यास से ' मोकात्मा ' नाम से प्रसिद्ध इस ओम् के - म् - उ - म रूप प्रज्ञान - विज्ञान महान् को पार करता हुमा, महान् पर प्रतिष्ठित प्रक्षर में लीन हो जाएगा । बस, चौथा मन्त्र कम्मंयोग प्रधान महदक्षरप्राप्ति करानेवाले जपयोग का ही निरूपण करता है । 11 8 11 सूय्यं के ऊपर परमेष्ठी है । सोरभाग विज्ञानात्मा है । पारमेष्ठ्यभाग महानात्मा है । महान् और अव्यक्त दोनों का महान् से ग्रहण है । इनमें वह व्याप्त रहता है, मतएव महान को महबार कहा जाता है । वह महत् पद - महदक्षर विज्ञान से परे है । विज्ञान से ऊपर की वस्तु है । न उसमें मन की गति है । न वह तत्व बुद्धिगम्य है । वह केवल अनुमेय है । प्राप्त यापय के आधार पर हमारा मन और बुद्धि यह विश्वास कर लेती है कि विज्ञान के ऊपर महदक्षर है । वही असली लक्ष्य है । इस प्रकार भावगम्य उस अक्षरब्रह्म पर धीर विद्वान् उपासनायोग द्वारा एवं उनसे नीची कोटि के विद्वान् जपात्मक कर्म्मयोग द्वारा ध्यानयोग से उस पर पहुँचने में समर्थ हो जाते हैं । परन्तु हैं ये दोनों ही मार्ग कठिन 1 । रोदसी के अधिनायक सूर्य्य हैं । इसमें अध्यात्म में वैश्वानर है । प्रान्तरिक्ष्य हम मरणधर्म्मा हैं । हमारी उत्पत्ति रोदसी ब्रह्माण्ड से हुई है । पृथिवी - अग्नि - खो तीन लोक हैं । पृथिवी अग्निलोक है । यही वायव्याग्नि मूतात्मा का तंजस - भाग है । सोममय दिव्या दित्याग्नि प्राश भाग है । तीनों की समष्टि भूतात्मा है । चित्य पार्थिवभाग शरीर है । पहले शरीर है । शरीर में - वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञरूप भूतात्मा है । इस पर प्रज्ञानमन है । इस पर विज्ञान सूय्यं है । यहाँ तक का भाग अध्यात्म और अधिदेवत में प्रत्यक्ष है । सूर्य्य - चन्द्रमा - श्रग्निवायु - पादित्य को भी देखते हैं । प्रज्ञानज्ञान - विज्ञानज्ञान - कर्मात्मा एवं शरीर का मी प्रत्यक्ष हो रहा है क्योंकि यह मौतिक प्रपञ्च है । प्रधिदैवत में सूय्यं से ऊपर के अमृतमय परमेष्ठी, स्वयम्भू भक्षर का भ्रप्रत्यक्ष है । मध्यात्म में विज्ञान से ऊपरवाले अक्षरविशिष्ट प्रमृतरूप महत्पद प्रत्यक्ष है । ऐसी अवस्था में साधारण मनुष्य उसका ध्यान करे यह सम्भव नहीं । बस, ऐसे सच मा चिकारियों की भी कल्याणकामना रखते हुए, महदक्षर से अर्वाकस्थित विज्ञानात्माक श्रोम् को सामने रखते हुए
ऋषि कहते हैं ---" यस्मिन् द्यौः पृथिवो चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ प्रात्मानमन्या वाचो विमुङचय, श्रमृतस्यैष सेतुः " ॥
ऋषि कहते हैं कि अक्षर - प्रव्यय - महदक्षर - भोपनिषदज्ञान - उपासानिशित महास्त्रशर महदक्षररूत प्रणव श्रादि सारे भगड़ों को छोडो । ओर - मोर सब बातें छोडो | यह तुम्हें मालूम है कि पृथिवीमन्तरिक्ष-[ १३२ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय द्यौ प्राणसहित मन सब कुछ उधर सूर्य्य में, इधर विज्ञान में श्रोतप्रोत है । बस, तुम इसे ही आत्मा समझो । उघर सूर्य्यं को देखा करो, इषर विज्ञान को देखा करो । योऽसावादित्यपुरुष. सोऽहम् - योऽसो सोऽहम् - योऽहं सोऽसौ - यह भावना किया करो । इसी भावना से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा क्योंकि विज्ञानात्मा उस महदक्षररूप श्रमृतात्मा का सेतु है । विज्ञान के नीचे मत्यंभाग है । ऊपर अमृतभाग है । इषर मध्यपतित विज्ञान, उधर मध्यपतित सूर्य्यं प्रमृत - मृत्यु का विभाजक है, सेतु है । मृत्युमय विषय से प्रमृतमय महदक्षर को पहुंचाने वाला यही सेतुरूप विज्ञान है । इसी विज्ञान - सूर्य्यं से प्रसतो मा सद्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय ' - इस रूप से प्रार्थना की जाती है । प्राण - म्रपान - समान - ध्यान-उदान भेद से पांच वायव्यप्रारण हैं । पांच ही भाग्नेयप्राण हैं । अधिदेवत में ३३ देवप्रारण हैं । मध्यात्म में-मूलद्वार से नाभि तक पृथिवीलोक है । नाभि से कष्ठ तक अन्तरिक्षलोक है | कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र तक बुलोक है । ब्रह्मरन्ध्र में विज्ञान - सूय्यं है । इसी शारीरत्रैलोक्य में प्राणापानादि सारे प्राण हैं । हृदय में मन है । यह सारे प्राण, मन, तीनों लोक, तीनों लोकों में रहने वाला वैश्वानर - तंजस - प्राशरूप देवसत्यात्मा सब कुछ उसी ब्रह्मरन्ध्रस्थ विज्ञानसूय्यं में प्रतिष्ठित हैं । विज्ञानब्रह्म की महिमा में सारा प्रपञ्च विजयी बन रहा है । उधर प्रषिदेवत में तीनोंलोक, प्राणस्थानीय ३३ देवता, मनः स्थानीय चन्द्रमा सब कुछ उसी सूयं में प्रतिष्ठित है । यही हमारा मात्मा है । सूयं में ज्योति गो - भायु तीन भाग हैं । ज्योति भाग से देवता बनते हैं । गौ से भूत उत्पन्न होते हैं । प्रायु भाग से मात्मसत्ता है । इसीलिए तो सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' - यह कहा जाता है । ऋषि कहते हैं कि मीर कुछ न सही, केबल तुम इसी का मोम् रूप से ध्यान किया करो । अथवा इस मन्त्र का निम्नलिखित प्रकार से भी प्रपं किया जा सकता है । मनः प्राणवाद्यां संघातो द्योः, वाक् प्राणयोः संघातमन्तरिक्षम् - वाक् - पृथिवी यौ अन्तरिक्ष- पृथिवी तीनों के ये लक्षण हैं । पृथिवी वाङ्मयी है । अन्तरिक्ष प्राणवाङ्मय है । द्यौ एवं तत्स्थानीय सूय्यं मनः प्राण वाङ्मय है, प्रतएव सूर्य के लिए - पावित्यं मनः, प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूथ्य: - कहा जाता है एवं प्राण- आपः वाक् प्रन्न - अन्नाद इस सृष्टिरूप क्षरक्रम में सूय्यं यो वाकुस्थानीया होती है । कहना इससे यही है कि वाक् पृथिवी प्रग्निनों में है । वात्रयी के ग्रहण के लिए - द्यौः पृथिवो, बाम्परिलम् - कहा है एवं प्राणैः से प्राण प्रभिप्रेत हैं । प्राण धर्क है । प्रकं मनन्त होते हैं, प्रतएव इसके लिए प्रार्थ: कहा है । मन ' मन ' है । वाक् - प्रारण - मन की समष्टि घात्मा है, जिसे हमने प्रात्मा समझ रखा है । मात्मा के वे मन - प्राण - वाकू तीनों उधर सूयं में, इधर विज्ञान में प्रोत - प्रोत हैं । इस भ्रात्मा की प्रतिष्ठा वह है । उसकी ज्योति से यह प्रकाशित है, अतः उसी को असली भात्मा समझना चाहिए । सूय्यं को लक्ष्य बनाकर प्रत्यक्षडष्ट विज्ञान को सदा लक्ष्य रखो । प्रज्ञान बन्घन का कारण है । विज्ञान प्रसंग है । उसको प्रधान मानकर कर्म्म करते रहने पर भी वासना - भावनासंस्कार को भाने का मौका नहीं मिलता । विश्वास करो, यदि तुम चिरकाल तक विज्ञान की उपासना करते रहो तो एक दिन वह अमृत ( प्रक्षर ) का सेतु विज्ञान तुम्हें प्रमृत पर पहुँचा देगा, क्योंकि विज्ञान पर ही वह अक्षर है । निरन्तर ध्यान से वहाँ के प्रक्षर का साक्षात्कार हो जाना I १ शत ० ब्रा ० १४।४।१।३१-३२ । . २ ऋग्वेद मं ० १।११५।१ । [ १३३ ]
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facteruse ( faitra ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य स्वाभाविक ही है । यह है -विज्ञानात्मा का स्वरूप । इसका किस रूप से ध्यान करें? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं -" मरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः । स एषोऽन्तश्चरते बहुधा. जायमानः । श्रोमित्येवं ध्यायथ श्रात्मानं स्वस्ति वः पाराय ( पराय वा ) तमसः परस्तात् " ॥६ ॥
प्रश्नोपनिषत् में जिन ७२ हजार नाडियों का प्रतिविस्तार से निरूपण किया गया हैं ये सारी इसी सय्यंरूप विज्ञान से बद्ध है । नाडियाँ प्राणरूपा हैं । प्राण का बाधार ज्ञानघन - विज्ञान ही है । जैसे रथ - नाभि में मारे प्रतिष्ठित हैं, एवमेव सारी नाडियाँ नामिरूप सूय्यं में, भष्मास्म में, सूम्यं स्थानीय विज्ञान में प्रतिष्ठित हैं । वह एक ही सूय्यं पृथिवी - अन्तरिक्ष - द्या- ३३ देवता - वैश्वानर- तैजस - प्राश बारि नेक रूपों में परिणत होता है । सृष्टि - विज्ञान के अनुसार सारा त्रैलोक्य, त्रैलोक्य के ३३ सों प्राणदेवता, सब कुछ सूर्य से उत्पन्न हुए हैं । इसका प्रोम् रूप से ध्यान करना चाहिए । पृथिवी ' म् ' है, धन्तरिक ' उ ' है एवं थो ' ' है । प्रथवा पृथिवी ' म् ' है, अन्तरिक्ष ' ओ ' है एवं द्यौ ' मोम् ' है । सूर्य्यरूप विज्ञान स्वयं ' प्रोम् ' है । इस विज्ञानरूप सेतु पर ' ओम् ' बुद्धि से सवार हो जाओ । यह अवश्य ही तुम्हें कर लगा देगा । जब कोई मनुष्य विदेश यात्रा करने के लिए जहांज पर सवार होता है तो पहुँचाने के लिए साथ में भाए हुए सगे - सम्बन्धी उसे जहाज में सवार कराके उसको कहा करते हैं- ' इस स्थान से उस पार-स्थान के लिए तुम्हार कल्याण हो । तुम कल्याणसहित पार पहुँच जामो ' । प्राज ऋषि भी इन्हीं प्रक्षरों का प्रयोग कर रहे हैं । सूर्य्यरूप विज्ञानसेतु पर ( प्रोमुरूप सेतु पर ) - प्रक्षर पर जानेवाले को सवार कर दिया है । मृत्युलोक भूतमय होने से तमोरूप । प्राज इस सूर्य्यसेतु पर बैठकर यह प्रात्मवित् ---इससे पार जाना चाहता है । ऐसों को मंगलकामुक ऋषि भाशीर्वाद देते हैं कि तम से पार जानें के लिए तुम्हारा कल्याण हो । अर्थात् तुम सानन्द, निविघ्न इस मृत्युलोक से भवसागर से पार उतर जायो । कहीं - कहीं राय यह भी पाठ है । सूय्यं से नीचे का मर्त्यभाग ' भवर ' है । ऊपर का प्रमृतभाग ' पर ' है । स्वयं सेतुरूप सूय्यं विश्वापेक्षया ' परावर ' है । तमोरूप ' प्रवर ' से जो तत्त्व ' पर ' है - वह ' पर ' नाम से प्रसिद्ध है । उसके लिए प्रर्थात् तमसः यत् परं तस्वं प्रक्षरं तत्त्वं तदर्थः तत्प्राप्तये वः स्वस्तिरस्तु यही तात्पय्यं है । इस प्रकार प्रथम- मध्यम - उत्तम अधिकारीभेद से ऋषि तीन प्रकार के मार्ग बतला देते हैं ---१ श्रोपनिषद ज्ञान प्राप्त कर - योग द्वारा मन की वृत्तियों को शान्त करते हुए, सर्व चित्रयोग सब द्वारा अक्षर को प्राप्त करना उत्तम अधिकारियों का काम है । तीसरे मन्त्र में इसी प्रयं का निरूपण है । [ १३४ ]
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feature ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य - ईश्वरप्राप्त्युपाय २- महदुक्षररूप ' मोम् ' इत्याकारक शब्दब्रह्म को प्राधार मानकर उस पर दृष्टि रखते हुए, सांसारिक कर्म्म करते हुए शब्दब्रह्म द्वारा उस महदक्षर को प्राप्त करना - मध्यमाधिकारियों का काम है । चौथे मन्त्र में इसी प्रर्थ का निरूपण है । ३ - विज्ञानरूप अक्षर को ' ओम् ' द्वारा देखते हुए, इसके द्वारा अक्षर प्राप्त करना - प्रथमाधिकारियों का काम है । पत्र व छठे मन्त्र में इसी अर्थ का निरूपण है । इस प्रकार अक्षरस्वरूपनिरूपण द्वारा ऋषि ने अधिकारी - भेद से तीन मार्ग बतलाए एवं यह सिद्ध किया कि यदि तुम उस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हो तो तीनों में से अधिकारानुकूल किसी एक मार्ग का अवलम्बन करो । इससे तुम्हारा कल्याण होगा । श्रबतक के निरूपण से यह भी सिद्ध हो जाता है कि लक्ष्य ( अक्षर ) भिन्न है एवं लक्ष्य पर पहुँचनेवाला मित्र है । साधारण दृष्टि से देखने पर भेद ही हमारे सामने उपस्थित होता है । यों तो भवान्तर घनेक भेद । परन्तु यहाँ हम स्थूल तीन भेदों पर ही आपका ध्यान श्राकर्षित करते हैं । पहला विभाग प्रमृत है । दूसरा ब्रह्मसत्य है । तीसरा-देवसत्य हैं । देवसस्यगमित ब्रह्मसत्य जीवात्मा है । यह जानेवाला है । तीर लगाने वाला है । अमृतरूप अक्षरात्मा - लक्ष्य । इस लक्ष्य पर देवसत्यरूप कम्र्मात्मा सीघा मी पहुँच सकता है । इसके लिए तो धनुगु होवोपनिषयम् इत्यादि कहा है । इस मार्ग में ब्रह्मसत्य का सहारा लेने की धपेक्षा नहीं है । दूसरे मार्ग में महदक्षर प्राप्त होता है । प्रव्यक्तयुक्त महान् ब्रह्मसस्य का भाग है । मध्यमाधिकारी देवसत्य को महदुरूप ब्रह्मसत्य पर ले जाते हैं । महद् द्वारा तत्रस्थित प्रक्षर को प्राप्त करते हैं । इसी ब्रह्मसत्यापेक्ष - द्वितीयभागं के लिए प्रणवो धनुः इत्यादि कहा है एवं तीसरा मार्ग एक श्रेणी नीचे उतरा हुआ है । वह है विज्ञानसूय्यं । यह भी ब्रह्मसत्य का ही भाग है । पाँचवें छठे - सातवें मन्त्र में इसी तीसरे मार्ग का निरूपण है । इस प्रकार प्रज्ञानात्म विशिष्ट कम्मरमा ( देवसत्यात्मा ) विज्ञान द्वारा प्रक्षर में जाए, द्यथवा महदक्षर द्वारा प्रणवोपासनारूप कर्म्म करता हुआ अक्षर में जाए, प्रथवा स्वतन्त्ररूप से मक्षर में जाए, ये तीन मार्ग हो सकते हैं । इसमें प्रक्षर प्राप्तव्य है । ब्रह्मसस्य मार्ग है । देवसत्य मार्गी है । उपासना-कर्मयोग - ध्यानयोग सांधन हैं । ऋषि कहते हैं कि जानेवाला, जाने का मार्ग, प्राप्त होने वाला- तीनों कहने को तीन हैं, दूसरे शब्दों में- अमृत ब्रह्मसत्य- देवसत्य तीनों कहने को तीन हैं, वस्तुतः तीनों एक हैं । माना - जाना काल्पनिक है । भेद काल्पनिक है । समझ का फेर है । जो जानेवाला है वही तो लक्ष्य है । जो लक्ष्य है वही तो जानेवाला है । वही चिदंश नानारूप में परिणत हो रहा है । इसलिए हम तुम्हें प्रादेश करते हैं कि तुम सारा भेद छोड़ो । प्रभेद को अपनाभो । तीन मार्ग हैं । न लक्ष्य कोई भिन्न है । हमने जो लक्ष्य पर पहुंचना बतलाया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें कहीं उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दूर जाना पढ़ेगा । तुम यहीं हो । केवल तुम्हारा ध्यान हटा हुआ है । उसे प्राकृष्ट करने के लिए हमने इतना भाडम्बर किया है । प्रप्राप्ति की प्राप्ति नहीं है । अपि तु प्राप्त वस्तु पर भाए हुए अविद्या प्रावरण की निवृत्ति है । बस, इसी प्रभेद - तत्व का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-[ १३५ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) १ ऋग्वेद मं ० ८५८।२ । ३ छान्दोग्योप ० ३।१४।१ । guest पनिषद्विज्ञान माध्य २ नृसिंह उत्तर उप ० ७ । [ १३६ ] " यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि । बिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः । मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽस्ले हृदयं संनिधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा प्रानन्दरूपममृतं यद्विभाति " ॥ स्वयम्भू वैश्वरूप्य श्राकाश कहलाता है - इसी को परमाकाश कहते हैं । पारमेष्ठ्य वैश्वरूप समुद्र कहलाता है । सौर वैश्वरूप ब्रह्माण्ड नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव वैश्वरूप्य इलान्द नाम से व्यवहुत होता है एवं चान्द्र वैश्वरूप्य को परिप्लव कहते हैं । वैश्वरूप्य वैज्ञानिक शब्द है । दार्शनिक परिभाषा में यही महिमा नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए पुनःपद प्रयोग माया करता है । स्वयम्भू शाकाशरूप हैं । यह ब्रह्मसत्य का प्रादिभाग है । सर्वान्त में पृथिवी है । भायन्स के व्योम ( स्वयम्भू ) भोर भू-( पृथिवी ) ये दोनों स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी पांचों के संग्राहक हैं । इन पाँचों में जो सर्वश है, सर्ववित् है, उस प्रक्षर की ही महिमा प्रतिष्ठित है । प्रक्षर उक्थरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इसका चिद-भाग ही सर्वत्र महिमारूप से व्याप्त हो रहा है । वही अपनी महिमा से स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूय्यं - चन्द्रमा-पृथिवीरूप में परिणत हो ब्रह्मसत्य बन रहा है । प्रर्थात् अमृत ही ब्रह्म बन रहा है । भर्थात् महाविश्व में वही है । महाविश्व भी यही है । भब चलिए - प्रध्यात्म की पोर । अध्यात्म में शरीर, हृदय, वहर भेद से तीन पुर हैं । तीनों पुरों की समष्टि ब्रह्मपुर है । इसमें भी वही प्रतिष्ठित है । देवसत्यमित ब्रह्मसत्यरूप सर्वधम्र्म्मोपपन्न ईश्वर भी वही है । देवसत्यगर्भित ब्रह्मसत्यस्वरूप ब्रह्मपुरस्य जीव भी वही है । जीव- ईश्वर की क्या बात, स्वयं अव्यय भी वही है । पहले ऋषि ने भ्रमृताक्षर के साथ जीवेश्वर का धमेव किया । अब अमृताक्षर भोर अव्यय का प्रभेद करते हुए भागे जाकर कहते हैं कि वही तस्व प्रमुतमव है । वही मनोमय है | प्राणरूप शरीर का सञ्चालक है । प्रर्थात् मव्यय की प्राण - कला का सम्बाधक अव्यय का मनोभाग है । ऐसा प्राणशरीरनेता मन अन्न ( वाक् ) को ग्रहण कर वहराकाश में प्रतिष्ठित है । विज्ञान द्वारा धीरलोग उसे देखते हैं । अर्थात् विज्ञान ही उसकी दृष्टि है । उसकी विज्ञान कला ने ही सबको जानने की शक्ति को सुरक्षित कर रखा है । उसके विज्ञान से सब विज्ञानमय बन रहे हैं । उसी विज्ञान - कला के नीचे प्रानन्दकला छुपी हुई है । विज्ञान पर पहुंचने के बाद विद्वान्लोग उस मानन्दकला के दर्शन करने में समर्थ होते हैं । इस प्रकार पञ्चकल aor य मी वही है । प्रमृताक्षर भी वही है, ब्रह्मसत्य भी है । सब कुछ वही है । कठोपनिषत् में विस्तार के साथ इस प्रभेदभाव का निरूपण किया जा चुका है, मतः यहाँ इस विषय में अधिक न कहकर यही कहते हुए इस मन्त्रार्थ को समाप्त करते हैं । हमें सदा - एकं वा इवं वि बमूध सर्वम् ' - देवं सर्वन् ' -सर्वं सल्विदं ब्रह्म ' - इन ति वचनों की उपासना करनी चाहिए । विषमता से, नानाभावों से, प्रशान्ति होती है । घशान्ति क्षोभ हैं । क्षोभ दुःख है । संसार में शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि हम सर्व-
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features ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य ईश्वरप्राप्युपाय भूतात्मभाव रखें । सबमें घमेद समझें । इससे विषमता जाती रहेगी । समता प्राप्त होगी । समस्य योग है । योगयुक्त प्रात्मा परम सुखी है ॥। ७ ॥ अक्षर ही अव्यय है, वही क्षर है, वही ब्रह्यसत्य है एवं वही देवसत्य है । जैसा कि तयाक्षरावृ ० इत्यादि में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । बस, इसी सर्वरूप महदक्षर की प्रशंसा करते हुए कृषि कहते है-" मिलते हृदयग्रन्थिरियन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् पराबरे " । से अव्यय पर नाम से प्रसिद्ध है, क्षर भवर नाम से प्रसिद्ध है; एवमेव प्रक्षर पत्रावर नाम से प्रसिद्ध है । क्षर की इष्टया यह पर है, धव्यय रष्टधा अबर है, मतएव हम इसे प्रवश्य ही परावर कहने के लिए सम्पार हैं । यह धव्यय - क्षर दोनों का मध्य है, प्रतएष दोनों का उपकारक है । घर विश्व है । समय विश्वासीत है । जो इस अक्षर को देश मेता है. साक्षात्कार कर लेता है, वह इस पार की वस्तु ( खर ) चोर इस पार की वस्तु ( अध्यय ) दोनों को देख लेता है । इन दोनों को देखता हुआ वह सब - कुछ देख देखा है क्योंकि इन दो से अतिरिक्त भोर बचता ही क्या है? स्थूल, सूक्ष्म, कारण भेद से हमारे में तीन प्रकार की बन्दिय हैं । तीनों में से एक भी रहती है तो मुक्ति का प्रभाव है । इनमें स्थूलशरीर थोर सूक्ष्मशरीर की ग्रन्थि हृदयस्थित व्यानरूपा है । जब तक एक व्यान में दोनों शरीर बद्ध रखते हैं तट तक जीवन है । जिस दिन ध्यानरूप - प्रन्थि टूट जाती है उस दिन स्थूल सूक्ष्म दोनों वियुक्त हो जाते हैं । इसी धवस्था का नाम मृत्यु है एवं सूक्ष्मशरीर घोर कारणशरीर की ग्रन्थि कहा है । पासपा-कथ सम्म संस्कारों मे दोनों को बस कर रखा है । जिस दिन यह कम्मरूपा: ग्रन्थि टूट जाती है उस दिन दोनों अमन हो जाते हैं । सूक्ष्मशरीर भी स्थूलशरीर से पृथक हो जाता है । इसी अवस्था का पा परामुक्ति है एवं कारणशरीर प्रोर अक्षर की जो परस्पर ग्रन्थि है, वह विद्यामय भावनासंस्कारख्या है । कर्म्म संस्कार हट गया, परन्तु जबतक यह तीसरी ग्रन्थि है तबतक भावना का विमोक नहीं हैं । जैसे उपासना से वासनारूप कम्मंग्रन्थि का विनाश होता है तथंब प्रक्षर -प्राप्ति से ग्रन्थिमात्र का विनाश हो जाता है क्योंकि प्रक्षर प्रसंग है - प्रमृत है । इस पर किसी संस्कार का जमाव नहीं हो सकता । इस अक्षरप्राप्ति का उपाय वही बुद्धियोग है, जिसका कि प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड में विस्तार में मिरूपण किया जा चुका है-१ - स्थूलसूक्ष्म यो यियनपा - तविमोके मृत्युः । २- सूक्ष्मकारण योथिर्वासनाकर्मरूपा = तद् विमोके प्रपरामुक्ति, विभोरच उपासनया । ३- कारणाक्ष रयोर्प्रन्थि - विद्यामयी भावनारूपा = सद्विमोके परासुक्तिः विमोकश्च सुद्धियोगेन । [ १३७ ]