Mundakopanoshad — पृष्ठ 141–150
Mundakopanoshad · पृष्ठ 141–150
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द्वितीय ( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानाय ईश्वरपा चूंकि अक्षर से ग्रन्थिसामान्य का विमोक हो जाता है । इसीलिए - मिळते हाय: - यह कहा है । एकस्मिन् धम्मिरिण विस्वनाना कोट्यवगाहि ज्ञानं ही संशय है । संसार में हम अनेक प्रकार का काव्य-कारणभाव देखते हैं । एक विश्व में विरुद्ध काय्यं कारण संसार का अद्वितीय काय्यं कारणभाव इन सब में कौन है? माव देखने से हम संशय में पड़ जाते हैं कि किसे सच माने? यह संशय तभी तक है जब तक कि प्रक्षर ज्ञान नहीं होता । प्रक्षर सर्वधम्मोपपलेश्च के अनुसार सर्वधम्मंमय है । जब उसे हम पहचान जाते हैं तो समझ लेते हैं कि यह सारी लीला अक्षर की । वह सब कुछ कर सकता है । सब कुछ बन सकता है । एक बहुरूपिया हमारे सामने नित्य नई वेशभूषा बना कर भाता है । इन संशय में पड़ जाते हैं । सामान्यज्ञानविशेष का मशान ही मोह है । संशय का पिता मोह है । का सामान्य ज्ञान है, परन्तु विशेषज्ञान न होने से हम उसकी प्रतिदिन की सर्वथा विभिन्न नूतन वेशभूषा को देखकर थक्कर में पड़ जाते हैं । परन्तु जब वस्त्र खोले हुए उसके प्रसमी स्वरूप को हम पहचान जाते हैं तो सारा संदेह जाता रहता है, और यही सब कुछ बसता है - यह निश्वय ज्ञान - हो जाता है । ठीक यही बात यहीं है । विश्ववस्त्र पहन कर नानारूपों में परिणत प्रक्षर धोखे में डाल रहा है । बबिया धोखा है - संशय है - मोह है । जिस दिन विश्वोपहित सुखमसर प्राप्त हो जाता है - उस दिन सारे कम् क्षीण हो जाते हैं । केवल विद्याभाग रह जाता है । ऐसी अवस्था में संशयों का कहाँ, कैसे टिकाव हो सकखा है? बस, जिनको अपनी तीनों हृदग्रन्थियां तोड़कर कम्र्म्मविनाश द्वारा संशय से बखन होते हुए परमुक्ति प्राप्त करना हो, वे संसार को नश्वर सुखों को छोड कर ममसा - बाबा - कर इसी प्रथि विमोकशक्षण धार की घोर बुद्धियोग करने का यत्न करें । इसी में उनका कल्याण है ॥। इति महदादप्रशंसा ॥ || 8 || जो महदक्ष रप धोकार की उपासना करते हैं उन्हें वही मिलता है । पूर्व के व शस्थ में उसी महदार की प्रशंसा है, परन्तु जो उसकी उपासना करने में असमर्थ रहते हुए सेतु सूर्य्यात्मक-मिनाक्षरस्वरूप श्रोम् को उपासना करते हैं, वे भी उसी में इसे जाते हैं, क्योंकि विज्ञानसूर्य स्वयंः जड़ है । उसमें जो चमक है, वह इसी अक्षर की है । अक्षर ( वित् ) की चमक से ही विज्ञान विज्ञान ' बना है । महदेश र चिन का यह विज्ञानावर सेतु है, अतएब इसके लिए पूर्व में प्रसृतस्येव सेतु यह कहा है । सौरमण्डल प्राग्नेय होने से हिरण्मय है । इस हिरण्मय के केन्द्र में जो सत्यतस्य है जिसे कि वान्ोग्यादि ' बाशुर पुरुष ' कहते हैं, जो कि इस हिरण्यमयपान से भारत रहने के कारण ---" हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । स्वं पूषनपावृणु सत्यमय स्ट्ये " ॥ " १ ईशावास्योप १५ । [ ११ ]
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fates ( Facts ) ईश्वरानुपाद इत्यादि रूप से उपथर्षित है यह बाधाविश्वे पुच सोऽहम् के प्रनुसार साक्षात् प्रा है, अक्षरूप है । हिरण्मयमण्डस में महिमा - शरीर - केन्द्र तीन कोश है । सोर प्रकाशमण्डन पहला गोश है । इसे हम अवर कोश कह सकते हैं । इसके भीतर सूय्यंपिण्डरूप शरीरकोश है । इसे हम व पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार परावर कोश कह सकते हैं । उसके भीतर हृदयाकाशात्मक दहराका है यही परकोश है । इसमें वह चित्पुरुष प्रतिष्ठित है । हिरण्मयमण्डलरूप परकोश में वह लोकातीत प निष्कल ब्रह्म प्रतिष्ठित है । वह वस्वन्त शुभ्र है । भर्यात् शुद्धज्ञान ज्योतिम्मय है । ज्योतियों का ( सूतज्योतियों का ) ज्योति है । यह तस्य वही है जिसे धारमवित् जाना करते हैं । प्रर्थात् प्रात्मकामना
रखनेवाले ही उसे जान सकते हैं, न कि विषयों में रहने वाले हमारे जैसे संसारी ।
॥ 8 ॥
पूर्व के मन्त्र में ज्योतिषां ज्योतिः पद पाया है । ज्योति भूत - ज्ञान मैद से दो प्रकार की है । मूसज्योति सून्डमा सारक विद्युत् अन्नि भेद से पांच प्रकार की है । पांचों मूतज्योतियाँ उसी शाम-ज्योति से है, बतएव हम अवश्य ही उस ज्ञानज्योति को इन पाँचों भूतज्योंतियों की भी ज्योति कहने के लिए सम्यार हैं । प्रकारान्तर से सूयं चन्द्रमा पग्नि - वाक् - धात्म ये पांच विभाग किए जाते हैं । इन्हीं पाँचों को लक्ष्य में रखकर पच्चन्यो तिरयं पुरुषः - यह कहा जाता है । इस पक्ष में तारक-विद्युत दोनों का सूयं से ग्रहत्व है । वाद का भग्नि में अन्तर्भाव है । इस प्रकार ४ भूतज्योतियाँ हो जाती हैं । पांचवीं वही धात्मज्योति है । धात्मज्योति जब तक है तब तक सारी भूतज्योतियां हैं । जिस दिन थालज्योति न रहेंगी, उम्र दिन संसार में अंधेरा है, प्रतएव धात्मज्योति को हम ज्योतिष ज्योि कहने के लिए तम्पार हैं । वस्तुतस्तु यह बुति - ईश्वरीय ज्ञानज्योति का ही निरूपण करती हैं क्योंकि हमारे में चित् का बागमन सूयं द्वारा होता है । इसीलिए तो सुभ्यं धारमा जनता - ग्रह कहा है । यही कारण है कि हमारा मात्मा स्वसत्ता के लिए मूतज्योति की अपेक्षा रखता है । यदि किसी को घोर अंधकार में रख दिया जाए तो वह मी हो मर जाए । इस प्रकार हम हमारी प्रपेक्षा से अपनी पात्मज्योति को सूतज्योति की ज्योति नहीं कह सकते क्योंकि यह हमसे पूर्वज है । परन्तु ईश्वर शरीर में ऐसा नहीं है । वहाँ पहले महदक्षररूप ज्ञानज्योति है । उसके पेट में भूतज्योति का जन्म है । भूत-ज्योति में जो चमक है वह उसी की है । भूतज्योति ज्ञानज्योति को आधार मानकर ही अपना स्वरूप प्रतिष्ठित किए हुए है, अतएव वह ज्ञानवत् मधामच्छद बन रही है । मूत वाङ्मय है, वाक् षामस्वर ( जगह रोकने वाली ) होती है । परन्तु इसमें तेजभूत ही एक ऐसा है, जो जगह नहीं रोकता । एक ही प्रदेश में भाप ५० दीपप्रमानों का समावेश कर सकते हैं । यही कारण है कि उसी तेजरूप सौरप्रकाश से निम्मित होनेवाली भणुमात्र चक्षुरिन्द्रिय पर धनन्तभूत ( मन्तर्जगत् रूप ) प्रतिष्ठित हो जाते हैं । सारे विश्व का चित्र एक ही चक्षुबिन्दु पर समा जाता । क्योंकि यह प्रामच्छर है । कहना इस प से यही है कि वह ईश्वराक्षर ज्योति वास्तव में इन पांचों भूतज्योतियों की प्रकाशिका है । इसी मित्रा को लक्ष्य में रखकर मत सुम्पों माति न चन्द्रतारकं०-- इत्यादि कहा है । सूय्यंचन्द्रज्योति [ १३६ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाय है । चन्द्रज्योति उससे कम है? तारक उससे कम है? जब यहीं वहाँ जाकर अपना गर्न खो है तो सर्वनिष्ट चग्निज्योति की तो कथा ही क्या है? जैसे चान्द्रज्योति सौरज्योति के सामने थाने पर छपवी ज्योति सो बैठती है - चन्द्रमा सुभ्यं में ( सौरप्रकाश में ) जाकर न केवल अपनी ज्योति खो ता है अपितु यह उसी सूयं ज्योति से प्रकाशित भी होता है, एवमेव सॉरी भूतज्योंतियां वहाँ जाकर
चना प्रकाश खो बैठती हैं एवं ये उसी से प्रकाशित भी हो रही हैं ।
॥ १० ॥
कभी तो सूट के ऊपर अक्षर ( महदक्षर ) की सस्ता बतलाई जाती है, कभी सूय्यं के केन्द्र में उ प्रतिष्ठित बतलाया जाता है । क्या वह किसी एक नियत स्थान में प्रतिष्ठित है? नहीं, कदापि नहीं । में प्रतिष्ठित है - इसका कारण केवल सुसूक्ष्मता से है । वह तो सर्वव्यापक है । उससे कौनसा स्थान शादी है? ऊपर - नीचे पूर्व - पश्चिम - उत्तर - पक्षित सर्वत्र वही व्याप्त है । यह सारा विश्व भी वही है । उसमें भी नही है । उससे बाहर भी बही है । यही प्रविविक्त नाम से प्रसिद्ध विश्वातीस परात्पर है । वहीं-प्रविष्ट नाम से प्रसिद्ध विश्वचर षोडसी है । वही सृष्ट नाम से प्रसिद्ध विश्व है । सब कुछ वही है ॥। ११ ॥ - * इस द्वितीयमुण्डक में ईश्वर का समष्टिरूप से निरूपण भौर उसकी प्राप्ति का उपाय देवों feee बतलाए गए हैं । प्रथममुण्ड के प्रथमखण्ड में परब्रह्म, द्वितीयखण्ड में अपरा बतलाया गया है । वह द्वितीय ives के प्रथमखण्ड में देवसस्य द्वारा परावर दोनों का निरूपण किया एवं द्वितीयचण्ड में उसकी प्राप्ति के साधन वृक्ष छान - हम्मे - उपासना तीनों काण्डों का निरूपण किया गया हैं ॥। इति द्वितीयमुष्य ईश्वरप्राप्स्युपायात्मको द्वितीयखण्डः समाप्तः ॥ २ ॥ इति द्वितीयमुण्डके समष्टिरूपपरावरब्रह्मनिरूपणम् सत्प्राप्युपायप्रदर्शनं च समाप्तम् ॥ ॥ इति द्वितीयमुण्डकं समाप्तम् ॥ [ 18 ]
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हिरण्यगर्भविद्या - अत्रैव स्पष्टरूपेण प्रतिपादिता विशे - अपरामुक्तिसाधक-अथ तृतीयमुण्डकम् तत्र महदक्षर विशिष्ट विज्ञानाक्षर निरूपणम् -परामुक्तिसाधक-अव्यय विशिष्ट महदक्षरनिरूपणम् ३
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अथ तृतीयमुण्डके-परामुक्तिसाधक महदक्ष र विशिष्ट विज्ञानाक्षर-निरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः १
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अब पुण्यकोपनिषद-ततोयमण्डके प्रथमः खण्डः [ मूल ] द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वस्यनश्नन्नम्यो प्रभिचाकशीति ॥ १ ॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति नुह्यमानः । जुष्टं यहा पश्यत्यम्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥२ ॥
या पश्यः पश्यते रुक्मवणं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तवा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥
धारणो ह्येष यः सर्वमूर्तविभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी ।
आत्मक्रीड प्रात्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
सत्येन लभ्यत्तपसा ह्येष बात्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीरणदोषाः ॥ ५ ॥
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पत्या विततो देवयानः । येनाक्रमन्स्युषयो ह्यालामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥
गृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे तविहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥७ ॥
न चक्षुषा गृह्यते नापि याचा नान्यदेवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ६ ॥
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्ध विभवत्येष म्रात्मा ॥ ९ ॥
यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांच कामान् । तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्ध तिकामः ॥ १० ॥
॥ इति तृतीयमुण्डके प्रथमः खण्डः ॥ ॥ १ ॥
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प्र तृतीयमुण्डके -अपरामुक्तिसाधक महदक्षरविशिष्टविज्ञानाक्षरनिरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः [ विज्ञानभाष्य ] पूर्व के प्रकरण में ऋषि ने बड़े विस्तार के साथ यह बतला दिया है कि जीवात्मा ईश्वर से पृथक वस्तु नहीं है । उससे अभिन्न हैं । इसके महत्पद में सबकुछ प्रपित है । यदि वहाँ पर स्थिर मार को यह अपना निशाना बना लेता है तो यह सारे बन्धन से विमुक्त हो जाता है । उपदेश यथार्थ है । परन्तु कैसे इस पर अमल किया जाए? ऐसा कौनसा कारण है कि हम जानते हुए भी धनजान बन रहे है? समझते हैं कि संसार बन्धन है, फिर भी रात - दिन उसी में विलीन रहते हैं । ऐसा क्यों? क्या कोई उपाय ऐसा है जिससे हम अपने समीपस्थ उसे देख सकते हैं? एक ही शरीर हम दोनों का ( कीश्वर वारः ) स्थान है । फिर क्या कारण हैं कि वह तो शरीर में रहता हुआ भी निर्लिप्त रहता है एवं इष इसके सुख - दुख से घिरे हुए हैं? बस, इस प्रथमखण्ड में सूक्ष्मरूप से इन्हीं विषयों पर प्रकाश जाएगा । संक्षेप से जीवेश्वर का एवं उनके स्थान का निरूपण, ईश्वर प्राप्ति के उपाय, इतने विषय इसमें बतलाए जाएंगे । शरीर में ही दोनों हैं । उनमें जीव भोक्ता है, ईश्वर साक्षी है । दोनों का भाव है । सबसे पहले इसी अर्थ का निरूपण करते हुए प्रङ्गिरा कहते हैं-" द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजातेः । तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्यो प्रभिचाकशीति " - इति ॥ free f द्वतीयखण्ड का प्रथम - प्राविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत् पदम् इत्यादि सानुषी होने से धनेक धर्मो से सम्बन्ध रखता है- एवमेव हमारा यह मन्त्र भी अनुगमानुबन्धी इसे से दार्शनिकों का खिलौना बन रहा है । भगवान् शंकराचार्य के भद्वैतवाद का रामानुजाचार्य के विवाद का बल्लभाचार्य के प्रवकृतपरिणामवादरूप शुद्धाद्वैतवाद का निम्बार्काचार्य के ईसा-बाद का एवं माध्वाचार्य के द्वैतवाद का यह मन्त्र प्रधान -स्तम्भ बन रहा है । पाँचों प्राचार्यों ने इसे माया है । ये पांचों ही अर्थ मपेक्षया पर्याय हैं । ईश्वर के लिए सर्वधम्मोपपत्तेश्य कहा जाता है । वह सम्पक्स है । वह अभि भी हैं । मिल भी है । भिक्षामित्र भी है । सब कुछ है । सचमुच यह मन्त्र सभी भावों से तात्पर्य रखता है । इसीलिए तो हम इसे अनुगमानुबन्धी मन्त्र कहते हैं । दार्शनिकों के छन भिन्न - भिन्न अर्थों का क्या स्वरूप है? प्रकृत में यह बतलाने की कोई प्रावश्यकता नहीं है । तत्तद्-दनों में तत्तदर्थों का बड़े विस्तार से निरूपण किया गया है । हमारा ध्यान विज्ञान की भोर है । विज्ञान भिन्न वस्तु है । दर्शन दूसरा तत्त्व है । हम उपनिषदों का दार्शनिक नहीं कर रहे हैं अपितु, वैज्ञा-[ १४७ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानाक्षरनिरूपण निक अर्थ कर रहे हैं । दर्शनों के झमेले से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं । दर्शनाभिलाषियों को दर्शन के महत्त्व का दर्शन में ही प्रत्यक्ष करना चाहिए । N चूंकि यह मन्त्र अनुगम मन्त्र है प्रतएव विज्ञान - कोटि में भी इसके अनेक श्रर्थं होते हैं । उन्हीं भों में से दो - चार भयों की भोर पाठकों का ध्यान माकर्षित किया जाता है प्रथम अर्थ—— परात्परविशिष्ट पञ्चकोशात्मक भव्ययपुरुष प्रालम्बन - तत्त्व है । संसार में जितना वाक् प्रपञ्च ( अन - प्रपञ्च ) है, उसका प्रालम्बन अव्यय का धन्नमयकोश है । संसार में वाक्रूप सूचक का विधरण करने वाले प्रश्नोपनिषत् में उपवर्णित जितने प्राण हैं उन सबका मालम्बन का प्राणमयकोश है । सुखदुःखभोक्ता - प्राणिमात्र में रहने वाले इन्द्रियमन एवं इन्द्रियागत विषयानुभव में कारणभूत प्रज्ञानमन, इन मनोमात्र का भालम्बन अव्ययपुरुष का मनोमयकोश है । इन्द्रियसापेक्ष-विषयानुबन्धी प्राणिमात्र का प्रज्ञानज्ञान, विषयों के न रहने पर भी इन्द्रियों की धनपेक्षा रखता हुआ स्वतन्त्र रूप से सर्वत्र दौड़ लगाने वाला प्राणिमात्र का विज्ञानज्ञान, प्राकृति, प्रकृति, अहंकृलिम्पाक पव्यक्तयुक्त महदज्ञान, सब उस प्रव्यय के विज्ञानमयकोश में प्रतिष्ठित हैं । मानन्द, प्रमोद मोक हर्ष आदि सांसारिक जितने भी समृद्धानन्द हैं एवं पारलौकिक शान्तिसुखरूप जितने भी आत्मानन्य सा पालम्बन अव्यय का आनन्दमयकोश है । संसार में हम पांच से भलावा छठी वस्तु नहीं 1 प्राणों उसके पांचों कोशों में है । जो उन पञ्चकोशात्मक भव्ययालम्बन को जान गया वह सबकुछ जानवया क्योंकि सबकुछ उसी में हैं । प्रव्यय की इसी घालम्बनता का निरूपण करते हुए महर्षि कठ कहतेोह " एतवालम्बनं श्रेष्ठमेतवालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते " - हति ॥ " यही मालम्बनरूप व्ययतस्व वृक्ष है । धव्यय ब्रह्म महामायावधि विश्वव्यापक प्रविष्ट-तत्त्व है । विश्वव्यापक इस वृक्ष से विश्व में न कोई पर है, न अपर है । न महीयान् है - न मणीयान् हैं । प्रव्यय - वृक्ष का क्षरभाग ही विश्व बना है । क्षर उसी का भाग है । ब्रह्म वन है । उसकी -भाग क्षर है । प्रार - तक्षा ने इसी क्षरमाग को काटकर worr घरातल पर सारा विश्व बनाया है । इसी पुरुषवृक्ष ( श्रव्ययवृक्ष ) का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है --- ' T ': " यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद्यस्मान्नारणी न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण वेण सर्वम् " - इति ॥ * १ कठोप ० १।२।१७ । २ तै ० आ ० १०।१०।२० । [ १४८ ]
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gateause ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानाक्षरनिरूपण इस श्रव्ययक्ष की आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् - ये पाँच शाखा हैं । इन शाखाओं में अक्षर और क्षर प्रतिष्ठित हैं । प्रक्षर प्रौर क्षर वास्तव में सुपर्ण हैं । पक्षी वृक्षस्थित घोसले में प्रतिष्ठित रहता है । प्रातःकाल घोसले से निकल कर प्राकाश में विचरता है स्प्रिनम्तर सायंकाल उसी में प्रतिष्ठित हो जाता हे । प्रक्षर मौर क्षर प्रातः कालस्वरूप सृष्टि - काल में, विश्वाकाश में विचरते हैं । प्रन्त में-परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति के अनुसार उसी में विलीन हो जाते हैं । अनन्त जीव - जीवसूतां महाबाहो ययेषं धाम्यते जगत् - के अनुसार मक्षर रूप हैं । यह प्रक्षर उसी ईश्वर का अक्षर है । महदभेद से वही नानारूपों में परिणत हो गया है । वस्तुतः समष्टिरूप से वह एक सुपर्ण है । इसी अक्षर का जो भाषा भाग है वही मत्यं भावापत्र होने से क्षर कहलाता है । यही दूसरा सुपर्ण है । दोनों सयुक् हैं जोड़ते हैं । असं ह में प्रजापतेरात्मनो मर्त्यभासोवर्द्धममृतम् - के अनुसार प्रक्षर - क्षर सहजन्मा हैं । परस्पर में दोनों की गाढ मंत्री है । न पक्ष क्षर बिना रह सकता है एवं न क्षर प्रक्षर के विना संसार में पनी प्रतिष्ठा रख सकता है । इन दोनों सुपणों का प्राधार वही एक मव्यय- वृक्ष ही है । समान वृक्ष पर दोनों का एकसाथ निवास है । इनमें प्रभर संसार का निमित्तकारण है । क्षर सुपर्ण उपादानकारण है । शरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार सारा भौतिक मर्त्य - प्रपञ्च क्षर है । संसार में जो प्रतिक्षरण परिवर्तनरूप कम्मं का उदकं ( फल ) है उसका भोक्ता उपादानभूत यही हैं । फलभोक्ता यही भर है । इस क्षर से बिल्कुल सटा हुआ प्रक्षर फल से सम्बन्ध न रखता हुप्रा, साक्षीमात्र बनता हुमा, क्षर की निगरानी कर रहा है । कारण वही निमित्त भाव । उपादानता में प्रासक्ति है । भासक्ति में फलभाग है । प्रक्षर चूंकि निमित्त है, प्रतएव वह भोक्ताक्षर के साथ रहता हुआ भी भोग से पृथक् रहता है । बस, मन्त्र का पहला यही घयं है । प्रव्यय - अक्षर - क्षर - परात्पर की समष्टि का नाम ही पुरुष है । यही षोडशी प्रमृतात्मा नाम से प्रसिद्ध है । द्वा सुपर्णा इत्यादि मन्त्र इस प्रमृतात्मा की समय - अक्षर - क्षर- इन तीन कलाओं का ' स्वरूप बतलाती है । श्रुति बतलाती है कि प्रमृतात्मा का प्रव्यय - भाग सृष्टि का घालम्बन है, भतएव वह वृक्ष है । क्षरसुपर्ण उपादानकारण है । अक्षर-सुपर्ण निमित्तकारण है-१- परात्परः + पुरुषः - वृक्षः २- प्रव्ययः १ -- अव्ययः २- प्रात्मक्षरः} + प्रकृतिः = साक्षी सुपर्ण = भोक्तासुपर्ण3 112 11 -- * --+ सयुजी -सखायौH षोडशी प्रजापतिः १ गीता १५/१६ । [ १४६ ]