Mundakopanoshad — पृष्ठ 151–160

Mundakopanoshad · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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तृतीयमुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य २- द्वितीय पर्य twiters ाग को पूर्व के प्रकरणों में बतलाया है । इसी कुर्वद्रूपता के कारण atra Hors को विश्वसीमा के भीतर माना पड़ता है । विश्व का भाषार--" श्रव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना " ॥ ' के अनुसार अव्यक्त अक्षर ही है । अक्षर से ही सब कुछ पैदा हुआ है । यहाँ तक कि जो अव्यय सर्वालम्बन बतलाया जाता है उसको पाँच कलाओं का विकास भी इसी प्रक्षर के द्वारा होता है-जैसा कि पूर्व के प्रथममुण्डक के प्रथमखण्ड में बतलाया जा चुका हैं । कहना यही है कि यद्यपि विश्व stefit पुरुष ही व्याप्त रहता है । परन्तु षोडशीपुरुष की विश्वप्रविष्टता--" प्रजो s पि व्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया " " -- के अनुसार कुर्वाण अक्षर पर ही निर्भर है, मतएव विश्वापेक्षया अक्षर को ही प्रधान यामा जाता है । जहाँ विश्वात्मा का प्रतिपादन करना होता है, वहाँ ऋषि केवल द्वार दोसा करते हैं । वी-लिए - नचिकेता के प्रन्यत्र धर्मारयत्राधम्र्म्मात् इत्यादिरूप से प्रात्यविषयक प्रश्न करने पर ध वात्मामनन्ति - यह कहते हुए प्रोमित्येतत् ' इस एकाक्षर को ही सामने रखा है । इसीलिए मारे जाकर - एतद्धये वासरं ब्रह्म ० - इत्यादि कहते हुए भार को ही ब्रह्म ( भात्मक्षर ) बसनाया है । शर को ही ' पर ' ( अव्यय ) बतलाया है । इस प्रकार विश्वापेक्षया हमारा यह परपुरुष संसार में दो स्व में परिणत रहकर व्याप्त रहता | विश्व में प्रव्यक्त महान् स्वरूप स्वयम्भू परमेष्ठी मृत हैं सूम्यं से नीचे का पृथिवी चन्द्रमाभाग तस्माद्यत् किजार्वा जोन माविस्यात् सर्व सम्मृत्युमाप्तम् के धनु-सार मृत्युमय है । इस विश्वगत प्रमृत - मृत्युभाव का विभाजक मध्यपदित सूम्यंरूप विज्ञान है । प्रक्षर स्वयं प्रमृत है । परमेष्ठी मौर स्वयम्भू में वह स्व - स्वरूर से उण रहता है, अतएव उमा विश्वमान मृत कहलाता है । नीचे ग्राकर पार्थिव मत्यंभूतों से संश्लिष्ट होने से अक्षर का प्रमुतभाव एक कहलाता है । प्रक्षर स्व - स्वरूप से महानुरूप प्रकार से अभिभूत हो जाता है, घतएव यह परमेष्ठी तक उल्बण रहता है, अतएव यहाँ तक विश्व प्रश्नोपनिषत् में परब्रह्म कहा हैं । यही माग कठादि में प्रवरबा कहलाता । यही भाग अवराध्यं कहलाता है । माग मत्थं का एक भागमान लिया जाता है । इसी को परार्ध्य नाम से प्रसिद्ध है एवं नीचे का भाग कहना यही है कि चूंकि महान तक अमृताक्षर १ गीता २/२८ । २ गीता ४।६ । ३-६ कठोप ० ११२।१४-१५-१६ । ७ शत ० ब्रा ० १०/५/११४ | [ १५० ]

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) Horse निषद्विज्ञानमाध्य विज्ञाताक्षरतिरूपण-स्वस्वरूप से उल्बण रहता है, अतएव प्रक्षर शब्द से महान् सक के भाग का ग्रहण कर लिया जाता है । जैसा कि सूतं अविष्यत् प्रस्तौमि माँ कमरम्म कमशरम् ' - इत्यादि कहते हुए पूर्व में कई कहा जा चुका है । बस, यही महदक्षर हमारे प्रकरण का वृक्ष है । विज्ञान सूय्यं की वस्तु है । प्रज्ञान चन्द्रमा की वस्तु है । सूय्यंरूप विज्ञान भाग्नेय होने से असंग हूँ । प्रति विकलन है, प्रतएव उसमें किसी अन्य पदार्थ की प्रतिष्ठा नहीं रह सकती । परन्तु प्रज्ञान चान्द्रसोममय है । सोम स्नेहवत्य है । इसी स्नेहनता के कारण प्रज्ञान पर भावना वासनासंस्कार जमा होते रहते हैं । इन्हीं संस्कारों का, प्रज्ञान को नाना - जन्म धारण करते हुए फल भोगना पड़ता है । प्रद्यपि स का एक सातामा विज्ञानात्यता संपरिवः के धनुसार यह विज्ञानात्मा कभी प्रज्ञान से अलग नहीं रह सकता । दोनों सयुक् है । दोनों में गाव सख्यभाव है । लोकान्तर में फल भोगने के लिए. प्रास्माविशिष्ट प्रज्ञान जाता है । सुख - दुःख साक्षात्कार भोग हैं । यह विना विज्ञान के ( बुद्धि के ) संभव है, भतएव लोकान्तर में देवयान पितृयानरूप धन्यतर प्राकाश में उड़ने वाले प्रज्ञानसुपर्ण के साथ ही विज्ञान को भी उड़ना पड़ता है । परन्तु फलभोक्ता केवल प्रज्ञान सुप ही है । विज्ञान तो साक्षीरूप से उससे युक्त रहता है । महदक्षर इन दोनों का मालम्बन है । महान की महिमा के पेट में ही विज्ञान - प्रशान हैं । महान् में सात्मा अक्षर के सम्बन्ध से ही विज्ञान ' विज्ञान ' बना हुआ है, प्रज्ञान ' प्रज्ञान ' बना हुआ है । प्रालम्बनरूप होने से ही महदार वृक्ष हैं । उस पर बैठने वाले विज्ञान- प्रज्ञान दो सुपर्ण हैं । एक फल भोक्तारमा है । दूसरा साक्षी है । बस, मन्त्र का यही दूसरा अर्थ है--१- महार वृक्ष १- विज्ञानात्मा २- प्रज्ञानारमा} = साक्षी सुपर्ण -- फलभोक्ता सुपर्ण ॥२ ॥} -सखी - सायी

३ तृतीय चर्थ--narefree में free ब्रह्माश्वस्थ का बड़े विस्तार के साथ निस्पक्ष किया गया है, उसका स्मरण fifty | वहाँ बतलाया गया है कि स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी इन पाँच प्राकृतात्मानों से युक्त attirrer का नाम ही है । इसमें मुढोत्मा को थोड़ी देर के लिए अलग कर दीजिए । art offer भाग aed हैं । ये पाँचों ही यज्ञरूप हैं । इन पाँच क्षरमात्मानों में समष्टिरूप से एक यज्ञात्मा १ शत ० वा ० १० | [ १५१ ]

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dates ( en ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरविरूपणे प्रतिष्ठित रहता है । उसी को प्रधियक्ष प्रजापति कहते हैं । अधिदेवत अध्यात्म पक्ति तीनों के चीन अधियज्ञ हैं । प्रकृत में हमारा सम्बन्ध भाष्यात्मिक अधियज्ञ प्रजापति से है । अव्यक्त महान, विज्ञान-प्रज्ञान, शरीररूप माध्यात्मप्रपञ्च प्रपञ्च पर रहने वाला समष्ट्यात्मक, आध्यात्म में व्यापक एक परिय प्रजापति है । वही एक प्रषियज्ञ प्रजापति अव्यक्तादि पांचों कलामों का भालम्बन है । चूंकि after पनी इन पांचों कलाओं से अभिन्न है, भतएव पञ्चकल समष्टि को भी हम अधियज्ञ कह सकते हैं । यही afara eat में बह्मसस्य नाम से प्रयुक्त हुआ है । इस अधियज्ञात्मक ब्रह्मसत्यालम्बन पर परब्रह्म और भवरदो ब्रह्म प्रतिष्ठित हैं । प्रव्यक्त, महान्, ममृत विज्ञान इन तीन प्रमृतभायों की समष्टि का नाम तो परा है एवं मत्येविज्ञान, प्रज्ञान, शरीर- इन तीन मत्यंभागों की समष्टि परब्रहा है । दोनों को समष्टि भोम है । इसी प्रभिप्राय से प्रश्नोपनिषत् में एसई सत्यकाम पर चापरं च यकार: -इत्यादि कहा गया है । उस समष्टिरूप अधियज्ञालम्बन पर प्रतिष्ठित रहने वाले ये ही दोनों बहा सुपरी है । इनमें शवरब्रह्म मर्त्य होने से फल मोता है एवं परब्रह्म प्रमृतभाषापस होने से साक्षी है । अन्तर मृत्योरमृत मृत्यादमृतमाहितम् ' नामृतं मृत्युमिखिना इत्यादि अभियुक्तोक्तियों के अनुसार दोनों ही सुपर्ण भ्रमित है । sar ब्रह्म फ ोगार्थं लोकान्तर में जाता है वह इस परब्रह्मरूप श्रमृतभावापत सुपर्ण से युक्त रहवा है, अतएव दोनों के लिए सयुजा सखायो कह सकते हैं । मन्त्र का यही तीसरा अर्थ है--१. अधियक्ष नामक समष्दधात्मक ब्रह्मसत्य - मालम्बनवृक्ष १. व्यक्त, महान् भमृत विज्ञान = साक्षीसुपर्ण २. मत्वंविज्ञान, प्रज्ञान, शरीर = भोक्तासुप + हो सुपनी समुजी

इन दोनों का प्रलम्बन ब्रह्मसत्य उपनिषदों में ब्रह्माश्वस्व नाम से प्रसिद्ध है ।

॥ ३ ॥

---४ चतुषं धर्थ--ब्रह्मात्य से प्रतिरिक्त एक कमश्वत्थ ओर है । कम्मश्वत्थ हमारो शरीर है । शरीर कम्मं का पुद्गल मात्र है । रसवलर्समष्टि ही परात्पर है । यही परात्पर मायावन्छिन होकर पुरुष बन जाता है । पुरुष के साथ प्रकृति का प्राविर्भाव । प्रकृति की प्रव्यक्तावस्था प्रकृति है । व्यक्तावस्था विकृति है । जल की प्रधानता होने से वही प्रकृति विकृतिरूप में परिणत हो जाती है । बल की मूल और तूल, दो अवस्थाएँ हैं । बल शक्ति है । मनन्त शक्तिसंघ ( बलसंघ ) किया है । मनन्त क्रियासंघ एक - एक गुण है । रूपरससंपादि गुण है । अनन्त गुणसमष्टि गुरणकूटो इष्यम् के धनुसार एक द्रव्य है । संसार में दृश्य पदार्थ जितने भी हैं-१ शत ० प्रा ० १०१११२१४ । [ १५२ ]

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tushy निषद्विज्ञानमाय तृतीयमुण्डक ( प्रथम खण्ड ) विज्ञानाक्षरनिरूपण सब गुणकूट हैं, क्रिया कूट हैं । क्रिया बलरूप है । बल प्रतिक्षण विकुर्वद्रूप है । ' क्रिया ' उत्पत्ति - स्थिति-लय- इन तीन प्रवस्थानों से सम्बन्ध रखती है । मध्य का स्थितिक्षण भी गतिरूप है । रसानुग्रह से मध्यका क्षण स्थितिरूप में परिणत हो जाता है । वस्तुत: यह स्थिति क्रियाधार उसी रस की है । बतताना इस प्रपञ्च से यही है कि संसार के पुद्गलमात्र क्रियाभय हैं - कम्ममय हैं । शरीर भी कम्मंसन्तानसंघमात्र है । शरीर में जो १०० वर्ष तक स्थिति दिखलाई दे रही है, विज्ञानचक्षु से देखने पर माप को मालूम होगा कि यह स्थिति सर्वथा परिवर्तनशीला है । शरीर में बाल, युवादि अनन्त अवस्थाएं हैं । निरन्तर कम्मंधारा बल रही है । यह शरीर मात्मा का प्रालम्बन है । धालम्बन वृक्ष कहलाता है । बालम्बन भूल शरीर कम्मं भय है, अतएव दार्शनिकों ने इसे कमश्वत्थ कहा है । इसी कम्मभाव को लक्ष्य में रखकर हरी रामवस्य की श्वः तिष्ठति इति स्वस्थः- न श्वः प्रपि तिष्ठति पश्वस्य: - यह व्युत्पत्ति की जाती है । प्राचीन प्राचायों ने प्रश्वस्य से इसी कम्मश्वित्थ का यहरण किया है । कम्मश्वित्थ का भाषार वही पव्यय है । इसीलिए म्रव्यय को भी प्रश्वत्थ बतला दिया जाता है । इस मश्वत्थ वृक्ष में ( शरीररूप कर्म्माश्वत्थ वृक्ष में ) ईश्वर और जीव, दो सुप हैं ईश्वर-सुपर्ण पशुपति कहलाता है । जीव - सुवां पशु कहलाता है । पशुपति और पशु दोनों समान ( एक ) वृक्ष पर प्रतिष्ठित हैं । केवल अध्यात्म - प्रपञ्च में ईश्वर भी है एवं जीव भी है । इस भ्राध्यात्मिक ईश्वर के लिए ही - ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति ' यह कहा जाता है । प्रध्यात्म में दोनों हैं - इसमें क्या प्रमाण? इसका उत्तर पूर्व के उपनिषदों में भली प्रकार से दिया जा चुका है । प्रध्यात्मस्थ जीवेश्वर प्रभिन्न हैं । दोनों सुवर्ण हैं । फल भोगने के लिए सूक्ष्मशरीर धारण करता हुझा जीव लोकान्तर में जाता है । उसके साथ ईश्वर- माग भी रहता है । वही सर्वव्यापक ईश्वर अनन्त जीवभेव से अनन्तरूप धारण कर, धनन्त जीवों में प्रतिष्ठित होकर, अनन्त बन रहा है । जीववत् प्राध्यात्मिक ईश्वर भी अनन्त ही है । प्रतिजीव में पृथक् - पृथक् ईश्वर है । भिन्न - भिन्न जीव की संस्था का संचालन उस उस जीव जगत् के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो कर उस उसका संचालन कर रहा है । जहाँ जीव को ईश्वर का अंश बतलाया जाता है - वहाँ इसी प्राध्यात्मिक ईश्वर का ग्रहण है । ईश्वर प्रमम्स हैं, प्रतिजीव में मित्र - मित्र हैं - यह सुनकर पाठक प्राश्वयं करेंगे । परन्तु इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है । विज्ञान जगत् में सब कुछ सम्भव है । एक को अनेक कर डालना ही तो विज्ञानपक्ष है । सूय्यं एक है । उसकी प्रनन्त रश्मियाँ हैं । सब भिन्न - भिन्न दिग्देश रखती हैं । जिस पात्र में जिस रश्मि का सम्बन्ध होता है- वहीं एक नया सूर्य्यं उत्पन्न हो जाता है । प्रनन्त पात्रों पर भाई हुई रश्मि अनन्त सूर्य्य बन जाती हैं । शरीर बर्तन है । प्रज्ञान पानी है । ईश्वर सूर्य्यं है । अनन्त शरीर हैं । उनमें भिन्न - भिन्न प्रज्ञान हैं सब पर पृथक् - पृथक् रश्मिय भाती हैं । धनन्त जीव बन जाते हैं! सूय्यं का प्रतिबिम्ब जीव है । उस पर व्यापक सूर्य्यं का उसी प्रदेश का - भाग ऊपर से और धाकान्त होता है । प्रतिबिम्बित सूय्यं में सौर प्रकाश भी तो है । वह प्रतिबिम्बित सूय्यं के केन्द्र में १ गीता १८ / ६ ९ । [ १५३ ]

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपेण प्रतिष्ठित रहकर प्रतिबिम्बित सूर्य्य का प्रभव प्रतिष्ठा - परायण बन रहा है । परन्तु इतना ध्यान रखिए कि सूर्य का जो भाग एक प्रतिबिम्ब के केन्द्र से सम्बन्ध रखता है - दूसरे प्रतिबिम्बित सूर्य के साथ इस स्थान पर पाए हुए सौरभाग का कोई सम्बन्ध नहीं है, वह उसी स्थानबाले से युक्त रहेगा । यह इसी स्थानवाले से युक्त रहता है । इस प्रकार प्रतिबिम्ब भेद से एक ही सूर्य्य अनन्त सूर्य्य हो जाते हैं । यही बात जीवेश्वर में समझिए । प्रतिजीव के साथ उस व्यापक के, उसी स्थान के अंश का सम्बन्ध है । वह माग वहीं है, अन्यत्र नहीं है । इसीलिए " श्रनन्तजीव भेद से प्रनन्त ईश्वर बन जाते हैं " - यह कहा जा सकता है । अनन्त प्रतिबिम्बित सूय्यं अनन्त जीव हैं । प्रति प्रतिबिम्ब के केन्द्र से सम्बन्ध रखने वाले तत्तद् स्थानीय अनन्त सौर- भाग प्रनन्त ईश्वर हैं । ये ही प्राध्यात्मिक ईश्वर हैं । इनसे मलावा त्रैलोक्य-व्यापक समष्टिरूप सुय्यं प्राविदेविक जगत् का एक ईश्वर है । प्रकृत अर्थ में जिस जीवेश्वर का निरूपण किया जा रहा है - वह प्राध्यात्मिक जीवेश्वर है । यही प्रजापति धौर पशु नाम से प्रसिद्ध है । इनमें प्रजापति साक्षी है । पशु फलभोक्ता है । प्राध्यात्मिक ईश्वर के स्वयम्भू - परमेष्ठी सूष्यं चन्द्रमा पृथिवी पांचों - शरीर में ही हैं । जीव के प्रव्यक्त - महान - विज्ञान- प्रज्ञान शरीर इन पाँचों से सटा हुआ स्वयम्भु प्रावि ईश्वरीयभाग शरीरपरिच्छित है । प्राध्यात्मिक जीव के इन पाँचों में से जैसे हम किसी एक को भी " ( शरीर को छोडकर ) नहीं देखते, वैसे ही प्राध्यात्मिक ईश्वर के भी किसी भाग का प्रत्यक्ष नहीं होता । परन्तु प्राधिदैविक ईश्वर के पृथिवी चन्द्रमा सूम्यं परमेष्ठी चारों का हम साक्षात् दर्शन कर रहे हैं । यही प्रत्यक्षष्ट भेदभाव हमें इसके लिए बाध्य करता है कि हम प्राध्यात्मिक ईश्वर को आषि-दैविक ईश्वर से पृथक् वम एवं साथ ही में जीववद भाष्यात्मिक ईश्वर को अनन्त समझें । माध्यात्मिक ईश्वर भोर जीव में ही परस्पर अंशांशीभाव समझे एवं प्राधिदैविक ईश्वर को इस माध्यात्मिक ईश्वर से पृथक् समझें! साथ ही में, प्राधिदैविक ईश्वर को सर्वव्यापक समझें एवं माध्यात्मिक ईश्वर को शरीर-परिच्छिन्न समझें । मन्त्रश्रुति का तात्पय्यं यही है कि शरीर कम्र्म्माश्वस्थ वृक्ष है । आध्यात्मिक प्रजापति बाम से प्रसिद्ध हृदयस्थ, अन्तर्य्यामी ईश्वर और पशु नाम से प्रसिद्ध जीव, दोनों सुपर्ण हैं । दोनों मिल हैं । इन दोनों में, जीवसुपर्ण फल मोक्ता है एवं ईश्वरसुपणं साक्षी मात्र है । बस, यही चतुर्थ मन्त्र का [ १५४ ]

पृष्ठ 156

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्वि ज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण शरीरम् - कम्मश्वत्थवृक्ष ----१- स्वयम्भूः २- परमेष्ठी ५ -- सूर्यः --चन्द्रमाः ५- अग्निः १ - अव्यक्त २-- महान ३ - विज्ञान ४- प्रज्ञान ५- अग्नि -- +ोशीयुक्त प्राध्यात्मिक ईश्वरभाग ईश्वर: - साक्षी सुपर्ण - प्रजापतिः -- → षोडशीयुक्त प्राध्यात्मिक जीवः = मोक्ता सुपर्णः --- पशुः ॥। ४ ॥ -----प्राध्यात्मिक खोबेश्वरौ सयुजा सखायो सुपनों ५ - पञ्चब धर्थ--इस पांचवें भयं का प्राधिदैविक ईश्वर और प्राध्यात्मिक जीव के साथ सम्बन्ध है । षोडशी श्रात्मा का नाम प्रविष्टबह्य है एवं स्वयम्भू - परमेष्ठी सूथ्यं चन्द्रमा पृथिवी इन पाँचों प्राकृतात्मानों की समष्टि नाम से प्रसिद्ध है । इसी में वह षोडशी गूढोरमा प्रविष्ट रहता है, अतएव विशति यत्र धारणा - इस व्युत्पत्ति से इस पञ्चावयत्र ' सृष्टब्रह्म ' को विश्व कहा जाता है । विश्व और विश्वात्मा, दोनों की समष्टि ही प्रजापति है । इस प्रजापति के विश्वभाग के उदय में ईश्वर प्रकट होता है । कठोक्क देवसत्यस्वरूप का स्मरण कीजिए । पृथिवी में से एक अमृताग्नि निकल कर सूय्यं तक व्याप्त होता है । इसी अमृताग्नि के ( जो कि पिण्डपृथिवीरूप चित्याग्नि से भिन्न है ) वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ ये तीन विभाग होते हैं । इन तीनों की समष्टि हो ईश्वर है । इस प्रकार सूर्य्य से नीचे पृथिवी ऊपर दोनों के मध्य में त्रैलोक्यव्यापक ( स्तोम्य त्रैलोक्यव्यापक ) इस अग्नि वायु- आदित्यमय - अतएव देवसत्य नाम से प्रसिद्ध ईश्वर का जन्म होता है । षोडशीयुक्त विश्ववृक्ष की एक पार्थिवशाखा पर यही ईश्वर प्रतिष्ठित है । जीब में भी यही बात है । षोडशीयुक्त अव्यक्त, महान् विज्ञान, प्रज्ञान, शरीररूप वि I व [ १५५ ]

पृष्ठ 157

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षर निरूपण के शरीर और प्रज्ञान - भाग के बीच में वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञरूप देवसत्य जन्म लेता है । इसी का नाम जीव है । दोनों का आधार वही प्रविष्ठात्मयुक्त सृष्टब्रह्म । यद्यपि जीव का आधार शरीर प्रजापति है । परन्तु यह उसी प्रजापति के भीतर प्रविष्ट है - उसी की मात्राओं से निम्मित है, अतएब मृत्तिका से उत्पन्न घट जैसे मृत्तिका ही है - तथैव उस आधिदैविक प्रजापति से उत्पन्न होने वाला यह आध्यात्मिक प्रजापति उससे अभिन्न है, अतएव ईश्वर का आधार जैसे वह प्रजापति है, एवमेव उसे जीव का भी आधार बतलाया जा सकता है । दोनों सुपणं हैं । ईश्वर अग्नि वायु - आदित्यमय है । तीनों की सुप चिति से ईश्वर का स्वरूप बना हुआ है । पृथिवीपृष्ठ से सूय्यं तक अमृताग्नि की चिति हो रही है । इसी अग्निचितिरूप चितेनिषेयगमित अग्निपुरुष को ब्राह्मण ग्रन्थों ने सुपणं कहा है । सुपर्णं पक्षी का नाम है । पक्ष में दो पक्ष होते हैं । मध्य का चार प्राणयुक्त घड़ होता है । पूंछ होती है । ऊपर मस्तक होता है । इस देवसत्य की चिति का ऐसा ही स्वरूप है, अतएव इसे ' चिति ' कहा जाता है । पृथिवी-अग्नि- तीन चितियां प्रधान हैं एवं पृथिवी अन्तरिक्ष की संधि में एक चिति है, अन्तरिक्ष द्यौ की संधि में एक चिति है । इस प्रकार अग्नित्रयरूप ईश्वरशरीर पञ्चचितियुक्त हो जाता है । यही ईश्वर यज्ञप्रजापति है । यज्ञ पञ्चचितियुक्त होने से पाङ्क्त है । ये यज्ञेश्वर त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहे हैं । यही चितिक्रम जीब में है । शतपय ब्राह्मण के ६-७-८- इन तीन काण्डो में इसी सौपर्ण - चिति का निरूपण है । अधिक जिज्ञासा रखने वालों को वह प्रकरण देखना चाहिए । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि आधिदैविक ईश्वर वैश्वानर- हिरण्य- सर्वज्ञात्मक ईश्वर एवं आध्यात्मिक परिच्छिन्न वैश्वानर तंजस -प्राज्ञात्मक जीव, दोनों सुपर्ण सदृशचितिमय होने से सुपर्ण कहलाते हैं । इनमें जीव- सुपणं फल भोगने के लिए नाना लोकों में जाया करता है, परन्तु ईश्वर- सुपर्ण त्रैलोक्य में असंगरूप से प्रतिष्ठित रहता हुआ फल भोगनेवाले जीव-सुपर्ण की निगरानी किया करता है । यही इस मन्त्र का पांचवा अर्थ है । १- प्रविष्टायुक्त सृष्टब्रह्म ( गूढोत्मा - विश्व ) = वृक्ष १- श्वान र हिरण्य - सर्वशात्मक साक्षी देवसत्य ( आषिदं ० व्याप्त ) = ईश्वर सुपर्ण २- वैश्वानर - तंजस प्राज्ञात्मक मोक्ता जीव देवसत्य ( अध्यात्मस्थ ) = जीव सुप} ॥ ५ ॥

---६ - पृष्ठ अर्थ हमारा यह औपनिषद मन्त्र ऋग्वेद से सम्बन्ध रखता है । यदि हम वहाँ के प्रकरण पर दृष्टि डालते हैं तो पाँचों से पृयक् एक छठा अर्थ हमें भोर प्राप्त होता है । पूर्व के प्रकरण में हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलं- इत्यादि से सेतुरूप सौर अक्षरात्मा का निरूपण किया गया | हमारा यह [ १५६ ]

पृष्ठ 158

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण तीसरे मुण्डक का प्रथमखण्ड वा सुपर्णा ० इत्यादि से उसी का निरूपण करता हैं । यह प्रकरण सूर्याक्षर का निरूपक है - यह कैसे माना जाए? इस प्रश्न का उत्तर ऋग्वेद की प्रकरण संगति है । जिस प्रकरण में यह मन्त्र हैं, उसे देखने से यही मालूम होता है कि हा सुपर्णा ० इत्यादि मन्त्र सूर्य्यं का ही निरूपण करता है । माष्यकार सायणाचार्य ने यद्यपि परम्परा के चक्र में पड़कर द्वा सुपर्णा का जीवेश्वरपरक ही अर्थ माना है, परन्तु मागे जाकर इसी मन्त्र से सम्बन्ध रखने वाले दो मन्त्रों को वह सूय्यंपरक ही लगाता है । यह उनका केवल प्रौढिवाद है । वस्तुतः तीनों मन्त्र एक अर्थ का निरूपण करते हैं । जो भ्रयं भागे के दोनों का है, वही प्रथम का है । वही सुपर्ला पद प्रथम है । वही प्रागे है । फिर प्रथम के सुपर्णा को जीवरपरक लगाना एवं आगे के ' सुपर्णा ' को प्रादित्यपरक लगाना कैसे उचित कहा जा सकता है? धतः हमारे विचार से समान प्रकरण में पढे हुए तीनों मन्त्रों का समान ही भयं होना चाहिए । द्वा सुपर्णा का प्रयं बतलाएं, इसके पहले इससे आगे पढ़े हुए दोनों मन्त्रों का अर्थ जान लेना प्रावश्यक होगा । इससे प्रथम मन्त्रार्थं अपने प्राप गतार्थ हो जाएगा । उन प्रागे के दोनों मन्त्रों में प्रथम मन्त्र निम्नलिखित है-" त्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति । इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश " ॥ " " यत्रा ( पत्रसूय् ) सुपर्णा ( शोभनगमना - सुपतशोला- श्रादित्यमण्डलस्य उपरिभागे श्रिता अमृतरश्मयः ) अमृतस्य ( सूर्योपरिस्थितस्य महदक्षरस्य ) भाग ( अंशमादाय ) अनवरतं ( श्रजनं ) विवथा ( स्वचेतनया - विज्ञानेन ) भि-स्वरन्ति ( भूमण्डलस्थितान् जीवान् श्रभिधानयन्ति ) | ( स ) विश्वस्य ( सर्वस्य ) : भुवनस्यः ( रोदसीनाम्ना प्रसिद्धस्य लोकत्रयस्थ ) इन: ( अधिपतिः ) गोपा घोर-( शब्द - प्रसिष्ठितश्च सूर्य्यः ) मा ( मां ) पार्क ( पवित्रं यथास्यात्तथा ) प्रत्र ( मर्त्य-मण्डले ) प्राविवेश ( प्रविष्टो बभूव ॥ " - यह है इस मन्त्र की प्रत्वयसंगति । सूय्यं मृत मृत्यु का केन्द्र है । सू के ऊपर परमेष्ठी स्वयम्भूरूप प्रमृतभाग है । इन्हीं दोनों की समष्टि महबार नाम से प्रसिद्ध है । महदक्षर चिङ्घन है । सूय्यं के नीचे चन्द्रमा पृथिवीरूप मत्यं-भाग है । इस अमृत - मत्यंमण्डल के केन्द्र में श्रमृत मर्त्य दोनों का समन्वय करता हुमा निवेशयनमृतं म - के मनुसार सूर्य्यं मध्य में प्रतिष्ठित है । सूव्यं के केन्द्र से याम्योत्तर रेखा ले जाइए । सूर्य्य के दो विभाग हो जायेंगे । ऊपर भाग अमृत सूर्य्य कहलाएगा, नीचे का भाग मर्त्य सूर्य कहलाएगा क्योंकि ऊपर का अमृताक्षर का अनुग्राहक है, नीचे का मर्त्यानुग्राहक है । इस विषय का विस्तृत विवेचन १ ऋग्वेद मं ० १११६४।२१ । [ १५७ ]

पृष्ठ 159

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tatayush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य विज्ञानाक्षरानरूपणं प्रश्नोपनिषत् के पाँचवें प्रश्न के भोंकार- निरूपण में किया जा चुका है, अतः यहाँ इस विषय में अधिक न कहकर, यही कहेंगे कि सूय्यं सहस्ररश्मि है । इसकी प्राधी रश्मियां ( ५०० ) ऊपर की ओर जा रही हैं । भाषी रश्मियाँ ( ५०० ) नीचे की भोर मा रही हैं । ऊपर की ओर जाने वाली रश्मियों का ऊपर के प्रमृतमण्डल से सम्बन्ध है, नीचे की भोर आनेवाली रश्मियों का मर्त्य-विश्व से ( रोदसी त्रिलोकी से ) सम्बन्ध है । इन उमयविधा रश्मियों से हो यह धमृत - मर्त्य के निवेशन में समर्थ हो रहा है । ऊपर का मन्त्र सूर्य्य से ऊपर जानेवाली अमृत रश्मियों का ही निरूपण करता है । ये रम्य पक्षिवत् ऊपर की भोर जाती है, मतएव ये सुपर नाम से प्रसिद्ध हैं । इनका क्या काम है? इसका उत्तर यही है कि ये ऊपर जाकर उसी अमृताक्षर के भाग को लाती हैं । एक बार नहीं, अपितु, निरन्तर । भ्रर्थात् ऊपर की रश्मियाँ निरन्तर उस चिद्रूप महदक्षर से युक्त रहती हैं । उसी से सूय्यं चमक रहा है । तस्य भासा सर्वमिदं विभाति - यह पूर्व के खण्ड में कहा ही जा चुका है । सारा चित् सूर्य्यं में नहीं प्राता अपितु उस चिवन का एक अंश ही भाता है । इस प्रकार वे रश्मि ऊपर से विद को ला- लाकर सूय्यं में माहुत कर रही हैं । इसी से सूम्यं विदधन बन रहा है । ऊपर की रश्मियों की कृपा से सूर्य चिन्मय बन गया । वह चिन्मय बनकर क्या करता है? मन्च का उत्तरार्ध इसी प्रश्न का समाधान करता है । इन्हीं चिन्मय रश्मियों से माए हुए चित् के प्रताप से सूर्य सम्पूर्ण स्थावरजङ्गमात्मक भुवन का अधिपति बन रहा है एवं रक्षक और धीर बन रहा है । बी ( ज्ञान ) को देने के कारण ही धियः- इति वयाति वा - इस व्युत्पत्ति से इसे बीर कहा जाता है । इसीलिए हो इसके लिए धियो यो नः प्रचोदयात् ' यह वचन प्रसिद्ध है । ये चिन्मय सौर- रश्मिय पाक है । -ज्ञानमय है । पाक शब्द का अर्थ है - पवित्र । नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते - के अनुसार संसार में ज्ञान के समान अन्य कोई पवित्र नहीं है । इन रश्मियों से वह पाक ( परिपवित्र ज्ञानमय ) बन रहा हैं । पाक बना हुआ सूय्यं मुझ में प्रविष्ट हो रहा है अर्थात् मेरा धारमा वही पाकांश है । मैं वहीं विदेश हूँ । इसीलिए तो सूर्य्यं खात्मा जगतस्तस्युधाण े - यह कहा जाता है । पाक का सम्बन्ध मां के साथ ही किया जा सकता है । इस पक्ष में पार्क का शुद्रशरीरम् अर्थ होगा । क्षुद्रमरी रविशिष्ट मुझ में वह विल्सय सौर- माग प्रविष्ट होता है । सारे जीव क्षुद्धशरीरावच्छिन्न हैं । सबका प्रात्मभाव वही है । इस प्रकार उपरिगत रश्मियाँ चिदंश को सूर्य्य में लाती हैं । सूय्यं द्वारा वही सबका नात्मा बन रहा है - यही निष्कर्ष है । यह है - उपरिगत प्रमृत सुरणों का निरूपण । अध्यात्म - पक्ष में भी इस मन्त्र को लगाया जा सकता है । विज्ञान सूय्यं है । इससे भी चारों मोर रश्मि निकल रही हैं । विज्ञानात्मा के ऊपर चिवन महदक्षर ( महानारमा ) प्रतिष्ठित है । विज्ञान की कपर की रश्मि उस चिदंश को विज्ञान में लाती हैं । विज्ञान में भाया हुआ चिद् - भाग जीवरूप भोकात्मा से युक्त होता है । बाकी बचती हैं नीचे को मर्त्य रश्मियाँ । उनका निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-१ यजुर्वेद ३६।३ | | २ गीता ४१३८ । ३ ऋग्वेद मं ० १।११५।१ । [ १५८ ]

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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण " यस्मिन् वृक्षे मध्ववः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चापि विश्वे । तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वये तन्नोनशद्यः पितरं न वेद " || ' सूर्य्य एक वृक्ष है । इसी पर सुपर्ण रश्मियाँ प्रतिष्ठित हैं । नीचे आनेवाली रश्मियाँ पार्थिव रस भोगने के कारण - मध्यद नाम से प्रसिद्ध हैं । मधु प्रप्त है । मन भौतिक रस है । ऊपर की रश्मियाँ मृत रस खाती थीं, ये पार्थिव भौतिक रस खाती हैं । अर्थात् - इनका सम्बन्ध मर्त्यमण्डल से है । नोचे की रश्मिय विरन्तर सारे मत्यं त्रैलोक्य के रस को प्राकर्षण शक्ति से चूसा करती है । उनसे सूय्यं का भाषा मर्त्यभाग तृप्त होता रहता है । ऊपरवाली रश्मिय सूर्य्यं को भ्रमृतरस से तृप्त करती हैं एवं नीचेवाली रश्मियाँ मस्य-मधुरस से तृप्त करती हैं । इससे सूय्यं उमयात्मक बन रहा है । इस प्रकार ये मध्वदसुपणं - अवाचीन रश्मियाँ पार्थिव रस लेकर मध्वव बनती हुई, सूय्यं में प्रविष्ट होती हैं एवं वहाँ से निकल कर विश्व की घोर व्याप्त होती हैं । प्रर्थात् मर्त्यरस को सूर्य में ले जाना भी इन्हीं का काम है एवं वहाँ से मत्यं रस को लाकर - विश्व की कमी पूरी करना भी इन्हीं मर्त्य- रश्मियों का काम है । इन्हीं आदान- विसर्ग भावों को बतलाने के लिए - निविशम्से ( सभ्य ) सुखले चापि विश्वे कहा है । विश्व के प्राणियों में शरीर मौर भ्रात्सा दो भाग हैं । म्रात्मा का सम्बन्ध चिन्मय - ऊपर के सुपर्णीों से है । यहाँ भी प्रादान- विसर्गात्मक प्रात्मयज्ञ हो रहा है । उन चिन्मय रश्मियों से प्राकर्षित हमारा श्रात्मा निरंतर सुथ्यं में जाता रहता है एवं भाता रहता है एवं शरीर का सम्बन्ध नीचे की मर्त्य - रश्मियों से है । निरन्तर भूतभाग सूय्यं में जाता रहता है-धाता रहता है । यही भूतयज्ञ है । इस प्रकार सूर्य्यं में प्रमृत, मर्त्यरूप दो सुपर्ण हो जाते हैं । ममृत सुपर्णं प्रग्ररूप हैं । क्योंकि उसकी सत्ता पहले है । प्रमूत पर मत्र्त्यभाग प्रतिष्ठित रहता है । भ्रयवा काम है उपरिभागे । ऋषि कहते हैं कि उस सूर्य वृक्ष के ऊपर के माग में बडा मीठा स्वादिष्ठ पिप्पल ( फल ) है | सच है - प्रमृतभाग ही उत्तम फल है । जो इस अपने प्रभवपिता सूर्य को नहीं जानता, भ ि g पार्थिव कामनाओंों में पुत्रादि सांसारिक सुखों में ही निमग्न रहता है - वह इस फल को खाने में असमर्थ ही रहता है । प्रमृतभाग की उपासना करनेवाले को वह स्वादु पिप्पल मिलता है एवं मत्यंभाग की उपासना करनेवाले को मर्त्यविश्व में ही पुनः पुनः जन्म - मरण के चक्र में फँसा रहना पड़ता है । बात यथार्थ है-" यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् " ॥ " I — के अनुसार उसी अमृतविज्ञान की प्राप्ति से यह जीवात्मा संसार समुद्र का तरण करने में समर्थ होता है । श्रुति में नीचे की रश्मियों के लिए मध्वद कहा है । सविषयक ज्ञान मोगरूप है । ऊपर । कहना यही है कि सूर्य्यरूप प्रादित्य बतला दिया जाता है । जैसा कि शुद्ध ज्ञान है । विषय- जात नीचे हैं । वही मोगस्वरूप बन सकता है की उदीची, प्रवाची दोनों रश्मियाँ सुपर्ण हैं, श्रतएव सूर्य को सुपर्णं दातयी कहती है ----१ ऋग्वेद मं ० १।१६४।२२ । २ कठोप ० ११३६ एवं ६ | । १५६ }