Mundakopanoshad — पृष्ठ 161–170
Mundakopanoshad · पृष्ठ 161–170
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानाक्षरनिष्पन
" सविता यन्त्रः पृथिवीमरम्णावस्कम्भने सविता द्यामबृंहत् ।
प्रश्वमिवाबुद्धनिमन्तरिक्षमतुतं बद्धं सविता समुद्रम् " ॥
' ' पश्चेदमन्यदभवद्यजत्रममर्त्यस्य भुवनस्य भूना । सुपर्णो अङ्ग सवितुर्गरुत्मान् पूर्वो जातः स उ अस्यानु धर्म्म " । ' इसी मन्त्र को मूल मानकर - प्रजापति सुपनों गरुत्मान् एव संविता - यह निगम चलता है । सौरमण्डल संदत्तर है । यह साक्षात् सुपर्ण है । संवत्सररूप सुपर्ण के भीतर पुरुषः सुपखंः ' - के धनुसार सुपर्ण नाम से प्रसिद्ध जीवरूप अनन्त शूद्र सुपर्ण व्याप्त हो रहे हैं । ये सब उसके पेट में है, प्रतएव उसे महासुप कहते हैं । जैसा कि भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— " अथ ह वा एष महासुपर्ण एव यत्संवत्सरः । तस्य यान् पुरस्तात् विषुवत वण्मासानुपयन्ति सोऽन्यतरः पक्षः । अथ यान् षटुपरिष्टात्सोऽम्यतरः । ग्रात्मा विषुवान् " ॥ " इन्हीं दोनों सुपणों का ( उदीचीन - भवाचीन उमयविध- सौररश्मियों का ) निरूपण करते हुए
ऋषि कहते हैं-" द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो प्रभिचाकशीति " ॥
सूर्य्यं एक वृक्ष है । उस पर अमृत - मर्त्य, रश्मिरूप दो सुपणं प्रतिष्ठित हैं । दोनों सयुक् है-जोडले हैं । दोनों का समान उक्य है । दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र हैं । दोनों दोनों के उपकारक हैं । प्रमुख मृत्यु की प्रतिष्ठा है । मृत्यु प्रमृत का लक्षण है । इन दोनों में सूय्यं से नीचे रहनेवाला सुपर्ण ( मल्यं-रश्मि ) पिप्पल का स्वाद चख रहा है । सांसारिक मौतिक विषयों को खाकर मध्बद बन रहा है एवं ऊपर का सुपर्ण प्रसंगरूप से बैठा हुआ साक्षीमात्र है क्योंकि वह अमृतरूप है । १ - सूय्यं १ - उदीचीन भ्रमृतरश्मिर्या = साक्षी सुपर्ण → सयुज, सखाय २ प्रवाचीन मर्त्य रश्मियाँ = भोक्ता सुपर्ण १ ऋग्वेद मं ० १०।१४६ । १ एवं ३ । ३० ब्रा ०७४ / २ / ५ | यजुर्वेद १३ १६ । २ शत ० ब्रा ० १०।२।२।४ | ४ शत ० ब्रा ० १२।२।३।७ । [ १६० }
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानास रनिरूपण ऋषि ने पहले समष्टिरूप से द्वा सुपर्णा ० - इत्यादि से निरूपण किया है । प्रागे जाकर पूर्वोक्त दो मन्त्रों में क्रमशः दोनों का पृथक् - पृथक् निरूपण किया है । बस, हमारे इस प्रकृत मन्त्र का यही सर्वप्रधान छठा अर्थ है ॥। ६ ॥ आत्मविद्या के प्रतिपादक उपनिषत् में सूय्यं की रश्मियों का निरूपण देखकर कितने महानुभाव छठे प्रर्थं को कल्पना समझेंगे एवं दो सुपर्णीों से जीवेश्वर का ही ग्रहण करणे । जीवर ग्रहण में हमें कोई प्रापात नहीं है । वास्तव में ऋषि का लक्ष्य यहीं है । परन्तु जीवसुप बना कैसे? इस जिज्ञासा की शान्ति सौर - पक्ष से ही हो सकती है । मादित्य पुरुष ही जीवपुरुष बनता है । इसी अभिप्राय से योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् - कहा जाता है । प्रादित्य- रश्मियां द्वेधाविभक्त हैं, भतएव जीव-जगत्भी दो भागों में विभक्त है । भ्रात्मा पहला भाग है, शरीर दूसरा भाग है । दोनों की समष्टि अध्यात्मम् है । मन - प्राण की समष्टि प्रात्मा है । पञ्चभूतात्मिका वाक् शरीर । धात्मा प्रमुख है । परीर मत्यं है- भौतिक है - स्थूल है, प्रतएव धमृतरूप मात्मा को धमस्या कहा जाता है एवं मयं स्थूल-शरीर को अस्थम्यान कहा जाता है । ' स्पन्या ' धोर ' जनस्था ' दोनों का स्वरूप धागे के खण्ड में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जाएगा । यहाँ केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि ममस्था मार्ग का निर्माण सूर्य की मत्यं प्रधाना अबाचीन रश्मियों से होता है । इसी में भोक्ताक्ष्मा का अन्तर्भाव है क्योंकि मोकात्मा पृथिवी ( अमृता पृथिवी ) की वस्तु है । पृथिवी मर्त्या है एवं मात्मतिर्माणि ऊपर की अमृतरश्मियों से होता है । सूय्यं के दोनों सुपर्ण, जीव के दो सुपर बनते हैं । बर्स, जीवस्वरूप को बतलाने के लिए ही ऋषि ने द्वा सुपर्णा - इत्यादि कहा है । जीव का स्वरूप समय में खा गया । जीव उसी का अंश है । वह जीवसृष्टि करता है एवं ततृष्ट्वा तदेवानुप्राविशतके भाप स्वयं भी जीव-अनुदान इसे प्रकार जीव-जगत् के केन्द्र में प्रविष्ट हो जाता है । सृष्ट - भाग जीव हैं । प्रविष्ट भाग जसव में दो प्रात्माओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । जीव जगत् में प्रविष्ट इस ईश्वरात्मा की उपद्रष्टा, अनुमन्ता, मर्ता, महेश्वर, परमात्मा ये संज्ञाएं हो जाती हैं । शेष बच्चा, वही भोक्ता है । भोक्ता भी उसी का अंत है, प्रतः छहों भाव हम उसी शरीरमविष्ट पुरुष के मान सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर गीता कहती हैं-" उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो बेहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥ ' द्वा सुपर्णा ० - इत्यादि मन्त्र के चौथे पर्थ में बतला दिया गया है कि प्राषिदेविक ईश्वर व्यापक है । प्राध्यात्मिक ईश्वर परिच्छिन्न है - वह उससे पृथक् है । इसका जीव के साथ प्रभेद सम्बन्ध है । शरीर १ गीता १३।२२ । [ १६१ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य fever का धात्मा जीवात्मा है । जीबात्मा का आत्मा शरीर प्रविष्टः ईश्वरात्मा है । जब तक है – सब तक: बीवाल्या की साला है । धागे धानेवाले मन्त्र का ईश यही भध्यात्मत्र विष्ट - ईश्वर है । मव्यात्मक प्रविष्ट ईश्वर उससे पृथक् है, यह कहना तो सहज है परन्तु समझाना कठिन है । भव्यय - प्रा - छात के ये तीन विभाग हैं । इन तीनों में क्षर भौतिकप्रपञ्च का प्राधार है । प्रक्षर जीवप्रपञ्च का धाधार है । धम्पय ईश्वकापञ्च का घाघार है । क्षराक्षरगर्भित भव्यय ईश्वर है । प्रव्ययक्षरगमित प्रक्षर जीव है । श्रव्ययाक्षरमित क्षर विश्व है । इस प्रकार तीनों के अवस्था सारतम्य से ईश्वर जीव जगत् ये तीन भेद हो जाते हैं । सीनों की सत्ता एक है । यही रामानुजाभिमत विभावापन्न विभिष्ट है । ईश्वर भी दी हैं, परन्तु वहाँ अव्यय प्रसन्न है - उल्बण है । जींव में भी तीनों है, परन्तु यहाँ अक्षर रत्वथ है । जगत् में भी वीवों हैं, परन्तु यहां क्षरभाग उपरण है, बतएव ईश्वर से अव्यय का ग्रहण किय बढ़ता है । जीव से भक्षर का ग्रहण किया जा सकता है एवं विश्व से क्षर का ग्रहण क्रिया जार है । विश्वस्वरूप कर जीवस्वरूप प्रक्षर, दोनों बव्यय पुरुष की प्रकृति हैं । भूमि - प्रापः - पतल वायु - स ( प्रकाश ) मन - बुद्धि - महं ( भ्रव्यक ) ये माठ क्षर प्रकृति है । इनमें से पहले के पाँच भूत हैं । इनका पृथिवी में अन्तर्भाव है । मन चन्द्रमा है, बुद्धि सूय्यं है, महं महान है एवं प्रव्यक्त स्वयम्भू है । यही विषय है, यही घपरा प्रकृति है । इस भौतिकार - कूट पर रहने वाला अक्षर प्रपरा प्रकृति है । विषय का पारण करना इसी का काम है । अव्यय. स्वयं जीव नहीं बनता - प्रपि तु, अव्यय की यह परागकृति कर जीवरूप में परिणत होती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर गीताचार्य कहते हैं ---" भूमिरापोऽनलो वायुः एवं मनो बुद्धिरेव च । महंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ प्रपत्यमित स्रवन्यां प्रकृति विद्धि पराम् ॥ जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् " ॥ " भगवान् स्पष्ट ही अक्षर को जीव बतला रहे हैं, अव्यय को ' असन ' ' निकाल रहे हैं । अभ्ययमाने ईश्वर है । वह जीव कदापि नहीं हो सकता । इसीलिए तो उसे चण कहा जाता है । जीव भूतात्मा ' है भूतेश्वर हैं । अला, वह जीव कैसे बन सकता है? इसी विषय का विभाग करते हुए भगवान् कहते ह
" द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्ष ः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते " ॥
" उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः " ॥ ’ १ गीता ७।४-५ । २ गीता १५।१६-१७ । 6 १६२ १
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरं निरूपण यहाँ स्पष्ट ही भगवान् ने अव्यय को ईश्वर कहा है । इस त्रित्ववाद को समझें लेने पर ईश्वर, आध्यात्मिक ईश्वर का पार्थक्य भली - भाँति समझ में आ जाता है--अव्ययःप्रसन्नः --अक्षरः → अव्ययप्रधान ईश्वरः > उन्मुग्धों -प्रस २ २- अव्ययः -- + अक्षरप्रधानो जीवः = उन्मुग्धो क्षरः १ - शरी - प्रसन्नः २ - अव्ययः -क्षराधानं विश्वम् ' ऊपर'की ' वालिका से आपको यह भली - भांति विदित हो गया होगा कि तीनों में तीनों है । साक्षी है । अक्षर- मोता है एवं क्षर भोग्य है । यह ईश्वर व्यापक हो अविवेविक जग से पृथक् है बह है, स्वतन्त्र है । अक्षर आध्यात्मिक जीव है । यहा सरकार योग्य है । योग्य, बोरा कर दोनों का वह साक्षी है । इसी ईश्वरीय मा सुपर्णा समुद्री इस मन्त्र से पांच अर्थ की संगति होती है । प में भी तीनों हैं । इसमें जो अध्यय का भाग है, यह तो ईश्वर है । इसाई जीव यह ईश्वर आल्याशिवा शरीरपरि है । यद्यपि यह अजन्मा है । इसे जीवस्वरूप में नहीं आना चाहिए था । मृतात्मारूप जीव का यह ईश्वर हैं । व्यापक है ' । तथापि वह अक्षरप्रकृति के बिना रह नहीं सकता एवं अक्षर जीव बनता है, अतएव उसके साथ बद्ध इस श्रू अज- अव्यय को भी जीव जगत में आम्बरूप से बाकर परि होना पड़ता है । शूद्र - जीव का परमात्मा बनना पड़ता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर जोऽपि समव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति १ गीता ४।६ । स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया " म [ १६३ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य १ श्वेताश्व ० उप ० १।८ । २ गीता ७। १४ । [ १६४ ] विज्ञानाक्षरनिरूपण ERS INN A stas बस, अक्षररूप धात्ममाया के साथ मानेवाला जो माध्यात्मिक अव्यय भाग है, वही प्राध्यात्मिक ईश्वर है । यह उस व्यापक ईश्वर से सर्वथा पृथक् है । वह स्वतन्त्र था । यह परतन्त्र में प्रविष्ट है । वह व्यापक था, यह शरीरपरिच्छिन्न है । वह एक था, यह जीवानन्त्यात् प्रनन्त है । प्रतिजीव की संस्था का भिन्न - भिन्न अव्यय है वही ईश्वर है । यह जीव जगत् में रहनेवाला साक्षीसुपर्ण है । मक्षररूप जीव भोक्ता है एवं क्षर मोग्य है । तीनों की समष्टि अध्यात्मम् है । द्वा सुपर्णा ० - इत्यादि मन्त्र के चतुर्थ अयं की इसी प्रपञ्च को लक्ष्य बनाकर संगति की जा सकती है । अध्यात्मप्रविष्ट अव्यय ईश है । अक्षर जीव है । यह पविद्यादि पाप्मानों से मात्रान्त होकर उससे अलग हो गया है । उसे मालूम नहीं है कि वह उस भव्यय की प्रकृति है एवं उसके सामथ्यं से युक्त है । बस, यही प्रशान इस जीव के दुःख का प्रधान कारण है । चाध्यात्मिकईश्वर उस प्रधिदैवत से भिन्न है, यह युक्ति से सिद्ध हो जाता है । परन्तु जो लक्षणचक्षुष्क हैं, बिना प्रमाण के कोई भी बात मानने के लिए तम्यार नहीं हैं, उनके संतोष के लिए दो - चार प्रमाण बता देना भी आवश्यक हो जाता है । क्षर - शरीर व्यक्त | अक्षर - जीव अव्यक्त है । दोनों का कर्ता - विमत्यंव्यय ईश्वर: - के धनुसार वह ईश ( धष्यात्मप्रविष्ट भव्यय ) है । जीव अनीश है । यह मोग्य - क्षर के बन्धन में पड़कर बरा होता हुमा, उसे भूल जाता है । जिस दिन भोग्य से अलग होकर वह उसे पहचान जाता है, उस दिन सारे बन्धनों से यह जीव विमुक्त हो जाता है । इसी अभिप्राय से श्वेताश्वतर कहता है--संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते ference: धनीशश्चारमा बध्यते भोक्तृभाषाज्ज्ञात्वा देवं मुध्यते सर्वपाशः " ॥ जीव श है । अव्यय ' श ' है ज्ञानप्रधान है । भोग्यशरीर, भोक्ताजीव दोनों को एकरूप से रखने वाली, दूसरे शब्दों में भोक्ता को भोग्य के बन्धन में डालकर उसे स्वमहिमारूप अव्यय ' से ' दूधई करने वाली, उस धज प्रव्यय की अजा नाम से प्रसिद्ध एक माया है । माया वही अविद्या है अव्यय का भविद्यारूप मन - प्राण वाक्माग ही मजा बना हुआ है । इसी ने इसे बस कर रखा है । जब तक यह माया- पास नहीं हटता, तब तक इसे स्व - स्वरूप का ज्ञान नहीं होता । इसी अभिप्राय से यह कहा गया
" देवी होवा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते " ॥३
अश जीव, विश्वशरीररूप भोग्य दोनों परिच्छित हैं । तीसरा मव्यय शरीर में रहता हुलाकी घटाकाशवत् प्रसंग है, अतएव अनन्त ( व्यापक ) है । सारा विश्व उसी का रूप है । वही भूतात्मा है, वही भूतभावन है, वही भूतेश्वर है । वह प्रकर्त्ता है । कर्तृत्व - धम्मं अक्षर का है न कि अव्यय का । जब जीव - मात्मा ' अव्यय - प्रक्षर - क्षर ' तीनों के यथार्थ स्वरूप को पहचान जाता है तो सारे भेद को छोड कर उस एकत्वरूप ब्रह्यभाव को प्रान्त हो जाता है । इसी अभिप्राय से भागे जाकर ऋषि कहते हैं ----
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aatenure ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपर्ण " ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्त्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् " ॥ " ब्रह्म को प्राप्त करने का उपाय है- मायानिवृत्ति, प्रविद्या विनाश । वह माया कैसे हट सकती है? इसका उपाय बतलाते हुए, आगे जाकर ऋषि कहते हैं-" क्षर प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनासत्त्वभावात् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः " ॥ " प्राधानिक सांक्यदर्शन क्षर को प्रधान कहते हैं । विश्व का प्रधान कारण वास्तव में क्षर ही है । यह मर्त्य है । अक्षर प्रमॄत है । दोनों का शास्ता वही प्राध्यात्मिक धव्यय है । अभ्यासयोग से, ध्यानयोग से सब भूतों में निरन्तर उसी की भावना करने से क्रमशः प्रविद्या हटती है एवं-" अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् " । — के अनुसार अनेक जन्म के बाद भूयो भूयः प्रभ्यास करते रहने पर विश्वमाया निवृत्त होती 1 तब वह मिलता है । जब माया - पाश टूट जाता है तो देहरूप भोग्य से मोका भिन्न होकर ईश - मव्यय में लीन हो जाता है । इस समय यह प्रात्मकाम होता हुमा पाप्मानों से ( पञ्चक्लेश ), जरा मरण पादि से विमुक्त होकर, आप्तकाम बन जाता है । शुद्ध आत्मरूप रह जाता है । मोक्ता जीव है, भोग्य विश्व है एवं प्रेरप्रिता ईश्वर है । तीनों मिलाकर एक प्रात्मसंस्था है । तीनों के यथार्थस्वरूप को जान लेने पर ब्रह्य - सम्पति प्राप्त हो जाती है । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि कहते हैं-" एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविषं ब्रह्ममेतत् " ॥ " जैसे काष्ठ में रहनेवाला भग्नि, तिल में रहने वाला तेल, दुग्ध में रहने वाला घृत प्रत्यक्ष है, एवमेव अनुभूत जीवात्मा में रहनेवाला वह ईश्वरभाग अप्रत्यक्ष है । जीवभाग को हम पहचानते हैं । उसे नहीं पहचानते है । मात्मा में ( जीवात्मा में ) उसे देखने का उपाय - सत्य और तप ही है । जीवात्मा तिल- दधि -अरणिस्थानीय है । तत्रानुस्यूत ईश्वरात्मा ( अव्यय ) तैल - सर्पि - अग्नि स्थानीय है । जो सत्य - तप द्वारा उसे देख लेता है, वही प्रात्मा में उस आत्मा को प्राप्त कर लेता है । इसी अभिप्राय से ऋषि मन्त में कहते हैं-१ श्वेताश्व ० १।६ । ३ गीता ६।४५ । २ श्वेताश्व ० १ । १० । ४ श्वेताश्व ० १।१२ । [ १६५ ]
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areness ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य विज्ञाताक्षरनिरूपण “ तिलेषु तेनं दधनीव सर्पिरापः स्रोतः स्वरणीय चारितः । एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनंनं तपसा योऽनुपश्यति ' इति ॥ ' इस प्रकार ' श्वेताश्वतर ने स्पष्टरूप से आध्यात्मिक ईश्वर, जीव, विख का विरूपण किया है । वही यहाँ भी अभिप्रेत है । उसी त्रित्व को लक्ष्य में रखकर मुण्डक श्रुति कहती है--" समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोषति शुद्धं वा प्रासति अन्यसीहमला- महिचानमिति शरीर एक मशरूप है । इसमें जीवपुरुष निमन्त है - मा हुआ है । भक्तियोग है । अविद्यादि दोषों से मान्य होता हुआ, अक्षररूप बीबात्मा । सेहत परसम्म बस रहा है मोक और ईश्वर में यदि कोई अन्तर है तो यह निमग्नता ही है । वह ईश्वरमा रहता हुआ मी है, आसक्त नहीं है । अतः न करोति न लिप्यते के अनुसार यह कर्ता भी अकर्ता है, अनासक्त है । इधर यह रागद्वेषमूला- आसक्ति के कारण विषयों में निमग्न होता हुआ, उनमें डूबता हुआ - मेघाव्या-- अपने प्रकाश से सिरोहित हो रहा है । इसी से अपने शो में ही ईश्वरता को भूलता हुआ, दुःख पाया करता है । जीव - ज्ञान अज्ञानावृत हो रहा है । म्हः तेन मुह्यन्ति बन्तवः ' --के अनुसार इसी प्रज्ञान से मुग्ध बन रहा है । मुग्धेऽसम्पतिः के धनुसार मोह में म - पूरा ज्ञान रहता है, न अज्ञान रहता है । अत: अज्ञानात ज्ञानस्राव ही मोड़ है । सब देखता है सुनता है, परन्तु कुछ पता नहीं है । पश्यन्नपि न पश्यति वम्यन्न जोति यही मोह है । गुरु - उपदेशादि द्वारा पूर्वजन्मकृत सदसंस्कारों के द्वारा निरन्तर भगवद् - आराधना के द्वारा, साधुसंग द्वारा, जब इसमें मितिकरूप निष्कामयोग का उदय हो जाता है तो कालान्तर में अविद्यादि दोषों से अलग होता हुआ, समस्वयोग को प्राप्त करता हुआ, यह जीव प्रपने पास प्रतिष्ठित, एकीभूत उसे देखने में समर्थ है । जाता है । इस अब यह अपने से पुष्टः ( मिलित, युक्त ) उस अन्य को ( अध्यक्ष नाटकको ) देख लेता है, ( पहचान जाता है ) तो लोक - मोह से रहित होता हुआ वह उस अमहिला को सस्तो जाता है । महिमानम् - इति का- महिमानमेति गच्छति यही अर्थ है । अव्यय की महिमा यही है कि वह रात-दिन कम्मैमय विश्व में रहता हुआ भी असंग है । बस, यही हालत इसकी है । एक तरफ महिमामा अव्यवभाग है । दूसरी ओर आसक्तिमूल क्षरविश्व है । मध्य में अक्षररूप जीव है । यदि वह है तो ' मुयमान ' है - शोक युक्त है, उधर है तो वीतशोक है । इस प्रकार जो जीव विश्व की मोर- जाऊडः कामना में लिप्त होता हुआ दुःख पाया करता है, वही यदि उस अव्यय को पहचानता हुआ मैं तो. यह हूँ, वह मेरा स्वरूप है यह ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो--१ श्वेताश्व ० १।१५ । ३ गोता ५। १५ । २ गीता १३।३१ । [ १६६ ]
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aatee ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य ' प्रात्मानं चेद् विजानीयावयमस्मीति पूरुषः । फिमिशन कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् " ॥ ' के अनुसार यथार्थ में कामनारहित होता हुआ वीतशोक हो जाता है ॥। २ ॥ विज्ञानान पूर्व के निरूपण में हम बतला आए हैं कि यह उपनिषत् मध्यमूला हिरण्यगर्भविद्या का निरूपण काक्ति में हिय्यायं सूयं है । अध्यात्म में हिरण्यगर्भ विज्ञानात्मा है । सभी उपनिषत् अक्षर को प्रमान मानते हैं, परन्तु मजरप्राप्ति का उपाय सभी में भिन्न - मिल है । वह अक्षर - महान-विज्ञान - प्रदान ' तीनों में प्रतिष्ठित है । प्रज्ञान द्वारा भी अक्षर प्राप्त किया जा सकता है । आगे का उपनिषदान द्वारा ही अक्षर प्राप्ति - का उपाय बतलाता है । केनोपनिषत् भी ऐसा ही करता है । परन्तु हमारा यह उपनिषत् विज्ञानात्मा को प्रधान न मानकर अक्षर का निरूपण करता है । विज्ञानात्मा सौरभाग है । सोरमाग हिरण्मय है । सूर्य में जो चित् है, जिसके कि प्रभाव से सूय्यं चिवन बन रहा है, वही अक्षर है । सोर - अग्निमण्डल हिरमेयमण्डल कहलाता है । यतएव इस सौरभवार को हिरण्मय-पुरुष कहा जाता है । यही हिरण्ययपुरुष सत्व तस्थ है । तदेतत् तस्यम के अनुसार यह सौर - अक्षर ( हिरण्मयपुरुष ) प्रवश्यमेव सत्य है । यही प्रध्यात्म में प्राकर विज्ञामात्मा नाम से प्रसिद्ध होता है । विज्ञानात्मा हृदयस्थ मन पर प्रतिष्ठित रहता है एवं दक्षिण - पशु में इसका विकास होता है । इसी के लिए- योज्य वशिलेाम् पुरुषः- इत्यादि कहा जाता है । दक्षिण - पशु में एक प्रदेश के अन्तर पर अनुक दृष्टि से इसका प्रत्यक्ष किया जा सकता है, परन्तु इस सत्य चाक्षुष -कृष्णारूप विज्ञानात्मा का प्रत्यक्ष प्रकाश में नहीं होता । सौरतेज हिरण्मय है । वह सत्य इससे आवृत रहता है । पार्थिव पूजाप्राण बायामय है । उसी में इसका प्रत्यक्ष होता है । इसी आधार पर -“ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । एवं पू umar वृणु सत्यधर्माय दृष्टये " ॥ " - यह कहा जाता है । आध्यात्मिक चाशुष पुरुष जीवसुपर्ण है । आधिदैविक सौर हिरण्मय पुरुष साक्षी सुपर है । दोनों अभिन्न हैं । जैसा कि निम्नलिखित बृहदारण्यक कृति से स्पष्ट हो जाता है— हमे नामेष योज्यं दक्षिणेऽशन्पुरुषः ' । योऽसावादित्यः पुरुषः सोऽसावहन् । यस्यानुबिलः प्रतिबुद्ध श्रात्माऽस्मिन् संदेहों गहने प्रविष्टः । विश्वस हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकाः स उ लोक एवं - इत्यादि " ॥ " १ बृहदा ० उप ० ४।४।१२ । ४ बृहदा ० उप ० ३।६।१२ । २ ईशावास्योप ० १५ । ५ बृहदा ० उप ० ४ । ४ । १३ । [ १६७ ] ३ बृहदा ० उप ० ४२ ।
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य विज्ञानाक्षरनिपरूण यह शरीरप्रविष्ट विज्ञानात्मा द्रष्टा है । इष्टा विज्ञान का असाधारण नाम है, यह पहले कहा जा चुका है । दृश्यतत्त्व वही साक्षी हिरण्मय आदित्याक्षर है । विश्वस्य कर्ता के अनुसार वही कर्ता है । जीव - प्रपञ्च का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण होने से वह ईश है । अक्षरमय होने से वह पुरुष है । ब्रह्माक्षर-समुद्भवम् ' – के अनुसार वही अक्षरतत्त्व क्षर की योनि है । ब्रह्म क्षर का प्रसाधारण नाम है, यह भी कई बार कहा जा चुका है । द्रष्टा विज्ञान जब इस रुक्मवर्ण- कर्त्ता ईश - पुरुष - ब्रह्म योनिरूप उस साक्षी को पहचान जाता है तो सत्कम्मंजनित पुण्यवासना, अकर्म्मजनित पापवासना दोनों का विधूनन करता हुआ स्वयं निरञ्जन होता हुआ उस निरञ्जन प्रसज्ञ पुरुष के साथ सायुज्यभाव को प्राप्त हो जाता है । साम्यमुपैति कहा है । इससे सायुज्यरूपा श्रपरामुक्ति सूचित की है । विज्ञान के ऊपर अभी महदार और है, वहीं शुक्र है । महदक्षर के बाद शुक्रातिवर्तन होता है, तभी परामुक्ति होती है । सौर हिरण्मयाक्षर से केवल सायुज्यरूप अपरामुक्ति होती है । जीव निर्धूतकिल्विष हो जाता है । सूक्ष्म शरीर घट जाता है । परन्तु भावनारूपा कारण ग्रन्थि बनी रहती है । जीव का अध्यय नहीं है । इसीलिए तो - पश्यः पश्यते मम् कहा है । अद्वैतरूपा समवलयनाम से प्रसिद्ध परामुक्ति में द्रष्टा - हस्य का भेद नहीं है । यह द्वैत अपरामुक्ति से ही सम्बन्ध रखता है । तो बस -" यतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते " | " —के अनुसार इन्द्ररूप होने से देवनाम से प्रसिद्ध उस ईश को जब यह देख लेता है तो वासनाप अञ्जन से निवृत्त होता हुप्रा, सजातीयता के काररण उस निरज्जन के साथ सायुज्यभाव को प्राप्त होता है । तीसरे मन्त्र का यही तात्पय्यं है ॥। ३ ॥ यदि जीवसुपणं उस हिरण्मयपुरुष को पहचान जाता है तो उसे क्या फल मिलता है, तृतीय-eg मन्त्र में इसी का निरूपण है । मात्मज्ञान हो जाने पर जब जीव प्रारब्ध कम्मरूप शरीर का परित्याग करता है तो वह सुषुम्णा द्वारा इतिद्वार का भेदन करता हुआ सीधा सौरमण्डल में चला जाता है एवं वहाँ जाकर उस निरञ्जन के साथ सायुज्य भाव को प्राप्त होता हुम्रा, जन्ममरण - चक्र से सदा के लिए विमुक्त हो जाता है । मरे बाद आत्मज्ञानी किस लोक में जाता है, क्या अवस्था होती है? बस, तीसरे मन्त्र में इसी सांपरायिक फल का निरूपण है | शरीरपरित्याग होने के बाद की स्थिति को जाने दीजिए । आत्मज्ञान हो गया है । परन्तु प्रारब्धकर्मणां मोगादेव क्षय: के अनुसार प्रारूपकम्र्म्यरूप शरीर अभी तक विद्यमान हैं । इस जीवित दशा में आत्मज्ञानी में और साधारण मनुष्यों की अपेक्षा क्या विशेषता रहती है? बस, चौथा मन्त्र इसी प्रश्न का समाधान करता है । हम कह आए हैं कि उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य इन्द्रनाम से प्रसिद्ध सौर - अक्षर है । वह सौरप्राण और प्राण में प्रतिष्ठित १ गीता ३।१५ । २ बृहदा ० उप ० ४।४।१५ । [ १६८ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य विज्ञानाक्षर निरूपण अक्षर दोनों मिलकर एक वस्तु हैं । वह स्वयं ज्ञानज्योतिर्धन है; परन्तु हिरण्मय सौरप्राण से संपरिष्वक्त होकर वह स्वयं भी उसी प्रकार हिरण्यवर्ण बन रहा है, जैसा कि हमारा ज्ञान तत्तद्विषयों से संपरिष्वक्त होकर तदाकाराकारित बन जाता है । इसीलिए सौरप्राणयुक्त अक्षरपुरुष के लिए ऋषि ने एक्पर्णम् कहा है । हमारा उपास्य हिरण्मय प्राणावच्छिन्न अक्षर है, इसी विद्या को सूचित करने के लिए ऋषि इस चौथे मन्त्र में उस अक्षर को प्राण शब्द से व्यवहुत करते हैं । इन्द्र साक्षात् प्रारण हैं । कैसा प्राण? बृहती प्राण है । त्रैलोक्य में प्रणु से महान् तक सारे पदार्थ इस बृहतीप्रारण से विष्टब्ध हैं । जैसा कि प्रश्नोपनिषत् में बड़े विस्तार के साथ बतला दिया गया है । इसी प्रभिप्राय से-" प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ” । " “ सर्वं होतं प्राणेनाऽऽवृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टम्भस्त-खथाऽवमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापि पोलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टानीत्येवं विद्यात् " - इति ॥ " -यह कहा जाता है । महर्षि विश्वामित्र ने बृहती सहस्र के शंसन द्वारा इसी प्राण को पहचाना था । उपासनानन्तर इन्द्र प्रत्यक्ष होते हैं, विश्वामित्र से कहते हैं कि मांगो, वर मांगो! तुम्हारे त्रिशत् बृहतीसहस्र शंसन से मैं तुम पर प्रसन्न हूँ । उत्तर में विश्वामित्र ने स्वामेव जानीयान कहा । इसके उत्तर में अपनी प्राणात्मकता बतलाते हुए इन्द्र ने कहा कि-" प्राणो वा ब्रहमस्मि ऋषे! प्राणस्त्वम् । प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा विशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽलं. मित्रम् " ॥ " प्राण की प्रतिष्ठा प्रश्न है । प्रन्न से ही प्राण- सता रहती है । जब तक प्रश्न है, तब तक प्राण है एवं साथ ही में, जब तक प्राण है तभी तक अन्नाहरण भी होता है । इसी का स्पष्टीकरण करती हुई वाजिति कहती है--' नं ब्रह्मत्येक प्राहुः । तन्न तथा पूर्याति वा प्रन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्येक श्राहुः । तम तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽतात् । एते त्वेष देखते एकषाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतः " ॥ " १ प्रश्नोप ० १।५ । ३ ऐ ० आ ० २।३।३।११ । २ ऐ ० आ ० २।१।६ । ४ शत ० ब्रा ० १४ | ५ | १३ | १ | [ १६६ ]