Mundakopanoshad — पृष्ठ 171–180
Mundakopanoshad · पृष्ठ 171–180
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एक प्रखण्ड ) restofou ज्ञानभाष्य - इस प्रन्नसम्बन्ध के कारण ही प्राण सत्य कहलाता है । वैज्ञानिक लोग सत्य सन्द ीक्षण मानते हैं--१- प्राणी अनं यतं सत्यम् २- प्रतगमितप्राणः सत्यम् ३- प्रमृतमयोः संयमनं सत्यम् : तीनों प्रमिझार्थक हैं । प्राण सद है । ती अन्न है । यह यवम् है । स्वरूप प्राम में तीरूप मन बैठा है - यत है । इस विद्या को बतलाने के लिए ही वैज्ञानिकों ने इस प्राण, मनमय प्राणतत्व का नाम समय रखा है । सविति प्राणः सत्यम्नम् सत्य शब्द का यही निर्वाचन किया जाता है । सद् ममृत है । होने से अद्भुत है । धनुतगति भमृत ही सत्य है । सत् - अमृत है । वी - बचव है । अब-दोनों के प्रावेन्द्र का ' का सूचक है । ऐसे ममुतन्मर्त्य के संयमन का नाम ही सत्य है । अन्न इस मित्र है । धन्नमित्र से संपरिष्वक्त होकर ही यह इन्द्र बेश्वमित्र बनता है । संसार के जीवमात्र का परि प्राणेन्द्र हे । परन्तु कब? जब तक वैश्वमित्र है तब तक जब तक अन्न माहृति है, तब तक यह वैश्वमित्र हैं । तभी तक इसकी अध्यात्म में सता रहती है । बिना भल के वह सूख जाता है, उदान्त हो जाता है । षध्यात्मसम्बन्ध है । बृहतीक्षम्य पर सूपं स्थित है । में यह प्राणेन्द्र ३६ हजार बृहती- - मन्त्र को खाता बृहती ३६ अक्षर का बन्द है । ३६ साहस्री हैं । १०० बार प्रावर्तन से ३६ हजार अन्न समाप्त हो जाते हैं । अतः मनुष्यायु ३६ हजार दिन की ही होती हैं । जब तक बृहतीप्राण बनयुक्त हैन्याबास्मिन् शरीरे यो वसति / ताबबायु: ' के अनुसार सभी तक मायु है । इसी बृहतीप्राण को -महरमय होने से ' लक्ष ' कहा जाता है । इसी से सारे भूत करित होते हैं । वह स्वयं नहीं बिगड़ता । अन्त जायमानो बहुषा विजायते - इस यजुर्मन्त्र के धनुसार वह स्वयं नित्य है, परन्तु ब्रह्म की योनि है- अर्थात् कर उसी से उत्पन्न होते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऐतरेय कहते हैं-" एष वा अक्षरम् । एवं ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः सरति न चैनमति-क्षरन्ति । स यवेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः सरति न चैनमतिक्षरन्ति । तस्माहार-मित्याचक्षते - एतमेव सन्तम् " - इति ॥ 2 इस सारे प्रपञ्च से कइना हमें केवल यही है कि श्रोत प्राणशब्द विज्ञानरूप हिरण्मय प्राणाक्षर काही वाचक है 1 अध्यात्म में प्रविष्ट होकर वह ' प्राण- भायु वैश्वमित्र चाक्षुषपुरुष ' प्रादि नामों से व्यवहृत होता है । वही अधिदेवत में ' रुक्मवर्ण - ईश ' आदि नामों से व्यवहृत होता है । यह प्राण यदि ऐसे रुक्मवर्ण को देख लेता है - तो जो धर्म्म उसके हैं- उनका इसमें अवतार हो जाता है । सारे तथ १ कौषीतकि ० उप ० ३।२ । २०० प्रा ० रारा | १० | [ १७० ]
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dahanush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षर freet से प्रकाशित हो जाता है । सर्वमूर्तीविभाति के दो अर्थ हैं । सारे भूतों से वही प्रकाशित हो रहा है! जिसने भूत देखते हो, विश्वास करो, यह मूखमाति आण की माति है । यदि इनमें वह प्राण न रहता तो इतना सर्वामनुप्रपन्नःसी । यही पहला अर्थ है । प्रपि च प्राण विज्ञानात्मा है । विज्ञानों से युक्त होकर ही प्रकाशित होता है । सिविषयज्ञान अनुभव से परे की वस्तु है । जो धनात्मत है - लड़का प्राण ( विज्ञानात्मा ) प्रल्पभूतों से मासित रहता है । पाप्मासंसर्ग के कारण उसका विज्ञान पल्प रहता सर्वश नहीं है । परन्तु सर्वज्ञ नाम से प्रसिद्ध सौर - रुक्मवर्ण का साक्षात्कार करने वाला विज्ञान की समता प्राप्त कर लेता है, अतः जो सर्वभूतमानविषयता उसमें है - वही इसमें हो जाती है । आत्मज्ञानी सर्वश यब जाता है-पूत- पविष्य दोनों हो जाते है । ि सुलाम के अनुसार सारे भूत क्षररूप हैं । धात्मा प्रक्षररूप है अतः उसमें सारे भूत समाविष्ट हो जाते हैं - ग्रही पात्मज्ञान का पहला एवं प्रधान फल है । इसी फल को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" शारणो ह्येष यः सर्वभूतविभाति " । ( " यः संपरितः आत्मा काक्षरसजातीयत्वेन सर्वे ति एकः शाखः प्राचात्मा - विज्ञानाला बन्यात्मज्ञानात् सर्वभूतभानपुरको मूल्या सजीव: सर्वज्ञो भवति इति निष्कर्षः ) " ॥ यह जानता हूँ, मैं सूर्य को पहचानता हूँ, मैं सब कुछ जानता हूँ - इस प्रकार के विष्ठ को- प्रति कहा जाता है एवं अपने मुख से ऐसे वन्दन बोलने वाले को प्रतिवादी कहा जाता है । जि सोमा ज्ञानी कहा जाता है, उसे केदमाषा में प्रतिबादी कहा जाता है । लोक में क विश्वको अनेक कार का है । उनमें से जो विद्यासम्बन्धी अभिमान है । ' प्रतिवादी ' शम्बरी में कुछः विद्या जानता हूँ " - कहने वाला ही ' अतिवादी ' कहलाता है ॥ यो मया देवक हा लेख है वह जानता हूँ " यह कहता है तो यह ' वतिवादी ' है । उसका यह पक ऐसा तिचान उसके परामय का कारण है । कारण इसका नही है कि देवाविष शास्त्रीया विद्या प्रपराविद्या है । जिससे प्रक्षर जाना जाता है वह अक्षरविद्या है, यही श है । इस विद्या को न जानकर जो केवल मपराविद्या जानता है, वह सनत्कुमार के कथनानुसार कोरा नाम ( शब्द ) ही नाम जानता है । विद्या नहीं जानता । ऐसी प्रवस्था में ऐसी शब्दविद्या पढने वाला जानता हूँ - यह कहता है तो वह अवश्य ही प्रतिवादी है । परन्तु जो प्रक्षर की जान जाता है, प्रार का साक्षात् कार लेता है- वह अवश्य ही - विज्ञ है - सर्वश है । ऐसा धात्मवित् - यदि धपने मुंह से उसे जानता हूँ " - यह कहता है तो उसका यह कथन ' प्रतिवदन ' ( मिथ्याकथन ) नहीं माना जा सकता । तु का यह कथन सत्य है । सत्य प्रक्षर है । सस्याक्षर को जानने वाले का कथन भी सत्य है । छान्दोग्य उपनिषत् में स्कन्द - विद्या में भगवान् सनत्कुमार ने बडे विस्तार के साथ इसी विषय का निरूपण किया है-[ १७१ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानाक्षर roj " प्रारणे सर्व समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति, प्राणाय ददाति । प्राणो ह पिता । प्राणो माता । प्राणो भ्राता । प्राणः स्वसा । प्राण प्राचार्य्याः । प्रातो ब्राह्मणः । प्राणो होवैतानि सर्वाणि भवति । स या एष एवं पश्यत्वं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति । तं चेद् ब्रूयुरतिबा-खसीति- ' प्रतिवाद्यस्मीति ब्रूयात् ' न श्रपह्न वोत । एष तु वा प्रतिबदति यः सत्येनातिवदति । सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानि " - इति ॥ " तात्पर्य इसका यही है कि जानकार मनुष्य यदि " मैं जानता हूँ " - इस प्रकार के वाक्य बोलकर प्रतिदावनता है तो उसका यह प्रतिवादीपना बुरा नहीं है । वास्तव में जानकार प्रतिवादी है । " # बडा पण्डित हूँ ” –यह वाक्य मिथ्या होने पर निन्दापरक है । सत्य होने पर उचित है । तथैव मिथ्याभाव से सम्बन्ध रखनेवाला ' अतिवादी ' शब्द निन्दनीय है एवं सत्यभाव से सम्बन्ध रखनेवाला ' अतिवादी ' शब्य यथार्थ है । ऐसा यथार्थ अतिवादी ( बढ कर बोलने वाला ) प्रतिवादी नहीं हैं । क्योंकि उसका प्रतिवादीपना यथार्थ है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं --विधानम् बिहान ममते मासिवादो - ऐसा प्राणरूप विज्ञानवित् विद्वान् उसे जानता हुभा - ' प्रतिवादी ' नहीं बनता है । अर्थात लोक में साधारण मनुष्य की बातों को सुनकर मनुष्य कहा करते हैं कि अरे! उसकी बातों में क्या सार है? यह तो प्रतिवादी है । जानता कुछ नहीं - केवल बडी - बडी बातें बनाता है । परन्तु जो आत्म-ज्ञानी होता है, उसकी प्रत्येक आशा वेदवाक्यवत् मानी जाती है चाहे वह बात असम्भव ही क्यों न हो । वह यदि कहता है कि, सूय्यं के ऊपर परमेष्ठी है, तो झट हम मान लेते हैं । क्यों कि वह जानकर कह रहा है । अत: “ अरे! इसकी बातों में क्या रखा है - वह तो कोरा प्रतिवादी है " कहकर उसके अनुशा-सन का साधारण मनुष्यों के वचनों की तरह उल्लंघन नहीं किया जाता । सर्वक्ष बनना, पहला फल था । " सबका इसकी भाशा में चलना, दूसरा फल है । अक्षर सर्वज्ञ है | सबका संचालन करता है । सब ही सर्वज्ञ शास्ता प्रक्षर को आशा मान रहे हैं । जो इसे प्रात्मसात् कर लेता है वह स्वयं भी सर्वज्ञ एवं सर्वशास्ता बन जाता है यही निष्कर्ष है । प्रात्मज्ञानी जीवित दशा में क्या फल प्राप्त करता है? इसका उत्तर हो चुका । अब उसकी चर्य्या का निरूपण करते हैं । आत्मज्ञानी का आचरण कैसा होता है? इसका समाधान करने के लिए श्रुति का उत्तर- माग हमारे सामने प्राता है । बुद्धियोगरहस्यानभिज्ञ प्राचीन आचाय्यों द्वारा कल्पित सर्वकम्मं परित्यागलक्षण संन्यासयोग की तरह श्रीपनिषत् पुरुष का ज्ञाता - यह विद्वान् सारा कर्म्मखोड - खार नहीं देता । घर बार छोडकर लंगोटी लगाकर मकर्म्मण्य बनकर जंगलों में मटकता हुआ मिथ्याचारी नहीं बनता । अपि तु -१ छान्दोग्योप ० ७।१५।१ एवं ४ । एवं ७।१६।१ । [ १७२ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य " काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः " । " विज्ञानाक्षर निरूपण - स्वरूप बुद्धियोग के मम्मे को समझता हुप्रा - नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च क्रम्मंणि'- - इस गीता- आदेश का पालन करता हुआ, यावज्जीवन यथाधिकार कर्म्म करता हुमा, क्रियावान् बना रहता हैं । यज्ञ, तप, दान तीनों कम्र्म्म करता है । कम्मं अवश्य करता है, परन्तु दृष्टि उसी मात्मरूप विद्यामय अक्षर पर रखता है । सब काम करता है, परन्तु म्रात्मदृष्ट्या । सबमें प्रात्मतत्त्व व्याप्त है । उसे लक्ष्य में रखकर दूसरे शब्दों में प्रात्मकी- मास्मरति बनता हुआ क्रियावान् बन रहा हैं । क्रीडा बाह्य विषय की अपेक्षा रखती है | क्रीडा में विषय का सम्बन्ध अपेक्षित है एवं विषय- संसर्ग से जो मानन्द मिलता है-वह रति है । सम्बन्ध है विषय के साथ कम्मों के साथ एवं क्रीडा और रति है गूढोत्मा नाम से प्रसिद्ध थात्मा के साथ । चष्टि इधर है, " मन उधर है । सारे कर्म करो । कामना का परित्यागे करो । सब में प्रात्मभावना करो । बस, जो वास्तविक ग्रात्मज्ञानी होता है, उसका प्राचरण ऐसा ही होता है । भवेदान् कृष्ण की तरह निष्कामशुद्ध्या यावज्जीवन कर्म्म करते हुए मामी, चात्मरति बने रहना ही वास्मशान काः सेदुपयोग हैं । ऐसा प्रात्मज्ञानी ही ब्रह्मवेत्तानों में श्रेष्ठ माना जाता है । श्रुति कहती है कि तुम पल के लिए, क्षणिकशान के लिए, क्षणिकसत्ता के लिए संसार - चक्र में फंस रहे हो । परन्तु तुम्हें मालूम नहीं है कि इसका प्राधार सच्चिदानन्दधन अक्षरात्मा है, उसे प्राप्त कर लो । सर्वशन्सर्वानन्द- सर्वसत्तायुक्त बदजायोगे । संसार में ऐसा मन्दभाषी भौर कौन है, जो कि ऐसे सच्चिदानन्यधन की उपेक्षांक र संसार-एक में मारा - मारा घूमा करता है? प्रय किक ब्रेक DID I ÚR FIF यहाँ के बाद से सर्वकम्मपरित्यागलक्षण संन्यास को मानने वाले प्राचान्यों ने बड़ी बचातानी की । ज्ञानध्यान को उन्होंने किया समझा है । मस्तु उन बडों की समालोचना करने का हमें कोई पविकार नहीं है- हमें तो केवल काम्यामां कम्मरला म्यासे संन्यासं कवयो विदुः- इस प्रवेश पर चलता है । एक बात मौर बतला कर इस मन्त्रार्थ प्रकरण को समाप्त करते हैं । मन प्राण, हाक तीनों क्रमशः ज्ञान - क्रिया - प हैं । इन तीनों का क्रमशः भ्रव्यय - मक्षर - क्षर से सम्बन्ध है । सव्यय मानधन प्रवपूर्व इसे श्रविकुर्वाण कहा जाता है । प्रक्षर क्रियाचन है प्रतएव इसे कुर्बाण हूँ कहा जाता है एवं शह प्रर्थन है प्रतएव इसे विकुर्बान कहा जाता है । मध्यवितत प्रक्षर क्रियारूप है, प्रारूप है । T जीवात्मा की प्रधानता रहनेवाला उपनिषच्छास्त्र अक्षर पर प्रधानदृष्टि रखता है । प्रक्षर प्राणरूप है । इसी को लक्ष्य में रखकर राम के लिए ऋषि ने यहां का प्रयोग किया है । ' ---" झात्मोपायन हेतवः ” । जिस आत्मा को पहचान लेने पर जीवात्मा " सर्वज्ञ बनता हुआ, सबका शोस्तों मेन जाता है, क्रियावान् होता हुआ भी ( निरन्तर कम्मंमार्ग में प्रवृत्त रहता हुआ भी ) ग्रात्मज्ञानाग्नि में उनकी भस्म १ गीता १८१२ । २ गीता ३।२२ । [ १७३ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण कर भावनावासना रहित होता हुमा, प्रात्मकौड - प्रात्मरति बना रहता हैं- ऐसे सर्वसमर्थ प्रात्मा को पहचा-नने का सा करने का कौनसा उपाय है? बस, पांचवा मन्त्र इसी का समाधान करता है-सत्य ( अक्षरसत्य की शब्दब्रह्म द्वारा उपासना नियति विज्ञानच य " ), तप ( ज्ञानमयं तप ) सम्यग्ज्ञान " ( " वेदानुवचन ) ब्रह्मचर्य ( ज्ञानचर्थ्या ) बस, इतने साधनों से वह बंसरीरमा लक्ष्य है--" महाचयं तपः सत्यं वेदातुम असा पोपनिषत् चैव ब्रह्मोपायनहितवः ॥ ' रूप से इन सारे शब्दों का: पूर्व के प्रकरणों में निरूपण किया जा चुका है इस विषय से सुख नहीं कहेंगे । नायमात्माः प्रथमेवम्यः- इत्यार्कि में उतम कामगिर हेतु वहीं माना है । यहाँ का तप प्रवृतिरूप कर्मयोग से सम्बन्ध रखता है । यही कातक निर्वाचिएण्ड ज्ञानयोगापरपर्यायक - कम्मंयोग से सम्बन्ध रखता है । अक्षर नियति- सत्य है वही सांस्कृि बनास मित्तरे इसका कारण भावापत नियक्ति का अनुगमन करते रहो । काला चीर में उसमा बतला देगी कि यही सब कुछ बना है । - सात्रा पति है । एक हिरावर सबः कः करो । परन्तु सब में एव सर्वेषु भूतेषु डोह पार प कर्म्म करना तप है । परन्तु कम्मं वैसा करो जो शानयुक्त हो, विचायुक्त को निक्काम होत भाब रखो । खाते - पीठे - सोते - उठते - बैठते - चलते - हँसते सर्वत्र उसे मनुस्युत समझो । घट- स्त्री - पुत्र- पिता - बम-उपवन - सूय्य - बन्ना - पृथिवी प्रादि यच्चयावद भूतों को भूतेषु भूतेषु निचित्य बीरा: के अनुसार उसे पता मक्ष्य बनाएँ । ससार में ऐसा कोई भी कम्र्म नहीं है जो बुडा हो - हेय हो । क्योंकि सत्र में ज ब्याण है । क्या चाह मंत्राविवेश के पनुसार परमपवित्र प्रात्मयुक्त कर्म्मजगत् कभी हेय हो सकता है? कदापि नहीं । वह उपादेय हैं, परन्तु ब्रह्मदृष्ट्या, आत्मदृष्ट्या, वेश्यागमन, सुरापान, ब्राह्महत्या, पित हत्या, बालहत्या भाति घोर कम्मों में भी वह है । उन्हें भी करो, कोई धापत्ति नहीं है, परन्तु दृष्टि आत्ममयी बनाओं, जिस दिन तुम्हारी ऐसी दृष्टि हो जाएगी, उस दिन तुम ऐसे कम्मे करोंगे ही नहीं । यदि करोगे तो बन्धन में नहीं पड़ोगे । इसी धर्मप्राय से उपनिषद् पूर्ति कहती है-" मसान होयते स पितृवाना हो भवति । पिता पिता भवति । माता अमाता भवति " हाराह - इन श्रुति वचनों का तात्पय्यं यही है कि यह सारे कम्मं उस व्यापक ब्रह्म की इच्छा से ही होते हैं । ईश्वरः सर्वभूतानां - यह वचन इस विषय की पुष्टि करता है । वह सब भले - बुरे कम्मों का कर्ता होता हुआ भी अकर्त्ता है । प्रतः इसके साथ सायुज्य प्राप्त करने बाला श्रात्मज्ञानी प्रो. प्रकर्ता हो जाता है--१ कौषी ० उप ० ३।१ । एवं बृहदा ० उप ० ४।३।२२ । [ १७४ ]
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( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य विज्ञानानिरुपण " साम्बरा वा दिगम्बरा वा - न तेषां धम्र्माधिम्मो न मेध्यामेध्यो । मस सूतिप्यते । " यथा रविः सर्वरसान् प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः " । सबैक योगी विषयान् प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापंश्च शुद्धः " ॥ ': हत्थादि वचन भी इसी धर्म को स्पष्ट करते हैं । कहना यहीं है कि कर्म्म करते हुए धात्म-बुद्धि रखना, दूसरे शब्दों में कामना डोटकर कम्पं करना ही तप है । ऐसा करने से वासना का विनाश होता है । सारे दोष क्षोष हो जाते हैं । मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ वासना से प्रावृत होती हुई चम्चम रहती -यासापरित्यागधर्म्मा तप से तीनों एक हो जाते हैं, प्रतएव तप का मनसमयेन्द्रियाणां व एक परम शत्र: - यह लक्षण भी किया जाता है । ऐसे तपोयोग को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है - सम्यग्ज्ञान । वैकवि शास्त्रों के द्वारा जब सदसद का विवेक हो जाता है, तभी प्रसत् - पदार्थों में से कामना हटती है, तभी सपन बन भाता हैं । कोरे सम्यग्ज्ञान से काम नहीं चलता । गुरु से एक - दो घण्टे पढ भए । कालान्तर मै ' सदसएशन ' हो गया ' । हम यह खूब समझ गए कि ' विषय ' बन्धन के कारण है, मतः इनका पारस्पा धरना उचित है । परन्तु फिर भी विषय संग नहीं छूटता । इसलिए सम्यग्ज्ञान की, दूसरे शब्दों में प मिचदज्ञान को स्थिर बनाने के लिए ब्रह्मचर्य अपेक्षित हैं । सुनो, मनम करो, निदिध्यासन करों, तब पात्मज्ञान मिलेगा । ब्रह्म ज्ञान है । वेदोदित ज्ञानब्रह्मा को अपनी मिसबब बनायो निरम्बर ती पर मक्ष्य रखो । इसीलिए ऋषि ने नित्यम् कहा । है । चिरकाल के निरन्तर अभ्यास से — " स. सुवीर्षकानेर सार्थसत्काराऽऽसेवितो बृष्ठभूमिः " । " --के धनुसार सम्यग्ज्ञान बन स्थिर हो जाएगा तो सर्वभूतात्मबुद्धिरूप तप सफल होगा । उसी अत अविद्यादि सारेदोष तिरोहित हो जाएंगे । ब्रह्मचर्य्य भी कैसे बने? रात - दिन मन विषयों की तरफ दौड़ा करता है । रोकते हैं परन्तु सकता नहीं । इसका एकमात्र उपाय है- दोषदर्शनयुक्त अभ्यास द्वारा इन्द्रियों का संयमन । मान लीजिए प्राप केलिए प्राप जाइए देखिए । मंतित्रोपर मन को जोकि यह तो पत्र बनावट है । क्यो प्राकृतिक वन - उसे भी यह क्या सबके सामने इथपाल सात्रियों का प्रेस कोई मूल्य रखा है? प्रकार दोष देखते - देखते अपने भाप वहाँ से मन हरेस मिहीं से प्राकृतिक सौन्दी समा भी द्रोष ढूंढिए यह सौन्दर्य, भाषा कहाँ से? इसका उत्तर खोजिए । इस क्रमिक दोष - दर्शन से अन्ततो-गामा का मन सर्वविषयों से उपरत होकर उसी सच्चिदानन्दघन की मोर झुक जाएगा । दर्शन के अभ्यास से मन का संयम होगा । भाप यति बनेगे । ज्ञानचर्या में समयं होंगे । तद्द्वारा १ परमहंसोपनिषत् -२ पा ० यो ० दर्शन १।१४ । [ १७५ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण भात्मदर्शन होगा । जो विद्वान् ऐसा करते हैं, पूर्वोक्त नियमों का पालन करते हैं, वे संयम के प्रभाव से यति नाम धारण करते हुए क्षोणदोष बन कर अन्तःशरीर में शरीर प्रकाश के भीतर प्रविष्ट हृदयाकाशान्तम्-तदभ्राकाश में ) ज्योतिर्म्मय शुभ्र ( निरञ्जन ) उसको देख लेते हैं । ऐसा वह शुभ्रतत्व सत्यादि द्वारा ही प्राप्त हो सकता है । प्राप्त होने से क्या फल मिलेगा? इसका उत्तर ३-४ मन्त्र में दिया ही जा चुका है । पाँच मन्त्र का प्रकारान्तर से द्वितीय धर्म ---सत्य - तप- सम्यग्ज्ञान इन तीन से आत्मप्राप्ति होती है - यह कहा गया है । ऋग्यजुः सामसमष्टि नाम ही सत्य है । यही भग्रीसत्य यज्ञरूप में परिणत होता है । यज्ञ सत्यस्वरूप है । इसका भूत प्रपञ्च से सम्बन्ध 1 बस, यहाँ सत्य शब्द से यज्ञरूप कर्म्मकाण्ड ही अभिप्रेत है । प्रारणव्यापार तक है । तप से उपसनाह काण्ड अभिप्रेत है एवं सम्यग्ज्ञान से ज्ञानकाण्ड प्रभिप्रेत है । वाक् प्राण - मन स्वरूप त्रिकल मात्मा तीनों कलाभों से वहाँ ले जाया जा सकता है । वाक् सत्य है- भूतमयी है - यही कम्मंयोग है । प्राण तप क्रियामय है - यही उपासनायोग है । मन ज्ञान है - यही ज्ञानयोग का अधिष्ठाता है । प्रवृत्ति हृदाकर तीनों करो, या तीनों में से एक करो, वह प्राप्त हो जाएगा । म्राठवें मन्त्र में हम इस पर भाषिक कहने - वाके हैं मृतः यहाँ इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा । ये तीनों योग निष्काममया तभी हो सकते हैं कि अनवरत ब्रह्मचर्या रखी जाती है । सदा ज्ञानदृष्टि रखनी चाहिए । ज्ञान को धागे रखकर ही कर्ल्स करना चाहिए एवं ज्ञान को मागे रखकर उपासना करनी चाहिए-१- मन- सम्यग्ज्ञानेन -- ज्ञानयोगेन २- प्राण - तपसा - उपासनायोगेन --- नित्यब्रह्मचर्य्यं युक्तेन तपसा सस्पेन सम्यग्ज्ञानेन व सध्या एवं मामा ' ३- वाक्- सत्येन - कर्मयोगेन सत्य नाम वेदत्रयी का है, यह धागे के मन्त्रार्थ से भली - भाँति सिद्ध हो जाता है ॥। ५ ॥ --उपनिषत् की प्रधान दृष्टि प्रक्षर पर है । प्रक्षर सत्य है, अतः उसी की प्रशंसा करते हुए ि कहते हैं कि विश्वास करो, संसार में सत्य की ही विजय है । यद्यपि सत्यानुयायी को पहले पनेक प्राप लियां सहनी पड़ती हैं । सारा वैभव खोडना पडता है । परन्तु अन्त में उसी की सद्गति होती है । इस विषय में ब्राह्मण श्रुति में एक प्राख्यान बहुत प्रसिद्ध है -एक बार पिता प्रजापति से उत्पन्न प्रतएव प्राजापत्य नाम से प्रसिद्ध देवता भोर मधुर दोनों दायविभाग के लिए प्रजापति के पास पहुँचे । जिस वस्तु का यह दोनों विभाग करवाना चाहते थे, वह १ इस कथा का वैज्ञानिक रहस्य हमारे लिखे हुए शतपथ ब्राह्मण के 8 वें काण्ड के भाषा - भाष्य में देखना चाहिए । [ १७६ ]
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) १ ऐ ० आ ० २३६/२० । " विज्ञानाक्षरनिरूपण मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाय [ १७ ] व्यवसाय सत्य से प्राप्त होता है । उसी से आत्मा प्राप्त होता है । यही सत्य की विजय है । धनुत से व्यवसाय होता है । भात्मज्ञान का विरोधी, अव्यवसाय का मूल, यही अनृतभाव पराजन का मूलस्तम्भ है । इसी सत्य से देवयान मार्ग वितत है । देवयान- पितृयागादि का स्वरूप पूर्व के उपनिषदों में अनेक बार बतलाया जा चुका है, अतः उसका पुनः पुनः आम्रडन करने की आवश्यकता नहीं । सत्य नाम त्रयीवेद का है, यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । त्रयीयज्ञ उस सत्य का वितान है । इसीलिए-पनं कृत्वा सत्यं समवामहे यह कहा जाता है । अग्निरूप ऋक् से गार्हपत्य का सम्बन्ध है - यही पृथिवी-लोक है । वायुरूप यजुः से दक्षिणाग्नि का सम्बन्ध है - यही अन्तरिमलोक एवं प्रादिस्यरूप सामवेद से माहवनीय का सम्बन्ध है - यही दिव्यलोक है । दिव्यलोक ही देवयान है । इसका स्वरूप वितायमान .सत्य ( वेदत्रयी ) रूप यज्ञ से बना हुआ है । चूंकि प्राकृतिक देवयान सत्य से वितत है, अतएव जो विद्यासापेक्ष यज्ञकर्म करते हैं, वे ही वहाँ जा सकते हैं । सत्यने पन्था विततो देवयानः- का वैज्ञानिक परि-- भावानुसार यज्ञ से देवयान बना है, यही अर्थ है । जिस ( इस ) सत्यनिम्मित मार्ग से प्राप्तकाम ऋषि जाते हैं - वही सत्य का परम निधान है । देवयान द्वारा सूर्य्यलोक ( दिव्यलोक ) मिलता है । सूय्यं त्रयी-न है । त्रयी ही सत्य है । इस त्रयीसत्य की सत्यता उसी क्रमागत प्रक्षरसत्य पर निर्भर है । इसी के लिए-- सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ' - यह कहा जाता है । त्रयीसस्य सस्य - है - पक्ष रसस्य सत्य का भी सत्य है । अक्षरं ब्रह्म परमम् - के अनुसार प्रक्षर के लिए परम शब्व नियत है । यह परमा ( अक्षरसत्य ) उसी सत्य पर ( त्रयीघन सूय्यं सत्य पर ) प्रतिष्ठित है । दूसरे खण्ड के प्राररूम के मन्त्र में - स बेवेतत् परमं ब्रह्मधाम में इस विषय का विशद विवेचन किया जाने वाला है, मतः यहाँ केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि ऋषिलोग देवयान द्वारा जहां जाते हैं वही तस्व सत्य. का ( त्रयीसत्य का ) परमधाम है, प्रक्षरधाम है । तद्धाम परमं मम का भी यही अर्थ है । कहना यही है कि निष्कामबुध्या यज्ञ करने वाला ऋषि प्राप्तकाम बनते हुए, इस यशसत्य के प्रभाव से उस सत्यधन, सूय्यं को प्राप्तकर, सत्य के परमनिधानभूत प्रमृताक्षर को प्राप्तकर, उसके साथ सायुज्यभाव को प्राप्त कर लेते हैं । पाँचवें मन्त्र में तप का विवेचन था, इस छठे मन्त्र में इस सत्य का निरूपण है । प्राकृतिक नित्यग्रश भी सत्य है । त्रयीवन सूय्यं भी सत्य है । सत्य से निम्मित देवयान मार्ग भी सत्य है । . सत्यात्मा से सम्बन्ध रखनेवाला सत्य भाषण भी सत्य है । सत्ययश की प्रतिकृतिभूत वैषयज्ञ भी सत्य है । सस्यों से प्राप्त होने वाला सत्य का परमनिधान भी सत्य ( सत्य का सत्य ) है । इस सत्य का धनु-ज़मन करने वाले ऋषि भी सत्य हैं । इस प्रकार - सत्ये सर्व प्रतिष्ठितम् - इस निगम श्रुति के मयं का मली-मंिित समन्वय हो जाता है । यज्ञदानतपः कम्मं न त्याज्यं कार्यमेव तत् - इस भगवदादेश को अपनाते हुए सत्यरूप यज्ञतपदान नाम से प्रसिद्ध विद्यासापेक्ष निष्कामकर्म्मरूप सत्य का अनुगमन करो, सदा सत्य बोलो । ऐसा करने से आप्तकाम ऋषियों की तरह तुम भी वहाँ पहुँच जाओगे, जहाँ पर कि इस यज्ञ-सत्य का परम निधान ( अक्षर ) है - यही निष्कर्ष है । बिना यज्ञसत्य के, निवृत्ति कर्म्म के, विद्यासापेक्ष-कम्मं के उसे प्राप्त करने की प्राशा केवल दुराशामात्र है । क्या आपको -
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मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) -.. यह मालूम नहीं है? ॥ ६ ॥
१५० ] विज्ञानाक्षरनिरूपरण CHESTR FRE
" विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः पराहताः ।
न तत्र दक्षिरणायन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः " ॥
प्रतिकष्टसाध्य यज्ञ करो । सारे संसार का सुख छोड़ो । क्यों? आत्मा मिलेगा - सचिवानन्द-घन मिलेगा इसलिए | कब मिलेगा? जब शरीर टूट जाएगा तो आत्मा चन्द्रलोक में जाएगा । वहाँ से बडी दूर प्रतिष्ठित सूर्य में जाएगा, तब वहाँ तुम्हें वह मिलेगा । छठे मन्त्र में इसी क्रममुक्ति का निरूपण है । क्षमा कीजिए, हम ऐसे परोक्षविषय के प्रलोभन में पड़कर संसारसुख नहीं छोडना चाहते । कौन जाने, शरीरपरित्याग के बाद क्या होता है? इस निराशा को दूर करने के लिए ऋषि सातवें मन्त्र में विदेह - मुक्ति का उपदेश देते हैं । ऋषि कहते हैं कि निराश होने की प्रावश्यकता नहीं है, जैसे तुम इसी शरीर में रहते हुए, संसार का मानन्द लेते हो, वैसे ही जीवित दशा में ही तुम उसे प्राप्त कर सकते हो । दोनों ही मार्ग है । तुम्हारे सामने एक थाली में साधारण भोजन रखा हुवा है जो कि घोगी दूर पर है एवं एक थाली में विशिष्ट भोजन रखा है जो कि साधारण भोजन की अपेक्षा तुम्हारे समीप रखा है । बोलो, कौनसा पसन्द करते हो? झट तुम - धकें बेन्मषु विन्देत किमर्थ पर्वत वदेत् PROTR - कहते कहते हुए समीपस्थ विशिष्टभोजन की भोर प्रवृत हो, क्योंकि इसमें अधिक आनन्द है एवं समीप भी है । प्रच्छा तो अब सांसारिक विषयानन्दों को एक तरफ रखो एवं प्रात्मानन्द को एक तरफ रखो । एक तुम्हारे से बाहर है । एक तुम्हारे भीतर प्रत्यन्त समीप है । एक क्षणिकानन्द का कारण हैं । एक नित्यानन्द का कारण है । किसे लोगे? क्या दूर रखे हुए क्षणिकानन्दप्रद विषयानन्द को व पसन्द करोगे? कभी नहीं । हम जानते हैं तुम अपने समीपतम प्रधिक सुखप्रद श्रात्मानन्द की मोरगे । इस प्रकार इसी शरीर सत्ता में तुम उसे प्राप्त कर सकोगे । जब घनानन्द तुम्हें घपने पाप में यहीं मिल जाता है तो फिर सांसारिक विषयों की भोर दौड़ने की क्या प्रावश्यकता है? जैसे पृथिवी का साम रथन्तर कहलाता है, तथैव सौरसाम बृहत् नाम से प्रसिद्ध है । प्रारमय प्रतएव मक्षररूप सौर-साम बृहत् है, बहुत बडा है । सारा ब्रह्माण्ड उसमें समा रहा है । हिरण्यगर्भमूलासृष्टि को ही प्रधान मानने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि सूय्यं के ऊपर स्वयम्भू - परमेष्ठीरूप अमृत है । नीचे चन्द्रमा पृथिवी रूप मत्यंमण्डल है । दोनों में इस मध्याक्षर की व्याप्ति है । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् के अनुसार बह बृहत् ( व्यापक ) -अक्षर विश्व के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो गया है - बृहद्ध तस्यो भुवनेष्वन्तः, प्रजापतिश्चरति-गर्भे ० - आादि वचन इसी प्रथं को पुष्ट करते हैं । मध्याक्षर व्यापक है । वह सूर्य में प्रतिष्ठित है । इसलिए तो सौरसाम बृहत् ( व्यापक ) कहलाता है । पार्थिव अक्षर पार्थिव है । प्रान्तरिक्ष्य अक्षर मान्तरिक्ष्य है । परन्तु सौर अक्षर दिव्य है । क्योंकि सूय्यं को ही दिव्यलोक कहा जाता है । सातों रंग एक - दूसरे से परस्पर भिन्न हैं । उस सौर साम में सातों रंग हैं । उसका कौनसा रूप माने? सब उसी के रूप हैं ।
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gatives ( प्रथमखण्ड ) १ ग्रष्टव्य माण्युक्य उप ० । ३ ऋग्वेद मं ० ३।५३।६ | विज्ञानाक्षरनिरूपण मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माष्य 110 11 २ ष्टव्य मुण्डक पूर्वप्रकरण । [ १८१ ] उसका कोई नियतरूप नहीं बतलाया जा सकता, अतएव वह अचिन्त्यरूप है । रूप प्रत्यक्ष करने वाली चक्षु है । यह स्वयं उससे बनी है, वही तो चक्षु बनकर रूप देखता है । फिर उसके रूप को कौन देखे? इसलिए भी वह मचिन्त्यरूप है । जितने रूप दिखलाई देते हैं - सब भौतिक हैं । वह उन सब के भीतर है! सब रूप उस भक्षर के हैं उसका कोई रूप नहीं, इसलिए भी वह श्रचिन्त्यरूप है । वह प्रचक्षुः श्रोत्र है, लक्षण है, इसलिए भी प्रचिन्त्य है । सबसे स्थूल शरीररूप पार्थिव प्रश्नमयकोश है । इसके भीतर सूक्ष्म जल है । इसके भीतर तेज है । इसके मीतर वायु है । सबके मीतर प्राकाश है । यह प्राकाश-ति में ( सौर प्रक्षरसम्बन्धी अधिदेवत में ) परमाकाश कहलाता है, अध्यात्म में हृदयाकाश कहलाता है पांचों भूतों की अपेक्षा हृदयाकाश सूक्ष्म है । इससे भी सूक्ष्म दहराकाश है । इस सूक्ष्मतर दहराकाश में प्रतिष्ठित रहने वाला वह प्रक्षरतस्व तो धौर भी सूक्ष्म है, सुसूक्ष्म है, सूक्ष्मतम है । इसीलिए तो इसके लिए - एव सबेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते - यह कहा जाता है । सूक्ष्म सूक्ष्मतर सूक्ष्मतम ये तीन विभाग ' हैं । विषय स्थूल है । प्रपचोपशम ' नाम से प्रसिद्ध प्रात्मक्षर सूक्ष्म है । प्रक्षर सूक्ष्मतर है । प्रव्यय सुसूक्ष्म है " । प्रधान दृष्टि यहाँ अक्षर पर है - अतएव सूक्ष्मात् ( स्थूलविश्वापेक्षयाऽऽत्मक्षर: सूक्ष्मः सस्मादपि ) सुक्ातरम् - यह कहा है । वह प्रत्यन्त सूक्ष्म है, परन्तु विश्वास करो, इन्द्र द्वारा मिलकर सोपाधिक बनकर ' वही सर्वत्र प्रतीत हो रहा है । संसार के पदार्थों का मान होता है । नाम रूप - कम्मं तीनों में रूप ही मुख्य है क्यों कि भान इसी का होता है । यह रूपप्रतीति रूपं रूपं मघवा बोभवीति के अनुसार इसी इन्द्र की है । इन्द्र बिना अक्षर के नहीं रहता । इन्द्रप्राण सत्य है । प्रक्षर इस सत्य का भी सत्य हैं । प्राणाःथा सस्यम् । तेषामेवसस्यम् - यह कहा जा चुका है । सूक्ष्मतर सौर प्रक्षरइन्द्र संयुक्त होकर ही सर्वत्र प्रतीत हो रहा है । वह छुपा भी है- प्रत्यक्ष भी है । दूर भी है नजदीक भी है । अच्छा भी है - बुरा भी है । बृहत् सुक्म, समीप दूर, तिरोहित - प्रत्यक्ष सारे विरुद्धधम्मं उसमें प्रतिष्ठित हैं । इसीलिए तो उसके लिए संर्थधम्मोपपत्तेश्च - यह कहा जाता है । दूरात् सुतरे तबिहान्तिके व के यो धर्थ हैं । शरीर विका-रक्षररूप है । इससे दूर प्रात्मक्षर है । वह दूर से श्री ( आत्मक्षर से भी दूर है -परे है । शरीर से किट ( भीतर ) प्रात्मक्षर है । अक्षर उससे भी समीप है । अपि च - सूर्य्यं हम से 8 करोड़ मील दूर है । वह अंशर उससे भी परे है । सुय्यं से भी ऊपर प्रतिष्ठित है एवं वही सुदूरमक्षर मात्मरूप से सबकें भीतर प्रविष्ट है - इसलिए वह समीपतर है । इन सारे विशेषणों से बतलाना केवल यही है कि वह व्यापक है । कहीं उसका प्रभाव नहीं है । जब कहीं भी उस मानन्दघन का प्रभाव नहीं है तो फिर वह तुम से अलग कैसे है? देखो, ढूंढो, वह तुम्हारी मन्तर्गुहा में छुपा बैठा है । पुर जाने की आवश्यकता नहीं है । वही तुम हो, तुम्हीं वह हो । यहीं इसी शरीर में उसे प्राप्त करो । इसकी प्राप्ति का उपाय पूर्व में हम तुम को बतला ही चुके हैं ।