Mundakopanoshad — पृष्ठ 181–190
Mundakopanoshad · पृष्ठ 181–190
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानारनिरूप जिज्ञासु - पूछता है कि भगवन्! जिसको प्राप्त कर लेने से मनुष्य द्वन्द्वातीत होता हुआ नित्यान नन्द बन जाता है - उसे कहाँ ढूंढे? ऋषि उत्तर देते हैं कि यहीं, अपने शरीर में देखो । वह तुम से दूर नहीं है । अपने आप में उसे देखो । जिज्ञासु की साधारणा बुद्धि ऋषि के गहन घर्षमय वाक्यः कामखानी मन समझी । भट उसने शरीर के ऊपर अपनी चक्षुरिन्द्रिय डाली । इधर - उधर खुद ऐसा पाल्तु घारमा न दीखा । फिर पूछा भगवन्! आपने तो कहा था कि उसे यहीं अपने शरीर में देखो मैंने आपके प्रावेशानुसार उसे सब ओर शरीर के अंग - प्रत्यंग में खोज डाला, परन्तु वह नहीं मिसा भाब लाइए, उसे कैसे? कहां खोजूं, कारुणिक ऋषि उत्तर देते हैं कि है मोले शिष्य! - वह स् ( चक्षुरिन्द्रिय से, जिससे कि घटपटादि बाहर की वस्तुएं देखी जाती हैं ) नहीं दीखता है ही प्रति है । चक्षु ज्ञानेन्द्रियों का उपलक्षण है । वाक् कर्मेन्द्रियों का उपलक्षय है । व्यास के अनुसार इन्द्रियों का रुख बाहर की शोर हैं । उसे हमने भीतर गुहानिहित बनाया है - प मला, जिन इन्द्रियों का रुख बाहर की घोर है - उनसे तू उस प्रन्तः प्रतिष्ठित धात्मतत्व को कैसे देखा है सकता है? वह इन्द्रियातीत है । उसको देखने की आंख स्थूलचक्षु नहीं पितु, मला वोलिक हिसाब पशु है । सं विज्ञानेन परिपश्यन्ति घोराः के अनुसार अपने विज्ञान को इन्द्रियानुयोगिता से का धात्मानुयोबिक बनाओ । उससे इसे देखो । विज्ञान से देखो, न कि इन्द्रियों से । न वह अन्य विबताकों से देखा जा सकता है, न तप से प्राप्त किया जा सकता है, न कम्र्म्म से प्राप्त किया जा सकता है ये शान - कल उपासना उसकी प्राप्ति के तीन उपाय है । कर्मकाण्ड त्रिगुणभावापद्म वेद से सम्बन्ध रखता है । वंश प्रपा ही कर्म्मकाण्ड है । यज्ञ में त्रयीवेद से काम लिया जाता है- क्योंकि यी पर ही देतान ष्ठित है । इस प्रयीयज्ञ को संपन्न करने वाले - अष्वर्य, होता, उद्गाला, बह्या नाम से प्रसिद्ध सा होते हैं । ऋग्वाक् का अनुवचन ' होता ' करता है । सामवाह का नाम ' उमाता ' करता है एवं सा प्रयोग - ' अध्वर्यु ' करता है । यजुः सम्बन्धी ' बाध्वर्यव कम्मं ' ग्रह ' नाम से प्रसिद्ध है । हमें की कर्म्म ' शस्त्र ' नाम से प्रसिद्ध है एवं सामसम्बन्धी मोदगार कम्मं ' स्तोत्र ' नाम से प्रसिद्ध है । तीनों यजुः - खाम वाङ्मय हैं । एक ही वेदवाक् श्रेधा विभक्त है; अतः तीनः ऋत्विक होते हैं । इसम निरीक्षण करने वाला चोया ' ब्रह्मा ' होता है । वह चूंकि निरीक्षण करता है प्रतएव उसे इस डा मय यज्ञ का ' वस्तु ' कह सकते हैं । अध्वर्यु होता ब्रह्मा तीनों वाक्यी के अधिष्ठाता है । अतः व की ' बा ' कह सकते हैं । इस चक्षु घोर वाक् से ( तत्स्थानीय चारों ऋत्विजों से ही यशनका स्वा बनती है । ऐसे चसुवाङ्मय कर्म्म से ( प्रवृत्तिरूप कर्म्मकाण्ड से ) मी वह प्राप्त नहीं किया जा सकता है--" चक्षुषा वाचा च युक्तेन कर्म्मणा स ग्रहीतुं न शक्यते " । कम्मं के बाद है - उपासना । मध्यपतित उपासना प्राणमयी होने से ' तप ' नाम से प्रसिद्ध है । उपासना में उपास्य और उपासक ये दो होते हैं । उपासना करने वाले का व्यापार तप है --- जिसकी उपासना की जाती है, वह देवता है । उपासना काण्ड का देवता से ही सम्बन्ध है, यह पूर्व में कई कहा जा चुका है । बस, देवयुक्त तप से, भर्थात् उपासनायोग से भी काम नहीं चल सकता है -[ १८२ ]
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( ख ) " न तपसा धपि न शक्नोति प्राप्तुम् " । fararefre यहाँ कम्उपासना से प्रवृत्तिमूलक कम्मंउपासना अभिप्रेत है । प्रवृत्ति से वासना होती है । इससे प्रावरण अधिक बहता है । शुद्ध होने की घपेक्षा प्रवृत्तिजन्य वासना से सत्त्व उलटा भषिक मलिन होता है, अतः ऐसा तप ( कम्मयी आसक्तिमूला उपासना ) निरर्थक है | ऐसा कम्मं भी निरर्थक है । यहाँ के तप - कम्मं को प्रवृत्तिप्रधान ही कहेंगे क्योंकि प्रवृत्ति हो मलिनता का कारण है, तप भोर कम्म नहीं । यदि ऐसा न होता तो -सत्येन सम्यस्तपसा ह्येष श्रात्मा - इस प्रकार तप को श्रात्म - प्राप्ति का श्रतएव ज्ञानमय प प्रभिप्रेत है । एवमेव FE कारण कमी. नहीं बतलाया जाता । वहाँ तप से निवृत्तिमूल चोये मन्त्र में भारत को क्रियायानेच ब्रह्मविदां परिष्क - इत्यादिरूप से कम्र्मयोगी बतलाया हैं । कम्मे को साधक माना है । ऐसी धवस्था में श्रुतियों की एकवाक्यता के लिए यहाँ के तप - कम्मका यं प्राकाम्य उपासना- प्रवृत्तिमूलक काम्यकम्मं ही करना चाहिए । पूर्व के कम्, तप का निष्काम-कम्पं, निष्कामतप ही अर्थ समझना चाहिए । ऐसा कम्पं ऐसी उपासना शानयोग ही हो जाते हैं । प्रवृतिमूलक कम्मोपासना से वह नहीं मिलेगा - अपि तु ज्ञान प्रसाद से ध्यानयोग करता हुआ विशुद्ध सस्य बनकर देख लेता है । 1. ' ' मन - प्रात- याद ' - ये पात्मा की तीन कलाएं हैं । मन ज्ञानप्रधान है । प्राण क्रियाप्रधान है । वा मप्र । वाक् भूतप्रपद है । क्रिया देवप है । ज्ञान मात्मा है । ग्रात्मवैवतानि हो मन - प्राण - वाक् कहो, ज्ञान- किया धर्म कहो, एक बात है । भास्मदेवतगमित ( ज्ञानकियागमित ) भूतः को सम्बन्ध काण्ड से है । दूसरे शब्दों में कम्र्मकाण्ड भूतप्रधान है । आत्मभूतगभित देवता के साथ उपासनाकाण्ड का सम्बन्ध हैं एवं देवतभूतमित arear के साथ airna का सम्बन्ध है । कर्मकाण्ड कम्मे है, उपासनाकाण्ड सप है एवं ज्ञानकाण्ड ज्ञान है । ज्ञान का मन से सम्बन्ध है, ध्यान से सम्बन्ध है । तप का बेड़ानों से सम्बन्ध है एवं कम्पं का वाकूरूप भूत से सम्बन्ध है । दोनों में ज्ञान को अलग कर दीजिए, क्योंकि उस भ्रसंग में प्रवृति का असर ही नहीं होता । बाकी बचते हैं - घोप । ये यदि प्र हैं तो वासना से कम्य बन जाते हैं । इनसे मलिन हो जाता है । इन्हीं के लिए. ऋषि निषेध करते हैं । यदि इनमें से प्रवृत्ति हटा की जाती हूं तो ये ही दोनों ज्ञानयोगवत् उपादेय बन जाते-हैं क्योंकि वासना हटने से वास्तव में यह ज्ञानयोग हो जाता है । वासना भेंद का मूल है । भेद नानाकल हैं, यह निष्कल है । निष्कल को प्राप्त करने के लिए पहले विष्कल बनना आवश्यक है । एतदयं कामना का परित्याग अपेक्षित है । कामनामय कम्मंयोग, कामनामयी उपासना छोयो एवं निष्काम कर्मयोग, fronterrent उपासना योगरूप ज्ञान प्रसाद से विशुद्धसत्त्व बन कर स्वयं निष्कल बनते हुए उस निष्कण को ध्यान से - ज्ञानचक्षु से देख लो जब तक इन साधनों से तुम उसे नहीं देखोगे, तब तक तुम
उसके रहते हुए भी उसे नहीं देख सकते यही निष्कर्ष है ।
॥ ८ ॥
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तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) ause पनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानाक्षरनिरूपण जिस आत्मा को यह उपासक प्राप्त करना चाहता है - वह आत्मा केवल शुद्ध सस्थ से ही प्राप्त हो सकता हूं । मलिनसत्त्व मन कहलाता है । शुद्धसत्त्व चित्त कहलाता है । आध्यात्मिक सारे अंशात्मक चिस उस अक्षरात्मा में ओतप्रोत रहते हैं । इसी अभिप्राय से-" स्मश्चित्तं सर्वममेतं प्रजानाम् " । " - इत्यादि कहा जाता है । उसी अक्षरात्मा में ( षोडशी पुरुष में ) प्राण - प्रापः वाक् - अन्न - धनाद नाम से प्रसिद्ध पाँचों प्राकृतप्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । स्वयम्भू प्राण ऋषिप्राण है । वहीं प्राणादि पांच रूप धारण करके स्वयम्भू मादि पांच स्थानों में प्रतिष्ठित होता है । वह एक आत्मा धरातल है । उस पर स्वयम्मू प्रादि पाँच प्रवयव प्रतिष्ठित हैं । पाँचों में एक ही ऋषि प्राण प्राण, आपः आदि नाम धारण करता हुमा पाँचों में क्रमश: प्रतिष्ठित हो रहा है । इस प्रकृत मन्त्र में ऋषि ने प्राण की पञ्चीकरण प्रक्रिया बतलाई हैं । इन पाँच प्राणों के प्रतिरिक्त इन्द्रियप्राण और बोर हैं । पाँचों प्राकृतप्राण, बसों इन्द्रियप्राण एवं प्राणापानादि पांचों वायव्यप्राण सबका आधार चित्त ( मन ) ही है । कैसे है? इसका उत्तर मनोऽबिसेमायास्यस्मिन्छरीरे - इस वाक्य के अर्थनिरूपण में प्रश्नोपनिषत् में बडे विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । अनेक प्राणयुक्त प्रजाधों का चित्त उसी में डूबा हुआ है । सबका मृगव प्रतिष्ठा, परायण वही है । ऐसे सर्वाधार उस विशुद्ध ( असंग - शुभ्र ) मात्मा में यदि वह विशुद्धसत्य जीव चला जाता है तो - यथोदकां शुद्धं सुद्धं तानेव सथति के अनुसार यह जीव उसमें विभूत हो जाता है, अर्थात् ईवातीत हो जाता है ॥। १ ॥ सौर प्रक्षर से परामुक्ति होती है - यह बतलाया जा चुका है । उसे काम लोक नाम से प्रसिद्ध ोकमहिमलोक प्राप्त होता है । विशुद्धसत्व विद्वान अपने मन से जिस - जिस लोक की कामना करता है एवं जिन - जिन लोकस्थ कामनाथों को चाहता है, वह उन - उन सोकों को, लोक की वस्तुओंों को, प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है । विभूति चाहने वाले को सदा ऐसे आत्मश की पूजा करनी चाहिए । ॥ १० ॥
॥ इति तृतीयमुण्डके प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥ ॥१ ॥
१ यजुर्वेद ३४।५ । २ प्रश्नोप ० ३।३ | [ १८४ ]
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अथ तृतीयमुण्डके-परामुक्तिसाधकाव्ययविशिष्टमहदक्षरनिरूपणात्मका द्वितीयः खण्डः २
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तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः स वेवैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् । उपासते पुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयमित कामाः ॥ २ ॥
मायमात्मा - प्रबोधनेन लभ्योन्न मेधयाः नाम्बहुना मुना मे तेनाध्यवस्यैषामा विवृणुते सनं स्वयम् ॥३ ॥
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तरमाविशते ब्रह्म पाम ॥४ ॥
संप्राप्य ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः । ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥५ ॥
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्म-लोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे || ६ ॥ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्व आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥
यथा नद्यः स्यन्वमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वानामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ६ ॥
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garness ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य मदक्षरनिरूपण सयो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याग्रह्मवित्कुले भवति तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ १ ॥
सतच म्युक्तम् । क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षि श्रद्धयन्तः । तेषामेवंतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवचैस्तु चीर्णम् ॥१० ॥
तबेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नंतवचोरव्रतोऽधीते नमः परमऋषियो नमः परमऋषिभ्यः ॥११ ॥
॥ इति तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः रिफ्रेस्सुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धभवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यों ग्ररिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्वधातु " ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ इति मुण्डकोपनिषत्समाप्ता ॥ [ १८० ]
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प्रथ तृतीयमुण्डके -परामुक्तिसाधकाव्ययविशिष्टमहदक्षरनिरूपणात्मको द्वितीयः खण्डः [ ( विज्ञानमय ] पूर्व के प्रकरणों में जिस सत्यतस्व का ( प्रक्षर - तन का ) विरूपण किया है, यह सार तत्व कहां रहता है? उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है? एवं प्राप्त हो जाने पर श्रीस्था की क्या दशा होती है? बस, इस द्वितीयखण्ड में इन्हीं तीन प्रश्नों का समाधान किया है. + एवं उसका ज्ञान इन दो भागों में सत्यविद्या विभक्त है । तीसरा मुण्डक इन्हीं दो विषयों का प्रधानरूप से निरूपण करता है । प्रथमखण्ड में सत्य का निरूपण है । द्वितीय में प्राप्त्युपाय है । प्राप्य की कही प्राप्त करें? इस जिशाला को शान्त करने के लिए निम्नलिखित प्रथम मन्त्र हमारे सामने माता है *. " स देवैतत् परमं उपासते पुरुषं ये ब्रह्मबाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभम् कामास्ते शुक्रसेतवतिवर्तन्ति पीरा * frre -इस मन्त्र में ब्रह्मधाण मौर शुरू, ये दो पदार्थ विशेय हैं । इनमें शुक्र का निरूपण इसोपभिर्वेद के पटना -- इत्यादि मन्त्र में विस्तार के साथ किया जा चुका है, भतः इसके वि कहकर ब्रह्मणाम की घोर ही विशेषरूप से प्रापका ध्यान प्राकर्षित करते हैं । प्रश्नोपनिषद के प्रकार-निर्हरणात्मक पाँचवें प्रश्न में जिस विषय का निरूपण किया गया है, आज हम यहाँ उसी का दूसरे सभ्यों मैं निरूपण करेगे । विषय सर्वत्र समान है । केवल कथन - प्रणाली के भेद से ही मनन्त उपनिषद हो गए हैं ' । मिन्न - भिषं भाषायों ने एक ही प्रात्मतत्त्व का भिन्न - भिन्न स्वरूप से निरूपण किया है । ऐसी अबस्था में यदि हम एक ही विषय का प्रकारान्तर से अनेक बार निरूपण करें तो इसमें कोई प्रति ' नहीं की जा सकती । सृष्टिविद्या का निरूपण तीन प्रकार से किया जा सकता हैं । " स्वयम्भू से सृष्टि-क्रम बतलाना पहला प्रकार है । इसी का नाम ब्रह्मबिया है । पृथिवी से सृष्टिक्रम बतलाना दूसरा प्रकार हूँ । वहीं प्रणवविद्या है । सूर्य से सृष्टिक्रम बतलाना तीसरा प्रकार हैं । यही उद्गीर्ष विद्या है । इसी को हिरण्यवर्मवित्वा कहते हैं । हमारे इस प्रकरण में तीनों ही विद्याधों का समविश है । परन्तु तीनों में से सारा विषय ' हा प्रधानता हिरण्यगर्भविद्या की ही है । पुरुष और प्रकृति के संयोग है । पुरुष पीर प्रकृति दोनों ही दो - दो प्रकार के हैं, अतएव इनके संयोग से उत्पन्न होने वाली सृष्टि के भी दो ही भेद हो जाते हैं । पहली सृष्टि धनस्था सृष्टि कहलाती है । दूसरी सृष्टि धस्या कहलाती है । दोनों की समष्टि विश्व कहलाता है । जगह रोकने वाला वाङ्मय स्थूल पदार्थ ग्रत्ययी है । ' संसौर में जिसने भी भूत हैं, सब पञ्चीकृत महाभूतमय हैं । पृथिवी जल - तेज- वायु - आकाश की समष्टि भूत है । इनमें माकाश वाक् है । यही उत्तरोत्तर होने वाले ग्रन्थि बन्धनसम्बन्ध से पांच स्वरूप धारण कर लेती है, [ १८ ९ ]
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garnues ( fata ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदक्षरनिरूपणा धतएव भूतप्रपञ्च का वाक् शब्द से ग्रहण किया जा सकता है । यह वाक्तत्त्व घामच्छद है । इसका मूल प्रविप्राण है । ' यह चूंकि स्थूल है - घन है, मतएव वैदिक परिभाषा में यह तब ही बला नाम से प्रसिद्ध है । भूतमय वाक् के भीतर क्रियारूप प्राण है । प्राण के भीतर ज्ञानमय मन है । ये दोनों तत्त्व अर्पणादव और प्रथम है ये जगह नहीं रोकते की क्रिया बसमा सीनों एक बम की भवस्थाएं हैं । उम्मुग्धरूप बल है । कुर्वद्रूप बलप्राण है । निर्गच्छत् बज़क्रिया है । तीनों प्रषामच्छद हैं । क्रिया अर्थ में रहती हैं । म्रर्थं धामच्यद हैं । तदन्वत क्रिया है । क्रियाधार प्राण - प्राणाधार बल - बलाधार ज्ञान मी अधामच्छुद हैं । विश्व में ज्ञान, क्रिया, अर्थ तीन तत्त्व हैं । तीन तत्व क्या है बीतों की सममिष्टि-ॐ हैं । इनमें किया प्रषामन्यव होने से धनस्था है । वाङ्मय धामच्छद होने से स्विन्बो ' है । दोनों की समष्टि विशेष है । सावतन - तस्व प्रस्थन्वा है, वहीं पर्य है । ' यहाँ बाहे निरायतनन्तस्य धनस्या है । वही ज्ञान क्रिया है । यही मन - प्राण हैं । 21 T प्रत्येक पदार्थ में आत्मा शरीर दो भाग होते हैं । विश्व धारमन्त्री है पानी प्रजापति लाठ्या हं । प्रजा उसका शरीर है । मारमा अनस्था है । शरीर स्यन्वात् है F है । शरीर है । केन्द्रस्थ तत्व प्रात्मा है । यह मनस्या है वह प्रस्थन्वान् है । इस प्रकार अस्थन्या धनस्थाभेद से शरीर - धारणा इन यो भागों में सृष्टि विभत हो जाती है । कुम्हा संत्वना बताताईहै । एस घटनिर्माण में चार बाते हैं । यूमि घाघार है । मिट्टी उपादान है । कुम्हार निमित है! बोबा कुम्हार का व्यापार है । बारों के समन्वय से घट की उत्पत्ति होती है । ये चारों सृष्टि के साधारण मनुबन्ध हैं । कोई भी सृष्टि * झा अपेक्षित हैं । यहाँ हमें धस्यत्वास्या एव वो वृष्टियों का विवाह करना है । दोनों * प्रतएव दोनों में इन वादों भावों का विचार करना -मावश्यक है महले -- प्रावस्था आत्मसृष्टि को ही लीजिए । इसका प्रालम्बन प्रमुख है । है । -- निमित अक्षर है । व्यापार प्राणव्यापार है । पुरुष प्रकृति के समन्वय से प्रती ग्रह सृष्टि आवरूपा है । वेदरूपा है । हमने पुरुष को प्रात्मयोनि- बाबा रोष्ठी-सूर्य चन्द्रमा पृथिवी ये पांच विश्वावयव हैं । पाँच पिष्ट हैं । पाँचों में ( पांचों के केद्र में ) पनि सात्मा - सांडों - प्रात्मम अनुस्था हैं । इनकी सृष्टि भव्ययपुरुष और सरप्रकृति के योग से आधार को अधिष्ठान कहा जाता है । उपादान को प्रारम्भ कहा- जाता है । देव में ..उपादान के लिए यही कके शब्द माया करते हैं । यत्मसृष्टि का विष्ठात प्रणययपुरुष है नीय है कृति प्रारम्भण है । यह मृत्स्थानीय है । प्रक्षर निमित्त है । यह हुई र या भूमि-है । वामा - वह है । उपादान इन पांचों मात्मानों का क्षर है,: प्रतएव इन पाँचों को इस घर कहेंगे - राहों, देवरूप 1 ← है, क्योंकि पांचों में मूलाधार स्वयम्भू का पात्मा है । वह वेदमग्र है । वेदमय ब्रह्मा अपनी-- बाकू - पत्र प्रसाद इन पञ्चीकृत पांच कलाटों को ही स्वयम्भूः परमेष्ठी सुय्यं चन्द्रमा पृथिवी इन पांचों के अरमानों का उपादान बनाते हैं । ये पांचों चूंकि वेदरूप हैं । देव को कहा जाता है हम कह सकते हैं कि पुरुष प्रकृति के संयोग से अक्षर द्वारा जो अनस्था - सृष्टि हुई, वह क्या है - सही महात्मा है । यह महादेव है । F5 1 १ द्रष्टव्य शत ० ० E = RE ]
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( द्वितीयखण्ड ) ज्ञानभाष्य महानिरूपण अब लिए प्रस्थ वासृष्टि की प्रोर । भूतसृष्टि - मैथुनी सृष्टि प्रस्थन्या है इसका प्रविष्ठान घागरा हैं । आ समय शृणु है । अंगिरा योनि है । मृत्यु देता है है अंगिरा भक्ति है । दूर लोग है । दोनों के समन्वय से मैथुनीसृष्टि होती है । पिण्डसृष्टि श्रम्निवोमरूप भृग्वङ्गिरामयी है इसीलिए तो अम्मी-वोमात्मकं जगत् - यह कहा जाता है । भृगुअंगिरा की समष्टि प्रथर्व है । यही सुब्रह्म है चमत्कार है । मैथुनी सृष्टि का मूल भृम्यङ्गिरा की समष्टिरूप सुब्रह्म ही है । परन्तु! सुब्रह्य तब तक सृष्टि करने में है, जब तक कि वह उस अनस्थाह्य का सहारा न ले । धनस्थ स्वत से धनस्था-सृष्टि का मूल बनता है । सृष्टि का मूल बनता है एवं यही सुब्रह्मरूप प्रस्थन्या मैं बाहुक होता है । इस क्रम विष्ठान ब्रह्म है, धारम्भरण सुब्रह्म है । दोनों के समन्वय से जो एक स्वरूप उत्पन्न होता है उसी का नाम शुक्र है । चूंकि यही वन्वा विश्व का उपादान है । प्रजोपादानद्रव्य शुक्र कहलाता है, अतएव हम इसे शुरू कहने के लिए तुम्पार हैं । शुक्र में दो वषिष्ठाम । दो प्रारम्भरण हैं । एक अधिष्ठानारम्भण सहकारी है । एक प्रधान है । शुद्धब्रह्य ( पुरुष - प्रकृति संयोगरूप ) ग्रात्मयोनि । ब्रह्म सुब्रह्म विश्वयोनि है । वह मनस्सृष्टि का गुरु है । यह स्पन्यासृष्टि का मूल है । भ्रात्मशरीर इस उमयविधसृष्टि के इसी स्वरूप का निरूपण करता हुआ वेद कहता है--DIFIE Tx + # pa } - = FWS निविष्ठानमा रम्नं कश मत् स्थित् बरसीम -यतो भूमि जनयन् विश्वकर्माको - इस प्रश्न श्रुति का पूर्वोक्त प्रपञ्च ही समाधान है ---१ - अनस्था सृष्टि: = भावसृष्टि: - प्राकृतिकी सृष्टि: } हत्या " F २ -- अस्यन्दा सृष्टि: == मैथुनीवैकारिकीष्टि Pateotis PRITH = अनस्था, आलम्बनरूपा SES शरीरसृष्टिः = अस्यन्वा, मालम्बित पा १ ऋग्वेद मं ० १० / ६१।२ । Fire | सृष्टि:= -! -----इत्याह
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तृतीयद्वितीयखण्ड ) मनः ज्ञानय कुल याकाण मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदक्षरनिरूपण } --पनस्था ग्रात्मसृष्टिः तस्माद वा एतस्मादात्मन शाकाशः .. d ' ब्रेज I पृथिवी -ममस्था सृष्टिः--- बाह्यर्थः अस्यन्वा शरीरसृष्टिः समर्थ विश्वम् १- श्रधिष्ठानम् अव्ययपुरुषापासम्बनम् १- प्रादयतिरपरागत F- विचितम् -- परप्रवृति: परा - निमा १ - सस्यन्वा दृष्टि: ---१ - खचिष्ठानम् - संगित - बासम्बनम् रे - वारम्भयम् भृगुः उपादानम् - रेसः 1 - विविराम्यतरः = निमित्त: ------ अक्षरः १ - सादृष्टिः - आत्मयोगि: -तत्र-अधिष्ठानम् - अव्ययपुरुषः } --+ समन्वयात् शरीरसृष्टि रभ- कृत: --समन्वयात् ब्रा ( वेद ) उत्पतिः निमित्तम् --- अक्षरशकृतिः [ 18 ]