Mundakopanoshad — पृष्ठ 191–200
Mundakopanoshad · पृष्ठ 191–200
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तृतीय ( द्वितीयखण्ड मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य महारण १- सृष्टि: शरीरापोनिः तत्र -सहका • अधिष्ठानम् = अव्ययपुरुषः # 1 घारूषणम् = क्षरप्रकृतिः निमित्तम् अक्षरप्रकृतिः -समन्वयात् = सृष्टिः । सब प्रधाना व ब्रह्मसृष्टिः सत्र ---{ -uftony = diftra; = utft: र - वारम्भणम् = भृगुः = = रेतः ३- निमित्तम् = → समासे । ferenities [ == सक्षरः = प्रक्षरः सुषा ही मैथुनी सृष्टि का मूल है । ब्रह्म मात्मा है । पृथिवी जलादि प्रांतों भूत विश्व है । इनका धूल सुब्रह्म है । परन्तु बिना ब्रा का सहारा लिए यह सृष्टि संग है । ब्रह्मवि ( e ) हा ही मैथुनी सृष्टि करने में समर्थ होता है । इसीलिए -तस्मात् वा एतस्मादात्मन शाला सम्युतः । प्राकाशाद् वायुः । वायोरग्निः । अदृश्यः पृथिवी ' - यह कहा जाता है, अस्यन्थान रूप विश्व एवं पथस्थारूप आत्मा, दोनों की समष्टि ' प्रजापति ' है, यह एक प्रकार की सृष्टिविधा है । दक्ष स्वयम्भू बेवरूप ब्रह्म को उपकर मानकर सारी सृष्टि का निरूपण किया है अतएव इसे हम पूर्वोक्त तीनों प्रकारों में से पहला ' ब्रह्मविद्या ' नाम का प्रकार मानने के लिए Aj दूसरा प्रकार है- पृथिवी को उपक्रम मानकर सृष्टि का विचार करना । यही प्रभवविधा है । पृथिवी वाड्मय है । इस प्रकार १५ तक ' आपःस्तर ' है । २.१ तक ' तेजःस्तर ' ही परत मापःस्तर है । ४८ तथा युनः वाक् - स्वर तक पृथिवी पुरुष - प्रकृति के समय से इसको मारमा बना है, अङ्गिरा - भृगुरूपयोनि रेत के समन्वय से क्योंकि आत्मयोनि ये ही दोनों है एवं है, क्योंकि पिण्डयोनि यही सुब्रह्म है । पृथिवी में पुरुष का वाकुभाग हैं । इसलिए तो यह वाही है । प्रकृति का बन्नाभाग है इसलिए अन्नादमयी है । दूसरे शब्दों में श्रात्मापेक्षया वाङ्मयी है । पिण्डापेक्षया अन्नमयी है । १५ वें अहर्गण तक अन्तरिक्ष हैं । चन्द्रमा का इसी में अन्तर्भाव है! चात्मक अन्तरिक्ष का त्याग प्राणवारूप है, क्योंकि यहाँ अव्यय का प्राण वागभाग उल्हण रहता है | शरीरभाग ' अन्न ' है । ऊपर २१ तक सौरमण्डल है । यह आत्मापेक्षया मनःप्राणवाङ्मय है. क्योंकि चिदात्मा १ से सिरीयोप ० २।१।१ । [ ६३ ]
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द्वितीयखण्ड ) पुण्यकोपनिषद्विज्ञान भाष्य १- पृथिवी-२- चान्यान्तरिक्षम् --हरीया R- शास् शरीरापेक्षया सुपा - वा पेपर प्रणय [ ter ] र 1 Fappy B क mu arth वयव के सृष्टिसाक्षीरूप मन - प्राण वाक् तीनों यहाँ ही उल्बण रहते हैं । शरीरमा चाह है कपुर ३१ तक परमेष्ठी है । यहाँ का आत्मभाग प्राणवाक् है | शरीरभाग ' आप ' हूँ । ऊपर ४६ तक स्वयम्भू है । यहां का चात्मभाग वाक् है । शरीर प्राणमय है । ऋषि कहते हैं कि पृथिवो को वाक् समझो । इसके रसर है । ऊपर आपःस्तर है । सर्वान्ति में मुकास्तर है - यही विश्व का स्वरूप है । यही प्रणय विद्या है । ब्रह्मविद्याधार सृष्टि का संपरक्रम से सम्बन्ध या । इस प्रणवविद्याधार-सृष्टि का प्रतिसम्बर कम है । स्वयम्भूब्रह्म से पृथिवी तक माना यह सबर है । वही ब्रह्मविद्या है । पृथिवी से स्वयम्भू तक जाना प्रतिसम्बर हे यही प्रणव विद्या है । ( १- बात्मा - वाड्मय पुर्वपापेक्षया पृथिवी वावी हा नवी पृथिवी दाद ( २ - शरीर - मनादमयस्- शरीरापेक्षया- मन्नादमयी- सुब्रहा कृषिपी अमिका १ - आत्मा - प्राणवाङ्मय = पुरुषापेक्षयान्स रिक्षं प्राणवाङ्मयः । ब्रह्ममय मन्तरिक्षम् वाक्प्राणो “ १ - वात्मा - पण. प्राणवाङ्मयः- देवालया द्यौः मनः प्राण बाङ्मयम् । ब्रह्ममयः म ० ० प्रा वा ० १- बात्मा वाड्मयः पुरुषापेक्षया स्वयम्भू वाङ्मयः । ब्रह्ममयः वाक् २- शरीरम् प्राणमयम् = शरीरापेक्षया प्राणाः । सुब्रह्म - प्राणमयम्
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( द्वितीयखण्ड मुण्डनमाध्य उपक्रम है + उसके ऊपर रिक्षा है । उसके ऊपर है । हु के काग मार “ मं व हि । स्वयम्भू - परपठी - मयां मे तीनों प्रम -यही है । कृष्ण के बहार इस मर्त्य है । यही परापर प्रजापति कोनों की साटिएका पति है । पति का प्राक नहीं है । इसका कहलाता है, भतएव इस प्राजापत्य चोंकार को हम प्रथबॉकार कह सकते हैं! पृथिवी धन्तरिक्ष ' उ ' है एवं मर्त्यसूम्यंरूप यो ' म् ' है । तीनों मात्रा मर्त्या हैं । इन्हीं के लिए प्रोषवि में तिलो मात्रा मृत्युमध्यः प्रयुक्ताः- यह कहा गया है । ऊपर का धतभाग है । यद्यपि प्रो-पनिषद्विशान भाष्य में हमने पृथिवी -न्तरिक्ष - यो को मृ यो - सोम् बतलाया है । पुषार्थ में हूँ भी ऐसा ही । परन्तु उपनिषदों में सर्वत्र म् - उ - म यह क्रम माना है । परन्तु वही बोधम् - यही क्रम माना है । कहना यही है कि यह प्रणव विद्या है । इससे भी सारा सृष्टिरहस्य झत हो जा-१ - स्वयम्भू २- परमेष्ठी → ममात्रा परग्रहा यो: -मसूय्यं ४- अन्तरिक्षम् → एसईई प्रापरं च महाप ( ब ) " कार " ५- पृथिवी - यह दूसरी है । बकरी मंत्र सूके का विचार करना हिसाग किया चैव तचागीय में है सतस्त्र व पी का पलड में कहा जाता है । विश्व समृत सत्यं समुत - सा का परिचायक है--त होता तो परापर ब्रह्मरूप विकास १ शत ० ब्रा ० १०३1३1२ । २०५६ । [ *** ]
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1 1 ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदारनिरूपण माता है परन्तु सूस्य उद्गीय है, न कि प्रणवस असव ' उ ' क्रमस्थानीय है । वह तो पृथिवी हो पंत एक इसे प्रणव विद्या न कहकर ' उद्गीथविद्या ' कहा है । सूर्य को केन्द्र मानकर ऊपर वहाँ परमेष्ठी स्वयम्भू मिलेंगे । ' नीचे पाथो, वहाँ मस्र्यत्रिलोकी मिलेंगी । इस उद्गीय सूर्य के एवोकार के उद्गीथ और प्रणब दो भेद हो जाते हैं । एक ओम् के दो मोम हो जाते यह दोनों उद्गीथ प्रमद नाम से प्रसिद्ध हैं । मयोपक्रमस्थानीय पार्थिवीकार ' है अतो-मानीय सोई प्रकार उद्गीय है दोनों का निम्नलिखित स्वरूप है । बॉडी धनुतात्मा सदमात्रा १ - स्वयम्भूं 5 हरेरुपरमेष्ठी = ३- अमृतसूर्य मु उ + प्रमृतोपक्रम स्थानीय उयुगीयोंवार ' शोम् ' – ' उद्गीथविद्या ' 23 १- षोडशीविशिष्ट स्वयम्भू - परमेष्ठी - अमृतसूय्यं भर्द्धमात्रा १ - योः ( मत्सूर्य ) तर n ३ - पृथिवी= = T म् उ भ यमस्वामीयप्रणवहारः ' प्रणव faar ' एक प्रणव प्रकार - एक प्रक्षर है । एक विश्व का एक अक्षर होता है । उसमें मत्यं - अभूवमेव पुनः धारण कर लेता हैं । इसी विद्या को से दो प्रक्षर हो जाते हैं । वही अक्षर उपाधिभेद से दो स्वरूप बतलाने के लिए प्रणव श्रौर उद्गीथ दो मोंकार बतलाए जाते हैं । वस्तुतः पृथिवी से स्वयम्भू तक एक विश्व है । उसका एक प्रोंकार है । यही नोंकार अक्षररूप परमब्रह्म है । व्यय परब्रह्म है । क्षर हूँ । अक्षर - धक्षरं ब्रह्म परमं के अनुसार परमब्रह्म है । यह पारिभाषिक संकेत पूर्व में कई बार बतलाए परब्रह्म जा चुके हैं । बस, घस्यन्वान् पञ्चावयव विश्व ही उस अक्षरब्रह्म का धाम है । सारा विश्व उस परम का घाम है, प्रतएव वह ब्रह्मघाम भी परमधाम ही है । इस अक्षरस्थान के लिए वियंधाम - परमधाममाधान तीनों शब्द आया करते हैं । वही प्रक्षर सत्यतत्त्व है । यद्यपि प्रक्षर सर्वव्यापक है, परन्तु भव्ययविशिष्ट कॉट विकास हिरण्मय मण्डलस्थ सूय्यं में ही होता है मतएवं इसके लिए हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्या-कहा जाता है । यहीं मक्षरसत्य ( सौर उद्गीथतस्य ) परम उपास्य है । जिसकी कि धीम विपर्व है । हिमये परंतु से उसी सत्यक्षिर का , निरूपण चला है । अन्त तक उसी का निरूपण केंद्र में सारा रहता है । यह सौर संत्याक्षर केन्द्रस्थानीय हैं, भतएव इसमें हम सारे विश्व की प्रतिभासित देखते हैं । इसीलिए पूर्व में हृदयमस्य विश्वम् कहा है । अमृत मृत्युमय विश्व है । उसका प्रकाशक यही मध्यस्थ धाम है । उसी घामस्थ अक्षर से सारा विश्व प्रकाशित है । १ ९ ५ ,
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ॥१ ॥ २ ॥
[ १ ९ ७ ] मर -ANTARTE निष्कर्ष यही हुआ कि ब्रह्मघाम पांचों प्राकृतात्मा हैं । उसमें भी परमधाम मध्य का उदुनिया है वहीं सारा विश्व निहित है । वहीं यह स्फुट प्रतिभासित हो रहा है । शुक्र विश्व का मूल है । तिरुं ': सुब्रह्म ही शुक्र है । शुक्र सोमरूप है । वही अध्यात्म में मन बनता है । उस पर भावना, वासना, संस्कारा रहते हैं । संस्कारविशिष्टशुक्र शुक्र है । अविद्या- राग - द्वेषादि सब शुक्र हैं । इनकी प्रतिष्ठा वही सुबह है । यदि कामना का परित्याग कर दिया जाता है तो शुक्रबल टूट जाता है । उसी समय शुक्ररूप सुब्र का प्रतिक्रमण कर धीर उपासक उस शुक्रातीत ब्रह्माक्षर को निष्काम उपासनारूप बुद्धियोग से प्राप्युक लेते हैं कामता प्रासक्ति की जननी है । यही सूत्र की जननी है । शुक्र बंधन का कारण - मतः यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो कामना का परित्याग करो इसी का स्पष्टीकरण करते हुए भागे नक ऋषि कहते हैं-- SN PIER 12 " कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्मायते तत्र तत्र कुछ पृष्ठ पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः " ॥३ ॥ 3 197
कामनाओं को सुखसाधन मानता हुआ जो मूढषी कामनामय विषयों की वाचा का है । अर्थात् कामना से विषयों में रत रहता है, वह कामसंघरूप शुक्र की कृपा से तत्तल्लोकों में जाया करता है, जन्म लिया करता है । स्वर्गकाम स्वर्ग में जाता है । पितृलोककाम इष्टापूत द्वारा वहाँ जाता है । इस प्रकार निरन्तर वह लोकों के भावागमन चक्र में फँसा रहता है । यह कमिना होती क्यों है? इसका उत्तर है - पपर्य्याप्ति । जिसे जो वस्तु पर्याप्त नहीं मिलती, वह उसको बाह्रा करता है । यदि एक बार भरपेट कलाकंद मिल जाता है तो उस दिन उसकी कामना नहीं होती । परन्तु न मिलने पर होती है । इस पर्थ्याप्ति का कारण है - स्वरूपाज्ञान | यह जीव समीपस्य ईश्वरभान को जानता हुआ अपर्याप्तकाम बना हुआ है । यही ज्ञान मोहमुलक कामना का जनक है । यदि उसे जानता हुषा यह प्राप्तकाम आत्मा को पहचान जाता है तो पर्याप्तकाम होता हुआ, सारी कामनाओं से मुक्त होकर शुक्र का प्रतिवर्तन करने में समर्थ हो जाता है । प्रक्षर -सत्यज्ञान शुक्रा विवर्तन का कारण है । कामनापरित्याग से ही शुक्र प्रतिवर्तन सम्भव है; छतः परम सुख ( शान्ति - सुख ) चाहने वाले को संसार में निष्काम कम्मं करते हुए ही जीवनयात्रा पार करनी चाहिए । यही निष्कर्ष है । --.. " स वेवैतत् परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्र उपासते पुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतदतिवत्तंन्ति घोराः ” । इस मन्त्र का अक्षरार्थ है- वह उपासक उसे जानता है जो कि परम ब्रह्मधाम है । जिसमें कि सारा विश्व स्फुट प्रतिभासित हो रहा है । कामना छोडनेवाले जो विद्वान् उसकी उपासना करते हैं, मे. ही घी इस शुक्र का प्रतिवर्तन ( प्रतिक्रमण ) करने में समर्थ होते हैं । प्रर्थात् सास विश्वः जिसमें बद्ध है । जो विश्वाधार है, वह परमब्रह्मधाम है । जिसे ब्रह्मधाम की इस विश्वालम्बनता का ज्ञान है वही उस
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( w ) मुण्डको नियं महदारनिर्ण करायों को देखने से इस मन्त्र का जो पूर्व में पर्च केलाया गया विश्व को बतलाया है । उस पर बी करें प्रतिष्ठित काका आदेश किया गया है । यहाँ विश्व को ब्रह्मजा पर प्रतिष्ठित बना बादसारविश्या पीटा की उपासना की शादी जाती है । कोनों में से कौनसा ठीक है? इस प्रश्न के उत्तर में एक यही कहेंगे कि दोनों ही ठीक है । इष्टमेव से दोनों ही घर्ष स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूयं - बन्धमा- पृथिवी पांच स्थूल- पिण्ड हैं । इन पाँचों की समष्टि विश्व है । इन स्यूस पिण्डों के केन्द्र में पाँच क्षर मात्मा हैं । यह पञ्चाक्षरात्मसमष्टि एक अधियज्ञात्मा है । पृथिवी है एक अधिशमा प्रतिष्ठित है । यहीं है । इस पर स्वविश्व प्रतिष्ठित है । विश्व अपने बागों से सत्ता में अधिक है । इसलिए हम एवं चात्मभान और विश्व का भातिरष्टधा पार्थक्य करें, रात्र पर स्थूलविश्व को प्रति विशिष्टविश्व को ब्रह्मधाम ' कह सकते हैं, तो भ्रात्मभाग को ब्रह्मधाम कह सकते हैं एक बचा समाते हैं । या की है । वह ससविश्व में नहीं रहता । अपि तु न्यूवविश्व के केन्द्र में रहने वाले चियामा पर रहता है । इसलिए घषियज्ञात्मा को हम धाम ( क्षरधाम ) कहने के लिए तय्यार है । भंक्षरधाम मोरं प्रक्षर अभिन्न हैं । इसलिए यहाँ उपाय की उपसिनों का बादशं भी सम्भव हो सकता है-समयमेव धामा १ विश्वम्--समरिया- ' ह ', ' श् परमेष्ठी सूर्य्यपिण्डम् विश्वम् संज्ञानि मिति त [ १ & ५ ]
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तृतीयद्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमय मन्त्र के पूर्वार्ष की संगति । एवं द्वितीय अर्थ की भोर प्रापका ध्यान हैं इसी खण्ड में समाप्त होने वाला है प्रतएव इस द्वितीय वर्ष मेहम उपनिपष्टीकरण करना चाहते हैं-मनुष्य जब उत्पन्न होता है तो उसके मस्तक घढ़ - पैर ये तीन प्रधान भवयद होते हैं । तीन भागों से युक्त मनुष्य रविप्राणरूप शुक्र- शोणित के संयोग से उत्पन्न हुंभा है । माता की गर्भगत रक्ताग्नि में पिता का शुसोम माहुत होता है । संवत्सरानन्तर वही साङ्गोपाङ्ग बनकर बाहर निकल पड़ता है । शरीर के तीनों भाग गर्म में बनते हैं । इस निर्माण - प्रक्रिया के विषय में मित्र - मित्र मात्राय्यों का भिन्न - भिन्न मत है । कई भिषग्वर कहते हैं कि पहले मस्तक बनता है । बाद में और प्रवयव बनते हैं । कई धाचा कहते हैं कि पहले पैर बनते हैं बाद में पोर अवयधः जनतें हैं । कई प्रार्थी का कहना है कि पहले पढ़ बनता है क्योंकि हृदय से आदान- विसगं गति का प्रारम्भ है । यहाँ से ऊपर - नीचे दोनों पोर रस का संचार होता है, पत: इसी को प्रथम सृष्टि माननी चाहिए । इन सब विवादों का भगवान् चरक ने सर्व वा सब कहकर अन्त कर दिया है । उनका सिद्धान्त है कि सारे अवयव सूक्ष्मरूप से पहले से ही उस शुरू में रहते हैं । उनका विकास एक साथ होता है । यह है ईश्वरांश भूतजीवसर्ग की परिस्थिति । पच ईश्वर की उत्पति का भी विचार करना चाहिए । ईश्वर- शरीर ' स्वयम्भू - परमेष्ठी- सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी दम पौष भागों में विभक्त है । स्वयम्भू उसका मस्तक है परमेष्ठी सूर्य - चन्द्रमा थद है । पूबिवी पैर है । यहाँ भी प्रश्न होता है कि पहले ईश्वर का मस्तक बना, घड़ बना, या पर बनें । अर्थात् सृष्टि स्वयम्-मूला है, य, कृषिका है या सूर्य्यमूला है । इस प्रश्न के तीन पृथक - पृर्षक उत्तर हमारे सामने पाते हैं । कहीं पृथिवीमूला- सृष्टि बतलाई जाती है । कहीं स्वयंम्भूला सृष्टि बतलाई जाती है । कहीं सूमा सुष्टि बलाई जाती हैं । यदि इन तीनों सृष्टियों का यहाँ निरूपण किया जाएं तो एक स्वतन्त्र इम्बे से बाए । भः परमार्थ दो बार शब्द लिखकर हम प्रकृत का प्रनुसरण करते हैं । पहले पासृष्टिको ही लीजिए । जब कुछ न पो तो क्या था? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं-" ग्रसद्वाऽहमग्रमासीत् । तदाहुः कि तबसवासीदिति? फ्यो बाट तेऽग्रेसवासीसबाहुः । के ते ऋषयः? प्रारणा वहिषयः । ते यत् पुरात्वात् सर्वस्मादिदमिन्द्रन्तः अमेण तपसारिवंस्तस्मात् वयः " II 1 : सृष्टि के पहले प्रसारण था । वह सप्तपुरुष पुरुषरूप में परिणत हुआ । उससे उससे पानी बना । पानी से अग्नि उत्पन्न हुआ । उस भ्राग्नेय पानी से कम - आप शर्करा, पुमा, मयः, हिरण्यरूप प्रष्टव्याहृत्यात्मक भूपिण्ड उत्पन्न हुआ । इसरे शब्दों में उसी एक चित्याग्निरूप प्राणपुरुष प्रजापति ने देव, पानी, मग्नि द्वारा भूपिष्ट उत्तपन्य किया । यह पुरुषप्रजापति की - मस्तु योऽस्तु इस इच्छा से उत्पन्न हुआ है, बतएव दंडानिकों से इ शत ० ब्रा ० ६।१।१।१ । [ १ ]
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argues ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य Here: का ताग काण्ड, रखः दिया । पहले - पहल यही शस्त्वण्ड उत्पन्न हुआ । बाद में पुष्णु इस इच्छा से मस्तविश्वरूप पोषाणु उत्पन्न हुआ । श्रन्तर यसो विगृहि इस कामना से खोप ( आादित्यरूप ) येथोन्ण उत्पन्न हुआ । अनन्तर रेतो बिगृहीति इस कामना से प्रापोरूप ( परमेष्ठीरूप ) रेतोड उत्पन्ना । इसके बाद जो प्रजापति बचा, वही स्वयम्भूरूप में परिणत हुआ । इस प्रकार शतपथ के छठे काण्ड के प्रारम्भ के १-२ ब्राह्मण में पृथिवीमूला सृष्टि का निरूपण किया गया है ---१ - मस्त्वण्डम् = पृथिवी र - पोषाण्डम्- = अन्तरिक्षंम् = चन्द्रमा यमो ऽण्डम्डोमादित्यः ४- रेतोऽण्डम् = आपः स्वयं स्वयम्भूः ” = चन्द्रमा → सेवा पृथिवीमा सृष्टिः वायुः ३- यशोऽण्डम् ४- रेतोऽयम् प्रादित्यः पृथिवी १-अश्वः चन्द्रमाः २-MAITRIS मरीचयः अन्तरिक्षम् सूर्यः ३-रश्मयः ॥ इति पादमूला ( पृथिवीमूला ) सृष्टिः ॥ परमेष्ठी ४- छाप refe warna for: इसी शतपथ में पार काण्ड में स्वयम्भूभूला ( मस्तकमूला ) सृष्टि का निरूपण है । वहाँ ठीक पूर्वसृष्टि से उल्टा क्रम है । स्वयम्भू प्रजापति नैं स्वप्रतिमारूप पितरपरमेष्ठी को उत्पन्न किया । धनम्सर इन्द्र उत्पन्न हुमा । अनन्तर भन्नसोम उत्पन्न हुआ । अनन्तर धन्नाद प्रग्नि उत्पन्न हुमा । इस प्रकार कामप्रयेश से स्वयंम्भू - परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी ये सृष्टियाँ हुई । स्वयम्मू के बाक् - माग़ से पानी हुआ । पानों में भग्नि हुथा । वही सूर्य्य बना । सूय्यं - रश्मि घर्षण से पुनः पानी उत्पन्न हुमा । उससे भूर्पिण्डं देना । शतपय के ११ काण्ड में यही क्रम निरूपित है - यह दूसरी स्वयम्भूमूला- सृष्टि है । १ शत ० प्रा ० ६।१।१।१-२ । २ शत ० ना ० ११।१।१ । [ २०० ]
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तृतीय yers ( द्वितीयखण्ड ) स्वयम्भूः मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ४ Y महदक्षरनिरूपण परमेष्ठी सूर्य्यः चन्द्र पृथिवी । ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव इत्यादि मन्त्र भी इसी
निरूपण करता है । यही मस्तकला सृष्टि है ।
॥ इति शिरोमूला ( स्वयम्भूला ) सृष्टिः ॥
तीसरी है मध्यमूला - सृष्टि । कितने ही वैज्ञानिकों का कहना है कि सृष्टि प्रजापति से होती है । प्रजापतिश्चरति गर्भे ० ' गर्म में बादित्य है, अतः इसी से सृष्टि होना सम्भव है । यही ऊपर के स्वयम्भू का, मीचे की पृथिवी का प्रभव प्रतिष्ठा -परायण है । दोनों का स्वरूपरक्षक यही है । गृहविद भाषण में हिरण्यगर्भसूक्त में इसी मध्यमूसा सृष्टि का निरूपण किया है । जैसा कि उस सुख का प्रथम भन्य कहता है-“ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स बाधार पृथिवी खामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम " ॥ " urfect मे विश्वस्य हृदयम् - के भनुसार प्रादित्य विश्व का मूल है । यही हिरण्यन प्रजापति है । यही मध्यस्य तस्य सारे विश्व का प्राचार है । यह तीसरा प्रकार है । पृथिवीमा सृष्टि में इ प्राणान्यवाद है । स्वयम्भूमूला - सृष्टि में वरुण प्राधान्यवाद है । पृथिवी सृष्टि मानने वाले वैशा इन्द्र को प्रधान मानते हैं एवं स्वयम्भू से सृष्टि मानने वाले वैज्ञानिक प्रापोमय वरुण को प्रधान मामले है । परन्तु मध्यमा सृष्टि के उपासक बृहदियव प्राथर्वण हिरण्यगमं सौरप्रजापति को प्रधान मानते हैं । एक बार वारण एवं ऐन्द्र वैज्ञानिकों में परस्पर बढा विवाद हुआ था । एक दल पृथिवी को ग्रूम मान कर इन्द्र को प्रधान बतलाता था, दूसरा स्वयम्भू को मूल मानकर वरुण को प्रधान बतलाता था । चण्ड में यह दोनों ही बृहदिवध प्राय बंण के पास गए । वे दोनों के प्रतिरिक्त तीसरे हिरण्यगर्भ के उपासक है । उनकी दृष्टि में सृष्टि न स्वयम्भूभूला थी, न पृथिवीमूला थी । वे न इन्द्र के उपासक थे, न बदल के area इन्द्र को हवि दी जाए या वरुण को यह पूछने पर बृहदिदव ने फटकारते हुए - हिरयनर्थ समता • इत्यादि से दोनों मतों का तिरस्कार किया था । इस सारे प्रपञ्च से प्रकृत में हमे केवल यही बता है कि मनुष्यवत् ईश्वरसृष्टि में भी वैज्ञानिकों के तीन मत प्रचलित हैं । इन तीनों में कोन सा मत सच्चा है? इसका उत्तर सर्व सहैव यही वाक्य है । सब एक साथ बनते हैं । पन्त में इसी परकाश का प्राय लेना पड़ता है । भपि च दृष्टिकोणभेद से तीनों ही मत यथार्थ हैं । उस दृष्टिकोण को समझते के लिए श्रव्यय - क्षर - क्षर इन सुप्रसिद्ध तीन पुरुषों की शरण में जाना चाहिए । भव्यय सृष्टि का घास + म्बन है । अक्षर निमित्तकारण है । क्षर उपादन है । तीनों के समन्वय से सृष्टि होती है । सृष्टि के तीन कारण हैं । कितने ही विद्वानों ने अव्यय को लक्ष्य बनाकर सृष्टि का विचार किया | feat ही ने अक्षर को लक्ष्य बनाकर सृष्टि का विचार किया है एवं कितनों ही ने क्षर को लक्ष्य बनाकर १ यजुर्वेद ३१।१६ २ ऋग्वेद मं ० १०।१२१ । १ । [ २०१ }
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तृतीयमुक ( द्वितीयखण्ड ) + V } : - + अक्षरपुरुषः = ध्यानः प्रन्तरिक्षम् सहस्राक्षः = प्राणाः भ्रर्काः ३ - सूर्य [ २०२ ] महदक्षरनिडण को कही सोऽयं प्रजापति ईश्वर : । सृष्टि का विचार किया है । बस, जो सृष्टि का अव्ययदृष्टि से विचार करते हैं- उनके मतानुसार सृष्टि स्वयं भूमूल है । जो पक्षरदृष्टि से विचार करते हैं उनकी दृष्टि में सृष्टि हिरण्यगर्भमूला है एवं जो क्षरसृष्टि से विचार करते हैं उनकी दृष्टि में सृष्टि पृथिवीमूला है । कारण इसका यही है कि अव्यय प्रश्वत्थरूप है, जैसा कि पचिके प्रश्न के भोंकार - विरूपण में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । श्वस्य की शाखा में स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूयं चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँच पुण्डीर हैं । इसका मूलभूत मान पृथिवी है । कठः उपनिषत् में अश्वत्व विद्या का निरूपण करते हुए हमने माथीको उर्ध्वमूला मोरभवशाखा बतलाया था । वहाँ कर्ध्वमूत का वर्ष केन्द्र किया था । यहाँ ऊपर उमराह है । सब से नीचे पृथिवी विराट है । इससे ऊपर चन्द्रमा ऊपर स्वयम्भू है । यह अश्वत्य का मूल है । वह मूल चूँकि ऊपर है, मतएव प्रश्वत्य को हम ऊर्ध्वमूल कहने के लिए तय्यार हैं । बस, यही अव्ययमूला उर्ध्वमूला पहली अश्वत्थविद्या है । दूसरा है-अक्षर । अक्षर का विर्सि सूर्य में होता है । ' सूर्य को सेतु माना जाता है । रही " के सैंतुराजाना-माम् - के धनुसार सेतु है । रष्टि से यदि सृष्टि का विचार किया जाता है तो सही सामने माता है । यही दूसरी अक्षरमूला हिरण्यग में विद्या है । तीसरा है क्षर । क्षर का विकास पृथिवी में है, अतएव सरस्ष्ट्या पृथिवों को भूल मानकर प्रतिष्ठा - विद्या चलती है । यद्यपि सर्व तीर्मो हैं, परन्तु स्वयम्भू में स्वाव्यय की प्रधानता है, सूर्य में प्रसार की प्रधानता है एवं पृथिवी में क्षर की प्रधानता है । इस भेद-सेवा की प्रगति हो जाती है- I ए व्यवस्था स ईश्वरः पश्वत्परूपः - सेवा कष्वंमूला ' प्रश्वत्यविद्या स्वयम्भूमुखा २- प्रझ रष्ट्या स हिरण्यगर्भ = संषा हृदयमूला ' हिरण्यंग में विद्या'सा या स भूतभावनः सेवा मयोमूला ' भूतभावनविद्या ' - पृथिवीमूला. स्वयम्भू ] - व्ययपुरुषः प्राणः, ची: -- सहस्रशीर्ष. मात्मा उक्थम् [ ५ पृथिवी ] + क्षरपुरुषः प्रपानः = पृथिवी = पादाः = सहस्रपात् = पशवः प्रशितयः