Mundakopanoshad — पृष्ठ 31–40
Mundakopanoshad · पृष्ठ 31–40
पृष्ठ 31
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य पराविद्या निरूपण कहना यही है कि इस प्रकार विश्व में अनेक प्रकार के काव्य - कारणभाव होते हैं । इन अनेक प्रकार के काय्र्य्यं - कारणों में से ऋषि उदाहरण के लिए तीन कार्य्यं कारणमाद बतलाते हैं । इससे बतलाना इनको यही है कि संसार में तुम अनेक प्रकार का कार्य्यं कारणमाद देखते हो । विश्वास करो, यह सारा का कारणभाव उन्मुग्धरूप से उसी प्रक्षर में प्रतिष्ठित है । परस्पर सबंधा विभिन्न १३ हों का कारणभाव प्रक्षर में निविष्ट है । अक्षर उपादानकारण है । इसकी उपादानता कहीं ऊनाभि-रूप में हैं । कहीं पृथिवीरूप में है । कहीं पुरुषरूप में है । कहीं वह्निरूप में हैं । कहीं मृद्रूप में हैं । कहीं पितारूप में है । कहीं कुम्भकाररूप में है । अपने घमृत - भाग से निमित्तकारण बना हुआ है, कहीं मर्त्यभाग से उपादानकारण बना हुआ है । मकड़ी स्वयं अक्षर है । इसका तामिस्थान क्षर है । यही जाल का उपदान है । संसार के उपादानकारण को जानने से संसार का स्वरूप ज्ञात हो सकता है । अक्षर उपादान नहीं है - मपि तु निमित्तकारण है । इससे पूर्वतक ऋषि ने अक्षर का ही निरूपण किया था । इससे पंदेह हो सकता है कि अभी शौनक का समाधान कहाँ हुआ? बस, इस संदेह को दूर करने के लिए ही ऋषि ने तथा अक्षरात् संभवतोह विश्वम्- यह कहा है । ऋषि का अभिप्राय यही है कि अक्षर का भाषा भाग ही क्षर कहलाता है । क्षरभाग से सृष्टि होना प्रक्षर से ही सृष्टि होना है । बस, इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रख कर पोनामिः सृजते ० - इत्यादि कहा है ॥। ७ ॥ पूर्व के ' प्रश्नोपनिषद् ' के छठे प्रश्न में विज्ञानात्मा की १६ कलामों का निरूपण किया है । यहाँ पर इस महाक्षर को ११ कलामों का निरूपण है । केवल पाँच कलामों का परित्याग है । शेष ११ कलाएँ जो विज्ञान ही हैं, वे ही इस महदकार की हैं । अक्षर महान् तक व्याप्त रहता है । भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि महत्व कमाएं हूँ माँ कमक्षरम् ' के अनुसार महविशिष्ट अक्षर हो सृष्टि का कारण बनता हैं । महान् सुब्रह्म हैं । धव्यक्त स्वयम्भूमा है । ब्रह्म सुब्रह्म की समष्टि ' शुक्र ' है । यह शुक्र महान् अव्यक्तरूप परमेष्ठी स्वयम्भू का समुच्चय है । इसमें क्षर ब्रह्म है, कर में पक्षररूप प्रमृत प्रतिष्ठित है । वही ममृत ब्रह्म ( क्षर बना है । वही शुक्र ( स्वयम्भू - परमेष्ठी ) बना है । इसी अभिप्राय से तदेव शुकं तबा तवेषामृतमुच्यते - अह कहा जाता है । यही शुक्रमय ( महदयुक्त ) क्षरविशिष्ट प्रक्षर - सृष्टि का कारण बनता है । इस, जा कहीं अक्षर से सृष्टि का सम्बन्ध बतलाया जाए वहाँ पक्षर से शुरूष ' महदक्षर ' ही चाहिए । यहाँ पर चूंकि अक्षर के लिए प्रारात् सम्मोह विश्वम् - यह कहा है, यह विभूति ( मिथुन - भाव से सम्बन्ध रखनेवाली मैथुनी सृष्टि ) भृगु - मंगिशत्मक मिथुन भावापन्न महान् नाम से प्रसिद्ध परमेष्ठी के बिना सम्भव है, मतएव यहाँ के अक्षर को हम ' महदार ' का वाचक मानने के लिए तय्यार हैं । बस, आगे के मन्त्र में इसी महदक्षर की ११ कलामों का निरूपण किया गया है । उन ] ११ कला के निरूपण से पहले मन्त्र के विषय में दो चार बातें जान लेना आवश्यक होगा-१ शत ० बा ० १० | ४ | ११६ | २ कठोप ० २।१ । [ २३ ]
पृष्ठ 32
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
tet मुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्यानिरूपणं वाक् - ब्रह्म - मन्त्र - विद्य । एक प्रकार से पर्य्याय हैं । स्वयम्भू के वेद को ब्रह्मनिःश्वसित कहा जाता है । उसके ऋऋग् - यजुः - साम तीन भाग हैं । इनमें यजुः पुरुष हैं, अग्नि है । इस यजुः में यत् और जूदो भाग हैं । यत् भाग प्राण है । जू भाग वाक् है । इसी वाक् - तत्त्व का नाम ब्रह्म है एवं इसी को मन्त्र, विद्या प्रादि शब्दों से व्यवहृत किया करते हैं । वाक्रूप ब्रह्म स्थितितत्त्व है - प्रतिष्ठातत्त्व है । वाक् के साथ दूसरा गतिमत् प्राणतत्त्व रहता है । इस प्राणतत्त्व को ही ' प्रसत् ' तत्त्व कहते हैं । इसी को ' ऋषि ' कहते हैं । वाक् मन्त्र है । प्रारण ऋषि है । इस वाक्मन्त्र का सम्बन्ध ऋषिप्राण के साथ रहता है । वाङ्मन्त्र के प्रथम द्रष्टा ऋषिप्राण हैं । वाक्मन्त्र को प्राप्त करने वाला ऋषि प्राण है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ऋषयो मन्त्रष्टारः - यह कहा जाता है । मन्त्र स्वयम्भू का वाक् ब्रह्म है । ऋषि वाक्प्राणोंवाला प्राण है । प्राण गतिधर्म्मा है, प्रत: ऋषि को दर्शनव्यापार का प्रविष्ठाता बतलाया जाता है । मन्त्ररूप वाग्वा धव्यक्तस्वयम्भू है । अव्यक्त होने से वह भावनासाध्य है, मननसाध्य है । इस मननसम्बन्ध से ही वह स्वयम्भू वाग्वह्य ' मन्त्र ' नाम से प्रसिद्ध है | हम जो मुँह से वाक् बोलते हैं, वह देववाक् है । इस देववाक् का स्वर- भाग सूर्य्य से सम्बन्ध रखता है एवं वर्ण-भाग पृथिवी से सम्बन्ध रखता है । वर्ण का पार्थिव प्राजापत्य मनुष्टुप्बाक् से सम्बन्ध है । इसी अभिप्राय से ब्राह्मण - ग्रन्थों में बार - बार बाग व धनुष्टुप् ' - - लिखा रहता है एव स्वर का सौरीबृहती-वाक् से सम्बन्ध रहता है । सूर्य्य इन्द्रमय होने से देवघन है । पृथिवो अग्निमयी होने से देवमयी है, प्रतएव सूय्यं पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाली, व्यवहार में पाने वाली स्वरवर्णात्मिका वाक् को हम अवश्य ही ' श्ववाक् ' कहने के लिए तय्यार हैं एवं स्वयम्भू की वाक् देववाक् नहीं- अपि तु ब्रह्मवाक् है । यह ब्रह्मवाक् परब्रह्म है । इधर देववाक् भवरब्रह्म है इस प्रवर ब्रह्मरूपा देववाक् का प्राधार वही परब्रह्मरूपा ब्रह्मवाक् है । उस ब्रह्मवाक् के साथ ऋषिप्राण का प्रति घनिष्ठ सम्बन्ध है । बिना ऋषिप्राण के उस वाग्ब्रह्म को प्रात्मसात् करना कठिन ही नहीं- अपि तु असम्भव है । इसीलिए मन्त्रसिद्धि में जहाँ अभियुक्त छन्द घौर देवता- ज्ञान की भावश्यकता बतलाते हैं - एवमेव ---" यो वा प्रविवि xxx गर्ने वा पतलि, प्रवा मीयते " ॥ -- इत्यादिरूप से मन्त्रसिद्धि में ऋषिज्ञान की भी प्रावश्यकता स्वीकार करते हैं । वाक्ह्म वेद-मन्त्र है । यह ऋषिप्राण से घविनाभूत है, प्रतएव ऋषि को ऋषिमन्त्रः के अनुसार वेदमन्त्र ही बतला दिया जाता है । दोनों का प्रभेद है- ' ऋषिर्वेदमन्त्र ' का यही अभिप्राय है । इसीलिए तो मन्त्ररूपा-वाक्, ऋषिरूप प्राण दोनों को मिला कर दोनों को ' यजु: ' इस एक नाम से ही व्यवहृत किया जाता है । वाक् का प्राण ( दम - शक्ति ) ऋषि प्राण ही है । प्राणतत्व के बिना वाक्तत्व सर्वथा प्रतिष्ठित है । प्राण ही वाक् की प्रतिष्ठा है । उपलब्ध वेदमन्त्रों को हम देववाक् कहेंगे । इनके द्वारा उस मौलिक वाग्रहारूप मन्त्र की प्राप्ति ( सिद्धि ) होती है, धतः तातुस्याताच्छम् इस न्याय से इस · देवखाक्-प्रपञ्च का नाम भी ' मन्त्र ' संहिता हो गया है । वस्तुत: ' मन्त्र ' वही स्वयम्भूवाक् है एवं प्रोम् प्रादिरूप स्वरवर्णात्मिका वाक् उस मन्त्र की साधनभूता है । यह साधक है एवं वह साध्य है । अस्तु, इस प्रपच १ शत ० ब्रा ० १।३।२।१६ । [ २४ ]
पृष्ठ 33
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रयमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण को हम अधिक नहीं बढाना चाहते । हमें प्रकृत में केवल इतना ही बतलाना है कि मन्त्रगत ' ब्रह्म ' शब्द ऋषिप्राणयुक्त वाग्ब्रह्म का वाचक | विज्ञानात्मा की १६ कलामों के प्रतिपादन में जिस तत्त्व के लिए मन्त्राः कहा है यहाँ पर उसी ' मन्त्रा ' के स्थान में तपसा चोयते- ' ब्रह्म ' यह कहा है । वहाँ मन्त्राः से जो अयं प्रपेक्षित है, यहाँ के ब्रह्म शब्द से वही अर्थ अपेक्षित है । वह स्वयम्भूवाक् माम्भृणी, वेकुरा, सरस्वती आदि अनेक धारामों में परिणत रहती है । इस प्रकार धाराभेद से एक ही वाक्-ब्रह्म मनन्त ब्रह्म रूप में परिणत हो जाता है । इसी अभिप्राय से ' प्रश्नोपनिषत् ' में इस वाग्ब्रह्म के लिए ' मन्त्रा: ' प्रयोग किया है । मन्त्र धनन्त हैं । प्रत्येक के साथ मित्र - मिन जाति का ऋषिप्रारण है, प्रतएव मन्त्र द्रष्टा ऋषि भी अनन्त हैं । इसी प्रभिप्राय से धनम्ता मे देवाः ' - यह कहा जाता है । प्रकृत में इस सारे प्रपच से केवल यही बतलाना है कि यहां का ' ब्रह्म ' पद छठे प्रश्न के चतुर्थ मन्त्र के ' मन्त्राः ' शब्द के स्थान में उसी पर्थ में प्रयुक्त हुमा है । वहाँ ' मन्त्राः ' पद का अर्थ करते हुए बतला दिया गया है कि यजुम्मन्त्र का नाम ( ज्ञानमयस्वयम्भू ब्रह्म का नाम ) मन्त्र है । मन्त्र विषयभेद से धनेक हैं । मनन्त मन्त्रों की समष्टि एक ब्रह्म है । व्यासज्यवृत्त्या बही तत्त्व मन्त्र नाम से व्यवहृत होता है एवं समष्टिरूप से उसे ' ब्रह्म ' कहते हैं । स्वयम्भू की प्राणमयी ( ऋषि प्राणमयी ) सत्या ( वेदमयी ) वाकू ही ' मन्त्राः ' है । वहीं मन्त्राः के धागे कर्म्मलोकाः लिखा है । ' कम्मंलोकाः ' का ' क्रिया ' भयं किया है । इस प्रकार ' मन्त्रा: ' ' कम्मँलोका: ' से वहाँ ' विद्या कम्मंणी, ब्रह्म कम्मंणी, ज्ञान कम्प्रेरणी ' ही प्रभिप्रेत है । बस, यहाँ के ब्रह्म शब्द से वही मन्त्रपदवाच्य देवमय ज्ञानग्रा प्रभिप्रेत है एवं कम्मं से वही क्रियातस्य अभिप्रेत है । यह है मन्त्रगत ' ब्रह्म ' शब्द का स्पष्टीकरण । तप का लक्षण मनसश्वेन्द्रियाणां च ऐकाय परमं तपः- इत्यादि रूप से पूर्व में किया जा चुका है । मन धौर इन्द्रियाँ - दोनों को, शब्दब्रह्म को प्राधार मान कर यदि चिरकाल तक एक ही लक्ष्य की ओर लगा दिया जाता है, तो कालान्तर में धारणा ध्यान - समाधि तीनों का एक बिन्दु पर समन्वय हो जाता है । उसी समय ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाता है । स्वयम्भूबा की प्राप्ति तप से ( मन भोर इन्द्रियों की एकाग्रता से होती है । मन मोर इन्द्रियां धोर साथ ही में शब्दवाकू तीनों एक स्थान पर रह कर चिति करते हैं । मुंह से बुलो हुई मनः प्राण गमवावाक् की अन्तरिक्ष में मूर्ति वनती है । निरन्तर शब्दब्रह्म की मनोयोग द्वारा माराधना करने से उस मूर्ति पर मन्यान्य तद्रूपमूत्तियों की चिति होती जाती है । कालान्तर में वही शब्दब्रह्यमूति खिति - भाव के कारण उसी स्वयम्भू ब्रह्मरूप में प्रकट हो जाती है । मनोयोग से वाक्मन्त्र की चिति से ब्रह्य चीयमान हो कर प्रत्यक्ष हो जाता है । इसका तात्पर्य यही है कि मन और इन्द्रिय की एकाग्रता से मन्त्रसिद्धि ( यजुम्मन्त्र ) सिद्धि हो जाती है । यजुम्मंन्त्र स्वयम्भू की वस्तु है । स्वयम्भू सत्यलोक है । यजुर्ब्रह्ममय सत्यस्वयम्भू के पेट में सारा विश्व समा रहा है । जिसे ऐसे सर्व-व्यापक ब्रह्म को चिति द्वारा प्राप्त करना हो, वह तप करे । मन मोर इन्द्रियों का एकत्र संयमन करे । बस, तपसा येते ब्रह्म का यही अर्थ है । मन्त्रसिद्धि हो गई । मनन्तर इसका क्या फल होता है? षि उत्तर देते हैं - संतोऽन्यमभिजायते सारा विश्व इसके लिए भन्न बन जाता है । भोग्य बन जाता है । १ तै ० ब्रा ० ३।१०।११।४ । [ २५ ]
पृष्ठ 34
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपणं सब पर इसका प्रभुत्व हो जाता है । क्योंकि सब पर प्रभुत्व रखने वाले वागृब्रह्म पर इसने अपना प्रभुत्व जमा लिया है । ऐसे ही योगी के लिए सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति - यह कहा जाता है । वाग्ब्रह्म के उदर में रहने वाली सप्तलोक सम्पत्ति - अनरूप में परिणत हो जाती है प्रर्थात् भोग्य बन जाती है । इसी अभिप्राय से ततोऽन्नमभिजायते - यह कहा है । प्रारण प्रन्तर्बल का नाम है । जिसे वीय्यं कहते हैं - वही यहाँ प्रारण शब्द से व्यवहृत हुधा है । जिसके पास जितनी अधिक भोग्य सामग्री होती है, उसमें उतना -0 ही भषिक प्राण ( दम - वीय्यं ) रहता है । दरिद्री निर्वाय्यं रहता है । इससे सिद्ध हो जाता है कि वीर्य्यसत्ता का एकमात्र कारण भोग्यसामग्री है । किसी के पास यदि प्रचानक दो लाख रुपये भा जाते हैं तो वह इस मोग्यान्न के प्राते ही ऊ बलयुक्त बन जाता है - वीर्य्यवान् बन जाता है । पिप्पलाद ने छठे प्रश्न में प्रश्नात् बोम्यंम् कहा है । यहाँ ऋषि ने बीर्य्यम् के स्थान में धनात् प्राण: कहा है । जैसे वहाँ का ' मन्त्राः पद ' और यहाँ का ब्रह्म पद समानार्थक है, एवमेव वहाँ के ' घनाद वीय्यम् ' का जो अर्थ है, यहाँ के ' प्रन्नात् प्राणः ' का वही अर्थ है । इस शब्दभेद का एकमात्र कारण यही है कि वहाँ पर ऋषि ने स प्राणमसृजत प्राणाच्छु ढां०- यहाँ स्वयम्भू के अमृतरूप परोरजा प्रारण के लिए प्राण शब्द प्रयुक्त किया है, प्रतएव अन्न से पैदा होनेवाले ऊं रूप बलप्रद प्राण के लिए वहाँ उन्हें ' वीय्यम् ' शब्द का प्रयोग करना पड़ा । यदि वीय्यं न कह कर ' पन्नात् प्राणः ' कहते तो दो प्राण शब्दों के हो जाने से अस्मदा दि साधारण मनुष्यों को अर्थ भ्रान्ति हो जाने की संभावना थी । ऐसा न हो, इसलिए कृपालु ऋषि ने अमृतप्रारण के लिए तो प्राण शब्द का ही प्रयोग कर दिया एवं ऊ प्राण के लिए ' वीर्य्य ' शब्द का प्रयोग किया । यहाँ पर उस अमृतप्राण के लिए प्राणशब्द का प्रयोग न कर केवल ' भ्रमृतम् ' कहा । चूंकि यहाँ ' प्रमृतम् ' होने से भ्रान्ति की संभावना नहीं है, प्रतएव यहाँ कंं प्राण के लिए ऋषि ने ' प्रन्नात्प्राणः ' इस रूप से प्राणशब्द का प्रयोग कर दिया है । प्राण के बाद मन है । प्राण एक प्रकार का ओज है । प्रोज की वृद्धि होते ही मनोबल ( विल पावर ) बढ़ता है । अन्न से प्रारण की वृद्धि है । प्राणवृद्धि मनोबलवृद्धि का कारण है । मन सत्य तत्त्व का श्राधार है । मन से सत्य का विकास है । सत्य का अर्थ है - ज्ञानेन्द्रियों और कम्मेन्द्रियां । प्राणा से ( इन्डिय प्राणा बं ) सत्यम् के अनुसार हम इन्द्रियप्राणों को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । पिप्पलाद ने इन्द्रियों के लिए ' इन्द्रियम् ' प्रयोग किया है । यहाँ ऋषि ने ' इन्द्रियम् ' के स्थान में ' सत्यम् ' प्रयोग किया है । ' इन्द्रियम् ' न कह कर ' सत्यम् ' क्यों कहा? यह प्रश्न हो सकता है । इसका उत्तर यही है कि ऋषि को महदक्षर के साथ ११ कलाधों का सम्बन्ध बतलाना है । विज्ञान में पांच भूतकलाएं हैं । ११ कलाएं और है । इस प्रकार उसमें कुल १६ कलाएं है । परन्तु महवार में, दूसरे शब्दों में महानात्मा में, स्वं-वायु - ज्योति प्रापः पृथिवी ये पांच भौतिक कलाएं नहीं है, शेष ११ कलाएं हैं । ऋषि उन्हीं को गणना कर रहे हैं । पाँच भौतिक कलाभों को छोड देने पर पिप्पलाद की निम्नलिखित ११ कलाएं बचती हैं-१- प्राण, २ - श्रद्धा, ३- इन्द्रिय, ४ - मन, ५ - प्रत्र, ६ - यीय्यं, ७ - तप, ८- मन्त्र, ६ - कम्मलोक, १०- लोक, ११ - नाम । प्रकृत में महान के साथ ११ हों का सम्बन्ध है । इन १ ९ हों में से प्रारंण के लिए ' अमृत ' कहा है । मन के लिए ' मन ' कहा है । अत्र के लिए ' अन्न ' कहा | वीय्यं के लिए ' प्राण ' कहा है । तप के लिए ' तप ' कहा है । मन्त्र के लिए ' ब्रह्म ' कहा है । कर्म्मलोक के लिए ' कमंतु ' कहा है । लोक [ २६ ]
पृष्ठ 35
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
venguse ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्यानिरूपण के लिए ' लोकाः ' कहा है । बाकी बच जाते है - नाम - श्रद्धा - इन्द्रियां । नामरूपे में सत्यम् के अनुसार नाम ' सत्य तत्त्व ' है । श्रद्धा वा प्राप: - प्रापः सत्यम् के अनुसार सोममय श्रद्धा - तत्त्व भी ' सत्य ' है एवं प्राणाः ( इन्द्रियाणा ) सत्यम् के अनुसार इन्द्रियाँ भी सत्य हैं । इस प्रकार श्रद्धा - नाम- इन्द्रियाँ तीनों का ' सत्य ' शब्द से ग्रहण हो सकता है । ऋषि को तीनों का ग्रहण अपेक्षित है । ऐसी अवस्था में यदि इन्द्रियों के लिए पिप्पलाद की तरह ' इन्द्रियम् ' कहते हैं, तब तो श्रद्धा औौर नाम छूट जाते हैं । इन दो के लिए इनको छन्दोमङ्ग करना पड़ता है जो कि अनुचित है । यदि इन्द्रियम् के स्थान में ' सत्यम् ' कह देते हैं तो सत्यसामान्यात् उपलक्षण विषया श्रद्धा मोर नाम सत्य का भी ग्रहण हो जाता है । इसीलिए ऋषि ने ' सत्यम् ' कहा है-१ प्रारण: = अमृतम् २ मनःमनः ३ पशम्पन्नम् ४ वी = प्राणः ५ तप: तपसा ६ मन्त्राः - ब्रह्म ७ कर्म्मलोकाः = कर्म्मसु ८ लोकेषु = लोकाः ६ इन्द्रियम् = १० श्रद्धा = ११ नामक सत्यम् ' प्रारणा व ( इन्द्रियप्राणा वै सत्यम् ' ' श्रद्धा वा प्रापः पो वै सत्यम् ' ' नामरूपे वै सत्यम् ' इस प्रकार महानात्मा में ११ कलाओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन ग्यारह कमानों प्रौर ' खं ' प्रादि पांचों भौतिक को मिलाकर १६ कलानों का छठे प्रश्न में विस्तार के साथ निरूपण कर दिया गया है । यहाँ केवल उनके नामान्तरमात्र बतला दिए गए हैं । पांचों भूतकलाएं मत्यंरूपा हैं । सूर्य्य विज्ञानात्मा है । सूर्य्यरूप विज्ञान के ऊपर ' परमेष्ठी - रूप महान् ' एवं ' स्वयम्भूरूष अव्यक्त ' दोनों अमृत : हैं । सूर्य से नीचे मत्यंप्रजा है भूतप्रजा है । मध्यस्थ विज्ञानसूर्य के साथ मयंप्रजा और ममृतप्रजा दोनों का सम्बन्ध है । इसलिए इस विज्ञान के साथ तो यथाकथञ्चित् मर्त्यभूत कलापों का सम्बन्ध फिर भी उपपन्न हो जाता है । परन्तु विज्ञान से परे रहने वाले ( परं विज्ञानात् ) ' प्रमृतरूप महान् के साथ इन पांचों मर्त्यभूत कलानों का सम्बन्ध कैसे हो सकता है? यद्यपि -१ मुण्डकोप ० २।२।१ । [ १७ ]
पृष्ठ 36
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
venture ( प्रथमखण्ड ) " तावुभौ मृतसंपृको महान् क्षेत्रज्ञ एव च ' । ' पराविद्या निरूपण -- के अनुसार क्षेत्रज्ञ ( विज्ञानात्मा ) वत् महान् के साथ भी भगवान् मनु भूत का सम्बन्ध मानते हैं । परन्तु यह सम्बन्ध भूतात्मसापेक्ष समझना चाहिए । भूतात्मा भूतसंपरिष्वक्त है । जाग्रदवस्था में और स्वप्नावस्था में यह भूतमय भूतात्मा महान् से प्रान्त है । इस प्रकार भूतात्मा द्वारा इसे भूत-संपृक्त बतलाया जा सकता है । परन्तु प्रातिस्विकरूप से महानात्मा भूतप्रपञ्च से सर्वथा भसंस्पृष्ट ही है । सुषुप्ति में भूतात्मा का लय है । इस समय महान् शुद्धरूप से रहता है । सत्यरूप रहता है, प्रतएव इस अवस्था का नाम ' स्वपिति ' है । निष्कर्ष यह हुआ कि उस संसा रस्रष्टा महदक्षर में ११ कलाएं हैं । ११ कलामों में परिणत होकर ही वह विश्व को उत्पन्न करने में समर्थ होता है । तप - प्रारणव्यापार है । महदक्षर स्वयं कुर्वद्रूप है क्रियामय है । क्रिया प्रारण व्यापार है । प्राण-व्यापार तप है, भतः हम प्राणरूप महदक्षर की एक कला ' तपोबल ' मान सकते हैं । यह कला सब में प्रधान है, प्रतएव ऋषि ने सबसे पहले इसी का उल्लेख किया है । ब्रह्म स्वयम्भूरूप द्विब्रह्म है । द्विषह्य-युक्त हो कर ही सुब्रह्मरूप महदक्षर शुक्र ( संसार का बीज ) बनता है, प्रतएव इस द्विब्रह्मरूप ब्रह्म को भी हम महदक्षर की कला मानने के लिए तय्यार हैं । भन्न ' यज्ञान - सप्तान ' भेद से दो प्रकार का है । अग्नीषोममयान्न यज्ञान्न है । ज्ञान - क्रिया -पृथिवी - जल - तेज- वायु- प्राकाश ये सप्तान हैं । इनमें ब्रह्म में ज्ञान का प्रन्तर्भाव है । कम्मंसु में क्रिया का प्रन्तमवि है । शेष पांचों भूतभागों का परित्याग है । बाकी बचता है - ज्ञान | सोम यज्ञान है । सोम महान् का भपना स्वरूप है । भृगु ही सोम है । भृगु - अंगिरा की समष्टि महान् है । यह यज्ञानरूप सोम भी महान की एक कला है । उसी में कंबल रहता है । इडा - ऊं - गौ - तीनों परमेष्ठी की वस्तु हैं । इट् प्रन है । ऊ प्राण है । ऐसी अवस्था में प्रभवत् प्राण को भी हम महदक्षर की कला मानने के लिए तय्यार हैं । मन सोममय है । ब्रह्मणस्पति चान्द्रसोम है । यही मन है । इसकी स्थिति भी उसी परमेष्ठी महान् में है । श्रद्धा सोमरस है । इन्द्रियां प्रज्ञा सोम और प्राणमयी हैं । दोनों सत्य हैं । दोनों परमेष्ठी की कलाएं हैं । रजोरूप क्रिया उस महदक्षर का कम्मं है । निविष्ठ - तरल - विरल महत्सोम की ये तीन अवस्थाएं ही लोककलाएं है । महान् सोममय है । सोम अवस्था-त्रय से युक्त हैं । वही तीनों भवस्थाएं वैदिक भाषा में ध्रुव घ धरुण नाम से प्रसिद्ध हैं । यही लोका: है एवं परोरजा स्वायम्भुव प्राण प्रमृत है । वह भी इस महदक्षर की कला है । इस प्रकार महदक्षर में कुल ११ कलाएं हो जाती हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ऋषि कहते हैं-“ तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिवायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्म्मसु वामृतम् ” ॥ यह मन्त्र बडा ही जटिल । इसकी जटिलता का प्रत्यक्ष निदर्शन इसके अयं का निरूपण ही है । उपासना - सम्बन्धी सिद्धयोग भी यह बतलाता है । ११ कलाएं भी बतलाता है । सृष्टि - प्रक्रिया भी बतलाता हैं । इनमें से उपासना सम्बन्धी पर्यं ११ कलाधों से सम्बन्ध रखने वाले अर्थ का निरूपण हो चुका । अब संक्षिप्त रूप से इसके सृष्टि - रहस्य प्रतिपादक अर्थ का भी निरूपण कर देना उचित होगा । १ मनुस्मृति १२।१४ । [ २८ ]
पृष्ठ 37
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण पुरुष - प्रकृति - शुक्र भेद से सारा प्रपञ्च त्रेघा विभक्त है । पुरुष ही प्रमृत कहलाता है । प्रकृति को ब्रह्म कहते हैं एवं शुक्र को यज्ञ कहते हैं । प्रमृत - तत्त्व ' पोरुष - ब्रह्म ' है, प्रकृति - तत्त्व ' प्राकृत - ब्रह्म ' है एवं शुक्र - तत्त्व ' शुक्रिय - ब्रह्म ' है । इन्हीं तीनों के लिए तवेष शुक्रं तद् ब्रह्म, तदेवामृत मुख्यते - यह कहा जाता है । पौरुष से जितनी सृष्टि होती है सब भावसृष्टि कहलाती है । भावसृष्टि नाममात्र की सृष्टि है । वास्तविक सृष्टि तो प्रकृति से उत्पन्न होने वाली वैकारिकी सृष्टि ही है । ग्रव्यय - प्रक्षर - आत्मक्षर तीनों पुरुषों की समष्टि ' पौरुष ब्रह्म ' है । प्रारण धापः वाक्- अन्न - मशाद ये पाँचों इस त्रिपुरुष पुरुष के आत्मक्षर भाग से प्रक्षर द्वारा उत्पन्न होते हैं । पाँचों की उत्पत्ति पुरुष से है, प्रतएव पुरुष की अपेक्षा से वैकारिक होने पर भी ये पांचों प्रधियज्ञरूप वैकारिकसृष्टि की अपेक्षा से प्रकृति ही हैं । इन पांचों की समष्टि ही प्राकृत - ब्रह्म । इस प्राकृत - ब्रह्म की उत्पत्ति पक्षर द्वारा क्षर भाग से होती है । प्राकृत - ब्रह्म ही सारे वैकारिक विश्व का मूल है, भतएव इसे वैज्ञानिक परिभाषा में विश्वसृ कहा जाता है । अक्षर को हमने कुर्वदरूप बतलाया है । मन त्राण - वाक् ये तीन मव्ययभाग सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं । मन से कामना होती है । प्राण से तप होता है । वाक् से श्रम होता है । दूसरे शब्दों में मनोव्यापार कामना है । प्राणव्यापार तप है । वाक्व्यापार श्रम है । चाहे भावसृष्टि हो या विकार-सृष्टि हो, दोनों में तीनों वम्मं प्रपेक्षित हैं । इन तीनों में भव्यय मनोव्यापार से सम्बन्ध रखता है । क्योंकि वह ज्ञानमय है । प्रात्मक्षर वागुव्यापार से सम्बन्ध रखता है क्योंकि वह प्रर्थरूप है । मध्यस्थ कुर्वद्रूप अक्षर का प्राणव्यापाररूप तप से सम्बन्ध है । यही तपोभूति प्रक्षर क्षर द्वारा प्राकृत - ब्रह्म का जनक बनता है । प्रक्षर का व्यापार तप है यह कहो, या प्रक्षर प्रारणरूप होने से स्वयं तपोमूर्ति है - यह कहो - एक ही बात है । तप के पूर्वभाग में श्रव्ययरूप काम है । उत्तरभाग में आत्मक्षररूप श्रम है । तपग्रहण से काम - तप- श्रमरूप प्रभ्यय - अक्षर - क्षर तीनों का ग्रहण है । तीनों पुरुषों की समष्टि से ही यद्यपि प्रकृति उत्पन्न होता है, परन्तु कुर्वद्रूपता के कारण प्रधानता तपोमूर्ति अक्षर को ही दी जाती है । अव्यय - प्रक्षर - क्षर तीनों अविनाभूत हैं । तीनों मिल कर एक प्रमृततत्त्व है, ग्रात्मतत्त्व है, पुरुषतत्त्व है, इसीलिए तो छठे मन्त्र में भूतयोनि भ्रात्मक्षर, सुसूक्ष्म भव्यय एवं मद्रेश्य ग्राय भक्षर-तीनों के लिए ' तत् ' ' तत् ' कहा है । तीनों तस्वस्वरूप से सर्वथा मित्र हैं । पव्यय प्रालम्बना है । अक्षर निमित्तब्रह्म 1 प्रात्मक्षर उपादान ब्रह्म है । इस भेद को दिखाने के लिए तो ऋषि ने एक ' तत् ' न कह कर तीन बार ' तत् ' शब्द का प्रयोग किया । साथ ही में तीनों भविना भूत हैं । तीनों की समष्टि एक अमृत बह्म है - इस विद्या को सिखाने के लिए तीनों ही के लिए उस ' तत् ' का ही प्रयोग किया है । इस त्रिमूत्तिरूप पुरुष के मध्यपतित अमृत नाम से प्रसिद्ध प्राणप्रधान होने से तपोमूर्ति, प्रव्ययालम्बित भक्षर से आत्मक्षर द्वारा सर्वप्रथम चितिक्रम से प्राण - प्रापः वाक्- भन्न प्रन्नादान्नरूप प्राकृत - ब्रह्म ( विश्वसृट् ) ही उत्पन्न होता । इसी ब्रह्मोत्पत्तिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं- तपसा चोयते ब्रह्म ( तपोमूत्तिना - प्रक्षरेण प्रात्मक्षर द्वारा ब्रह्म चीयते ) । यही ब्रह्म वेदति है । यही ब्रह्म श्रागे जाकर ब्रह्मसत्यरूप में परिणत हो जाता है । ब्रह्म को हमने विश्वसृट् कहा है । विश्वसृट् शुद्ध क्षरब्रह्म है । भागे जा कर इनका पञ्चीकरण होता है । इस पञ्जीकरण प्रक्रिया को ही ' यज्ञ ' कहते हैं । यज्ञ अन्न- मन्नाद - भाव सम्बन्ध रखता है । एक में अन्य का [ २ ९ ]
पृष्ठ 38
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण मिलना ही यज्ञव्यापार है । इसमें जो स्वस्थान पर श्राधार रूप से प्रतिष्ठित रहता है वह तो ग्रन्नाद कहलाता है एवं उसमें श्राधेय बनने वाला तत्त्व न कहलाता है । यह अन्न अन्नाद की साधारण परिभाषा है । वस्त्र प्रश्न है, शरीर अन्नाद है । अंगुली प्रन्नाद है, अंगूठी बन्न है । यज्ञस्वरूप प्रताहुति पर निर्भर है एवं प्रजासृष्टि यज्ञ पर निर्भर है । बिना अन्नाहृतिरूप यज्ञ के तप से ( तपोमूत्ति प्रक्षर द्वारा प्रात्मक्षर से ) उत्पन्न होने वाला ब्रह्म ( विश्वसृट् ) विश्वप्रजा को उत्पन्न करने में तब तक सर्वथा असमर्थ हैं, जब तक कि वह प्रन्नवृत्ति उत्पन्न कर यज्ञ रूप में परिणत न हो जाए । प्राकृतेश्वर ( प्रकृतिब्रह्म ) से सृष्टि नहीं होती, प्रपि तु यज्ञेश्वर से सृष्टि होती है । इसी विज्ञान के आधार पर यह कहा जाता है— “ सहयशाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । श्रनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् " ॥ " कहना यही है कि ब्रह्म के उत्पन्न हुए बाद प्रन्नवृत्ति उत्पन्न होती है । अब तक जो पञ्चकल प्राकृत- ब्रह्य था वह केवल भन्नाद ही था । अब उसी में से यज्ञ - साधिका प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । इस वृत्ति के उत्पन्न होते ही प्रकृतिग्रह्म का प्राणभाग तो पाघार बनता हुमा प्रशाद बन जाता है एवं भापः - बाक् प्रन्न प्रन्नाद ये चारों भाग माधेय बनते हुए मन्न बन जाते हैं । इन चारों की उसमें प्राहुति हो जाती है । इसी प्रकार पाँचों प्राधार बनते हैं । प्रत्येक में शेष चार - चार भाषेय बनते हैं । इस अन्न - प्रन्नादभाव से सब में सबकी सत्ता हो जाती है, प्रतएव इस प्राथमिक प्रजापति ( ईश्वर ) यज्ञ को सर्वहुत - यज्ञ कहा जाता है । सबहुत ( भागे भाने वाले यज्ञसत्य निरूपण ) में गार्ह ० विष्ण्य ० प्राह ० १ रूप त्रेताग्निमय जिस यज्ञ का प्रतिपादन किया जाएगा, उस यज्ञ से यह सर्वहुत - यज्ञ पृथक् है । इसके पेट में वह यज्ञ रहता है । वह यह तो बेवसत्य पर प्रतिष्ठित है । इधर हमारा यह सर्वहुतयज्ञ देवसत्य-रूप ब्रह्मसत्य की भी प्रतिष्ठा है । यह यज्ञ मग्नि- सोममय है । वेद के आधार पर उत्पन्न होता है । इधर हमारा यह सर्वहुत - यज्ञ पञ्चीकृत प्राण धापः वाक् मन्त्र- अन्नादमय है एवं इससे वेद उत्पन्न होने वाला है । भागे जाकर हम यश को देवसत्य पर प्रतिष्ठित रहने वाला बतलाने वाले हैं । यहाँ हम यज्ञ को ब्रह्म-सत्य की भी प्रतिष्ठा बतला रहे हैं- इसमें भ्रम होने की संभावना है । वह न हो, एतदर्थं यहां संक्षिप्त रूप से दोनों का स्पष्टीकरण कर दिया है । यदि भन्नवृत्ति न होती तो यश न होता । बिना यश के इनका पञ्चीकरण न होता । बिना पव्चीकरण के धागे की सृष्टि न होती । एतदर्थं ब्रह्म के अनन्तर सृष्टि-कामुक प्रजापति की कामना से धन्नवृत्ति को उत्पन्न होना पड़ा । उसके उत्पन्न होते ही पाँचों का सर्वहृतयज्ञ होगा । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— ततोऽन्नमभिजायते - ( ब्रह्मानन्तरं तबभिलक्ष्य पद्मवृत्तिरुत्पद्यते ) । न प्रतिद्रव्य है । जिसमें धन पाहत होता है - वह प्रसादस्वरूप प्राण है । अन्नाद- मन दोनों " के समुच्चय का नाम यज्ञ है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । कितने ही कहते हैं कि प्रसादरूप १ गीता ३।१०१ २ गार्हपत्य, धिष्ण्य, आहवनीय । [ ३० ]
पृष्ठ 39
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) १ शत ० ब्रा ० १४ | ४ | ३ | १० | ३ ऋग्वेद मं ० १०६०।६-१० । पराविद्यानिरूपण मुण्डकोपनिषद्विशान भाष्य २ यजुर्वेद ३४।६ | ४ तैत्तिरीयोप ० २।६ । [ ३१ ] प्राण ( प्राणाग्नि ) ही यज्ञ है । परन्तु वैज्ञानिकों का मत है कि न केवल भ्रप्त से यज्ञ सम्भव है, न प्राण से सम्भव है - प्रपि तु, जब दोनों मिल जाते हैं तब यज्ञ - स्वरूप सम्पन्न होता है । निष्कर्ष यही है कि प्रश्न-नाद दो भावों पर सर्वहुत - यश अवलम्बित है । वह प्राकृतब्रह्म अन्नाहुति से प्राण धौर अन्न इन दो रूपों में परिणत हो जाता है । प्राण अन्नाद है । प्रसादशब्द मनसापेम है । जब तक मन नहीं तब तक अनाद ' नाद ' नहीं, भतएव प्रनवृत्ति के उत्पन्न होने से पहले वह ब्रह्म केवल ब्रह्म था । ब्रह्म के बाद अन्न-वृत्ति उत्पन्न होती है । इसके उत्पन्न होते ही अन्न के प्रभाव से, प्रताहुति के प्रभाव से, वह अन्नाद प्राणरूप में परिणत हो जाता है । उसी समय दोनों के समन्वय से सर्वहुत - यज्ञ का स्वरूप सम्पन्न हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर बनात् प्राणः - यह कहा है । आत्मा की वाक् प्राण - मन ये तीन कलाएं होती हैं । इसीलिए वा एष झात्मा चाङ्मयः प्राण-यो मनोमयः १ - यह कहा जाता है । भन वाक् है । प्राण प्राण है । दोनों का समन्वय यज्ञ है । दोनों के समन्वय से मनोभाव उदित हो जाता है । मन - हृत्प्रतिष्ठं यबजिरं अविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्प-मस्तु े - के अनुसार हृदय में प्रतिष्ठित होता है । भग्नीषोमीय ( यज्ञिय ) वस्तु में ही हृदय होता है । अग्नी-षोम पिण्डाधिष्ठाता है । पिण्ड यशरूप है । जब तक पिण्ड नहीं तब तक केन्द्र नहीं । जब तक केन्द्र नहीं, तब तक मन नहीं । अब तक प्रकृतिग्रह्म शुद्ध था - अयशिय था । भाज मन मोर प्राण ( मन्नादरूप-अग्निप्राण, प्रप्तरूप सोम ) के समन्वय से वह ' यज्ञमृति ' बन गया है, भतएव तदव्यवहितोत्तरकाल में ही इसमें केन्द्र भाव के कारण वही भव्यय - मन विकसित हो जाता है । मन के अनन्तर वह क्षरसह्य - प्रकृति-ब्रह्म यज्ञास्मा बन जाता है । यज्ञात्मा का प्रभाग वाक् है । प्रशादरूप प्राणभाग प्राण है । मन ' मन ' है । तीनों की समष्टि एक यज्ञात्मा है । इस प्रकार तप से उत्पन्न होनेवाला विश्वसृट् नाम से प्रसिद्ध पञ्चकल क्षरब्रह्म प्रप्त- प्राण - मन भाव को उत्पन कर पञ्चीकरणरूप सर्वहुत - यज्ञ के द्वारा ' यज्ञात्मा ' बन जाता है । इसी प्रभिप्राय से - धनात् प्राणः - ( ततः ) यमः - यह कहा है । सर्वच यशरूप करा ही पञ्चजन नाम से प्रसिद्ध है । इसी सर्वहुतयज्ञरूप पञ्चजन- ब्रह्म से क्रमश: - वेद, सोक, देवता, भूत, पशु, ये पाँच पुरंजन पैदा होते हैं । इसी प्रभिप्राय से-" तस्माद्यज्ञात् सर्वहृत ऋऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जशिरे तस्माद्यजुस्तस्मावजायत ॥
तस्मादश्वा प्रजायन्त ये के चोभयावतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता प्रजावयः " ॥
-इत्यादि कहा जाता है । सर्वहुतयज्ञ से उत्पन्न होने वाले पुरंजनों से स्वयंभू - परमेष्ठी -सूर्य-चन्द्रमा पृथिवी ये पाँच पुर उत्पन्न होते हैं । तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् - के मनुसार वह त्रिपुरूष-
पृष्ठ 40
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथममुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य पराविद्या निरूपण विशिष्ट प्राकृतवा - पञ्चजन - पुरंजन- पुर बनाकर इनके केन्द्र में प्रतिष्ठित हो जाता है । इसके केन्द्र में प्रतिष्ठित होते ही वे पाँचों ब्रह्म ' पुर ' ' सत्य ' नाम में परिणत हो जाते हैं । वह ब्रह्म - यज्ञात्मा बनता हुधा ' ब्रह्मसत्य ' बन जाता है । इस प्रकार प्रमृत के बाद ब्रह्म का भवतार होता है । ब्रह्म से ब्रह्मसत्य बनता है । दूसरे शब्दों में वही ब्रह्म ' ब्रह्म ' पुर में प्रतिष्ठित हो कर ब्रह्मसत्य बन जाता है । इसी ब्रह्म-सत्य के स्वरूप को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने सत्यम् कहा है । सत्य स्वयम्भू है । यद्यपि हमने पूर्व में स्वयम्भू परमेष्ठी प्रादि पांचों को सत्य बतलाया है, परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । सत्य केवल स्वयम्भू है । पहले पहल प्रथम के वेदपुरंजन से सत्यस्वयम्भू का उदय होता है । मनन्तर इसके पेट में क्रमशः - परमेष्ठी सूय्यं पृथिवी चन्द्रमा ये चार प्रतिमाप्रजापति प्रकट होते हैं । इन चार प्रतिमाप्रजापतियों की सत्ता सत्य - स्वयम्भू के पेट में है । पहला भवतार स्वयम्भू - सत्य का है, इसीलिए तो ऋषि ने सस्यानि न कह कर सत्यम् कहा है । इस सत्यलोक के पेट में क्रमश: -तपः- जन: - महः स्वः भुवः - भूः ये ६ लोक प्रातर्भूत होते हैं । सत्यलोक के पेट में इतर लोक - सृष्टि होती है । पृथिवीलोक भूः है । पृथिवी एवं सूर्य्यं के मध्य का चान्द्रलोक भुव: है । सूर्य्यलोक स्व: है । सूर्य्यं परमेष्ठी के मध्य का वायुलोक महलोंक है । परमेष्ठी जनर्लोक है । परमेष्ठी स्वयम्भू के मध्य का सूत्ररूप वायब्यलोक तपोलोक है । स्वयं स्वयम्भूलोक सत्यलोक है । सातों लोकों में सबसे पहले स्वयम्भू-सत्यलोक का विकास है । मनन्तर इतर लोक सृष्टि होती है । प्रत्येक लोक में एक - एक लोकी है मोर प्रत्येक लोकी का मिन -भिन्न कम्मं है । १ - स्वयम्भू, २ सूत्रवायु, ३- परमेष्ठी, ४ - शिववायु, ५ - सूय्यं, ६ - रूद्र-वायु, ( चन्द्रमा भी ), ७- पृथिवी - ये सात लोकी हैं । भू - प्रादि सातलोक हैं । प्रत्येक लोकी के नाम - रूप-कम् ये तीनों धम्मं सर्वथा पृथक् हैं । इस धम्मं भेद ने ही इन सातों को एक - दूसरे से विभक्त कर रखा है । स्वयम्भू से स्वयम्भू में रहने वाले यच्चयावत् पदार्थ अभिप्रेत हैं । यही नियम मागे के ६ हों लोकों में समझना चाहिए । नामरूपकम्मंमय सातों लोक लोकी हैं । नाम - रूप - कम्मे तीनों प्रभ्व हैं, मत्यंभाग हैं । इनमें भाधाररूप से अन्तः प्रविष्ट रहने वाला वही मन्तर्य्यामो प्रमृत प्रक्षर है । वही तो बह्य-सत्यलोकादिरूप में परिणत हो रहा है । लोक एवं लोकों में कर्म्मरूप प्रनन्तपदार्थ - ( प्रत्येक में वही प्रमृ-ताक्षर संसार के पदार्थमात्र ) परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । परन्तु अक्षररूप अमृततस्व सब में श्रमिन्न है । घट ज्ञान से घट का ज्ञान है । पट का प्रज्ञान । इस प्रकार नाम - रूप- कम्र्मात्मक संसार के पदार्थ एक दूसरे से भिन्न हैं, प्रतएव एक का ज्ञान धन्य के शान से भिन्न है । परन्तु इन सब मित्रों में ( कम्मंपुद्गलों में रहने वाला वह प्रभिन्नतत्व प्रमृताक्षर एक है । शौनक पूछते हैं-" कस्मिन्तु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विशालं भवति "? ऋषि कहते हैं-" कसु चामृतम् ” । ऋषि कहते हैं - कर्म्मसु चामृतम् । ऋषि का अभिप्राय यही है कि कम्र्म्ममय सर्वप्रपञ्च उसी ममृत से उत्पन्न हुआ है एवं उत्पन्न हुए उस सब प्रपञ्च में वह प्रमृत प्रतिष्ठित है । उस एक श्रमृत को जान लो । [ ३२ ]