Mundakopanoshad — पृष्ठ 41–50

Mundakopanoshad · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

Mundakopanoshad, पृष्ठ 41 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथममुण्डक ( प्रथखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य मानन्द - विज्ञान- मन - प्राण- यामय अव्यय पौरुषं ब्रह्म ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - धग्नि - सोममय = अक्षर ब्रह्मा - विष्णु-- इन्द्र- प्रग्नि- सोममय = प्रात्मक्षर ( --- प्राण - मापः - वाक्- धनाद - प्रत्रमय विकारक्षर शुद्ध पचीकृत - प्राण - प्रापः वाक् - पन्नाद - मन्नमय = पञ्चजन प्राकृतं ब्रह्म वेद - लोक - देव - भूत - पशुमय = पुरंजन स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूय्यं पृथिवी - चन्द्रमय = पुर शुक्रियं ब्रह्म [ भौतिकी सृष्टि: -१ शत ० ब्रा ० १।१।२।१ । [ ३३ ] पराविद्या निरूपण अमृतात्मा ' प्रमृतम् ' -सत्यात्मा ' ब्रह्म ' -यज्ञात्मा ' यज्ञ: ' उसके जान लेने से सब कुछ विज्ञात हो जाएगा । मन्त्र का विषय समाप्त हो गया । घब दो चार बातें धौर बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । प्रमृत - ब्रह्म - यज्ञ ये तीन प्रपञ्च पूर्व में बतलाए हैं । तीनों में सर्वहुतयज्ञ का तो ब्रह्म में ही अन्तर्भाव है । इससे यज्ञ अलग बच जाता है । सूर्य्यं से नीचे उत्पन्न होने वाली वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञमयी त्रेताग्निरूपा जो मौतिकी मर्त्या सृष्टि है - वही तीसरा यशसत्य है । के खण्ड में ऋषि इसी यज्ञसत्य का निरूपण करने वाले हैं, भ्रतः इसके विषय में यहाँ प्रषिक कुछ नहीं कहना चाहते । यह यज्ञ भूतानन्ततया अनन्त है । प्रतिपदार्थं यज्ञ है । प्रतियश का प्राधार वेद है । जैसे ब्रह्मसत्य का मूलभूत यज्ञ ' सर्वहुतयज्ञ ' कहलाता है, एवमेव ये धनन्त भौतिक त्रेताग्निरूप यज्ञ विश्वामि नाम से प्रसिद्ध हैं । दूसरे शब्दों में समष्ट्यात्मक ईश्वरयज्ञ सर्वहुतयज्ञ हैं । एक प्रकार से सर्वहुतयक्ष का निर्वचन प्रारम्भ में ही कर दिया था । सारे विश्वदा नियज्ञ उस पशुपति ईश्वर के पाश से उसी में हृत रहते हैं । इसलिए भी वह समष्टिरूप ईश्वरमश सर्वहृतयज्ञ कहलाता है एवं व्यष्ट्रयात्मक विश्वदा नियज्ञ जीवयज्ञ है । यज्ञो वै कर्म्म ' के अनुसार यज्ञ कम्मं है । जीवेश्वरभेद से यशकम्मे धनन्त हैं । उन सब कम्मों में वही प्रमृताक्षर प्रतिष्ठित है । उसे पहचानिए । मनोयोग से उसे निशाना बना कर तीर चलाइए । उसकी उपासना कीजिए । पूर्व के प्रकरण से यह भी सिद्ध हो जाता है कि पञ्चकस-अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल प्रात्मक्षर इन तीनों पुरुषों की समष्टि अमृतम् है । विकारक्षर, पञ्चजन, पुरंजन, पुर - इन सबकी समष्टि ब्रह्म है । यही ब्रह्मसत्य है एवं भौतिकी जीव - सृष्टि यश है । सबका मूलाधार वही भमृत है । यह है इस मन्त्र का एक प्रकार से सृष्टि - विषयक अर्थं । यह मन्त्र एक प्रकार का अनुगम मन्त्र है । इसके दृष्टिकोणभेद से प्रनेक प्रथं हो सकते हैं । प्रकरण प्रावश्यकता से अधिक लम्बा हो गया है, अतएव अन्य मथ के झमेले में न पड़कर केवल एक अयं का संक्षिप्त निरूपण करके इस प्रकरण को समाप्त करते हैं ।

पृष्ठ 42

Mundakopanoshad, पृष्ठ 42 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

tee ( प्रथमखण्ड ) पराविद्यानिरूपण सारा प्रपञ्च ग्रात्मा च विश्वं च के अनुसार मात्मा और विश्व इन दो भागों में विभक्त है । विश्व ' सृष्टब्रह्म ' है । भात्मा विश्व में प्रविष्ट ' प्रविष्टब्रह्म ' है । दोनों की समष्टि सम् है । जिसने दोनों को, दोनों के संचर - प्रतिसंच रक्रम को जान लिया, उसने सब कुछ जान लिया । बस, ऋषि ने छठे मन्त्र में ब्रात्मा का स्वरूप बतलाया है । ७ वें में ' श्रात्मा विश्व कैसे उत्पन्न करता है? काम्यंविश्व का कारण-भूत मात्मा के साथ कैसा सम्बन्ध है? ' - यह बतलाया गया है एवं तपसा चीयते ब्रह्म इस आठवें मन्त्र में विश्व का स्वरूप बतलाया गया हैं । विश्व प्रविष्ट भ्रात्मा को ' पोडशी ' कहते । म्रव्यय - अक्षर प्रात्मक्षर - परात्पर की समष्टि मात्मा है । इनमें परात्पर घोर अव्यय एक वस्तु हैं । इस प्रकार भव्यय-मक्षर - मात्मक्षर मारा घातुक ही रह जाता है । इस आत्मा का धव्यय - भाग भूतेश्वर हैं- विभु है- सर्वे -व्यापक है - सुसूक्ष्म है । प्रक्षर -भाग भूतभावन है - मद्रेश्य है- मचक्षुः श्रोत्र है । क्षर - भाग भूतयोनि हैं । तीनों मिल कर एक मात्मा है । छठे मन्त्र में इसका प्रतिस्पष्ट निरूपण हैं । सातवें में कार्य्य - कारणभाव का उल्लेख है । श्रात्मा से उत्पन्न होनेवाला विश्व स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवीभेद से पचावयव है । विकारक्षर - पञ्चजन- पुरंजन तीनों क्षरभागों का स्वयम्भू घादि में भन्तर्भाव है । स्वयम्भू वेदमय होने से ब्रह्म है । इसके पेट में प्रापोमय परमेष्ठी उत्पन्न होता है । परमेष्ठी वा धोरमः ' के अनुसार ब्रह्म के पेट में रहनेवाला परमेष्ठी मन्त्र है । सोम भन्न है । परमेष्ठी सोममय है । इसी पारमेष्ठ्य सोमान्न के लिए- तृतीयस्था के इतो विधि सोम प्रासोत् - यह कहा जाता है । इस सोमाहुति से सौर प्रारण प्रज्वलित होता है । मन से ही - प्राणः प्रजानामुख्यत्येव सुयं: 3 - के अनुसार प्राणघन प्रारूप सूर्य्य प्रतिष्ठित है । पारमेष्ठ्य - सोम सूय्यं में निरन्तर माहुत हो रहा है । इसी से प्राणरूप सूयं प्रतिष्ठित है । सूय्यं के नीचे बृद्रमा है । यह उस ईश्वरात्मा का मन है । चन्द्रमा के नीचे पृथिवी है । पृथिवी भग्निमय होने से सत्य है । यह है- विश्वरूप ईश्वर का शरीर । इसमें भूः भुवः प्रादि सात लोक हैं । इन्हीं सातों लोकों के भिप्राय से उसके लिए संवेष्टिता डटसप्त वितस्तिकाय. - इत्यादि कहा जाता है । सातों लोकों में ( सप्लोकात्मक ईश्वरशरीर में ) विश्वदानि यज्ञकर्म्मरूप भ्रमन्त जीव प्रतिष्ठित हैं । प्रत्येक में वही प्रमृतात्मा ( घक्षरात्मा आत्मा ) व्याप्त है । इस प्रकार यह मन्त्र मली मति मात्मा के सप्त वितस्ति युक्त शरीर का और उसमें रहनेवाली मनन्त प्रणामों का निरूपण कर देता है । परन्तु लक्ष्य ऋषि का वही अमृताक्षर है । इसलिए उपसंहार में कम्र्म्मसु चामृतम् यही कहा है--तपसा चीयते -- ब्रह्म - स्वयम्भूः स्वयम्भूः प्रभ्यामयंत् ततः ----- पन्नम् - परमेष्ठी - परमेष्ठी वा सोपनः झषात् -प्राण: -: -सूर्य: -: -- प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ततः ------ मनः - चन्द्रमा: --- चद्रमा मनसो जात: वत: ---सत्यम् - पृथिवी प्रग्निर्वै सत्यम् १ ते ० ब्रा ० १।७।१०।६ । २ ते ० ब्रा ० १।१।३।१० ३ प्रश्नोप ० ११८ | [ ३४ ]

पृष्ठ 43

Mundakopanoshad, पृष्ठ 43 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

sense ( प्रथमखण्ड ) ततः --- - लोका: - सप्तलोकाः कर्माणि - जीवाः कर्म्मसु -- प्रमृतम् प्रक्षरम् १ गीता ३३५ । पराविद्यनिरुपण 11 5 11 8 ----[ ३५ ]. प्रश्न - प्राण - मन - तत्य - लोक - कम्मं प्रमृत इनसे अध्यात्म - विद्या भी सम्यक् प्रकार से गतार्थं हो जाती हैं । जीवात्मा ब्रह्म है । काम करना उसका तप हैं । यदि वह तपश्चय्य करता है —– काय्र्य्यं करता रहता है तो इससे भात्मा दिन - दिन चीयमान होता रहता है, वृद्धि को प्राप्त होता रहता है । प्रकम्मंण्य मनुष्य का भात्मा चीयमान होने की मपेक्षा उलटा हसीयान् होता है । श्रुति शिक्षा देती है कि यदि तुम अपने ब्रह्म को चितिरूप में ( दृद्धिरूप में ) देखना चाहते हो तो तप करो, काम करो । निठल्ले रहना- प्रात्मपतन का पहला कारण है । कर्म्मण्य बनना - प्रात्मोन्नति का प्रधान हेतु है । तप द्वारा यदि तुम्हारा ब्रह्म चिति - सम्पन्न है तो वह धनसम्पति प्राप्त करने में पूर्ण समर्थ है । प्रकम्ध्य-मनुष्यों का प्रात्मा निर्बल रहता है, भषित रहता है, भतएव वे सदा प्रन्नवस्त्र के लिए श्राहि - त्राहि किया करते हैं । ऐसे प्रकर्मण्यों को दोनों समय पेट भर भोजन भी नहीं मिलता । अन्य सम्पत्ति की तो कथा ही क्या है? परन्तु कम्मंठों का मात्मा प्रबल रहता है । वे परिश्रम द्वारा यथेष्ट धन - सम्पत्ति प्राप्त कर लेते हैं, धन - धान्य पशु गृह मादि भोग्य मात्र पत्र हैं । इस मन से उनका प्राण प्रबल हो जाता है । प्राण से मन में एक प्रकार का बल मा जाता है । ऐसे ही कम्मंबीर संसार में ' महाशय ' कहलाते हैं । प्रभाव मनुत है । सत्ता सत्य है । प्रकम्मैण्यों का जीना न जीने के समान है । वे भतृत हैं, कुछ नहीं हैं । परन्तु तप द्वारा जिन्होंने मन - प्राण- मनोबल बढा लिया है - ऐसों का रहना ही रहना है । ऐसे ही मनुष्य सत्यभावापश्त्र हैं- प्रतिष्ठित हैं । यह लोक ऐसों के लिए ही है । ऐसे लोकों में रहते हुए सत्यमा वापस वे कम्मंठ मनुष्य निरन्तर कर्म्म करते हैं एवं अपने कृतकम्मों में उत्तमोत्तम फल देखते हैं । उन्हीं कम्मों से वे स्वर्गरूप प्रमृतभाव भी प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं । यह तो हुआ व्यावहारिक प्रयं । अब जरा परमार्थ की मोर मी दृष्टि डालिए । परमार्थकोटि में भारमा रिर क्रिया करता ही रहता है । न हि कश्चित् जखमपि जातु तिष्ठत्यकम्मंत् ' के अनुसार ग्रह निरन्तर कुछ न कुछ कम्मं किया करता है । इस कम्मं से ही, कम्मंसंतान से ही, यह अपना स्वरूप बनाए हुए है । यह अन्न खाता है । मुक्तान में पार्थिव प्रान्तरिक्ष्य - दिव्य ( सोम ) तीनों रस हैं । इनमें रस, पट्ट, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र ये सात घातु पार्थिव प्रश्न हैं । भोज भान्तरिष्य प्राप्थ है । यह प्रश से उत्पन्न हुआ है । दिव्यभाग शुद्ध सोमरूप है - यही मन है । अन्न ' वाक् ' है । प्राण ' प्राण ' है । मन ' मन ' है । तीनों की समष्टि प्रात्मा है - यह सत्य है । सत्यात्मा शरीरलोक में प्रतिष्ठित होकर निरन्तर कर्म्म करता रहता है । जब तक कर्म्म है, तभी तक अमृतरूप जीवात्मा है । कम्र्म्मविराम ही अमृत - विराम है ।

पृष्ठ 44

Mundakopanoshad, पृष्ठ 44 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) परन्तु यद्यपि आठवें मन्त्र से ऋषि अभी इन्हें पूर्णसंतोष न हुमा, करते हुए धागे जा कर ऋषि कहते मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्यानिरूपण को सृष्टि के विषय में जो कुछ कहना चाहिए था - कह दिया । पतएव सृष्टिविषयक गुप्त रहस्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण

-" यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।

तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते " ॥ ॥

' अक्षर ' क्षर द्वारा सारा संसार उत्पन्न करता है । छन्त प्रकार की सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं । उन ग्रनन्त प्रकार की ( परस्पर में सर्वथा मिन ) सृष्टियों का तीन ही सृष्टियों में भन्तर्भाव है । जैसे धात्मा के मन - प्रारण वाक् माग सृष्टि के साधारण ( सामान्य ) अनुबंध हैं- एवमेव ब्रह्म, नामरूप, भन्त ये तीन सर्व सृष्टि के यच्चयावत् पदार्थों से सम्बन्ध रखते हैं । सम्बन्ध क्या रखते हैं? तीनों की समष्टि का नाम ही सृष्टि है । उस प्रक्षर प्रजापति से जो सृष्टि होती है - उसका क्या स्वरूप है? उत्तर है-ब्रह्म - नामरूप - मन्न । उदाहरण के लिए सूयं को ले लीजिए । सूय्यं में एक प्रतिष्ठा तत्त्व है - ठहराव है । इस प्रतिष्ठातस्य का ही नाम ' ब्रह्म ' है । सूर्य्यं यह ' नाम ' है, हिरण्मय इसका ' रूप ' है । नामरूप किसी वस्तु का हुआ करता है । किसका नाम, किसका रूप - की जिज्ञासा इस प्रतिष्ठा तत्व से हो शान्त होती है । पहले प्रतिष्ठा तत्व होगा, दूसरे शब्दों में जब कोई वस्तु होगी तब ही उसका नामरूप होगा । इसी अभिप्राय से इस ब्रह्यतस्व के लिए ब्रह्म में सर्वस्य प्रतिष्ठा, ब्रह्म मे सर्वस्य प्रथमणम् ' - यह कहा जाता है । वस्तु का हमें मान होता है । यह भाति एक प्रकार का प्रकाश है - ज्योति है । यदि नामरूप न सो वस्तु प्रकाशित ही न हो, प्रतएव ब्रह्म - प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित इस नामरूप- समष्टि को हम ' ज्योति ' कहने के लिए तय्यार हैं । नामरूपी ज्योति की प्रतिष्ठा ब्रह्म है । परन्तु इन दोनों की ब्रह्म, नामरूप की प्रतिष्ठा भ्रम है । नामरूपात्मक प्रतिष्ठा भावापन्न जो भी है, वह निरन्तर प्रादान- विसर्ग किया करता है । यही कम्मे है । नामरूप - कम् इन तीनों में नामरूप ' ज्योति ' है । कम्मे पादान- विसरूप है । प्रत्येक वस्तु में पक्ष की माहुति होती रहती है । नाहुति व्यापार ही ' यज्ञ ' कहलाता है । यही यश श्रात्मरक्षा का साधन होने के कारण ब्राह्मण ग्रन्थों में बेष्ठतम कर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है । जिस समय भषाहुति गायब हो जाती है - उसी समय नामरूपा दोनों विलीन हो जाते हैं, प्रतएव पक्ष को हम प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा कहने के लिए तय्यार हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर प्रसाबीनं जगत् सर्वं - यह कहा जाता है । प्रतिष्ठातव का ही नाम प्रति है । मनःप्राणवाचा संघातः सता के अनुसार मन - प्राण वाक् की समष्टि का नाम ही प्रति है - यही प्रतिष्ठा है । मन का वैकारिक मत्र्त्यभाग ' रूप ' है । वाक् का मत्यं भाग ' नाम ' है एवं प्राण का मत्यंभाग ' कम्र्म्म ' हैं । मन - प्राण वाक् प्रमृत है - यही सत्ताब्रह्म है । नामरूपकम्मोपहित इसी शुद्ध-अतएव सामान्य नाम से व्यवहृत सत्ता - तत्व के लिए यह कहा जाता है --१ शत ० ग्रा ० ६।१।१६ | २ शत ० ब्रा ० १।७।१।५ । [ ३६ ]

पृष्ठ 45

Mundakopanoshad, पृष्ठ 45 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

sense ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्यं. पराविद्यानिरूपणे

" प्रत्यस्ताशेषमेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् ।

वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् " ॥

इस सत्ता के प्राधार पर ( ब्रह्म के आधार पर ) नाम, रूपात्मिक ज्योति, कम्मरूप प्रलयज्ञ प्रतिष्ठित है । बस, यही सारी सृष्टि है । ब्रह्म नामरूप मन्न कहो या प्रतिष्ठा - ज्योति - यज्ञ कहो एक ही बात है । पूर्व का मन्त्र इसी सृष्टि का निरूपण करता है । मन के सम्बन्ध से वह सर्वज्ञ है । प्राण के सम्बन्ध से ज्ञानमय तपोयुक्त होता हुधा सर्वशक्तिमान् है एवं अर्थरूप वाक् के कारण सर्ववित् है । बस, सवंश, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मोपपत्र ज्ञान क्रियाशक्तिधन उस भव्ययात्मक्षरगमिताक्षर पुरुष से ब्रह्म, नामरूप, अत नाम से प्रसिद्ध प्रतिष्ठा ज्योति - यश - ये तीन सृष्टियां होती हैं ॥। ६ ॥ ॥ इति पराविद्या निरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥ । ३७ }

पृष्ठ 46

Mundakopanoshad, पृष्ठ 46 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ प्रथममुण्डके-श्रपराविद्यानिरूपणात्मको द्वितीयः खण्डः २

पृष्ठ 47

Mundakopanoshad, पृष्ठ 47 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथममुण्डके द्वितीयः ण्डः तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्मारिण कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुषा संत-तानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥

यदा लेलायते ह्यचिः समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावसरेणाहुतीः प्रतिपादयेच्छ्रया हुतम् ॥ २ ॥

यस्याग्निहोत्रमदर्शमपोरांमास मचातुर्मास्यमनाप्रयणमतिथिर्वाजितं च 1 प्रतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥ ३ ॥

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्यावदायन् । तत्रयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिववन्त्योऽर्थयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ । लवा ह्येते प्रा यज्ञरूपा प्रष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म । एतच्छ्रेयो ये s भिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥

श्रविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंः घोराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥

[ ४१ ]

पृष्ठ 48

Mundakopanoshad, पृष्ठ 48 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्यानिरूपण

विद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।

यत्करिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीरालोक्न इच्यवन्ते ॥ ६ ॥

इष्टापूतं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुमृत्येमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥

तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्य रष्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।

हारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥

परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥

तस्मै स विद्वानुपसज्ञाय सम्यक्प्रशान्तचिताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥

॥ इति प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ ॥ २ ॥

[ ४२ ]

पृष्ठ 49

Mundakopanoshad, पृष्ठ 49 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः अपराविद्यानिरूपणम् [ विज्ञानभाष्य ] इस उपनिषत् में प्रधानरूप से ईश्वरीय देवसत्य का निरूपण है - यह प्रकरस के प्रारम्भ में ही कहा जा चुका है । यदि संकुचित भाव को सामने रख कर इस उपनिषत् के निरूपणीय विषय का विचार करें तो वह सत्य ही होगा । प्रधान लक्ष्य यद्यपि देवसस्य पर ही है, तथापि साधारणदृष्टि सत्य-निरूपण की भोर ही है । सत्य कुल चार प्रकार के हैं । सबसे पहला सत्य अक्षर है । प्रक्षर को सत्य कहा सकता है और नहीं भी कहा जा सकता है । प्रातिस्विकरूप से शुद्ध अक्षर सत्य नहीं है - प्रसृत है । वैकारिक प्रोममय अक्षर सत्य है । सहृदयं सशरीरं वस्तु सत्यम् सत्य का यह परन्तु साधारण लक्षण है । इस लक्षण के अनुसार वस्तु पिण्ड सत्य है एवं हृदयस्य प्रक्षर भी सत्य है । हृदय पिण्ड में होता है । पिण्ड प्रग्नीषोम ( वैकारिक प्रग्नीषोम ) से बनता है, प्रतएव विकार की घपेक्षा से ही मक्षर को सत्य कहा जा सकता है । यही कारण है कि द्वितीयमुण्डक के प्रारम्भ में जहाँ ऋषि सवेतत् सत्यम् कहकर अक्षर - सत्य का निरूपण करने लगते हैं - साथ ही में बायु प्रादि वैकारिकपदार्थो का भी समावेश करने लगते हैं, क्योंकि बिना वैकारिक जगत् के शुद्धभक्षर सत्य से बाहर की वस्तु है, शुद्धअक्षर अमृत है । इस शुद्धप्रक्षर के सरभाग से विश्व उत्पन्न होता है । क्षराक्षरविशिष्ट स्वयम्भू प्रादि पांचों पिण्डों की समष्टिरूप विश्व ही ब्रह्मसत्य है एव ब्रह्मसत्य के पेट में वे ० हि ०१ - सर्वशात्मक देवसत्य है । इन दोनों के अलावा तीसरा एक यशसत्य है । यज्ञसत्य भी क्षररूप है, ब्रह्मवस्य भी क्षररूप है एवं देवसत्य मी रूप है परन्तु अक्षरसत्य अक्षररूप है । धव्ययालम्बन पर अक्षरसत्य प्रतिष्ठित है । प्रक्षरसत्य पर क्षररूप ब्रह्मसत्य प्रतिष्ठित है । ब्रह्मसत्य पर क्षररूप देवसत्य प्रतिष्ठित है । देवसत्य पर क्षररूप यज्ञसत्य प्रतिष्ठित है । पृथिवीपिण्ड ब्रह्मसत्य का भाग है । इसमें रहने वाला चितेनिधेय प्रग्नि धन - तरल- विरल वस्था में परिणत होता हुआ अपनी तीन संस्था बनाता है । ६-१५-२१ इन की स्थिति है । " 8 तक पृथिवी है । इसमें प्राग्नि है । १५ तक वायव्याग्नि है । २१ तक माविस्याग्नि है । ये ही स्तोम्यत्रिलोकी के तीन प्रतिष्ठावा देवता हैं । इनमें १७ पर रहने वाला पार्थिव अग्नि माहवनीय है । इसमें १७ से ऊपर रहने वाले सोम की बाहुति होती है । इस प्राहुति से यह प्रग्नि २१ तक चला जाता है । मग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यश है । २१ तक गया हुआ मग्नि अग्नीषोममय है, प्रतएव हम इसे यह कहने के लिए तय्यार हैं । इस श्रग्नियज्ञ का नाम ही विष्णु है । ६ तक पहला विक्रम है । १५ तक दूसरा विक्रम है । २१ तक तीसरा विक्रम है । यज्ञ को ही वैदिक - परिभाषा में विष्णु कहा जाता है । विष्णु मशः ३ - यशो में विष्णुः ४ - इत्यादि वचन प्रतिसुप्रसिद्ध हैं । पृथिवीपृष्ठ से २१ महर्गण तक व्याप्त रहने वाले इसी यज्ञाग्नि के विद्युत् पञ्चदश- एकविंश ये तीन बिभाग हो जाते हैं । त्रिस्थानीय अग्नि ' प्रग्नि ' है । पञ्चदशस्थानीयभग्नि वायष्परूप है । एक-१ ये = वैश्वानर, हि = हिरण्यगमं । ३ ऐ ० ब्रा ० प्र ० १।१५ । २ - पञ्चदश- एफविशस्तोम इनकी स्थिति है । ४ शत ० प्रा ० १३ | १ || [ ४३ ]

पृष्ठ 50

Mundakopanoshad, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य अपराविद्यानिरूपण विशस्थानीयग्निप्रादित्यात्मक है । प्रग्नि का मूलाधार ऋग्वेद है । वायु का मूलाधार यजुर्वेद है एवं प्रादित्य का मूलाधार सामवेद है । बाकी बचता है - यज्ञस्वरूपसम्पादकमग्नि में आहुत होने वाला सोम । इसका मूलाधार प्रथर्ववेद है । आपको यह विश्वास करना चाहिए कि जिन पुस्तकों को खाज नापने ऋग् - यजुःसाम - प्रथर्व वेद समझ रखा है - वे वेद नहीं हैं, अपितु, वेद की पुस्तकें हैं । वेद मौलिक तत्त्व है, सर्वत्र व्याप्त है । संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है- जो वेद न हो । जिसका वेद नहीं उसकी उपलब्धि नहीं । ग्रग्नीषोमात्मकं जगत् है । प्रग्नि का आधार भी वेद है । सोम का माघार भी वेद है । भग्नि तीन हैं । तदाधार वेद भी ऋग्यजुः साम भेद से तीन हैं । सोम एक है । तदाधार अथर्ववेद भी एक है । वेद के आधार पर प्रग्नीषोमात्मक यज्ञ प्रतिष्ठित है, भतएव यज्ञ के लिए - संवा त्रयी बिद्या यश: - यह कहा जाता है । कहना यही है कि क् - यजुः साम के प्राधार पर प्रग्निवायु-धावित्यरूप यज्ञ प्रतिष्ठित है । वेद के प्राधार पर यज्ञ प्रतिष्ठित है । इस यज्ञ का प्रग्निभाग गार्हपत्याग्नि है । स्तोम गार्हपत्यकुण्ड है- उसमें रहने वाला पार्थिवाग्नि गार्हपत्याग्नि है । पञ्चदशस्तोम तक रहने वाला प्रान्तरिक्ष्याग्नि दक्षिणा है । पञ्चदशस्तोमस्थ दक्षिणाग्नि कुण्ड है । मन्तरिक्ष में सोम - वायु-पापः तीनों रहते हैं । सोम दक्षता पैदा करने से दक्ष है । इस सोम के सम्बन्ध से प्रान्तरिक्ष्य वायव्याग्नि दक्षिणाग्नि कहलाने लगता है एवं सात भापः स्तर हैं । एक निर्ऋति है । नक्षत्र प्रापोमय है । नाक्षत्रि-का न f भी प्रापोमयी है । इसका सात आपःस्तर एवं भ्राठवां निऋति, इन पाठों से सम्बन्ध है । बस, नाक्षत्रिक प्रापोमयाग्नि के सम्बन्ध से मान्तरिक्ष्य वायष्याग्नि विष्ष्याग्नि कहलाने लगता है । इस प्रकार मध्यस्थ प्रग्नि दो अवस्थानों में परिणत हो जाता है । तीसरा एक विशस्थमग्नि प्राहवनीयाग्नि है । एक विशस्तमस्थान ग्राहवनीयकुण्ड है । इसमें निरन्तर सोम की धाहुति होती रहती है । इस सोमाहुति से ही यज्ञाग्नि स्व - स्वरूप से प्रतिष्ठित हो रहा है । इस प्राकृत - यज्ञ में भग्नि ' होता ' है । वायु पष्वर्यु है । मादित्य उद्गाता है । चन्द्रमा ब्रह्मा है । सूय्यं प्रजापति है - यजमान है । इस यजमान के ये चारों लिक इस त्रैलोक्य व्यापकयज्ञ का संचालन कर रहे हैं । इसी यज्ञ से संसार का स्वरूप प्रतिष्ठित है । जिस क्षण यह भग्नीषोमात्मक यज्ञ नष्ट हो जाएगा, उसी क्षण प्रग्नीषोममय सारा विषय उसी पारमेष्ठ्य समुद्र में विलीन हो जाएगा । पूर्व के प्रकरण से यह भली - मांति सिद्ध हो जाता है कि इस त्रेताग्नि का वितान ऋग्यजुः साम, इस वेदत्रयी के प्राधार पर ही होता है । प्रथममुण्डक के तपसा चोयते ब्रह्म • -- इत्यादि मन्त्र का निरूपण करते हुए यह बतलाया जा चुका है कि वेद का नाम ही ब्रह्म है । ब्रह्म को ही मन्त्र कहते हैं । इसी मन्त्रब्रह्म के ( वेद के ) प्राधार पर प्राकृतिक त्रेताग्निरूप स्वाहायज्ञ का स्वरूप प्रतिष्ठित है । इस प्राकृतयज्ञ की प्रतिकृतिभूत मनुष्ययज्ञ ( वैधयज्ञ ) में भी ऐसा ही होता है । क्योंकि वैधयज्ञ के प्राविष्कर्ता ऋषियों का देवानां वं विधामनु मनुष्याः -यहुं देवा कुंवस्तत् करवाणि - यहि सिद्धान्त है । प्रकृतिवत् यहाँ भी गार्हपत्य-दक्षिणा श्राहवनीय इन तीन अग्नियों का वितान किया जाता है एवं होता मध्वर्यु- ब्रह्मा- उद्गाता चार ऋत्विक् होते हैं । वल्लीसोम प्राहुतिद्रव्य होता है एवं उस प्राकृतिक मन्त्रब्रह्म ( परब्रह्म ) के प्राधार पर प्रतिष्ठित शब्दब्रह्म रूप अपरब्रह्म ( वेदमन्त्र ) के आधार पर ही यह यज्ञ सम्पन्न होता है । वेद - नियति-सूत्र इन तीनों में वेद भी सत्य है । वेद के प्राधार पर वितत होने वाला यज्ञ भी सत्य है । यज्ञ सोम-[ ४४ ]