Mundakopanoshad — पृष्ठ 51–60

Mundakopanoshad · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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ranush ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण गर्मित अग्निमय है । अग्नि अपना केन्द्र रखता है । मन्त्र - वाक् मी केन्द्र रखती है, प्रतएव सहृदयं सत्यम् इस लक्षण के अनुसार हम वेद और उस पर प्रतिष्ठित त्रेताग्निरूप यज्ञ को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । बस, इसी यज्ञसत्य का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-" तवेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुषा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ” ॥१ ॥

पूर्व के 8 वें मन्त्र में ( मुण्डक १।१।६ में ) बतला दिया गया है कि उस अक्षर के ज्ञानमय तत्त्व से ब्रह्म - नामरूप - अन्न नाम से प्रसिद्ध प्रतिष्ठा ज्योति - यश- ये सरभाव पैदा होते हैं । इनमें ब्रह्मरूप प्रतिष्ठा, नामरूपात्मक सत्य दोनों एक श्रेणी की वस्तु हैं । प्रनयज्ञ एक श्रेणी की वस्तु है । यश का प्राधारभूत जो त्रयी - ब्रह्म है - वही प्रतिष्ठा है । अक्षर से प्रात्मक्षर द्वारा सबसे पहले प्रतिष्ठारूप यही ब्रह्मतत्त्व ( वेदत्रयी ) प्रादुर्भूत होता है, प्रतएव इसके लिए ब्रह्म व सर्वस्य प्रथमजम् ब्रह्म वं सर्वस्य प्रतिष्ठा - यह कहा जाता है । इस ब्रह्म पर प्रतिष्ठित यज्ञ नामरूप से युक्त है । नामरूपक की समष्टि वस्तु है । इसमें कर्म्मभाग यज्ञ है । वह नाम - रूपात्मक है । इस प्रकार प्रतिष्ठा - ज्योतियंश इन तीनों का वेद, यज्ञ इन दो सत्यों में हो भन्तर्भाव हो जाता है । इस मुण्डक में बेद पर प्रतिष्ठित इसी धनात्मक यशसत्य का निरूपण करना है । शौनक ने कस्मिन्नु नगयो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति - यह प्रश्न किया था । इसके उत्तर में अंगिरा ने द्वे बिखे बेबितव्ये परा बंद अपरा छ, तथापरा व्हावेबो यजुबंदो - इत्यादि कहा था एवं प्रागे जाकर पराविद्यारूप प्रक्षर का निरूपण करके प्रथमखण्ड को समाप्त किया था । उस ब्रह्म के पर धीर पर दो भेद हैं । परापर समष्टि ही भोंकार है । इसका आधाभाग प्रमृताक्षरयुक्त है । भाषामाग मत्यंक्षरप्रधान है । सूर्य से नीचे पृथिवी अन्तरिक्ष - यो तीन लोक हैं । इन तीनों की दूसरे शब्दों में पृथिवी, चन्द्र की समष्टि अपरब्रह्म है । यही अपराविद्या है । महान् प्रव्यक्तमयग्रक्षर परब्रह्म है । एक ही भोम् के दो भांग हैं 1 पूर्वभाग प्रमृतप्रधान होने से विद्यामय है । अपरभाग मत्यंप्रधान होने से कम्मंमय है । दोनों खण्ड एक भोम् हैं । दोनों खण्ड सर्वथा विभक्त हैं । इस विद्या को सिखाने के लिए तो ऋषि ने दोनों के प्रतिपादन के लिए दो खण्ड रखे हैं । पहले में परब्रह्मविद्या का ( अक्षर का ) निरूपण किया है । दूसरे में सपर-ब्रह्मविद्या ( क्षरविद्या, त्रयीयज्ञ - विद्या ) का निरूपण किया है । दोनों मिल कर एक प्रोम् है, अतएव दोनों खण्डों का मुण्डक एक है । प्रथममुण्डक पोम्रूप है । पहलाखण्ड पराविद्या है । दूस राखण्ड अपराविद्या है । यज्ञरूप किंवा त्रयीरूप अपरविखा है विभिन्न, परन्तु प्रतिष्ठित यह अक्षर पर ही है । अक्षर के साथ इसका ग्रन्थि - बन्धन है । इसी विद्या को सिखाने के लिए प्रथमखण्ड के अन्त में तस्मादेतत् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते - कहते हुए ऋषि ने अक्षर के साथ प्रनयज्ञरूप अपराविद्या का निरूपण कर दिया है । इस प्रकार महारम्मा कृतघी ऋषि इशारे से बडी - बडी ग्रन्थियाँ सुलझाते हुए श्रात्म विद्या का निरूपण कर रहे हैं । सूर्य्य से ऊपर का वर्णन प्रथमखण्ड में था, सूय्यं के नीचे का वर्णन इस द्वितीय-खण्ड में है । इसमें मृत्युप्रधान सूर्य्य भी प्रन्तर्मूत है । सूय्यं श्रयीवेदधन है । यही ६ वें मन्त्र का ब्रह्म [ ४५ ]

पृष्ठ 52

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मुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण है । ज्ञानमय महदक्षर से सर्वप्रथम त्रयीरूप यही सौरहिरण्यगर्भ ब्रह्म प्रादुर्भूत होता है । इसीलिए इसके लिए— " हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक श्रासीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम " | " यह कहा जाता है । सूर्य्यपिण्ड चित्याग्निमय है । इसमें रहने वाला चितेनिधेय प्राण इन्द्र कहलाता है! यही मघवा इन्द्र रूपं रूपं मघवा योभवीति, इन्द्रो रूपाणि करोकुराचरत् के अनुसार रूप का अधिष्ठाता है । रूप के साथ नाम का सम्बन्ध है । नामरूप के साथ कम्मं का सम्बन्ध है । ईशोपनिषत् में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि सूय्यं में प्रव्यय के रूप मन-प्राण - वाक् इन तीन कलाओं का चिति - सम्बन्ध से विकास होता है । सूर्य्य वाङ्मय है । प्राण - प्रापः वाक् क्रम में सूर्य्य वाक् स्थानीय है । इसीलिए इसके लिए वाक् पतङ्गाय घोयते - यह कहा जाता है । सूय्यं प्राणमय है । इसीलिए इसके लिए प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूयः कहा जाता है । सूय्यं मनोमय है, मतएव इसके लिए प्रादित्यं मनः कहा जाता है । मन के आधार पर सामवेद का विकास है । प्राण के आधार पर यजुर्वेद का विकास है एवं वाक् के आधार पर ऋग्वेद का विकास है । मन - प्राण वाङ्मय -साम - यजु: -ऋक् रूप सूय्यं त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । इसकी ऋक्मयी वाक् से पृथिवी उत्पन्न होती है, अतएव पृथिवी वाङ्मयी है, यही ऋग्वेदमयी है । यजुम्मंय प्राणभाग से अन्तरिक्ष उत्पन्न होता है, यही प्राणमय है । साममय मनमाग से द्यौ की उत्पत्ति है, यह मनोमयी है । ऋक् का पार्थिव अग्नि से सम्बन्ध है । यजुः का अन्तरिक्ष्य - वायु से सम्बन्ध है । साम का दिव्य - मन ले सम्बन्ध है । इस प्रकार यशसिद्धि के लिए वह हिरण्यगर्भ सौर- प्रजापति पृथिवी धन्तरिक्ष- बोरूप स्तोम्यत्रिलोकी को उत्पन्न कर तीनों के भग्नि-वायु - माविश्य तीन भागों से अपने मन - प्राण वाक् द्वारा ऋग् - यजुः साम को उत्पन्न कर इनके आधार पर खाग्नि का वितान कर यज्ञ का संचालन कर रहा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं-" प्रग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनम् । दोह यशसिखर्थं ऋग्यजुः सामलक्षणम् " ॥ " इसी माघार पर बन्नेछ ग्वेदः, वायोर्यजुर्वेदः, आदित्यात् सामवेदः - कहा जाता है । भग्ति होता है । यह ऋग्वेदी है । होत्रकम्मं का ऋक् से ही सम्बन्ध है । वायु भ्रष्वर्यु है । यह यजुर्वेदी है । भाघ्वयंव कम् का यजुः से सम्बन्ध है । भादित्य उद्गाता है । यह सामवेदी है । प्रौद्गात्रकर्म्म का साम से सम्बन्ध है । इससे बतलाना यही है कि सूय्यं के मनभाग से तो रूप उत्पन्न होता है । प्राणभाग से कर्म्म होता १ यजुर्वेद १३।४ । ४ प्रश्नोप ० १।८ | २ ऋग्वेद मं ० ३।५३३८ । ५ मनुस्मृति १।२३ | ३ यजुर्वेद ३३८ । [ ४६ ।

पृष्ठ 53

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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्यानिरूपण है । वाक्माग से नाम उत्पन्न होता है । मन - प्राण- वाक् अमृतभाग है । इनका मर्त्यभाग ही नाम - रूप-कम्मं है । कर्म्म यज्ञ है । अन्न रूप है । नामरूप ज्योति है । स्वयं सूर्य्यं त्रयो ब्रह्म है । तीनों क्षर भाग हैं । तीनों का विकास उसी ज्ञानमय महदक्षर के ज्ञानमय तप से हुआ है । इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रख कर तस्मादेता, नाम रूपमन्नं च जायते - यह कहा है । इनमें नामरूप - कम्मरूप - यज्ञ तीनों एक हैं । तीनों ब्रह्म पर प्रतिष्ठित हैं । नामरूपात्मक यज्ञकर्म्म त्रयोब्रह्म पर प्रतिष्ठित है । परम वैज्ञानिक महर्षियों ने इन त्रयीब्रह्मरूप श्रयीमन्त्रों में प्राकृतिक नित्य अग्निहोत्रादि यज्ञ - कम्मों को देखा । विज्ञान-बल से उनका स्वरूाप पहचाना एवं पहचान कर लोक - कल्याण के लिए वैध गार्हपत्य विष्ण्य- माहवनीय इस नेताग्नि में अनेक प्रकार से उसका वितान किया । निष्कर्ष यही है कि ऋषियों ने प्रकृति में यज्ञ का जैसा स्वरूप समझा है ठीक वैसा ही स्वरूप इस मनुष्ययज्ञ का रखा है । प्रकृतियज्ञ पाक- हवि - महा - प्रति प्रवर्ग्यं भेद से पाङ्क्त है । तथैव यहाँ भी इन्हीं पांचों का विधान किया है । गृहयज्ञ पाकयज्ञ कहलाता है । यही स्मात्तयज्ञ है । यह त्रेताग्नियज्ञ नहीं है, अपि तु एकाग्नियज्ञ है । अग्न्याधानपूर्वक भग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबंध इतने हविर्यज्ञ हैं । सोमयज्ञ नामक ज्योतिष्टोम महायज्ञ है । इसी को ग्रहयज्ञ भी कहते है, इसके एकाह- अहीन - रात्रिसत्र - प्रयनसत्र चार भेद हैं । इसी अयनसत्र के लिए - सनं स्वर्गाय तोकाय सहसमासत - कहा जाता है । इस चतुविध ज्योतिष्टोम की नग्निष्टोमन्प्रत्यग्निष्टोम उक्थस्तोम - षोडशी स्तोम- प्रतिरात्रस्तोम - वाजपेयर तोम - अन्तर्यामिस्तोम ये सात संस्था हैं । यह सारा प्रपञ्च महायज्ञ में प्रन्तर्भूत हैं । राजसूय - वाजपेयं श्रश्वमेध चयन ये चार महायज्ञ हैं । प्रवम्यं नाम से प्रसिद्ध महावीरोपासना धम्मंयक्ष है । इस प्रकार यश पाँच मागों में विभक्त है । पाँच में पाक को छोड़ कर शेष चारों त्रेताग्नि पर प्रतिष्ठित हैं । इनके अनेक प्रवान्तर भेद हैं । इसीलिए त्रेतायां बहुधा संततानि - कहा है । ये कहने का एक मतलब भोर भी है । चतुर्युगव्यवस्था के धनुसार कृत- त्रेता द्वापर - कलि बार युग हैं । कल्याणप्राप्ति के ज्ञान कर्म्म - उपासना ये तीन मार्ग हैं । ये ही तीनों मार्ग ज्ञानयोग - उपासनायोग कर्मयोग नाम से प्रसिद्ध हैं । कम्र्म्मयोग पहला है, धनन्तर उपासना है । सर्वान्त में ज्ञानयोग है । उपासना भक्तियोग है । यह कम्मंयोग से सरल है । सबसे दुस्तर ज्ञानयोग है । उससे सरल कम्र्म्मयोग है । सबसे सरल भक्तियोग है । मन्त्रयोग - लययोग - हठयोग - राजयोग चारों भक्तियोग हैं । इनमें सब - इठ-राज तीन कठिन हैं । जपात्मक मन्त्रयोग सरल है । भगवन्नामसंकीर्तन का इसी जपात्मक मन्त्रयोग में धन्तर्भाव है । कृतयुग में बुद्धि का पूर्ण विकास है । चतुष्पाद धम्मं के सम्बन्ध इसमें बुद्धि पूर्णां है । मतः ज्ञानयोग कृतयुग की वस्तु है । त्रेता में एक भाग का विनाश है । कर्म्मयोग इस युग की वस्तु हैं । द्वापर में दो भागों का विनाश है । इसमें लय - राज - हटरूप उपासनापरपर्य्यायक भक्तियोग का सम्बन्ध है । कलि में एक चरण है । प्रत: इसमें भगवन्नामस्मरणरूप जपात्मक मन्त्रयोगरूप उपासना की प्रघानता है--ज्ञानयोग संन्यास योग-कर्म्मयोग -- यज्ञकलाप-उपासनायोग बुद्धियोगरूप - लय- हठ - राजयोग---- + कृतयुग + त्रेतायुग - द्वापरयुग भक्तियोग - भगवन्नामसंकीर्तनरूप जपात्मक मन्त्रयोग - व + कलियुग [ ४७ ]

पृष्ठ 54

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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपरा विद्यानिरूपण चूंकि त्रेतायुग में कम्र्म्मयोग की प्रधानता है । कम्मंयोग यज्ञप्रपञ्च है । इसीलिए त्रेतायां बहुषा संततानि कहा है । ऋषि भादेश करते हैं कि त्रेताग्निरूप यज्ञकम्मों का मन्त्रों के प्राधार पर प्राक्तन महामहर्षियों ने बड़े परिश्रम से उद्भावन किया है । अतः यशवानतपः कम्मं न त्याज्यं कार्यमेव तत् इस भगवदादेश को सामने रखते हुए तुम्हें सत्यकाम ( स्वर्गकाम ) बनते हुए नित्य ही यज्ञ दान तप करते रहना चाहिए । तुम्हें याद रखना चाहिए कि यह यज्ञमागं संसार में सुकृतमार्ग कहलाता है । स्वर्गलोकप्राप्ति का यह भवारितद्वार है । निश्चित मार्ग है । भतः यदि तुम स्वर्गसुख चाहते हो तो जीवनपय्यन्त यज्ञक करते रहो । साधारण मनुष्यों ने यज्ञ को साधारण कम्मं समझ रखा है । प्रग्नि में घृत डाल देना, मन्त्र बोल देना, स्वाहा स्वाहा कर लेना, इतने पर ही यज्ञ की इतिकर्तव्यता मान रखी है । उन्हें यह पता नहीं है कि यह वैधयक्ष प्रकृति की नकल है । प्रकृति में जैसा हो रहा है - वंसा करने में ही यज्ञ करना सफल है । प्राहवनीय में धरित प्रज्वलित हो रहा है । उसके चाहे जिस प्रदेश में प्रवृति देने से काम नहीं चलता । ईंधन से प्रज्वलित अग्नि इद्ध है, प्रबंध है । इसमें माहुति देना निरर्थक है । ऐसा प्रबंध प्रग्नि - हयवाहन नहीं हो सकता । सामिषेनी मन्त्रों से समिद्ध वैध - भग्नि ही प्राणदेवतानों के साथ हा का सम्बन्ध कर सकता है । परणिमन्थन द्वारा अग्नि प्रकट करो । यथाविधि से गार्हपत्य में उसे प्रतिष्ठित करो । अनन्तर माहवनीय में उसका प्रणयन करो । भाहवनीय में प्रतिष्ठित प्रग्नि को सामिषेनी मन्त्रों द्वारा प्रादेशमित ११ सामिषेनी ( समिधाएँ ) डाल कर उसे समिद्ध बनाते हुए हव्यवाहन बनाओ । ऐसी भवस्था में जब प्रचण्डरूप से उसमें ज्वाला निकलने लगे तब प्रयाज- धनुयाजदेवता को बाज्याहुति डालते हुए दोनों के मध्य में प्रधान देवता के लिए माहुति डालो । तब कहीं तुम्हारा यश सफल होगा । प्रत्येक कम्मं में प्रधान देवता होता है । देवता छन्द से वन्दित रहते हैं । मध्य में देवता हैं, इधर - उधर छन्द हैं । उपक्रम का छन्द प्रयाज है - अन्त का अनुयाज है । पहले प्रयाजरूप अन्य देवता को तृप्त करने के लिए भाज्याहृति दो । धनन्तर नियतव्य से ( पुरोडाश - पशु - सोम से ) प्रधान देवता के लिए प्राहुति दो । अनन्तर अनुयाज छन्द के लिए फिर भाज्याहुति दो यही तात्पय्यं है । श्रीतयज्ञों का मूलयज्ञ अग्निहोत्र है, भतः निदर्शन के लिए संक्षेप से इस मन्त्र में ऋषि ने इसी की इतिकर्तव्यता बतलाई है । इसमें दो माहुति प्रधान देवता के लिए मध्य में होती है । भाचन्त में प्रयाज - धनुयाजरूप छन्दों के लिए प्राज्याहुति होती है । ऋषि को बतलाना यही है कि साक्षात्कृतधर्म्मा ऋषियों ने यज्ञ की जो पद्धति बतला दी है जो कि पद्धतिग्रन्थ ब्राह्मण - सूत्र ( कात्यायनादि श्रौतसूत्र ) नाम से प्रसिद्ध हैं- तुम्हें उन्हीं के अनुसार सारा कम्मं करना चाहिए | सम्भव है - पशुबलि आदि कम्मं देखकर तुम हिचकिचाने लगो भौर इसके एवज में कल्पित पद्धतियों से यज्ञ करने लगो । सावधान! यदि तुम ऐसा करोगे तो स्वर्गफल तो दूर रहा, उनटा अपना नाच करा बैठोगे । क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि केवल स्वरदोष से इन्द्रशत्रुर्वस्व कहनेवाला वृत्रासुर इन्द्र को मारने के लिए यश करता हुआ अपना नाश करा बैठा था । " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते काव्यकार्य्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म्म कर्तुमिहार्हसि ॥ ' ॥ २ ॥

१ गोता १६।२४ । [ ४८ ]

पृष्ठ 55

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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्या निरूपण एक बात और हमने केवल तुम्हें श्रग्निहोत्र की इतिकर्तव्यता बतलाई है । कहीं इसी पर यज्ञ-कम्मं की समाप्ति न समझ लेना । केवल अग्निहोत्र से ही अपने को कृतकृत्य न समझ लेना । श्रग्निहोत्र से स्वर्गप्राप्ति नहीं । ज्योतिष्टोमापरपर्य्यायक सोमयज्ञ से स्वर्गफल मिलता है । सोमयज्ञ और मग्निहोत्र के बीच में भी अवान्तर कितने ही कम हैं । पृथिवी सूय्यं के चारों ओर घूमती है । पृथिवी जिस मार्ग पर घूमती है - वह क्रान्तिवृत्त कहलाता है । इस परिभ्रमण - मण्डल में भरा हुआ सौरदेव प्राणमय अग्नि ही संवत्सर है । इसी संवत्सर को स्वरहर्वेधाः के अनुसार स्वर्गलोक कहते हैं । सौरमण्डल ही स्वर्गलोक है । यह स्वर्गमण्डल प्रग्नीषोममय यज्ञ हैं । इसके बल से ही प्राणदेवता स्वर्ग में प्रतिष्ठित हैं । यह संवत्सरा-ग्नीषोमीययज्ञ - महोरात्र - पक्ष- चातुर्मास्य प्रयन - संवत्सर भेद से पचधा विभक्त है । इसीलिए तो यज्ञ के लिए पाणी व यशः कहा जाता है । अहः अग्नि है - रात्रि सोम है । रात्रिगतसोम की प्रहरग्नि में प्राहुति हो रही है - यही प्रकृति का अग्निहोत्रयज्ञ है । शुक्लपक्षाग्नि - मग्नि है, कृष्णपक्ष सौम्य है । इसकी प्राहुति से पाक्षिक यज्ञ हो रहा है । यही दर्शपूर्णमास है । ब्रीहि - यव- श्यामाक भेद से ग्रीष्म - वर्षा - शीत इन तीन ऋतुनों में तीन अग्नि - धन्न उत्पन्न होते हैं । ४-४ मास के तीन चातुम्मस्य हैं । इनमें प्रार्त्तवाग्नि भरा है । इनमें क्रमश: - तीन मतसोमों की माहुति हो रही हैं । यही प्राकृतिक श्रीहि चातुर्मास्य, यव चातुम्मस्य, श्यामाक चातुम्मस्य ये तीन चातुर्मास्य यज्ञ हैं । दक्षिणभाग भाग्नेय है - उत्तर सौम्य है । उत्तरस्थस्तोम दक्षिणाग्नि में ग्राहृत हो रहा है, यही अयनयज्ञ है । इसी को पशुबन्ध कहते हैं । मन-न्तर पूरा संवत्सर माता है । इसमें पारमेष्ठ्य सोम की माहुति हो रही हैं । पार्थिव प्रग्नि गायत्री हैं । वही सुपर्ण बनकर तीसरे खुलोक से ( परमेष्ठी से ) सोम का अपहरण करती है । इसी से संवत्सर - यक्ष हो रहा है । इसके अलावा संवत्सर - यज्ञ के अंगभूत दाक्षायणयज्ञ - प्रातिथ्येष्टि - प्रामायणेष्टि - वैश्वदेवेष्टि - ये अवान्तर यश प्रौर होते हैं । इन यज्ञों की नकल पर वैधयश है । मग्निहोत्र से महोरात्र के मग्नि पर अधिकार होता है । दर्शपूर्णमास से पक्षाग्नि पर अधिकार होता है । चातुर्मास्य, प्राग्रयण, वैश्वदेव से ऋतु अग्नि पर अधिकार होता है । प्रयन से उत्तर - दक्षिण प्रयन पर अधिकार होता है । इतना करने के बाद स्वर्गसाधक संवत्सरयज्ञ ( सोमयज्ञ ) का अधिकार मिलता है । इससे स्वर्ग प्राप्ति होती हैं । संवत्सरयज्ञ को छोडकर पूर्व के सारे यश ऋत्वयं हैं । इनसे किसी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं है । सोमयज्ञ ही पुरुषार्थ है । पुरुष का ' अर्थ ' स्वर्गप्राप्ति है । वह इसी पर निर्भर है । ऐसी भवस्था में जिस मनुष्य का प्रग्निहोत्र प्रदर्श - प्रपौर्णमास - प्रचातुर्मास्य मनाग्रयण होता है, प्रातिथ्येष्टि दजित होता है, भव-देव होता है उसका प्रग्निहोत्र करना न करना बराबर है । ऐसा हुतद्रव्य ' अद्भुत ' है । मान लो एक मनुष्य सभी यज्ञकर्म्म करता है । परन्तु प्रविधि से करता है । ऐसा करना भी निरर्थक हैं । इस प्रकार जो मनुष्य केवल मग्निहोत्र करके हो रह जाता है भथवा करता सब है परन्तु शास्त्रप्रदर्शित पद्धतियों का तिरस्कार कर कपूर - केशर - खोपरा आदि पदार्थों का सन्निवेश कर मनाएं मनुष्यों की पद्धतियों के अज्ञानवश इन में पड़कर अवैध - विधि से करता है - उस मनुष्य के वह बहुत एवं अवैधयश सात लोकों की विभूति नष्ट कर देता है । उसके हाथ से पिण्डदान का फल नहीं होता, वंशसूत्र टूट जाता है । सातों लोकों से बहिर्भूत लोकालोक नाम से प्रसिद्ध असूर्यलोक में इसे पड़ा रहना पड़ता है । पिता पितामह, प्रपितामह, पुत्र, पौत्र, प्रपोत्र, सातवां स्वयं यजमान - ये सातों विच्छिन्न हो जाते हैं । क्यों कि अवैधयज्ञ [ ४७ ]

पृष्ठ 56

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प्रथममुण्डक ( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण से सन्तानसूत्र टूट जाता है । इसलिए हमें चाहिए कि हम आपद्धतियों का ही अनुसरण करें । इसी में हमारा कल्याण हैं F 113 11 -:: -जिस श्रग्नि में यजमान प्राहुति देता है उसे याद रखना चाहिए कि उसमें सात जिल्ह्वा हैं । जीभ निकाले अग्नि सामने खड़ा है । जिल्ला भी एक नहीं सात - सात । ऐसी अवस्था में यदि तुमने उसके अनुकूल प्राहुति न दी तो वह उसी प्रकार तुम्हें स्वाहा कर जाएगी जैसे श्मशान में प्रतिष्ठित सिद्ध को भागममन्त्र से जाग्रत प्रेतवर्ग अनुकूल भन न पाने पर उस सिद्ध को ही खा जाता है । अग्नि की वे सातों जिल्ह्वा उनसे भी मयंकर हैं । वे सातों जिल्ला काली करालो - मनोजवा सुलोहिता- सुबूम्रवर्णा - स्फुलिगिनी-विश्वरूची नाम से प्रसिद्ध हैं । सातों ही लेलायमाना हैं । इन सातों का वैज्ञानिक स्वरूप इसी ग्रन्थ के प्रथम-मुण्डक के प्रथमखण्ड में बतलाया जा चुका है । ७ ऋषिप्राण प्रग्नि में रहते हैं । इन सातों का प्रप्रमाग सात जिह्वा हैं । इन सातों प्राणों का सम्बन्ध सूर्य्य से होता है । प्रलयकाल में जब प्रनयज्ञ बन्द हो जाता है तो ये सातों महाशक्तियाँ सातरूप धारण कर संसार का नाश करवाती हैं । इनमें मुख्य महाकाली है । सुलोहित रक्तवन्तिका रक्ताम्बरा नाम से प्रसिद्ध है । मनोजवा कमला- लक्ष्मी - रोहिणी श्रादि नामों से प्रसिद्ध हैं । स्फुलिङ्गिनी ज्वालामुखी नाम से प्रसिद्ध है । सुषूम्रवर्णा- घूमावती - ज्येष्ठा दरिद्रा - अलक्ष्मी नि ति प्रादि नामों से प्रसिद्ध है । कराली कंकाली- चामुण्डा आदि नामों से प्रसिद्ध है । विश्वरूची त्रिपुरसुन्दरी-भुवनेश्वरी प्रादि नामों से प्रसिद्ध है । इस प्रकार निगमशास्त्र की ये सात जिह्वाएँ निगममूलक आगम-शास्त्र में नाना स्वरूपों से उपर्वाणित हुई हैं । निगमविद्या का सूय्यं से सम्बन्ध है - श्रागम का पृथिवी से सम्बन्ध है । पृथिवी प्रग्निमयी है । भग्नि की सात जिल्हा ही महाशक्तियाँ हैं । पार्थिव प्राणप्रधान प्रागम में इन्हीं की प्रधानता है-१. काली महाकाली - प्राथा भगवती २. कराली = कङ्काली- चामुण्डा ३. मनोजवा = कमला लक्ष्मी - रोहिणी ४. सुलोहिता = रक्तदन्तिका -रक्ताम्बरा ५. सुधूम्रवर्णा = घूमावती - दरिद्रा - ज्येष्ठा निर्ऋति ६. स्फुलिंगिनी = ज्वालामुखी - त्रिपुररवी ७. विश्वरूची = त्रिपुरसुन्दरी -- भुवनेश्वरी प्रवि श्रंगार धूम भेद से अग्नि त्रिवृत् होता है । जहाँ से अचि ( ज्वाला ) निकलती है - वह अंगारा है । इससे २१ प्रकार का अंगिराप्राण उत्पन्न होता है । ज्वाला प्रकाशरूप है । स्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ के अनुसार प्रकाश सोम से हो रहा है । सोम ही जलता हुआ अचिरूप में परिणत हो रहा [ ५० ]

पृष्ठ 57

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tress ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण है । सोम भृगु है । इस सोममय भृगुप्राण का विकास प्राचि से होता है । इस भार्गवप्राण के सात श्रवा-न्तर भेद हैं । वही अग्नि की सात जिल्ह्वा हैं । ज्वाला त्रिकोण बनाती है । इस स्थान पर भृगु रहता है । दोनों छोर में वामदेव रहता है । मूल में गौतम रहता है । मध्य का जमा हुआ अग्नि ( लो ) जमदग्नि है । इन सात प्रारणों का अन्तिमभाग सात ज्वाला है । सात स्तर मिलकर एक अचि का स्वरूप

बनता है ॥। ४ ॥

जो यजमान यथाकाल - यथाविधि प्रदीप्त इन सासों में आहुतियां देता है, प्राहुति देते हुए ऐसे यजमान को वे ज्वालाएं उस स्थान पर ले जाती हैं - जहाँ पर की देवताओं का एक ( प्रसपत्न ) अधिपति रहता है । तात्पर्य्य यही है कि सूय्यं में सात नाड़ी हैं । सात प्रधान रश्मियां हैं । इन सातों रश्मियों का पार्थिव अग्नि ज्वालानों के साथ प्रभिन्न सम्बन्ध है । धन्नो प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुप-तिष्ठते के अनुसार इन सात ज्वालाभों में जो भन्न डाला जाता है - वह सूय्यं रश्मियों से प्राकर्षित हो, उसके अपने संवत्सर - मण्डल में प्रतिष्ठित हो जाता है । पाब‌विलं तावदात्मा के अनुसार घन में भात्म-भाग रहता है । ' भ्रात्मा ' मन - प्राण वाङ्मय है । अन्त में तीनों भाग हैं । ' होता ' का वाक् - भाग ( ऋऋ-भाग ) प्रश्न में युक्त होता है । मध्वर्यु का प्राणभाग ( यजु माग ) अन्त में युक्त रहता है । उद्गाता की साम - वाक् युक्त रहती है । ब्रह्मा का मन रहता है । चारों ऋत्विक अपने मन - प्राण - वाक् को मन में डालते हैं । इसकी एवज में इन्हें दक्षिणा मिलती है । भ्रतः जो इनका मन - प्राण - वाक् भाग प्रन में छाता है, दक्षिणा के कारण उन पर से इन ऋत्विजों का सत्त्व हट जाता है । इसीलिए दक्षिणाकम्मं आव-श्यक माना जाता है - बिना दक्षिणा का यज्ञ नष्ट है । इधर पत्र में यजमान का प्रात्मभाग भी शामिल है । ऐसे प्रात्ममय प्रप्त की धाहुति दी जाती है । यजमान मघ्न रूप से स्वयं प्राहुत हो रहा है । प्राहुत धन्न यजमान का भात्मा है । स्वयं यजमान है । सूय्यं रश्मियां अन्न को स्वर्ग में क्या प्रतिष्ठित करती हैं, एक प्रकार से यजमान के भ्रात्मा को प्रतिष्ठित करती हैं । यजमान का मानुषात्मा उससे प्रप्नजन्यदिव्यात्मा से बद्ध रहता है । मानुषायुर्भोगानन्तर वह उस भाकर्षण से आकर्षित होता हुमा उसी स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हो जाता है । बस, पचिव मन्त्र इसी मयं का निरूपण करता है ॥। ५ ॥ अन्त में यज्ञकाण्ड की स्तुति पूर्वक उपसंहार करते हुए ऋषि कहते हैं-" एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्य्यस्य रश्मिभिर्य नमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिववन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः " ॥ [ ५१ ]

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verosa ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्यानिरूपण अग्नि का नाम ब्रह्म है । जैसे ऐन्द्रवीर्य्यं श्रोज कहलाता है, वैश्वदेव्य विड्वीय्यं सुम्न कहलाता है; एवमेव प्राग्नेय गायत्र वोयं ब्रह्मवर्ष नाम से प्रसिद्ध है । अग्निब्रह्म - ऋक्साम - यजुः त्रिकल है । तीनों प्राणाग्नियों ( देवाग्निनाम से प्रसिद्ध वेदाग्नियों ) के सम्बन्ध से माहवनीय कुण्डस्य यह भूताग्नि की सातों ज्वालाएँ ब्रह्मवचंयुक्त बन गई हैं । इनमें प्राहुत प्राहुतियाँ भी इनके सम्बन्ध से सुवर्चा हो गई हैं । ऐसी सुवर्चा प्राहुतियाँ सौर- रश्मियों से युक्त हो कर चलो चलो - धाम्रो घाम्रो कहती हुई इस यजमान को आज स्वर्ग में ले जा रही हैं, आज वे आहुतियाँ यजमान के लिए स्वर्ग में धाम्रो ऐसी मधुर वाणी बोलती हैं । इसका अभिवादन करती हैं । इसकी पूजा करती हैं । यशकर्त्ता यजमान को सारे मनुष्य अभिवादन करते हैं, पूजा करते हैं । सर्वत्र उसका यश व्याप्त हो जाता है । यह अभिवादन - पूजन - यश असल में -माहुतियों की कृपा है । यजमान आहुति न देता तो कुछ न था । माहृतियों के प्रताप से प्राप्त स्वर्गलोक सुकृत है; भच्छी करनी का पुण्य का फल है । यहो ब्रह्मलोक ( वेदलोक ) है । जिसे ऐसा लोक प्राप्त करना हो वह भवश्य हो यज्ञ करे ॥। ६ ॥ -:: --कमार्ग की जटिलता का निरूपण करते हुए भगवान् वासुदेव कहते हैं-" कर्म्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोतृव्यं च विकर्म्मणः । refore बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः " ॥ वास्तव में बात यर्थाथ है कि कम्मं किमसम्मति कवयोऽप्यत्र मोहिताः " के अनुसार बडे - बडे कर्म्म-योगी भी समय पर धोखा खा जाते हैं । कौनसा कम्पं इस समय उपयुक्त है? कौनसा प्रनुपयुक्त है? साधारण मनुष्य तो इसका निर्धारण कर ही नहीं सकते । परन्तु विद्वान् भी ऐसे अवसरों में परव्यामोह में पड़ जाता है । इसी अभिप्राय से भगवान् कहते हैं कि तुम कम्मं का स्वरूप कर्म्म से पहचानो - प्रक से पहचानो - विकम्मं से पहचानो । क्यों कि कर्म्म की गति बढी गहन है । बस, भाज हमें गीतोक्त इन्हीं कर्म्म - विकम् - प्रकम्मं तीन कम्मंभेदों की भोर भाप का ध्यान आकर्षित करते हैं । स्मार्तोक्त - कर्म्म - प्रकर्म्म - विकम् इन तीन कम्मों के श्रोतग्रन्थों में ४ विभाग माने हैं । चतुष्टयं या इदं सर्वम् ३ के अनुसार कम्मंप्रपञ्च चार भागों में विभक्त है । वे चारों कम्र्म्म - १. विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिसत्कर्म्म २. विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिसत्कर्म्म ३. शास्त्रप्रतिषिद्धाप्रतिषिद्ध कर्म्म ४. शास्त्रप्रतिषिद्ध विकम् । बस, इन ४ से अतिरिक्त संसार में कोई पांचवां कर्म्म हो ही नहीं सकता । संसारभर के भवान्तर कम्मों का इन्हीं चार कम्मों में मन्तर्भाव है । जिस श्रव्ययपुरुष की गाथा उपनिषदों में बडे विस्तार से गायी गई है - वह प्रव्ययात्मा विद्याकर्म्ममय है । विद्या- कर्म्ममय द्विकल अव्यय की काममय-१ गीता ४।१७ । २ गीता ४। १६ । ३ को ० ब्रा ० २। १ । [ ५३ ]

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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मन के कारण विद्या - काम - कर्म्म ये तीन कर्म्म प्रवश्य है, परन्तु अन्तर्लीन है । मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण कलाएँ हो जाती हैं । विद्याभाग शुद्ध विद्या है । यद्यपि इसमें दूसरे शब्दों में कम्मंगमित विद्यामाग ही शुद्धविद्या है एवं कर्म्मभाग शुद्धकम्मं है । विद्यागभित कम्मंभाग हो शुद्धकम्मं है । मध्यभाग विद्याकर्म की साम्या-वस्था है । मानन्द - विज्ञान शुद्धविद्या है । प्राण वाक् शुद्ध कम्मं है । मध्यपतित मन उभयात्मक है । हमारा भूतात्मा इसी त्रिकल का अंश है । अतः हमारे में भी ये ही तीनों भाग हैं । हम काम - क्रोषादि पाप्मानों से संसक्त होते हुए उस अपने अंशी से पृथक् हो रहे हैं । जिस दिन पाप्माम्रों को छोडकर हम उस ( हमारी तीनों कलाओं ) से युक्त हो जाते हैं- उस दिन परेऽष्यये सर्व एको भवन्ति के धनुसार सारा भेद - भाव टूट जाता है । हम उससे तीन ही उपायों से योग कर सकते हैं । हम प्रपने शुद्ध विद्याभाग को उसके विद्याभाग से युक्त कर दें - यह पहला योग है इसे हो ज्ञानयोग कहते हैं । यही योग-सांख्ययोग - संभ्यासयोग श्रादि नामों से प्रसिद्ध है । हम अपने कर्म्मभाग को उसके कम्र्म्मभाग से युक्त कर दें - यह दूसरा कर्म्मयोग है एवं मध्यस्थ उभयभाग का उसके मध्यभाग से योग कर दें - यह तीसरा भक्तियोग है । विद्यायोग में शुद्धविद्या है, मतः हम इसे कर्म्मप्रपञ्च से बाहर की वस्तु समझते हैं | ऋषि भागे जाकर इसी के पालन का प्रादेश देने वाले हैं । बाकी बचते हैं- शुद्ध कम्मंयोग एवं विश्वायुक्त कम्मंयोग । बस, यही हमारे प्रकरण के विद्यासापेक्ष - विद्यानिरपेक्ष कम्मं हैं । यज्ञ तप - दान ये विद्या-सापेक्ष कम्मं हैं । इष्ट - माप्तं दत्त ये विद्या निरपेक्षक हैं । पार्थिव भूतसम्बन्धी मौतिककम्मं विद्या-निरपेक्ष हैं । विना पढालिखा भी इन्हें कर सकता है । यद्यपि इनमें भी ज्ञान प्रपेक्षित हैं । परन्तु यहाँ ज्ञान गौण है, कर्म्म प्रधान है एवं सौरभयी ज्ञान सम्बन्धी दिव्यकम्मं विद्यासापेक्ष कम्मं हैं । सूय्यं विद्या पृथिवीविद्या की अपेक्षा गहन है । प्रत: एतद् सम्बन्धी कर्म्म को प्रवश्य ही विद्यासापेक्ष कहा जा सकता है । इनमें विद्या निरपेक्ष कम्मं का फल क्षर - सम्पत्ति है । विद्यासापेक्ष कम्मं का फल प्रक्षर सम्पत्ति है । शुद्ध ज्ञानयोग का भी फल अक्षरसम्पत्ति है । यश - तप - दान तीनों में यज्ञकर्म्मप्रधान है । तप उपासना प्रधान है । तप को उपासनायोग कहते हैं । यही भक्तियोग है । हमने कहीं - कहीं उपासना को तपरूप भक्तियोग से अलग छोटा है इसका कारण यही तप है । सपरूप उपासनायोग के -मन्त्र - राज - लय - हठ - ये चार भेद हैं । जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । उपासनायोग का ही दूसरा नाम भक्तियोग है । यही यश-तपदान है । कम्मंयोग इष्ट - प्रापूर्त- दस है । ज्ञानयोग- शुद्धज्ञानसम्पदरूप है । उपासना से ज्ञानयोग सिद्धि होती है । यह है इस कम्र्म्म का पहला विभाग ---१ - शुद्धविद्या ( श्रानन्दविज्ञानरूप - प्रव्ययप्रधान ) कम्मंत्यागरूपसंन्यासयोगी २ - शुद्धक ( प्राणवारूप - क्षरप्रधान ) -कम्मंग्रहणरूप कम्मयोग ३ - उमयभाग ( मनोरूप- प्रक्षरप्रधान ) - उमयविष - भक्तियोग -१- शुद्धकर्म - ( विद्यानिरपेक्ष पार्थिव भौतिक फल प्रदाता - इष्ट, भापूर्त, दत्त ) -२ - उभयमाग- ( विद्यासापेक्ष सौर दिव्यफल प्रदाता- यश, तप, दान ) --[ ५३ ] - सांख्ययोगी

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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्यानिरूपणं ज्ञान - कर्म्म - उपासना के दूसरे विभाग से प्रथम विभागवाले भक्तियोगरूप यज्ञादि का कर्म में भन्तर्भाव होता है । यज्ञ तप - दान तीनों कर्म्मयोग हैं । इस पक्ष में इष्ट प्रापूर्त - दत्त का भी इसी में प्रन्त-र्भाव है । इस कम्मंयोग का प्रतिपादक वेदभाग - साह्यण है एवं बुद्धियोग उपासना है - धारण्यक इसी का प्रतिपादन करते हैं । संन्यास ज्ञानयोग है - उपनिषत् इसी का निरूपण करते हैं । इस प्रकार स्थूल-दृष्टि से देखने पर भी दोनों पक्षों में बडा अन्तर प्रतीत होता है । परन्तु जरा विचार करने से सारा भ्रन्तर दूर हो जाता है । इस प्रन्तर को दूर करने के लिए प्रवृत्ति प्रौर निवृत्ति दो शब्द ही पर्याप्त हैं-विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिरूप यज्ञ - तप - दान विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिरूप इष्ट, भापूर्त, दत्त} --दोनों कर्म्मयोग हैं । क्योंकि प्रवृत्ति का कामना से सम्बन्ध है । कामना में मुक्ति का प्रभाव है । पुत्र - धन - साम्राज्य-स्वर्गादि सारे सुख भौतिक हैं । ऐसे विद्यासापेक्ष यज्ञ - तप - दान फल की दृष्टि से विद्यानिरपेक्ष होते हुए कम्मय विद्यानिरपेक्ष इष्ट - प्रापूर्त - दत्त में ही मतं भाव को प्राप्त हो जाते हैं । ऐसे विद्यासापेक्ष यश - सप-दान का फल क्या? इसका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं--" यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतावके । तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: " प्रवृत्तिप्रधान त्रयीवेदरूप ( संषा त्रयोविद्या यज्ञः ) यज्ञकर्म्म कम्मंयोग है । ऐसे के परित्याग में ही कल्याण है । प्रवृत्ति में कामना का उदय है । कामना - सत्व, रज, तम त्रैगुण्य से सम्बन्ध रखती 1 त्रिगुणमाद बन्धन का कारण है, प्रत: त्रिगुणभाव पत्र वेदमय यश को छोडने में ही कल्याण है । इसीलिए ऐसे प्रवृत्तिप्रधान त्रयीमय - यज्ञ की निन्दा करते हुए भगवान् कहते हैं-" त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्य सत्वस्यो निर्योगक्षेम आत्मवान् " ॥ ' ऐसे प्रवृत्तिप्रधान विद्यासापेक्ष यज्ञ को ही विद्यानिरपेम्यतुल्य होने से हम कर्म्मयोग कहते हैं । प्रवृत्ति को हटा रीजिए, निवृत्तिशब्द का समावेश कर दीजिए । निवृत्ति से कामना का क्षय है । कामना के क्षय से त्रिगुणभाव का विनाश है । चाहे विद्यासापेक्ष यज्ञ हो या विद्यानिरपेक्ष इष्ट आदि हो - यदि प्रवृत्ति का परित्याग है तो दोनों ही संस्कार से प्रसम्बद्ध रहते हुए मुक्ति के कारण बन जाते हैं । ऐसे दोनों ही फम्मों को हम भक्तियोगरूप- बुद्धियोग ( उपासनायोग ) कहने के लिए तय्यार हैं । कामना के सम्बन्ध से विद्यासापेक्षप्रवृत्तिरूप यज्ञ - तप - दान भी भौतिक फल से सम्बन्ध रखते हुए विद्यानिरपेक्ष बन कर १ गीता २।४६ । २ गीता २।४५ । [ ५४ ]