Mundakopanoshad — पृष्ठ 61–70
Mundakopanoshad · पृष्ठ 61–70
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण कम्मंयोग में प्रन्तंभूत हो जाते हैं एवं कामना के परित्याग से विद्यानिरपेक्ष निवृत्तिरूप इष्ट - मापूर्व- दत्त मी दिव्यफल से सम्बन्ध रखते हुए विद्यासापेक्ष बनकर उपासनायोग में अन्तर्भूत हो जाते हैं । इस क्रम से इनका निम्नलिखित विभाग हो जाता है--१- शुद्ध विद्या - कर्म्मत्यागरूप = संन्यासयोग २- शुद्ध कर्म्म - ( विद्यासापेक्ष प्रधान यज्ञ - तप - दान, विद्यानिरपेक्ष प्रधान इष्ट - प्रापूतं - दत्त ) = कर्म्मयोग ३ - उभययोग - ( विद्यासापेक्ष निरपेक्ष यज्ञ - सप - दान, विद्यानिरपेक्ष इष्ट - मापूर्त - दत्त ) - भक्तियोग जहाँ प्रवृत्तिरूप त्रयीमय यज्ञ की पुण्याविषया बेबा इत्यादि रूप से भगवान् निन्दा करते हैं-वहाँ निवृत्तिरूप प्रतएव - बुद्धियोगात्मक यज्ञ - तपादि के पालन का यशयामतप. कर्म्म मत्याज्यं काय्र्य्यमेव तत् इस रूप से प्रादेश करते हैं । कामनापरित्यागपूर्वक कम्मं करते रहना ही भगवान् के मत में संन्यास-योग है । शुद्ध ज्ञानयोग भगवान् को अभिमत नहीं है । क्योंकि वह सम्भव नहीं । कर्म्म प्रात्मा का स्वरूप है, अतः कर्म्म त्यागलक्षण संन्यास सर्वधा मनुपपत्र है । भगवान् के मतानुसार संन्यास का— " काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः " । " - यही लक्षण है । इसी को भगवान् बुद्धियोग कहते हैं । बुद्धियोग कम्र्म्ममय होता हुमा भी कामना-शून्य होता हुआ - कर्म्मजनित फल से लग रहता हुप्रा - शानयोग है । प्रवृतिरूप कम्मं कम्मं है । निवृत्ति-रूप कम्मं ज्ञानयोग है - बुद्धियोग है - यही उपादेय है । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् कहते हैं--" दूरेण ह्यवरं कर्म्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपरणाः फलहेतवः " ॥ " फल की कामना का परित्याग है न कि कम्मं का क्षर पवर है । प्रक्षर परावर है । भव्यय पर है । क्षरः सर्वाणि भूतानि के अनुसार प्रवरक्षर भूतमय है । कामनामय यज्ञादि का फल प्रवरक्षर ( भौतिक सुखक्षणिक सांसारिक स्वर्गादि सुख ) है । श्रतः ऐसे कर्म्म को हम प्रवर कम्मं कहने के लिए तय्यार हैं । इस प्रासक्तिरूप श्रवरकम्मं का अधिक से अधिक फल स्वर्गप्राप्ति है । प्रतः प्रक्षय्यसुख ( मुक्ति सुख ) की कामना रखने वाले को इस अवरकम्मं के झगड़े में न पड़कर निष्काम कर्म्मरूप संन्यास-योग ( जो कि गीता के अनुसार बुद्धियोगरूप भक्तियोग है ) का ही मनुसरण करना चाहिए । श्रुति यहाँ प्लवा ह्येते इत्यादि से यज्ञादि कम्र्म्मकाण्ड की निन्दा कर रही है । यह निन्दा प्रवृत्त्यात्मक यज्ञादि से सम्बन्ध रखती है, न कि निवृत्यात्मक यज्ञादि से । श्रुति कम्मंपरित्याग नहीं बतलाती, कामना का परित्याग बतलाती है । इस विषय की पुष्टि श्रुति के भ्रष्टावशोक्तमवरं कम्मं येषु - इस वाक्य से हो १ गीता १८।२ । २ गीता २४ ९ | [ ५५ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्यानिरूपण जाती है । स्मार्तोपनिषत् ( गीतोपनिषत् ) का प्रवरं फम्मं भोर इस श्रोती उपनिषत् का अदर कम्म एक वस्तु है । दोनों की एकवाक्यता के लिए प्रवृत्ति का परित्यागमात्र ही प्रभिप्रेत है - यही मानना पड़ता है । प्राचीनों ने जो इस प्रकरण का सर्वकर्म्मपरित्याग की प्रोर झुकाव माना है हमारे विचार से यह उनका प्रौढिवादमात्र है । क्योंकि कर्म्मपरित्याग सर्वथा प्रसम्भव है । प्रारम्भ में हमने विद्या -सापेक्ष यज्ञतपदान को मक्तियोग कहा है । यह निवृत्तिपक्ष से सम्बन्ध रखता है एवं इष्ट - प्रापूर्त - दत्त को कर्मयोग कहा है - यह प्रवृत्तिपक्ष से सम्बन्ध रखता है । यदि दोनों में यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' के भनुसार यज्ञ - तप- दानरूप प्रवृत्तिकम्मं प्रवरकम्मों में श्रेष्ठकर्म्म है । इष्ट - मापूर्त - दत्त तीनों निकृष्ट प्रवर कम्मं हैं । इन दोनों का क्रमशः देवस्वर्गप्राप्ति, पितृस्वर्गप्राप्ति फल है । पाकयज्ञ को छोडकर पूर्व में प्रतिपादित सारे प्रवर यज्ञकम्मं यश है । कामनामय तपोयोग ( भक्तियोग ) तप है एवं विद्वान् ब्राह्मणों को पूर्णाङ्गों को जो दान दिया जाता है वह दान है । इस दान को दक्षिणा कहते हैं । इसमें दाता गृहीता पर पूज्यबुद्धि रखकर - स्वयमेयं वस्तु गोबिन्द तुम्यमेव समर्पये - यह भाव रखता हुमा दान देता है । इनमें जो यज्ञ है उसकी इतिकर्तव्यता १७ में समाप्त होती है । १७ कला है । १८ व स्वयं
यज्ञपुरुष है । इसी प्रभिप्राय से-" चतुभिश्च चतुभिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः " ॥
IIII ५६७८ ६ १०१११२१३ १४ १५ १६१७ -यह कहा जाता है । भोश्रावय, भस्तुश्रौषट् ये य जा म हे, य ज, वौषट्, यही यज्ञ की १७ कलाएँ हैं । इनसे १८ वें यज्ञ का स्वरूप सम्पन होता है । प्रपि च १६ ऋत्विक होते हैं । १ व यजमान धीर उसकी पत्नी हैं । इन १७ से १५ वें यश का स्वरूप सम्पन्न होता है । अपि च १७ पर ग्राहवनीय न है । इसके १७ ग्रहण हैं । इसमें अग्नि है । इसमें सोमाहुति होने से १८ में यज्ञ का स्वरूप सम्पन्न होता है । अपि च- चयनयज्ञ में निम्नलिखित १५ स्तोम होता हैं । इसलिए भी यज्ञ प्रष्टादशात्मक है--१ - त्रिवृत् ( 8 ) प्राशुस्तोम १० - चतुविश ( २४ ) योनिस्तोम २- पञ्चदश ( १५ ) मान्तस्तोम ११- पञ्चविंश ( २५ ) गर्मस्तोम ३ - सप्तदश ( १७ ) व्योमस्तोम १२- त्रिरणव ( २७ ) भोजस्तोम ४ - एकविश ( २१ ) घरुणस्तोम १३ एकत्रिश ( ३१ ) क्रतुस्तोम ५- भ्रष्टादश ( १८ ) प्रतिस्तोम १४ - त्रयस्त्रिण ( ३३ ) प्रतिष्ठा ६ - नवदश ( १ ९ ) तपस्तोम १५ - चतुस्त्रिश ( ३४ ) १ शत ० ब्रा ० १।७।१।५ । [ ५६ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य अपरा विद्यानिरूपण ७- विंश ( २० ) uotati स्तोम १६- पशि ( ३६ ) नाक ८ - द्वाविंश ( २२ ) स्तोम १७- अष्टाचत्वारिंश ( ४८ ) विवर्त - त्रयोविश ( २३ ) सम्मर स्तोम १८ - चतुःष्टोम ( ९ - १०-१५-२१ ) पत्रं अपि च-१- त्रिवृत् १० - षोडशीस्तोम २- पञ्चदश - सप्तदश ११- प्रतिरात्रस्तोम - ज्योतिष्टोम १२ वाजपेयस्तोम > पृष्ठयस्तोम ४ -- एकविंश १३- प्राप्तोपमस्तोम ५- त्रिणक १४ - गायत्रस्तोम ( २४ ) ६- त्रयस्त्रि १५ - श्रेष्टुमस्तोम ( ४४ ) - छन्दोमास्तोम ७- अग्निष्टोम १६ - जागतस्तोम ( ४८ ) ८- प्रत्यग्निष्टोम ज्योतिष्टोम १७ - महाव्रत स्तोम ( २५ ) E - उक्थ्यस्तोम १८ सर्वयज्ञस्तोम भी तीन , से ज्योतिष्टोम सर्वयज्ञभेद ७ एक , पृष्ठ्यस्तोम महाव्रत ६ एक , प्रकार इस छन्दोमास्तोम । हैं जाते हो अवयव १८ के यक्ष १ -- त्रिवृत् अपि च - ६ पृष्ठ्य, ६ ग्राभिप्ल विक, ६ स्वरसाम, भेद से भी यश के १५ पर्व हो जाते हैं-७ - वाक् स्तोम १३- ( १८ ) २- पञ्चदश - गोस्तोम १४- ( १ ९ ) ३- सप्तदश - द्यौस्तोम १५- ( २० ) ४- एकविश ६ पृष्ठ्य ६ प्राभि ० ६ स्वरसाम १०- गोस्तोम १६- ( २२ ) ५ - त्रिणव ११- पोस्तोम १७- ( २३ ) ६ - मपत्रिश १२ - वाक्स्तोम १८- ( २४ ) [ ५७ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) Pushtu निषद्विज्ञान माध्य पूर्व के १८ पार्थिवस्तोम हैं । सूय्यंसम्बन्ध से भी ये ही १८ गौ - धौ मनोता हैं । सूयं के ज्योति गी - प्रायु ये मनोता हैं । इससे जाते हैं-१ - त्रिवृत् १ - ज्योतिष्टोम अपराविद्या निरूपण स्तोम हो जाते हैं । पृथिवी के वाग्-सूर्य्य के निम्नलिखित १८ पर्व हो १ – ( १८ ) २- पञ्चदश २ - गोष्टोम २- ( १६ ) ३- सप्तदश ३- प्रायुष्टोम ३- ( २० ) +६ पृष्ठयस्तोम ६ श्रभिप्लाविक ४- एकविश ४- गोष्टोम ४- ( २२ ) ५- त्रिणव ५- प्रायुष्टोम ५- ( २३ ) ६- त्रयस्त्रिश ६- ज्योतिष्टोम ६- ( २४ ) अपि च – ६ पृष्ठघषडह, ६ स्तोमवाला नवाहयज्ञ, तीन छन्दोमाभेद से भी यज्ञ के निम्नलिखित १८ पर्व हो जाते हैं-११ - अष्टादश ( १८ ) ) १२ - नवदश ( १ ९ ) ( +३ स्वरसाम ( २० ), १ - त्रिवृत् ( 1 ) ) १० - सप्तदश ( १७ ) } श्रमिजिदह - त्रिणाचिकेतस्वर्ग २- पञ्चदश ( १५ ) ३- सप्तदश ( १७ ) - पृष्ठप पडह ४- एकविश ( २१ ) १३ – विंश ५- त्रिणव ( २७ ) ६- त्रयस्त्रिश ( ३३ ). ७ - चतुविशत् ( २४ ) > -छन्दोमा ८- चतुश्चत्वारिशत् ( ४४ ) - अष्टाचत्वारिंशत् ( ४८ ) ] १४- एकविश ( २१ ) ] + विषुषदहः ब्रध्नस्यविष्टप १५ - वाविश ( २२ ) १६- त्रयोविंश ( २३ ) ३ स्वरसाम १७ - चतुविश ( २४ ) १८- पञ्चविंश ( २५ ) ] - विश्वजिदह - प्रत्ननाक – देवस्वर्ग ७ यज्ञ नवाह अपि च - ६ पृष्ठ षडह, ६ श्राभिप्लाविक बडह, ३ छन्दोमा ( २४-४४-४८ ), १ महाव्रत ( २५ व ), १ स्वाराज्य स्तोम ( गोसवनाम से प्रसिद्ध पञ्चदशाहयश ), १ सर्वस्तोम इस क्रम से भी यज्ञ १५ पर्व है --[ No 1 स्वरसाम ६-
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tereuse ( द्वितीयखण्ड ) restofrea ज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण १ - त्रिवत् १- वाक्स्तोम १- चत्वारिशद् २- पञ्चदश २ - गोस्टोम २ चतुश्चत्वारिंशत् ३- सप्तदश ३ - पोस्तोम ३- अष्टाचत्वारिशद् ४- एकविंश ४ - गोस्तोम १ - महाव्रत ( २५ वा ) अविवाक्यमहः ५ - चोस्तोम १- ( स्वाराज्य - पञ्चदशाह ) ६- त्रयस्त्रि १ - ( सर्व स्तोम ) ६ - वास्तोम -883. ईश्वरयज्ञ को सर्वहृतयज्ञ कहते हैं एवं जीवयज्ञ विश्वदानि नाम से प्रसिद्ध है । इनमें ईश्वरयज्ञ के भवान्तर यज्ञ भी ( प्रत्येक ) प्रष्टादशपर्वा है एवं स्वयं ईश्वरयज्ञ भी निम्नलिखित क्रम से अष्टादशपर्वा है--१ - अग्निहोत्र २- दर्शपूर्णमास I ३- चातुर्मास्य ४- अयन ( पशुबन्ध ) ' हवियंश ' अंगकर्म्म --- कार्य कम्म ५- प्राप्रायष्टि ६- श्रातिथ्येष्टि ७-- वेश्वदेवेष्टि -- प्रग्निष्टोम प्रत्यग्निष्टोम १० - उक्थ्यस्तोम + एकाह- महीन - रात्रिसत्र - प्रयनसत्र भेदभिन्न समयशापरपर्य्यायक सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम नाम से प्रसिद्ध - महायज्ञ अंगीक पुरुषार्थ - कम्म ११- षोडशीस्तोम १२- वाजपेयस्तोम १३- प्रतिरात्रस्तोम १४- प्राप्तोपमस्तोम [ ५६ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्यानिरूपण १५ - राजसूय १६ - वाजपेय प्रतियज्ञ १७ - अश्वमेघ १५ - बयन १- अधिदेवत २- अध्यात्म ३ - अधिभूत ४- अधियक्ष ५- भूत ६- देवता ७- ऋतु ६- स्तोम ६ - पृष्ठ १०- छन्द ११ - या १२- प्राण १३- मन १४-- शस्त्र १५ - स्तोत्र १६ -- ग्रह १७- यजमान १८- यशभूमि इस प्रकार भी व्यापक यश के १५ पर्व हो जाते हैं । [ ६० ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्यानिरूपण इस प्रकार यज्ञरूप अवरकम्मं की प्रष्टादशपर्वता अनेक प्रकार से सिद्ध हो जाती है । ऋषि को सबका संग्रह अभिप्रेत है, अतएव किसी एक का उल्लेख न कर सामान्यरूप से भ्रष्टावशोरूमवरं येषु कम्मं यह कहा है । यह है -यज्ञतपदानरूप श्रेष्ठ प्रवरकम्मं का संक्षिप्तनिरूपण । श्रब बलिए - इष्ट - आपूर्त - दत्तरूप विद्यानिरपेक्ष प्रवृतिकम्मं की ओर | स्वायं परमार्थ- परार्थं भेद से विद्यानिरपेक्ष कम्मं तीन भागों में विमक्त हैं | आत्मार्थक कर्म्म स्वार्थक है । इसी को इष्ट कहते हैं । पाकयज्ञ का ही नाम ( गृह्यस्मात यश का ही नाम ) इष्ट है । गृहस्थ में होने वाले पाँच पातकों की निवृत्ति के लिए भी पांच महायज्ञ करने पड़ते हैं । जैसा कि प्रमियुक्त कहते हैं -" पञ्चसूना गृहस्थस्य खुल्ली पेषण्युपस्कर । कण्डमी चोवकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् " ॥
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महात्मभिः ।
पञ्चक्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ॥
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । होमो, देवो, बलिभौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् " - इति ॥ ' आत्मा ---- ऋषि- पितर देव इन तीनों प्राणों को कर्ज लेकर गर्म में प्रविष्ट होता है । प्रग्निहोत्रावि से देवऋण का परिशोधन होता है । पूजा - उपवास - व्रत - श्राद्ध - प्रजोत्पत्ति से पितृऋण से मुक्त होता है । ब्रह्मचय्यं विद्याध्ययन - तप से ऋषिऋण से मुक्त होता है । यह सब स्वायं ( भ्रात्मप्रधान ) इष्ट कर्म्म हैं । लोकोपकारार्थं ( समाज के कल्याण के लिए ) वापी - कूप - तडागखन - धम्मंशाला - पाठशाला सदावतं भावि कम्मं श्रापूर्त हैं । यह परम अर्थ है । इसमें अनेक व्यक्तियों का हित है एवं असमर्थ को देना परार्थ है । यही दस है । इसमें व्यक्ति का ही कल्याण है । दत्त दान से सर्वथा विजातीय है । दान में दाता की ग्रहीता पर पूज्यबुद्धि रहती है । यहाँ लेनेवाला निकुष्टभाव से देखा जाता है । इष्ट - प्रापूर्त - दस इन तीनों में स्वायंभूत इष्ट भी प्रध्यात्म - मषिभूत प्रषिदेवत भेद से तीन प्रकार का है । तप सत्य ब्रह्मचय्यं माध्यात्मिक इष्ट है | श्राद्ध - प्रजोत्पत्ति - संश्वदेव पादि प्राधिर्देविक इष्ट है । प्रतिथिसत्कार- भूतबलिनादि भाष मोतिक इष्ट है । इस प्रकार यश - तप - दानवत् इष्ट - प्रापूर्त- दस के भी भवान्तर अनेक भेव हो जाते हैं । इनसे पितृस्वर्ग मिलता है । यदि ये दोनों ही प्रवृत्तिभाव से किए जाते हैं तो दोनों ही अवरम्मं होते हुए बन्धन के कारण बनते हैं । निवृत्तिप्रधान दोनों मुक्ति के कारण बनते हैं । इनमें बन्धन के हेतुभूत प्रवृत्तिरूप, भतएव प्रवरकर्म्म नाम से प्रसिद्ध यश - तप- दानरूप विद्यासापेक्ष ( वस्तुतः प्रवृत्ति-प्रधान होने से विद्यानिरपेक्ष ) कम्मं एवं प्रवृत्तिरूप अतएव अवरकम्मं नाम से प्रसिद्ध इष्ट - आपूर्त - दत्त विद्यानिरपेक्ष कम्मों में से प्रथम यज्ञ - तप - दानरूप कर्म की निन्दा करते हुए ऋषि कहते हैं-१ मनुस्मृति ३।६८-७० । [ ६१ ]
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reness ( द्वितीय खण्ड ) अपराविद्या निरूपण
" लवा होते प्रवृढा यज्ञरूपा श्रष्टावशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छु यो ये s भिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति " ॥
यज्ञादि कम्मों को मनुष्य क्यों करता है? सुख के लिए । श्रात्मचिन्तन क्यों करता है? सुख के लिए । इष्टादि क्यों करता है? सुख के लिए । इन कम्मों से इसे श्रानन्द प्राप्त होता है, अतएव यह् अपने आत्मा के आनन्द के लिए सारे कर्म्म करता है । संसार में मनुष्यों की कौन कहे, प्राणिमात्र निरन्तर सुख चाहा करते हैं एवं तदनुकूल यथाशक्ति कम्मं किया करते हैं । परन्तु निरन्तर कर्म्म करते रहने पर भी सुखप्राप्ति नहीं देखी जाती । क्यों? उतर अव्यवस्था । सांसारिककम्मं क्षणिक सुख के अधिष्ठाता है । आत्मा सच्चिदानन्दघन का अंश है, अतएव जबतक इसे वह प्राप्त नहीं हो जाता तब तक यह शान्त ही रहता है । पुत्र हुथा । उसी क्षण प्रानन्द भाया, परन्तु क्षणि । फिर वही अशान्ति । राजा बन गए क्षणिक आनन्द । श्वब सम्राट् बनने की लालसा । सम्राट् बन गए विराट् बनने की लालसा । इस प्रकार तृष्णा का प्रन्त नहीं । तृष्णा प्रशान्ति है । प्रशान्तस्य कुतः सुखम् इसके लिए सुखों की श्रेणियों को लक्ष्य में रखते हुए ऋषियों ने कस्बों को व्यवस्थित किया है । मनुष्य का कल्याण ऋषियों के निर्दिष्ट मार्ग पर चलने में ही है । मनमाने पथ में सिवाय दुःखवृद्धि के और कुछ नहीं है । संसार में यश हो जाने से पुत्र, पशु आदि वित्त - सम्पत्ति प्राप्त हो जाने से, मनुष्य अपने प्राप को सुखी समझता है । परन्तु यथाविधि कम्पं न करने से उसे यह सांसारिक सुख भी प्राप्त नहीं होता । इसके लिए ऋषियों ने गृहस्थियों के लिए- इष्ट - भापूर्त इस तीन कर्म निर्धारित कर रखे हैं । इनसे इसे सांसारिक सुख ( पार्पिष मौतिक सुख ) प्राप्त हो जाता है । यह प्रथम कोटि का सुख है । इससे इसमें संस्कार उल्बण रहते हैं, अतएव इसमें प्रात्मसुख का प्रभाव है । पृथिवी के १७ में ग्रहण से २५ में ग्रहण त s Hereas है । इसमें १७ व स्थान नाचिकेत स्वर्ग कहलाता है । २१ व सोरस्थान वध्मस्य विष्टप कहलाता है । २५ व स्थान नाक कहलाता है ये ही तीनों ( १७-२१-२५ ) त्रिविष्टप स्वर्ग कहलाते हैं । पहला ब्रह्मविटप है । दूसरा मन्त्रविष्टप है तीसरा विष्णु विष्टप है । तीनों में उत्तरोत्तर अधिक सुख है । कारण यही प्रावन्दन प्रात्मा । सूर्य्य से ऊपर महदक्षर है । यह सच्चिदानन्दघन भरमा है । उत्तरोत्तर के तारकम से वही पृथिवी तक व्याप्त हो रहा है । यद्यपि वह अपने स्वरूप से सर्व समानरूप से व्याप्त है, तथापि भूतमपञ्च की * मिक वृद्धि मे उत्तरोत्तर उसका भाग दबता जाता है । पृथिवी में यह बस हुआ है । १७ वें में वह कम दबा हुआ है । २१ वें में उससे भी कम । पच्चीसवें में बिल्कुल कम । ऊपर शुद्धरूप, अतएव प्रात्मा ज्यों-ज्यों ऊपर जाता है त्यों - त्यों शुद्धरूप की प्राप्ति से उसे अधिकाधिक मानम्य मिलता है । जब यह शुक्ररूप महत् का भी तरण कर जाता है तो वह श्रानन्दन में डूबकर सदा के लिए बन्धन से स्लट जाता है । इसमें सूय्यं के ऊपरभाग को अभी tere aafar । नीचे के भाग का विचार कीजिए । सूय्यं के नीचे १७ से २१ तक स्वर्गं स्थान है । यद्यपि सप्त के देवस्वर्गाः के अनुसार १८-१६ २०-२१-२२-२३-२४ का नाम स्वर्ग है, परन्तु वस्तुतः २१ तक ही स्वर्ग शब्द लागू होता है । २१ पर सूर्य है । इससे ऊपर जाना स्वर्ग नहीं, श्रपरामुक्ति है । इसमें चयनयज्ञ को छोड़कर और जितने भी यज्ञ है उनसे १७ से २० [ ६२ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य १ - १ सत् कम्मं दो प्रकार के होते हैं-{ १ - ( विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिकम्मं, यज्ञतपदानरूप-सत्कर्म्म २ - { श्रकम्मं अपरवा ३- विक्रम्मं [ ६३ ] अपराविद्या निरूपण स्वर्गति कम्म तक का स्थान प्राप्त होता है । यद्यपि सूर्य्य मृत्यु है परन्तु इसमें अमृत भाग भी है । नामृतत्वस्पाशास्ति ऋते चयनात् के अनुसार चयनयज्ञ के अतिरिक्त सारे यज्ञ सूर्य्य से नीचे १७ से ऊपर के स्वर्ग स्थानों में ही आत्मा को ले जाते हैं । चयनयज्ञ एक ऐसा यज्ञ है - जिससे २१ वीं स्थान मिल जाता है । सूर्य से ऊपर परब्रह्म ही है, अमृताक्षर है । नीचे भवर ब्रह्म है - क्षर है । पूर्व से यह भली - भाँति सिद्ध हो जाता है कि यज्ञरूप अपरविद्या से केवल मृत्युमण्डल पर अधिकार होता है । श्रात्मानन्द का इसमें प्रभाव है । क्योंकि कर्म्म कृत है । अमृत प्रकृत है । कृत से प्रकृत पाना दुराशामात्र है । उसकी प्राप्ति के लिए तो यज्ञ - कर्म्म भी छोडने पडेंगे । इसके लिए तो अक्षरविद्या का ही श्राश्रय लेना पड़ेगा । उसी से पूर्ण सुख प्राप्त होगा । इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि जो मनुष्य इष्टापूर्तदत्तरूप विद्या निरपेक्ष कम्मं करता है - वह ऐहलौकिक सुखों को भोगता हुप्रा पितृस्वर्ग में जाता है । विद्यासापेक्ष यज्ञतपदानरूप अपरब्रह्म की उपासना करता हुआ देवस्वर्ग में जाता है एवं प्रक्षरविद्यारूप ज्ञानयोग ( बुद्धियोग ) का प्राचरण करता हुआ मुक्त हो जाता है । इस मुक्ति के भी पर- अपर दो भेद हैं । श्रपरामुक्ति - उपासनारूप भक्तियोग से सम्बन्ध रखती है । इसके सालोक्य- सामीप्य -साहत्य- सायुज्य ये क्रमिक चार भेद हैं । चारों में द्वैतभाव है - प्रत: यह अपरामुक्ति है । संसार में पुनरागमन नहीं है, इसलिए तो यह मुक्ति है । परन्तु प्रद्वैतभाष नहीं है - इसलिए अपरा ( नीचे दर्जे की ) मुक्ति है । परन्तु इसी भक्ति को यदि निष्काम बना दिया जाता है तो यही गीता का बुद्धियोग बनती हुई ज्ञानयोग बन जाती है । इससे परामुक्ति होती है । इसके क्रममुक्ति - सद्योमुक्ति दो भेद हैं । क्रममुक्ति में क्रमिक बन्धनमुक्ति है । दूसरी है सद्योमुक्ति । सद्यो मुक्ति क्षीणोदर्क - भूमोदर्क भेद से दो प्रकार की है । एसबजं रसोऽप्यस्य परं वृष्ट्वा मिथलेसे गोता के अनुसार निराहार रहते हुए सारे संसार से अलग होते हुए शुद्धरसरूप ( श्रात्मरूप ) रह जाना क्षीणोदकं कैवल्य है एवं संसार को भी श्रात्मा समझकर सर्वत्र प्रात्ममय बन जाना भूमोदकं है । यही विदेहमुक्ति है । इसी के लिए वृहदा ० उप ० में - यत्र स्वस्य सर्वमात्मैवात् तत् केन कं पश्येत् - इत्यादि कहा है । अब बाकी बचते है अक - विकर्म्म । निरर्थक हंसना- घूमना- कुवेष्टा करना प्रादि प्रकम्मंण्यरूप जो निरर्थक कम्मं हैं जिनका कि विधिनिषेध दोनों ही नहीं है । इनसे नरक मिलता है एवं ब्रह्महत्या सुरापान - भ्रूणहत्या चातुर्वर्ण्यविरुद्ध-कर्म्म श्रादि विकम्मं हैं । इनसे लोकालोकरूप असुर्यलोक मिलता है । यह है - कर्म्मज्ञान विभाग और उनके फलों का संक्षिप्त निदर्शन । २ - ( विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिकम्मं, इष्टापूर्तदत्तरूप - पितृस्वर्गप्राप्ति { जलतान, हास्य श्रादि निरर्थक कर्म्म — नरकप्राप्ति { श्रात्महत्या, महापातकादि निषिद्ध कम् ---- - प्रसूर्यलोकप्राप्ति
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) परब्रह्म मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्या निरूपण २- भक्तियोग ( प्रवृत्तिरूप ) सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप - प्रपरामुक्ति - भक्ति ३- ( बुद्धियोगरूप ज्ञानयोग ( निवृत्ति - कम्मरूप ) --कम सद्योमेदमिपरामुक्ति } - ज्ञान इन सब में सुख केवल बुद्धियोगरूप ज्ञानयोग से, अक्षरविद्या से ही मिल सकता है । ध्यान रहे कि वे ही कम्मं यज्ञादि यदि प्रवृत्तिशून्य कर दिए जाते हैं तो वे परामुक्ति के साधन बन जाते हैं । प्रवृत्ति में वे कृतरूप रहते हैं । जहाँ ऋषि नास्त्यकृतः कृतेन कहते हैं वहाँ कृतेन का प्रवत्तिरूपकृतेन ही अर्थ हैं । प्रवृत्ति हटने पर वही कृत प्रकृत होता हृथा मुक्ति का साधन हो जाता है । ऋषि वा तै ० इत्यादि से जिस यज्ञकम्मं की निन्दा कर रहे हैं वह प्रवृत्तिरूप ही है । पार्थिव भौतिकसंसार की मपेक्षा अधिक सुख के कारण सौरदिव्य भौतिकसंसार परलोक है । इहलोकसुख पार्थिव सुख है । पारलौकिक सुख सौर सुख है । जो वहाँ पहुंच गया - वह संसारसमुद्र पार कर गया । यज्ञकम्पं संसार ( पार्थिव संसार ) समुद्र को पार करने की नौका है । कमी माप नौका में बैठे हैं? यदि बैठे हैं तो प्राप को मालूम होगा कि यद्यपि भाप जल की सतह पर हैं । जल के ऊपर चल रहे हैं । जल की लत नहीं है, परन्तु वायुवेगों से कम्पित नाव माप को कम्पायमान किए रहती है । निरन्तर बूबने की मीति सताती रहती है । क्यों? आप का प्लव ( नाव ) अच्छ है । स्थिर यान नहीं है । बस, ठीक यही हालत इन नावों की है । पार्थिव संसार से प्राप पार हो गए । परन्तु अभी कम्प है । क्यों कि यज्ञरूप नाव भी तो कम्मरूप ही है । प्रतः इससे भाप भ्रमयसुख प्राप्त नहीं कर सकते । कम्मं भी कैसा? कम्मं प्रवृत्तिरूपकम् । वह भी एक नहीं, भ्रष्टादशावयव प्राप की नाव में १८ जोड़ हैं । इनको खुलने में क्या देर लग सकती है? मला, जिन यशरूप ों में शास्त्रकार मष्टादश परकम्मरूप १८ जोड़ बतलाते हैं - वे कैसे हो सकते है? पात्मसुख को न जानने वाले अज्ञानावृतज्ञान से see बने हुए जी मनुष्य या कर्म्म बडा हो उसमें है इससे स्वर्ग सुख मिलता है - इत्यादि कहते हुए जिन यशों की स्तुति करते हैं वे सीले दुब्छे मर्त्यलोके इसम्सि के अनुसार स्वर्ग में क्षणिक सुख भोगकर जरामृत्युरूप उसी नश्वर पार्थिवसंसार का अनुसरण किया करते हैं ॥।७ ॥ सूर्य के ऊपर प्रभृतरूप विद्या भाग है । नीचे मृत्युरूप प्रविधा है । इसी मत्यं - विद्यारूप संसार में हम सब प्रतिष्ठित हैं, अतएव स्वभाव से ही प्रविद्याजगत् ( सौर - जगत् ) में प्रतिष्ठित मनुष्य प्रविद्यामय बने रहते हैं | सौर - बुद्धि प्रविश्रामय बनी रहती है, प्रतएव वे इस ज्ञानरूप विद्याभाग के रहस्य को जानने में असमर्थ रहते हैं । त्रैगुण्यरूप प्रवृत्तिप्रधान वेदशास्त्ररूप शब्दप्रपरूष का अध्ययन कर ये अपने आपको विना पढे - लिखे मनुष्यों की दृष्टि से बहुत योग्य समझने लगते हैं । मैंने बड़े परिश्रम के साथ साथ साङ्गोपाङ्ग देवाध्ययन किया है । वविद्या प्राप्त की है । मेरा ज्ञान साधारणों की अपेक्षा सुपरिष्कृत है - वृठ है । में साधारणों को तरह चञ्चल नहीं हूँ । बडा घोर हूँ 1 । विद्याबल से सोच - समझकर काम करता हूं । मैं विदितवेवितव्य हूँ- इस प्रकार ये कम् प्रपची अपने प्रापको बहुत घोर श्रीर पण्डित समझते हुए श्रविद्या की कृपा से जन्ममरणादि से पुनः पुनः पीडित होते हुए इधर - उधर [ ६४ ]