Mundakopanoshad — पृष्ठ 71–80
Mundakopanoshad · पृष्ठ 71–80
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terrush ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण भटका करते हैं । अविद्या तमोरूप होने से स्वयं अन्ध है । उसको अपनाकर ये मी अन्धे हो रहे हैं । जैसे एक अन्धे मनुष्य से ले जाया जाता हुआ दूसरा अन्धा भयुष्य पद - पद पर ठोकरें बाता रहता है - एवमेव विद्यारूप अन्धपुरुष के चक्र में पड़कर अन्चे बने हुए ये मनुष्य भी पद - पद पर ठोकरें खाया
करते हैं ।
॥ ६ ॥
हमने निहोत्र कर लिया है । ज्योतिष्टोम कर लिया है । कहाँ तक कहें, चयनयश तक कर सिया है । भाज हम लतकृत्य हो गए हैं । आज हमारे जैसा इस संसार में कौन है? इस प्रकार भविया मैं नेक तरह से प्रविष्ट होते हुए बालची मनुष्य उसी प्रकार ज्ञान में धन्य हो गया हूँ - इस तरह प्रभिमान करने लगते हैं, जैसे कि एक बच्चा मिट्टी के खिलोने को पाकर पपने मन में फूला नहीं समाता । विद्या के पास ही प्राररूप विश्वातस्य प्रतिष्ठित है, परन्तु उसे ये नहीं जानते । इसका कारण वही राग है । राम प्रासक्ति है । धारिष्ट प्रवृत्तिमूला है । यदि मे खसः सततं कार्य कर्म्म समाचर के असार प्रतिलक मासक्ति छोडकर कर्म्म करते तो उनका कोई अनिष्ट नहीं था । ऐसी अवस्था में उनके विद्याभाग पर विद्या कमी प्रभाव नहीं जमा सकती थी, परन्तु वे तो मासक्ति के गुलाम बन रहे हूँ । आसक्ति से वासनासंस्कार का जमाव होता है, इससे मेषान्दत्र सूय्यंवत् मात्मा का विद्याभाग आखक्ष हो जाता है । बस, दम्मी मनुष्य इसी राग से उस तस्य को नहीं पहचानते, अतएव मे धातुर हो जाते हैं, क्षुब्ध हो जाते हैं एवं क्षणिक सुखसाधक होने से क्षीण लोकरूप स्वर्गलोक की धारापना करने से ये मूढधी उससे पुनः क्षीणलोक नाम से ही प्रसिद्ध मृत्युलोक चक्र में था गिरते हैं । वृति का संवात् पद हमारे को बुद्धियोग का हो उपदेश देता है । राग ( प्रवृत्तिरूप - प्रासक्ति ) बन्धन का कारण है न कि कर्म्म । प्रासतिजनित संस्कारपुञ्ज विद्या का प्रतिबन्धक है, न कि me कविरहित निष्काम कम्मे ।
भासक्ति छोड दो, विद्या मिल जाएगी । फिर धमय है यहीं तात्पर्य है ॥ ॥
॥ इति विद्यासापेक्षप्रवृलिकम्मस्वरूपम् तथा तादशकर्मत्यामोपदेशः समाप्तः ॥
विद्यासापेक्ष कम्मं का स्वरूप बतला दिया गया । श्रम संक्षिप्त रूप से विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्ति-कम् का निरूपण करते हैं । यहकमे में घासक्त जन जहाँ केवल मूढ है वहाँ इष्टापूर्तरूप विद्या-निरपेक्ष सांसारिक कम्मों में रत रहने वाले लोग तो उनसे भी अधिक गए बीते हैं, भ्रतएव ऋषि ने प्रावेश में पाकर उनके लिए प्रसूद शब्द का प्रयोग किया है । वे प्रकृष्ट मूढ मूढतम हैं । इष्टापूर्त को हो सर्वेसर्वा मानने वाले प्रमूढ इससे अतिरिक्त विद्यातत्त्व को जानने में एकान्ततः असमर्थ ही रहते हैं । ऐसे प्रमूढ पितृस्वरूप नाकपृष्ठ में अपने किए का क्षणिक फल भोग कर इस लोक में एवं इससे भी होन-तर असुदिलोकों में प्रविष्ट होते 1 हमने बतलाया था कि कम्मं के कम्मं श्रकम्मं विकम्मं तीन भेद हैं । इनमें कम् विद्यासापेक्ष - विद्यानिरपेक्ष भेद से दो प्रकार का है । इष्ट - प्रापूतं दत्त की तरह प्रकर्म्म-विकम् भी एक प्रकार से विद्यानिरपेक्ष ही हैं । अतः ऋषि ने विभाग न्ह कर दो ही विभाग कर डाले हैं । इनमें पहले का फल स्वर्गप्राप्ति है । दूसरे में से इष्टापूर्तदत्त का फल पितृस्वर्ग है । ये दोनों [ ६५ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्यानिरूपण स्वर्गं से च्युत होकर इस भूलोक में जन्म लेते हैं । इनमें भी यज्ञादिवाले उच्चवर्ण में जन्म लेते हैं । इष्टादिवाले निकृष्ट योनि में जन्म लेते हैं एवं प्रकम्पं विकर्म्मवाले इस लोक से भी हीन नरकादि लोकों में जाते हैं । इस प्रकार इष्ट- प्रकम्मं विकम्मं तीनों के संग्रह के लिए ऋषि ने इमं लोकं हीनतरं या विशन्ति - कहा है । १ - विद्यासमुचित प्रवृत्तिकम् - यज्ञतपदान स्वर्गप्राप्ति, अनन्तर क्षीणेयुष्ये - मूलोकावाप्ति २ - विद्या निरपेक्ष प्रवृत्तिका --१ -- इष्ट- मापूर्त- दत्तरूप कम् ] - सत्कम्पं पितृस्वर्ग, धनन्तर भूलोकावाप्ति २- निरर्थक कम्मरूप प्रक ३- शास्त्र निषिद्ध विकम्म } → धसत्कम्मे पार्थिव विषयसुख, मनन्तर हीन लोक ( नरक ) - ात 11 20 11 यह है पराविया का निरूपण, उसके फलों का विवरण । इस विद्या से परमानन्द कभी प्राप्त नहीं हो सकता । इसके लिए तो निष्कामकम्मरूपा ज्ञानयोगरूपा परब्रह्मविद्या ही उपादेय है - इसी अर्थ का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं ---" तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्वरव्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्या चरन्तः । सूर्य्यद्वारेण ते बिरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा " ॥ सब कुछ हुआ । परन्तु वह कोनसा उपाय है जिससे कामनारूप प्रवृत्तिभूतिका भासक्ति का परित्याग किया जाए एवं बुद्धियोगरूप ज्ञानयोग का अनुपालन किया जाए? बस, इस मन्त्र में ब्रह्मो पायन के जाते हैं-कारण बतलाए “ ब्रह्मचय्यं तपः- सत्यं वेदानां चानुपालनम् । श्रद्धा चोपनिषत् चैव ब्रह्मोपायनहेतवः । तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको विधीयते ।
न येषामनृतं जहां माया हृवि निधीयते ।
जैह्ममनृतं माया चेति निरोषो ब्रह्मरणा स्मृतः ” ॥
- के अनुसार १ - ब्रह्मचय्यं, २ - तप, ३- सत्य, ४ - वेदानुपालन, ५ श्रद्धा, ६ - उपनिषत् -ये ६ ब्रह्म ( अमृताक्षर ) की प्राप्ति के कारण हैं एवं जा, अनृत और माया - ये ब्रह्मज्ञान के निरोधक हैं | [ ६६ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपर । विद्या निरूपण १- अह्म वयं ज्ञान और कम्मं दो ही प्रधान स्तम्भ हैं । ज्ञान का नाम ब्रह्म है । प्राधिदैविक सौर-विद्याभाग ही ब्रह्म हैं । श्रविद्याभाग ही कम्मं है । इनमें से विद्या - भाग की चर्य्या ( पाचरण ) ही महा च है । निरन्तर उस ज्ञान भाग को ही भपना उपास्य एवं उपादेय समझना विद्यारूप कम्मय पदार्थों में उसी ज्ञान की भावना करते रहना ब्रह्मवस्यं है । वह अध्ययनाध्यापन पर निर्भर है । अध्य-यनाध्यापन के कारण औौर तरफ से प्रवृत्ति हटकर विद्याभाग की ओर ही मन लगा रहता है । पञ्चमहा-यज्ञों में से ब्रह्मयज्ञ नाम का अध्ययनाध्यापनरूप यज्ञ ही महाचर्य है । वर्या परिचय है । परिचय उपासना है - सेवा है । बह्मप्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्या ही प्रपेक्षित है । २ - सप - उस ब्रह्मचर्य्या की प्राप्ति के लिए जो व्यापार किया जाता है यही तप है । ममसश्चे-मिद्रयार्णा च ऐकाग्र्यं परमं तपः तप का यही लक्षण है । मन इन्द्रिय दोनों को एकाग्र बनाए रखना सप है । इसी से शानभाग की उपासना हो सकती है । शानार्थ कर्म्म ( निष्कामकर्म्म ) ही तप है । यही एक प्रकार का बुद्धियोग है । तन्मयता तप है । जब तक शान की भोर तन्मयता नहीं होगी तब तक बह्य की चर्या ( परिचय ) धधूरी है । खाते - पीते - सोते उठते - बैठते उसी में लो लगाए रखना, यज्ञरूप यज्ञात्मा के लिए सारे कम्मं करना तप है । इसी तप के लिए--" यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व भदर्पणम् " ॥ " - यह कहा जाता है । यहाँ का तप उपासना है - ईश्वरा सपना है । वह भी प्रात्मनिमित्त ही होनी चाहिए । हमारा श्रोत तपःशब्द सबका संग्राहक है । मौर - मोर कारणों में यह तप मुख्य कारण है । ३- सत्यम् - यथार्थ ज्ञानेऽमिचथि: - ही सत्य है । सत्य नियति है । नियतिज्ञान ( अक्षरज्ञान ) थथा-ज्ञान है । उसकी पोर मात्मा का मुकाव चाहिए, यही सत्यानुपालन है । ४- देवानां चानुपालनम् - उस धभिरुचि को पैदा करने के लिए वेदाध्ययन अपेक्षित है । वेद ही उसके असली स्वरूप का परिचायक है । सांसारिक पदार्थ निःस्सार हैं । सत्यनियति ही मन्तर्यामीरूप से सर्वत्र व्याप्त है । यह ज्ञान वैदिकविज्ञान पर भवलम्बित है । जो शब्दब्रह्म से अपरिचित है - वह उसे नहीं जान सकता, उघर अभिरुचि नहीं रख सकता । सत्यनियति के स्वरूप को बतलाने वाला विज्ञानशास्त्र हो वेद है । मतः सत्य की भोर प्रमिदपि पैदा करने के लिए वेदानुपालन नितान्त अपेक्षित है । ५- मला - उपेक्षाबुद्धि प्रश्रद्धा है, अपेक्षाबुद्धि अस्सा है । अपेक्षा बुद्धि के बिना सब व्यर्थ है । उसे ( ब्रह्म ) प्राप्त करने की भोर मन का झुकाव होना - लगाव होना ही श्रद्धा है । बद्धामयोज्यं पुरुषः यो यच्छ्रद्धः स एव सः के अनुसार श्रद्धा ब्रह्मोपायन का तपोवत् प्रधान हेतु है । ६ - उपनिषत् - कोरे वेदानुपालन से श्रद्धा तब तक असम्भव है जब तक कि उपनिषत् न हो । उपपत्तिज्ञान ही उपनिषत् है, काव्यकारणपरिज्ञानविद्या है । मन की लगन श्रद्धा है, उपपत्तिज्ञान १ गीता ६।२७ । [ ६७ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य अपराविद्यानिरूपण उपनिषत् है । यदेव विचया षट्या, उपनिषदा करोति तदेव वोध्यंवत्सरं भवति के अनुसार जब तक तीनों का समन्वय नहीं होता तब तक उसमें पूरी सफलता नहीं मिल सकती । श्रद्धा उपनिषद् से उत्पन्न होती है । बस, ब्रह्म ( विद्याभाग ) की प्राप्ति के ये ही ६ कारण हैं । इसमें तप और श्रद्धा मुख्य हैं । ठीक इसके विरुद्ध जैह्म - मनृत - माया ये तीन प्रविद्याभाग के उपकारक बनते हुए विद्या के निरोधक बनते हैं । १ - अह्मम् - मनस्यम्यत् - वचस्यन्यत् - कम्मंध्यन्यत् दुरात्मनाम् के अनुसार मन - प्राण - वाक् प्रास्मा की इन तीनों कलानों का विभिन्न मार्ग में जाना ही जहा है । कुटिलता ही बिह्यता है । तीनों भात्म-कला हूँ । यदि तीनों - मनस्येकं वचस्येकं - कम्मंध्येकं महात्मनाम् के अनुसार एक मार्ग पर हैं, यन्मम-सा मते तद् वाचाभिवदति यद् वाचा प्रनिवदते सत्कम्मंणा करोति के धनुसार तीनों यदि एक घरातल पर प्रतिष्ठित हैं तो ऋजुमाव है, धन्यथा कुटिलता है । जैसे विषम धरातल पर पूर्णरूप से सौर प्रति-बिम्ब नहीं पड़ता, एवमेव कुटिलता से विषम होने वाले प्रशानपात्र में पूर्णरूप से विदाभास उल्बण नहीं होता । प्रज्ञान एवं प्रज्ञानस्य विज्ञान ( बुद्धि ) खण्ड खण्ड में परिणत हो जाता है । इसी को प्रव्यवसाया-त्मिका बुद्धि कहते हैं । यह जैह्यभाव से सम्बन्ध रखती है । जैह्य भाव को हटाने से व्यवसाय बुद्धि ( जो कि बहुशाख न होने से एकस्वरूपा है ) प्राप्त होती है— " व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् " ॥ ' - यह स्मासं वचन सभी को विदित है । २ - अमृतम् - कल्पमासारस्थं यतएव निःसारत्वममृतत्वम् मत का यही लक्षण है । बैठे - बैठे निरर्थक असम्भावित कल्पना करते रहना मनुतभाव है । प्रश्नोपनिषत् के सत्यानृत- प्रकरण में ( ठे प्रश्न में ) इस विषय का विस्तार से निरूपण कर दिया गया है । ३- माया - वचन विधात छल है, यही माया है । धोखेबाजी - फरेब - धूर्तता सब माया के अन्तर्भूत हैं । माया प्रासुरषम्मं है, भासुरप्राणा माया तमोमयी है । तम प्रविधा है । प्रविद्या-are femmenares है । प्रतएव तन्मूलकमाया को भी हम ब्रह्म के विरोध का कारण मानने के लिए तय्यार हैं । मायमात्मा बलहीमेन लभ्यः के मनुसार मात्मबल भी अपेक्षित है । म्रात्मबल मनोबल पर अपेक्षित है । मनोबल भोजबल पर अपेक्षित है । भोजबल शुक्रबल पर अपेक्षित है । शुक्र रक्षा ब्रह्मचर्य्य है । परम्परासम्बन्ध से शुक्ररक्षणरूप ब्रह्मचय्यं भी ब्रह्मोपायन हेतु है । सत्यभाषण मी कारण है । जो मनुष्य मिथ्या बोलता है उसका रसरूप प्रात्मा शुष्क हो जाता है, जैसा कि ६ ठे प्रश्न में बतलाया जा चुका है । पूर्व में हमने बतलाया है कि ६ नों कारणों में तप, श्रद्धा प्रधान हैं । प्रतः ऋषि ६ नों में से इन दो का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं जो शान्त एवं धीर विद्वान् भिक्षावृत्ति से अपना निर्वाह करते हुए जंगल में रहते हुए तप और श्रद्धा की उपासना करते हैं, वे सूर्य्य द्वारा विरज बनते हुए उस स्थान पर पहुँच जाते हैं जहाँ पर कि वह मव्ययात्म ममृत - पुरुष प्रतिष्ठित है । १ गीता २२४१ । २ द्रष्टव्य न्यायदर्शन । [ ६८ ]
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प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्यानिरूपण शरण्य से संन्यास- प्राश्रम सूचित किया है । घर बार छोडकर जंगल में चले जाना संन्यास नहीं हैं । किन्तु घर में रहते हुए काम्यकम्मों का परित्याग ही वास्तविक संन्यास है । ऐसे संन्यासी के लिए घर ही जंगल हैं । भ्रकेला होना - यही जंगल से अभिप्रेत है । प्रासक्तिशून्य मनुष्य - न करोति न लिप्यते के अनुसार सब में रहता हुआ भी सब से अलग है अर्थात् जंगल में है । वह सर्वत्र अपने को ही व्याप्त देखता है - वह एक ही सर्वत्र व्याप्त है । जब उसके पास दूसरा नहीं तो सारा विश्व उसके लिए जंगल है । ऐसा कम्मंयोगी सन्चासंग्यासी देहत्यागानन्तर अपने ब्रह्माण्डरूप सौरमण्डल का भेदन करता हुआ - हृदय से निकल कर सीधी ऊपर जाने वाली सुषुम्णा द्वारा, प्रमृतत्व को प्राप्त हो जाता है । रज को लोक कहते हैं । वह विरजा हो जाता है । सूर्य्यं के ऊपर महान् है । इसी महत्स्थान में अमृताक्षर है । अक्षरपुरुष का भाषारभूत मात्मा प्रव्यय है । प्रव्यय सच्चिदानन्दवन है । यह भात्मा इसी में लीन हो जाता है । ॥११ ॥
ऋषि को ब्रह्मविद्या के विषय में जो कुछ बतमाना था, बतला दिया । सब ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा रखने वाले शिष्य एवं उपदेश देने वाले गुरु का स्वरूप बतलाकर उत्तर समाप्त करते हैं । ब्रह्मज्ञान की जिज्ञासा रखने वाले को चाहिए कि वह कम्मंचित ब्राह्मणों की यथार्थ रूप से परीक्षा करे । जब तक प्रसद् वस्तु का ज्ञान नहीं हो जाता तब तक सत् का यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिए ज्ञान जिज्ञासु को-" कर्म्मणो ह्यपि बोद्धव्यं ० " । - इत्यादि, गीता- प्रदेश को स्मरण में रखते हुए इन कम्मों के प्राचरण करने वाले ब्राह्मणों की सम्यक् परीक्षा करनी चाहिए । इस परीक्षा का फल यह होगा कि खारे प्रवृत्ति कम्मों से वैराग्य हो जाएगा । afe तुम समझ लोगे कि भाई! पात्मज्ञान ज्ञानरूप होने से अकृत है । कम्मंजाल कृत है । कृत से कभी प्रकृतप्राप्ति संभव नहीं है । बडे - बडे कम्र्म्मठ ब्राह्मणों को भी मैं उसी जन्म - मरण के चक्र में फंसा हुआ पाता हूँ । भतः इसके तो परित्याग में ही कल्याण है । इस प्रथम सम्यक् परीक्षण के अनन्तर जब इसे प्रासक्तिरूप कम्प्रपञ्च से जिस दिन वेराग्य हो जाएगा, उस दिन इसे ब्रह्मजिज्ञासा होगी । इस ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी जिज्ञासा को पूरी करने के लिए इसे समित्पाणि बनकर श्रोत्रिय भोर ब्रह्मनिष्ठ गुरु की ही शरण में जाना चाहिए । शब्दब्रह्म जानने वाला गुरु श्रोत्रिय है । शस्दब्रह्म को लक्ष्य बना कर परब्रह्म को पहुँचा हुमा गुरु ब्रह्मनिष्ठ है । भाकित होना श्रोत्रिय है, भामिल होना ब्रह्मनिष्ठ है । दोनों को जानने वाला ( परापरविद्या को जानने वाला ) विद्वान् ही घोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ है । ऐसे ही गुरु की सेवा में अपनी
जिज्ञासा शान्त करने के लिए जाना चाहिए ।
॥१२ ॥
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eroes ( द्वितीयखण्ड ) अपराविद्या निरूपण ऐसे उपसन्न, प्रशान्तचित्त, शमयुक्त शिष्य के लिए वह ब्रह्मनिष्ठ गुरु उस ब्रह्मविद्या का उपदेश दे, जिससे कि उस प्रक्षरपुरुष को वह जान जाए ॥।१३ ॥ ---इस दूसरे खण्ड में ऋषि प्रवृत्तिलक्षरण । प्रपरविद्या का स्वरूप बतला कर अन्त में उसके परित्याग का उपदेश देते हैं एवं निवृत्तिलक्षणः पराविद्या की आराधना का प्रवेश करते हैं । दो विद्या जानने की हैं । प्रथमखण्ड में प्रथमा पराविद्या का निरूपण है एवं इस द्वितीयखण्ड में द्वितीया अपराविद्या का निरूपण है-॥ इति प्रपराविद्या निरूपणात्मको द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ ॥ इति परापरविद्यानिरूपणात्मकं प्रथममुण्डकं समाप्तम् ॥ १ [ ७० ]
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पथ द्वितीयमुण्डकम् तत्र परावरब्रह्मणः- समष्टिरूपात्मक वर्णनम्-तत्प्राप्त्युपायप्रदर्शनं च
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अथ द्वितीयमुण्डके-परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्य निरूपणात्मकः प्रथमः १
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अथ मुण्डकोपनिषद--द्वितीयमुण्डके प्रथमः खण्डः [ मूल ] तबेतत्सत्यं यथा सुखीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चंवापियन्ति ॥ १ ॥
विव्यो मूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । प्राणो ह्यमनाः शुभ्रो हाक्षरात्परतः परः ॥२ ॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । त्वं वायुज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३ ॥
प्रग्निर्मूर्धा चक्षुषो चन्द्रसूयो दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्द्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥४ ॥
तस्मादग्निः सविधो यस्य सूर्य्यः सोमात्वर्जन्य प्रोषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्संप्रसूताः ॥ ५ ॥
तस्मात्चः साम यजुषि दीक्षा यशाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
तस्माच्च वेदा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्रारणापानौ व्रीहियवौ तपन भद्धा सत्यं ब्रह्मचयं विधिन ॥७ ॥
सप्त प्राणाः प्रञ्चयन्ति तस्मात्सप्ताचिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति धारणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥
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facteruse ( प्रथमखण्ड ) सुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण मतः समुद्रा गिरयश्व सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । प्रतश्न सर्वा प्रोषधयो रसाञ्च येनैष मूर्तस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥९ ॥
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सो s विद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ॥१० ॥
॥ इति द्वितीयमुण्डके प्रथमः खण्डः ॥ ॥ १॥.
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