Mundakopanoshad — पृष्ठ 81–90

Mundakopanoshad · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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प्रथ द्वितीयमुण्डके-परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्य निरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः अक्षरसत्यनिरूपणद्वारा ईश्वरीयवैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञात्मकवेवसत्यनिरूपणम् ---[ विज्ञानभाष्य ] उपनिषत् के प्रारम्भ में ही यह बतलाया जा चुका है कि इस मुण्डकोपनिषद में प्रधानरूप से ईश्वरीयदेवसत्य का ही निरूपण किया गया है । ईश्वरीय देवसत्य वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञा-त्मक है । सुपृष्ठ से सूय्यं तक रोदसी त्रिलोकी में यह सहस्रशीर्ष, सहस्राक्ष, सहस्रपात्, जीवसत्य नाम से प्रसिद्ध सर्वभूतान्तरात्मा प्रतिष्ठित है । प्रथममुण्डक के प्रथमखण्ड में प्रसात् प्राणः, ममः, सत्यं, लोकाः कम्मंसु चामृतम् - इत्यादि कहा है । इनमें सत्य शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं । त्रिवत्या हि देवाः के अनुसार सत्यतत्त्व वेद, सूत्र, नियुक्ति इन तीन भागों में विभक्त है: वेदाः सत्यम्, सूत्रं सत्यम्, मियतिः सत्यम् के हैं । इन तीनों को ऋषि ने क्रमिक निरूपण किया है । वेदाः सत्यम् का 10 अनुसार सत्य के तीन यज्ञ से सम्बन्ध है T । जिया के अनुसार यज्ञतस्व ऋग् - यजुः साम की समष्टिमात्र है । ऋक् अग्नि है । यजुः वायु है । साम मादित्य है । तीनों के प्रयोग से यज्ञस्वरूप सम्पन्न होता है । मग्नि गार्हपत्य है । वायु विषय है एवं भाहित्य प्राहवनीय है । यह त्रेता भग्नि ही भूपृष्ठ से २१ तक संतत ( वितत ) होकर fearner नाम से प्रसिद्ध होता है । विज्ञानयज्ञ मन्त्रमय है । ऋग्यजुः साम ब्रह्म ही मन्त्र है । उसी के भाषार पर त्रेताग्नि का वितान होता है, प्रतएव वेद और तज्जनित यज्ञ को हम धमित्र कहने के लिए तय्यार हैं । बस, मुण्डकोपनिषत् के प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड में इसी वेदरूप ( मन्त्रमय ) यज्ञसत्य काही निरूपण है । यज्ञसत्य ही देवसत्य है क्योंकि अग्नि ( वैश्वानर ), वायु ( हिरण्यगभं ), इन्द्र ( सर्वज्ञ ) इन तीन देवताओं की समष्टि ही यश है । यही हमारा ईश्वरीयदेवसत्य है । यशव्याज से ऋऋषि ने द्वितीयखण्ड में इसी देवसत्य का एवं उस यज्ञेश्वररूप देवसत्य के उपासनाफल का निरूपण किया है । यह यज्ञ क्षररूप है, प्रतएव हम इस खण्ड को क्षरात्मा का भी निरूपक कह सकते हैं । वेद क्षर है । प्रग्नित्रयी क्षर है । अग्नित्रयरूप यशदक्षर भी क्षर हैं । क्षर को अवर कहा जाता है । इसी क्षर निरूपण को सूचित करने के लिए ऋषि -" प्लवा ह्येते बुढा, यज्ञरूपा श्रष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म " । " -इत्यादि कहा है । इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रख कर हम देवाः सत्यम् - देवाः सत्यम् - यज्ञः सत्यम् - प्रवराक्षरः सत्यम् इन सबको एक वस्तु ( सत्य ) मानने के लिए तय्यार हैं । बस, द्वितीयखण्ड में क्षररूप इसी वेदसत्यात्मक यज्ञसत्य द्वारा हमारे सुप्रसिद्ध देवसत्य का निरूपण है - जैसा कि उस खण्ड के भाष्य से सर्वथा स्पष्ट हो जाता है । वेद के बाद है, सूत्रसत्य । सूत्रसत्य के बाद है - नियतिसत्य । बस, द्वितीय १ मुण्डकोप ० १।२ / ७ । [ ७७ ]

पृष्ठ 82

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faaranush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण मुण्डक के इस प्रथमखण्ड में इन्हीं दोनों सत्यों का एकरूप से निरूपण किया गया है । जैसे क्षर की प्राण-आपः- वाक्- प्रश्न प्रश्नाद ये पाँच कलाएँ हैं । अव्यय की प्रानन्द- विज्ञान- मन - प्राण वाक् ये पांच कलाएं हैं, एवमेव मध्यस्थ अक्षरपुरुष की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम ये पाँच कलाएं हैं । प्रक्षर इन पाँच कलामों में विकसित रहता है । इन पाँचों कलाओं के ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र, इन्द्र - सोम - प्रग्नि ये दो विभाग हो जाते हैं । इन दोनों में पहला विभाग अन्तर्यामी सत्य कहलाता है । दूसरा विभाग सूत्रसत्य कहलाता है । मग्नि - अक्षर मौर सोम - अक्षर से क्षररूप प्रप्त और क्षररूप प्रनाद से ( क्षर अग्नीषोम से ) सारा संसार बनने वाला है । अग्नि सत्य है, सोम ऋत है । इस ऋततत्त्व का शासक ऋतसोमाक्षर सूत्र है एवं सत्यतत्त्व का शासक सस्याग्निप्रक्षरसूत्र है । इस प्रकार ऋत्सत्य भेद से उस भग्नीषोमरूप सूत्रसत्य के त सत्य दो विभाग हो जाते हैं । संसारस्वरूप में परिणत अग्निसत्य का सत्य वही अक्षराग्निसुधसत्य है एवं हृत्. माग का प्राधार वही ऋतसूत्र है । इसी ऋत - सत्यात्मक अग्नीषोमाक्षररूप अक्षरसत्य के विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् व्यास कहते हैं-" सत्यव्रतं सत्यपरं सत्यं सत्यस्य योनि निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यं ( अक्षरसत्यं तस्य ) ऋतसत्यनेनं सत्पात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः " ॥ " कहना यही है कि अक्षर का इन्द्रमय पग्मिसोममान सूषसत्य है । स्वायम्भूव प्राणवायु रूप में ( प्राणवायु -सूत्ररूप में ) परिणत होकर ही इस सूत्र सत्य ने सातों लोकों को अपने में बह कर रखा है । सातों लोक अपने - अपने स्थान पर रहते हुए परस्पर बद्ध है । वह उसी सुभवस्व की महिमा है । इसी सूत्रसत्य का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" वायुर्वे गौतम तत् सूत्रम् 1 । वायुना दे गौतछ सूत्रेणार्क च लोक: परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संवृब्धानि भवन्ति । वाधुना हि गौतम सूत्रेण संवृब्धानि " - इत्यादि ॥ " इस सत्य सूत्रात्मा के माषार पर सारा विश्व सत्य भाव में परिचत हो रहा है । आत्म-प्रकरण में यही श्रग्नीषोमाक्षररूप सूत्रसत्य सुत्रात्मा नाम से प्रसिद्ध है । संसार में जितनी भी मूर्तियां हैं, पिण्ड हैं, सब सूत्रसत्यमय हैं । प्रत्येक मूर्ति क्षराग्निसोममय है । इसी को हम मांसों से देखते हैं । संसार का बहिःस्वरूप प्रग्नीषोममय है । इसीलिए अग्नीषोमात्मकं जगत् - यह कहा जाता है । इसी प्रग्नीषोममय पिण्डजगत् के भग्नीषोमोय परमाणुओं को एकरूप से बद्ध रखने वाला अग्नीषोममय वही सूत्रसत्य है । अब चलिए अन्तर्य्यामी की भोर । वस्तुपिण्डमात्र में केन्द्र होता है, इस केन्द्र में ब्रह्मा - विष्णु-इन्द्र तीन अक्षर रहते हैं । ब्रह्मा प्रतिष्ठा तत्व है । प्रत्येक पदार्थ में जो एक ठहराव दीखता है, स्थिति दीखती है, वह ब्रह्माक्षर है एवं प्रत्येक पदार्थ कुछ खाता है । बस, जिस हृय - शक्ति से यह खाता है - उसी १ श्रीमद्भागवत पुराण १०/२/२६ । २ शत ० वा ० १४/६/७ १६ । [ ७८ ]

पृष्ठ 83

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्यनिरूपण शक्ति का नाम विष्णु है । साथ में उस पदार्थ में से निरन्तर कुछ खर्च भी होता रहता है । जो शक्ति आगत पदार्थों को बाहर फेंका करती है वही इन्द्र है । स्थिति, श्रागति ( प्रादान ), गति ( विसर्ग ) ये पदार्थ-मात्र में तीनों धर्म हैं । जैसे प्रग्नीषोमअक्षर अग्नि - सोममय पिण्ड के प्रवर्तक हैं, एवमेव यह हुय देवता देदसाहस्री - लोकसाहस्री - वाक्साहसी इन तीन साहस्रियों के प्रवर्तक हैं । ब्रह्माक्षर प्राणाक्षर द्वारा वेदसाहस्त्री का वितान करते हैं । विष्णुप्रक्षर आापक्षर द्वारा लोकसाहस्री का वितान करते हैं एवं इन्द्राक्षर वाकुक्षर से वाकुसाहस्त्री ( वषट्कार ) का वितान करते हैं, प्रतएव इन्द्र के लिए वाक्साहस्रीरूप छोष्ट्-कार ही किया जाता है । इस साहस्रीत्रयी का प्रधान कारण इन्द्र विष्णु की स्पर्द्धा है । स्थितिरूप ब्रह्म-तस्य पर प्रागतिमतिरूप हन्द- विष्णु की प्रादान विसर्गरूपा प्रतिस्पर्द्धा होती है । इससे तीन साहस्रियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । इसी साहस्रीविज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-" उभाजिग्यथुर्न बरा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्य नैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदेश्येयाम् " ॥ '

" कि तत् सहस्रमिति - इमे लोकाः ।

इमे वेदाः प्रथो वागिति ब्रूयात् " ॥2

अस्तु इस वैज्ञानिक विषय को प्रकृत में हम अधिक नहीं बढाना चाहते । प्रकृत में केवल यही बतलाना हैं कि वस्तुमान के हृदय में हृ - द - य रूप स्थिति प्रागति गतिमय ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ये तीन अक्षर रहते हैं! इसकी समष्टि ही अम्मी है । हम इसे नहीं देखते क्योंकि यह हृदय में रहता है । धन्तः प्रतिष्ठित रहकर यही अन्तर्यामीसत्य उसका नियमन कर रहा है; प्रतएव अम्तस्तिष्ठम् त्रियमयति पदार्थान् - इस व्युत्पत्ति से उसे अन्तर्यामी कहा जाता है । भग्नि ऊपर ही जाता है । पानी नीचे ही जाता है । वायु तिय्यं ही चलता है । सूय्यं नियतस्थान पर ( बृहती पर ) ही प्रतिष्ठित रहता है । पृथिवी कमी कान्तिवृत्त को नहीं छोडती । चन्द्रमा दक्षवृत्त से कभी अलग नहीं होता । ३६० दिन का ही वर्ष होता है । महिना ३० दिन का ही होता है । गो मादि पशुषों के सींग अवश्य ही होते हैं । इस प्रकार पदार्थमात्र में हम नियतभाव देखते हैं । सब में एक नियत स्थिति है । वह नियतधम्मं इसी अन्तर्यामी का धर्म है | पदार्थ मात्र के केन्द्र में प्रतिष्ठित अन्तर्यामी उन उन पदार्थों से-" पराजित वानि व्यतरण स्वयम्भूस्तस्मात् क्सङ् पश्यति नान्तरात्मन् " । " -इस सिद्धान्त के अनुसार भविज्ञात है । पृथिवी - जल - तेज- वायु प्राकाश - दिशाएं- विद्युत् - सप्तलोक-सर्ववेद - सर्वयज्ञ - सर्वभूत - प्रारण वाक् - श्रोत्र - मन - त्वक् - तम- रेत - आत्मा ( भूतात्मा ) सब में वह प्रन्तः प्रतिष्ठित रहकर सबका स्व - स्वरूप से संचालन कर रहा है । वही हमारा नियतिसत्य है । नियतिरूप से विचरण-१ ऋग्वेद मं ० ६६६/८ । २ ऐ ० ब्रा ० अ ० २८ | ख ० ७ । ३ कठोप ० २।२।१ । [ ७६ ]

पृष्ठ 84

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेव सत्यनि शील होने के कारण ही वह नित्यतत्त्व नियतिवर कहलाता है । नियतिवर ही धाजकल के उच्छिष्ट-भोगी पाश्चात्यों में नेचररूप में परिणत हो गया है । प्रकृति का नियम वटल है - यह जो माजकल का घंटाघोष है, वह इसी प्रन्तर्यामी की कृपा है । अक्षर अव्यय की प्रकृति है । पुरुष प्रसंग है । प्रकृतिरूप अक्षर ने ही मन्तर्य्यामी, सूत्ररूप में परिणत होकर सबका संचालन कर रखा है । इसी हृदयस्य हृदयरूप अक्षरसत्यात्म नियतिसत्य का निरूपण करते हुए धनवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" एष प्रजापतिर्यद् हृदयम् । एतद् ब्रह्म । एतत् सर्वम् । तदेतत्त्र्यारं हृदयमिति । ' हृ ' इत्येकमक्षरम् । ' द ' इत्येकमक्षरम् । यमित्येकमक्षरम् । तद्वै तदेतदेव तदास सत्यमेव " | " यह है - प्रक्षरसत्य के नियति, सूत्ररूप दोनों भावों का स्वरूपनिदर्शन । बाज इस द्वितीयमुण्डक के प्रथमखण्ड में इसी भावद्वयोपेत अक्षरसत्य का निरूपण किया जाता है । इस सत्याक्ष रविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि कहते हैं-तबेतत्सत्यम् -" यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गा. सहस्रशः प्रभवन्ते सख्याः । तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र देवापियन्ति " ॥१ ॥

अव्यय - अक्षर - क्षर ( भ्रात्मक्षर ) परात्पर इन चारों की referent | इनमें परात्पर को थोड़ी देर के लिए छोड क्षर पर दृष्टि डालिए । ये तीनों ही श्रुति स्मृतियों में निम्नलिखित समष्टि का नाम ही होना है । यह दीजिए एवं शेष बचे हुए एव्यय - प्रहर-नामों से प्रसिद्ध हैं- ' इन नामों के उल्लेख करने का प्रयोजन यही है कि प्राथ दिन उपनिषदों के पर्व में जो महबर हुई है उसका मूल कारण वर्गीकरण का प्रभाव ही है । सबको सब समझा जा रहा है । पदार्थ -विद्या की डष्टि से यह समझ बुरी है । हम भी सबको सब ही समझते हैं क्योंकि ज्ञानमार्ग में भेद टूट जाता है । परन्तु सच्चाज्ञान सभी प्राप्त हो सकता है जब कि विज्ञान का सहारा लिया जाए । बिभिन्न शाम से एकत्व को प्रतीति सम्यरूप से होती हैं । इसीलिए भगवान ने ब्रानं तेऽहं सविज्ञानम् ' - यह प्रतिज्ञा की है । इस विभिन्नरूप विज्ञान को भाधार मानने से ही उपनिषदों की सन्वियां सुलझ सकती हैं । इसीलिए हमने प्रापके सम्मुख विभिन्न नामों को रख दिया । इससे उपनिषद को आत्मसात् करने में सुविधा होगी । १ शत ० ब्रा ० १४२८ | ४ | १ एवं १४ || ५ | १ । २ गीता ७।२ । २ वार्षिका पृष्ठ ७६ पर । I 05 [

पृष्ठ 85

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faatenure ( प्रथमखण्ड ) दोनों से ही सृष्टि का होना सकती है । यह कुर्वदरूपता अव्यय मण पर उत्तमपुरुष परब्रह्म वेश्वर मालम्बनब्रह्म + सुसूक्ष्मग्रा पुरुष मालम्बनवा महेश्वर पुराणपुरुष सर्वालम्बन प्र असर प्रमृत परावर मध्यमपुरुष परमब्रह्म भूतभावन का भान्तरिक्ष्यग्रह्म + सूक्ष्मब्रह्म पराप्रकृति fafe उपेश्वर अन्तर्यामी विश्वालम्बन धमात्रा परात्परः [ ८१ ] जर मयं प्रवर प्रथमपुरुष भव रखा भूतयोनि कार्य पार्थिवा ' खो ' अपराप्रकृति उपादानबहा ईश्वर विश्वमूर्ति विश्व मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण व्यय ज्ञानमय होने से निष्क्रिय है - अविकुर्वाण है । क्षर घर्यरूप होने से निष्क्रिय है, प्रतएव असम्भव है । सृष्टि क्रियासापेक्षा है । कर्म करने से नई वस्तु उत्पन्न हो मध्यपतित अक्षर का ही घम्मं है । जैसा कि कठोपनिषदादि में विस्तार के साथ बसलाया जा चुका है । अक्षर कुर्बाण है, क्षर विकुर्वाण है एवं प्रव्यय प्रविकुर्वाण है । यदि कुर्वाण अक्षर न होता तो न भव्यय का पता था, न क्षर का पता था । अक्षर से ही भव्यय का प्रादुर्भाव होता है. एवं असर से ही क्षर का प्रादुर्भाव होता है । प्राज हमारे मुंह से ' अक्षर से धव्यय का प्रादुर्भाव होता है

पृष्ठ 86

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण यह ' अक्षर ' सुनकर भाश्चर्य करेंगे । क्यों कि हम ही ने आपको प्रारम्भ से ही ' श्रव्यय पहला है ' - ' अध्यय के बाद प्रक्षर का विकास है - यह कह रखा है । भाज इससे उलटा कह रहे हैं । परन्तु इसमें प्राश्चयं की कोई बात नहीं है । प्रात्मविद्याप्रकरण में जो कहा जाए सो थोड़ा है । भव्यय साक्षात् परात्पर है 1 सर्वबल विशिष्ट प्रसीम - रस का नाम परात्पर है । उस परात्पर का ही यत्किञ्चित् प्रदेश महामाया-ब से सीमित होकर मायापुर से सीमित होता हुमा अव्ययपुरुष नाम धारण कर लेता है । प्रक्षर का पूर्वकथनानुसार हृदय भाव से सम्बन्ध है । धन्सर्थ्यामी प्रक्षर हृदय में ही रहता है । हृदय सीमित वस्तु का धर्म्म है | सीमा माया के ऊपर निर्भर है । माया सीमा हो तब ' हृदय ' हो । हृदय हो तब हृस्न्य ( अक्षर ) हों । प्रव्यय रसबलात्मक है । रसबलात्मक प्रव्यय परात्पररूप से मायासीमा के अभाव में भी मौजूद है । परन्तु अव्यय की इस परात्परावस्था में हृदयस्थायी अक्षर का प्रभाव है । इस स्थिति के आधार पर हम अव्यय को प्रक्षर से पहला तत्त्व मानने के लिए तय्यार हैं । परन्तु पञ्चकलव्यय प्रक्षर के विकास के बाद ही विकसित होता है । कारण इसका यही है कि माया बन्धन के होते ही रसबलात्मक परात्पर तस्व ' श्रव्यय ' नाम धारण कर लेता है । इस समय इसमें रस - बल दो कला है । रस विद्याभाग है एवं बल कर्म्मभाग है । सीमा के साथ हृदयभाव उत्पन्न हो जाता है । इस हृदय में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ये तीन हैं । इसमें विष्णु से प्रशनाया उत्पन्न होती है । इस अशनाया से उस पव्यय में एकोऽहं बहुस्याम् - इस वृत्ति का प्रादुर्भाव होता है । उसी समय प्रशनाया जहाँ से उठती है वह स्थान मनोनाम धारण करता हुआ सिसृक्षा- मुमुक्षा इन दो इच्छाओंों का प्रवर्तक बन जाता है । इन दो विभिन्न इच्छाओंों का कारण रसबल ही है । रसख्या विद्यासाक्षिणी इच्छा मुमुक्त है एवं बलरूपा कम्मंसाक्षिणी इच्छा सिसृक्षा है । इन दोनों इच्छानों से उसी प्रक्षररूप चेतना के द्वारा इस editor पर विद्याम्मं का चयन होने लगता है । इस चिंति से वह द्विकल भव्यय पञ्चकल बन जाता है । विद्याभाग की पिति से मन विज्ञान बनता है । विज्ञान में दिखा है, परन्तु इसमें कम्मरूप बल का भी सम्बन्ध है, प्रतएव यह शुद्ध विद्या नहीं है । शुद्ध ज्ञान मानन्द है । आनन्द परविज्ञान है । मन मध्य में है । मनन्तर प्राण है, मनन्तर वाक् हैं । वाक् शुद्धबलरूपा है । प्राण विद्या - गमित बल है । मन विचकम्ममय है । विज्ञानबलगमित विद्या है । भाद्र शुद्धविद्या है । इस प्रकार अक्षर के ( चेतना ) व्यापार से इन पांचों चितियों के कारण वह पञ्चकस अव्ययपुरुष चियात्स्ना नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । निष्कर्ष यही हुमा कि परात्पररूप निष्कल प्रव्यय एवं रसदलात्मक विकलपव्यय को लक्ष्य में रख कर तो हम अव्यय को ' प्रथमज ' कह सकते हैं । परन्तु पञ्चकलोपेत चिदात्मारूप म्रव्यय को अक्षर द्वारा प्रादुर्भूत होने वाला बतला सकते हैं एवं अक्षरब्रह्म तो ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् के अनुसार क्षर का उद्भावक है ही । इसी विज्ञान के प्राधार पर तो महर्षि कठ ने यह कहा है-" एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् " ॥ ' १ कठोप ० १।२।१६ । [ ८२ ]

पृष्ठ 87

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्यनिरूपण सचमुच यही बात है । मध्यस्थ अक्षर ही प्रव्यय का विकासक है । अक्षर ही अक्षर का विकासक सबका प्रभव- प्रतिष्ठा - परायण अक्षर ही है । जैसे प्रज्वलित रहते हैं एवं अन्त में उसी में विलीन होते रहते हैं, एवमेद अन्त में उसी में विलीन होते रहते हैं । है । कहाँ तक गिनावें, संसार में जो कुछ है, भङ्गार से अनन्त सरूप विस्फुलिंग निकलते सारे भाव उसी प्रक्षर से उत्पन्न होते हैं एक प्रकार से श्रव्ययब्रह्म सृष्टि का प्रालम्बन है । प्रक्षरतत्त्व निमित्त कारण है एवं क्षरतस्य उपादानकारण ' है । ऐसी भवस्था में विविध भावों की उत्पत्ति कस्भाग से ही माननी पड़ती है । जिससे उत्पत्ति होती है उसी में उस उत्पन्न कार्य का लय होता है । इस सामान्य परिभाषा के अनुसार क्षर से उत्पन्न वि fararerna विश्व का लय क्षर में ही होना न्यायप्राप्त है । यह होने पर भी प्रकृत में ऋषि अक्षर को विविधभाव का प्रभव एवं परायण बतला रहे हैं । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए क्योंकि अक्षर - प्रजापति ही एक माग से निमित्त बनता है एवं भाषेभाग से उपादान बनता है । ई ह -रामो ममासममृतम् ' के अनुसार पक्षर का प्रावाभाग पविपरिणामी है; वही अक्षर कहलाता है एवं प्राधाभाग विकुर्वारण है, वही क्षर कहलाता है । दोनों पविना भूत हैं । काम करने वाला प्रक्षर भाग ही है, भतएव इसके मत्यं क्षरभाग की उपादानता को मानते हुए भी ऋषि अक्षर की कुदता को लक्ष्य में रख कर अक्षरादृविविधाः सोम्य भावा: प्रायम्ले - यह कहने में कोई प्रापत्ति नहीं समझते । बात ऐसी ही है । प्रव्यय- प्रक्षर - प्रात्मक्षर तीनों प्रविनाभूत हैं, प्रतएव प्रत्येक के काय्यं का सम्बन्ध प्रत्येक के साथ बतलाया जा सकता है । भूतयोनि क्षर है । परन्तु क्षर मक्षर भोर भव्यय से भदिनासूत हैं, अतएव तवष्ययं तद्भूतयोनि- इत्यादि रूप से धष्यय को भी भूतयोनि बतला दिया जाता है । इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिए । इन्हीं सब रहस्यों को लक्ष्य रख कर प्रकार को कारण बतलाया गया है । अक्षर की कारणता से ऋषि को एकमात्र अक्षर का स्वरूप बतलाना प्रमीष्ट है । ऋषि यही सिखलाते हैं कि मानन्यादिविविध भावापन्न जिस भव्यय का तुम साक्षात् कर रहे हो - स्वयम्भू परमेष्ठी -सूय्यं घाटि रूप विविधभावापन क्षर की विश्वरूपता को देख रहे हो - विश्वास करो यह वैविष्य न सव्यय का है, न क्षर का है क्योंकि एक का विविधरूप में परिणत होना व्यापार है । व्यापार गति हैं । गति न प्रव्यय का धम्मं है, न क्षर का धम्मं है । क्रियातस्य का पषिष्ठाता तो. एकमात्र मध्यस्थ सेतुरूप प्रस्तर ही है । इस भोर इसने विविध भावापत विश्व का संचालन कर रखा है, उस मोर पञ्चकल भव्यय का संचालन कर रहा है । अक्षर ही अव्यक्त है । यही उस भज भव्यय का स्वभाव है । इसके सहारे ही वह भव्यय जीव rores प में विकसित होता है । विश्वावच्छिन्न भव्यय पक्षर के धाधार पर ही प्रपनी स्वरूप सत्ता रखने में समर्थ होता । इसी अभिप्राय से कहा जाता है-" अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया " ॥ " १ शत ० ब्रा ० १०।१।३२ । २ गीता ४।६ । [ ५३ ]

पृष्ठ 88

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fadtanush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण इसी आधार पर यह कहा जाता है--“ श्रव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । राज्याने प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके " ॥ ' इस अक्षर के सम्बन्ध से ही निष्कल ईश्वराव्यय की गति भर्ता प्रभु साक्षी - निवास - पारण- सुहृत्-प्रभव - प्रलय - स्थान- निघान - बीज ये १२ भवस्थाएं हो जाती हैं एवं अध्यात्म प्रक्षर सम्बन्ध से जीवाव्यय-उपद्रष्टा- धनुमन्ता भर्त्ता भोक्ता महेश्वर - परमात्मा इन सात भावों में परिणत हो जाता है । इसी प्रक्षर से ( अक्षर की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - खोम - इन पाँच कलाझों से ) क्षर - प्रारण, प्राप, वाक्, अन्नाद, अन्न इन पांच भावों में परिणत हो जाता है । अक्षर से उत्पन्न ये ही पञ्चक्षर आगे जाकर विश्वसृट् पञ्चजन - पुरं-जन पुररूप में परिणत होते हुए स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी इन पांच सत्यों में परिणत हो जाते हैं । इसी अक्षर के प्रभाव से अमृता- पृथिवी की अग्नित्रयी देवसत्यरूप धारण कर लेती है । कहाँ तक गिनायें-आप संसार में जितने विविधभाव देखते हैं - सब प्रक्षर से उत्पन्न हुए हैं । सर्वा - व्यक्तियाँ इस अव्यक्त का व्यक्ती भाव हैं । बस, विविधाः सोम्य ० का यही पहला भयं है । अक्षर कारण है । विविधभाव काय्यं हूं । यह प्रक्षर सम्बन्धी काय्र्य्य - कारणभाव १३ प्रकार का है, जिनमें से तीन - चार काय्यं कारणों का उल्लेख प्रथममुण्डक के प्रथमखण्ड में किया जा चुका है । ऊनाभि से जाल, पृथिवी से प्रौषषि, पुरुष से केश - लोम, पिता से पुत्र, मिट्टी से घड़ा, अग्नि से विस्फुलिंग सब परस्पर भिन्न हैं । ऐसे १३ विविधभाव उस प्रक्षर से उत्पन्न होते हैं । बस, वि fvers सोम्य भाषा का यही दूसरा अर्थ है । प्रपि च जीव घनन्त हैं । जैसे एक ही सूय्यं पात्रभेद से विविध-भाव को प्राप्त हो जाता है एवं पात्रनाश से सारे प्रतिबिम्ब उसी अपने एक महाप्रभव में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस एक ही महामायामायावच्छिन्न अक्षर से ये अनन्त जीवाक्षर निकले हैं । अनन्त जीवाक्षरमेद से योगमायावच्छिन्न प्रव्यय भोर क्षर मी अनन्त रहे हैं । पात्ररूप स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरश्रय के नाश से सारे जीवाक्षर उसी ईश्वराक्षर में विलीन हो जाते हैं एवं जीवाव्यय उस पव्यय में ( ईश्वराध्यय में ) लीन हो जाते हैं । इसी अभिप्राय से --" यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता प्रभियत् संवहन्ति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति " ॥

" गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।

कर्माणि विज्ञानमयश्च श्रात्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति " ॥

१ गीता ८।१५ । ३ मुण्डकोप ० ३।२।७ । २ ऐ ० प्रा ० २।३।८।२० । [ ४ ]

पृष्ठ 89

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fadtanusa ( प्रथमखण्ड ) goantar षद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्यनिरूपण इस वह्नि विस्फुलिंगरूप १३ काय्यं कारणभावों में से एक कार्य - कारणभाव को अपनाकर साम्प्रदायिको ने अक्षरस्थान को सम्पूर्ण विश्व को ) चिद्धाम माना है । अक्षर को ' चिवन ' माना है एवं अनन्त जीवाक्षरों को ' चित्करण ' मात्रा माना है । बस, अक्षर के इसी निगूढ स्वरूप को प्रतिसंक्षिप्त स्वरूप को हमारे सामने रखते हुए ऋषि ने तवेतत् सत्यम् ० - इत्यादि कहा है ॥। १ ॥ .. अक्षर से ही सब कुछ पैदा होता है - यह पूर्व के निरूपण से भली - भांति सिद्ध हो जाता है । अक्षर से सबसे पहले किस भाव का विकास होता है इसका उत्तर है - मव्ययपुरुष । जबतक आनन्द-विज्ञान- मन - प्राण- वाक्रूप अव्यय भाव का उदय नहीं होगा तबतक क्षरसृष्टि का होना असम्भव है । क्योंकि सृष्टि में ' काम - तप - श्रम ' रूप ' मन - प्राण - वाक् ' व्यापार प्रधानरूप से प्रपेक्षित हैं एवं प्रानन्द - विज्ञान का साहचर्य मपेक्षित है । पांचों प्रव्यय के भाव है, अतएव मक्षर भागे के विविधभाव उत्पन्न करने में तबतक नितान्त प्रसमर्थ है- जबतक कि वह पहले उस पञ्चमायोपेत अव्यय का विकास न कर ले । बस, इसीलिए बाध्य होकर सबसे पहले पूर्वकथनानुसार उसे भव्यय को उदबुद्ध करना पड़ता है । यही अक्षर-कृत पहली सृष्टि है । अक्षर से भव्यय उत्पन्न होता है । उस उत्पन्न व्यय का क्या स्वरूप है? इसका उत्तर देते हुए, साथ ही में ' मक्षर से पहले भव्यय का प्रादुर्भाव होता है - इस विद्या को सिखाने के लिए अक्षर - स्वरूप के अनन्तर ही भव्यय का स्वरूप बतलाते हुए ऋषि कहते हैं-१ - विष्य: --" विण्यो हामूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यभरात्परतः परः " ॥२ ॥

tore के एक - एक विशेषण में बडा चमत्कार है । संसारभर के पदार्थ ' धन तरस - विरल ' –इन तीन भावों में परिणत हैं एवं दशाक्रमानुसार प्रत्येक में भी ये तीनों अवस्थाएं हैं । वनावस्था मू: है । तरलावस्था भुत: है । विरलावस्था स्व: है । पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ मिन्न वस्तु हैं एवं भूः भूवः स्वः मिस्र हैं | विज्ञान जगत् में तीनों को पृथिवी प्रादि का पर्थ्याय समझना बडी भूल है । केवल पृथिवी में ही भूः - भूवः स्वः तीनों । यह विभिन्न पदार्थ हैं - इसीलिए तो विषं च पृथिवीं चान्तरिसम् ० - कह कर प्रयो-स्थ: कहा है । यह स्वर्लोक धौर द्युलोक एक वस्तु होती तो श्रुति विबं- स्वः यह पुनरुक्ति कदापि नहीं करती । भूः भुवः स्वः श्रवस्थाएं हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष - खो लोक हैं । प्रतिलोक में तीनों अवस्थाएँ हो सकती हैं । कपूर पार्थिव पदार्थ है । पृथिवी लोक है । घनावस्था में यह भूः श्रवस्था से युक्त है । पिघलने पर मु. अवस्थापन है एवं जलने पर स्वः अवस्थापन है । दूसरे शब्दों में घनावस्था भूः है । तरलावस्था मुवः है । विरलावस्था स्वः है । क्षर स्थूल होने से घन है, अतएव यह भूः प्रवस्थापन है । अक्षर सूक्ष्म होने से तरल है, मतएव यह मुब: अवस्थापन है एवं भव्यय उससे भी सूक्ष्म है । सुसूक्ष्म है । वह विरलावस्थापन है । वह स्वः प्रवस्थाप । स्वः का पर्य्याय है- दिव्य । स्वः - भवस्था ही दिव्यावस्था है । सुसूक्ष्मावस्था को दिव्यावस्था कहते हैं | हमारा भव्यय ऐसा ही है - प्रतएव हम अवश्य ही इसे विषय कह सकते हैं -[ ६५ ]

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faatenure ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण १ अव्यय विरलावस्थापन सुसूक्ष्मः २ प्रक्षर तरलावस्थापन ३ पात्मक्षर घनावस्थापन सूक्ष्मः स्थूलः स्वः ( दिव्यः ) प्रकुर्वद्रूप प्रालम्बन निमित्तकारण भुवः ( मान्तरिक्ष्यः ) कुवंरूप भूः ( पार्थिवः ) विकुर्वदरूप उपादानकारण १- अमूर्त: -दूसरा विशेषण है - प्रस्तुतः । प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतला चुके हैं कि मूर्ति भग्नीषोम से बनती है । अग्निषोम अक्षर का धम्मं है । वेवमय ध्यक्षर ही प्रग्नीषोममय द्वपक्षर - क्षर प्रग्नीषोम से लिरूप में परिणत होता है । दूसरे शब्दों में मूर्तिषम्मं क्षरसंश्लिष्ट वेदमय अक्षर का धर्म है । उससे भ्रव्यय मिल तस्व है, अतएव हम इसे प्रवश्य ही अमूर्त कहने के लिए तय्यार हैं । उपलब्धि का नाम वेद है । उपलब्धि हो मूर्ति का स्वरूप है । प्रस्तिमावापत मूर्ति ही उपलब्ध होती है, मतएव मूर्ति वेदरूपा है । चोऽक्षरे परमे व्योमन् के अनुसार अक्षर के साथ ही वेद का सम्बन्ध है, अतएव भ्रव्यय को मूर्ति से बाहर की वस्तु मानना उचित है । अपि च मूर्ति वस्तु है । प्रव्यय वस्तु नहीं, वस्तुओं का माघारभूत कोष है । इसलिए भी हम उसे अमूर्त कह सकते हैं । भपि - मूर्ति की उपलब्धि होती है । वह सुसूक्ष्म होने से दिव्य है, अतएव अनुपलब्ध है । इन्द्रियातीत है, अतएव च भ्रमत्तं है । मसिरहितम् द्रव्यामयम् सुसूक्ष्मत्वाग्राह्यम् - इत्यादि धम्मों के अभिप्राय से ही उसे ममूर्त बतलाया है । ३- पुरुषः ---सेखा हि पुर: - के अनुसार परिच्छेदक छन्दोरूप रेखा का नाम ही पुर है । मायारूप रेखा से यह रसबल रूपतस्व परिच्छिन्न है । इस मायापुर में बसने के कारण ही वह अव्यय पुरुष है । यद्यपि क्लाबिमो पुरुषौ लोके ' के अनुसार प्रक्षर धौर क्षर भी पुरुष कहलाते हैं । परन्तु इनकी यह पुरुषता भ्रव्ययपुरुष के साथ रहने पर ही निर्भर है । वस्तुतः - अपरेय मितस्स्यस्यां प्रकृति विद्धि मे पराम् -के अनुसार प्रक्षर औौर क्षर तो उस पुरुष की प्रकृति ही है । पुरुष तो एकमात्र अव्यय ही है । पुरुषः का मथं ' परिच्छिन्नः-ससीमः ' ही है । ४ - याद्याम्बरः-संसार में धामच्छद धौर प्रषामन्द भेद से दो प्रकार के पदार्थ होते हैं । इनमें हमारा भव्यय अधामच्छद है अनावरण है, क्योंकि सुसूक्ष्म है । भागे के सारे भाव सुसूक्ष्मता से सम्बन्ध रखते हैं । इसीलिए तो ऋषि ने पहले दिव्य विशेषरण का उल्लेख किया है । सुक्ष्म से सूक्ष्म परमाणु है । वह उनके १ गीता १५।१६ । २ गीता ७१५ । [ 1 ]