भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 231–240
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 231–240
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१४२ नाट्यशास्त्रम् -पुनरावृत्ति की जाए और नूपुर तथा भुजङ्गत्रासित, तत्पश्चात् रेचित' और मण्डल करणों का प्रयोग किया जाए और कन्धों को सिकोड़ लिया जाए और फिर ऊरुद्वृत्त, आक्षिप्तक, उरोमण्डल, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रदर्शित किया जाए तो उसे ' वैशाखरेचित ' नामक अङ्गहार कहा जाता है ॥ २१८-२२१ ॥ आद्यं तु जनितं कृत्वा पादमेकं प्रसारयेत् ॥ २२१ ॥
तथैवालातक कुर्यात् त्रिक तु परिवर्तयेत् ।
अश्चित वामहस्त च गण्डदेशे निकुट्टयेत् ॥ २२२ ॥
कटिच्छिन्नं तथा चैव परावृत्ते प्रयोजयेत् । ( २१ ) परावृत्त - सबसे पहले जनित करण' का प्रयोग करके एक पैर को आगे प्रसारित किया जाए; फिर अलात करण निष्पन्न करते हुए त्रिक को [भ्रमरी चारी में ] घुमाया जाए; साथ ही बाएँ हाथ को अंचित मुद्रा में कपोल प्रदेश पर निकिट्टत किया जाए और अन्त में कटिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए तो उसे ' परावृत्त' अङ्गहार कहते हैं ॥ २२१-२२३ ॥ स्वस्तिक करणं कृत्वा व्यंसितौ च करौ पुनः ॥ २२३ ॥
अलातकं प्रयुञ्जीत हह्यूर्ध्वजानु निकुञ्चितम् ।
अर्धसूची च विक्षिप्तमुद्वृत्ताक्षिप्तके तथा ॥ २२४ ॥
करिहस्त कटिच्छिन्नमङ्गहारे ह्यलातके । ( २२ ) अलातक - यदि स्वस्तिक करण के प्रयोग के बाद दोनों हाथों को व्यंसित' रखे और फिर क्रम से अलातकः ऊर्ध्वजानु, निकुश्चित अर्धसूची, विक्षिप्त, १. अभिनवगुप्त के अनुसार रेचित से यहाँ उन्मत्त करण का संकेत है- ( रेचित- मित्युन्मत्तकरणम् ) । उन्मत्त करण का लक्षण ना० शा० ५-७५ में प्राप्त होता है । २. अभिनवगुप्त ने मण्डल से मण्डल- स्वस्तिक करण का तात्पर्य लिया है- ( मण्डलमिति मण्डलस्वस्तिकम् ) । मण्डल स्वस्तिक करण का लक्षण ना० शा० ८-६८ में प्राप्त होता है । ३. अभिनवगुप्त के मत में 'आदध' शब्द से दक्षिण अङ्ग द्वारा जनितकरण के प्रयोग का तात्पर्य है - आद्यशब्दो दक्षिणाङ्गप्रयोज्यत्वमस्याह । ४. अभिनवगुप्त के विचार में वहाँ व्यंसित करण का दुहरा प्रयोग अपेक्षित है क्योंकि "व्यंसितो " में द्विवचन प्रयुक्त हुआ है- ( व्यंसितौ चेति द्विवचनेन पुनश्शब्दे -स्वस्तिक व्यवधानेन व्यंसितस्य द्विप्रयोगमाह ) । परन्तु डा० रघुवंश की व्याख्या- -नुसार दोनों हाथों के इस करण में रेचित प्रयोग के कारण ( करौ वक्षसि रेचितौ ) श्री द्विवचन का प्रयोग माना जा सकता है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १४३ उद्वृत्त, आक्षिप्त करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को सम्पन्न किया जाए तो। वह ' अलातक ' अङ्गहार है ॥ २२३-२२५ ॥ निकुटय वक्षसि करावृर्ध्वजानु प्रयोजयेत् ॥ २२५ ॥
आक्षिप्तस्वस्तिक' कृत्वा त्रिक तु परिवर्तयेत् ।
उरोमण्डलको हस्तौ नितम्बं करिहस्तकम् ॥ २२६ ॥
कटिच्छिन्न तथा चैव पार्श्वच्छेदे विधीयते । ( २३ ) पार्श्वच्छेद -- जब हाथों को निकुट्टित मुद्रा में वक्षःस्थल पर रखा जाए और ऊर्ध्वजानु, आक्षिप्त और स्वस्तिक करणों का प्रयोग करने के बाद त्रिक को (भ्रमरी चारी के अन्तर्गत ) परिवर्तित किया जाए और हाथों द्वारा उरोमण्डल करण को सम्पन्न करते हुए नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए तो उसे 'पार्श्वच्छेद' नामक अङ्गहार की संज्ञा दी जाती है ॥२२५-२२७॥ सूचीवामपदं दद्याद्विद्युद्भ्रान्त च दक्षिणम् ॥ २२७ ॥
दक्षिणेन पुनः सूची विद्युद्भ्रान्त च वामतः ।
परिच्छिन्नं तथा चैव ह्यतिक्रान्त च वामकम् ॥ २२८ ॥
लताख्यं सकटिच्छिन्नं विद्युदुभ्रान्तश्च स स्मृतः । ( २४ ) विद्युतभ्रान्त - बाएं पैर को सूची करण में रखकर दाहिने पैर को विद्युद्भ्रान्त करण की प्रक्रिया में रखा जाए और फिर दाहिने पैर से सूची करण और बायें पैर से विद्युद्भ्रान्त करण का प्रयोग किया जाए' । इसके बाद छिन्न करण को सम्पन्न करके त्रिक का परिवर्तन किया जाए । इसके बाद लता- हस्त-मुद्रा में कटिछिन्न करण का सम्पादन किया जाए तो उसे 'विद्युद्भ्रान्त' अङ्गहार कहा जाता है ॥ २२७ २२ ९ ॥ कृत्वा नूपुरपादं तु सव्यवामौ प्रलम्बितौ ॥ २२ ९ ॥
करौ पार्श्वे ततस्ताभ्यां विक्षिप्त सम्प्रयोजयेत् ।
ताभ्यां सूची तथा चैव त्रिकं तु परिवर्तयेत् ॥ २३० ॥
लताख्यं सकटिच्छिन्नं कुर्यादुदुवृत्तके सदा । ( २५ ) उद्वृत्तक - पैर को नूपुरपादचारी में रखते हुए दाहिने ओर बायें हाथों १. श्री घोष की व्याख्यानुसार इन करणों का प्रयोग का क्रम उल्टा है । तद-नुसार पहले बायें व दाहिने पैर से और बाद में दाहिने व बायें पैर से इन कारणों का प्रदर्शन करना चाहिए । २. पाठभेद के अनुसार 'त्रिकं तु परिवर्तयेत्' के स्थान पर अतिक्रान्तं च वामकम् " पाठ मानने पर यहाँ छिन्न करण के प्रयोग के पश्चात् वायें अंग से अतिक्रान्त करण का प्रयोग मानना होगा ।
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१४४ नाट्यशास्त्रम् को पार्श्व में लटकाए रखे और फिर उन्हीं दोनों हाथों द्वारा विक्षिप्त करण का प्रयोग करे और फिर उन्हीं हाथों से सूचीकरण के प्रयोग के बाद ( भ्रमरी चारी में ) त्रिकको परिवर्तित करे व अन्त में लता ( लतावृश्चिक ) तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग करें तो उसे ' उद्वृत्तक' अङ्गहार कहा जाता है ॥ २२ ९ -२३१ ॥ आलीढव्यंसितौ हस्तौ बाहुशीर्षे निकुट्टयेत् ॥ २३१ ॥
नूपुरश्चरणो वामस्तथालातश्च दक्षिणः ।
तेनैवाक्षिप्तक कुर्यादुरोमण्डलको करौ ॥ २३२ ॥
करिहस्त कटिच्छिन्नमालीढे सम्प्रयोजयेत् । ( २६ ) आलीढ-5- जब आलीढ नामक स्थानक के साथ व्यंसित करण का प्रयोग करते हुए दोनों हाथों को कन्धे पर निकुट्टित किया जाए और फिर बायें पर से नूपुर करण तथा दाहिने से अलात करण को सम्पन्न किया जाए और उसी के द्वारा फिर आक्षिप्तक करण का भी प्रदर्शन किया जाए । इसके बाद दोनों हाथों से उरोमण्डल करण का प्रयोग करते हुए करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का सम्यक् प्रयोग किया जाए तो उसको 'आलीढ' नामक अङ्गहार कहते हैं ॥ २३१-२३३ ॥ हस्त तु रेचित कृत्वा पार्श्वमानम्य रेचयेत् ॥ २३३ ॥
पुनस्तेनैव योगेन गात्रमानम्य रेचयेत् । रेचित करणं कार्यमुरोमण्डलमेव च ॥ २३४ ॥
कटिच्छिन्नं तु कर्तव्यमङ्गहारे रेचिते । ( २७ ) रेचित - यदि रेचित हाथ को एक पार्श्व में झुकाकर रेचित अवस्था पर रखे, फिर सम्पूर्ण शरीर को झुकाते हुए उसी तरह से रेचित दशा में रखे और रेचित करण का प्रयोग करके क्रमशः उरोमण्डल व कटिच्छिन्न करणों का १. अभिनवगुप्त के विचार में बाहुओं के प्रलम्बित होने से भुजङ्गाश्चित (योग- पद्य सूचयन् भुङ्गवासित च द्वात्रिंशत्तमम् ( भुजङ्गाश्वितं चत्वारिंशत्तमम् ना० शा० ४-१०१ ) २ तथा गृध्रावलीनक (गृध्रावलीनकं चतुस्सप्ततितमङ्करुणं दर्शयति ना०शा० ४-१३५ ) करणों के प्रयोग का निर्देश है ( कराविति च द्विवचनेन ) । २. श्रीघोष के मत में इन पैरों से करणों को निष्पन्न करने का यह तात्पर्य है कि इनका प्रयोग उल्लिखित पर से प्रारम्भ किया जाए । ३. श्रीघोष ने इन उल्लिखित करणों के अनिरिक्त इस अङ्गहार में नूपुरपाद व भुजङ्गत्रासित करणों की भी उपस्थिति मानी है ।
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१४५ सम्पादन करे तो उसे ' रेचित ' संज्ञक अङ्गहार कहा जाता है' ॥ २३३-२३५ ॥ नूपुरं चरणं कृत्वा त्रिक नु परिवर्तयेत् ॥। २३५ ॥
व्यंसितेन तु हस्तेन त्रिकमेव विवर्तयेत् ।
वामं चालातक कृत्वा सूचीमत्रैव योजयेत् ॥। २३६ ॥
करिहस्त कटिच्छिन्न कुर्यादाच्छुरिते सदा । [२८] आच्छुरिति- यदि नूपुर पादाचारी में चरण का प्रयोग करके त्रिक को घुमाया जाए और फिर व्यंसित करण में हस्त को रख कर त्रिक को गोलाकार घुमाए, फिर बायें पैर से अलातक करण का प्रयोग करके सूची, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो 'आच्छुरित ' नामक अङ्गहार सिद्ध होता. है ॥ २३५-२३७ ॥ रेचितौ स्वस्तिकौ पादौ रेचितौ स्वस्तिकौ करौ ॥ २३७ ॥
कृत्वा विश्लेषमेवं तु तेनैव विधिना पुनः ।
२३८ ॥ पुनरुत्क्षेपणं चैव रेचितैरेव कारयेत् ॥
। उद्वृत्ताक्षिप्तके चैव ह्य रोमण्डलमेव च नितम्बं करिहस्त च कटिच्छिन्नं तथैव च ॥ २३ ९ ॥ आक्षिप्तरेचितो ह्यष करणानां विधिः स्मृतः । [२ ९] आक्षिप्तरेचित - यदि दोनों स्वस्तिक पैर और दोनों स्वस्तिक हाथ रेचित रहें और रेचित प्रक्रिया से ही उन्हें पृथक किया जाए और फिर रेचित क्रिया के द्वारा ही उन्हें ऊपर की ओर परिचालित किया जाए एवं इसके बाद क्रमशः उद्वृत्त, आक्षिप्त, उरोमण्डल, नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो उसे आक्षिप्तरेचित नामक अङ्गहार कहा जाता १. अभिनवगुप्त की व्याख्यानुसार इस अङ्गहार में रेचन प्रक्रिया से युक्त नृत्त- हस्तों वाले सभी करणों का प्रयोग होता है । इन कारणों की संख्या २५ है ( एवं करणपञ्चविशतिवैचित्र्येण प्रयोज्याः ) इनके नाम निम्नलिखित हैं- ( १ ) स्वस्तिकरेचित, ( २ ) अर्धरेचित, ( ३ ) वक्ष:स्वस्तिक, ( ४ ) उन्मत्त ( ५ ) आक्षिप्तरेचित, ( ६ ) अर्ध मत्तल्लि, [७] रेचितनिकुट्ट [ ८ ] भुजंगत्रस्तरेचित, [ ९ ] नूपुर, [ १० ] वैशाखरेचित्, [ ११ ] भुजंगाचित, [ १२ ] दण्डरेचित, [ १३ ] वृश्चिक- रेचित, [ १४] व्यंसित, [ १५ ] विवृत्त, [ १६ ] विनिवृत्त, [ १७ ] विवर्तित, [ १८ ] गरुडप्लुत, [ १ ९ ] मयूरललित, [ २० ] सर्पितक, [ २१ ] स्खलित, [ २२ ] प्रसर्पितक, [२३] तलसंघट्टित, [ २४ ] वृषभक्रीडित, [ २५ ] लोलित । १० ना०
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१४६ नाट्यशास्त्रम् है' ॥ २३७-२४० ॥ २४० ॥ विक्षिप्तवामसूची सहकृतकरणं कृत्वाविक्षिपेद्वामकहस्तपादं मुखानुगम्करम् ॥। वक्षःस्थाने भवेत्सव्यो वलित त्रिकमेव च ॥ २४१ ॥
नूपुराक्षिप्तके चैव ह्यर्धस्वस्तिकमेव च ।
नितम्बं करिहस्त च ह्य रोमण्डलक' तथा ॥ २४२ ॥
कटिच्छिन्न च कर्तव्यं सम्भ्रान्ते नृत्तयोक्तृभिः । [३० ] सम्भ्रान्त - विक्षिप्त करण का प्रयोग करके दोनों हाथों व पैरों को मुखाभिमुख रखते हुए बायें हाथ को सूची मुद्रा में रखे व दाहिने हाथ को वक्षःस्थल पर रखते हुए त्रिक बलित किया जाए और उसके बाद क्रम से नूपुर, आक्षिप्त, अर्धस्वस्तिक, नितम्ब, करिहस्त, उरोमण्डल और कटिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए तो 'सम्भ्रान्त' नामक अङ्गहार कहा जाता है ॥ २४०-२४३ ॥ अपक्रान्तक्रमं कृत्वा व्यंसित हस्तमेव च ॥ २४३ ॥
कुर्यादुद्वेष्टित चैव ह्यर्धसूचीं तथैव च ।
विक्षिप्त सकटिच्छिन्नमुद्वृत्ताक्षिप्तके तथा ॥ २४४ ॥
करिहस्त कटिच्छिन्नं कर्तव्यमपसर्पिते । [ ३१] अपसर्पित- जब अपक्रान्त करण के प्रयोग के बाद केवल हाथों से व्यंसित करण सम्पादित किया जाए और फिर हाथों को उद्वेष्टित मुद्रा' में ( गोला- कार घुमाते हुए ) स्थित करके अर्धसूची, विक्षिप्त, कटिच्छिन्न, उद्वृत्त, आक्षिप्तक, करिहस्त तथा कटिछिन्न नामक करणों को क्रमशः निष्पन्न किया जाए तो उसे ' अपसर्पित' नामक अङ्गहार कहा जाता है ॥ २४३-२४५ ॥ १. अभिनवगुप्त के विचारानुसार इस अङ्गहार में उन सभी करणों का प्रयोग किया( यत्र जातायत्र करणेहै जिनमेंकरयोःहाथपादयोर्वाऔर पैर स्वस्तिकचितस्वस्तिकसाहित्यंके साथ रेचिततत्तदिहाप्यनुजानातिकिए जाते हैं । पृथगभिधानेन ) । इनकी संख्या बारह है— ( १ ) स्वस्तिक- रेचित, ( २ ) पृष्ठस्वस्तिक, ( ३ ) दिवस्वस्तिक ( ४ ) कटीसम, ( ५ ) घूर्णित, ( ६ ) भ्रमर, ( ७ ) वृश्चिक रेचित ( ८) पार्श्वनिकुट्टक, ( ९ ) उरोमण्डल, ( १० ) सन्नत, ( ११ ) सिंहाकर्षित, और ( १२ ) नागापसर्पित । २. अभिनवगुप्त के मत में हाथों को उद्वेष्टित करने से करिहस्त करण का संकेत किया गया है-' उद्वेष्टितमिति करिहस्तकरणं निर्दिशति' । श्रीघोष ने उद्वेष्टन से हाथों की गति का ही अर्थ लिया है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १४७ कृत्वा नूपुरपादं च द्रुतमाक्षिप्य च क्रमम् ॥ २४५ ॥
पादस्य चानुगौ हस्तौ त्रिक' च परिवर्तयेत् ।
निकुटय करपादं चाप्युरोमण्डलक' पुनः ॥ २४६ ॥
करिहस्त' कटिच्छिन्न कार्यमर्धनिकुट्टके ।
द्वात्रिंशदेते सम्प्रोक्ता हयङ्गहारा द्विजोत्तमाः ॥ २४७ ॥
( ३२) अर्धनिकुट्टक-5- जब शीघ्रता से नूपुरपादचारी का प्रयोग करके हाथ पैरों को क्रम से आक्षिप्त किया जाता है और पैरों की गति के अनुरूप हाथों की गति रखते हुए त्रिक को परिवर्तित किया जाता है एवं हाथ पैरों को निकुटिटत करते हुए क्रमशः उरोमण्डल, कटिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का सम्पादन किया जाता है तो उसे ' अर्ध निकुट्टक ' संज्ञक अङ्गहार कहते हैं । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो । इन बत्तीस अङ्गहारों का मैने सुष्ठुरीत्या निरूपण किया है ॥ २४५-२४७ ॥
रेचकों के चार भेद- चतुरो रेचकांश्चापि गदतो मे निबोधत ।
पादरेचक एकः स्यात् द्वितीयः कटिरेचकः ॥ २४८ ॥
कररेचकस्तृतीयस्तु चतुर्थः कण्ठरेचकः । मैं जिन चार रेचकों के विषय में जानता हूँ, उन्हें भी आप लोग जानिए । इनमें पहला पादरेचक, दूसरा कटिरेचक, तीसरा हस्तरेचक तथा चौथा ग्रीवारेचक कहा जाता है ॥ २४८-२४९ ॥ [ रेचिताख्यः पृथग्भावो वलेने चाभिधीयते ॥
उद्वाहनात्पृथग्भावाच्चलनाच्चापि रेचकः ।
पाश्वत्पार्श्वे तु गमनं स्खलितैश्चलितैः पदैः ॥
विविधैश्चैव वादस्य पादरेचक उच्यते ।
त्रिकस्योद्वर्तन चैत्र कटीवलनमेव च ॥
। तथाऽपसर्पणं चैव कटिरेचक उच्यते || उद्वर्तन परिक्षेपो विक्षेपः परिवर्तनम् । विसर्पणं च हस्तस्य हस्तरेचक उच्यते ॥ उद्वाहन सन्नमन तथा पार्श्वस्य सन्नतिः ] भ्रमणं चापि विज्ञेयो ग्रीवाया रेचको बुधैः । [ इनका नाम रेचित इस कारण है कि इसमें पृथक् पृथक् रूप में वलनक्रिया की जाती है । अथवा इसे इस कारण भी रेचक कहते हैं कि इसमें किसी (अङ्ग को) ऊपर उठाकर गतिशील किया जाता है ।
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१४८ नाट्यशास्त्रम् ( १ ) पादरेचक – यदि लड़खड़ाती चाल वाले या हिलाए जाते पैरों को एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व में विभिन्न प्रकार की गतियों से चलाया जाए तो उसे 'पादरेचक ' कहते हैं । ( २ ) कटिरेचक - यदि त्रिक का परिवर्तन किया जाए, कटि को वलित किया जाए ' और फिर उसे अपसर्पित किया [ अर्थात् पीछे की ओर खींचा] जाए तो वह ‘ कटिरेचक ' कहलाता है । [ ३ ] हस्तरेचक-हाथ को ऊपर की ओर उठाना, नीचे झुकाना, बाजू की ओर फैलाना और चक्राकार घुमाना तथा फिर पीछे की ओर हटाया जाना 'हस्तरेचक ' कहलाता है । [४ ] ग्रीवारेचक - ग्रीवा को ऊपर की ओर उठाये जाने, नीचे झुकाने, पार्क में नमित करने तथा भ्रमण को ' ग्रीवारेचक' कहा जाता है । शिवजी द्वारा रेचकों तथा अङ्गहारों से युक्त नृत्य- रेचकै रङ्गहारैश्च नृत्यन्त वीक्ष्य शङ्करम् ॥ २४९ ॥
सुकुमारप्रयोगेण नृत्यन्तीं चैव पार्वतीम् । मृदङ्गभेरीपटहैर्भाण्डडिण्डिमगोमुखैः ॥ २५० ॥ पणवैर्दर्दुरैश्चैव सर्वातोद्यैः प्रवादितैः ।
दक्षयज्ञ विनिहते सन्ध्याकाले महेश्वरः ॥ २५१ ॥ शिव जी कोनानाङ्गहारैःइन रेचकों तथा अङ्गहारोंप्रानृत्यल्लयतालवशानुगैःसे युक्त नृत्य करते देखकर। पार्वती के
भी सुकुमार प्रयोगों से युक्त नृत्य किया । [ शंकर जी के ] इस नृत्य में मृदंग, भेरी, पटह, भाण्ड, डिण्डिम, गोमुख, पणव तथा दर्दुर आदि सभी वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया गया । दक्ष यज्ञ के प्रणष्ट हो जाने पर एक संध्या में महेश्वर ने अनेक प्रकार के अङ्गहारों के साथ लय तथा ताल के अनुकूल नृत्य किया ॥ २४ ९-२५२ ॥ पिण्डी बन्धों का नाम करण - पिण्डीबन्धांस्ततो दृष्ट्वा नन्दिभद्रमुखा गणाः ॥ २५२ ॥
चक्रस्ते नाम पिण्डीनां बन्धमासां सलक्षणम् । १. डा० रघुवंश के मत में कटि का क्षिप्रगति से चालन ही उसका वलन भी माना जाएगा । २. यहाँ सती के पिता दक्ष द्वारा सम्पादित उस यज्ञ का निर्देश है जिनमें शंकर को आमन्त्रित न किये जाने पर अपमानित सती ने देहत्याग कर दिया था । फलस्वरूप शंकर ने दक्ष के यज्ञ का विनाश कर दिया और सन्ध्याकाल में सती के शव को कन्धे पर डालकर ताण्डव नृत्य किया ।
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चतुर्थोऽध्यायः १४९ तब नन्दी तथा प्रद्रमुख आदि गणों ने उस नृत्य में प्रयुक्त पिण्डीबन्धों को देख कर उनके लक्षणों का प्रतिपादन तथा नामकरण किया ॥ २५२-२५३ ॥ fafaa पिण्डीबन्धों के नाम- ईश्वरस्येश्वरी पिण्डी नन्दिनश्चापि पट्टसी ॥ २५३ ॥
चण्डिकाया भवेत्पिण्डी तथा वै सिंहवाहिनी ।
तार्क्ष्यपिण्डी भवेद्विष्णोः पद्मपिण्डी स्वयम्भुवः ॥ २५४ ॥
शक्रस्यरावती पिण्डी झषपिण्डी तु मान्मथी ।
शिखिपिण्डी कुमारस्य रूपपिण्डी भवेच्छ्रियः ॥ २५५ ॥
धारापिण्डी च जाह्नव्याः पाशपिण्डी यमस्य च ।
वारुणी च नदीपिण्डी याक्षी स्याद्धनदस्य तु ॥ २५६ ॥
हलपिण्डी बलस्यापि सर्पपिण्डी तु भोगिनाम् ।
गाणेश्वरी महापिण्डी दक्षयज्ञविमर्दिनी ॥ २५७ ॥
त्रिशूलाकृतिसंस्थाना रौद्री स्यादन्धकद्विषः ।
एवमन्यास्वपि तथा देवतासु यथाक्रमम् ॥ २५८ ॥
ध्वजभूताः प्रयोक्तव्याः पिण्डीबन्धाः सुचिह्निताः । ईश्वर की पिण्डी का नाम ईश्वरी, नन्दी की पट्टसी, चण्डिका की सिंह- १. अग्निपुराण के अनुसार अङ्गहार एवं करण आदि के प्रयोग में निश्चित मुद्रा को पिण्डी बन्ध कहा जाता है । "पिण्डीबन्ध आकृतिविशेषस्तस्येक देशान्नि- बन्धनं पिण्डीति । पिण्डीबन्धः करणाङ्गहारादिः । पिण्डी- बन्धग्रहणेन शिखिपिण्डीप्रभृत्युपायमयूरललितादिकरणसंग्रहः । --- अङ्गहारा एव पिण्डीबन्धाः तथाऽन्येऽपि पिण्डीबन्ध इति केवलकरण संग्रहः ।" इन उद्धरणों से पिण्डीबन्ध का कोई सुनिश्चित एवं सुस्पष्ट स्वरूप नहीं पता चलता । अभिनवगुप्त ने भी " पिण्डीबन्ध आकृतिविशेषः ।" ही कहा है । [ अ० भा० १. पृ० १६८- १६ ९ ] । परन्तु भावप्रकाश में शारदातनय ने नर्तक या नर्तकियों के सामूहिक
नृत्य को पिण्डीबन्ध की संज्ञादी है- षोडशवादशाष्टी वा यस्मिन्नृत्यन्ति नायिकाः ।
पिण्डीबन्धादिविन्यासैः रासकं तदुदाहृतम् ॥
प्रस्तुत प्रसङ्ग में नृत्य के प्रसार की अपेक्षा पिण्डीबन्ध का अर्थं नृत्य की मुद्रा अधिक सटीक प्रतीत होता है । २. अभिनवगुप्त के मत में इससे शिवलिंगाकृति पिण्डी का अर्थ लिया
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१५० नाट्यशास्त्रम् वाहिनी, विष्णु की तार्क्ष्य स्वयंभू की पद्म, शक्र की ऐरावती, मन्मथ की झष' कुमार की शिखी, श्री की रूप', जाह्नवी की धारा, यम की पाश, वरुण की नदी, धनद [कुबेर ] की याक्षी, बलराम की हल, भोगिन् की सर्प, गणेश्वर की दक्षयज्ञविमर्शिनी नामक महापिण्डी तथा अन्धकासुर के हत्ता शंकर की त्रिशूलाकारा रौद्री नामक पिण्डी होती है । इस भाँति अन्य देवताओं की भी अपने अपने चिन्हों से युक्त पिण्डियों के नाम होते हैं ॥ २५३-२५९ ॥ ताण्डव नृत्य की उत्पत्ति- रेचका अङ्गहाराश्च पिण्डीबन्धास्तथैव च ॥ २५ ९ ॥ सृष्ट्वा भगवता दत्तास्तण्डवे मुनये तदा ॥। २६० ॥ ततः सम्यग्गानभाण्डसमन्वितः नृत्तप्रयोगः सृष्टो यः स ताण्डव इति स्मृतः । शङ्कर भगवान् ने रेचक, अङ्गहार तथा पिण्डीबन्धों की सृष्टि करके तण्डुमुनि को दिया । तब उन्होंने [ उन्हें ] भलीभांति गान तथा वाद्य यन्त्रों से गया है । श्री घोष ने शिव की पिण्डी का नाम वृष माना है । १. अभिनव के विचारानुसार स्वाकार [ कमल के रूप में होने के कारण इसे रूपपिण्डी माना गया है । २. धारा पिण्डी के अनेक बार प्रयोग से नदीपिण्डीबन्ध बनता है । इसका सम्बन्ध वरुण से है जो जल के देवता हैं । इन पिण्डीबन्धों के नाम अपने देवी या देवता के नाम, वाहन अथवा विशेषता के आधार पर रखे गए हैं । अभिनवगुप्त का मत है कि इसके अभिनय से देवताओं का परितोष किया जाता है । इन पिण्डीबन्धों के अभिनय के समय उस देवता विशेष के आयुध; वाहन तथा कर्म आदि के भावों का आंगिक अनुकरण करना अभीष्ट है । इस भांति भगवती का परितोष तलपुष्पपुट करण द्वारा एवं शिव का परितोष निस्तम्भित करण के सम्पादन द्वारा किया जाता है विशेष प्रकार की पिण्डियों के अभिनय के प्रदर्शनार्थ विशिष्ट करणों का प्रयोग होता है । यथा निकुट्टककरण के प्रयोग से त्रिशूलाकृति का । नागापसर्पित करण से भोगपिण्डी का तथा प्रथम स्थितरहस्त अङ्गहार के द्वारा भौम, त्रिशूल, शिवलिंग आदि पिण्डीबन्धों का अभिनय किया जाता है । नन्दी आचार्य के विचार में रेचित नामक अङ्गहार के प्रयोग से सभी देवताओं को प्रसन्न किया जाता है ।
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चतुर्थोऽध्यायः 949 संयुक्त करके जिस नृत्तप्रयोग की सृष्टि की उसका नाम ताण्डव' प्रसिद्ध हुआ ॥ २५ ९ -२६१ ॥ ऋषिगणों का भरतमुनि से प्रश्न- ऋषयः ऊचुः- २६१ ॥ यदा प्राप्त्यर्थमर्थानां तज्ज्ञैरभिनयः कृतः ॥ कस्मान्नृत्तं कृतं ह्येतत्कं स्वभावमपेक्षते । ऋषिगणों ने पूछा- जब अर्थों की अभिव्यंजना के निमित्त प्रयोक्ताओं ने अभिनय की सृष्टि की, तो उन्होंने नृत्त की सृष्टि किस अभिप्राय से दी? और उस [नृत्त ] की प्रवृत्ति [लक्षण या स्वरूप ] क्या निर्धारित की गई ॥ २६१-२६२ ॥ न गीतकार्थसम्बद्धं न चाप्यर्थस्य भावकम् ॥ २६२ ॥
कस्मान्नृत्तं कृतं ह्येतद्गीतेष्वासारितेषु च । यह नृत्त न तो गीत के अर्थ से सम्बद्ध होता है और न उसके प्रतिपाद्य अर्थ ( संवाद ) की अभिव्यञ्जना करता है तो फिर इस नृत्त की सृष्टि आसारित गीत से सम्बद्ध रूप में किस लिए की गई है? ॥ २६२-२६३ ॥ भरतमुनि द्वारा ऋषियों को उत्तर देना- भरतः- अत्रोच्यते न खल्वर्थं कञ्चिन्नृत्तमपेक्षते ॥ २६३ ॥
किं तु शोभां प्रजनयेदिति नृत्तं प्रवर्तितम् । भरत मुनि उत्तर देते हैं - नृत्त की उपयोगिता किसी अर्थ विशेष की अभि- व्यक्ति में नहीं है, किन्तु इसकी रचना शोभा के उत्पादनार्थ हुई है ॥ २६३-२६४ ॥ नृत्त की उपयोगिता - प्रायेण सर्वलोकस्य नृत्तमिष्टं स्वभावतः ॥। २६४ ॥ मङ्गल्यमिति कृत्वा च नृत्तमेतत्प्रकीर्तितम् । प्रायः सभी लोगों को नृत्त स्वाभाविक रूप से प्रिय होता है तथा यह शुभ भी है । इसलिए इस नृत्त का कथन किया जाता है ॥ २६४-२६५ ॥ विवाहप्रसवावाहप्रमोदाभ्युदयादिषु ॥ २६५ ॥ विनोदकारणं चेति नृत्तमेतत्प्रवर्तितम् ।
१. तण्डु मुनि से उद्भूत होने के कारण इस नृत्तप्रयोग का नाम ताण्डव पड़ा । डा० रघुवंश का विचार है कि आर्यपूर्व परम्परा में ताण्डव नृत्त विशेष का या उसका सामान्य नाम रहा होगा और उसी से तण्डु नाम की कल्पना की गई है । २. नाटय में स्थित गति एवं संवादों में अन्तनिहित अर्थों से तात्पर्य है ।