भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 301–310

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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२१२ नाट्यशास्त्रम्

सा ध्रुवा परिवर्ताख्या त्रिलया त्रियतिस्तथा ।

परिवर्तास्तु चत्वारः पाणयस्त्रय एव च ॥

यदि पाद के प्रारम्भ के दो अक्षर, चतुर्थ, अष्टम, दशम, चतुर्दश एव पंचदश संख्यक अक्षर गुरु हों, तथा वह तीन लय, तीन यति, चार परिवर्त और तीन पाणि से युक्त हो तो उसे परिवर्ता ध्रुवा मानना चाहिए । परिवर्तिनीचतुभिस्सन्निपातैस्तुध्रुवा के सन्निपात तथा कलायेंद्वात्रिंशत्कलिकान्विता- । पूर्वरङ्ग प्रयोक्तव्यः परिवर्तः प्रयोक्तृभिः ॥ प्रयोक्ताओं द्वारा चार सन्निपातों तथा बत्तीस कलाओं के साथ इस ( परिवर्ता ध्रुवा ) का प्रयोग पूर्वरङ्ग में किया जाना चाहिए । परिवर्तिनी ध्रुवा का उदाहरण श्लोक— यथा- चन्दार्धभूषणजटं वरं वृषभकेतुं कैलासपर्वतनिवासिनं सुरवरिष्ठम् । शैलाधिराजतनयाप्रियं प्रमथनाथं मूर्ध्ना नतोऽस्मि त्रिपुरान्तकं परमयोगिनम् ॥ आधे चाँद को जटा में सजाने वाले, वृषभांक, कैलासपर्वत पर रहने वाले, देवों में श्रेष्ठ, पर्वततनया पार्वती के प्रियतम, गणों के स्वामी त्रिपुरारि, परमयोगी भगवान् शिव को मैं शिरसा प्रणाम करता हूँ ।

अवकृष्टा धुवा का उपोहन तथा गुरु लघुवर्ण- अवकृष्टामिदानीं तु कथ्यमानां निबोधत ।

अस्यास्तूपोहनं कार्य कलाभिः पञ्चभिर्युतम् ॥

दिग्ले दिग्ले पुनश्चान्ते झण्टुमस्य प्रयोजयेत् ।

अष्टावेव तु कार्याणि मध्ये लघ्वक्षराणि तु ॥

तृतीयं चैव षष्ठं तु नवमैकादशे तथा ।

पादे पञ्चदशं चैव षोडशं भवेद् गुरु ॥

अब मैं अवकृष्टा ध्रुवा के विषय में बताता हूँ, उसे आप लोग सुनें । इसमें पाँच कलाओं से युक्त उपोहन किया जाना चाहिए । आरम्भ में दिग्ले दिग्ले, और अन्त में झण्टु का प्रयोग होना चाहिए एवं मध्य में लघु आठ अक्षर रहने चाहिए । और प्रत्येक पाद के तीसरे, छठे नवें, ग्यारहवे, पन्द्रहवे और सोलहवे अक्षर को गुरु होना चाहिए ।

पृष्ठ 302

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पचमोऽध्यायः २१३ अवकृष्टा ध्रुवा के गण, सन्निपात तथा पाणि आदि- अष्टषष्टिगणैः पादैरवकृष्टविधिर्बुधाः । चतुभिः सन्निपातैश्च पाणिभिस्त्रिभिरेव च ॥ अवकृष्टा ध्रुवा के प्रत्येक पाद में साढ़े छः गण' अर्थात् बाइस मात्रायें होती हैं जिनका विभाजन चार सन्निपात तथा तीन पाणि के द्वारा किया जाता है । अवकृष्टा ध्रुवा का उदाहरण श्लोक- यथा- वरदं सगणं त्रिपुरान्तकं वृषभकेतुम् । गजचर्मपटं विषमेक्षणं भुवननाथम् ।

भुजगाभरणं जगतां हितं भुवनयोनिम् ।

प्रणतोऽस्मि भवन्तमुमापतिं त्वसितकण्ठम् ॥

मनोरथ पूर्ण करने वाले, गणों के स्वामी, त्रिपुरासुरहन्ता वृषभचिह्न वाले गजचर्म के धारणकर्ता, त्रिनेत्र, लोकत्रय के अधिपति, सर्पों से अलंकृत, विश्वकल्याण- कारक, संसार के उत्पादक, नीलकण्ठ पार्वती पति शिव को मैं प्रणाम करता हूँ । अड्डिता ध्रुवा छन्द के गुरु लघु वर्ण तथा गण- तृतीयं चैव षष्ठं च गुरुपादे: त्रयोदशम् । चतुर्गुणसमायुक्ता सा कार्या त्वडिता ध्रुवा ॥ जिस छन्द का प्रत्येक पाद १३ अक्षर वाला हो तथा प्रत्येक पाद का तीसरा, छठा तथा १३ वां अक्षर गुरु हो, इस प्रकार प्रत्येक पाद चार गणों' अर्थात् १६ मात्राओं से युक्त हो उसे अड्डिता ध्रुवा कहते हैं । अडिता ध्रुवातत्राप्यपोहनंकी उपोहन विधि-कार्यं चतुष्कलसमन्वितम् । अड्डितायाः प्रयोगज्ञैरन्ते झण्टुविभूषितम् ॥ १. इस श्लोक अष्टषष्टि गणैः के स्थान पर पाठ भेद अर्धषष्ठगणैः ही ठीक है । क्योंकि उदाहरण में साढ़े छः गण ही प्राप्त होते हैं । अभिनवभारती में इसकी टीका में 'अष्टषष्टिगणैरिति पात भागा: ' में यह लिखा है कि वह भ्रामक है । इसमें ६८ पात नहीं होते । मूल में पादैः, 'शब्द 'पातैः,' नहीं । २. इस श्लोक में 'चतुर्गुण शब्द के स्थान पर 'चतुर्गण' पाठ होना चाहिये जैसा कि पाठभेद में द प्रति में दिया गया है । ध्रुवाओं के छन्दों के विधान में गणों का वर्णन होता है गुणों का नहीं ।

पृष्ठ 303

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२१४ नाट्यशास्त्रम्

दिग्ले दिग्ले ततश्चैव कार्यमन्ते सदा बुधैः ।

चत्वार्येव हि कार्याणि मध्ये लघ्वक्षराणि तु ॥

( अड्डिता धवा में ) चार कलाओं से उपोहन विधि की जानी चाहिए और अन्त में झण्टु एवं प्रारम्भ में दिग्ले दिग्ले का प्रयोग करना चाहिए तथा मध्य में चार लघु अक्षर रखे जाने चाहिए । अड्डिता ध्रुवा का उदाहरण श्लोक- यथा- प्रवरं वरदं प्रणमत सततम् । •गजचर्मपटं मुनिजनसहितम् ।

उमया सहितं भुजगवलयिनम् ।

प्रणतोऽस्मि शिवं त्रिभुवनसमितम् ॥

देवों में श्रेष्ठ, वर देने वाले, गजचर्म को धारण करने वाले, ऋषिजनों से सुशोभित, पार्वती से युक्त सर्पों के वलय से अलंकृत और त्रिलोक के स्वामी शिव की मैं सदा वन्दना करता हूँ ।

अता ध्रुवाका उपसंहार- प्रयोज्या त्वड्डिता ह्येवं पूर्वरङ्ग यथार्थतः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि विक्षिप्तायास्तु लक्षणम् ॥

जाना चाहिए । इस प्रकार पूर्वरंग में अड्डिता ध्रुवा का यथाविधि प्रयोग किया अब मैं 'विक्षिप्ता ' ध्रुवा के लक्षण बतलाता हूँ विक्षिप्ता ध्रुवा के छन्द का लक्षण- । तृतीयं चैव षष्ठं च नवमं दशमं तथा ॥ गुर्वक्षराणि पादे तु यस्यां विक्षिप्तिका तु सा अक्षर गुरु हो तो यदि १० अक्षर वाले पाद का तीसरा, छठा, नवीं और दसवाँ उसे विक्षिप्ता ध्रुवा जानना चाहिये ।

विक्षप्ता ध्रुवा का उपोहन- दिग्ले त्रिभिर्गुणैर्युक्ताः पातास्तस्य भवन्ति हि ।

त्रिकलं चापि निर्दिष्टमुपोहनमतः परम् ॥

दिग्ले दिग्ले पुनः कार्यमन्ते झण्टुं प्रयोक्तृभिः ।

लघ्वक्षरैविहीनं तु विक्षिप्तोपोहनं भवेत् ॥

१. ' त्रिभुवननमितम्' इति वा पाठः ।

पृष्ठ 304

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पञ्चमोऽध्यायः २१५ (विक्षिप्ता ध्रुवा में) दिग्ले के प्रयोग द्वारा तीन गणों से युक्त पाद निष्पन्न किये जाते हैं और तीन कलाएँ होती हैं । उपोहन की क्रिया में प्रारम्भ में दिग्ले दिग्ले और अन्त में झण्टु का प्रयोग किया जाता हैं तथा इसमें उपोहन में लघु अक्षर नहीं प्रयुक्त किये जाते हैं । विक्षिप्ता ध्रुवा का उदाहरण श्लोक-

यथा- त्रिपुरान्तकरं बहुलीलमुमया सहितं बहुरूपम् ।

भुजगाभरणं त्रिपुरान्तकं प्रणमामि सदा परमीशम् ॥

त्रिपुरासुर के हन्ता नानाविधलीलाओं से युक्त, उमा के स्वामी, अनेक स्वरूप धारण करने वाले, सर्पों से अलंकृत एवं त्रिपुर के नाशक भगवान् शिव को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।

धवाओं का उपसंहार- एवं सर्वा ध्रुवाः कार्या युग्मौजकृतगीतकाः ।

आचार्यबुद्धया कर्त्तव्याः पूर्वरङ्ग यथाविधि ॥

इस प्रकार चतुरश्र एवं त्र्यश्र ताल में युक्त इन ध्रुवाओं का पूर्वरंग में आचार्य की बुद्धि के अनुरूप यथाविधि प्रयोग करना चाहिये । अध्याय का उपसंहार—

एवं वः कथितं सम्यक् पूर्वरङ्ग त्रिधा मया ।

किमन्यत्संप्रवक्ष्यामि भूयोऽभीष्टं द्विजोत्तमाः ॥

॥ इति भारतीये नाट्शास्त्रे पूर्वरङ्गविधानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इस भाँति मैंने तीनों प्रकार के पूर्वरंग का निरूपण किया । अव आगे आप लोगों के किस अभीप्सित पदार्थ का वर्णन किया जाए ॥। इस प्रकार भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की 'नाट्यप्रदीप' नामक हिन्दी व्याख्या का पूर्वरङ्गविधान' नामक पांचवां अध्याय का प्रक्षिप्त भाग पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

१. इस श्लोक में ' त्रिभिर्गणैः युक्ताः पाताः ' के स्थान पर 'म' प्रति का पाठान्तर 'त्रिभिर्गणय पादाः' यह पाठ संगत है क्योंकि विक्षिप्ता ध्रुवा के उपोहन में इस श्लोक में 'दिग्ले दिग्ले झण्ट' इन शब्दों का वर्णन किया गया है ये तीनों शब्द चार चार मात्रा वाले तीन गणों से युक्त हैं केवल तीन गणों से नहीं ।

पृष्ठ 305

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अथ षष्ठोऽध्यायः मुनियों कापूर्वभरतमुनिरङ्गविधिसे प्रश्न-श्रुत्वा पुनराहुर्महत्तमाः । भरतं मुनयः सर्वे प्रश्नान्पञ्चाभिधत्स्व नः ॥ १ ॥

(पिछले अध्याय में वर्णित ) पूर्वरंग के विधान को सुनकर सब महत्तम मुनि लोग भरत से ( प्रथम अध्याय में पूछे गए ) पाँचों प्रश्नों का उत्तर पूछने लगे ॥ १ ॥

येरसत्वंरसा इतिकेनपठ्यन्तेवै नाट्येतेषामेतदाख्यातुमर्हसिनाट्यविचक्षणैः ॥। २ ॥ नाट्यशास्त्र के ज्ञाता लोग नाट्य में जिनको रस कहते हैं उनमें रसत्व क्या है, यह बतलाने की कृपा कीजिए ॥ २ ॥

भावाश्चैव कथं प्रोक्ताः किं वा ते भावयन्त्यपि ।

संग्रह कारिकां चैव निरुक्तं चैव तत्त्वतः ॥ ३ ॥

भावों के विषय में किस लिए प्रतिपादन किया गया है और वह किसे भावित करते हैं? इसके अतिरिक्त उन भावों के संग्रह', कारिका एवं निरुक्त ' के विषय में १. मुनि लोगों ने अब जो पाँच प्रश्न पूछे हैं वह नये हैं किन्तु अभिनवगुप्त के मत में वे प्रथम अध्याय में किये गये पाँचों प्रश्नों का विस्तार मात्र हैं । २. अभिनव की व्याख्यानुसार " रसानाथर्वणात्" (ना० शा० १-१७ ) में जिन रसों का उल्लेख हुआ है वे अम्लादि छः रस नाट्य के किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होते तथा 'शृङ्गार रसपरक श्लोक है' या 'यह रौद्ररसपरक श्लोक है' आदि के उद्गारों से जिस श्रृङ्गारादि को रस माना गया हैं वहाँ रस-पद- वाच्यता कैसे होगी? क्योंकि रस नामक गुण का ग्रहण तो रसनेन्द्रिय के ही द्वारा संभव है और शृङ्गारादि रसनाग्राह्य नहीं हो सकते । इसके प्रति अत्यन्त आदर भावना दिखायी पड़ती है अतः उसका विवेचन भी आवश्यक है । (न चायमनादरस्थानभूतोऽर्थो येनाविचारित एवोपेक्ष्यते 'खिन्नानां रसभावेषु' इत्या- दावादरातिशयप्रतीतेः ) यही कारण है कि अंगों एवं अभिनय के अन्तर्गत इसका आंशिक विवेचन हो चुकने पर भी अलग से रस के विषय में पूँछा जा रहा है । ३. संग्रह का तात्पर्य है— उद्देश्य । श्रीघोष ने इसका अर्थ ' डाइजेस्ट' माना है । ४. कारिका का अर्थ लक्षण है । ५. निरुक्त का तात्पर्य परीक्षा है ।

पृष्ठ 306

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षष्ठोऽध्यायः २१७ भी बतलाइये क्योंकि भाव की सिद्धि तो इन्हीं के द्वारा होती है ॥ ३ ॥

भरतमुनि का उत्तर- तेषांप्रत्युवाचतु वचनं पुनर्वाक्यंश्रुत्वा मुनीनांरसभावविकल्पनम्भरतो मुनिः ॥। ४ ॥ ऋषियों के इस कथन को सुनकर भरत मुनि रस तथा भावों के लक्षणपरक इन वाक्यों को बोले ॥ ४ ॥

अहं वः कथयिष्यामि निखिलेन तपोधनाः ।

संग्रहं कारिकां चैव निरुक्तं च यथाक्रमम् ॥ ५ ॥

हे मुनिजन! मैं आपको विस्तारपूर्वक संग्रह, कारिका तथा निरुक्त ( के साथ रस एवं भावों ) के विषय में क्रमशः बतलाऊँगा ॥ ५ ॥

न शक्यमस्य नाट्यस्य गन्तुमन्तं कथञ्चन ।

कस्याद्बहुत्वाज्ज्ञानानां शिल्पानां वाप्यनन्ततः ॥ ६ ॥

इस नाट्य का अन्त पाना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है क्योंकि ज्ञान तथा शिल्प' अनन्त है ( अतः उनके प्रतिपादक होने से नाट्य की भी कोई सीमा नहीं है ) ॥ ६ ॥

एकस्यापि न शक्यस्त्वन्तो ज्ञानार्णवस्य हि । गन्तुं किं पुनरन्येषां ज्ञानानामर्थंतत्त्वतः ॥ ७ ॥

क्योंकि इनमें से एक भी विद्या के समुद्र को पार करना असम्भव है तो फिर सभी ज्ञानों के तात्त्विक आशय तक पहुँचना नितान्त दुष्कर है ॥ ७ ॥

किन्त्वल्पसूत्र- ग्रन्थार्थ' मनुमानप्रसाधकम् नाट्यस्यास्य प्रवक्ष्यामि रसभावादिसङ्ग्रहम् ॥ ८ ॥

फिर भी आप लोगों को सूत्र तथा ग्रन्थ ( परीक्षा ) के भूत अर्थ वाले तथा अनुमान से सिद्ध होने वाले, रस एव भाव के संग्रह रूप इस नाट्य को बतलाता हूँ ॥ ८ ॥

विस्तरेणोपदिष्टानामर्थानां सूत्रभाष्ययोः । निबन्धो यः समासेन सग्रहं तं विदुर्बुधाः ॥ ९ ॥

१. अभिनवगुप्त के मत में यहाँ ज्ञान शब्द से व्याकरणादि शास्त्रों का एवं शिल्प से चित्र पुस्तकादि कर्म का संकेत किया गया है । २. अभिनवभारती के अनुसार जब अंगभूत विद्याओं का ही पार पाना कठिन है तो फिर अंगीभूत नाट्य को पार पाना तो नितान्त कठिन है । ३. ' गूढार्थम्' इति वा पाठः ।

पृष्ठ 307

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२१८ नाट्यशास्त्रम् सूत्र एवं भाष्य के विस्तारपूर्वक प्रतिपादित अर्थों को ' संक्षिप्तरूप में जब निबद्ध किया जाता है, तो उसे ही विद्वज्जन ' संग्रह' कहते हैं ॥ ९ ॥

नाट्यशास्त्र विषयक संग्रह के ११ अङ्ग - रसा भावा ह्यभिनयाः धर्मी वृत्तिप्रवृत्तयः । सिद्धिः स्वरास्तथातोद्यं गानं रङ्गश्च संग्रहः ॥ १० ॥

रस, भाव, अभिनय, धर्मी, वृत्ति, प्रवृत्तियाँ, सिद्धि, स्वर, वाद्य, गान एवं रङ्ग को 'संग्रह' कहा जाता है ॥ १० ॥

कारिका लक्षण- अल्पाभिधानेनार्थो यः समासेनोच्यते बुधैः ।

सूत्रतः साऽनुपठिता' कारिकार्थप्रदर्शिनी ॥ ११ ॥

विद्वान् लोग जब किसी अर्थ को संक्षेप में सीमित शब्दों वाले सूत्र द्वारा व्यक्त करते हैं तो उस अर्थनिबोधिनी उक्ति को 'कारिका' कहा जाता है' ॥ ११ ॥

१. अभिनवगुप्त के मत में सूत्र द्वारा लक्षण का परिज्ञान कराया जाता है ( सूत्रं लक्षणम्) और लक्षण को भाष्य में भलीभांति विस्तार दिया जाता है। ( भाष्यं तद्व्यक्तीकरणरूपा परीक्षा ) । २. आचार्य अभिनवगुप्त का अभिमत है कि यद्यपि यहाँ संग्रह के एकादश अंग बताये गये हैं किन्तु वे भरतसम्मत न होकर कोहलाचार्य के मतानुसार हैं । ( अनेन तु श्लोकेन कोहलमतेने कादशाङ्गत्वमुच्यते, न तु भरते । तत्संगृहीतस्यापि पुनः रत्रोद्देशः ) । भरत के अनुसार केवल पाँच अंग होने चाहिये जिनमें त्रिविध अभिनय एवं गान तथा वाद्य का समावेश होता है ( अभिनयत्रयं गीतातोद्य चेति पञ्चाङ्ग नाट्यम् । ) ३. ' साऽनुमन्तव्या' इति वा पाठः । ४. अभिनवगुप्त के मत में सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाने वाला अर्थ और अर्थ को व्यक्त करने वाली उक्ति ( सूत्र ) एवं सूत्र के अर्थ को प्रतिपादित करने वाले

श्लोक - इन तीनों की संज्ञा 'कारिका' है ( अनेन अर्थस्य लक्षणरूपस्य तद्वाचकस्य

सूत्रस्य, तत्संक्षिप्तार्थविवरणात्मकस्य च श्लोकस्य कारिकात्वं दर्शयति ) । कारिका की इस परिभाषा को देखते हुए दो प्रकार की कारिकाओं की स्थिति सिद्ध होती है- १. सूत्रात्मक कारिका, एवं २. श्लोकात्मक कारिका । कारिका के द्वारा पद्यात्मक रूप में तथा सूत्ररूप में लक्षणात्मक अर्थ का प्रतिपादन किया जाता है, जिसमें लक्षणीय अर्थ का अन्य धर्मियों से भेद प्रतीत होता हैं अर्थात् लक्षण को ही कारिका कहा जाता है ।

पृष्ठ 308

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षष्ठोऽध्यायः २१ ९ निरुक्त लक्षण- नानानामाश्रयोत्पन्नं निघण्टुनिगमान्वितम् । धात्वर्थहेतुसंयुक्त नानासिद्धान्तसाधितम् ॥ १२ ॥

स्थापितोऽर्थो भवेद्यत्र ' समासेनार्थसूचकः । धात्वर्थवचनेनेह निरुक्त तत्प्रचक्षते ॥ १३ ॥

विविध प्रकार की संज्ञा के आश्रय से ( अर्थात् सुबन्त से ) उत्पन्न होने वाले एवं कोश तथा व्याकरण के नियमों के अनुकूल, तथा सहेतु अर्थ की ज्ञापक मूल धातु से युक्त एवं अनेक प्रकार के सिद्धान्तों से साधित ( परीक्षित) तथा संक्षेप में आशय को प्रकट करने वाली एवं धातु के अर्थ का समर्थन करने वाली उक्ति को " निरुक्त" कहते हैं ॥ १२-१३ ॥ १. अभिनवगुप्ताचार्य ने शंका उठाई है कि नाम ( सुबन्त ) पदों में आक्षेप एवं प्रतिसमाधान किस प्रकार होता है? तथा इसका समाधान इस रूप में किया है कि निघण्टु ( शब्दकोश ) तथा निगम ( शब्दशास्त्र ) के द्वारा ऐसा किया जाता है । निघण्टु से रूढ़ शब्दों की एवं निगम से यौगिक या योगरूढ़ शब्दों की व्याख्या की जाती है । लक्षणवाक्य में जिस धातु के अर्थ का संयोग स्थापना के निमित्त किया जाता है उसे भी ' निरुक्त' कहते । इसके अन्तर्गत लक्षण वाक्य में पहले आक्षेप किया जाता है कि इस अर्थ का प्रयोग इस विशिष्ट अर्थ में किस भांति हुआ है और फिर इसकी विवेचना करते हुए उत्तर दिया जाता है । निरुक्त के चार भेद हैं: - १. नाम या प्रातिपादिक के द्वारा व्याख्या करना, यथा - उलूखल शब्द की 'ऊ ' खमस्योलूखलः ” इस प्रकार निर्वचन करना । २. धातु के द्वारा व्याख्या करना । जैसे— रस शब्द को 'रस्यते इति रस:' इस प्रकार रस्यते क्रिया का प्रयोग करते हुए विवेचित करना । ३. नाम एवं धातु दोनों के द्वारा व्याख्या करना । यथा-पिशाच शब्द की "पिशित- मनातीति पिशाचः" है इस भांति व्याख्या करने के लिए पिशित शब्द एवं अश्नाति क्रिया, दोनों का प्रयोग किया जाता है । ४. संकेत के द्वारा संकेत द्वारा व्याख्या तीन प्रकार से की जा सकती है । (अ ) लौकिक शब्द से, यथा-' भू सत्तायाम्' । (ब ) वैदिक शब्द से, जैसे - केवल वेद में प्रयुक्त दीधीङ् धातु दीमि और देवन ( अक्षक्रीडन ) के अर्थ में प्रयुक्त की जाती है । (स ) पारिभाषिक शब्द से, जैसे- गान्धर्व वेद में विशेषगीत के सन्दर्भ में प्रयुक्तः

पृष्ठ 309

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२२० नाट्यशास्त्रम्

संग्रहो यो मया प्रोक्तः समासेन द्विजोत्तमाः ।

विस्तरं तस्य वक्ष्यामि सनिरुक्त सकारिकम् ॥ १४ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैने सूक्ष्म रूप में जो संग्रह ( उद्देश ) बताया है उसी के "विस्तार ( विभाग ) को मैं लक्षण ( कारिका ) तथा परीक्षण ( निरुक्त ) के साथ -बतलाऊँगा ॥ १४ ॥

आठ रस- रौद्रवीरभयानकाः । शृङ्गारहास्यकरुणा बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः ॥ १५ ॥

नाट्य ' में शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स एवं अद्भुत -नामक आठ रस होते हैं ॥ १५ ॥

होने वाला 'ओवेणक ' शब्द । इस प्रकार के पारिभाषिक शब्द प्रत्येक शास्त्र में प्रयुक्त होते हैं जो उस विशेष शास्त्र के संन्दर्भ में एक विशेष अर्थ के द्योतक होते हैं; यथा पाणिनि के वृद्ध, वि, टि आदि संकेत । १. अभिनवगुप्ताचार्य के मत में नाट्य उस अर्थ को कहते हैं जो नट द्वारा -प्रदर्शित अभिनय के फलस्वरूप साक्षात् रूप से दृश्यमान होता है तथा एकाग्र मन से अनुभूत किया जाता है । उसका ज्ञान सभी नाटकों और कभी कभी किसी काव्य से भी होता है ( तत्र नाट्यं नाम नटगताभिनयप्रभावसाक्षात्कारायमाणैक- घनमानसनिश्चलाध्यवसेयः समस्तनाटकाद्यन्यतमकाव्य विशेषाच्च द्योतनीयोऽर्थः ) । आलम्बन एवं उद्दीपन रूपी विभावों की बहुलता के कारण नाट्य अनन्त- विभावादि रूप है, तथापि समस्त विभावों का पर्यवासन ज्ञान में एवं ज्ञान का पर्यवसान उपभोक्ता में तथा भोक्ताओं के ज्ञान का पर्यवसान नायक में होने के -कारण नायक की रत्यादि स्थायीभावात्मक चित्तवृत्ति को ही नाट्य माना जाता है । अभिनवगुप्त का मत हैं कि नायक की चित्तवृत्ति, (जो कि प्रधान चित्तवृत्ति रूपा होती है) ही लौकिक गीतों के गेयपदादि, लास्य नृत्य के दस अंगों, तथा स्वीकृत -लक्षणयुक्त गुण, अलंकार, गीत, वाद्य आदि के संयोग द्वारा अत्यधिक रमणीय होकर काव्य के प्रभाव एवं नट द्वारा अनुष्ठित प्रयोग एवं परम्परा अभ्यासविशेषण के प्रभाव से स्वकीय परकीय की भावना से रहित होकर - साधारणीकरण हो जाने से -नायक की चित्तवृत्ति की परिधि में सामाजिक का भी प्रवेश होने से नायक और सामाजिक की चित्तवृत्ति में अभेद या साधारणीकरण होने से, अनुमान, आगमरूप

पृष्ठ 310

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षष्ठोऽध्यायः २२१ परीक्षात्मक एवं इन्द्रियसन्निकर्ष के बिना ही उद्भूत योगिप्रत्यक्ष से उत्पन्न रसादि के अनुभव से उदासीन प्रमाता एवं प्रमेय से विलक्षण और लौकिक चित्त-वृत्ति से भिन्नरूपा प्रतीत होने वाली, नायक के अपने सीमित स्वरूप के आश्रय से प्रतीत न होने के कारण लौकिक अङ्गना आदि से उत्पन्न अपनी रीति और शोक की भाँति अन्य चित्तवृत्ति को उत्पन्न करने में असमर्थ होने से निर्विघ्न अनुभूति के विश्रान्ति स्वरूप आस्वादन नाम की प्रक्रिया स्वीकृत होने के कारण "रस " कही जाती है । अभिनवगुप्ताचार्य की सुदृढ़ मान्यता है कि रस ही नाट्य है ( रस एव नाट्यम्) । यह रस त्रिविध है ( १ ) स्फोट के समान असत्यभूत, ( २ ) अन्विताभिधान के समान उपायात्मक सत्यरूप तथा ( ३ ) अभिहितान्वयवाद के समान — प्रधान रस समुदाय-रूप । इस प्रकार के अन्य रस प्रधानरस के अंशरूप में वर्णित किए जाते है । यहाँ यह स्मणीय है कि स्फोट सिद्धान्त के अनुसार वर्ण, पद एवं वाक्य अखण्ड होते है,-वाक्य में पदों की तथा पदों में वर्णों की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती । स्फोटवाद में अखण्डपदों को "पदस्फोट " तथा अखण्डवाक्य को " वाक्यस्फोट" कहा जाता है तथा यह स्फोट ही अर्थ का प्रकाशक होता है । इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वाक्य एवं पद में अवयवों की प्रतीति असत्य रूपा होती है और अखण्ड रूप से वहाँ अर्थ का प्रकाशन होता है उसी प्रकार नाट्य में भी रस की प्रतीति अखण्डाभिव्यक्तिरूपा होती है । इसी सन्दर्भ में अन्विताभिधानवाद का भी परिचय देना उपयुक्त होगा । इस वाद में वाक्यार्थ बोध के लिए पदों का अभिहित होने के बाद अन्वय नहीं माना जाता । अपितु पदों के द्वारा अन्वित अर्थ को ही अभिहित माना जाता है । इस प्रकार अन्वित पदार्थ की ही प्रतीति होने से पदार्थ ही सत्य होता है । उनकी अलग अलग स्थिति उपायमात्र होती है । इसका तात्पर्य यह है कि नाट्यरस के साथ अन्य रसों की स्थिति उपायारत सत्य के सदृश है । इसके विपरीत प्रभाकरमिश्र द्वारा प्रवर्तित सिद्धान्त "अन्विताभिधानवाद” के अनुसार पदों के द्वारा अन्वित अर्थ ही अभिहित होता है अर्थात पहले पदार्थों का बोध होता है फिर उनके समुदाय रूप में वाक्यार्थ का बोध होता है । इसी प्रकार नाट्यरस के अन्तर्गत अन्य सभी रसों की स्थिति पदार्थो के समान अंगभूत होती है और इनसे अङ्गीभूत प्रधानरस का बोध समुदाय रूप में होता है । रसों की संख्या के विषय में भरत की मान्यता है कि नाट्य में आठ ही रस होते हैं किन्तु अभिनवगुप्त ने शान्तरस की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए नाट्य में नौ रसों की गणना की है ।