भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 311–320

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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: २२२ नाट्यशास्त्रम् एते ह्यष्टौ रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना ।. पुनश्च भावान्वक्ष्यामि स्थायिसञ्चारितत्त्वजान् ॥ १६ ॥

महर्षि ब्रह्मा के द्वारा यह आठ रस कहे गए हैं । इसके पश्चात् अब मैं आप लोगों से स्थायी, संचारी तथा सात्त्विक भावों के विषय में बतलाऊँगा ॥ १६ ॥

भरत ने रसों का उल्लेख जिस विशिष्टक्रम में किया है उसके मनोवैज्ञानिक आधार को प्रकाशित करते हुए अभिनवगुप्त ने बड़ी सुन्दर व्याख्या दी है । तदनुसार शृंगाररस को भरत द्वारा सर्वोच्च स्थान देने का कारण यह कि वह सकलजाति- सामान्य, अर्थात् सभी प्राणियों में सुलभ व अत्यन्तपरिचित सा होता है तथा सबके लिए हर्षद होता है ( सकलजातिसुलभतयात्यन्तपरिचितत्वेन सर्वान् प्रति हृदय- तेतिपूर्वशृंगारः ) श्रृंगार का अनुगामी होने से हास्य का द्वितीय स्थान रखा गया है ( तदनुगामी च हास्यः ) । श्रृंगार से निरपेक्ष एवं हास्य के विपरीत होने के कारण करुण को तृतीय -स्थान मिलता है ( निरपेक्षभावत्वात् तद्विपरीतस्ततः करुणः ) । करुण का -निमित्तभूत अर्थात् करुण से उत्पन्न होने के कारण तथा अर्थ प्रधान होने से रौद्र -रस का स्थान चतुर्थ माना गया है (ततस्तन्निमित्तं रौद्रः । च चामर्षप्रधानः ) । इसके 'पश्चात् काम तथा अर्थ दोनों का धर्ममूलक होने के कारण धर्मप्रधान -वीररस का स्थान आता है ( ततः कामार्थयोर्धर्ममूलत्वाद् वीरः । स हि धर्मप्रधानः) । वीर रस का उद्देश्य भयार्तजन को अभय देना है । अतः वीररस के बाद सप्तम स्थान मैं भयानक रस की गणना की जाती है ( तस्य च भीताभयप्रदानसारत्वात् तदनन्तरं भयानकः ) भयानक एवं वीभत्स रस के विभावों की समानता होने की सम्भावना -होने से भयानक के बाद वीभत्सरस का स्थान है ( तद्विभावसाधारण्य सम्भाबनात् •ततो वीभत्स इति ) । वीरता के परिणामस्वरूप में आठवें स्थान पर अद्भुतरस को माना जाता है । ( वीरस्य पर्यन्तेऽद्भुतः । यद्वीरेणाक्षिप्तं फलमित्यन्तरं तदुपा -दानम् । ) इस प्रकार यह आठों रस त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ एवं काम ) से सम्बन्धित हैं और प्रवृत्तिधर्म हैं । भरत द्वारा मान्य इन आठों रसों के अतिरिक्त अभिनव शान्तरस नामक नवें -रस को भी मान्यता देते हैं । उन्हीं के शब्दों में नवम संख्यक शान्तरस निवृत्तिधर्मा होता है तथा उभयधर्मोपयोगी तथा मोक्षफलक होता है ( निवृत्तिधर्मात्मको मोक्षफल: शान्तः । इस शान्तरस में आत्मनिष्ठ होकर रस का आस्वादन किया जाता है । इसका स्थायी भाव “ निर्वेद " माना जाता है जो तत्त्वज्ञान से उत्पन्न होता है ।

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षष्ठोऽध्यायः २२३

आठ स्थायीभाव -- रतिहसिश्च शोकश्च क्रोधत्साही भयं तथा ।

जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः ॥ १७ ॥

रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा एवं विस्मय यह आठ स्थायी भाव माने गए हैं ॥ १७ ॥

तैंतीस संचारी भाव- निर्वेदग्लानिशङ्काख्यास्तथासूया मदः श्रमः ।

आलस्यं चैव दैन्यं च चिन्ता मोहः स्मृतिर्धृतिः ॥ १८ ॥

व्रीडा चपलता हर्ष आवेगो जडता तथा ।

गर्वो विषाद औत्सुक्यं निद्रापस्मार एव च ॥ १ ९ ॥

सुप्तं विबोधोऽमर्षश्चाप्यवहित्थमथोग्रता । मतिर्व्याधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च ॥ २० ॥

त्रासश्चैव वितर्कश्च विज्ञेया व्यभिचारिणः ।

त्रयस्त्रिशदमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः ॥ २१ ॥

( १ ) निर्वेद, ( २ ) ग्लानि, ( ३ ) शंका, ( ४ ) असूया, ( ५ ) मद, ( ६ ) श्रम, (७ ) आलस्य, ( ८ ) दैन्य, ( ९ ) चिन्ता, ( १० ) मोह, ( ११ ) स्मृति, ( १२ ) धृति, १. अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार कुछ लोग स्थायीभावों की नामगणना के पाठ में "जुगुप्सा विस्मयशमा:" इस प्रकार का पाठ करते हैं और इस प्रकार शम् को शान्त रस का स्थायी भाव मानते हैं । किन्तु अन्य कुछ विद्वान् उत्साह -को एवं कतिपय विद्वान् जुगुप्सा को शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करते हैं । -कुछ लोगों की मान्यता है कि सभी स्थायी भाव शान्त रस के स्थायी हो सकते हैं । ..अतः उसके लिए पृथक स्थायी भाव की कल्पना करना अनावश्यक है । इस विषय में अभिनवगुप्त की यह धारणा है कि तत्त्वज्ञान से उत्पन्न वैराग्य ( निर्वेद ) ही इस शान्तरस का वास्तविक स्थायी भाव हैं ( तत्त्वज्ञानजो निर्वेदोऽस्य स्थायी ) । यही -कारण है कि निर्वेद में स्थायीभाव तथा व्यभिचारीभाव दोनों के धर्म रहते हैं । -इसका तात्पर्य यह है कि शान्तरस में निर्वेद स्थायी भाव के रूप में रहता है एवं अन्य - रसों में व्यभिचारी भाव के रूप में । यहीं कारण है कि अमंगलभूत होने पर भी व्यभिचारी भावों की गणना में सबसे पहले निर्वेद का पाठ किया गया है । तथा इसके लिए भरत ने स्थायी भावों की संख्या की गणना में संख्या का निर्देश नहीं किया है । यही स्थायीभाव अन्य रसों में व्यभिचारी भाव के रूप में भी प्रयुक्त किए जाते हैं ।

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२२४ नाट्यशास्त्रम् ( १३ ) व्रीडा, ( १४ ) चपलता, ( १५ ) हर्ष, ( १६ ) आवेग, ( १७ ) जडता, ( १८ ) मर्व, ( १ ९ ) विषाद, ( २० ) औत्सुक्य, ( २१ ) निद्रा, ( २२ ) अपस्मार, ( २३ ) सुप्त, ( २४ ) प्रबोध, ( २५ ) अमर्ष, ( २६ ) अवहित्था, ( २७ ) उग्रता, ( २८ ) मति, ( २ ९ ) व्याधि, ( ३० ) उन्माद, ( ३१ ) मरण, ( ३२ ) त्रास तथा ( ३३ ) वितर्क — ये तैंतीस संचारी भाव कहे जाते हैं ॥ १८-२१ ॥ आठ सात्त्विकभाव-

स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽथ वेपथुः ।

वैवर्ण्यमश्रु प्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः ॥ २२ ॥

( १ ) स्तम्भ, ( २ ) स्वेद, ( ३ ) रोमांच, ( ४ ) स्वरभंग, ( ५ ) कम्पन, ( ६ ) विवर्णता ( ७ ), अश्रु तथा ( ८ ) प्रलय - यह आठ सात्त्विक भाव ' कहे जाते हैं ॥ २२ ॥

चार प्रकार के अभिनय- आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्त्विकस्तथा ।

चत्वारोऽभिनया ह्येते विज्ञेया नाट्यसंश्रयाः ॥ २३ ॥

( १ ) आङ्गिक, ( २ ) वाचिक, ( ३ ) आहार्य' एवं ( ४ ) सात्त्विक — यह चार प्रकार के नाट्याश्रित अभिनय माने जाते हैं ॥ २३ ॥

दो प्रकार के धर्मी— लोकधर्मी नाट्यधर्मी धर्मीति द्विविधः स्मृतः । १. अभिनव के मत में सात्त्विक भाव व्यभिचारी भावों के तथा अभिनय दोनों के धर्मों से युक्त होते हैं । परन्तु अभिनय से सम्बन्धित होते हुए भी यह अभिनय से भिन्न होते हैं । अतः इसके नाम अलग से गिनाए गए हैं ( सात्त्विका व्यभिचारिवृत्तमभिनयवृत्तं चोपजीवन्तीति पृथगभिनयादिभ्यो गणिता: ) । २. आहार्य अभिनय से तात्पर्य है धनुष मुकुटादि से प्रतिलक्षित अभिनय । अभिनवगुप्त का विचार है कि अभिनय की साक्षात्कार बुद्धि के उपयोग में आहार्य अभिनय की अन्तरंगता सूचित होती है (आहार्यंस्यापि धनुः प्रतिशीर्षक मुकुटादेः प्रत्यक्षबुद्धावुपयोगेऽन्तरं गत्वं सूचयति ) । अभिनवगुप्त के मत में "नाट्यसंश्रया ” पद से यह सूचित होता है कि लोक में तो सहज परिचित होने से चाहे आहार्य वेषभूषादि का अधिक उपयोग न भी हो किन्तु नाट्यप्रयोग में तो यह वेषभूषादि नाट्य के प्राण स्वरूप होते हैं । इसी कारण रस तथा भाव के पश्चात् अभिनय के विषय में कहा गया है ।

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२२५

धर्मी के दो रूप माने गए हैं: - ( १ ) लोकधर्मी तथा ( २ ) नाट्यधर्मी ।

चार प्रकार की वृत्तियाँ- भारती सात्वती चैव कैशिक्यारभटी तथा ॥ २४ ॥

चतस्रो वृत्तयो ह्येता यासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् । ( १ ) भारती, ( २ ) सात्त्वती, ( ३ ) कैशिकी और ( ४ ) आरभटी - यह उन चार वृत्तियों के नाम हैं जिन पर नाट्यप्रयोग आधारित होता है ॥ २४-२५ ॥ पाँच प्रकार की प्रवृत्तियाँ - आवन्ती दाक्षिणात्या च तथा चैवौद्रमागधी ॥ २५ ॥

पाञ्चालमध्यमा चेति विज्ञेयास्तु प्रवृत्तयः । ( १ ) आवन्ती, ( २ ) दाक्षिणात्या, ( ३ ) अर्धमागधी एवं ( ४ ) पाञ्चाली तथा ( ५ ) मध्यमा यह पाँच प्रकार की प्रवृत्तियां होती हैं ॥ २५-२६ ॥ दो प्रकार की सिद्धियाँ- दैविकी मानुषी चैव सिद्धिः स्याद् द्विविधैव तु ॥ २६ ॥

१. धर्मी का तात्पर्य है स्वभाव । दसवीं कारिका में भरत ने जिन ग्यारह नाट्यांगों का उल्लेख किया था उनमें चतुर्थ संख्या धर्मी की थी । तदनुसार १. रस २. भाव एवं ३. अभिनय के वर्णन के बाद धर्मी का निरूपण किया जा रहा है । लोकधर्मी एवं नाट्यधर्मी के भेद से यह द्विविध है । जैसा लोक में प्रचलित परम्परा है । उसी के अनुसार यदि नाट्य में कार्य हो यथा पुरुष पुरुषवत् एवं स्त्री स्त्रीवत् आचरण करे तो उसे लोकधर्मी कहेंगे । किन्तु यदि लोक के विरुद्ध आचरण हो, अर्थात् ऐसा व्यापार हो जो नाट्य में ही संभव है यथा स्त्री का पुरूषवत् या पुरुष का स्त्रीवत् आचरण हो तो उसे नाट्यधर्मी कहा जाता है । धर्मी का विशेष विवरण नाट्यशास्त्र के आगामी अध्याय ( १२.७०-७४ ) में दिया गया है । २. अभिनवभारती का कथन है कि वृत्तियों का सम्बन्ध अभिनय की पद्धति से है । बिना अभिनेतव्य के अभिनय की संभावना नहीं है । दस प्रकार के रूपकों को विविध रूपों में प्रस्तुत करने के कारण वृत्तियों को रूपकों की उपकारक कहा जाता है ( न चाभिनयोऽभिनेतव्यमन्तरेणास्तीति दशरूपकयोगद्वारेण च तदुप- कारिण्यो वृत्तयः ) । ३. देश पर आधारित होने के कारण प्रवृत्तियों का कथन वृत्तियों के पश्चात् कहा गया है । ( ता अपि देशवशाद् भूयसा भवन्तीति तदनन्तरं प्रवृत्तयः ) । १५ ना०

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२२६ नाट्यशास्त्रम् ( १ ) देवी और ( २ ) मानुषी दो प्रकार की सिद्धियाँ' होती हैं ॥ २६ ॥

सात स्वर तथा उनके दो वर्ग-- शारीराश्चैव वैणाश्च सप्त षड्जादयः स्वराः । [निषादर्षभ गान्धार-मध्य पञ्चम. धैवताः । ] षड्जादि सात स्वरों के शरीर तथा वैणव के भेद से दो वर्ग कहे गए हैं । ( इन सात स्वरों के नाम हैं- १- निषाद, २- ऋषभ, ३- गान्धार, ४- मध्यम, ५- पंचम, ६. धैवत और ७- षड्ज ) चार प्रकार के वाद्य -- ततं चैवावनद्धं च घनं सुषिरमेव च ॥ २७ ॥

चतुर्विधं च विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम् । ( १ ) तत ( वीणादि की भाँति तारयुक्त ) ( २ ) अवनद्ध ( मृदंगादिवत् मढ़े हुए ) ( ३ ) घन तथा ( ४ ) सुषिर ( बाँसुरी आदि के समान फूंके जाने वाले ) यह चार प्रकार के आतोद्य वाद्य माने जाते हैं ॥ २७-२८ ॥ चार प्रकार के वाद्यों के लक्षण- पौष्करम् ॥ २८ ॥ ततं तन्त्रीगतं ज्ञेयमवनद्धं तु

घनस्तु तालो विज्ञेयः सुषिरो वंश एव च । तन्त्रीयुक्त ( वीणादि को ) तत् अवनद्ध ( मढ़े हुए ) वाद्य को पौष्कर, तालोप- १. अभिनवगुप्त के अनुसार सभी प्रकार के अभिनयों का परिसमापन कार्य की सिद्धि में होता है । अतः द्विविध सिद्धियों का उल्लेख किया गया है । इसके विषय में ना० शा० अध्याय २७ में विस्तारपूर्वक कहा गया है । २- पाठ्य तथा गान में स्वरों का अन्तर्भाव हो जाने पर भी उन्हें पृथक् माना जाता है क्योंकि वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं ( स्वराः पाठ्यगानसंगृहीता अपि पृथगुपात्ताः ) नाट्य का सौन्दर्य केवल स्वरों से भी जाना जाता है जिसे अन्तरालाप कहते हैं ( केवलानामपि प्रयोगोप रंजकत्वं यल्लक्ष्ये दृश्यते, यत्र अन्त- रालाप इति प्रसिद्धिस्तदभ्युपगमार्थम् ) । ३. " आतुद्यते इति आतोद्यम्" इस व्युत्पत्ति के अनुसार हाथ या वायु आदि से ताडित होने पर ध्वनि उत्पन्न करने के कारण इन वाद्यों की संज्ञा आतोद्य होती है । यों तो वाद्य असंख्य हैं, किन्तु लक्षणानुसार वाद्यों की यही चार श्रेणियाँ हैं । इस प्रकार लोक में प्रचलित मल्लक पट आदि बहुसंख्यक वाद्यों की गणना इन शास्त्रीय वाद्यों की श्रेणियों में नहीं की जाएगी ।

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षष्ठोऽध्यायः २२७ योगी व ठोंक कर बजाए जाने वाले वाद्य ( मंजीरा आदि ) को घन तथा फूँक कर बजाए जाने वाले वाद्य ( बाँसुरी आदि ) को सुषिर कहा जाता है ॥ २८-२९ ॥ पाँच प्रकार का ध वागान- प्रवेशाक्षेपनिष्क्रामप्रासादिकमथान्तरम् ॥ २९ ॥

। गानं पञ्चविधं ज्ञेयं ध्रुवायोगसमन्वितम् ' [ २ ] आक्षेप ", ध्रुवा' से युक्त गायन पाँच प्रकार का होता है [ १ ] प्रवेशक [३] निष्काम' [ ४ ] प्रसादिक तथा [ ५ ] आन्तर' ॥ २ ९ -३० ॥ त्रिविध रङ्गमण्डप चतुरश्रो विकृष्टश्च रङ्गस्त्र्यश्रश्व कीर्तितः ॥ ३० ॥

रङ्गमण्डप के तीन रूप हैं –[ १ ] चतुरस्र, [ २ ] विकृष्ट एवं [ ३ ] त्र्यत्र ॥ ३० ॥

उपसंहार- एवमेषोऽल्पसूत्रार्थी निर्दिष्टो नाटयसंग्रहः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि सूत्रग्रन्थविकल्पनम् ॥ ३१ ॥

१. ध्रुवा कहते हैं गीत के आधारभूत निर्धारित पदसमूह को (ध्रुवा गीत्या- धारो नियतः पदसमूहः) । ध्रुवा से सम्बन्धित गायन विशिष्ट होने के कारण साधारण संगीत से भिन्न होता है । २. प्रवेशक — पात्रों के मञ्च पर प्रवेश के समय उनकी प्रकृति एवं भावादि का सूचक गायन । ३. आक्षेप - प्रकृत रस से भिन्न रस का आक्षेप करने वाला गायन । ४. निष्काम - मञ्च से निष्क्रमण करते समय गाया जाने वाला गान । ५. प्रासादिक - सामाजिकों के प्रति प्रविष्ट पात्र की आन्तरिक चित्तवृत्ति का सूचक गायन । ६. आन्तर - प्रवेश एवं निष्क्रमण के अन्तराल में ( गीत आदि के समय ) गाया जाने वाला गान । तीन प्रकार का जन स्वभाव- [ उत्तमाधममध्या च प्रकृतिस्त्रिविधा स्मृता । ] बाह्याभ्यन्तरसम्भूतमुपचारद्वयं भवेत् ॥ जन स्वभाव के तीन प्रकार होते हैं - [ १ ] उत्तम, [ २ ] अधम, [ ३ ] मध्यम । और द्विविध उपचार होते हैं: - [ १ ] बाह्य एवं [ २ ] आभ्यन्तर ।

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२२८ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार मैंने संक्षेप में नाट्य के ग्यारह अङ्गों का उल्लेख किया । अब मैं उनके सूत्रादि लक्षण तथा भाष्य आदि परीक्षण को कहूँगा ॥ ३१ ॥

रस निरूपण- तत्र रसानेव तावदादावभिव्याख्यास्यामः । न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते । सबसे पहले हम रसों की ही विशेष व्याख्या करेंगे; क्योंकि रस के बिना अन्य नाट्यांग रूप अर्थ की प्रवृत्ति नहीं होती ( अतः सर्वप्रथम उसका ही निरूपण करना आवश्यक हैं ' ) । रस का लक्षण सूत्र— तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः । उनमें विभाव अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति " होती है । १. अभिनवगुप्त की व्याख्यानुसार रस के विशेष विवरण के लिए निम्न कारण उत्तरदायी हैं- १. रस के बिना विभावादि अर्थ व्याख्येय रूप से बुद्धि में नहीं आ सकते (रसं विना विभावादिरर्थो बुद्धौ व्याख्येयतया न प्रवर्तते ) २. रस के विना नाटक में प्रीतिमय उपदेश नहीं मिल सकता जो कि नाटक का मुख्य प्रयोजन है । [ तं विनार्थः प्रयोजनं प्रीतिपुरस्सरं व्युत्पत्तिमयं न प्रवर्तते ] १३. जो सामाजिक रस का आदर करते हैं व उसकी प्रतीति में आनन्दा- नुभव करते हैं उसे रस से भिन्न भाव आदि अन्य अर्थ स्पष्टतः नहीं समझ में आता क्योंकि विभावानुभाव रूप समस्त अचेतन वर्ग की चित्तवृत्ति से उपकृत जो स्थायीभाव होता है उसी स्थायीभाव नाम की प्रधान चित्तवृत्ति के अर्न्तगत विभावादि वर्ग की प्रतीति होती है । रस के बिना भावादि की प्रतीति न हो सकने से नट तथा सामाजिक सभी के लिए समस्त नाट्याङ्गों में रस ही सबसे महत्त्व- पूर्ण हैं इसलिए सर्वप्रथम उसी का अभिधान किया गया है । २. नाट्यशास्त्र में प्रयुक्त यह निष्पत्ति शब्द अत्यधिक विवादास्पद है । मूलग्रन्थ में एतद्विषयक कोई सुनिश्चित व्याख्या न मिलने के कारण परवर्ती व्याख्याकारों यथा भट्टलोल्लट, श्री शंकुक, भट्टनायक एवं अभिनवगुप्त ने रस सम्बन्धी

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षष्ठोऽध्यायः २२९ विभिन्न धारणाओं का प्रतिपादन किया है । आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी समालो-चनात्मक व्याख्या अभिनवभारती में अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की मान्यताओं का -समीक्षण करते हुए रसविषयक अपनी प्रौढ़ एवं प्रबुद्ध मान्यता का प्रतिपादन अत्यन्त विश्लेषणात्मक रूप में किया है । अभिनवभारती के ही आधार पर रस 'विषयक उन धारणाओं का अध्ययन नीचे किया गया है— भट्टलोल्लट का मत- भट्टलोल्लट कृत व्याख्या के अनुसार रस सूत्र का तात्पर्य यह है कि विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारिभाव के साथ स्थायी भाव के संयोग से ही रस की उत्पत्ति होती हैं । इस प्रक्रिया में स्थायीभाव रूप चित्तवृत्ति की उत्पत्ति में विभाव कारण होते हैं । यहाँ अनुभाव से रसजन्य कटाक्षादि स्वरूप अनुभव का तात्पर्य नहीं है क्योंकि रस के कारणों में उनकी गणना न होकर भावों की गणना होती है । एवं जो व्यभिचारिभाव चित्तवृत्त्यात्मक होने के कारण यद्यपि स्थायीभाव के सहभावी नहीं हो सकते तब भी यहाँ रत्यादि स्थायीभाव के साथ व्यभिचारी भाव क्रमशः वासनात्मक तथा उबुद्ध रूप से रह सकते हैं । भरत ने रस के सम्बन्ध में जो दष्टान्त दिया है उनमें भी नाना व्यञ्जन और मसालों से संस्कृत षाडव रस या पकवान आदि के बीच में किसी की स्थायीभाव के समान वासनात्मक और किसी की व्यभिचारीभाव के समान उद्भूत रूप में स्थिति होती है । अतः विभाव, अनुभाव आदि से परिपुष्ट किए गए स्थायीभाव को ही रस मानना चाहिए । यह परिपुष्ट स्थायीभाव अनुकार्य एवं अनुकार्य दोनों में रहता है । मुख्यरूप से वह अनुकार्य रामादि में तथा गौण रूप से रामादि का अनुकरण करने वाले नट में अनुसन्धान -बल से रहता है । भट्टलोल्लट ने ऐसा लगता है कि सूत्र में आए हुए निष्पत्ति शब्द का अर्थ " उत्पत्ति ” किया है । परन्तु लोल्लट के विवरण से यह स्पष्ट है कि उत्पत्ति का यहाँ लाक्षणिक अर्थ है, नैयायिक का अभाव से भाव का उत्पत्तिरूप नहीं । क्योंकि जिस दृष्टान्त का विवेचन लोल्लट करते हैं उसमें सर्वत्र स्थायी भाव की वासनारूप से अवस्थिति मानी गयी है और इसी वासनात्मक स्थायी के परिपोष, उपचय अर्थात् घनीभूत और व्यक्तरूप को रस कहा गया है । प्राचीन आचार्यों का यही मत है । इसी कारण काव्यादर्श नामक अलंकार ग्रंथ में रसवत् अलंकार का प्रतिपादन करते हुए दण्डी ने कहा है कि “रूप बाहुल्य ( उपचय ) के कारण रति ( नामक स्थायीभाव ) शृंगार ( रस ) बन जाता है " तथा "अधिकतम सीमा पर पहुँचकर क्रोध (नामक स्थायी भाव) रौद्ररस बन जाता है । " (काव्यादर्श २.२८१-२८३ )

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२३० नाट्यशास्त्रम् शंकुक का मत- इस मत के प्रवर्तक श्री शंकुक हैं । उनके प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार विभा-बादि का योग हुए बिना स्थायीभाव का अनुमान करने वाला हेतु नहीं होगा । अतः स्थायीभाव की प्रतीति नहीं हो सकेगी । भरत को रस के पूर्व, न रस के बाद, भाँवों की चर्चा करनी पड़ती जबकि भरत ने रस के पहले ( छठे अध्याय ) और भावों की बाद में [ सातवें अध्याय में ]] चर्चा की है तथा विभावादि के प्रयोग के पहले भी रस की स्थिति सिद्ध होती है । रस की पूर्व सिद्धि होने पर अन्य लक्षणों की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और यदि रत्यादि स्थायीभाव की मात्रा में न्यूना-धिक्य या तारतम्य को सम्भव मानें तो रस में मन्द मन्दतर, मध्यम आदि अनेक भेद मानने पड़ेंगे । हास्यरस में स्थायी के तारतम्य से छः भेदों का विधान किया गया है । उनका भी अभाव मानना पड़ेगा, तथा यदि स्थायी के तारतम्य से रस भेद मानें तो काम की दस दशाओं के अगणित रस भाव मानने पड़ेंगे । शोकादि स्थायीभावों में आरम्भ में शोक अधिक होता है जो क्रमशः मन्द होता जाता है तथा क्रोध, उत्साह एवं रति आदि स्थायी भावों में अमर्ष, स्थैर्य और सेवा आदि पोषक सामग्री के अभाव में अवनति हो जाती है । अतः यह कहना ठीक नहीं कि उपचय के स्थान पर अपचय रूपी विपर्यय के प्राप्त होने के कारण उपचित स्थायी भाक रस होता है । अतः विभावादि हेतुओं तथा अनुभाव आदि कार्यों एवं निर्वेदादि व्यभिचारी भाव रूप सहचारी के द्वारा [ नट के अभ्यासादि ] प्रयत्न से उत्पन्न होने के फलस्वरूप कृत्रिम होने पर भी अकृत्रिम प्रतीत होने वाले कारण, कार्य, सहकारी रूप विभा-वादि के कारण या चिह्न की सामर्थ्य द्वारा अनुकर्त्ता [नट ] में वर्तमान रूप से अनुमान द्वारा ज्ञेय अनुकार्य राम में विद्यमान रहने वाला रत्यादि स्थायीभाव का इसमें अनुकरण स्वरूप होता है । स्थायी भाव का तद्रूप न होकर उसका अनुकरण रूप होने के कारण ही इसका दूसरा नाम 'रस ' है । विभावों का अनुसन्धान काव्य से, अनुभावों का शिक्षा से, एवं व्यभिचारी भावों की प्रतीति अपने कृत्रिम अनुभावों के द्वारा होती है किन्तु स्थायीभाव का अनुसन्धान काव्य के अवगाहन से भी नहीं होता । नाट्य या काव्य में प्रयुक्त रति शोक आदि शब्द रति एवं शोक आदि भावों का ही अभिधान करते हैं पर वाचिक अभिनय के रूप में उनकी प्रतीति नहीं कराते । वाक् या शब्द के प्रयोग का ही नाम वाचिक अभिनय नहीं है अपितु उस वाक् के द्वारा किये जाने वाले अभिनय का नाम वाचिक अभिनय होता है, जैसे अङ्गों

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षष्ठोऽध्यायः २३१ से किए जाने वाले अभिनय का नाम आंगिक अभिनय होता है । अभिगुप्त ने एक श्लोक को उदाहृत करते हुए इस तथ्य को अच्छी तरह प्रकाशित किया है । श्लोक का अर्थ है - 'जैसे अत्यन्त बढ़े, अगाध व अनन्त समुद्र को भी वाडवाग्नि समाहित कर लेता है उसी प्रकार अत्यन्त प्रौढ़ शोक को भी क्रोध समाप्त कर देता है ।' तथा शोक के कारण निश्चेष्ट एवं निरन्तर रुदन करते हुए इस राजा का हृदय विदीर्ण न हो जाए इसलिए मन्त्री उसकी रक्षा के लिए भगवान् से प्रार्थना कर रहे हैं । 'इन दोनों उदाहरणों में शोक अभिनेय न होकर अभिधेय हैं । किन्तु नीचे जो उदाहरण दिया गया है—' चित्र रचना करते समय उसके जो अश्रुबिन्दु चित्र पर गिर पड़े वह ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे कि उसके हाथ के स्पर्श से शरीर पर स्वेद बिन्दु आ गए हों ।' [ रत्नावली २.११ ] इस श्लोक में अभिधार्थ से भिन्न उदयन विषयक सुखात्मक रति स्थायीभाव का अभिनय अभिप्रेत है, मात्र कथन अभिप्रेत नहीं है । अभिधाशक्ति के अतिरिक्त एक अन्य शक्ति अभिनय की है जिससे शब्द अपना अर्थ बोध कराता है । अतः अभिनय से स्थायीभाव का बोध होने से विभावानुभाव आदि के साथ सूत्र में स्थायी भाव का भिन्न विभक्ति में भी प्रयोग नहीं किया गया है । अर्थात् उपचित स्थायीभाव रस नहीं होता अपितु अनुक्रियमाण स्थायीभाव ही रस होता है । इसीलिए अनुक्रिय- माण रति ही शृंगार रस होती है। अतः वह स्थायीभावरूप एवं स्थायीभाव मूलक दोनों होती है [ तेन रतिरनुक्रियमाणा शृंगार इति तदात्मकत्वं तत्प्रभवत्वश्व युक्तम् ] । बौद्ध भी इस मत से सहमत दिखाई पड़ते हैं । धर्मकीर्ति ने अपने प्रमाण- वार्तिक [ २.५७ ] में यह प्रतिपादित किया हैं कि - अर्थं का व्यक्त कराने वाली क्रिया मिथ्या ज्ञान से भी होना सम्भव है । उदाहरणस्वरूप - मणि और दीप की ज्योति को मणि समझकर प्राप्त करने के लिए दो व्यक्तियों में ज्ञान और मिथ्याज्ञान के समान रहने पर भी उनमें अर्थक्रिया [ फलप्राप्ति ] को लेकर अन्तर हो जाता है । शंकुक का वक्तव्य है कि जब भ्रान्तज्ञान भी अर्थक्रिया- कारी हो सकता है तो अनुकरण में रसबोध की क्षमता मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिये । यहाँ पर ऐसी प्रतीति नहीं होती कि केवल नर्तक ही सुखी है और न यही प्रतीति है कि यही राम है, इसके अतिरिक्त यह प्रतीति भी नहीं होती है कि यह सुखी नहीं है अथवा यह राम है या नहीं है । साथ ही ऐसी प्रतीति भी नहीं होती कि यह उसके समान है अपितु सम्यक, मिथ्या, संशय एवं सादृश्य इन सभी प्रतीतियों से विलक्षण अश्व के चित्र में बने हुए ज्ञान की भांति जो सुखी राम है,