भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 431–440

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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३४२ नाट्यशास्त्रम् [ १५ ] जिस दृष्टि में पुतलियां स्थिर न हों, जो देखने में मटकी हुई और व्याकुल सी दिखाई पड़ती हो एवं जिसमें नेत्र विस्फारित तथा उभरे हुए से दिखाई पड़ते हो उसे 'विभ्रान्ता' दृष्टि कहते हैं ॥ ७६ ॥

विप्लुता दृष्टि का लक्षण –

पुटो प्रस्फुरितो यस्य निष्टब्धो पतितो पुनः ।

विप्लुतोद्वृत्ततारा च दृष्टिरेषा तु विप्लुता ॥ ७७ ॥

[ १६ ] जब दोनों पलकें फड़क कर शान्त हो जाए तथा पुतलियां गतिशील हों तो उस दृष्टि की संज्ञा 'विप्लुता' होती है ॥ ७७ ॥

आकेकरा दृष्टि का लक्षण– आकुञ्चितपुटापाङ्गा सङ्गतार्धं निमेषिणी । मुहुर्व्यावृत्ततारा च दष्टिराकेकरा स्मृता ॥ ७८ ॥

[ १७ ] 'आकेकरा' दृष्टि में पलके एवं अपांग कुछ सिकुड़े हुए तथा मुदे हुए से होते हैं, आँख आधी झपी रहती है व पुतलियाँ बार बार घूम रही होत हैं ॥ ७८ ॥

विकोशा दृष्टि का लक्षण –

विकोशितोभयपुटा प्रोत्फुल्ला चानिमेषिणी ।

अनवस्थिततारा च विकोशा दृष्टिरिष्यते ॥ ७९ ॥

[ १८ ] जब दोनों पलके बिल्कुल न झपक रही हों, एवं पुतलियाँ गतिशील हों तो उसे ' विकोशा' दृष्टि कहा जाता है ॥ ७९ ॥

त्रस्ता दृष्टि का लक्षण- त्रासोद्वृत्तपुटा या तु तथोत्कम्पिततारका ।

संत्रासोत्फुल्लमध्या च त्रस्ता दृष्टिरुदाहृता ॥ ८० ॥

[ १ ९ ] भयवश पलकें जब ऊपर की ओर उघड़ी हों, पुतलियाँ काँप रही हो एवं पीड़ा के कारण आंखों का मध्यभाग खुल गया हो तो उसे 'त्रस्ता' दृष्टि कहते हैं ॥ ८० ॥

मदिरा दृष्टि का लक्षण- आघूर्णमानमध्या या क्षामान्ताञ्चितलोचना ।

दृष्टिविकसितापाङ्गा मदिरा तरुणे मदे ॥। ८१ ॥

[ २० ] जब आखों का मध्यभाग चक्कर खा रहा हो, आँखें बिल्कुल सिकुड़ गई हों एवं नेत्रों के कोर बिल्कुल खुले हुए हों तो उसे ' मदिरा' दृष्टि कहते हैं ।

पृष्ठ 432

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अष्टमोऽध्यायः ३४३ इसका उपयोग मद्यपान की प्रारम्भिक अवस्था के प्रदर्शनार्थं किया जाता है ॥ ८१ ॥

मध्यमद वाली मंदिरा दृष्टि का लक्षण- किञ्चिदाकुञ्चितपुटा किञ्चिल्लुलिततारका ।

अनवस्थितसञ्चारा दष्टिर्मध्यमदे भवेत् ॥ ८२ ॥

मद्यपान की मध्यावस्था का प्रदर्शन करने के लिए पलकें कुछ सिकुड़ी हुई रहती हैं, पुतलियाँ चंचल रहती हैं तथा निगाह भी अस्थिर रहती है ॥ ८२ ॥

अधम मद वाली मदिरा दृष्टि का लक्षण - सनिमेषाऽनिमेषा च किञ्चिद्दर्शिततारका ।

अघोभागचरी दृष्टिरधमे तु मदे स्मृता ॥ ८३ ॥

मद्यपान की चरमावस्था में या तो पलकें बहुत ही जल्दी झपकती हैं या एकदम स्थिर रहती हैं तथा पुतलियाँ भी बहुत कम दृश्य होती हैं एवं दृष्टि नीचे की ओर झुकी रहती है ॥ ८३ ॥

छत्तीस दृष्टि चेष्टाओं का उपसंहार- इत्येवं लक्षिता ह्येषा षट्त्रिंशद्द् ष्टयो मया । रसजा भावजाश्चासां विनियोगं निबोधत ॥ ८४ ॥

इन छत्तीस रसज एवं भावज दृष्टियों का मैंने वर्णन किया । अब इनके •प्रयोग प्रसंग के विषय में ज्ञान प्राप्त करें ॥ ८४ ॥

रसजास्तु रसेष्वेव स्थायिषु स्थायिदष्टयः ।

शृणुत व्यभिचारिण्यः सञ्चारिषु यथास्थिताः ॥ ८५ ॥

रसावस्था में इन रस दृष्टियों का, स्थायीभाव के प्रसंग में स्थायी दृष्टियों का तथा सञ्चारी भावों के प्रसंग में व्यभिचारी दृष्टियों को मैंने बतलाया ॥ ८५ ॥

सञ्चारी भाव सम्बन्धी बीस दृष्टि एवं चेष्टाओं का विनियोग- शून्या दृष्टिस्तु चिन्तायामभितप्तापि कीर्तिता । निर्वेदे चापि मलिना वैवर्ण्ये च विधीयते ॥ ८६ ॥

श्रान्ता श्रमार्त्ते स्वेदे च लज्जायां ललिता तथा ।

अपस्मारे तथा व्याधौ ग्लान्यां ग्लाना विधीयते ॥ ८७ ॥

शङ्कायां शङ्किता ज्ञेया विषादार्थे विषादिनी ।

निद्रास्वप्नसुखार्थेषु मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ८८ ॥

शून्या दृष्टि का प्रयोग चिन्ता एवं परेशानी में, मलिना दृष्टि का प्रयोग निर्वेद एवं रंग के फीके पड़ने में, श्रान्ता का थकावट एवं पसीना बहने में, लज्जान्विता

पृष्ठ 433

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३४४ नाट्यशास्त्रम् दृष्टि का शर्म में, ग्लाना का अपस्मार, बीमारी तथा खिसियाहट में, शंकिता दृष्टि का जिज्ञासा, में विषादिनी का शोक में, मुकुला का नींद, स्वप्न, देखने एवं सुखानु- भूति में प्रयोग किया जाता है ॥ ८६-८८ ॥ । कुञ्चितासूयिता निष्टदुष्प्रेक्षाक्षिव्यथासु च अभितप्ता च निर्वेदे ह्यभिघाताभितापयोः ॥ ८ ९ ॥

जिह्मा दृष्टिरसूयायां जडतालस्ययोस्तथा ।

धृतौ हर्षे सललिता स्मृतौ तके वितर्किता ॥ ९ ० ॥

। आह्लादिष्वर्धमुकुला गन्धस्पर्शसुखादिषु ॥ ९ १ ॥ विभ्रान्ता दष्टिरावेगे संभ्रमे विभ्रमे तथा । विप्लुता चपलोन्माददुःखात्तिमरणादिषु ॥ ९ २ ॥ आकेकरा दुरालोके विच्छेदप्रोक्षितेषु च । विबोधगर्वामषग्रयमतिषु स्याद्विकोशिता ॥ ९ ३ ॥ त्रस्ता त्रासे भवेद्द् ष्टिः मदिरा च मदेष्विति 'कुचिता' दृष्टि का प्रयोग डाह, न देखे जा सकने वाले या कठिनता से देखे जाने वाले पदार्थ का दर्शन एवं आँख की पीड़ा में, ' अभितप्ता' का प्रयोग तटस्थता, चोट आदि एवं ज्वरादिजन्य ताप आदि में, 'जिह्मा ' दृष्टि का प्रयोग ईर्ष्या एवं जड़ता तथा आलस्य में, 'ललिता' दृष्टि का प्रयोग धैर्यं एवं आनन्द में, ' वितर्किता' का स्मरण एवं तर्क में, ' अर्धमुकुला' का सुगन्ध एवं स्पर्शजन्य आनन्दानुभूति में 'विप्लुता' का चंचलता, पागलपन, कष्टाधिक्य एवं मृत्यु आदि के समय, 'आकेकरा' दृष्टि का सूदूरस्थित वस्तु को देखने, वियोग एवं गौर से देखने, 'विकोशिता' का जागने, अभिमान, अमर्ष, एवं क्रोध में, ' त्रस्ता' दृष्टि का भय में एवं ' मदिरा' दृष्टि का प्रयोग मद्यपान के प्रसंग में किया जाता है ॥ ८ ९ - ९ ३ ॥

दृष्टि चेष्टाओं का उपसंहार - षट्त्रिंशं ष्टयो ह्येता यथावत्समुदाहृताः ।

रसजानां तु दृष्टीनां भावजानां तथैव च ॥ ९४ ॥

तारापुटभ्रुवां कर्म गदतो मे निबोधत । इस प्रकार मैंने छत्तीस प्रकार की दृष्टियों का वर्णन किया है । अब आप लोग रसों एवं भावों के आधार पर पुतलियों, बरौनियों एवं भवों के संचालन को सुनिए ॥ ९ ४- ९ ५ ॥ पुतलियों की नो चेष्टाओं के नाम- भ्रमणं वलनं पातश्चलनं संप्रवेशनम् ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 434

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अष्टमोऽध्यायः ३४५ विवर्त्तनं समुद्वृत्तं निष्क्रामः प्राकृतं तथा । [ एतानि नवकर्माणि ताराकर्म द्विजोत्तमाः । शृणुध्वं लक्षणं तावत्सांप्रतं प्रीतितः स्फुटम् ॥ ] ( १ ) भ्रमण, ( २ ) वलन, ( ३ ) पातन, ( ४ ) चलन, ( ५) सम्प्रवेशन, ( ६ ) विवर्तन, (७ ) समुवृर्त्तन, ( ८ ) निष्क्राम, ( ९ ) प्राकृत, ( यह नौ प्रकार पुतलियों के सञ्चालन के हैं । अब उनके एक एक के लक्षण आप लोग सुनिए) ॥ ९ ५- ९ ६ ॥ पुतलियों की नौ चेष्टाओं के लक्षण- पुटान्तर्मण्डलावृत्तिस्तारयोर्भ्रमणं स्मृतम् ॥ ९ ६ ॥ वलनं गमनं त्र्यश्रं पातनं स्रस्तता तथा । चलनं कम्पनं ज्ञेयः प्रवेशोऽन्तः प्रवेशनम् ॥ ९ ७ ॥

विवर्तनं कटाक्षस्तु समुद्वृत्तं समुन्नतिः ।

निष्क्रामो निर्गमः प्रोक्तः प्राकृतं तु स्वभावजम् ॥ ९ ४ ॥

दोनों पलकों के मध्यगत भाग में पुतलियों को घुमाने की संज्ञा ' भ्रमण ' है । पुतलियों को तिरछे चलाना ' वलन', दलकाना 'पातन', कंपाना 'चलन', पुतलियों को (पलकों के अन्दर ले जाना 'अन्तः प्रवेशन', तिरछे देखना (कटाक्षपात करना ) 'विवर्तन', ऊपर चढ़ाना 'समुद्वर्तन ', पुतलियों को बाहर की ओर निकालना 'निष्क्रा-मण' एवं सामान्य अवस्था में रखना 'प्राकृत ' संचालन कहा जाता है ॥ ९ ६ -९ ८ ॥ पुतलियोंकी नौ चेष्टाओं का विनियोग - । अथैषां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ॥ ९९ ॥ भ्रमणं वलनोद्वृत्ते निष्क्रामो वीररौद्रयोः

। निष्क्रामणं सचलनं कर्तव्यं हि भयानके ॥ १०० ॥ हास्य बीभत्सयोश्चापि प्रवेशनमिहेष्यते । पातनं करुणे कार्यं निष्क्रामणमथाद्भुते

॥ १०१ ॥ प्राकृतं शेषभावेषु शृङ्गारे च विवर्ततम्

अब आप लोग विभिन्न रसों एवं भावों के संन्दर्भ में इनके प्रयोग को जानिए- भ्रमण, वलन एवं उद्वृत्त [ समुद्वर्तन ] का प्रयोग वीर एवं रौद्ररस में किया जाता है तथा निष्क्रमण एवं वलन का प्रयोग भयानक रस में किया जाता है । प्रवेशन का प्रयोग हास्य तथा वीभत्स रस के सन्दर्भ में होता है । पातन का प्रयोग करुण रस में, निष्क्रमण का अद्भुत रस में, विवर्तन का श्रृंगार रस में तथा अन्य शेष सभी रसों के सन्दर्भ में 'प्राकृत ' तारापुटों का प्रयोग किया जाता. है ॥ ९९ -१०१ ॥

पृष्ठ 435

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३४६ नाट्यशास्त्रम् स्वभावसिद्धमेवैतत्कर्म लोकक्रियाश्रयम् । एवं रसेषु भावेषु ताराकर्माणि योजयेत् ॥ १०२ ॥

पुतलियों का यह संचालन स्वाभाविक तथा सामाजिक व्यवहार के ऊपर आश्रित है । इसका प्रयोग रसों तथा भावों के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए ॥ १०२ ॥

दृष्टि के आठ प्रकारों के नाम- अथात्रैव प्रवक्ष्यामि प्रकारान् दर्शनस्य तु । ह्यालोकितविलोकिते ॥ १०३ ॥ समं साच्यनुवृत्ते च

प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च । अब मैं दृष्टि के प्रकारों के विषय में बतलाऊँगा जो अष्टविध हैं । इनके नाम हैं ( १ ) सम, ( २ ) साची, ( ३ ) अनुवृत्त, ( ४ ) आलोकित, ( ५ ) विलोकित, ( ६ ) प्रलोक्ति, (७ ) उल्ल्ोक्ति, एवं ( ८ ) अवलोकित ॥ १०३-१०४ ॥ दृष्टि के आठ प्रकारों के लक्षण- समतारञ्च सौम्यश्च यद् दृष्टं तत्समं स्मृतम् ॥ १०४ ॥

पक्ष्मान्तर्गततारं यत्त्र्यश्रं साचीकृतं तु तत् । रूपनिर्वर्णनायुक्तमनुवृत्त मिति स्मृतम् ॥ १०५ ॥ " ' सहसादर्शनंविलोकितं पृष्ठतस्तु पादर्वाभ्यांयत्स्यात्तदालोकितमुच्यतेतु प्रलोकितम् ॥। १०६ ॥ • ऊर्ध्व मुल्लोकितं ज्ञेयमवलोकितमप्यधः । इत्येष दर्शनविधिः सर्वभावरसाश्रयः ॥ १०७ ॥

( १ ) सम — जब पुतलियाँ समान स्थिति तथा शान्त रूप में हों तो उसे ' सम ' दृष्टि कहते हैं । (२ ) साची- जब पुतलियों पर पलके, बरौनियां झुकी हों तथा नजरें तिरछी हों तो उसे 'साची' दृष्टि कहते हैं । ( ३ ) अनुवृत्त - किसी वस्तु को गौर से देखने वाली दृष्टि का नाम ' अनुवृत्त ' दृष्टि होता है । (४) आलोकित — जब अचानक कोई चीज पर दृष्टि पड़ती है तो उसे " अलोकित ' कहते हैं । (५ ) विलोषित - पीछे की ओर देखने को 'विलोक्ति' दृष्टि कहा जाता है । ( ६ ) प्रलोक्ति- पार्श्व में देखने [ कटाक्षपात ] को 'प्रलोकित ' दृष्टि कहते हैं । (७ ) उल्लोकित- ऊपर की ओर दृष्टिपात करने को ' उल्लोकित' दृष्टि कहते हैं ।

पृष्ठ 436

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अष्टमोऽध्यायः ३४७ ( ८) अवलोकित - इस दृष्टि में नीचे की ओर देखा जाता है । दृष्टि के यह प्रकार समस्त रसों एवं भावों से सम्बन्धित ॥ १०४-१०७ ॥ पलकों की नो चेष्टाओं के नाम तथा लक्षण- तारागतोऽस्यानुगतं कर्म निबोधत । उन्मेषश्च निमेषश्च प्रसृतं कुञ्चितं समम् ॥ १०८ ॥

विवर्तितं स स्फुरितं पिहितं सविताडितम् ।

विश्लेषः पुटयोर्यस्तु स उन्मेषः प्रकीर्तितः ॥ १० ९ ॥

समागमो निमेषः स्यादायामः प्रसृतं भवेत् ।

आकुञ्चितं कुञ्चितं स्यात्समं स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ११० ॥

विवर्त्तितं समुद्वृत्तं स्फुरितं स्पन्दितं तथा ।

स्थगितं पिहितं प्रोक्तमाहतं तु विताडितम् ॥ १११ ॥

आँख की पुतलियों का अनुसरण करने वाली पलकों की गति के विषय में अब आप जानिए । पलकों की विभिन्न गतियों के यह नाम हैं- ( १ ) उन्मेष, (२ ) निमेष, ( ३) प्रसृत, ( ४ ) कुञ्चित, ( ५ ) सम, ( ६ ) विवर्तित, (७ ) स्फुरित,. (८ ) पिहित एवं ( ९) वितालित । ( १ ) उन्मेष:- पलकों का खुलना 'उन्मेष ' है । (२ ) निमेष:-पलकों का जुड़ना [ बंद कर लेना ] 'निमेष' होता है । (३ ) प्रसृत: - पलकों का खूब फैलाना 'प्रसृत' होता है । (४ ) कुश्चित:- पलकों को सिकोड़ने को 'कुञ्चित' कहते हैं । (५ ) सम:- पलकों को स्वाभाविक अवस्था में रखना ' सम ' है । ( ६ ) विवर्तित: पलकों का उठाना ' विवर्तित' होता है । (७) स्फुरित: - पलकों का फड़कना ' स्फुरित ' कहा जाता है । (८) पिहित: पलकों का निश्चेष्ट हो जाना [ पलकें मूँदना ] 'पिहित"" माना जाता है । (९ ) वितालितः - [ आघात आदि के भय से ] पलकों के अचानक बन्द होने का नाम 'वितालित ' होता है ॥ १०८१११ ॥

पलकों की नो चेष्टाओं का विनियोग - अथैषां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।

क्रोधे विवर्तितं कार्यं निमेषोन्मेषणैः सह ॥ ११२ ॥

विस्मयार्थे च हर्षे च वीरे च प्रसृतं स्मृतम् ।

अनिष्टदर्शने गन्धे रसे स्पर्शे च कुञ्चितम् ॥ ११३ ॥

पृष्ठ 437

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३४८ नाट्यशास्त्रम्

शृङ्गारे च समं कार्यमीर्ष्यासु स्फुरितं तथा ।

सुप्तमूर्छितवातोष्ण धूमवर्षाञ्जनात्तिषु ॥ ११४ ॥

नेत्ररोगे च पिहितमभिघाते विताडितम् । अब आप लोग रस तथा भावों के सन्दर्भ में पलकों की गति के विषय में जानिए- विवर्तित, निमेष एवं उन्मेष का प्रयोग क्रोध में, प्रसृत का प्रयोग विस्मय, हर्ष तथा वीर रस के प्रसंग में, कुवित का प्रयोग अप्रिय वस्तु को देखने, सूँघने, चखने या छूने के समय, सम का प्रयोग रति में, स्फुरित का प्रयोग द्वेष के प्रसंग में, पिहित का प्रयोग सोने, व बेहोशी में एवं लू 'धुआं, बारिश व अंजन आदि से उत्पन्न कष्ट तथा आँख के रोग के प्रदर्शन में, और वितालित का प्रयोग अकस्मात् चोट लगने के प्रसंग में किया जाता है ॥ ११२-११५ ॥ भौंहों की सात चेष्टाओं के नाम- इत्येषु रसभावेषु तारकापुटयोविधिः ॥ ११५ ॥ कार्यानुगतमस्यैव ध्रुवोः कर्म निबोधत ।

रस व भावों के प्रसंग में पुतलियों एवं पलकों की इन गतियों का प्रयोग किया जाता है । इसी का अनुसरण करने वाली भवों की क्रियाओं के विषय में - अब जानों ॥ ११५-११६ ॥ भौंहों की सात चेष्टाओं के लक्षण- उत्क्षेपः पातनं चैव भ्रुकुटी चतुरं तथा ॥। ११६ ॥ कुञ्चितं रेचितं चैव सहजं चेति सप्तधा । भवों की गति सात प्रकार की होती है- ( १ ) उत्क्षेप, ( २ ) पातन, ( ३ ) भ्रकुटी (४) चतुर, ( ५ ) कुञ्चित; ( ६ ) रेचित, एवं ( ७ ) सहज ॥ ११६-११७ ॥ भ्रुवोरुन्नतिरुत्क्षेपः सममेकैकशोऽपि वा ॥ ११७ ॥ अनेनैव क्रमेणैव पातनं स्यादधोमुखम् ।

दोनों भवों को एक साथ अथवा एक एक करके उठाने को 'उत्क्षेप' कहते हैं । भवों को एक साथ या एक एक करके नीचे झुकाना 'पातन' कहा जाता है ॥ ११७-११८भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपाद्॥ भ्रुकुटी परिकीर्तिता ॥ ११८ ॥

चतुरं किञ्चिदुच्छ्वासान्मधुरायतता भ्रुवोः । भवों के मूलभाग को काफी ऊपर तक उठाने का नाम ' कुटी' है । भवों को -मृदुलता से ऊपर उठाकर फैलाना ' चतुर' कहा जाता है ॥ ११८-११९ ॥

पृष्ठ 438

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अष्टमोऽध्यायः ३४९ एकस्या हि द्वयोर्वापि मृदुभङ्गस्तु कुञ्चितम् ॥ ११ ९ ॥ एकस्या एव ललितादुत्क्षेपाद्रेचितं ध्रुवः । एक अथवा दोनों भवों को धीरे से नीचे गिराने की संज्ञा 'कुञ्चित' है । एक ही भौं को लीलापूर्वक उठाने को 'रेचित' कहा जाता है ॥ ११ ९ -१२० ॥ सहजातं तु संप्रवक्ष्यामिसहजं कर्म स्वाभाविकंरसभावप्रयोजनम्स्मृतम् ॥। १२० ॥ प्राकृतिक सहज रूप में भवों के रहने पर उन्हें ' सहज' कहा जाता है । अब मैं रस एवं भावों के प्रसंग में इनका प्रयोजन बतलाऊँगा ॥ १२०-१२१ ॥ भौंहों की सात चेष्टाओं के विनियोग- कोपे वितर्के हेलायां लीलादौ सहजे तथा ॥ १२१ ॥

दर्शने श्रवणे चैव ध्रुवमेकां समुत्क्षिपेत् ।

उत्क्षेपो विस्मये हर्षे रोषे चैव द्वयोरपि ॥ १२२ ॥

( १ ) उत्क्षेप: क्रोध, तर्क, क्रीडा, विलास एवं स्वाभाविक अवस्था में तथा देखने एवं सुनने के समय भौं को उठाना चाहिए । आश्चर्य प्रसन्नता व क्रोध में दोनों भवों को उठाना चाहिए ॥ १२१-१२२ ॥

असूयिते जुगुप्सायां हासे घ्राणे च पातनम् ।

क्रोधस्थानेषु दीप्तेषु योजयेद् भ्रुकुटीं बुधः ॥ १२३ ॥

(२ ) पातन: डाह, जुगुप्सा, हास्य एवं सूंघने का अभिनय करते समय पातन" का प्रयोग किया जाता है । ( ३ ) भ्रकुटी: क्रोध एवं चमक लगने के अवसर पर भ्रकुटी का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ १२३ ॥

शृङ्गारे ललिते सौम्ये सुखस्पर्शे प्रबोधने ।

एवं विधेषु भावेषु चतुरं तु प्रयोजयेत् ॥ १२४ ॥

[ स्त्रीपुरुषयोश्च संलापे नानावस्थान्तरात्मके । ] ( ४ ) चतुर: रति, लीला, सुख एवं सुखदायी स्पर्श तथा जगाने आदि भावों के सन्दर्भ में चतुर का प्रयोग करना चाहिए ॥ १२४ ॥

[विविध परिस्थितियों में नायक नायिका के संवाद में भी इसका प्रयोग करना चाहिए । ]

मोट्टायिते कुट्टमिते तथा च किलकिञ्चिते ।

निकुञ्चितं च कर्तव्यं नृत्ते योज्यं तु रेचितम् ॥ १२५ ॥

पृष्ठ 439

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-३५० नाट्यशास्त्रम् अनाविद्धेषु भावेषु कुर्यात्स्वाभाविकं तथा । ( ५ ) कुञ्चित: मोट्टायित एवं कुट्टमित ' दशाओं में कुवित का प्रयोग

होता है ।

( ६ ) रेचित: इसका प्रयोग नृत्य के अवसर पर होता है ॥ १२५ ॥

( ७ ) सहज: साधारण अवस्थाओं में सहज भ्रूक्षेप का प्रयोग किया जाता है ।

इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं नासाकर्म निबोधत ॥ १२६ ॥

भ्रूसंचालन के विषय में इस चर्चा के बाद अब आप लोग नासिका के कार्यों के

विषय में जानिए ॥। १२६ ॥

नासिका की चेष्टाओं के छः भेदों के नाम- नता मन्दा विकृष्टा च सोच्छ्वासाथ विकूणिता । स्वाभाविका चेति बुधैः षड्विधानासिका स्मृता ॥ १२७ ॥

मुद्रा के भेद से नासिका के छः प्रकार होते हैं, जिनके नाम हैं- ( १ ) नता, एवं ( ६ ) स्वा- ( २) मन्दा, ( ३ ) विकृष्टा, ( ४ ) सोच्छ्वासा, ( ५ ) विकूणिता -भाविका ॥ १२७ ॥

नासिका की छः चेष्टाओं के लक्षण- नता मुहुः श्लिष्टपुटा मन्दा तु निभृता स्मृता ।

विकृष्टा फुल्लितपुटा सोच्छ्वासाकृष्टमारुता ॥ १२८ ॥

विकूणिता संकुचिता समा स्वाभाविकी स्मृता ॥। १२ ९ ॥ नासिकालक्षणं हयेतद्विनियोगं निबोधत जब दोनों नथुने चिपके रहते हैं तो 'नता' नासिका होती है । नथुनों के स्वाभाविक मुद्रा'में रहने पर 'मन्दा' नासिका एवं नथुने फुला लेने पर ' विकृष्टा' नासिका कही जाती है । साँस अन्दर खींचने पर नासिका को 'सोच्छ्वासा ' कहते हैं । नाक सिकोड़ने पर ' विकूणता' एवं स्वाभाविक अवस्था में रहने पर 'समा' नासिकानासिकामानी केजातीयहहैलक्षण। हैं । अब इनके उपयोग के विषय में जानिए ॥ १२८-१२९ ॥ नता नासिका का विनियोग- मदोत्कम्पसमायुक्तेनिःश्वासे च नता कार्या नासिकानारीणामनुरोधनेनाट्ययोक्तृभिः॥। १३० ॥ १. प्रेम प्रदर्शन की विधाओं का एक रूप मोट्टायित एवं कुट्टमित भी है । इसके अन्तर्गत अनुभव के प्रिय लगने पर भी अस्वीकृति प्रदर्शित करना आता है ।

पृष्ठ 440

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अष्टमोऽध्यायः ३५१ मद्यपानजन्य कम्पन एवं स्त्रियों के अनुरोध के समय तथा उच्छ्वास लेते समय नाट्य प्रयोक्ताओं को 'नता' नासिका का प्रयोग करवाना चाहिए ॥ १३० ॥

मन्दा तथा विकृष्टा नासिका का विनियोग- निर्वेदौत्सुक्यचिन्तासु मन्दा शोके च योजयेत् । तीव्रगन्धे विकृष्टां तां रौद्रे वीरे तथैव च' ॥ १३१ ॥

निर्वेद, उत्सुकता एवं चिन्ता तथा शोक के अवसर पर मन्दा नासिका का का प्रयोग होना चाहिये । तेज गन्ध के अनुभव तथा रौद्र एवं वीर रस के प्रसंग में विकृष्टा नासिका का प्रयोग करना चाहिए ॥ १३१ ॥

सोच्छ्वासा, विकूणित तथा स्वाभाविकी नासा का विनियोग- इष्टघ्राणे तथोच्छ्वासे दीर्घोच्छ्वासां प्रयोजयेत्' । विकूणिता च कर्त्तव्या जुगुप्सासूयितादिषु ॥ १३२ ॥ ६४

कार्या शेषेषु भावेषु तज्ज्ञ: स्वाभाविका तथा । सुगन्धि की अनुभूति तथा दीर्घश्वास लेते समय 'सोच्छ्वासा' नासिका का प्रयोग 'होना चाहिये । जुगुप्सा तथा असूया आदि भावों में ' विकूणिता' नासिका का प्रयोग होता है । बाकी बची समस्त अवस्थाओं में 'स्वाभाविका' नासिका का प्रयोग होना चाहिए ॥ १३२-१३३ ॥ कपोलों की छः चेष्टाओं के नाम- क्षामं फुल्लं च घूर्णं च कम्पितं कुश्चितं समम् ॥ १३३ ॥

षड्विधं गण्डमुद्दिष्टमस्य लक्षणमुच्यते । ( १ ) क्षाम, ( २ ) फुल्ल, ( ३ ) घूर्णं, ( ४ ) कम्पित, ( ५ ) कुचित एवं ( ६ ) सम-यह छः प्रकार के कपोल कहे गये हैं । इनके लक्षण आगे कहे जायेंगे ॥ १३३-१३४॥ कपोलों की छः चेष्टाओं के लक्षण- क्षामं चावनतं ज्ञेयं फुल्लं विकसितं भवेत् ॥ १३४ ॥

विततं घूर्णमत्रोक्तं कम्पितं स्फुरितं भवेत् ।

स्यात्कुञ्चितं संकुचित समं प्राकृतमुच्यते ॥ १३५ ॥

पिचके हुए गालों को 'क्षाम', फूले हुए गालों को 'फुल्ल', फैले हुए गालों को १. 'विकृष्टा तीव्रगन्धे च श्वासरोषभयातिषु' – इति काशी संस्करणे पाठः । २. 'सोच्छ्वासा मधुरे गन्धे दीर्घोच्छ्वासकृतेषु च' - काशी संस्करणे पाठः । ३. पाठान्तर का अर्थ होगा- तीव्रगन्ध, श्वास, रोष, भय, तथा पीड़ा में विकृष्टा की, मीठी सुगन्ध ( इष्ट मन्ध ) दीर्घश्वास तथा उसाँस में 'सोच्छ्वास' की (योजना करनी चाहिए) ।