भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 491–500

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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४०० नाट्यशास्त्रम् १ - "छिन्ना" चेष्टा का प्रयोग व्यायाम, शीघ्रता तथा चारों ओर देखने में किया जाता है । २- " निवृत्ता " चेष्टा द्वारा चारों ओर घूमने का अभिनय किया जाता है । ३- " रेचित " कटि का प्रयोग भ्रमण इत्यादि में किया जाता है । ४ - प्रकम्पिता कटि चेष्टा के द्वारा कुबड़ों, बौनों तथा अधम स्तर के लोगों की जाति का प्रदर्शन किया जाता है । ५ - " उद्वाहिता" चेष्टा से मोटे लोगों एवं स्त्रियों की विलास गति का अभिनय किया जाता है ॥ २४८-२५० ॥ ऊरु चेष्टाओं के पांच भेदों के नाम- कम्पनं वलनं चैव स्तम्भनोद्वर्तने तथा ॥ २५० ॥

विवर्तनश्च पञ्चैतान्यूरुकर्माणि कारयेत् । १-कम्पन २ वलन ३ स्तम्भन ४-उद्वर्तन ५ विवर्तन - ये पाँच ऊरु सम्बन्धी चेष्टाओं के नाम हैं ॥ २५०-२५१ ॥ १. कम्पन ऊरुचेष्टा का लक्षण- नमनोन्नमनात्पार्णैर्मुहुः स्याद्वरुकम्पनम् ॥ २५१ ॥ बार बार एड़ी के झुकाने एवं उठाने से ऊरु भाग का "कम्पन

होता है ॥ २५१ ॥

२. बलन ऊरुचेष्टा का लक्षण - गच्छेदभ्यन्तरं जानु यत्तु तद्वलनं स्मृतम् ।

घुटने को भीतर की ओर मोड़ने से उसका "वलन " होता है ॥ २५२ ॥

३. स्तम्भन ऊरुचेष्टा का लक्षण- स्तम्भनं चात्र विज्ञ यमपविद्धक्रियात्मकम् ॥ २५२ ॥

घुटने को भीतर की ओर मोड़कर फिर बाहर की मोड़ना " उद्वर्तन " कहलाता है ॥ २५३ ॥

४. उद्वर्तन ऊरुचेष्टा का लक्षण- वलिताविद्धकरणादुद्वर्तन मितीरितम् 1 घुटने को भीतर की ओर मोड़कर फिर बाहर की ओर मोड़ना "उद्वर्तन " कहलाता है ॥ २५३ ॥

५. निवर्तन उरुचेष्टा का लक्षण- पाष्णिरभ्यन्तरं गच्छेद् यत्र तत्तु निवर्तनम् ॥ २५३ ॥

एड़ी भीतर की ओर मोड़ लेने को "निबर्तन " कहते हैं ॥ २५३ ॥

पृष्ठ 492

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नवमोऽध्यायः ४०१ १. कम्पन उरुचेष्टा का विनियोग- गतिष्वधमपात्राणां भये चापि हि कम्पनम् । अधम पात्रों की गति तथा भय में कम्पन नामक ऊरूचेष्टा का अभिनय करना चाहिए । २. वलन ऊरुचेष्टा का विनियोग— वलनं चैव कर्त्तव्यं स्त्रीणां स्वैरपरिक्रमे ॥ २५४ ॥

स्त्रियों की स्वच्छन्द गति का प्रदर्शन करते समय वलन नामक ऊरूचेष्टा का अभिनय करना चाहिए ॥ २५४ ॥

३. स्तम्भन ऊरूचेष्टा का विनियोग-- साध्वसे च विषादे च स्तम्भनं सम्प्रयोजयेत् । भय तथा विषाद भाव के प्रदर्शन के अवसर पर स्तम्भन नाम ऊरूचेष्टा का अभिनय करना चाहिए । ४. उद्वर्तन ऊरूचेष्टा का विनियोग- व्यायामे ताण्डवे चैव कार्य मुद्वर्तनं बुधैः ॥। २५५ ॥ व्यायाम तथा ताण्डव नृत्य के अवसर पर उद्वर्तन नामक ऊरु चेष्टा का अभिनव करना चाहिए ॥ २५५ ॥

५. विवर्तन उरू चेष्टा का विनियोग- विवर्तन कर्तव्यं सम्भ्रमादि परिक्रमे ।

यथादर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्य प्रयोक्तृभिः ॥ २५६ ॥

आदर पूर्वक परिक्रमा आदि क्रियाओं के अवसर पर विवर्तन नामक ऊरु चेष्टा का अभिनय करना चाहिए । इसके अतिरिक्त अन्य चेष्टाओं को लौकिक व्यवहार के अनुसार नाट्य प्रयोक्ताओं को ग्रहण करना चाहिए ॥ २५६ ॥

६. जंघा की पाँच चेष्टाओं के नाम - इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घयोस्तु निबोधत ।

आवर्तितं नतं क्षिप्तमुद्वाहितमथापि वा ॥ २५७ ॥

परिवृत्त तथा चैव जङ्घाकर्माणि पञ्चधा । इस प्रकार ऊरुओं की चेष्टाओं के लक्षणों का वर्णन किया गया अब जंघाओं की चेष्टाओं के लक्षणों का वर्णन करते हैं । ना० २६

पृष्ठ 493

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४०२ नाट्यशास्त्रम् ( १ ) आवर्तित ( २ ) नत ( ३ ) क्षिप्त ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) परिवृत्त -ये जंबाओं की पांच चेष्टायें हैं ॥ २५७-२५८ ॥ १. आवर्तित जंधा चेष्टा का लक्षण- वामो दक्षिणपार्श्वेन दक्षिणाच्चापि वामतः ॥ २५८ ॥

। पादो यत्र व्रजेद्विप्रास्तदावर्तित मुच्यते बायाँ पैर दाहिने पाश्र्व की ओर तथा दाहिना पैर बाएँ पार्श्व की ओर ले जाने को आवर्तित जंघा चेष्टा कहते हैं ॥ २५८-२५९ ॥ ॥ २५ ९ ॥ जङ्घास्वस्तिकयोगेन क्रमादावर्तितं नयेत् ( जंघाओं को स्वस्तिक आकार में करने पर आवर्तित नामक जंघा चेष्टा निष्पन्न होती है ॥ २५ ९ ॥ ) २. नत जंघा चेष्टा का लक्षण- जाननुः कुञ्चनाच्चैव नतं ज्ञेयं प्रयोक्तृभिः । घुटने के भीतर सिकोड़ लेने पर नत नामक जंघा चेष्टा निष्पन्न होती है । ३. क्षिप्त जंघा चेष्टा का लक्षण- विक्षेपाच्चापि जङ्घायाः क्षिप्तमित्यभिधीयते ॥ २६० ॥

नवं स्याज्जानुनमनात्क्षिप्तं विक्षेपणाद्बहिः । जंघा के विक्षेप ( बाहर की ओर फेंकने ) से क्षिप्त नामक जंघा चेष्टा निष्पन्न होती है । घुटने के भीतर सिकोड़ने से नत तथा बाहर की ओर फेंकने से क्षिप्त नामक बंधा चेष्टा निष्पन्न होती है ॥ २६०-२६१ ॥ ४. उवाहित जंघा चेष्टा का लक्षण- उद्वाहितं ॥ २६१ ॥ च विज्ञयमूर्ध्वमुद्वाहनादिह

जंघा को ऊपर की ओर उठाने से उद्वाहित नामक चेष्टा flore होती है ॥ २६१ ॥

५. परिवृत्त जंघा चेष्टा का लक्षण - प्रतीपनयनं । यत्तु परिवृत्तं तदुच्यते दोनों जंघाओं को एक दूसरे से विपरीत दिशा में करने से परिवृत्त नामक जंघा चेष्टा निष्पन्न होती है ॥ २६२ ॥

पृष्ठ 494

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नवमोऽध्यायः ४०३ १. आवर्तित जंधा चेष्टा का विनियोग- आवर्तितं प्रयोक्तव्यं विदूषकपरिक्रमे ॥ २६२ ॥ विदूषक द्वारा परिक्रमा करने के अवसर पर आवर्तित नामक जंघा चेष्टा का

प्रयोग करना चाहिये ॥ २६२ ॥

२. नत जंघा चेष्टा का विनियोग- नतं चापि हि कर्तव्यं स्थानासनगतादिषु । उठने बैठने तथा चलने में नत नामक जंघा चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए । ३. क्षिप्त जंघा चेष्टा का विनियोग - क्षिप्तं व्यायामयोगेषु ताण्डवे च प्रयुज्यते ॥ २६३ ॥

व्यायाम तथा ताण्डव नृत्य के अवसर पर क्षिप्त नामक जंघा चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २६३ ॥

४. उद्वाहित जंघा चेष्टा का विनियोग- । तथा चोद्वाहितं कार्यं माविद्धगमनादिषु जिसमें एड़ी को बाहर की ओर फेंक कर भूमि पर रखा जाय ऐसी गति में उद्वाहित नामक जंघा चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए । ५. परिवृत्त जंघा चेष्टा का विनियोग— ताण्डवादौ प्रयोक्तव्यं परिवृत्तं प्रयोक्तृभिः ॥ २६४ ॥

ताण्डव नृत्य आदि के अवसर पर नाट्य प्रयोक्ताओं को परिवृत्त नामक जंबा चेष्टाका प्रयोग करना चाहिए ॥ २६४ ॥

पाद चेष्टा के पाँच भेदों के नाम- इत्येयं जङ्घयोः कर्म पादयोस्तु निबोधत । तथाग्रतलसञ्चरः ॥ २६५ ॥ उद्घट्टितः समश्चैव

अश्चितः कुञ्चितश्चैव पादः पञ्चविधः स्मृतः । इस प्रकार जंघा की पांचों चेष्टाओं का वर्णन किया गया । अब पैरों की चेष्टाओं का वर्णन किया जाता है । ( १ ) उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ ) अग्रतल संचर, ( ४ ) अश्चित, ( ५ ) कुञ्चित- ये पाँच पैरों की चेष्टाएँ हैं ॥ २६५-२६६ ॥ १. उद्घट्टित पाद चेष्टा का लक्षण- स्थित्वा पादतलाग्रेण पाणिर्भूमौ निपात्यते ॥ २६६ ॥

यस्य पादस्य करणे भवेदुद्घट्टितस्तु सः ।

पृष्ठ 495

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४०४ नाट्यशास्त्रम् ( प्रक्षिप्त ) पैर के अग्रभाग के सहारे खड़े होकर पृथ्वी पर एड़ी के गिरा देने से उद्घाट्टित त्य स्य नामक पाद चेष्टा सम्पन्न होती है ॥ २६६-२६७ ॥ सम नामक प उद्घट्टित पाद चेष्टा का विनियोग- अयमुद्घट्टित करणेष्वनुकरणार्थं प्रयोगमासाद्य ॥ २६७ ॥ घबड़ाहट आदि

चाहिए ॥ २७१- । द्रुतमध्यमप्रचारः सकृदसकृद्वा प्रयोक्तव्यः उद्वेष्टित करणों में अनुकरण करने के लिए किये गये प्रयोग के अवसर पर व्यश्रा पाद अ इस उद्घाट्टित पाद चेष्टा का द्रत या मध्यम गति में एक बार या अनेक बार प्रयोग करना चाहिए ॥ २६७-२६८ ॥ जब सम नाम २. सम पाद चेष्टा का लक्षण तथा विनियोग- उसे त्र्यश्रा नामक स्वभावरचितो भूमौ समस्थानश्च यो भवेत् ॥ २६८ ॥

समपादः स विज्ञेयः स्वभावाभिनयाश्रयः । इसका प्रयोग ३. अग्रतल स जब पैर पृथ्वी पर स्वाभाविक रीति से सम स्थिति में रखा जाता है तो उसे सम नामक पाद चेष्टा कहते हैं । उ अ इसका प्रयोग स्वभाव सम्बन्धी अभिनय के अवसर पर करना अग्रतल सं चाहिए ॥ २६८-२६९ ॥ अँगूठा फैला होता स्थिर पाद चेष्टा का विनियोग- अग्रतल संचन स्थिरः स्वभावाभिनये नानाकरणसंश्रये ॥ २६ ९ ॥ तो अनेक प्रकार के करणों से सम्बन्धित स्वाभाविक अभिनय के अवसर पर स्थिर वि नामक पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २६ ९ ॥ तोदन ( प्रे चलित पाद चेष्टा का विनियोग- स्थानक ) निशुम चलितश्च पुनः कार्यो विधिज्ञ: पादरेचिते । ( प्राणियों को दू नाट्य विधि के ज्ञाताओं को पादरेचक के अवसर पर चलित नामक में एड़ी को उठाक

पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए । २७० ॥ करना चाहिए ॥

( प्रक्षिप्त ) त्र्यश्रा पाद चेष्टा का लक्षण- ४. अञ्चित समस्यैव यदा पाष्णिः पादस्याभ्यन्तरे भवेत् ॥ २७० ॥ प

बहिः पार्श्व स्थितोऽङ्गुष्ठस्त्र्यश्रपादस्तु स स्मृतः । अ जब सम नामक पाद चेष्टा में पैर की एड़ी भीतर की ओर मोड़ ली जाय जिस पैर की तथा अँगूठा बाहर की ओर हो तो उसे व्यथा नामक पाद चेष्टा सभी अँगुलियाँ फै कहते हैं ॥ २७०-२७१ ॥

पृष्ठ 496

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नवमोऽध्यायः ४०५ ( प्रक्षिप्त ) त्र्यथा पाद चेष्टा का विनियोग - (? )दधाट्टित त्यक्त्वास्याद् विक्लवादिष्वर्थेषुकृत्वा समपदंत्र्यश्रःस्थानमश्वक्रान्तेपादो यथाविधितथैव। च ॥ २७१ ॥

॥ घबड़ाहटसम आदिनामक भावनाओंपाद चेष्टा केको अवसरछोड़ करपर त्रयश्राघोड़े परपादचढ़नेचेष्टाके अवसरका प्रयोगपर करनातथा चाहिए ॥ २७१-१७२ ॥ सर पर व्यश्रा पाद चष्टा का लक्षण तथा विनियोग-क बार अस्यैव समपादस्य पाणिरभ्यन्तरे भवेत् ॥ २७२ ॥

त्र्यपादः स विज्ञेयः स्थानकादिषु संश्रयः । जब सम नामक पाद चेष्टा में पैर की एडी भीतर की ओर मोड़ ली जाय तो त्र्यश्रा नामक पाद चेष्टा कहते हैं । ॥ उसे इसका प्रयोग स्थानकों आदि में करना चाहिए ॥ २७२-२७३ ॥ ३. अग्रतल सश्वर पाद चेष्टा का लक्षण - तो उसे उत्क्षिप्ता तु भवेत्पाष्णिः प्रसृतोऽङ्गुष्ठकस्तथा ॥ २७३ ॥

करना अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः पादेऽग्रतलसञ्चरे । अग्रतल संञ्चर नामक पाद चेष्टा में एड़ी ऊपर की ओर उठी होती है, ९ ॥ अंगूठाअग्रतलफैला होतासंचर हैपादतथाचेष्टासभीकाअंगुलियाँविनियोग-भी फैली होती हैं ॥ २७३-२७४ ॥पर स्थिर तोदनविक्षेपविविधरेचकपाष्णिकृतागमनमेतेननिकुट्टने स्थितनिशुम्भने भूमिताडने भ्रमणे ॥ २७४ ॥

तोदन ( प्रेरणा ), निकुट्टन ( प्रेरणा का भ्रहण ), स्थित ( वैष्णव आदि स्थानक ) निशुम्भन ( पीडन ), भूमिताडन, भ्रमण ( मानसिक भ्रान्ति ) विक्षेप ( प्राणियों को दूर भगाने ), अनेक प्रकार के ( कर, पाद, ग्रीवा आदि के ) रेचकों न्त नामक में एड़ी को उठाकर चलने वाली इस अग्रतल संचर नामक पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २७४-२७५ ॥ ४. अञ्चित पाद चेष्टा का लक्षण- o 11 पाष्णियस्यअङ्गुल्यश्चाञ्चिताःस्थिता सर्वाःभूमौ सपादमग्रतलंपादोऽञ्चिततथाउच्यते॥ २७५॥।

ली जाय जिस पैर की एड़ी पृथ्वी पर स्थित हो, अग्रभाग ऊपर की ओर उठा हो तथा द चेष्टा सभी अँगुलियाँ फैली हों उसे अश्वित नामक पाद चेष्टा कहते हैं ॥ २७५-२७६ ॥

पृष्ठ 497

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४०६ नाट्यशास्त्रम् ॥ २७६ ॥ ५. अञ्चित-पादाग्रस्थितसञ्चारेपाद चेष्टा का विनियोग-वर्तितोद्वर्तिते तथा

एष पादाहते कार्यों नाना भ्रमरकेषु च । पैर के अग्रभाग के संचालन में, वर्तित तथा उद्वर्तित चेष्टा में अनेक प्रकार की भ्रमरीचारियों के तथा पदाघात में इस अश्वित पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २७६-२७७ ॥ ६. कुञ्चित पाद चेष्टा का लक्षण- ऊक्षिप्ता पस्य पाणिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ॥ २७७ ॥

तथाकुञ्चितमध्यश्च स पादः कुश्चितः स्मृतः । पैर की एड़ी ऊपर उठी हुई हो, अँगुलियाँ सिकुड़ी हुई हों तथा पैर का मध्यभाग भी सिकुड़ा हुआ हो तो उसे कुञ्चित नामक पादचेष्टा कहते हैं ॥ २७७-२७८ ॥ कुञ्चित पादउदात्तगमनेचेष्टा का विनियोग-चैव वर्तितोद्वर्तिते तथा ॥ २७८ ॥

अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् । उदात्त ( उत्तम लोगों की ) गति में, वर्तित तथा उद्वर्तित चेष्टा में तथा अतिक्रमण ( लांघने ) में इस कुश्चित पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २७८-१७९ ॥ ( प्रक्षिप्त ) सूची पादचेष्टा का लक्षण- 'उत्क्षिप्ता तु भवेत्पाणिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः ॥ २७९ ॥

•वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः । ( दाहिने पैर की एड़ी ऊपर उठी हो और उसी पैर के अँगूठे के सहारे खड़ा हो तथा बायाँ पैर अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो तो इसे सूची नामक पादचेष्टा कहते हैं ॥ २७ ९-२८० ॥ सूची पाद चेष्टा का विनियोग-- नृत्ते नूपूरकरणे च प्रयोगस्तस्यकीर्तितः ॥। २८० ॥ नृत्त तथा नूपुर बाँधने के अवसर पर इस सूची नामक पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ) ॥ २८० ॥

पादचेष्टाओं के प्रयोग की विधि- पादजङ्घोरुकरणं समं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।

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नवमोऽध्यायः ४०७ जङ्घोरुकृतमिष्यते ॥ २८१ ॥ पादस्य करणे सवं

नाट्य प्रयोक्ताओं को पैर, जंघा तथा ऊरु तीनों की चेष्टाओं का एक साथ ही के अन्तर्गत जंघा तथा ऊरु की चेष्टाओंप्रयोग करना चाहिए क्योंकि पादचेष्टाओं का भी समावेश हो जाता है ॥ २८१ ॥

अध्याय का उपसंहार- तथैवोरुः प्रवर्तते । यथा पादः प्रवर्तेत तयोः समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत् ॥ २८२ ॥

उसी प्रकार ऊरु की भी चेष्टा होती है । जिस प्रकार पैर की चेष्टा होती है इसलिए पैर तथा ऊरु इन दोनों की चेष्टाओं की समानता के अनुसार पाद चेष्टा का प्रयोग करना चाहिए ॥ २८२ ॥

इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं लक्षणं चैव कर्म हि ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि चारीव्यायामलक्षणम् ॥ २३८ ॥

॥ इति श्रीभारतीये नाट्यशास्त्रे अङ्गाभिनयो ' नाम नवमोध्यायः ॥

इस प्रकार सभी अङ्गों की चेष्टाओं के लक्षणों तथा विनियोग का वर्णन किया गया । इनके बाद चारी नामक व्यायाम के लक्षणों का वर्णन करेंगे ॥ २८३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीभरतप्रणीत नाट्यशास्त्र की 'नाट्यप्रदीप' नामक हिन्दी व्याख्या में “ अङ्गाभिनय " नामक नवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥

1191 १. 'शरीराभिनयो नाम ' इति वा पाठ: काशी० ।

पृष्ठ 499

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अथ दशमोऽध्यायः चारी का लक्षण-

एवं पादस्य जङ्घाया ऊर्वोः कटयास्तथैव च ।

समानकरणे चेष्टा सा चारीति परिकीर्तित ॥ १ ॥

इस प्रकार पैर, जंघा, ऊरु तथा कटि ( कमर ) की समानकरण वाली आङ्गिक चेष्टा ' चारी' कहलाती है' ॥ १ ॥

व्यायाम का लक्षण- विधानोपगताचार्यो व्यायच्छन्ते परस्परम् ।

यस्मादङ्गसमायुक्तास्तस्माद्वयायाम उच्यते ॥ २ ॥

विधान नियम ) पूर्वक प्रयुक्त' ( अभिनीत ) चारियाँ परस्पर एक दूसरे के आश्रित रहती है । इन चारियों को व्यायाम इसलिये कहते है, क्योंकि १. नवम अध्याय के अन्त में कहा जा चुका है कि इसके बाद चारी नामक व्यायाम का लक्षण कहेंगे । उस कथन के "चारी व्यायाम लक्षणम्" इस शब्द के समास तथा व्यायाम शब्द के अर्थ इन दोनों में सन्देह होता है । चर् धातु से करण या भाव अर्थ में उणादि गण का इन् प्रत्यय करने के बाद "कृदिकारादक्तिन् ङीष् ” इस सूत्र से ङीष् प्रत्यय करने पर चारी शब्द सिद्ध होता है । २. चारियों के विधान का नियम किस प्रकार है यह 'विधानोपगता' शब्द द्वारा स्पष्ट करते हैं । "विधानोपगता' शब्द का अर्थ है एक प्रधान चारी द्वारा बलपूर्वक दूसरी चारियों का अभिनय । ऐसा होने पर क्या ये चारियाँ अन्यो-न्याश्रित होंगी? इस प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है, ये चारियाँ किसी एक प्रधान अङ्ग द्वारा प्रयुक्त नहीं होतीं । ३. कुछ चारियाँ प्रयत्नपूर्वक की जाती हैं तथा कुछ बिना प्रयत्न के स्वतः ही हो जाती हैं । इसीलिए 'चार्य:' इस बहुवचनान्त शब्द का प्रयोग किया गया है । उपर्युक्त कथन का तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिये - चारियों में कुछ अङ्ग प्रधान माने जाते हैं — जैसे अभिनय में हाथ या गति ( चलने ) में पैर आदि । इन प्रधान अङ्गों की उपयोगी चारी को प्रधान चारी कहते हैं । इस प्रकार जब पूर्व चारी पर चारी ( बाद वाली चारी ) के आश्रित रहती है तो इन परस्पर नियमबद्ध चारियों की चेष्टा को व्यायाम कहा जाता है ।

पृष्ठ 500

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दशमोऽध्यायः ४० ९ ये किसी प्रधान अङ्ग के आश्रय से प्रयुक्त होती है' ॥ २ ॥

चारी तथा करण का लक्षण - एकपादप्रचारो यः सा चारीत्यभिसंज्ञिता ।

द्विपादक्रमणं यत्तु करणं नाम तद्भवेत् ॥ ३ ॥

एक पैर से ( श्रोणी आदि ) अङ्गों के संचालन को चारी कहते हैं तथा दो पैरों की गति को करण कहते हैं ॥ ३ ॥

खण्ड तथा मण्डल का लक्षण--- करणानां समायोगाः खण्ड इत्यभिधीयते ।

खण्डैस्त्रिभिश्चतुभिर्वा संयुक्तेर्मण्डलं भवेत् ॥ ४ ॥

तीन करणों के समायोग को 'खण्ड ' कहते हैं तथा तीन-चार खण्डों के समूह को ' मण्डल ' कहते हैं ॥ ४ ॥

चारियों की उपयोगिता - चारीभिः प्रसृतं नृत्तं चारीभिश्चेष्टितं तथा ।

चारीभिः शस्त्रमोक्षश्च चार्यो युद्धे च कीर्तिताः ॥ ५ ॥

१. 'चारी व्यायाम के लक्षणम्' इस शब्द खण्ड के दोनों सन्देहों को दूर करने के लिए ही द्वितीय श्लोक में इनका स्पष्टीकरण किया गया है । 'परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से अभिनीत चारियां ही व्यायाम कही जाती हैं । ' चारी व्यायाम शब्द में 'चारियाँ ही व्यायाम' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मधारय समास है । व्यायच्छन्ते का अर्थ है 'परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा अभिनीत' । परस्परम् यह अभिनय नियम किस अंश में है, इसका स्पष्टीकरण ' परस्परम्' इस शब्द से किया गया है । ' परस्परम्' का अर्थ है पहले वाली चारी बाद वाली चारी पर आश्रित है बाद वाली चारी पहले वाली चारी पर नहीं । इसीलिए अकर्मक होने के कारण आत्मनेपद हो गया है । २. श्री घोष ने इस स्थल पर ध्यान आकृष्ट किया है कि यहाँ उल्लिखित करण एवं नाट्यशास्त्र के चतुर्थ अध्याय में विवेचित करण एक नहीं, अपितु भिन्न हैं । ३. तीन-चार की संख्या केवल उपलक्षण मात्र है । इससे अधिक संख्या वाले समूह का भी प्रयोग देखा जाता है । जैसे सूचीविद्ध नामक का ( ११-१२ ) चौथे मण्डल में अधिक प्रयोग किया जाता है । सातवें अलात नामक मण्डल में ६ या ७ चारियों का प्रयोग होता है ( ११-१३ ) ।