भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 501–510
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 501–510
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४१० नाट्यशास्त्रम् चारियों के द्वारा ही वृत्त व्याप्त है, चारियों के द्वारा ही विभिन्न चेष्टाये की जाती है । चारियों के द्वारा ही शस्त्रों का प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार चारियों का प्रयोग युद्ध के दृश्यों में भी किया जाता है ॥ ५ ॥
यदेतत्प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारीष्वेव संस्थितम् ।
न हि चार्या विना किञ्चिन्नाटयेऽङ्ग संप्रवर्तते ॥ ६ ॥
यह जो नाट्य का वर्णन हो रहा है, वह भी चारियों के ही आश्रित है ।' चारी के विना नाट्य में किसी भी अङ्ग ( हाथ, पैर आदि ) का प्रयोग नहीं होता ॥ ६ ॥
तस्माच्चारीविधानस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।
या यस्मिंस्तु यथा योज्या नृत्ते युद्धे गतौ तथा ॥ ७ ॥
अतः चारी विधान का लक्षण आगे बतलायेंगे कि कौन चारी वृत्त, युद्ध या गति आदि कर्मों में किस प्रकार प्रयोग की जानी चाहिए? ॥ ७ ॥
१६ भौमी चारियों के नाम- समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तथैव च ।
अध्यर्धिका चाषगतिर्विच्यवा च तथापरा ॥ ८ ॥
एडकाक्रीडिता बद्धा ऊरूद्वत्ता तथाडिता ।
उत्स्पन्दिताथ जनिता स्यन्दिता चापस्यन्दिता ॥ ९ ॥
समोत्सारितमत्तल्ली मत्तल्ली चापि षोडश ।
एता भौम्यः स्मृताचार्यः शृणुताकाशिकीः पुनः ॥ १० ॥
( १ ) समपादा, ( २ ) स्थितावर्ता, ( ३ ) शकटास्या, ( ४ ) अर्ध्याधिका, (५ ) चाषगति, ( ६ ) विच्यवा, (७ ) एडकाक्रीडिता, ( ८ ) बद्धा, ( ९ ) ऊरूत्ता, ( १० ) अड्डिता, ( ११ ) उत्स्पन्दिता, ( १२ ) जनिता, ( १३ ) स्यन्दिता, ( १४ ) अप- स्यन्दिता सम्बन्धित, ) (चारियाँ१५ ) समोत्सारितइसके- मत्तल्लीअनन्तर, ( आकाश१६ ) मत्तल्लीसम्बन्धी- ये चारियों१६ भोमी का( भूमिवर्णनसे १. चारियों की लौकिक व्यवहारोपयोगिता बतलाते हुए अभिनवगुप्त का कथन है- 'नृत्तं वाङ्गहारात्मकत्वं च तच्चारीभिः प्रसृतं च व्याप्तमिति प्रत्येकं चेष्टितं गतिः । २. अभिनवगुप्त के विचार में भरत द्वारा प्रयुक्त यत् शब्द से पूर्वविवेचित एवं एतद् से विवेच्यमान नाट्य की ध्वनि निकलती है-' यच्छब्देन व्याख्यात- धर्मपूर्वकं, एतच्छब्देन व्याख्यास्यमानधर्मयोगं परामृश्यत इति वितततां नाट्यस्याह ।'
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दशमोऽध्यायः ४११ करते हैं' ॥ ८-१० ॥ १६ आकाशीय ( आकाश सम्बन्धी ) चारियां
अतिक्रान्ता पक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता तथैव च ।
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥
डोलपादा तथाक्षिप्ता व्याविद्धोद्धृत्तसंज्ञिते ।
विद्युदुद्भ्रान्ता लाता च भुजङ्गत्रासिता तथा ॥ १२ ॥
मृगप्लुता च दण्डा च भ्रमरी चेति षोडश ।
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता लक्षणं च निबोधत ॥ १३ ॥
( १ ) अतिक्रान्ता, ( २ ) अपक्रान्ता, ( ३ ) पार्श्वक्रान्ता, ( ४ ) ऊर्ध्वजानु, ( ५ ) सूची, ( ६ ) नूपुरपादिका, ( ७ ) डोलापादा, ( ८ ) आक्षिप्ता, ( ९ ) आविद्धा, ( १० ) उद्वृत्ता, ( ११ ) विद्युद्भ्रान्ता, ( १२ ) अलाता, ( १३ ) भुजङ्गत्रासिता, ( १४ )
मृगप्लुता, ( १५ ) दण्डा, ( १६ ) भ्रमरी - ये १६ आकाश सम्बन्धी चारियाँ है ।
इनका लक्षण आगे बतलाया जायगा ॥ ११-१३ ॥
१. समपादा चारी का लक्षण- पादैर्निरन्तरकृतैस्तथा समनखैरपि ।
समपादा तु सा चारी विज्ञेया स्थानसंश्रया ॥ १४ ॥
जिसमें गति के समय पैरों तथा नखों की स्थिति एक समान हो तथा प्रत्येक पदक्षेत्र के विन्यास में भी अन्तर न हो, उसे ' समपादा' चारी कहते है ।" इसका सम्बन्ध स्थान से है ॥ १४ ॥
१. ' म' तथा 'न' प्रतियों में समपादा और स्थितावर्ता इन दो चारियों का पदच्छेद इस प्रकार किया गया है- १. समपादस्थिता, २. आवर्ता । अध्यधिका का अध्यधिका का पाठान्तर 'न ' में अभ्यर्धिता तथा 'म ' में अध्यर्धगा है । चाषगति का पाठान्तर 'प' में वासगति है । 'विच्यवा च तथा परा' का पाठान्तर 'म ' में 'स्वस्तिकोद्वर्तिता' है तथा एडकाक्रीडिता 'वद्धा ' 'ऊरुद्वृत्ता' के स्थान पर एलकाक्रीडिता तथा 'ऊरूवृत्ता' पाठान्तर है । ' फ' में ' अड्डिता ' के स्थान पर ' अधिता' पाडान्तर है । 'च' में 'अड्डिता' के स्थान पर 'अंडिता ' पाठ है । ' म' में ११ से १६ तक की चारियों की गणना इस प्रकार है- ' विच्यवा, जनिता, आस्कन्दिता, अवस्कन्दिता, मत्तल्ली, समोत्सारित मत्तल्ली' । २. समपादा नाम के औचित्य के विषय में अभिनवगुप्त का कथन है-' ननु समपादा कथं वा चारीत्याह - स्थान संश्रयेति यदा समपाद एवं स्थानान्तरं गच्छति तदा चरणश्चारी भवत्येव योग्यतया तथा व्यपदेशादिति भावः ।' श्री घोष ने 'पदैर्निरन्तरकृतैः' का अर्थ आपस में सटे पैर किया है ।
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४१२ नाट्यशास्त्रम् २. स्थितावर्ताचारी का लक्षण - भूमिघृष्टेन पादेन कृत्वाभ्यन्तरमण्डलम् । पुनरुत्सारयेदन्यं स्थितावर्त्ता तु सा स्मृता ॥ १५ ॥
जब एक पैर के अग्रभाग से भूमि का स्पर्श करते हुए दूसरी ओर के पार्श्व तथा जानु तक घूम कर पुनः दूसरे पैर से इसी प्रकार किया जाता है तो उसे 'स्थितावर्ता ' चारी कहते हैं ॥ १५ ॥
३. शकटास्या चारी का लक्षण - निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ।
उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटास्यां प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
जब प्रयत्नपूर्वक शरीर के ऊपरी भाग को स्थिर करके एक पैर को समानता से स्थापित किया जाय तथा दूसरे पैर की अंगुलियों को सिकोड़ करके उसी ओर के घुटने को मोड़ कर जंघा को फैला दिया जाय, वक्षस्थल को उद्वाहित ( ९ -२३१, उठी हुई ) स्थिति में रखे तो इसे ' शकटास्या' चारी कहते हैं ॥ १६ ॥
४. अर्ध्याधिका चारी का लक्षण - सव्यस्य पृष्ठतो वामश्चरणस्तु यदा भवेत् ।
तस्यापसर्पणं चैव ज्ञेया साध्यधिका बुधैः ॥ १७ ॥
दाहिने पैर के पीछे की ओर बायाँ पैर स्थापित करे । फिर दाहिने पैर को अपने पार्श्वभाग के अर्धाश तक चलाये तो इसे 'अध्यधिका' चारी कहते हैं ॥ १७ ॥
५. चाषगति चारी का लक्षण -- पादः प्रसारितः सञ्यः पुनश्चैवापसर्पितः ।
वामः सव्यापसर्पी च चाषगत्यां विधीयते ॥ १८ ॥
चाषगति चारी में दायाँ पैर फैलाकर फिर समेट लिया जाता है, साथ ही बायें पैर को पीछे करके सामने कर दिया जाता है ॥ १८ ॥
१. अभिनवगुप्त ने मतान्तर का उल्लेख किया है जिसके अनुसार बायें पैर को पार्श्व भाग के अधश तक चलाना भी कहा गया है-'एकस्य पूर्णता गतिरन्यस्य पादस्य पूर्णाकेत्यन्ये । करणप्राधान्याच्चैवमुक्त वामस्यापि पृष्ठसङ्गतमेव । ' २. प्रस्तुत स्थल पर शाब्दिक अनुवाद की अपेक्षा श्री घोष कृत अनुवाद •अत्यन्त सुबोध है । तदनुसार दाहिना पैर सामने की ओर लाकर पीछे कर दिया जाता है तथा बायाँ पीछे ले जाकर पुनः सामने लाया जाता है ।
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दशमोऽध्यायः ४१३ ६. विव्यवा चारी का लक्षण- विच्यवात्नियंस्तलाग्रेणसमपादाया पादस्यविच्यवां सम्प्रयोजयेत्धरणीतलम् ॥। १ ९ ॥ एक पैर सम भाव से स्थापित करके आगे की ओर सरकाये तथा दूसरे पैर
तल भाग' से पृथ्वी पर आघात करें । इसे 'विच्यवा' चारी कहते है ॥ १ ९ ॥
७. एडकाक्रीडिता चारी का लक्षण - तलसञ्चरपादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनं तु यत् ।
पर्यायशश्च क्रियते एडकाक्रीडिता तु सा ॥ २० ॥
दोनों पैरों के तल भाग से पृथ्वी पर थोड़ा आगे सरके फिर उछल कर गुल्फों के सहारे पूर्वावस्था में आ जाय । पुनः गुल्फों या सक्थि के सहारे सरक कर उछले और फिर तल भाग आदि के सहारे पूर्वावस्था में आ जाये । इसे 'एडकाक्रीडिता चारी कहते हैं ॥ २० ॥
८. बद्धाचारी का लक्षण - अन्योन्यजङ्घासंवेधात् कृत्वा तु स्वस्तिकं ततः ।
ऊरूभ्यां वलनं यस्मात् सा बद्धा चार्युदाहृता ॥ २१ ॥
दाहिने पैर को घुमाकर बायीं ओर ले जाकर दोनों जँघाओं को सटा लेना या बायं पैर को घुमाकर दाहिनी ओर ले जाकर दोनों जंघाओं को सटा लेना इसे ' बद्धा' चारी कहते हैं ॥ २१ ॥
९. ऊरूवृत्ता चारी का लक्षण- तलसञ्चरपादस्य पाष्णिह्योन्मुखी यदा ।
जङ्घाञ्चिता तथोद्वृत्ता ऊरूद्वृत्तेति सा स्मृता ॥ २२ ॥
एक पैर तलुओं के सहारे भूमि पर रखे । दूसरे पैर के पाणि भाग को ऊपर की ओर रखे तथा उसी पैर की जंघा को सिकोड़ कर सामने की ओर कर दे । यह 'ऊरूवृत्ता' चारी है ॥ २२ ॥
१०. अड्डिता चारी का लक्षण- अग्रतः पृष्ठतो वापि पादोऽग्रतलसञ्चरः ।
द्वितीयपादो निर्दृष्टः यत्र स्यादड्डिता तु सा ॥ २३ ॥
१. श्री घोष ने तलभाग का अर्थ पैर का पंजा किया है । २. अभिनवगुप्त ने मतान्तर का उल्लेख किया है जिसके अनुसार दोनों जंघाओं को एक दूसरे के तिरछे रखना ही ' बद्धा' चारी है ।
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४१४ नाट्यशास्त्रम् पैर पृथ्वी पर समभाव से स्थापित करे । पुन: दूसरे पैर से पहले वालेपैर का अग्रभाग ' ' एक या पृष्ठ भाग को स्पर्श करे । यह अड्डिता चारी है ॥ २३ ॥
११. उत्स्पन्दिता चारी का लक्षण - शनैः पादों निवर्तेत बाह्येनाभ्यन्तरेण च ।
यद्रेचकानुसारेण सा चार्युत्स्पन्दिता स्मृता ॥। २४ ॥
पैर को क्रमश: ( अन्दर से बाहर अँगूठे से कनिष्ठा की ओर एवं बाहर से अन्दर ) जब कनिष्ठा से अँगूठे की ओर रेचक के अनुसार संचालित किया -जाए तो उसे 'उत्स्पन्दिता ' चारी कहते हैं ॥ २४ ॥
१२. जनिता चारी का लक्षण - वक्षःस्थः करोऽन्यश्च प्रवर्तितः । मुष्टिहस्तश्च तलसञ्चरपादश्च जनिता चार्युदाहृता ॥ २५ ॥
मुद्रा में एक हाथ वक्षःस्थल पर रखे तथा दूसरे हाथ को क्रियाशील रखे मुष्टि एवं पैरों को तलसंचर रखे तो 'जनिता' चारी होती है' ॥ २५ ॥
१३. स्यन्दिता चारी का लक्षण- पञ्चतालान्तरं पादं प्रसार्य स्यन्दितां न्यसेत् । पैर को ( दाहिने ) दूसरे ( बायें ) से पाँच ताल' तक फैलाना एक 'स्यान्दिता चारी कहा जाता है' ॥ २६ ॥
१४. अपस्यन्दिता चारीतुका लक्षण-पादेन तथापस्यन्दितामपि ॥ २६ ॥ द्वितीयेन
ताल दूरी तक दाहिना स्यन्दिता चारी के विपरीत बाये पैर से पांच -पैर फैलाना ) को ' अपस्यन्दित' चारी कहते हैं ॥ २६ ॥
प्रारम्भिक रूप हैं । अतः १. अभिनवगुप्त के अनुसार यह सभी चारियों का -सभी चारियों की जननी होने से इसका नाम जनिता' है 'समस्तगतीनामियं जननं करोति प्रारम्भरूपत्वादिति जनिता । मध्यमा अंगुली तक के अन्तर को ताल कहा जाता है ( ताल: २. अँगूठे से ) -स्मृतः३.मध्यमयाअभिनवगुप्त । की व्याख्या को मानने पर दाहिने पैर को फैलाया जाता है । के मत में यहां दूसरे पैर में बायें पैर को फैलाने का ४. अभिनवगुप्त तात्पर्य है ।
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दशमोऽध्यायः ४१५ १५. समोत्सारित मत्तल्ली चारी का लक्षण- तलसञ्चरपादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः । समोत्सारितमत्तल्ली व्यायामे समुदाहृताः ॥ २७ ॥
दोनों जांघों को स्वस्तिक आकार के एक दूसरे से सटाये । एक बार दाहिने पैर के तल भाग से तथा दूसरे बार दाहिने पैर के तल भाग से आगे
की ओर घूमते हुए सरके । यह ' समोत्सारित मतल्ली' चारी है ॥ २७ ॥
१६. मत्तल्ली चारी का लक्षण- उभाभ्यामपि पादाभ्यां घूर्णंमानोपसर्पणैः । उद्वेष्टितापविद्धैश्व हस्तैर्मत्तल्युदाहृता ॥ २८ ॥ दोनों जाँघों को स्वस्तिक आकार में एक दूसरे से सटाकर क्रमश: दाहिने
तथा बायें दोनों पैरों से चक्कर लगाते हुए आगे बढ़े । दोनों हाथों को एक दूसरे से लपेट ले । यह ' मत्तल्ली' चारी है ॥ २८ ॥
भौमी चारियों का उपसंहार-
एता भौम्यः स्मृताचार्यों नियुद्धकरणाश्रयाः ।
आकाशिकीनां चारीणां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २ ९ ॥
समपादा से लेकर मत्तल्ली तक सोलह भौमी ( भूमि सम्बन्धी ) चारियाँ कही गई हैं । इन चारियों का प्रयोग नियुद्ध ( खड्ग युद्ध आदि ) तथा करण में होता है । इसके बाद आकाश सम्बन्धी चारियों का लक्षण बतलायेंगे ॥ २ ९ ॥
१. अतिक्रान्ता चारी का लक्षण - कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३० ॥
कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर अग्रभाग से भूमि पर गिराना 'अति- क्रान्ता' चारी है ॥ ३० ॥
१. कुञ्चित पाद का लक्षण ९।२७७ में इस प्रकार है-पाष्णि भाग ऊपर उठा हो, अंगुलियां सिकुड़ी हुई हों, पर का मध्यभाग भी सिकुड़ा हो, इसे कुञ्चित पाद कहते हैं । २. अभिनवगुप्त ने पैर को ऊपर उठाने की सीमा चार ताल तक मानी है -' कुञ्चितं तद्वितीयगुल्फक्षेत्र कृत्वा किंचित् पुरतः प्रसार्य प्रकृतिभेदेन चतुर- तालाद्यन्तरमुत्क्षिप्याग्रेण भूमौ निपात्य इति-' ।
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नाट्यशास्त्रम् ४१६
२. अपक्रान्ता चारी का लक्षण -- ऊरूभ्यां वलनं कृत्वा कुञ्चितं पादमुद्धरेत् ।
तु सा स्मृता ॥ ३१ ॥
पार्श्व विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता को वलित अवस्था में रखे ' एक पैर को कुश्चित अवस्था, ' ' में ऊपरदोनोंउठावेऊरुओंऔर पार्श्व भाग में रखे यह अपक्रान्ता चारी है ॥ ३१ ॥
३. पार्श्वक्रान्ता चारी का लक्षण - पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसम न्यसेत् । कुञ्चितं विधीयते ॥ ३२ ॥
उद्घट्टितेन पादेन पार्श्वक्रान्ता जानु को स्तन के समीप कुचित पैर को अपने पार्श्व भाग से उठाकर पर रखे । यह 'पार्श्वक्रान्ता" ले जाये, फिर पार्ष्णि भाग से उद्घट्टित अवस्था में पृथ्वी चारी है ॥ ३२ ॥
४. ऊर्ध्व जानु चारी का लक्षण - पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसमं न्यसेत् ।
द्वितीयं च क्रमात् स्तब्धमूर्ध्वजानुः कुञ्चितं प्रकीर्तिता ॥ ३३ ॥
अवस्था में रखे । उसी पैर की जानु को उठाकर एक पैर को कुञ्चित स्थिर रखे । यह 'ऊर्ध्वजानु'" स्तन के समीप तक ले जाये । दूसरे पैर को क्रमशः चारी है ॥ ३३ ॥
५. सूची चारी का लक्षण- सम्प्रसारयेत् । कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूध्वं पातयेच्चाप्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ ३४ ॥
घुटने तक जंधा को फैलाये कुश्चित अवस्था वाले पैर को ऊपर उठा कर सूची' चारी है ॥ ३४ ॥
तथा अग्र भाग से पैर को पुनः पृथ्वी पर रखे । यह ' ६. नूपुरपादिका चारी का लक्षण - ह्यञ्चितं कृत्वा पादमग्रतलेन तु । पृष्ठतोद्रुतं निपातयेद् भूमौ चारी नूपुरपादिका ॥ ३५ ॥ का लक्षण ९ २५१-५२ में इस प्रकार है - जिस १. मेंऊरूजानुकी भागवलितभीतरअवस्थाकी ओर और ऊरू भाग सामने हो उसे वलित अवस्था अवस्था
- कहा २.गयानाट्यशास्त्रहै । ( ९ - २६६-६७ ) के अनुसार पहले पैर के अग्रभाग से स्थित हो को पृथ्वी पर रखे तो इसे 'उद्घट्टित' अवस्था' कहते हैं । फिर पाणिभाग
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दशमाध्यायः ४१७ अति अवस्था वाले एक पैर को पीछे की ओर ले जाये फिर अग्रभाग
को शीघ्रता से पृथ्वी पर रखे । यह ' नूपुरपादिका' चारी है ॥ ३५ ॥
७. डोलापादा ( दोलपादा ) चारी का लक्षण-
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पाश्र्वात्पाखं तु दोलयेत् ।
पातयेदञ्चितं चैव दोलपादा तु सा स्मृता ॥ ३६ ॥
कुञ्चित अवस्था वाले पैर को ऊपर उठाकर एक पार्श्व को दूसरे पार्श्व की ओर झूले की तरह ले जाये, फिर अञ्चित' अवस्था में पैर को नीचे रखे, यह 'दोलपादा' चारी है ॥ ३६ ॥
८. आक्षिप्ता चारी का लक्षण- कुञ्चित पादमुत्क्षिप्य आक्षिप्य त्वञ्चितं न्यसेत् ।
जङ्घा स्वस्तिकसंयुक्ता चाक्षिप्ता नाम सा भवेत् ॥ ३७ ॥
कुज्जित अवस्था में पैर को ऊपर उठाये तथा अवित अवस्था में नीचे रखे । जांघों की स्थिति स्वस्तिक के आकार की हो । यह 'आक्षिता' चारी है ॥ ३७ ॥
९. आविद्धा चारी का लक्षण- स्वस्तिकस्याग्रतः पादः कुश्चितस्तु प्रसारितः ।
निपतेदञ्चिताविद्धमाविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ३८ ॥
स्वस्तिक स्थिति से पीर को कुञ्चित अवस्था में करके पहले फैलाये और फिर अश्चित अवस्था में नीचे रखे तो यह 'आविद्धा' चारी है ॥ ३८ ॥
१०. उद्वृत्ता चारी का लक्षण- पादमाविद्धमावेष्ट्य समुत्प्लुप्य निपातयेत् ।
परिवृत्य द्वितीयं च सोवृत्ता चार्युदाहृता ॥ ३ ९ ॥
उपरिलिखित आविद्ध नामक चारी से सम्बन्धित कुश्चित अवस्था वाले पैर की पाणि (एडी ) को एक दूसरे पैर के ऊरू तक ले जाये, फिर उछल कर
उसी पर को घुमा कर पृथ्वी पर रख दे । यह ' उद्घृता' चारी है ॥ ३ ९ ॥
१. पैर की अञ्चित अवस्था का लक्षण ९ ।२७५ में इस प्रकार है— पैर का पाणिभाग भूमि का स्पर्श करे, अग्रभाग ऊपर उठा हो तथा अंगुलियां फैली हों, यह पैर की अञ्चित अवस्था कही जाती है । २. दशम अध्याय की ३० श्लोक की टिप्पणी में कुञ्चित तथा ३५ श्लोक की टिप्पणी में अञ्चित का लक्षण दिया है । २७ ना०
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४१८ नाट्यशास्त्रम्
११. विद्युद्भ्रान्ता चारी का लक्षण- पृष्ठतो वलितं पादं शिरोघृष्टं प्रसारयेत् ।
सर्वतो मण्डलाविद्धं विद्युदुद्भ्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ४० ॥
परको पार्श्व भाग की ओर घुमाकर ( मोड़कर ) शिर को स्पर्श करते हुए ऊपर, नीचे तथा पृष्ठभाग की ओर मण्डलाकार घुमाकर फैला दे । यह 'विद्युद- भ्रान्ता' चारी है ॥ ४० ॥
१२. अलाता चारी का लक्षण - पृष्ठप्रसारितः पादो वलितोऽभ्यन्तरीकृतः ।
पाणिप्रपतितश्चैव ह्यलाता सा प्रकीर्तिता ॥ ४१ ॥
पीर को पहले पृष्ठभाग की ओर फैला दे फिर मोडकर दूसरे पैर के ऊरू प्रदेश की ओर ले जाये, फिर अपने पार्श्व भाग की एड़ी के सहारे पृथ्वी पर टिका दे । अलातचक्र के समान गतिशील होने के कारण इसे ' अलाता' चारी कहते है ॥ ४१ ॥
१३. भुजङ्गत्रासिता चारी का लक्षण- कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य त्र्यश्रमूरुं विवर्त्तयेत् । कटीजानुविवर्त्ताच्च भुजङ्गत्रासिता भवेत् ॥ ४२ ॥
कुञ्चित अवस्था वाले पैर को उठाकर दूसरे पैर के ऊरू मुल तक ले जाय, फिर कटि और जानु तक ले जाकर नितम्ब के सामने ऊरू भाग तक घुमाये । यह 'भुजङ्गत्रासिता' चारी है ' ॥ ४२ ॥
१४. अतिक्रान्ता चारी का लक्षण - अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य विनिपातयेत् ।
जङ्घाञ्चिता परिक्षिप्ता सा ज्ञेया हरिणप्लुता ॥ ४३ ॥
अतिक्रान्ता नामक चारी ( १०-३० ) में प्रोक्त कुञ्चित पैर को ऊपर उठाये, फिर उछल कर उसे नीचे गिराये, उसके बाद अश्वित पाद' से युक्त दूसरी जंघा १. जानु को अपने पार्श्व तक ले जाकर पर के तलवे को ऊपर की ओर कर दिया जाता है, इस प्रकार भुजङ्ग ( सर्प ) के भय से डरे हुए के समान चेष्टा करने के कारण इसे 'भुजङ्गत्रासिता' चारी कहते है । ( भुजङ्गभयभावितगतिसा- दृश्याद् भुजङ्गत्रासिता – अभि० भा० ) । २. कुञ्चित पाद का लक्षण १० । ३० की टीका में तथा अचित पाद का लक्षण १०।३५ की टीका में दिया गया है ।
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दशमोऽध्यायः ४१९ पीछे की ओर करे तो इस चारी को 'हरिणप्लुता कहते हैं ' ॥ ४३ ॥
१५. दण्डा ( दण्ड पादा ) चारी का लक्षण -- नूपुरं चरणं कृत्वा पुरतः सम्प्रसारयेत् । क्षिप्रमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ॥ ४४ ॥
नूपुरपादिका नामक चारी में प्रयुक्त कुञ्चित अवस्था वाले पैर को दूसरे पैर की एड़ी की ओर ले जाकर आगे की ओर फैला दे, फिर शीघ्रतापूर्वक आविद्ध नामक चारी ( १०-३८ ) के समान कर ले । इसे 'दण्ड पादा' चारी कहते हैं ॥ ४४ ॥
१६. भ्रमरी चारी का लक्षण - अतिक्रान्तक्रम कृत्वा त्रिकं तु परिवर्त्तयेत् ।
द्वितीयपादभ्रमणात्तलेन भ्रमरी स्मृता ॥ ४५ ॥
'अतिक्रान्ता' नामक चारी ( १०-३१ ) में प्रयुक्त कुञ्चित अवस्था वाले पर को ऊपर उठाकर 'भुजङ्गत्रासिता' ( १०-४२ ) नामक चारी में प्रयुक्त त्र्यश्र अवस्था में ऊरू तक घुमाकर दूसरे पैर के तलवे से तीन बार सारे शरीर को घुमाये यह 'भ्रमरी' चारी है ॥ ४५ ॥
आकाशीय चारियों का उपसंहार - • आकाशिक्यः स्मृता ह्येता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ॥। ४६ ॥ धनुर्वज्रासिशस्त्राणां प्रयोक्तव्या विमोक्षणे ' अतिक्रान्ता' ( १०।३० ) से 'भ्रमरी' ( १०/४५ ) तक ये १६ चारियाँ आकाशिकी ( आकाश सम्बन्धी ) चारियाँ कही जाती हैं । ये चारियाँ ललित शारीरिक क्रियाओं से युक्त हैं । इन चारियों का प्रयोग धनुष, वज्र, असि ( तलवार) आदि शस्त्रों के प्रयोग के समय किया जाता है ॥ ४६ ॥
चारियों की प्रयोग विधि-
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पादयोस्तु द्विजा! हस्तौ कर्तव्यौ नाटययोक्तृभिः ॥ ४७ ॥
इन चारियों में कभी परों की चेष्टा ( गति ) की प्रधानता होती है और कभी हाथों की चेष्टा की प्रधानता होती है तथा कभी पैरों और हाथों दोनों की १. प्रस्तुत चारी के नाम का आधार इसमें की गई हरिण के उछलने की चेष्टा है ।