भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 511–520
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 511–520
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४२० नाट्यशास्त्रम् चेष्टाओं की प्रधानता होती है । जब पैरों की चेष्टा ( गति ) की प्रधानता हो तो हाथों की चेष्टा पैरों की चेष्टा के अनुसार उनके बाद होनी चाहिए । जब हाथों की चेष्टाओं की प्रधानता हो तो पैरों की चेष्टा हाथों की चेष्टाओं के अनुसार उनके बाद होनी चाहिए । जब हाथों और पैरों दोनों की चेष्टाओं की प्रधानता हो तो दोनों की चेष्टाओं को साथ-साथ ही करना चाहिए ॥ ४७ ॥
यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततस्त्रिकम् ।
पादस्य निर्गम कृत्वा तथोपाङ्गानि योजयेत् ॥ ४८ ॥
परों की चेष्टा की ही भांति हाथ की चेष्टा भी होनी चाहिए तथा जिस प्रकार हाथ की चेष्टा हो, उसी प्रकार भौह, नेत्र आदि उपाङ्गों की भी चेष्टा होनी चाहिए । पहले पैर की चेष्टा करना चाहिए, तदनन्तर उपाङ्गों की चेष्टायें करे ॥ ४८ ॥
पादाचार्यां यथा पादो धरणीमेव गच्छति ।
एवं हस्तश्चरित्वा तु कटीदेशं समाश्रयेत् ॥ ४ ९ ॥
यदि परों की चेष्टा के अनन्तर पैरों को पुनः पृथ्वी पर रखे । इसी प्रकार हाथों की चेष्टायें करने के बाद हाथों को कमर पर रख ले ॥ ४ ९ ॥ शस्त्र प्रयोग सम्बन्धी चारियों के स्थानों के नाम-
एताश्चार्यों मया प्रोक्ता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
स्थानान्यासां प्रवक्ष्यामि सर्वशस्त्रविमोक्षणे ॥ ५० ॥
इस प्रकार ललित शारीरिक क्रियाओं से युक्त चारियों का वर्णन किया गया । अब सभी शस्त्रों के प्रयोग के अवसर पर इनके स्थानों ( खड़े होने के विशेष ढंगों ) का वर्णन करते है ॥ ५० ॥
वैष्णवं समपादं च वैशाखं मण्डलं तथा ।
प्रत्यालीढमथालीढं स्थानान्येतानि षण्णाम् ॥ ५१ ॥
सभी शस्त्रों के प्रयोग के ६ स्थानों के नाम - ( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, (३) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ ) प्रत्यालीढ तथा ( ६ ) आलीढ है ॥ ५१ ॥
१. वैष्णव स्थान का लक्षण - द्वौ तालावर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेत् । त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥ ५२ ॥ तयोस्समुत्थितस्त्वेकः
किञ्चिदञ्चितजङ्घवैष्णवं स्थानमेतद्धिच सौष्ठवाङ्गपुरस्कृतम्विष्णुरत्राधिदैवतम् ॥। ५३ ॥
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दशमोऽध्यायः ४२१ दोनों पैरों को एक दूसरे से ढाई ताल के अन्तर से स्थापित करे । दोनों पैरों में एक एक पर सम अवस्था में स्थित हो तथा दूसरा पैर त्र्यश्र अवस्था में हो तथा उसकी उंगुलियाँ पार्श्व भाग की ओर हों, जानु के झुके होने के कारण जंघा कुछ टेढ़ी हो, इस प्रकार सौष्ठव युक्त अंगों से युक्त इस स्थान ( खड़े होने के
विशेष ढंग ) को वैष्णव स्थान कहते हैं । इसके अधिदेवता विष्णु हैं ' ॥ ५२-५३ ॥
वैष्णव स्थान का विनियोग- स्थानेनानेन कर्त्तव्यः संलापस्तु स्वभावजः । नानाकार्यान्तरोपेतैर्नृभिरुत्तममध्यमैः ॥ ५४ ॥
चक्रस्य मोक्षणे चैव धारणे धनुषस्तथा ।
धैर्योदात्ताङ्गलीलासु तथा क्रोधे प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥
इस वैष्णव स्थान का प्रयोग अनेक कार्यों में संलग्न उत्तम तथा मध्यम पात्रों द्वारा स्वाभाविक संलाप वार्तालाप में करना चाहिए ॥ ५४ ॥
चक्र के छोड़ने में, धनुष के धारण करने में, धैर्य में, उदात्त शारीरिक लीलाओं में तथा क्रोध मेंइदमेवभी वैष्णव स्थानविपर्यस्तंका प्रयोगप्रणयक्रोधकरना चाहिए ॥इष्यते५५ ॥ । उपालम्भकृते चैवं प्रणयोद्वेगयोस्तथा ॥ ५६ ॥
शङ्कासूयोग्रताचिन्तामतिस्मृतिषु चैव हि । चपलतायाञ्च गर्वाभीष्टेषु शक्तिषु ॥ ५७ ॥ 1 शृङ्गाराद्भुतबीभत्स वीरप्राधान्ययोजितम्
प्रणय सम्बन्धी क्रोध की दशा में प्रणय सम्बन्धी उद्वेग ( घबराहट ) में, १. प्रति 'म' तथा ' म ' दिये हुए पाठान्तर के अनुसार वैष्णव स्थान का लक्षण इस प्रकार है- एक पर स्वाभाविक रीति से सम अवस्था में हो, दूसरा पर त्र्यश्र अवस्था में हो, उसकी अंगुलियाँ पार्श्व भाग की ओर हों, जंघा कुछ टेढ़ी हो, हृदय समुन्नत हो, हनु ठोढ़ी तथा सिर सम अवस्था में हो तथा कान से आठ अंगुल के अन्तर पर स्थित हो, दाहिना हाथ कटक ( ९/ २०६ खटक ) या त्रिपताक ( ९ ।१ ९ ५ ) अवस्था में नाभि पर स्थित हो तथा बायाँ हाथ त्रिपताक या अर्धचन्द्र अवस्था में कमर पर स्थित हो । दोनों पैरों में दो ताल का अन्तर हो । यह वैष्णव नामक स्थान है । इसके अधि देवता विष्णु है ।
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४२२ नाट्यशास्त्रम् उपालभ में, शङ्का, असूया, उग्रता, चिन्ता, मति ( विचार ), स्मृति, दैन्य, चपलता, तथा गर्व आदि मनोभावों की स्थिति में, शृंगार, अद्भुत, बीभत्स तथा वीर प्रधान रसों में भी विपर्यस्त ( विपरीत ) अवस्था वाले इसी वैष्णव स्थान का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५६-५८ ॥ २. समपाद स्थान का लक्षण - समपादे समौ पादौ तालमात्रान्तरस्थितौ ॥ ५८ ॥
स्वभावसौष्ठवोपेतौ ब्रह्मा चात्राधिदैवतम् । एक ताल के अन्तर से सम अवस्था में दोनों पैरों को स्वाभाविकतापूर्वक स्थापित करे, इसे ' समपाद' नामक स्थान कहते हैं । इसके अधिदेवता ब्रह्मा ॥ ५८-५९ ॥ समपाद स्थान का विनियोग - अनेन कार्यं स्थान विप्रमङ्गलधारणम् ॥ ५ ९ ॥
रूपणं पक्षिणां चैव वरं कौतुकमेव च ।
खस्थानां स्यन्दनस्थानां विमानस्थायिनामपि ॥ ६० ॥
लिङ्गस्थानां व्रतस्थानां स्थानमेतत्तु कारयेत् । समपाद स्थान का प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा किये हुए मांगलिक आशीर्वाद आदि में पक्षियों के रूपण ( अभिनय ) में, परम ' आश्चर्य के प्रदर्शन में तथा आकाश स्थित, प्रदर्शन में करना चाहिये । रथ स्थित तथा विमान स्थित प्राणियों के करने वाले ( शैवों, वैष्णवों आदि को ) ( शूल चक्रादि ) चिह्नों को धारण करने वालों को इसी ( वैष्णव ) स्थान का तथा (ऊर्ध्वकाय आदि ) व्रतों को धारण प्रयोग करना चाहिए ॥ ५ ९-६१ ॥ ३. वैशाख स्थान का लक्षण - पादयोरन्तरं भवेत् ॥ ६१ ॥ तालास्त्रयोऽर्धतालश्व
तालांस्त्रीनर्धतालांश्च निषण्णोरुं प्रकल्पयेद् ।
त्र्यत्रो पक्षस्थितौ चैव तत्र पादौ प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥
वैशाखस्थानमेतद्धि स्कन्दश्चात्राधिदैवतम् । १. यहां प्रयुक्त ' बरं' को हमने कौतुक का विशेषण मानते हुए इसका अर्थ उत्कृष्ट या परम आश्चर्यं किया है । श्री घोष वर का तात्पर्य दूल्हा तथा कौतुक का अर्थ वैवाहिक क्रिया करते हुए वर एवं कौतुक को दो विभिन्न पद मानते हैं । तदनुसार समपाद स्थान का प्रयोग कौतुक में वर का प्रदर्शन करने के लिए होता है ।
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दशमोऽध्यायः ४२३ दोनों पैरों को साढ़े तीन ताल के अन्तर पर स्थापित करे, जंधायें स्थिर हों, दोनों पैर त्र्यश्र अवस्था में हों तथा उनकी उंगलियाँ पार्श्व भाग की ओर हों । इसे
वैशाख स्थान कहते हैं । इसके अधिदेवता स्कन्द हैं ॥ ६१-६३ ॥
वैशाख स्थान का विनियोग- स्थानेनानेन कर्त्तव्यमश्वानां वाहनं बुधैः ॥ ६३ ॥ व्यायामनिर्गमश्चैव स्थूलपक्षिनिरूपणम् । शरासनसमुत्कर्षे व्यायामकृतमेव च ॥ ६४ ॥ रेचकेषु च कर्त्तव्यमिदमेव प्रयोक्तृभिः ।
वैशाख स्थान का प्रयोग अश्व संचालन, व्यायाम, निर्गमन, स्थल पक्षियों का निरूपण धनुष की डोरी का खींचना और अभ्यास तथा रेचक आदि कार्यों में करना चाहिए ॥ ६३-६५ ॥ ४. मण्डल स्थान का लक्षण -- ऐन्द्रे तु मण्डले पादौ चतुस्तालान्तरस्थितौ ॥ ६५ ॥
त्र्यश्री पक्षस्थितौ चैव कटिजानू समौ तथा । मण्डल नामक स्थान के अधिदेवता इन्द्र हैं । इसमें दोनों पैरों को चार ताल के अन्तर से स्थापित करे, दोनों पैर त्र्यश्र अवस्था में हों और उनकी उंगलियाँ पार्श्व भाग की ओर हों तथा कमर एवं जानु ( घुटने ) सम स्थिति में हों ॥ ६५ ६६ ॥ मण्डल स्थानधनुर्वज्रासिशस्त्राणिका विनियोग- मण्डलेन प्रयोजयेत् ॥ ६६ ॥
वाहनं कुञ्जराणां तु स्थूलपक्षिनिरूपणम् । धनुष, वज्र, तलवार आदि शस्त्रों का प्रयोग, हाथी आदि का संचालन तथा गरुड़ आदि विशाल पक्षियों के निरूपण में मण्डल का निरूपण करना चाहिए ॥६६-६७ ॥ ५. आलीढ स्थान का लक्षण- अस्यैव दक्षिणं पादं पञ्चतालान् प्रसार्य तु ॥ ६७ ॥
आलीढस्थानकं कुर्याद् रुद्रश्वास्याधिदैवतम् । उपर्युक्त मण्डल में जब दाहिने पैर को पाँच ताल के अन्तर पर फैला दिया जाता है तो आलीढ नामक स्थान कहलाता है । इसके अधिदेवता रुद्र हैं ॥ ६७-६८ ॥ आलीढ स्थान का विनियोग- अनेन कार्यं स्थानेन वीररौद्रकृतं तु यत् ॥ ६८ ॥
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४२४ नाट्यशास्त्रम् उत्तरोत्तरसंजल्पो रोषामर्ष कृतस्तु यः । मल्लानाञ्चैव संफेटः शत्रूणां च निरूपणम् ॥। ६ ९ ॥ तथाभिद्रवणं चैव शस्त्राणां चैव मोक्षणम् । वीर तथा रौद्र रस सम्बन्धी सभी कार्यों, जैसे क्रोध और अमर्षपूर्वक पारस्परिक उत्तर-प्रत्युत्तर, मल्लों का संघर्ष, शत्रुओं का निरूपण, शत्रुओं का पीछा करना, का प्रयोग करना आदि में आलीढ़ स्थान का प्रयोग करना चाहिए ॥ ६८-७० ॥ ६. प्रत्यालीढ स्थान का लक्षण- कुञ्चितं दक्षिणं कृत्वा वामं पादं प्रसार्य च ॥ ७० ॥
आलीढपरिवर्तस्तु प्रत्यालीढमिति स्मृतम् । जब दाहिने पैर को सिकोड़ कर बायें पैर को आगे फैला दिया जाय तो इसे 'आलीढ' स्थान से विपरीत होने के कारण प्रत्यालीढ स्थान कहते हैं ॥ ७०-७१ ॥ प्रत्यालीढ स्थान का विनियोग-- आलीढसंहितं शस्त्रं प्रत्यालीढेन मोक्षयेत् ॥ ७१ ॥
नानाशस्त्रविमोक्षो हि कार्योऽनेन प्रयोक्तृभिः । वस्त्रों का संधान ( चढ़ाना या उठाना ) आलीढ स्थान से करे तथा शस्त्रों का मोक्षण ( छोडना या प्रयोग ) प्रत्यालीढ स्थान से करे । अभिनेता को अन्य अनेक प्रकार के शस्त्रों का प्रयोग भी इसी 'प्रत्यालीढ' स्थान से करना चाहिए ॥ ७१-७२ ॥ शस्त्र मोक्षण सम्बन्धी चार न्यायों के नाम- न्यायाश्चैव हि विज्ञेयाश्चत्वारः शस्त्रमोक्षणे ॥ ७२ ॥
भारतः सात्वतश्चैव वार्षगण्योऽथ कैशिकः । शस्त्र मोक्षण ( शस्त्रों के प्रयोग ) के चार न्याय ( रीतियाँ ) हैं - १. भारत २. सात्वत, ३. वार्षगण्य और ४. कैशिक ॥ ७२-७३ ॥ चारों न्यायों के विनियोग- भारते तु कटीच्छेद्यं पादच्छेद्यं तु सात्वते ॥ ७३ ॥
वक्षसो वार्षगण्ये तु शिरश्छेद्यन्तु कैशिके । भारत न्याय से शत्रु की कटि का छेदन, ( काटना ), सात्वत न्याय से शत्रु पैरों का छेदन, वार्षगण्य न्याय से शत्रु के वक्षस्थल ( हृदय ) का छेदन तथा कैशिक न्याय से शत्रु के शिर का छेदन करना चाहिए ॥ ७३-७४ ॥
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दशमोऽध्यायः ४२५ न्यायों की प्रयोग विधि-: एभि प्रयोक्तृभिर्न्यायैर्नानाचारीसमुत्थितैः ॥ ७४ ॥ प्रविचाराः प्रयोक्तव्या नानाशस्त्रविमोक्षणे ।
अनेक प्रकार की चारियों से युक्त इन चारों न्यायों से अनेक प्रकार के शस्त्रों के प्रयोग के समय विविध चेष्टाओं का प्रदर्शन करना चाहिए ॥ ७४-७५ ॥ न्याय शब्द की निरुक्ति- न्यायाश्रितै रङ्गहा रैन्ययाच्चैव समुत्थितैः ॥ ७५ ॥ यस्माद् युद्धानि नीयन्ते तस्मान् न्यायाः प्रकीर्तिताः ।
न्यायपूर्वक उठाये हुए तथा न्यायपूर्वक शस्त्रुओं के अंगों पर प्रयुक्त किये हुए शस्त्रों के द्वारा युद्ध किया जाता है, इसीलिए इन युद्ध चेष्टाओं को 'न्याय' नाम से अभिहित किया जाता है ' ॥ ७५-७६ ॥ १. भारत न्याय की प्रयोग विधि- वामहस्ते विनिक्षिप्य खेटकं दक्षिणेन च ॥ ७६ ॥
शस्त्रमादाय हस्तेन प्रविचारमथाचरेत् ।
प्रसार्य च करौ सम्यक् पुनराक्षिप्य चैव हि ॥ ७७ ॥
खेटकं भ्रामयेत् पश्चात् पार्खात् पार्श्वमथापि च ।
शिरः परिगमचापि कार्यः शस्त्रेण योक्तृभिः ॥ ७८ ॥
पुनश्चकपोलस्यान्तरेखङ्गहस्तेनवापि शस्त्रस्योद्घट्टनंललितोद्वेष्टितेनतथाच ॥। ७९ ॥
खेटकेन च कर्तव्यः शिरःपरिगमो बुधैः ।
एवं प्रचारः कर्तव्यो भारते शस्त्रमोक्षणे ॥ ८० ॥
बायें हाथ में ढाल तथा दाहिने हाथ में शस्त्र हो, हाथों को भलीभांति फैलाये तथा फिर समेट ले, एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व की ओर ढाल से घुमाये, शस्त्र को खड्गशत्रु के वालेशिर केहाथचारोंको ओरललितघुमाये' या, कपोलउद्वेष्टितके समीपमुद्रा शस्त्रमें करकेको स्पर्शढाल करायेशत्रु, फिरके शिर के चारों ओर घुमाना चाहिए । भारत न्याय की यही चेष्टायें कही गई है ॥ ७६-८० ॥ १. न्याय शब्दस्यार्थं दर्शयति न्यायेनाङ्गौचित्येन यान्यङ्गोदाहरणादि न्यायादेव च परबन्धन स्वभाविताप्तिरूपात् प्रवर्तितानि तैः यत् एतयोः क्रिया अतो न्यायाख्याः । ' - अभिनवभारती२. द्रष्टव्य ९ ।.२०६ । ३. द्रष्टव्य ९.२१६ ।
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४२६ नाट्यशास्त्रम्
२. सात्वत न्याय की प्रयोग विधि- सात्वते तु प्रवक्ष्यामि प्रविचारं यथाविधि ।
स एव प्रविचारस्तु शस्त्रखेटकयोः स्मृतः ॥ ८१ ॥
केवलं पृष्ठतः शस्त्रं कर्तव्यं खलु सात्वते । सात्वत न्याय में भी ढाल तथा शस्त्रों की चेष्टायें पूर्वोक्त भारत न्याय के ही समान करनी चाहिये । भेद केवल यह है कि सात्वत न्याय में शस्त्र का प्रयोग शत्रु के शरीर के पीछे की ओर करना चाहिए ॥ ८१-८२ ॥ ३. वार्षगण्य न्याय की प्रयोग विधि- गतिश्च वार्षगण्येऽपि सात्वतेन क्रमेण तु ॥ ८२ ॥
शस्त्रखेटकयोश्चापि भ्रमण संविधीयते । शिरःपरिगमादस्मिस्तस्य शस्त्रस्य केवलम् ' ॥ ८३ ॥
उरस्युद्वेष्टनं कार्य तथांसे परितः पुनः । वार्षगण्य न्याय में पूर्वोक्त सात्वत न्याय के समान ढाल तथा शस्त्रों को घुमाना चाहिए । किन्तु शस्त्र का प्रयोग शत्रु के वक्षस्थल या कन्धे पर करना
चाहिये । ८२-८४ ॥
४. कैशिक न्याय की प्रयोग विधि- भारते प्रविचारो यः कर्तव्यः स तु कैशिके ॥ ८४ ॥
विभ्रमय्य तथा शस्त्रं केवलं मूनि पातयेत् । कैशिक न्याय में भी भारत न्याय के ही समान ढाल तथा शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए, अन्तर केवल इतना है कि कैशिक न्याय में शस्त्र का प्रहार सिर पर किया जाता है ॥ ८४-८५ ॥ चारों न्यायोंप्रविचाराश्चकी प्रयोग विधि--कर्तव्या हयेवमेतेऽङ्गलीलया ॥ ८५ ॥
धनुर्वज्रासिशस्त्राणां प्रयोक्तव्या विमोक्षणे । इस प्रकार अङ्गों की विविध चेष्टाओं द्वारा शस्त्र प्रयोग सम्बन्धी गतियों का प्रयोग धनुष, वज्र, तलवार आदि शस्त्रों के प्रयोग के समय करना चाहिए ॥ ५५-८६ ॥ रङ्गमंच पर वर्जित अभिनय- न भेद्यं नापि च च्छेद्यं न चापि रुधिरस्रुतिः ॥ ८६ ॥
रङ्ग प्रहरणे कार्यो न चापि व्यक्तघातनम् । १. 'शिरः परिगमस्तद्वछस्त्रस्येह भवेत्तथा' इति वा पाठ: काशी० ।
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दशमोऽध्यायः ४२७ रङ्ग स्थल में शत्रु के शरीर का छेदन, भेदन, रक्तपात तथा प्रत्यक्ष हत्या आदि नहीं करना चाहिए ॥ ८६-८७ ॥ संज्ञामात्रेण कर्तव्यं शस्त्राणां मोक्षणं बुधैः ॥ ८७ ॥
अथवाभिनयोपेतं कुर्याच्छेद्यं विधानतः । कुशल अभिनेताओं को केवल नाम मात्र के लिए ही शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए अथवा शत्रु के शरीरच्छेद की मुद्राओं में ( कृत्रिम रूप से ) अभिनीत करना चाहिए ॥ ८७-८८ । व्यायाम की प्रयोग विधि- ॥ ८८ ॥ अङ्गःव्यायामं कारयेत्सौष्ठवसम्यक्संयुक्तै रङ्गहारैविभूषितम्लयतालसमन्वितम् ।
सौष्ठवे हि प्रयत्नस्तु कार्यों व्यायामवेदिभिः ॥ ८ ९ ॥ अंग सौष्ठव से युक्त अंगहारों ( शारीरिक चेष्टाओं ) से तथा लयों और तालों से युक्त व्यायाम भलीभांति करे । व्यायाम की विधि को जानने वालों को चाहिए कि वे अंग सौष्ठव के लिए भलीभांति प्रयत्न करें ॥ ८८-८९ ॥
सौष्ठव का लक्षण तथा उपयोगिता- सौष्ठवं लक्षणं प्रोक्तं वर्तनाक्रमयोजितम् ।
शोभा सर्वैव नित्यं हि सौष्ठवं समुपाश्रिता ॥ ९ ० ॥
नहि सौष्ठवहीनाङ्गः शोभते नाट्यनृत्तयोः । क्रम पूर्वक संयोजित अंगों की उचित स्थिति ही सौष्ठव का लक्षण है । सभी प्रकार की शोभा सौष्ठव के ही आश्रित रहती है । सौष्ठव रहित अङ्गों बाला नाट्य एवं नृत्यकला में सफलता नहीं पाता ॥ ९० - ९ १ ॥ सौष्ठवाङ्गअचञ्चलमकुब्जंप्रयोग विधि— चासन्नगात्रमथापि च ॥ ९ १ ॥ नात्युच्चं चलपादञ्च सौष्ठवाङ्ग प्रयोजयेत् । सौष्ठवाङ्ग के प्रयोग के लिए निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए- ( १ ) शरीर चंचल न हो । ( २ ) शरीर टेढ़ा - मेढ़ा या कुबड़ा न हो । ( ३ ) शरीर के अंग परस्पर सटे हुए अथवा संज्ञा शून्य या अचेतन न हों । ( ४ ) अंग अत्यन्त ऊपर की ओर न उठे हों । ( ५ ) पैर हिलते डुलते या कांपते न हों ॥ ९ १- ९ २ ॥ सौष्ठवाङ्ग का लक्षण - - कटी कर्णसमा यत्र कूर्परांऽसशिरस्तथा ॥ ९ २ ॥
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४२८ नाट्यशास्त्रम् समुन्नतमुरश्चैव सौष्ठवं नाम तद्भवेत् । सौष्ठवांग का लक्षण यह है कि कमर, कान, कूर्पर ( कुहनी ), कन्धा तथा शिर ये सभी समानान्तर हों तथा वक्षःस्थल तना हुआ हो ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ सौष्ठवाङ्ग की उपयोगिता- अत्र नित्यं प्रयत्नो हि विधेयो मध्यमोत्तमैः ॥ ९ ३ ॥ नाट्यं नृत्तं च सर्व हि सौष्ठवे संप्रतिष्ठितम् । नाट्य नृत्त आदि सभी सौष्ठव पर ही आधारित हैं, अतः मध्यम तथा उत्तम सभी पात्रों को सौष्ठव के लिए पूर्ण प्रयत्नशील रहना चाहिए ॥ ६३.९ ४ ॥ सौष्ठव सम्बन्धी चार अङ्ग- कटिनाभिचरौ हस्तौ वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥ ९ ४ ॥ चतुरश्रमुदाहृतम् । वैष्णवं स्थानमित्यङ्ग चाहिए । वक्षःस्थल तना हुआ तथा दोनों हाथ कटि एवं नाभि पर होने । यह चारों सौष्ठव के चार अंग कहे वैष्णव स्थान का प्रयोग होना चाहिए जाते हैं ॥ ९ ४- ९ ५ ॥ धनुष सम्बन्धीपरिमार्जनमादानंचार करण- सन्धानं मोक्षणं तथा ॥ ९ ५ ॥ धनुषस्तु प्रयोक्तव्यं करणं तु चतुविधम् । जनुष के चार करण होते हैं- १. परिमार्जन, २. आदान, ३. सन्धान, ४. मोक्षण ॥ ९ ५- ९ ६ ॥ चारों करणोंप्रमार्जनंके लक्षण -परामर्श आदानं ग्रहणक्रिया ॥ ९ ६ ॥ सन्धानं शरविन्यासो विक्षेपो मोक्षणं भवेत् । १. धनुष के स्पर्श को ' प्रमार्जन ' कहते हैं ।' २. तरकश से बाण को निकालना 'आदान' कहलाता है । के अनुसार हाथों की यह स्थिति क्रमश. या युगपत् दोनों १. अभिनवगुप्त है । पहली स्थिति में दोनों हाथ एक एक करके क्रमश: पहले कटि एवं फिर नाभि पर स्थित होंगे प्रकार से हो सकती तथा दूसरी स्थिति में एक साथ पहले कटि व फिर नाभि पर अवस्थित होंगे । २. श्रीघोष ने प्रमार्जन का अर्थ धनुष मोड़ना किया है ।
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दशमोऽध्यायः ४२९ ३. धनुष पर शर सन्धान करना ' सन्धान ' होता है । ' ४. वाण को छोड़ने को 'मोक्षण ' कहते हैं ॥ ९ ६- ९ ७ ॥ व्यायाम करने की विधि- ॥ ९ ७ ॥ तैलाभ्यक्तेन गात्रेण यवागूमृदितेन च
व्यायाम कारयेत् श्रीमान् भित्तावाकाशिके तथा ।
योग्यायां मातृकाभित्तिस्तस्माद्भित्ति समाश्रयेत् ॥ ९ ८ ॥
भित्तौ प्रसारिताङ्ग तु व्यायामं कारयेन्नरम् ।
बलार्थं च निषेवेत नस्यं बस्तिविधि तथा ॥ ९९ ॥
स्निग्धान्यन्नानि च तथा रसकं पानकं तथा । शरीर में तेल लगा कर तथा जो का आटा मल कर, किसी भित्ति ( दीवार ) के सहारे या निराधार आकाश में व्यायाम करे । भित्ति के सहारे व्यायाम करने से अत्यन्त कुशलता प्राप्त होती है, इसीलिए भित्ति का ही सहारा लेना चाहिये । भित्ति के सहारे अङ्गों को फैलाकर व्यायाम करना चाहिये । बल प्राप्ति के लिये नस्य ( नाक द्वारा नहस सूंघना या घी आदि सुड़कना ) तथा बस्तिविधि ( गुदा द्वारा जल, घी आदि चढ़ा कर अशुद्ध मलांदि का निकालना ) का सेवन करना चाहिए । स्निग्ध ( चिकने ) अन्नों, रसक ( मांस आदि ) तथा पानक ( पीने योग्य बलकारक तरल पदार्थों ) का भी बल प्राप्ति के लिए सेवन करना चाहिए ॥ ९७-१०० ॥ आहार की उपादेयता- आहारेऽधिष्ठिताः प्राणाः प्राणे योग्याः प्रतिष्ठिताः ॥ १०० ॥
तस्माद्योग्यप्रसिध्यर्थमाहारे यत्नवान् भवेत् । आहार के सहारे ही प्राण स्थित हैं । प्राणों की ही शक्ति से विविध प्रकार की योग्यतायें विकसित होती हैं, इसलिए विविध योग्यताओं की वृद्धि के लिए, बलदायक आहार का ही सेवन करना चाहिए ॥ १००-१०१ ॥ व्यायाम के अनधिकारी पुरुष- अशुद्धकायं प्रक्लान्तमतीवक्षुत्पिपासितम् ॥ १०१ ॥
अतिपीतं तथा भुक्तं व्यायामं नैव कारयेत् । १. श्रीघोष के अनुसार यहाँ लक्ष्य का सन्धान अपेक्षित है । २. यह व्यायाम अङ्गहारों तथा चारियों के प्रसङ्ग में किया जाता है ।