भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 541–550

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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नाट्यशास्त्रम् ४५० हस्तकर्म विवरण श्लोक पृष्ठ ऊर्ध्वमण्डली नृत्तहस्त २०३ ३ ९ १ ऊर्ध्वसंस्थ बाहुकरण २२० ३९५ ५९.६० ३६८क कपित्थ कपोत ह १३०-१३३ ३७ ९ रहस् नृत्तहस्त १९९ ३ ९ १ कर्कट संयु १३३-१३४ ३८० कर्तरीमुख ३९ -४२ ३६५ -९० ३७२ कांगुल असंयुतहस्त ८८ केशबन्ध नृत्तहस्त १ ९ ७ ३ ९ ० ६०-६३ ३६८ख खटकामुख खटकावर्धमानक संयु हस्त १३७-१३८ ३८० ग गजदन्त १५४-१५५ ३८३ गरुडपक्ष नृत्तहस्त २०१ ३ ९ १ च चतुर असंयुक्त हस्त ९३ १०० ३७३ नृत्तहस्त १८४ ३८८ चतुरश्र "" छ छेदन हस्तकर्म १६८ ३८५ त तर्जन हस्तकर्म १६७ १ तलमुख नृत्तहस्त १८६ ३८८ ताम्रचूड (ताम्रचूल) असंयुक्त हस्त १२२-१२६ ३७८ ताडन हस्तकर्म १६८ ३८५ तिर्यक् हस्तकरण २२० ३ ९५ तोदन हस्तकर्म १६६ ३८५ नृत्तहस्त २०२ ३९ १ trद दण्डपक्ष दोल संयुतस्त १४८-१४९ ३८२ हस्तकर्म १६७ ३८५ ध धूनन नृत्तहस्त २०७ ३ ९ २ न नलिनीपद्मकोश निग्रह हस्तकर्म १६६ ३८५ नितम्ब नृत्तहस्त १ ९ ६ ३ ९ ० निषेध संयुक्तहस्त १४१-१४७ ३८१ नृत्तहस्त की ३० मुद्रायें ११-१७ OTH 89 ३६१

पृष्ठ 542

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परिशिष्ट ४५१ नाम विवरण श्लोक पृष्ठ नृत्तहस्तय पक्षप्रद्योतक २०१ ३ ९ १ पक्षवंचितक नृत्तहस्त २०० ३९ १ पताक असंयुतहस्त १८.२७ ३६२ पद्मकोश असंयुतहस्त ७९.८३ ३७१ परिग्रह हस्तकर्म ६५ ३६ ९ परिवर्तित हस्तकरण २१८ ३ ९ ४ पल्लव नृत्तहस्त १ ९ ६ ३९ ० पार्श्वग हस्तप्रचार १६ ९ ३८५ पार्श्व मण्डली नृत्तहस्त २०३ ३ ९ १ पुष्पपुट संयुतहस्त १५१-१५२ ३८२ पृष्ठानुसारी हस्तकरण २२० ३ ९५ प्रसारित हस्त करण २२१ ३ ९ ५ भ भेदन हस्तकर्म १६८ ३८५ भ्रमर असंयुतहस्त १०१-१०३ ३.४ म मकर हस्त १५२-१५३ ३८३ असंतहस्त मुकुल ११७-११९ ३७७ असंयुतहस्त 2 मुष्टि ५५-५६ ३६७ मुष्टिक स्वस्तिक नृतहस्त २०६ ३ ९ २ मृगशीर्ष असंयुतहस्त ८६-८७ ३७२ मोक्षण हस्तकर्म १६७ ३८५ मोटन हस्तकर्म १६८ ३८५ र रक्षण हस्तकर्म १६७ ३८५ रेचित नृत्त हस्त १ ९ ३ ३९ ० लताख्य नृत्तहस्त ल १९८ ३ ९ १ ललित नृत्तहस्त २०१ ३ ९ ३ हस्तप्रचार १८२ ३८८ वर्धमान हस्त १५८-१५९ ३८४ वलित नृत्तहस्त २०९ ३ ९ ३ विकर्षण हस्त कर्म १६६ ३८५ विक्षेप हस्तकर्म १६७ 32 विप्रकीर्ण ( विप्रकीर्णक ) १८७ ३८ ९ नृत्तहस्त

पृष्ठ 543

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४५२ नाट्यशास्त्रम् हस्त कर्म 98120 विवरण श्लोक . वियोग हस्तकर्म १६७ ३८५ ०४ ७ 31 Ear विसर्ग हस्तकर्म १६७ " व्याकर्षण हस्तकर्म १६६ व्यावर्तित हस्तकरण २१७ ३ ९४ कर्म का श शिखर हस्त ५७.५८ ३६७ असंयुतहस्त ५३.५४ ३६६ अ अग्रतल स शुकतुण्ड असंयुतहस्त ११०-११६ ३७६ अश्चितस संदेश ( अग्र, मुख पार्श्व ) संयुतहस्त की १३ मुद्राए ८-१० ३६० अपसृत सर्पशिरा असंयतहस्त ८४-८५ ३७२ आ आभुग्न संश्लेष हस्तकर्म १६७ ३८५ आवर्तित सूचीमुख ( सूच्याख्य ) असंयतहस्त ६५-६८ ३६ ९ उ उदरकर्म सूचीमुख ( सूच्याख्य ) नृत्तहस्त १ ९१-१९ २ ३८४ उदरकर्म स्थित हस्तप्रचार १८२ ३८८ उदरकर्म स्फोटन हस्तकर्म १६८ ३८४ उद्घट्टित स्वस्तिक बाहुकरण २२० ३ ९५ उद्वर्तन स्वस्तिक संतहस्त १३५-१३७ ३८० उवाहित स्वस्तिक नृत्तहस्त १८७ ३८९ उद्वाहि हस्तप्रचार के ३ भेद १६ ९ ३८५ उद्वाहि हस्तप्रचार के ५ भेद १८२ ३८८ उन्नत हाथ के ४ करण २१४-२१८ ३९४ उर: कर्म हाथ ( बाहु ) के १० लक्षण २२०-२२१ ३ ९ ५ ऊरुकर्म हाथ ( बाहु ) के १० करण २१०-२२१ ३ ९ ५ क कटि चे १६६-१६८ ३८५ हस्त के २० कर्म कटिक १०६-१०९ ३७५ हस्तपक्ष असं हस्त कम्पन हंसवक्त्र (हंसास्य ) असं तहस्त १०४-१०५ ३७५ कम्पिता त्र त्रिपताक असंयुतहस्त २८-३८ ३६३ च त्र्यश्र हस्तप्रचार १८२ ३८८ ख खल्व च चलित छ छिन्न

पृष्ठ 544

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PROPESIF FIF I RE ७. उर, पाश्व, उदर, कटि ऊरू, जंधा, पाद कर्मों की सूची ( नाट्यशास्त्र नवम अध्याय ) कर्म का नाम विवरण श्लोक पाद कर्मअ अग्रतल संचर २७३-२७५ ४०५ अश्चित पाद कर्म २७५-२७७ ४०५ पार्श्व कर्म २३८ ३ ९ ८ अपसृत आ आभुग्न उरः कर्म २२४ ३९ ५ आवर्तित जंघाकर्म २५८-२५९ ४०२ उ उदरकर्म के ३ भेद २४१ ३ ९८ उदरकर्म के ४ भेद २४३ ३ ९९ उदरक के विनियोग २४२-२४३ ३९ ८ पादकर्म उद्घ २६६.२६८ ४०३ उद्वर्तन ऊरुकर्म २५३ ४०० उद्वाहित ऊरुकर्म २३१ ३९६ उद्वाहित २४७ ३९९ जंघाकर्म उद्वाहित २६१ ४०२ उन्नत पार्श्व कर्म २३६ ३९ ७ उर:कर्म के ५ भेद २२३ ३ ९ ५ ऊरुकर्म के ५ भेद २५० २५१ ४०० ऊरुकर्म के विनियोग २५४-२५६ ४०१ क कटि चेष्टा के ५ भेद २४४२४५ ३९९ कटि कर्म के विनियोग २४८-२५० ३९९ कम्पन उत्कर्म २५१ ४०० २४४ ३९९ कम्पिता कटिचेष्टा पादकर्म २७७-२७९ ४०६ २४१ ३९ ८ ख खल्व उदरकर्म च चलित पादकर्म २७० ४०४ छ छिन्न कटिकर्म २४५ ३९९

पृष्ठ 545

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४५४ नाट्यशास्त्रम् कर्म का नाम बिवरण श्लोक पृष्ठ ज जंघा कर्म के ५ भद २५७-२५८ ४०१ जंघा कर्म के विनियोग २६२-२६५ ४०३ जंघा कर्मन नत २६० ४०२ नत पार्श्वकर्म २३५ ३९७ निर्भुग्न उरुकर्म २२६ ३ ९ ६ निवर्तन उरुकर्म २५३ ४०० निवृत्त कटिकर्म २४६ ३९९ प परिवृत्त जंघा कर्म २६२ ४०२ पाद कर्म के ५ भद २६५.२६६ ४०३ पाश्र्वकर्म के ५ भेद २३४ ३९७ पार्श्वकर्म के विनियोग २३ ९ -२४० _३९ ८ घूर्ण उदरकर्म २४१ ३९८ प्रकम्पित उरुकर्म २२९ _३९ ६ प्रकम्पित कटिकर्म २४७ _३९९ प्रसारित पार्श्वकर्म २३७ ३ ९ ७ र रेचित कटिकर्म २४६ ३९९ उरुकर्म व बलन २५२ ४०० विवर्तित पार्श्वकर्म २३७ ३ ९ ७ उरुकर्म स सम २३२ ३ ९७ सम पादकर्म २६८-२६९ ४०४ सम उदरकर्म २४३ _३९९ स्तम्भन उरुकर्म २५२ ४०० स्थिर पादकर्म २६ ९ ४०४ सूचीपाद पादकर्म २७ ९ -२८० ४०६ क्ष क्षाम उदरकर्म २४१ ३९८ क्षिप्त जंघाकर्म २६०-२६१ ४०२ पादकर्म त्र त्र्यश्रा २७०-२७३ ४०४

पृष्ठ 546

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८. चारियों, स्थानकों तथा न्यायों की सूचो ( नाट्यशास्त्र दशम अध्याय )

श्लोक पृष्ठ नाम विवरण

भौमीचारी २३ ४१३अ अड्डिता आकाशीयचारी ३० ४१५ अतिक्रान्ता भौमचारी १७ ४१२ आकाशीयचारी अपक्रान्ता ३१ ४१६ अपस्यन्दिता भौमी चारी २६ ४१४ ४१८ अलाता आकाशीयचारी आ आकाशिकी चारियों का विनियोग ४६ ४१९ ४१७ आक्षिप्ता आकाशीयचारी आदान का लक्षण धनुःकरण चतुर्थकरण ९ ६ ४२८ आलीढस्थानक का लक्षण स्थानक ६८-६७ ४३३ आलीढ स्थानक का विनियोग ६८-७० ४२३ आविद्धा आकाशीयचारी ३८ ४१७ आकाशीयचारी ३९ ४१७ उ उद्वृत्ता उत्स्पन्दिता भौमीचारी २४ ४१४ ४१६ ऊ ऊर्ध्वजानु आकाशीयचारी भौमीचारी ऊरूद्वृत्ता २२ ४१३ ४१३ भौमीभारी ए एडकाक्रीडिता ३ उत्तरार्ध ४० ९ क करण का लक्षण कैशिक न्याय का प्रविचार ८४-८५ ४२६ कैशिक न्याय का लक्षण ७४ द्वितीयचरण ४२४ खण्ड का लक्षण ४ पूर्वार्ध ४० ९ च चाषगति भौमीचारी १८ ४१२

पृष्ठ 547

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४५६ नाट्यशास्त्रम् पृष्ठ नाम विवरण श्लोक चारी का लक्षण १ ४०८ १६ भौमी चारियां ८-१० ४१० VPS SIPPSTF १६ आकाशिकी चारियाँ ११-१३ ४११ ज जनिता ४१४ भौमचारी २५ ड डोलापादा (दोलापादा) ४१६ आकाशीयचारी ३६ द दण्डपादा ४१ ९ आकाशीयचारी ४४ घधनुष के चार करण ९५ उ० ९ ६ पू ४२८ न नूपूरपादिका ४१६ आकाशीयचारी ३५ न्याय के चार भेद ७२उ० ७३५० ४२४ न्याय का लक्षण ७५ उ० ७६ प० ४२४ न्याय का विनियोग ७३ उ ० ७४ पू० ४२४ प पार्श्वक्रान्ता ४१६ आकाशीयचारी ३२ प्रत्यालीढ़ स्थानक का लक्षण ४२४ स्थानक ७० उ० ७१ पू० प्रत्यालीढ का विनियोग ७१ उ० ७२ पू० ४२४ ४२८ ( ) प्रमार्जन धनुकरण का लक्षण ९ ६ तृतीय चरणब बदा भौमीचारी ४१३ भ भारत न्याय का ४२५ ( ) प्रविचार गति ७६३० ८० ४२४ भारतन्याय का लक्षण ७३ तृतीय चरण ४१८ भुजंगत्रासिता आकाशीयचारी ४२ ४१ ९ भ्रमरी आकाशीयचारी ४५ ४१५ भौमचारियों का विनियोग २ ९म मण्डल का लक्षण ४ उत्तरार्ध ४० ९ मण्डल स्थान का लक्षण स्थानक ६५-६६ ४२३708 ४२३ मण्डल स्थान का विनियोग ६६-६७ ४१५ मत्तल्ली भौमीचारी २८ मृगप्लुता (हरिणप्लुता ) आकाशीयचारी ल ४१८ ४२८ मोक्षण धनुःकरण ९५ वार्षगण्य न्याय का ४२६ प्रविचार Grefl८२ उ० ८४ पू०

पृष्ठ 548

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परिशिष्ट ४५७ नाम विवरण श्लोक पृष्ठ ७४ प्रथम वारण ४२४ वार्षगण्य न्याय का लक्षण १९ ४१३ विच्यवा भौमीचारी ४० ४१८ विशुद्धान्ता आकाशीयचारी ४२२ वैशाखस्थानक का लक्षण ६१ उ ० ६३ पू० ६३३० ६५ पू० ४२३ शाखस्थानक का विनियोग वैष्णवस्थानक ९ ४ ३० ९ ५ पू० ४२८ वैष्णवस्थानक का लक्षण ५२५३ ४२० ४२१ वैष्णव स्थानक का विनियोग ५४.५८ २,८८३०८९ ४०८, ४२७ व्यायाम का लक्षण ४२ ९ ७९ ३० १०३ व्यायाम की विधि भौमचारीश शकटास्या १ ९ ४१२ ९७ प्रथमचरण ४२८ सन्धान धनुःकरण स ५८-५९ ४२२ समपादस्थानक का लक्षण समपादस्थानक का ४२२ विनियोग ५९ ० ६१ पू० भोमीचारी १४ ४११ समपादा भौमीचारी २७ ४१५ समोत्सरितमत्तल्ली ८१-८२ पू० ४२६ सात्वत न्याय का प्रविचार सात्वत न्याय का लक्षण ७३ चतुर्थ चरण ४४ ४१६ सूची आकाशीयचारी ३४ ४२८ सौष्ठवांग की प्रयोग विधि ९ १ ३० ९ ४० ४२७ सौष्ठवांग का लक्षण ९०.९ १ पू० ४१२ स्थितावर्ता भौमचारी १५ ४१४ ४१८ स्यन्दिता ( ) भोमीचारी २६ हरिणता मृगता आकाशीयचारी ४३

पृष्ठ 549

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काही मृदुललितपदार्थ गूढशब्दार्थहीनं बुधजनसुखभोग्यं युक्तिमन्नृत्तयोग्यम् । बहुरसकृतमार्ग सन्धिसन्धानयुक्तं भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२९ ॥

जगत् में वही नाटक दर्शकों के देखने के योग्य होता है जिसमें कोमल एवं ललित पदार्थ हों, जो शब्द के गूढ़ अर्थों से हीन हों, जो जिले के एवं प्रान्त के और राष्ट्र के निवासियों के सुख से भोग्य हो । युक्तियों के साथ जिसमें वृत्त की योजना कीयुक्तगईहो । हो तथा रस के मार्ग जिसमें बहुत हों और जो-सन्धियोंना० शा०के १६.१२सन्धान९से। (

पृष्ठ 550

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PERPE P

श्लोकार्थानुक्रमणिका

अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ३६७, ३८०अंशभागैर्भवद्भिस्तु २७अंशांशैर्भाषितं भावान् २३ अङ्गष्ठः कुञ्चितश्चैव ३७५अंसो प्रशिथिलो मुक्तो ३८२ अचञ्चलमकुब्जं च ४२७अक्षराणां कलायास्तु २११ अचल चाप्यकम्पञ्च: ५३अक्षिनिमीलोच्छ्वसनैः ३०७ अचलैर्मधुरैर्गात्र ४३०अग्निकुण्डाज्य कुण्डौ १४ अञ्चितं वामहस्तं च १४२: अश्वित कुञ्चितश्चैव ४०३अग्नी होमं ततः कुर्यात् ८४अग पृष्ठो वापि ४१ ९ अञ्चितः पृष्ठतः पादः १११ अग्रतः पृष्ठतो वापि ४१३ अश्चितश्चरणश्चैव १२४ अङ्गनैपथ्यवाक्यैश्व २७२ अश्चितः स्यात् करो वामः ११० अश्विताऽपसृतोद्बद्ध- ३५७ अङ्गवस्तुनिवृत्ती तु १६३, १६६ अङ्गहारप्रयोगे तु १५५ अञ्चितापसृतौ पादौ १२२ अञ्चितेन तु पादेन १०३ अङ्गहारवि निष्पन्नं ३२ ९ १३ ९ अङ्गहारेषु वक्ष्यामि ९ ३ अङ्गहारैश्च देव्यस्ताः २०३ अञ्चितो नासिकाग्रे तु १०५ अश्चितो कूर्परांसौ तु ३९० अङ्गकर्माणि शेषाणि ३५८ बाहुशिरसि १०१ अङ्क शरज्वाकर्षण- ३६८ अञ्जलिश्च कपोतश्च ३६० अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः ३२८ अड्डितश्च पुनर्वाम ४३ अङ्गसौष्ठव संयुक्तैः ४२७ अङ्गानां तु परावृतो १६२ अड्डितं शकटास्यं च ४३ अङ्गाभिनय मेवातो ३२८ अड्डिता चात्र कर्तव्या १९ ५ ': अड्डितायाः प्रयोगज्ञ २१३ अङगुलं च तथा हस्तः ४३ अणवोऽष्टौ रजः प्रोक्तम् ४३ अङगुलानि तथा हस्तः ४३ अङ्गुल्यः करणं विप्राः ३९ ४ अण रजश्च बालश्च ४३ अत ऊध्वं न कर्तव्यः ४४ अगुल्यस्संयुता वक्रा ३७८ अत ऊध्वं प्रवक्ष्यामि २७७, ३८८, ४३० अङ्गुल्यः संहता सर्वाः ३७२ अङ्ग ल्यग्रस्वस्तिकयोगान् ३६६ अङ्ग यश्चाश्विताः सर्वा ४०५, ४०५ अत ऊध्वं व्याख्यास्ये ३९ ५