भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 11–20

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 11–20

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( ८ ) ४ या ५ वर्षों पूर्व से ही सन्दर्भ ग्रन्थ अनुशंसित हो चुका है । मैं उन सभी मनीषी प्राध्यापकों एवं नाट्यविद्या के अन्वेषक एवं अधीतिजन का भी आभारी हूँ जिनने इसी संस्करण को प्रेमपूर्वक अपनाया और मुझे प्रोत्साहित किया । आशा है इस संस्करण का पूर्ववत् अब भी सभी कोनों से इसी भावना से अनुशीलनादि होता रहेगा । प्रकृत संस्करण पर अनेक पत्र - पत्रिकाओं एवं भारत के मान्य मनीषी जन के आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं जिनके प्रति अपनी विनम्र कृतज्ञता प्रकट करता हूँ तथा इनकी कृपा की सदैव अपेक्षा को अनुभव कर रहा हूँ । प्रकृत ग्रंथ को अपनी विश्रुत ग्रन्थ - परम्परा में प्रकाशित करने की भावना वाले चौखम्भा संस्कृत संस्थान के संचालक भाई श्री मोहनदास जी गुप्त तथा उनके समग्र परिवार जन का भी आभारी हूँ जिनने प्रथम संस्करण के समाप्त होने के कुछ समय बाद ही इस भाग का पुनर्मुद्रण आरम्भ कर इस ग्रन्थ को शीघ्र उपलब्ध करवाया । इस क्रम में प्रेस के सभी कार्यकर्तागण तथा व्यव-स्थापक का भी स्मरण करना आवश्यक है । मित्र श्री कपिलदेव गिरि ने यथासंभव प्रूफ की त्रुटियों का निराकरण किया है । अत एव मैं इन सभी के प्रति अपना विनम्र हार्दिक आभार मानता हूँ । अन्त में सभी मित्रों एवं स्नेहीजन को इस संस्करण को ' पूर्ववत् कृपा के साथ अपनाते हुए मुझे प्रोत्साहित करने की प्रार्थना है । श्रावणी पर्व विद्वज्जन- कृपाकांक्षी दिनांक २३-८-८३ बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री

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पुरोवाक् भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का ' प्रदीप'व्याख्यादि के साथ प्रस्तुत संस्करण का प्रकाशन आज से कई वर्ष पूर्व ही हो जाना चाहिए था, परन्तु समय की प्रतिकूलता ने ऐसा नहीं होने दिया । इसका एक कारण तो इस ग्रन्थ का दूरस्थ वाराणसी में मुद्रण तथा मेरा शासकीय सेवा के कारण अनेक स्थानों पर परिवर्तन भी है; जिसने इस कार्य को थोड़ा शीघ्रता से प्रस्तुत नहीं होने दिया । दूसरा प्रमुख कारण था नाट्यशास्त्र खण्ड एक के अन्तिम भाग के मुद्रण काल में ( जब अतिरिक्त टिप्पणियों का मुद्रण चल रहा था ) मेरे स्वास्थ्य का सहसा अतिशय बिगड़ जाना । मुझे अपनी वातजन्यव्याधि तथा वृक्क में होने वाले विकार के निरन्तर रहने के कारण भी इस ओर से ध्यान हटाना पड़ा, यह व्याधिक्रम भी लगभग एक से डेढ़ वर्ष तक चला ( जिसमें गृध्रसीवात तथा वृक्क के सभी उपचार एवं चिकित्सा के दौर में मुझे आना पड़ा ) इस प्रकार एक तो वाराणसी दूरस्थ होने तथा मेरे कुछ वर्षों तक अस्वस्थ हो जाने के कारण नाट्यशास्त्र के प्रकाशन में अप्रत्याशित विलम्ब हो गया । इसकी हिन्दी व्याख्या अनुवादात्मक रूप में की गयी है तथा आवश्यक होने पर कुछ व्याख्यात्मक रूप में भी, इसका कारण विषय की गम्भीरता है । क्योंकि नाट्यशास्त्र के विभिन्न स्थलों की व्याख्या करते समय कला, शिल्प, वास्तु तथा संगीत आदि शास्त्रों की प्राचीनपरम्परा को ध्यान में रखना पड़ता है, जो आज के व्याख्याकार के लिये कठिन स्थिति निर्मित कर देती है । इसका दूसरा कारण यह भी है कि एक ही व्यक्तिद्वारा विस्तीर्ण क्षेत्र पर अधिकार रखते हुए मूल सम्पादन एवं व्याख्या लेखन के कार्य को सम्पन्न करना और नाट्यशास्त्र में चर्चित संगीत आदि शास्त्रों के प्राचीनतर रूप को प्रतिपादित करते हुए परम्परानुसारी दृष्टि से भी व्याख्या का

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( १० ) आलेखन करना । इस प्रकार की स्थिति प्रत्येक नाट्यशास्त्र के सम्पादक या - संस्कर्ता व्याख्याकार के समक्ष अवश्य उपस्थित होती है । इस प्रसंग में भरत मुनि के आशय को काश्मीरिक परम्परा के पाठों से स्पष्ट करने वाली एकमात्र आचार्य अभिनवगुप्त प्रणीत नाट्यशास्त्र की व्याख्या अभिनव-भारती ही सहायक है । जिसमें नाट्यशास्त्र में अभिहित विषयों ( जैसे रस, भाव, रूपकस्वरूप, नाट्यङ्ग, सन्ध्यङ्ग आदि ) का अपनी परम्परा के अनुसार व्याख्यान किया गया है । यह व्याख्या नाट्यशास्त्र के व्याख्यान लेखक को अतिशय सहायता तो करती है पर फिर भी जिन अध्यायों पर यह व्याख्या प्राप्त नहीं है या किन्हीं स्थानों पर इसके द्वारा अल्परूप में ( विषयों का व्याख्यान किया गया है या फिर किसी अंश का खण्डित या संदिग्ध पाठ है तो ऐसे स्थलों पर अनुवादक या व्याख्याकार को अर्थ स्पष्ट करते समय असहाय स्थिति में आकर अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता हो जाती है । कुछ विद्वान् नाट्यशास्त्र की अभिनवगुप्त प्रणीत व्याख्या को भरत के दृष्टिकोण को सुस्पष्टतया प्रस्तुत करने में अधिक सहायक नहीं मानते हैं । इनके मत में नाट्यशास्त्र के अनेक स्थानों की अभिनवभारती के आधार पर अधिक स्पष्ट व्याख्या करना सम्भव ही नहीं है । इतना होने पर भी अभिनवभारती के आधार को लेकर व्याख्यान करना अधिक प्रामाणिक है, ऐसा मेरा अपना मत है । हाँ, यह अवश्य है कि नाट्यशास्त्रीय प्रमेयों को प्राचीन परम्परागत नाट्य या संगीत के ग्रन्थों में या विवरणों के शास्त्रीय विवेचनों को देखकर ही स्पष्ट करना चाहिए । इसी भावना को सर्वदा बनाये रखकर इस ग्रन्थ की हमने यह व्याख्या लिखी है तथा साहित्यशास्त्र के एक सुप्रसिद्ध व्याख्यान के अनुकरण पर इस व्याख्यान का नाम भी ' प्रदीप ' दिया है । प्रयत्न किया गया है कि यह व्याख्यान अपने पूर्व परम्परागत गौरव का अनुसरण करते हुए ठीक से शास्त्रीय तत्त्वों को उपस्थापित करे तथा उनमें स्थित गम्भीर आशयों को स्पष्ट करे । अपने इस प्रयास की सफलता भी कालिदास के शब्दों को ध्यान में रखकर विद्वानों के परितोष पर ही हम निर्भर मानते हैं ।

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( ११ ) आरम्भ में हिन्दी व्याख्यान के साथ संक्षिप्त हिन्दी टिप्पणियाँ जोड़ी गयी थीं तथा यह निश्चय हुआ था कि विस्तीर्ण व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ परिशिष्ट में दे दी जाएँ जिनमें अभिनवगुप्तपाद की अभिनव-भारती व्याख्या के आवश्यक सभी विवरण को रखा जाए । परन्तु बाद में यह निश्चय हुआ कि इस प्रकार की विस्तीर्ण टिप्पणियाँ जिनमें अभिनव-गुप्त का आधार तो लिया ही गया है तथा जो अनेक अन्य ग्रन्थों के आधार पर भी निर्मित की गयी हैं उन्हें मूल ग्रन्थ के व्याख्यान के नीचे ही यथास्थान लगा देना अधिक उपयुक्त रहेगा । इसी कारण प्रथम अध्याय से चतुर्थ अध्याय तक के अंश की विस्तीर्ण टिप्पणियाँ परिशिष्ट -१ में लगायी गयीं तथा शेष भाग अर्थात् अध्याय ५ से ७ तक की टिप्पणियाँ मूल भाग की व्याख्या के यथास्थान नीचे लगायी गयी हैं तथा परिशिष्ट में भी हैं । इस प्रकार करने से यद्यपि पाठकों को थोड़ी असुविधा अवश्य ही होगी परन्तु नाट्यशास्त्र के अगले संस्करण में ही इन टिप्पणियों को मूल व्याख्यान के नीचे व्यवस्थित कर लगाना संभव हो सकेगा । सम्प्रति इस असुविधा के लिये पाठकों से क्षमा प्रार्थना ही एक मात्र अवलम्बन है । प्रस्तुत संस्करण में षष्ठाध्याय के रससूत्र व्याख्यान के प्रसंग में अभिनवभारती व्याख्या का मूल सहित सम्पूर्ण भाग भी हिन्दी व्याख्यान के साथ लगाया गया है । इससे रसविषयक नाट्यशास्त्रीय अध्ययन-क्रम को ( आवश्यक सामग्री एवं विवरण के साथ एक साथ उपलब्ध करने के कारण ) पाठक व्यवस्थित रूप से प्राप्त कर सकेंगे । इस प्रसंग में हमने शान्त रस की निरूपक नाट्यशास्त्र की कारिकाएँ तथा उनकी समग्र अभिनव-भारती की हिन्दी व्याख्या मात्र लगायी है । शान्तरस का भाग यद्यपि भरताचार्य के आठ नाट्यरसों की विवेचना से पृथक् पड़ता है, किन्तु अभिनवभारती के पाठ के आधार पर उसे यहाँ संगृहीत कर लेना उपयोगी होने के कारण किया गया है । यहाँ क्रम के अनुसार इन कारिकाओं की संख्या भी लगा दी गयी है, परन्तु आवश्यकतानुसार इन्हें अलग भी रखा जा सकता है तथा यदि इनको उद्धृत करना कहीं इष्ट हो तो उन्हें संख्या देकर प्रस्तुत भी किया जा सकता है ।

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( १२ ) नाट्यशास्त्र के इस समग्र ' प्रदीप ' व्याख्यान को सुसम्पादित एवं पाठान्तर आदि के अतिरिक्त पद्यार्थानुक्रमणिका आदि के परिशिष्टों के साथ चार भागों में प्रकाशित करने की योजना है । इसमें प्रत्येक खण्ड में उसी भाग से सम्बद्ध विषय की प्रस्तावना में विवेचना रखी गयी है, जिससे नाट्यविषय व्यापक और सूक्ष्म अध्ययन को बढ़ावा मिलने की आशा है । मैं इस कार्य में अपने प्रकाशक श्री भाई मोहनदास जी गुप्त एवं श्री भाई विट्ठलदास जी गुप्त का अतिशय कृतज्ञ हूँ जिन्होंने इस महत्व-पूर्ण ग्रन्थ के प्रकाशन कार्य को लिया तथा उसे बड़े ही धैर्य के साथ पूर्ण-करवाने में रुचि रखी । इस अवसर पर चौखम्बा से सम्बद्ध श्री देवनारायण झा तथा सुहृद्वर श्री पं ० रामचन्द्र ' झा व्याकरणाचार्य के सहयोग को भी भुलाया नहीं जा सकता, जिनके प्रयत्नों से ही यह ग्रन्थ ठीक से मुद्रित हो सका और आज प्रस्तुत रूप में प्रकाशित हो रहा है । मेष संक्रान्ति सुखीजन - कृपाकांक्षी वि ० सं ० २०२६ बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री

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प्रस्तावना कला का उत्कृष्ट रूप काव्य है और उत्कृष्टतम रूप है नाटक, जिसका प्रतिपादक सर्वप्राचीन भारतीय ग्रन्थ है भरतमुनि का नाट्यशास्त्र- -जो अपनी विचारों की व्यापकता के साथ साथ विषयगत समग्रता से परिपूर्ण है । भार तीय नाट्य कला पर विचार करते समय नाट्यशास्त्र सदा सम्मुख आ जाता है, क्योंकि यह महान् ग्रन्थ नाट्य कला के अतिरिक्त उसके आनुषंगिक विषयों, जैसे - काव्य, सङ्गीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है । इस ग्रन्थ ने भारत की रङ्गमश्वीय कला को शताब्दियों से प्रभावित कर रखा है— क्योंकि इस अकेले ग्रंथ में नाट्य विषयक विवरण जितनी समग्रता के साथ प्रस्तुत हुआ है वह किसी अन्य उत्तरकालीन भारतीय ग्रन्थ में तो दुर्लभ है ही, तत्कालीन संसार के किसी अन्य ग्रन्थ में भी प्राप्त नहीं होता । इसका कारण यह भी है कि भारतीय नाट्यकला की नाट्यशास्त्र को छोड़कर कल्पना करना सम्भव ही नहीं है और प्राचीनभारत में व्यवहृत नाट्यकला के स्वरूप, तत्व तथा प्रकृति को पूर्णतः हृदयङ्गम करने के लिए एकमात्र नाट्यशास्त्र ही आलम्बन है । इस ग्रन्थ में नाट्य तथा रङ्ग से सम्बद्ध काव्य, शिल्प, सङ्गीत, नृत्य आदि ललित कलाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है तथा विविध शास्त्रों, शिल्पों, कलाओं तथा प्रयोगों की चर्चा की गयी है । ग्रन्थ की इसी विविधता ने इसे काव्य, नाट्य, शिल्प तथा ललित विद्याओं का विश्वकोष बना दिया । इसमें भरत मुनि ने नाट्यकला को ( व्यवस्थित कर ) जो स्वरूप प्रदान किया, वह इतना व्यापक, सूक्ष्म तथा तात्विक हुआ कि परवर्ती आचार्यों को इसी के प्रभाव तथा छाया में आकर ही अपना विश्लेषण प्रस्तुत करना पड़ा । भरत के नाट्य- सिद्धान्तों में मौलिकता तथा व्यापकता के ऐसे बीज हैं, जिनकी शाश्वती स्थिति आज भी नाट्य - रचना में ( सफलतापूर्वक ) देखी जा सकती है । भरत का चतुविध अभिनय - सिद्धान्त, गीत एवं वाद्यविधि, पात्रों की विविध प्रकृति तथा भूमिका आदि का विवेचन विश्व की किसी भी उन्नत नाट्यकला के प्रतिपादक ग्रन्थ से न्यून नहीं ठहरता तथा आज भी इसमें उन नाट्य तत्वों की ग्राह्यता बराबर बनी हुई है । भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र ने शाश्वत भारत का ऐसा स्वरूप उपस्थित किया जिसमें काव्य, नाट्य, सङ्गीत तथा नृत्य जैसी सुकुमार ललित कलाओं के द्वारा मानव के शाश्वत जीवन की कल्पना की गई थी । नाट्य के सांगोपांग तथा सर्वाङ्गीण वर्णन ने नाट्य शास्त्र

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( २ ) को जो अप्रतिम स्वरूप, सौभाग्य तथा स्थान प्रदान किया वह आज तक अक्षुण्ण है । नाट्यशास्त्र में वर्णित शिल्पों तथा विद्याओं की प्राचीन परम्परा यद्यपि पूर्णतः स्थिर नहीं रही, मध्यकाल में इनमें थोड़े बहुत परिवर्तन भी हुए पर फिर भी नाट्यशास्त्रीय प्रमेय अपनी स्पष्टता तथा ग्राह्यता की स्थिति को अपरिवर्तित रखने में समर्थ रहा यह आश्चर्य ही | आचार्य भरतमुनि ने भारत की समस्त कला - चेतना को अपनी प्रतिभा से अनुप्राणित किया था जिसका कीर्तिस्तम्भ है उनका आकर ग्रन्थ ' नाट्यशास्त्र ' । नाट्यशास्त्र का स्वरूप ललित कलाओं के विश्वकोष इस ग्रन्थ ने भारत की उदात्त कला चेतना को अनुप्राणित किया है । इसी कारण शास्त्रकारों ने नाट्यशास्त्र को नाट्य-वेद तथा इसके प्रणेता भरताचार्य को मुनि के रूप में आदर से स्मरण किया । वर्तमान उपलब्ध नाट्यशास्त्र के छत्तीस ( या कुछ संस्करणों में सैंतीस ) अध्याय हैं तथा इसका आयाम छः सहस्र श्लोकों का है । इसी तथ्य का संकेत आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी प्रसिद्ध नाट्यशास्त्र व्याख्या अभिनवभारती में किया है । शारदातनय तथा इसके उत्तरवर्ती अनेक शास्त्रकारों ने नाट्य-शास्त्र के दो संस्करणों या पाठों का उल्लेख किया है । इनके अनुसार नाट्य-वेद के बृहत् तथा लघु दो पाठ थे, जिनमें क्रमशः छः तथा बारह हजार श्लोक या ग्रन्थ ( एक श्लोक की अक्षर संख्या ३२ मानकर तदनुसार ग्रन्थ संख्या की गणना की जाती है ) का प्रमाण था । म ० म ० रामकृष्ण कवि ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए बतलाया कि द्वादशसाहस्री संहिता वृद्धभरत की रचना थी जिसे संक्षेप करते हुए भरत मुनि ने छः सहस्र श्लोकों में नाट्य-शास्त्र का संकलन किया । प्राचीन ग्रन्थ का नाम नाट्यवेद था तथा दीर्घ या द्वादशसाहस्री का पाठ ही प्राचीन पाठ था; जिसके कुछ अंश प्राप्त भी ( हो गए ) हैं । अन्य विद्वान् श्री रामकृष्ण कवि के इन तर्कों से सहमत नहीं हैं । उनका मत है कि लघु या षट्साहस्रीसंहिता का पाठ ही प्राचीन है जिनमें अन्य प्रक्षेपों तथा विषय - विस्तरों को जोड़कर विस्तृत बनाना ही उत्तरवर्ती पाठ की स्थिति तथा आयाम को तार्किक सहारा देने योग्य बनाता है । धनञ्जय,, भोज एवं आचार्य अभिनवगुप्त के समय तक दोनों पाठों की परम्पराएँ चल रही थीं । धनञ्जय ने नाट्यशास्त्र के षट्साहस्री रूप को तो भोजराज ने द्वादशसाहस्त्री या बृहत् पाठ को अपनी रचना का आधार माना था । परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी सुप्रसिद्ध अभिनव भारती टीका नाट्यशास्त्र के षट्साहस्री पाठ पर ही लिखी थी । इन दोनों पाठों ( के बनने ) का

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( ३ ) कारण भी शारदातनय ने अपने भाव प्रकाशन में सविवरण दिया है । तदनु-सार मूल नाट्यवेद को मनु के आग्रह पर दो रूप में विभाजित किया गया था जिनमें एक षट्साहस्री तथा दूसरी द्वादशसाहस्री थी । द्वादशसाहस्री का पाठ सदाशिव भरत की परम्परा में प्रचलित था । यमलाष्टकतन्त्र के अनुसार नाट्यवेद का विस्तार छत्तीस हजार श्लोकों का था । जिसे संक्षिप्त रूप में द्वादशसाहस्री में प्रतिपादित किया गया; परन्तु यह विव-रण उत्तरकालीन किसी भी नाट्यशास्त्रीय विवरण से मेल नहीं खाता और न ही शारदातनय के वर्णन से कहीं समानता प्राप्त करता है, अत एव इसे निराधार कल्पना मान कर प्रसन्न हुआ जा सकता है । यदि ' गान्धर्ववेद ' अपने सैद्धान्तिक विवरणों में संगीत रत्नाकर जैसे उत्तरवर्ती ग्रन्थों से जहाँ विषयगत समानता रखता हो तो फिर नाट्यवेद के विवरण भी इसी परम्परा में होने आवश्यक थे । इस विषय में दूसरा तर्क यह भी है कि वर्तमान नाट्यशास्त्र को कहीं भी षट्साहस्री - संहिता से यद्यपि अभिन्न नहीं निर्देशित किया गया है तथापि धनिक जैसे प्रथितयशस्क आचार्य तथा उत्तर-वर्ती अनेक आचार्यों के द्वारा नाट्यशास्त्र के जिस विवरण को उपस्थापित किया जा रहा है वह निस्सन्दिग्धरूप से षट्साहस्री - संहिता ही है जो वर्तमान नाट्यशास्त्र का लघुपाठ ( वाला संस्करण ) हैं, पर इसे द्वादशसाहस्री का प्रतिषेधक नहीं मानना चाहिए । इसका कारण है दशरूपक - टीका में बहुरूपमिश्र द्वारा तथा अन्यत्र द्वादशसाहस्री संहिता के कुछ उद्धरण मिलना । यह शारदातनय के उस विवरण को ही पुष्टि देता है कि द्वादशसाहस्त्री संहिता का दीर्घपाठ नाट्यशास्त्र का एक बृहत् रूप ( अवश्य ) था जो प्राचीन-काल में विद्यमान था । इन विवरणों पर ध्यान देने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इनमें चर्चित ब्रह्मा, शिव तथा भरत का व्यक्तित्व नाट्यशास्त्र के मुख्य उपदेष्टाओं में हैं जिनमें बाद में विष्णु तथा तण्डु को भी समाविष्ट किया गया है । यह इन उपदेष्टा व्यक्तियों की महत्वपूर्ण स्थिति की तो पुष्टि करता ही है साथ ही एतद्विषयक प्रवृत्तियों का भी क्रमिक संकलन निद्दिष्ट करता है । पर इनसे प्राप्त ऐतिहासिक संकेतों को बड़ी कठिनाई से मान्यता की सोपानपंक्ति पर अग्रसर किया जा सकता है । हम तो यही कहेंगे कि वर्तमान नाट्यशास्त्र ही षट्साहस्री के रूप में स्थापित है क्या? या इसके अतिरिक्त अन्य सामग्री भी है? यदि अन्य सामग्री नहीं है तो फिर कितने विस्तार की आवश्यकता हो सकती थी जिसके कारण द्वादशसाहस्री की स्थिति आई । यदि षट्साहस्री से विषय के सम्भव तत्वों का प्रतिपादन सम्भव था तो फिर द्वादशसाहस्री में एतद्विषयक सामग्री के विशिष्ट आयाम को मान लेने

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( 8 ) के अतिरिक्त अन्य बातों को विचारणीय विषय बनाना आधारहीन होगा । क्योंकि हमारे पास नाट्यशास्त्र विषयक पुरामध्यकालीन रचनायें उपलब्ध नहीं हैं । केवल कुछ उद्धरणों के आधार पर ही आज हमारी ये कल्पनायें अग्रसर हो रही हैं जो केवल भावी आशावाद की मद्धिम ज्योति प्रदान करने मात्र में सक्षम हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र अपने व्यापक विषय-विस्तार के कारण पुराकाल से आजतक विवेचक विद्वानों को आकृष्ट करता चला आ रहा है, जो इस बात का सूचक है कि पुरा भारतीय प्रज्ञा ने लोकप्रिय कलाओं को कितने गम्भीर रूप में ग्रहण किया होगा तथा उसे उन्नत-स्थान पर आसीन करवाने में कितना श्रम तथा समय लगाया होगा । आज भी नाट्यशास्त्र का अध्ययन इसके स्थायी महत्व को देखकर ही जारी है । नाट्यशास्त्र का विषय संक्षेप हम यहाँ नाट्यशास्त्र की संक्षिप्त रूपरेखा दे रहे हैं; जिसमें अध्याय क्रम काशी संस्करण के आधार पर ही रखा गया है ( तथा यही क्रम प्रस्तुत संस्क-रण में भी है ) परन्तु विशेषता यह है कि प्रस्तुत संस्करण में बड़ौदा से प्रका-शित अभिनवभारती संस्करण के सभी महत्वपूर्ण विवरण विवेचन तथा पाठों को व्यवस्थित रूप में आगृहीत किया गया है जिसका वर्णन प्रसंगानुसार आगे किया जाएगा । नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में भरतमुनि के आत्रेय आदि ऋषियों द्वारा नाट्यवेद के विषयों में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न किये गये कि नाट्यवेद की उत्पत्ति कैसे हुई? किसके लिए हुई? इसके कौन - कौन अंग है? उसकी प्राप्ति के उपाय कौन से हैं तथा उसका प्रयोग कैसे हो सकता है? भरतमुनि ने इसके उत्तर में कहा कि नाट्यवेद का ऋग्वेद से पाठ्य अंश, साम से संगीत, यजुर्वेद से अभि-नय तथा अथर्ववेद से रसों को लेकर प्रणयन किया गया है । इसे इस स्वरूप में निर्मित कर मुनि ने इसे अपने पुत्रों को सिखाया । द्वितीयाध्याय में मुनि ने नाट्यप्रदर्शन के लिये आवश्यक होने के कारण प्रेक्षागृह का वर्णन करते हुए उसके तीन प्रकारों को बतलाया तथा उनके शिल्प, आकार तथा साधनों का विस्तार से विवेचन किया है । तृतीयाध्याय में नाट्यमण्डप में सम्पादित की जाने वाली आवश्यक धार्मिक क्रियाओं का निरूपण करते हुए विभिन्न देवताओं की पूजा तथा उनसे प्राप्त होने वाले फलों का निरूपण किया है ।

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( ५ ) चतुर्थाध्याय में भरतमुनि द्वारा अमृतमन्थन नाट्यप्रयोग के देवताओं के सम्मुख प्रस्तुत करने तथा त्रिपुरदाह को महेश्वर के सम्मुख करने तथा महे-श्वर के आदेश से तण्डु द्वारा भरत को अंगहार, करण तथा रेचकों का ज्ञान करवाने का वर्णन है । इसी अध्याय में विस्तार से ताण्डवनृत्य की उत्पत्ति तथा उसके शिल्प का ( अंगहारों, करणों, रेचकों आदि को ) सांगोपांग विवेचन है । जिसके अभिनय में नृत्तहस्तों तथा गीतों से सौन्दर्य वृद्धि होती है । पंचमाध्याय में नाट्यप्रयोग के आरम्भ में प्रस्तुत किये जाने वाले पूर्व-रंगविधान, नान्दी, प्रस्तावना तथा ध्रुवाओं का सांगोपांग विवेचन है । षष्ठ- अध्याय – रसाध्याय है । इसमें ऋषिगण रसविषयक पाँच प्रश्न उपस्थापित करते हैं । उत्तर में भरतमुनि रसों के नामकरण का आधार तथा संग्रह, कारिका तथा निरुक्त का आधार लेकर नाट्यसंग्रह, के विववरण के साथ रस का वर्णन करते हैं । इसी क्रम में रस - निष्पत्ति, रसों का भावों आदि से पारस्परिक सम्बन्ध, रसों के अधिदेवता तथा रस एवं उनके स्थायीभावों का विस्तृत विवरण दिया गया है । सप्तमाध्याय - भावाध्याय है । इसमें भाव, विभाव, स्थायी तथा संचारी या व्यभिचारी भावों का विस्तृत विवेचन तथा आठ प्रकार के सात्विक भावों का ( रसों की अपेक्षा से ) विवरण दिया गया है । अष्टमाध्याय से अभिनय वर्णन आरम्भ हो जाता है । इसमें अभिनय के आंगिक, वाचिक आहायं तथा सात्विक भेद बतलाकर आंगिक अभिनय के अन्तर्गत उपाङ्गाभिनय आदि का सांगोपांग वर्णन किया गया है । नवमाध्याय में आंगिक अभिनय के क्रम की और आगे बढ़ाते हुए हस्त, कुक्षी, कटि, जानु तथा पाद जैसे शारीर अंगों का अभिनय विस्तार से निरू-पित करते हुए २४ असंयुत हस्तमुद्राओं, १३ संयुत हस्तमुद्राओं, २७ प्रकार के नृत्त हस्तों का वर्णन करते हुए ६४ हस्त प्रकारों को बतलाया गया है । अंग संचलन तथा हस्त - मुद्राओं का प्रयोग रस, भाव तथा अभिनय के अनुरूप होता है और नृत्य में हस्तमुद्राओं की परमोपयोगिता होती है अतः इसका भी विवेचन किया गया है । दशम अध्याय में वक्ष, कटि तथा शरीर के अन्य भागों के परिचालन-जन्य पाँच प्रकारों का विवरण देकर उनके विभिन्न अवसरों पर किये जाने वाले अभिनय प्रयोग बतलाये गये हैं । एकादशाध्याय में चारों का निरूपण करते हुए १६ प्रकारों की भौमी तथा १६ प्रकार की आकाशिकी चारियों के लक्षण तथा प्रयोगों को बतलाया गया है तथा खण्ड - करण तथा मण्डलों की नाट्योपयोगिता का वर्णन किया गया है । २ प्रस्ता ० ना ० शा ० प्र ०