भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 311–320
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 311–320
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१८२ नाट्यशास्त्रम् इस नाटक ( आदि दृश्यकाव्य ) के निर्माता कवि को यश मिले तथा उसका धर्म भी ( गुण, अद्दष्ट पुण्य ) विस्तृत हो और इस काव्यात्मक यज्ञ के अनुष्ठान से सदा देवगण भी प्रसन्न होते रहें ॥
नान्दीपदान्तरेष्वेषु ह्येवमस्त्विति नित्यशः ।
VICTE वदेतां सम्यगुक्ताभिर्वाग्मिनौ पारिपार्श्विकौ ॥। ११० ॥
इस प्रकार के विषयवाली किसी एक ( सलक्षणा ) ) नान्दी के पद्य पाठ के अनन्तर दोनों पारिपार्श्विक स्पष्ट तथा उच्च स्वर से ( उक्त भावना के अनुमोदन हेतु ) ' ऐसा ही हो ' शब्द का उच्चारण करें ॥ ११० ॥
शुष्काविष्टा ध्रुवा
एवं नान्दी विधातव्या यथावल्लक्षणान्विता ।
ततश्शुष्कावकृष्टा स्याजर्जरश्लोक - दर्शिका ॥ १११ ॥
इसी प्रकार लक्षणानुसार ' नान्दी ' का प्रयोग करना चाहिए और फिर जर्जर की स्तुति को निदर्शित करने वाली ' शुष्कावकृष्टा ' ध्रुवाका गान किया जाए ॥ १११ ॥
गुर्वक्षराण्यादी लघूनि गुरुत्रयम् ।
शुष्कावकृष्टा तु भवेत्कला ह्यष्टौ प्रमाणतः ॥ ११२ ॥
IF ASTE इस ' शुष्कवकष्टा ' वा में आदि के ९ वर्ण गुरु फिर ६ वर्ण लघु तथा अन्तिम ३ वर्ण गुरु होते हैं । इसका आठ कला का ( समयगत ) परिमाण होता है ॥ ११२ ॥
शुष्कावकृष्टा ' का उदाहरण
. दिग्ले दिग्ले झण्डू ज्ञण्टू ।
- जम्बुकपलितक ते ते चाम् ॥ ११३ ॥
१. शुकावकृष्टा का इसी अध्याय में प्रयोग निर्देश ( ५।१४ ) दिया जा चुका है । यहाँ इसका स्वरूप तथा उदाहरण दिया गया है । इसका स्वरूप इस प्रकार होगा ऽऽऽऽऽऽऽऽ ऽ ॥॥॥ sss ( दिग्ले दिग्ले झण्ट झण्टू जम्बुकपलितक ते ते चाम् । ) एकछ SSSSSSSSSIIIIIISSS १. दन्देतां ख ० । २. यथोक्ता लक्षणया ग ० । ३. कलाश्चाष्ठी प्रमाणेन पादे ह्यष्टादशाक्षरे - क, पार्दष्टादशाक्षरः - ग ० । ४. झण्डे झण्डे दिग्ले - ग ० । 1.01
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पञ्चमोऽध्यायः १८३ रंगद्वार
कृत्वा शुष्कावकृष्टां तु यथावद्विजसत्तमाः ।
ततः श्लोकं पठेदेकं गम्भीरस्वरसंयुतम् ॥ ११४ ॥
देवस्तोत्रं पुरस्कृत्य यस्य पूजा प्रवर्तते ।
राज्ञो वा यत्र भक्तिः स्यादथवा ब्राह्मणस्तवम् ॥ ११५ ॥
हे श्रेष्ठमुनिजन, शुष्कावष्टा वा के गान के पश्चात् वह ( सूत्रधार ) गम्भीर स्वर से एक श्लोक का पाठ करे । यह श्लोक किसी देवता की स्तुति पाठा, या जिसके उपलक्ष में नाच नाट्य प्रदर्शन का देव से सम्बन्धित हो या फिर जिस राजा के प्रति प्रजा का अनुराग हो उसकी ओर या फिर ब्राह्मणों की स्तुति का संकेत करने वाला होना
चाहिए ॥। ११४-११५ ॥
गदित्वा जर्जर श्लोकं रङ्गद्वारे च यत्स्मृतम् ।
पठेदम्यं पुनः श्लोकं जर्जरस्य प्रकाशनम् ॥ ११६ ॥
रंगद्वार के अन्तर्गत इस प्रकार जर्जर श्लोक के पाठ के पश्चात् वह पुनः जर्जर के यश प्रकाशक एक दूसरे श्लोक का पाठ करे
चारी-जर्जरं नमयित्वा तु ततश्चारीं प्रयोजयेत् ।
पारिपार्श्विकयोश्च स्यात्पश्चिमेनापसर्पणम् ॥
इसके उपरान्त जर्जर को प्रणाम किया जाए और ' शुष्कावकृष्टा ' ध्रुवा का जर्जर को लक्ष्य कर उसकी कीर्ति होता है । भरत ने इन ध्रुवाओं की छन्दःशास्त्र तथा संगीत व्याख्या की है । प्रथम छन्दः शास्त्र के अनुसार गुरु, लघु का ॥ ११६ ॥
११७ ॥ फिर ' चारी ' का विस्तार हेतु गाना दोनों की दृष्टि से निर्देश किया गया है तथा बाद में संगीत के अनुसार कला का प्रमाण बतलाया १. राज्ञो भक्तिश्च यत्र । २. ब्राह्मणस्तवः ख ०, ग ० । ०३. नान्दित्वा - ग ० ।४ . विनाशनम् क ०, विनामनम् – ष ० । ५. मानयित्वा ० । 20
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१८४ नाट्यशास्त्रम् प्रदर्शन शुरु करे । तभी पश्चिम की ओर से दोनों पारिपार्श्विक रंगमंच से निष्क्रमण कर जाएँ ॥ ११७ ॥
' अड्डिता ध्रुवा-अडिता चात्र ' कर्तव्या ध्रुवा मध्यलयान्विता ' ।
चतुर्भिः सन्निपातैश्च चतुरभ्रा ' प्रमाणतः ॥ ११८ ॥
इसके उपरान्त ‘ अड्डिता ’ ध्रुवा का मध्यलय, चतुरस्रताल ( चौताल ) तथा चार सन्निपातों से युक्त गान ( प्रयोग ) आरंभ हो जाए ॥ ११८ ॥
आद्यन्त्यं चतुर्ध पञ्चमं च तथा गुरु ।
* यस्यां हस्वानि शेषाणि सा ज्ञेया त्वड़िता बुधैः ॥ ११ ९ ॥
इस अड्डिता ध्रुवा में प्रथम, पंचम तथा अन्तिम वर्ण गुरु तथा शेष वर्ण ह्रस्व होते हैं तथा इसके चारों पादों में बारह वर्ण होते हैं ॥ ११ ९ ॥ १. अड्डिता ध्रुवा का लक्षण नाट्य शा ० ५।१२१ में तथा ३।१०, ३।७५ पर भी देखिये । २. अड्डा - अड्डिता ध्रुवा का प्रयोग चारी के साथ होता है । अभिनव गुप्त ने बतलाया कि इसका प्रयोग कुछ आचार्य रंगद्वार में चारी के साथ मानते हैं और अन्य रंगद्वार के सान्निध्य के कारण रंगद्वार में ' अवकृष्टा ' का प्रयोग मान्य करते हैं ( अड्डिता का नहीं या अड्डिता को भी अवकृष्टा ही मानते हैं ) । तीसरे विद्वान् रंगद्वार में ध्रुवा का प्रयोग ही स्वीकार नहीं करते हैं । ( अभि ० भा Vol. I, पृ ० २३६ ) अड्डिता का अन्य स्वरूप अभि-नवगुप्त ने इस प्रकार बतलाया: ' आद्यं चतुर्थं दशममष्ट मैकादशे तथा । गुरूणि दोधके या स्यादड्डिता नाम सा स्मृता ॥ ' इति । TEITE अर्थात् दोधकवृत्त से पाद में जब प्रथम, चतुर्थ, अष्टम, दशम और एकादश संख्या के अक्षर गुरु तथा शेष अक्षर लघु रहें तो उसे ' अडिता ' ध्रुवा समझना चाहिए । ( यह लक्षण भरत से भिन्न है । यहाँ भिन्नता यह है कि भरत के मत से ' अड्डा ' जाति है तथा अन्य आचार्य के मत से ( जो अभिनव ने उद्धृत किया है ) वह ' वृत्त ' होती है । १. चानुकर्तव्या - ग ० । २. मध्यलयाश्रिता - ग ० । ३. चतुरसं - ग ० । ४. यस्यां तु जागते पादे सा भवेदडिता ध्रुवा ग ०, घ ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १८५
या प्रयोगं वक्ष्यामि यथा पूर्व महेश्वरः ।
सहोमया क्रीडितवान्नानाभावविचेष्टितैः ॥ १२० ॥
और प्राचीन काल में भगवान शिव ने पार्वती के साथ क्रीड़ा करते हुए. जिस प्रकार अनेक भाव तथा चेष्टाओं की सृष्टि के द्वारा इस ध्रुवा का प्रयोग किया था अब मैं उसे बतलाता हूँ ॥ १२० ॥
कृत्वाऽवद्दित्थं स्थानं तु वामं चाधोमुखं भुजम् ' चतुरथमुरः कार्यमचितश्चापि मस्तकः नाभिप्रदेशे विन्यस्य जर्जरं च तुलाधृतम् वामपल्लवहस्तेन पादैस्तालान्तरस्थितैः 3 गच्छेत्पञ्चपद चैव सविलासाङ्गचेष्टितैः वामवेधस्तु कर्तव्यो विक्षेपो दक्षिणस्य च शृङ्गाररससंयुक्तां पठेदार्या विचक्षणः चारीश्लोकं गदित्वा तु कृत्वा च परिवर्तनम् तैरेव च पदैः कार्य पश्चिमेनापसर्पणम् पारिपार्श्विकहस्ते तु न्यस्य जर्जरमुत्तमम् महावारीं ततश्चैव प्रयुञ्जीत यथाविधि
।
॥ १२१ ॥
।
॥ १२२ ॥
।
॥ १२३ ॥
।
॥ १२४ ॥
।
॥ १२५ ॥
सर्व प्रथम सूत्रधार अवहित्य ' स्थान को प्रदर्शित करे और बायीं भुजा को नीचे की ओर झुका कर वक्षस्थल को चतुरस्र तथा मस्तक को अंचित १. अविहत्थस्थान - यह स्थान स्त्रीस्थानकं माना जाता है । इसका लक्षण ना ० शा ० १३।१६४, १६५ पर द्रष्टव्य । अवहित्थस्थान में लताहस्त का अधोमुख स्थापन नाभिप्रदेश पर जर्जर को सन्तुलित करना है । जैसा कि यहाँ विवरण से स्पष्ट है । १. एतत्पद्यार्ध - ग ० पुस्तके नास्ति । १२. तुलाधृतम् - ख ०, ग ० । ३. पादान्त रोत्थितैः क ० । ४. दक्षिणेन तु ग ० । ५. गदित्वा - ग ० । ६. प्राङ्मुखेना- ग ० । ७. पारिपाश्विकयोर्हस्ते - ग ० ।
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१८६ नाट्यशास्त्रम् चेष्टा में रखे और नाभि स्थान पर संतुलित जर्जर को लिये हुए पाँच कदम आगे चले । वह अपने बाएँ हाथ से ' पल्लव ' मुद्रा का प्रदर्शन करे, चलने के समय प्रत्येक कदम एक ताल के अन्तर से रखता जाए तथा अपने अवयवों को विलासयुक्त गति या चेष्टा में रखे । फिर वह बाएँ पैर द्वारा सूची ( वेध ) का तथा दाहिने पैर द्वारा विक्षेप का प्रदर्शन करे । तदुपरान्त विचक्षण सूत्रधार ( एक ) आर्या का पाठ करे जो शृङ्गार रस को प्रकट करती हो । पुनः वह चारी श्लोक का पाठ करे और औ एक परिवर्तन ( गोल घुमाव ) लेने के उपरान्त उन्हीं पूर्व वर्णित प्रकारों से जैसे वह यहाँ तक आया था ( पश्चिमाभिमुख होकर ) पीछे की ओर उसी तरह लौट जाए । फिर पारिपार्श्विक के हाथ में ( उस श्रेष्ठ ) ' जर्जर ' को देकर वह यथाविधि ' महाचारी ' का प्रयोग करे ॥ १२१-१२६ ॥ महाचारी-चतुरश्रा - ध्रुवा तत्र द्रुतलयान्विता ॥ १२६ ॥
चतुर्भिस्सन्निपातैश्च कला ह्यष्टौ प्रमाणतः ।
आद्यं चतुर्थमन्त्यं च सप्तमं दशमं गुरु ॥। १२७ ॥
लघु शेषं ध्रुवा योगे त्रैष्टुभे चरणे तथा । इस चारी में ध्रुवा गीत चतुरस्र ताल तथा द्रुतलय से युक्त होता है । इसमें चार सन्निपात और आठ कलाएँ होती हैं । इस ध्रुवा का प्रत्येक पाद एकादशाक्षर का होता है जिसमें प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु होता है; एवं शेष वर्ण लघु होते हैं ॥ १२६-१२८ ॥ -चतुरस्रा ध्रुवा का उदाहरण-पादतलाहतिपातितशैलं क्षोभितभूतसमग्र समुद्रम् । १. यह चतुरस्रा ध्रुवा का उदाहरण है । इसके एकादशाक्षरपाद का क्रम इस प्रकार होगा: पादतला हतिपातितशैलम् । SIISIISIISS १. द्रुतलयाश्रया ग ० । २. ध्रुवापादे चतुर्विंशति के भवेत् — क ० । ३. पादतलाहत- घ ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १८७ : ताण्डव नृत्तमिदं प्रलयान्ते 6 पातु ' जगत्सुखदायि हरस्य ॥ १२ ९ ॥ प्रलय काल के पश्चात् सँसार को सुखप्रदाता भगवान शिव का वह ' ताण्डव नृत्य ' - जिसमें पैर के तले की ठोकर से पर्वत विच्छिन्न होकर लुढ़क 5. ग गये हैं, और सम्पूर्ण समुद्र तथा उसमें स्थित प्राणियों को जिसने विक्षुब्ध कर दिया है - आपकी रक्षा करे ॥ १२ ९ ॥
भाण्डोन्मुखेन कर्तव्यं पादविक्षेपणं ततः ।
सूचीं कृत्वा पुनः कुर्याद्विक्षेप परिवर्तनम् ॥ १३० ॥
तब वह अपने कदम भरता हुआ भाण्डवाद्य तक जाए और फिर सूची ' ( चारी ) का प्रदर्शन करे तथा पुनः ' विक्षेप ' के जाए ॥ १३० ॥
अतिक्रान्तैः सललितैः पादैद्रुतलयान्वितैः ’ त्रितालान्तरमुत्क्षेपैर्गच्छेत्पञ्चपदी ततः तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणस्य च तैरेव ' च पदैः कार्ये प्राङ्मुखेनापसर्पणम् पुनः पदानि त्रीण्येव गच्छेत्प्राङ्मुख एव तु ततश्च स्याद्विक्षेपो दक्षिणस्य च द्वारा परिवर्तित हो ॥। १३१ ॥ । फ ॥ १३२ ॥ मागी
।
॥ १३३ ॥
फिर ह अतिक्रान्ता - चारी में ललित गति से चलते हुए द्रुत लय में तीन ताल के ' अन्तर से उठाये जाने वाले पैरों से पाँच क चले और पुनः वह ' सूची ( वेध ) चारी का बाएँ पैर से प्रथम और दाहिने से बाद में प्रदर्शन करें, फिर इन्हीं पैरों की गतियों ( जो कि ऊपर १. वाद्ययन्त्र तथा उनके वादक पीछे की ओर स्थित रहते हैं अतः सूत्रधार को पीछे की ओर हटना पड़ता है और फिर सूची चारी का प्रयोग कर पैरों को विक्षेप मुद्रा से आगे बढ़ाते हुए घूमने का यहाँ आशय प्रकट किया गया है । १. पातु हृरस्य सदा सुखदायि – घ ० । २. दत्वा ग ० 1 ३. लयाश्रितैः -- ग ० । ४. पद्यार्धमिदं प्रक्षिप्तं ख- पु ० । ५. तत्रैव ख ० ।
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१८८ नाट्यशास्त्रम् वर्णित हैं ) से सामने की ओर ( पूर्व की ओर ) मुख रखते हुए पीछे की ओर हटे पुनः सम्मुख तीन कदम आगे बढ़े और फिर वह ' सूची ' चारी का बाएँ पैर द्वारा तथा ' विक्षेप ' का दाहिने पैर द्वारा प्रदर्शन करे ॥
ततो रौद्ररलं श्लोकं पादसंहरणं ' पठेत् ।
तस्यान्ते तु त्रिपद्याथ व्याहरेत्पारिपार्श्विकौ ॥ १३४ ॥
तयोरागमने कार्य गानं नर्कुटकं बुधैः । [ तत्रपि बामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणस्य च । ] वह पुनः एक रौद्र - रस प्रचुर श्लोक का पाठ करे जिसमें समास ( प्रयोग ) के कारण पाद ' ( परस्पर ) सम्मिलित हो गए हों । इसके पश्चात् तीन कदम आगे बढ़ते हुए वह अपने दो पारिपार्श्विकों को बुलाए । जब ये दोनों पारिपार्श्विक आ रहे हों उस समय ' नर्कुटक ध्रुवा का गान किया जाए ( तथा इस ध्रुवागान के समय वह बाएँ पैर से सूची ( चारी ) तथा दाहिने से विक्षेप का प्रदर्शन करे ) ॥ १३४-१३५ ॥ त्रिगत-तथा च भारतीभेदे त्रिगतं सम्प्रयोजयेत् ॥ १३५ ॥
विदूषकत्वेकपदे सूत्रधारस्मितावद्दाम् ।
असम्बद्धकथाप्रायां कुर्यात्कथनिकां ततः ॥ १३६ ॥
१. पादसंहरण मूल में ' रौद्ररस ' का विशेषण है जैसा कि अभि ० गु ० ने भी माना है —यथा पादानां च संहरणं समासयोजनयैक्यं यत्रेत्योजः प्रधानत्वं दर्शितम् ' ( अ ० भा ० पृ ० २४४ ) श्री म ० म ० घोष इसका अर्थ करते हैं-पैर को एक साथ उठाते हुए जो यहाँ असंगत लगता है । २. नर्कुटक ध्रुवा का लक्षण ना ० श ० ३२।२८० पर द्रष्टव्य । यह नर्कुटक ध्रुवा तीनों मिलकर गाते हैं या तीनों के साथ २ आने के समय गान-मंडली द्वारा भी गायी जा सकती है । १. पदसंहरणं - ग ० । २. पद्यार्धमेतत् क ०, ख ० पुस्तके च नास्ति । ३. तथा — ग ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १८ ९ इसके उपरान्त भारती वृत्ति में ' त्रिगत ' ( तीन पात्रों के संभाषण ) की संयोजना करे । इस ( त्रिगत ) में अकस्मात् आकर विदूषक सूत्रधार को मुस्कराहट पैदा कर देने वाली असम्बद्ध बातों में संभाषण करे ( कथनिका ) ॥
वितण्डां गण्डसंयुक्तां नालिकांश्च ' प्रयोजयेत् ।
कस्तिष्ठति जितं केनेत्यादिकाव्यप्ररूपिणीम् ॥ १३७ ॥
इस संभाषण में वह कुछ विवादात्मक ( ' वितण्डा ) विषय पर जो एक खुरखुरापन लिए हो ( गण्ड या आकस्मिक रूप में विहित ) या जो किसी १. वितण्डा - नालिका तथा गण्ड के लक्षण वीथ्यंग के अन्तर्गत असत्प्र-लाप ' नालिका तथा गण्ड हैं । असत्प्रलाप का लक्षण है— हितावह वचन का कथनमात्र जिसे सुनकर भी उसका आशय मूर्खतावश मश्वस्थ श्रोता ग्रहण न करें । ' जैसे: -3318 सर्वथा योऽक्ष विजयी सुरासेवनतत्परः । तस्यार्थानां सुखानाञ्च समृद्धिः करगामिनी । ( अभि ० Vol ii ४५६ ) इसका अर्थ होगा- -जो सदा जुए के पासों से विजय प्राप्त करता है, सुरा - सेवन में व्यस्त है उसे धन तथा सुखों की सम्पन्नता हाथ में स्थित रहती है ( क्योंकि वह पासों से विजय हस्तकौशल द्वारा ही प्राप्त करता है ) । किन्तु इसका दूसरा प्रतिपाद्य अर्थ है - ' कि जो अपनी इन्द्रियों पर संयम रखता है ( अक्षविजयी ) देवताओं की भक्ति में तत्पर है उसे अर्थ और सुखों की प्राप्ति एवं वृद्धि सदा प्राप्य है । नलिका का स्वरूप है— ' ऐसी प्रपञ्चपूर्ण वचनावली का परिहासपूर्ण भाव से अभिधान करना जो प्रहेलिका के समान गूढ़ अर्थ भी अपने में समाविष्ट करे ।
जैसे-हस्ते कर्णस्य का शक्तिः क्षसमध्यगतोऽस्ति कः ।
परः किमधितिष्ठतो न वाच्याः शस्त्रिणो हताः ॥
अर्थ - कर्ण के हाथ में कौन शक्ति है? ( उत्तर - वासवदत्ता ) ' क्ष ' ओर ' स ' के बीच कौन है? ( उत्तर- ' ह ' कार ) कहाँ शत्रुओं से मारे जाने पर भी १. नामिका - ग ०० । ई
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१ ९ ० नाट्यशास्त्रम् प्रहेलिका ( नालिका ) में इस प्रकार के प्रश्न करता हो: - ' कौन है? किसने जीता? " आदि - नाटक की कथावस्तु को आगे बढ़ाने वाले प्रश्नों का प्रयोग करे । ( पर इसमें अरोचक एवं अनपेक्षितं विषयों का समावेश नहीं किया जाए ) ॥ १३७ ॥
पारिपार्श्विक सञ्जल्पो ' विदूषकविरूपितः ।
• स्थापितः सूत्रधारेण त्रिगतं सम्प्रयुज्यते ॥ १३ ९ ॥
इस त्रिगत में पारिपार्श्विक की ठीक बातें विदूषक द्वारा सदोष बतलाई जाएँ तथा उसका ( पारिपाश्विक का ) सूत्रधार भी समर्थन करे ॥ १३८ ॥
प्ररोचना-प्ररोचना च कर्तव्या सिद्धेनोपनिमन्त्रणा ।. रङ्गसिद्धौ पुनः कार्य काव्यवस्तुनिरूपणम् ॥ १३ ९ ॥ योद्धा निन्दनीय नहीं होते? ( उत्तर- ' रण ' ) में इस प्रकार इस पद्य के द्वारा ' वासवदत्ताहरण ' नामक रूपक या घटना की सूचना देने से ' नालिका ' है । गण्ड का स्वरूप है - एक व्यक्ति के द्वारा एक पक्ष में प्रयुक्त वचन का अन्य व्यक्ति के द्वारा अन्यार्थ में ले लेना । यह गण्ड उक्तिगण्ड, द्वयर्थ गण्ड वाक्यगण्ड तथा लेशगण्ड के प्रभेद से अनेक प्रकार का होता है । जैसे-जातोऽन्यत्र च योऽन्यत्र वर्द्धितो मधुसम्भवः । परपुष्टः स कृष्णोऽयं मारयत्यनिवारितः ॥ अर्थ —जो एक स्थान में उत्पन्न होकर दूसरे स्थान में पोषित हुआ है, जो मधु ( वसन्त ) में उत्पन्न [ माधव ] है, जिसका वर्णं काला है [ कृष्ण ] और जो परपुष्ट ( कोकिल, दूसरे के द्वारा पालित ] हैं वह न रोकने पर मारक काम के समान ] होता है । यहाँ उत्कण्ठिता नायिका के द्वारा कोकिल को सम्बोधित कर कहे गये वचन हैं जिसका कंस ने दूसरा ही आशय समझा । अतएव यह गण्ड का उदाहरण है 1 । ( गण्ड के अन्य प्रभेदों के लक्षण तथा उदाहरण नाटकलक्षणरत्नकोश में द्रष्टव्य ) । वितण्डा, नालिका गण्ड आदि का वचनविन्यास कूट होता है जिसमें व्यङ्गय के साथ नाटकीय कथा वस्तु की योजना का संकेत भी मिल जाता है । १. पद्यमेतत् ग – पुस्तके नास्ति । २. विदूषकविदूषितः घ ० । ३. त्रिगते । ४. सिद्धेनोपनिमन्त्रणम् - क ०, ख ०
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पञ्चमोऽध्यायः १ ९ १ इसके पश्चात् सूत्रधार प्रेक्षकगण को आमन्त्रित करते हुए प्ररोचना को प्रस्तुत करे तथा प्रयोग की सिद्धि - हेतु ( खेले जाने वाले ) नाटक आदि की विषय - वस्तु का निरूपण करे ॥ १३ ९ ॥
सर्वमेव विधिं कृत्वा सूचीवेधकृतैरथ ।
पादैरनाविद्धगतैर्निष्कामेयुः समं त्रयः ॥ १४० ॥
इन सभी विधानों के ( विधिवत् ) पूर्ण हो जाने पर तीनों पात्र सूची चारी का प्रदर्शन करे और फिर ' आविद्ध ' चारी के अतिरिक्त किसी भी चारी ( के लक्षणवाली चाल ) में रंगमंच से निष्क्रमण कर जाए ॥ १४० ॥
एवमेष ' प्रयोक्तव्यः पूर्वरङ्गो यथाविधि ।
चतुरश्री द्विजश्रेष्ठात्र्यनं वापि निबोधत ॥ १४१ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ, इस प्रकार विधिवत् इस चतुरस्र पूर्वरंग का प्रयोग करना चाहिए । अब मैं त्र्यत्र पूर्वरंग बतलाता हूँ ॥ १४१ ॥
त्र्यत्र पूर्वरङ्ग-F
अयमेव प्रयोगः स्यादङ्गान्येतानि चैव हि ।
तालप्रमाणं संक्षिप्तं केवलं तु विशेषकृत् ॥ १४२ ॥
इस त्र्यत्र पूर्वरंग को भी चतुरस्र के ( प्रयोग के ) समान ही जानों, इसके भी उतने ही अंग होते हैं केवल इसकी विशेषता ताल के प्रमाणों का संक्षेप करना ही है ॥ १४२ ।
शम्य तु द्विकला कार्या तालो ह्येककलस्तथा ।
पुनश्चैककला शम्या सन्निपातः कलाद्वयम् ॥ १४३ ॥
१. मेव - ग ० । २. त्र्यश्वश्वापि ग ०, त्र्यनं वा विनिबोधत - ख ० । ३. विक्षिप्तं ग ० । ४. शम्याकृद्विकलः कार्यः - ग ० ।..