भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 321–330
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 321–330
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१ ९ २ नाट्यशास्त्रम् इसमें शम्या ' दो कला की तथा ताल एक कला की, पुनः शम्या एक कला की तथा सन्निपात ' दो कला के प्रमाण वाला होता है ॥ १४२ ॥
अनेन हि प्रमाणेन कलाताललयान्वितः ।
कर्तव्यः पूर्वरङ्गस्तु व्यथोऽप्युत्थापनादिकः ॥ १४४ ॥
कला ताल तथा लय युक्त काल - प्रमाण के द्वारा ' त्र्यत्र पूर्वरंग ' का इसी प्रकार प्रयोग करना चाहिए जिसमें उत्थापना आदि अंग वैसे ही ( चतुरस्र के समान ) रखें गए हों ॥ १४४ ॥
आद्यं चतुर्थ दशममष्टमं नैधनं गुरु ।
यस्यास्तु ' जागते पादे सा त्र्योत्थापिनी ध्रुवा ॥ १४५ ॥
' त्र्यत्र ' पूर्वरंग में होने वाली ' उत्थापना ' ब्रुवा में ' जगती ' छन्द के पाद में ( द्वादशाक्षर पाद में ) प्रथम, चतुर्थ, अष्टम, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु होता है ॥ १४५ ॥
वाद्यं गतिप्रचारश्च ध्रुवा तालस्तथैव च ।
संक्षिप्तान्यत्र र कार्याणि त्र्यक्षे ' नृत्तप्रवेदिभिः । १४६ ॥
नृत्त के विज्ञातागण इस त्र्यत्र पूर्वरंग में वाद्य, गतिप्रचार, ध्रुवागीत तथा तालों का संक्षेप में ही प्रयोग करें ॥ १४६ ॥
१. शम्या कहते हैं दाहिने हाथ से ताली बजाना । इसमें दो कला समय लगता है तथा यह शब्दा क्रिया के अन्तर्गत मानी जाती है । यह एक हाथ से होने वाली क्रिया कहलाती है तथा इसका काल दो गुरु मात्रा मा या २० निमेष होता है कला । - गुरु मात्रा के काल में होने वाली सशब्दा क्रिया । भरत ने पाँच २. निमेष का काल लघु ताल और दो लघु ताल का एक गुरु ताल माना है । अतः कला १० निमेष की होती है । ३. सन्निपात — दोनों हाथों ने ताली बजाना सन्निपात कहलाता है । इसका समय भी कला ( आदि ) से नियमित होता है । इसका विशेष विवरण ना ० शा ० अ ० २६ तथा ३१ पर द्रष्टव्य । १. जायत - ग ० । २: न्येव - ग ० । १३. त्र्यश्रनृत्त - क ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १ ९ ३
वाद्यगीतप्रमाणेन कुर्यादङ्गविचेष्टितम् ' ।
की विस्तीर्णमथ सङ्क्षिप्तं द्विप्रमाणविनिर्मितम् ॥ १४७ ॥
और वाद्य तथा गीत के अनुसार अंगों का अभिनय बतलाना चाहिए जो संक्षिप्त तथा विस्तीर्ण दोनों प्रकार का हो ॥ १४७ ॥
हस्तपादप्रचारस्तु द्विकलः परिकीर्तितः ।
चतुरस्रे परिक्रान्ते पाताः स्युः षोडशैव तु ॥ १४८ ॥
यत्रे द्वादश पातास्तु भवन्ति करपादयोः ।
एतत्प्रमाणं विज्ञेयमुभयोः पूर्वरङ्गयोः ॥ १४ ९ ॥
इसमें हाथ और पैरों की हलचल का समय दो कलाओं ( के प्रमाण ) का होता है । चतुरस्रपूर्वरंग के प्रत्येक परिवर्त में हाथ तथा पैरों का परिवर्तन सोलह बार होता है जब कि त्र्यस्रपूर्वरंग में यह परिवर्त बारह बार किया जाता है । इस प्रकार दोनों पूर्वरंगों में स्थित परिवर्त की संख्या — जो कि हस्त तथा पादों की होती है — बतलाई गई ॥१४८-१४९ ॥
केवलं परिवर्ते तु गमने त्रिपदी भवेत् ।
दिग्वन्दने पञ्चपद चतुरस्रे विधीयते ॥ १५० ॥
किन्तु ( त्र्यस्र पूर्वरंग ) ' परिवर्त की दशा में पैरों को तीन कदम आगे बढ़ाया जाता है जब कि चतुरस्र के दिग्वन्दन में पाँच कदम आगे बढ़ाया जाता है ( तथा यही चतुरस्र पूर्वरंग से व्यस्त्र की विशेषता है ) ॥ १५० ॥
आचार्यबुद्धया कर्तव्यस्त्र्यधस्तालप्रमाणतः ।
तस्मान्न लक्षणं प्रोक्तं पुनरुक्तं भवेद्यतः ॥ १५१ ॥
१. परिवर्त - चारों दिशाओं में घूम घूम कर प्रत्येक दिशा के अधिपति ( लोकपालों ) की वन्दना करना परिवर्त कहलाता है । ( ना ० शा ० ५।२३ ) १. कृतिविचे ग ० गतिविचे - घ ० । २. करपादजाः ग TPF ० । 15 ३. त्र्यनस्तज्ज्ञैः प्रमा– ख ० । १३ ना ० शा ० प्र ०
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१ ९ ४ नाट्यशास्त्रम् । त्र्यत्र पूर्वरंग ताल के कालप्रमाणानुसार तथा आचार्य बुद्धि द्वारा अनुमोदित स्वरूप में रहना चाहिए । पृथक् से इसका लक्षण इसलिए नहीं दिया गया है क्योंकि ऐसा करने पर पुनरुक्ति होती ॥ ॥ ॥ १५१ ॥
एवमेष प्रयोक्तव्यः पूर्वरङ्गो द्विजोत्तमाः ।
त्र्यत्रश्च चतुरस्रश्च शुद्धो भारत्युपाश्रयः ॥ १५२ ॥
हे मुनिजन, इस प्रकार मैंने आपको भारती ' वृत्ति के आश्रित रहने पर यत्र तथा चतुरस्र के शुद्ध पूर्वरंग का प्रयोग बतलाया । इसका इसी ( वर्णित ) विधि से प्रयोग करना चाहिए ॥ १५२ ॥
चित्रपूर्वरंग-एवं तावदयं शुद्धः पूर्वरङ्गो मयोदितः ।
चित्रत्वमस्य वक्ष्यामि यथाकार्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार मैंने यहाँ तक शुद्ध पूर्वरंग का विधान बतलाया अब इसी को ' चित्र ' स्वरूप में ( इनमें से किसी एक को ) प्रयोग करने का उपाय बतलाता हूँ ॥ १५३ ॥
वृत्ते ' ह्युत्थापनै विप्राः कृते च परिवर्तने ।
चतुर्थकारदत्ताभिः सुमनोभिरलङ्कृते ॥
उदात्तगानैर्गन्धर्वैः परिगीते प्रमाणतः ।
देवदुन्दुभयश्चैव निनदेयुभृशं ततः ॥
' उत्थापनी ' ध्रुवा के प्रदर्शित हो जाने, ' परिवर्तन ' ( मंच पर ) प्रविष्ट होकर पुष्पों को प्रदान कर चुकने १५४ ॥ १५५ ॥ में ' चतुर्थपात्र ' के और संगीत - निपुण १. यत्र तथा चतुरस्र पूर्व रङ्ग भारतीवृत्ति के आश्रित होने पर शुद्ध होते हैं । भारती शब्द वृत्ति है अतः उसका सम्बन्ध वाचिक अभिनय से रहता है । पूर्वरंग में भारतीवृत्ति का उपयोग प्ररोधना, वीथि आदि में किया जाता है इसी कारण यहाँ पूर्वरंग को केवल भारतीवृत्ति के आश्रित होने पर शुद्ध कहा गया है । १. नृत्ये — ख ० । २. चतुष्प्रकारः ग ० । ३. परिगीतः - ग ०
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पञ्चमोऽध्यायः १ ९ ५ गन्धर्व जन द्वारा लक्षणयुक्त उदात्तगीतों के गाये जाने पर बार बार देव-दुन्दुभियों का नाद करना चाहिए ॥। १५४-१५५ ॥
शुद्धाः ' कुसुममालाभिर्विकिरेयुः समन्ततः ।
अङ्गहारैश्च देव्यस्ता उपनृत्येयुरग्रतः ॥ १५६ ॥
( और इस प्रकार चित्र पूर्वरंग के प्रारंभ हो जाने पर ) फिर श्वेत वर्ण की कुसुममालाओं को रंगमंच पर चारों ओर बिखेरते हुए देवियों का देश धारण किये हुए नर्तकियाँ प्रवेश करें जो अंगहारों को प्रदर्शित करती हुई सामने नृत्य करें ॥ १५६ ॥
यस्ताण्डवविधिः प्रोक्तो नृत्ते पिण्डीसमन्वितः ।
रेचकैरङ्गहारैश्च न्यासोपन्याससंयुतः ॥ १५७ ॥
नान्दीपदानां मध्ये तु एकैकस्मिन्पृथक्पृथक् ।
प्रयोक्तव्यो विधिः सम्यक् चित्रभावमभीप्सुभिः ॥ १५८ ॥
नृत्त प्रकरण में पिण्डीबन्ध, रेचक तथा अङ्गहारों के न्यास ' तथा अपन्यास ' के प्रयोग सहित जो ताण्डवविधि बतलाई गयी है उसका चित्रपूर्व रङ्ग के रूप में विधान करने की इच्छा वाले कुशलनाट्याचार्य नान्दी के के एक एक एक एक प पदों के मध्य में पृथक पृथक ठीक प्रयोग प्रयोग करें करें ॥ ॥ १५७-१५८ ॥
एवं कृत्वा यथान्यायं शुद्धं चित्रं प्रयत्नतः ।
ततः परं प्रयुञ्जीत नाटकं लक्षणान्वितम् ॥। १५ ९ ॥
इस प्रकार शुद्ध तथा चित्र पूर्वरंग का ( जो भी प्रासंगिक हो ) प्रयत्न पूर्वक प्रयोग करने के पश्चात् लक्षणों से युक्त नाटक का प्रयोग प्रारंभ करना चाहिए ॥ १५ ९ ॥ १. न्यास - जिस स्वर पर ' अंग ' अर्थात् गीत, वाद्य या नृत्त का एक प्रबन्ध समाप्त हो जाए उसे ' न्यास ' कहा जाता है । २ अपन्यास — वह स्वर जिस पर ' अंग ' का मध्यभाग पूर्ण या समाप्त होता हो । १. सिद्धा: - क, ख ० २. समन्ततः- ख ० ३. बुधैः –— क ० ।
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१ ९ ६ नाव्यशास्त्रम्
ततस्त्वन्तर्हिताः सर्वा भवेयुर्दिव्ययोषितः ।
निष्क्रान्तासु च सर्वासु नर्तकीषु ततः परम् ॥ १६० ॥
पूर्वर प्रयोक्तव्यमङ्गजातमतः परम् ।
एवं शुद्धो भवेच्चित्रः पूर्वरङ्गो विधानतः ॥ १६१ ॥
फिर ये नर्तकी - देवियाँ रंगमंच से नृत्य प्रदर्शन के पश्चात् चली जाएँ । और उन देवी नर्तकियों के रंगमंच से चले जाने के शेष अङ्गों का प्रयोग पूर्ण किया जाय । इस विधान से पूर्वरंग ' बन जाता है ॥ १६०-१६१ ॥
कार्यो नातिप्रसङ्गोऽत्र नृत्तगीतविधिं प्रति ।
गीते वाद्ये च नृत्ते च प्रवृत्तेऽतिप्रसङ्गतः ॥
खेदो भवेत्प्रयोक्तृणां प्रेक्षकाणां तथैव च खिन्नानां रसभावेषु स्पष्टता नोपजायते ततः शेषप्रयोगस्तु न रागजनको भवेत् । बाद ' पूर्वरंग ' के शुद्ध पूर्वरंग ' चित्र १६२ ॥
।
॥ १६३ ॥
परन्तु इन पूर्वरंगों में ( जो किसी भी स्वरूप वाले हो ) अधिक ' गीत तथा नृत्य ( नृत्त विधि ) की योजना नहीं करना चाहिए । क्योंकि यदि १. पूर्वरङ्ग के इन प्रकारों में आचार्य अभिनवगुप्त ने सोलह अङ्गों का क्रम बतलाया है । यथा उत्थापन, परिवर्तन, अवकृष्टागान, नान्दीपाठ, शुष्कावकृष्टा,, जर्जरश्लोक, ध्रुवा, रङ्गद्वार, अड्डिता, आर्यापाठ, ध्रुवा, रौद्रश्लोक पाठ, नर्कुटक, त्रिगत तथा प्ररोचना । त्र्यस्त्र में भी ये सोलह अङ्ग रहते हैं तथा नान्दी के पदों के मध्यवर्ती समय में नृत्त भी होता है । यदि इसके अतिरिक्त अङ्गों का प्रयोग और अधिक विलम्ब तक चले तो उससे प्रस्तुत किये जाने वाले ' नाट्य ' को देखने का उत्साह दर्शकों में घटने लगेगा अतः अधिक विस्तार नहीं किया जाए ( तथा प्रारम्भ में ही प्रयोग के बिगड़ जाने से आगे अच्छी तैयारी से भी नाट्य प्रयोग प्रस्तुत किया जाय तो भी इष्ट लाभ सरल नहीं होता । ) 1813 ०१. गीतनृत्य विधि - ग ० । S
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पञ्चमोऽध्यायः १ ९ ७ गीत तथा नृत्य देर तक चलते रहेंगे तो प्रयोक्तागण को थकाने तथा प्रेक्षकों को उबा देने वाले होंगे, फिर खिन्न व्यक्तियों ( अभिनेता तथा प्रेक्षक वर्ग ) को रस तथा भावों की स्पष्टतापूर्वक प्रतिपत्ति नहीं होगी और इस प्रकार आगे प्रस्तुत किये जाने वाले नाट्य प्रयोग की रंजकता न रह पाएगी ॥ १६२ - ३६३ ॥ [ लक्षणेन ' विना बाह्यलक्षणाद्विस्तृतं भवेत् ॥ लोकशास्त्रानुसारेण तस्मान्नाट्यं प्रवर्तते । ] [ शास्त्रलक्षणहीन होने पर ' नाटक ' लोकलक्षण मात्र से भी प्रसिद्ध हो जाता है इसलिये शास्त्र तथा लोक ( दोनों ) लक्षण के अनुसार ' नाट्य ' का पवर्तन किया जाए । ] त्र्य वा चतुरस्रं वा शुद्धं चित्रमथापि वा ॥ प्रयुज्य रङ्गान्निष्क्रामेत् सूत्रधारः सहानुगः । त्र्यस्र, चतरस्र, शुद्ध तथा चित्र किसी प्रकार के करने के उपरान्त सूत्रधार अपने दोनों परिपार्श्वकों के चला जाए ॥ १६४ ॥
आश्रावणा ' १६४ ॥ पूर्वरंग का प्रयोग साथ रंगमंच से देवपार्थिवरङ्गाणामाशीर्वचनसंयुताम् ॥ १६५ ॥
कवेर्नामगुणोपेतां वस्तूपक्षेपरूपिकाम् ।
लघुवर्णपदोपेतां वृत्तैश्चित्रैरलङ्कृताम् ॥ १६६ ॥
अन्तर्यवनिका संस्थः कुर्यादाश्रावणां ततः ।
आश्रावणावसाने च नान्दीं कृत्वा स सूत्रधृत् ॥ १६७ ॥
पुनः प्रविश्य रङ्गं तु कुर्यात्प्रस्तावनां ततः । फिर वह सूत्रधार ( स्थापक ) ' आश्रावणा ' का प्रयोग करे । यह आश्रावणा देवता, भूप तथा रंग के आशीर्वचन से युक्त होती है । इसमें १. आश्रावणा ' का यह वर्णन कुछ पुस्तकों में नहीं मिलता है । १. श्लोकोऽयं ग ० पुस्तके नास्ति । क
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१ ९ ८ नाट्यशास्त्रम् नाटक के रचयिता कवि का नाम तथा उसके गुणों का वर्णन रहता है तथा यह कथावस्तु की प्रतीति की उत्पादक होती है । इसमें लघुवर्ण के पद रहते हैं तथा अनेक वृत्त ( छन्द या घटनाएँ ) रहती हैं । वह सर्व-प्रथम इस आश्रावणा को यवनिका के अन्दर स्थित रहकर सम्पन्न करे और आश्रावणा के पश्चात् ( सूत्रधार ) पुनः नान्दी को भी सम्पन्न करे और तदनन्तर वह मंच पर आकर प्रस्तावना को प्रस्तुत करे ॥ १६५-१६७ ॥ * प्रस्तावना-प्रयुज्य विधिनैवन्तु पूर्वरङ्गं प्रयोगतः ' ॥ १६८ ॥
स्थापकः प्रविशेत्तत्र सूत्रधारगुणाकृति । इस प्रकार वर्णित विधि के अनुसार ' पूर्वरंग ' का प्रयोग हो चुकने पर सूत्रधार के समान गुण एवं आकृति वाला स्थापक ' रंगमंच पर प्रवेश करे ॥ १६८ ॥
१. ' स्थापक ' को अभिनवगुप्ताचार्य सूत्रधार ही बतलाते हैं- ' सूत्रधार एवं स्थापक: ( अभि ० भाव ० अ ० ५, पृ ० २५० ) धनंजय ने ' दशरूपक ' ( ३०२ ) में बतलाया कि पूर्वरंग के विधान के बाद सूत्रधार रंगमंच से चला जाए । शारदातनय ने ( भावप्रकाशन में ) भी यही विवरण दिया है ( दे ० भा ० प्र ० ०२८ ) । साहित्यदर्पण में विश्वनाथ कविराज ने भी ऐसे ही विचार प्रकट किया हैं ( सा ० द ० ६।२६ ) । उपर्युक्त सभी आचार्य ' नाट्यशास्त्र ' के आधार पर यहाँ एक मत हैं । अति प्राचीन काल में धार्मिक अनुष्ठान के सम्पन्न करने पर सूत्रधार का प्रयोजन पूर्ण हो जाता था तथा प्रदर्शन की पूर्वपीठिका बन जाती थी । बाद में होने वाले नाट्य प्रदर्शन का कार्य अन्य सहायक व्यक्ति देखते थे जिनमें एक स्थापक भी होता था । पर यह व्यवस्था आगे नहीं चली और तब सूत्रधार या स्थापक में से किसी एक के द्वारा यह कार्य सम्पन्न होने लगा । भास अपने नाटक सूत्रधार द्वारा प्रस्तावना के उपक्रम से ही प्रारम्भ किये जो उस समय का एक नवीन आदर्श था तथा बाण ने भी अपने हर्षचरित में ' सूत्रधार - कृतारम्भैः ' के द्वारा उल्लेख किया है । परन्तु कालान्तर में एक सूत्रधार ही सब कार्य सम्पन्न करने लगा था जिनका साहित्यदर्पण में उल्लेख ( आता ) है ।
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पञ्चमोऽध्यायः १ ९९ स्थानन्तु वैष्णवं कृत्वा सौष्ठवाङ्गपुरस्कृतम् ॥ १६ ९ ॥ प्रविश्य रङ्ग तैरेव सूत्रधारपदैर्वजेत् ' । वह वैष्णवस्थान ' को सौष्ठव युक्त शरीरावयवों से प्रदर्शित करते हुए मञ्च पर प्रवेश करे तथा ( वैसी ही ) सूत्रधार सदृश चारी में पाँच कदम आगे चले ॥ १६२ ॥
स्थापकस्य प्रवेशे तु कर्तव्यार्थानुगा ध्रुवा ॥ १७० ॥
त्र्यस्त्रा ' वा चतुरस्रा वा तज्ज्ञैर्मध्यलयान्विता । स्थापक के मंच पर प्रवेश के समय अर्थानुगामिनी ध्रुवा का गान किया जाए और यह गान त्र्यत्र या चतुरस्र ताल में मध्यलय में रखना चाहिए ॥ कुर्यादनन्तरं चारों देवब्राह्मणशंसिनीम् ॥ १७१ ॥
सुवाक्यमधुरैः श्लोकैर्नानाभावरसान्वितैः । इसके पश्चात् वह देवता तथा ब्राह्मणों में भक्ति की सूचक ' चारी ' को अनेक भाव तथा रसों से युक्त, मधुर वाक्य वाले सुन्दर श्लोकों के द्वारा प्रस्तुत करे ॥ १७१ ॥
प्रसाद्य रङ्गं विधिवत् कवेर्नाम ' च कीर्तयेत् ॥। १७२ ॥ प्रस्तावनां ततः कुर्यात् काव्यप्रख्यापनाश्रयाम् । १. वैष्णस्थान का लक्षण ना ० शा ० १० / ५०-५१ पर है । इनमें खड़े होने की स्थिति में दोनों पैर ढाई ताल के अन्तर से रखे जाते हैं, यहाँ एक पैर सम ( सीधा ) रहता है तथा दूसरा टेढ़ा रखा जाता है । २. सौष्ठव का लक्षण ना ० शा ० १११८६ पर द्रष्टव्य । इसमें शरीर स्थिर, सीधा और समस्थिति में रहता है । ३. अभिनवगुप्त ने ' अन्तरचारी ' पाठ को भी व्याख्या की है । अर्थात् अपने ( स्थान के ) अतिरिक्त एक अन्य ' चारी ' श्लोक का पाठ करना । अर्थात् इस समय शृङ्गार या वीररस प्रधान देवस्तुति ( आदि ) के विषय वाले एक और श्लोक का पाठ किया जाए । १. पदं ग ० । २. चतुरस्राऽथवा व्यस्रा तज्ज्ञैर्मध्यलयान्विता - घ ० । ०३. नमानुकीर्तयेत् — घ ० ।
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२०० नाव्यशास्त्रम् ( इस प्रकार ) रंगस्थ प्रेक्षकों का मनोरंजन कर चुकने पर वह नाटक लेखक ( कवि ) का नाम घोषित करे और फिर नाटक की कथावस्तु को निदर्शित करने वाली ' प्रस्तावना ' का प्रारम्भ करे ॥ १७२ ॥
उद्धात्यकादि कर्तव्यं काव्योपक्षेपणाश्रयम् ॥ १७३ ॥
दिव्ये दिव्याश्रयो भूत्वा मानुषे मानुपाश्रयः ।
दिव्यमानुषसंयोगे दिव्यो वा मानुषोऽपि वा ॥ १७४ ॥
मुख बीजानुसदृशं नानामार्गसमाश्रयम् ।
नानाविधैरुपक्षेपैः काव्योपक्षेपणं भवेत् ॥। १७५ ॥
STHE PIP
प्रस्तान्यैवं तु निष्कामेत् काव्यप्रस्तावको ' द्विजः ।
एवमेष प्रयोक्तव्यः पूर्वरङ्गो यथाविधि ॥ १७६ ॥
दृश्य काव्य के अर्थों की सूचक उद्घात्यक आदि ( प्रस्तावनाओं के विभेदों ) का प्रयोग करना चाहिए । यदि नाटक का ( कथावस्तु का ) विषय दिव्य - चरित हो तो वह दिव्यवेश, मानव - चरित हो तो मानुष-वेश तथा दिव्य एवं मानवों के संकीर्ण चरित होने पर दिव्य - मानुष वेश में से किसी एक को धारण करे और अनेक प्रकार से ( वह ) नाटक के प्रतिपाद्य मुख ' तथा बीज के सूचक अनेक मार्ग का आश्रय लेकर सूचना दे । यह कार्य ( प्रस्तुत किये जाने वाले अभिनेय काव्य का संकेत ) अनेक - विध उपक्षेपों ( सन्दर्भों ) द्वारा किया जाता है । इस प्रकार काव्य ( दृश्य काव्य ) की प्रस्तावना ( करने ) के पश्चात् वह स्थापक ( द्विज ) रंगमञ्च से प्रस्थान करे । इसी प्रकार विधिवत् ( इस ) पूर्वरंग का प्रयोग
करना चाहिए । १७३-१७६ ॥
१. मुखसन्धि, बीज तथा अर्थप्रकृति के लक्षण ना ० शा ० अध्याय २१।३ तथा २१।२२ पर द्रष्टव्य । पूर्वरंग में सूत्रधार प्रस्तावना का सम्पादन कर मंच से चला जाता है पर वह सामाजिकों में मुखसन्धि का प्रयोग द्वारा बीज का आधान करते हुए उनकी अनुकूलता अर्जित करता है ( तथा ' नाट्यप्रयोग ' के प्रति कौतूहल की सृष्टि भी कर देता है ) १. पद्यार्धमेतत् ग - - पुस्तके नास्ति । १. काव्यप्रास्तावकस्ततः - ख ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः २०१
पूर्वरंग का महत्व -य इमं पूर्वरङ्गं तु विधिनैव प्रयोजयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १७७ ॥
जो भी नाट्यप्रयोक्ता इस ‘ पूर्वरंग ' का ( इस वर्णित ) विधान के अनुसार प्रयोग करेंगे, वे किसी भी अनिष्ट को प्राप्त नहीं करेंगे तथा ( अन्त में ) स्वर्गलोक को प्राप्त करेंगे ॥ २७७ ॥
यश्चापि विधिमुत्सृज्य यथेष्टं संप्रयोजयेत् ।
प्राप्नोत्यपचयं घोरं तिर्यग्योनि च गच्छति ॥ १७८ ॥
और जो नाट्य प्रयोक्ता इस विधि का अतिक्रमण कर यथेष्ट विधि से पूर्वरंग का आचरण करेगा वह अतिशय हानि प्राप्त करेगा तथा पशुयोनि में जन्म लेगा ॥ १७८ ॥
न यथाग्निः प्रदहति प्रभञ्जनसमीरितः ।
यथा पप्रयोगस्तु प्रयुक्तो दहति क्षणात् ॥ १७ ९ ॥
वायु से प्रेरित अनि भी उतना शीघ्र फैल कर किसी वस्तु को भस्म नहीं कर सकती जितना त्रुटिपूर्ण नाट्यविधान, क्यों कि यह तो प्रयोग त्रुटि के होने पर तत्काल ही प्रयोक्ता को नष्ट कर देता है ॥ १७ ९ ॥
इत्येषोऽवन्ति पाञ्चालदाक्षिणात्यान्ध्रमागधैः ' ।
कर्तव्यः पूर्वरङ्गस्तु द्विप्रमाणविनिर्मितः ॥ १८० ॥
दो प्रमाण एवं विस्तार वाला ( त्र्यस्र तथा चतुरस्र प्रकारों से निर्मित ) यह पूर्वरंग अवन्ती, पांचाल, दाक्षिणात्य, आन्ध्र तथा मगध देशवासियों द्वारा प्रयोग किया जाए ॥ १८० ॥
१. ' नाट्य ' जैसे जटिल प्रयोग को साव सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा । यहाँ अ क हो सकती है । १. इत्येवावन्ति पाञ्चालदाक्षिणात्योढू मागधैः ग ० ।