भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 331–340

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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२०२ नाट्यशास्त्रम् एष वः कथितो विप्राः पूर्वरङ्गाश्रितो विधिः भूयः किं कथ्यतां सम्यङ्नाट्य वेदविधिं प्रति ॥ १८१ ॥

हे मुनियों, इस प्रकार मैंने आपको ' पूर्वरंग ' से सम्बद्ध सभी विधियाँ बतलाई । अब आपको इस नाट्यवेद से सम्बन्धित और कौन - सा विषय बतलाऊँ ॥ १८१ ॥

पुनश्चित्रे तथा मिश्र शुद्धे चैव ब्रवीम्यहम् ।

यथा योज्या ध्रुवाः पञ्च तथा वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ १८२ ॥

अब मैं चित्र, ' मिश्र तथा शुद्ध पूर्वरंग में होने वाली पाँच ध्रुवाओं के संयोजन की तात्विक विधि बतलाता हूँ ॥ १८२ ॥

आदावुत्थापनी ' कार्या परिवर्तस्तथा भवेत् ।

अवकृष्टाड़िता चैव विक्षिप्ता चैव पञ्चमी ॥ ९ ८३ ॥

एवं पञ्च भ्र वा ज्ञेया उपोहनसमन्विताः ।

कर्तव्यास्तु प्रयत्नेन पूर्वरङ्गे प्रयोक्तृभिः ॥ १८४ ॥

इन पाँच ध्रुवाओं में सर्व प्रथम उत्थापनी ध्रुवा होती है फिर परि-वर्तिनी, अवकृष्टा, अड्डिता और विक्षिप्ता ध्रुवाएँ की जाती हैं । ' उपोहन ” विधान से सम्बद्ध ये ही पाँच ध्रुवाएँ हैं जिनका ' पूर्वरंग ' में प्रयत्नपूर्वक प्रयोग करना चाहिए ॥ १८३-१८४ ॥ १. ' पुनश्चित्र ' इत्यादि से अध्यायान्त तक के श्लोक भरत के नहीं है किन्तु अन्य आचार्यो ( कोहल आदि ) द्वारा विषय पूर्ति की दृष्टि से यहाँ दिए गए हैं । इसी दृष्टि से इन सभी श्लोकों का व्याख्यान दिया जा रहा है । क्योंकि नाट्यशास्त्र की अनेक प्रतियों तथा संस्करणों में यहीं ये श्लोक प्राप्त ( होते ) हैं । २. उपोहन - वस्तु या गीत ( जिसे आजकल चीज, कहते हैं ) के प्रयोग १. इतः प्रभृतिसमाप्ति यावत् श्लोकः प्रक्षिप्ताः । २. उत्थापिनी तथा कार्या परिवर्ता तथा भवेत् ग ० । ३. अपकृष्टा सिता ग ० । THI

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पञ्चमोऽध्यायः

अतः परं प्रवक्ष्यामि ह्यपोहनविधिक्रियाम् ।

अस्थापनस्याष्टकलं परिवर्त्तस्य षट्कलम् ॥

अवकृष्टं ' पुनः कार्य कलाभिः पञ्चभिर्युतम् ।

वायामवितायाश्च चतुष्कलमथापि च ॥

क्षिप्तायाञ्चैव ' विज्ञेयं कलात्रयसमन्वितम् ।

एवं ह्यपोहनानान्तु प्रमाणं समुदाहृतम् ॥

कलातालसमन्वितम् । गुरुलाघवसंयुक्तं पूर्वरङ्गं सदा ज्ञेयं चित्र मार्गे पोहनम् ॥ चित्रे चैत्राः कला ज्ञेया मिथे वार्तिकमाश्रिताः । २०३ १८५ ॥ १८६ ॥ १८७ ॥ १८८ ॥ शुद्धे दक्षिणमार्गेण प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १८ ९ ॥ अब मैं ‘ उपोहन ( के प्रयोग को ) विधि बतलाता हूँ । उत्थापनी-ध्रुवा में आठ कला, परिवर्तनी में छः कला, अवकृष्टा में पाँच कला, अड्डिता में चार कला तथा विक्षिप्ता वा में तीन - कला का प्रमाण उपोहन विधि में माना गया है । यह उपोहन- विधान गुरु तथा लघु ( अक्षरों ) वाला और कला तथा ताल से युक्त होता है । ' चित्र - मार्ग में उपोहन का के पूर्व या वस्तु और कलिका के बीच स्वर तथा कला ( ताल या काल विशेष ) के नियमन के लिये किया जाने वाला आलाप । यह उपोहन केवल शुष्काक्षरों के द्वारा किया जाता है अर्थात् इससे गीत के सार्थक पदों का गान नहीं होता । आचार्य भरत ने तालाध्याय में ' उपोहान्ते स्वराः येन यस्माद् गीतं प्रवर्तते । तस्मादुपोहनं प्रोक्तं शुष्काक्षरसमन्वितम् ' । ( ना ० शा ० ३१।१३८ ) अर्थात् प्रारंभ में स्थापित स्थायीस्वर का आलाप आदि करना जिससे गीत का प्रारंभ होता हो, तो केवल ऐसा वर्णालाप का ( अक्षरों का ) गान ' उपोहन ' कहलाता है । १. चित्र, वार्तिक तथा दक्षिण मार्ग के लक्षण ना ० शा ० के २६ तथा ३१ में विस्तार से दिये गए हैं । क १. अपकृष्टं ग ० । २. विक्षिप्तञ्चैव घ ० । ३. चित्रागं ख ० ।

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२०४ नाट्यशास्त्रम् यही विधान होता है । चित्र पूर्वरंग में चित्र मार्ग के अनुसार, मिश्र पूर्वरंग में वार्तिक - मार्ग के अनुसार तथा शुद्ध पूर्वरंग में दक्षिण मार्ग के अनुसार नाट्यचायों के द्वारा कलाएँ रखी जाएँ ॥ १८५–१८९ ॥

चतस्रो गीतयः कार्या मागधी ह्यर्धमागधी ।

संभाविता तथा चैव पृथुला च प्रकीर्तिता ॥।

मागधी त्वथ कर्तव्या त्वथवा त्वर्धमागधी ।

पूर्वरङ्ग भवेच्चित्रे चित्रमार्गसमाश्रिता ' ॥

यथा मिश्रस्तु योक्तव्यः पूर्वरङ्ग भवेदिह ।

मिश्रे सम्भाविता कार्या तदा वार्तिकमाश्रिता ॥

शुद्धे च पृथुला कार्या दक्षिणं मार्गमाश्रिता ।

१ ९ ० ॥

१ ९ १ ॥

१ ९ २ ॥

इनमें चार गीतियों का प्रयोग किया जाता है । इस गीतियों के नाम हैं— मागधी, अर्धमागधी, संभाविता तथा पृथुला । इसमें चित्र ' पूर्वरंग में ( जो चित्र मार्ग के अनुसार होता है ) मागधी और अर्धमागधी गीति रखी जाए । मिश्र पूर्वरंग ( जो मार्ग के अनुसार होता है ) में सम्भाविता गीतिका तथा शुद्धपूर्वरङ्ग ( जो दक्षिण मार्ग के अनुसार है ) — में पृथुलागीति ' का प्रयोग रहना चाहिए ॥ १ ९०-१९ २ ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि गुरुलाघवतः क्रियाम् ॥ १ ९ ३ ॥ उपोहनक्रियायां तु यथायोज्यं प्रयोक्तृभिः । १. गीति का स्वरूप —–जो छन्द, अक्षर आदि के लक्षणानुसार रहने पर संगति के अनुकूल वर्ण तथा अलङ्कारों को भी रखे वह गीति कहलाती है । इसके मागधी आदि प्रकार होते हैं जिनका विस्तृत वर्णन ना ० शा ० के २ ९ वें अध्याय में किया गया है । २. गीति का प्रयोग पूर्वरंग में हो केवल नहीं होता किन्तु नाट्य में भी किया जाता है । भरत मुनि ने ( ना ० शा ० ३१ में ) ' गानयोगे चतस्रस्तु योज्यः सर्वत्र गायनैः ' के द्वारा नाट्य तथा संगीत की योजना के अवसर पर भी गीति का प्रयोग करने का निर्देश किया है । • १. चित्रमार्गे च मागधी ग ० २. गुरुलध्वरक्षर क्रियाम् - घ ० ।

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पचमोऽध्यायः २०५ दिग्ले दिग्लै पुनः कार्यमन्ते झण्टुं सदा बुधैः ॥ १ ९ ४ ॥

मध्ये लध्वक्षराणि स्युः षोडशैव तु नित्यशः ।

एवं पोहनं कृत्वा तथा वस्तु समाचरेत् ॥ १ ९ ५ ॥

अब मैं उपोहन ( विधान ) में गुरु तथा लघु मात्राओं के द्वारा होने वाली क्रियाविधि बतलाता हूँ । इसमें आरम्भ में दिग्ले दिग्ले , तथा अन्त में झण्टुं झण्टुं किया जाता है तथा मध्य में सोलह अक्षर रखे जाते हैं । इसी प्रकार उपोहन - विधि करने के उपरान्त फिर वस्तु ( गीत ) का

आरंभ करना चाहिए ॥। १ ९३-१९ ५ ॥

उत्थापन्यां प्रयोगेऽस्मिन् कलाकालसमन्वितम् ।

अक्षराणां कलायास्तु गुरुलाघवमेव च ॥। १ ९ ६ ॥

पूर्व तु कथितं यस्मात्तस्मान्नाभिहितं भवेत् ॥ १ ९ ७ ॥

' ' उत्थापनी ' ध्रुवा में अक्षरों और कलाओं के गुरुलाघव प्रकार को— जो कला तथा समय के अनुसार किया जाता है " पूर्व में बतलाया जा चुका है अतएव पुनः यहाँ नहीं दिया जा रहा है ॥ १ ९६-१९ ७ ॥

यथा-देवं विभुं त्रिभुवनाधिपतिं कैलासपर्वतगुहाभिरतम् ।

शैलेन्द्रराजतनयादयितं मूर्ध्ना नतोऽस्मि पुरनाश - करम् ॥

जैसे — मैं त्रिभुवन के स्वामी परमश्रेष्ठ देव हूँ जो कैलास पर्वत की कन्दराओं में रमण अतिशय प्रिय हैं तथा त्रिपुरासुर के नाशक हैं ॥ १. उत्थापनीध्रुवा का लक्षण ना ० शा ० चुका है । २. इन उदाहरण में गुरु लघु अक्षरों का क्रम देवं विभुं त्रिभुवनाधिपति SSIS III SIIS शिवजी को प्रणाम करता करते हैं, पार्वती जी के १ ९ ८ ॥ ५।६० पर बतलाया जा इस प्रकार है --१. त्रिपुरान्तकरम् - ग ० ।

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२०६ नाट्यशास्त्रम्

एवमुत्थापनी ' कार्या पूर्वरङ्गप्रयोक्तृभिः ।

अतोऽन्यत्परिवर्ताया लक्षणं संविधीयते ॥ १ ९९ ॥

पूर्वरंग के प्रस्तुत कर्ता इसी विधि से उत्थापनी ध्रुवा का प्रयोग करें ।

अब आगे ' परिवर्तिनी ' ध्रुवा का लक्षण बतलाया जाएगा ॥ १ ९९ ॥

अस्थास्तूपोहनं कार्य षट्कलं परिसङ्ख्यया ।

आदी दिग्ले द्विरुक्तस्तु ' अन्ते झण्टुं सदा भवेत् ॥ २०० ॥

मध्ये लध्वक्षराण्येव द्वादशैव प्रयोजयेत् ।

वस्तुनोऽत्र प्रवक्ष्यामि गुरुलध्वक्षरक्रमम् ॥ २०१ ॥

इस परिवर्तिनी ध्रुवा में छः कलाओं की उपोहन क्रिया होती है । इसमें दो बार आदि में दिग्ले और अन्त में झण्टु होता है और मध्य में द्वादश लघु अक्षरों का निवेश किया जाता है । अब इसमें विद्यमान वस्तु ' ( गीतक ) की गुरु तथा लघु अक्षरों की क्रमविधि बतलाता हूँ ॥ २००-२०१ ॥

द्वे चादौ च चतुर्थ च अष्टमं दशमं तथा ।

चतुर्दशं पञ्चदशं पादे गुर्वक्षराणि तु ॥

सा ध्रुवा परिवर्ताख्या त्रिलया त्रियतिस्तथा ।

परिवर्तस्तु चत्वारः पाणयस्त्रयः एव च ॥

चतुर्भिस्सन्निपातैस्तु द्वात्रिंशत्कलिकान्विता ।

पूर्वरङ्गे प्रयोक्तव्यः परिवर्तः प्रयोक्तृभिः ॥

जिसके एक पाद में आदि के दो अक्षर तथा चतुर्थ २०२ ॥ २०३ ॥ २०४ ॥ , अष्टम, दशम, चतुर्दश एवं पञ्चदशाक्षरर गुरु होते हैं तो उसे परिवर्ता ध्रुवा समझना १. नाट्यप्रयोग के अतिरिक्त अपरान्तक आदि सात प्रकार की गीति वस्तु कहलाती है । वस्तु के सात प्रकार तथा उनका स्वरूप ना ० शा ० अध्याय ३१ में बतलाया गया है! १. एवमुक्त्वा परीकार्या — ग ० । २. पूर्व रङ्गे घ ० । ३. त्रिरुक्तस्तु ग ० । ४. द्वौ पादी ग ० ।

पृष्ठ 336

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पञ्चमोऽध्यायः २०७ चाहिए । इसमें तीन ' लय, तीन यति, चार परिवर्त और तीन पाणि होते हैं । इस परिवर्ता ध्रुवा को चार सन्निपातों के तथा बत्तीस कलाओं के साथ पूर्वरंग में प्रयुक्त करना चाहिए । २०२-२०४ ॥ यथा-चन्द्रार्धभूषणजटं वरं वृषभकेतुं कैलास पर्वतनिवासिनं सुरवरिष्ठम् । शैलाधिराजतनयाप्रियं प्रमथनाथं मूर्ध्ना नतोऽस्मि त्रिपुरान्तकं परमयोगिनम् * ॥२०५ ॥

जैसे — मैं उन परमयोगि त्रिपुरारि भगवान शिव को साष्टांग प्रणाम करता हूँ जो जटा और चन्द्र के भूषण धारण करते हैं, चिह्न है, कैलास पर्वत पर निवास करते हैं, देवताओं में के अतिशय प्रिय हैं तथा गणों के अधिपति हैं ॥ २०५ ॥

अवकृष्टा ध्रुवा अवकृष्टामिदानी " तु कथ्यमानां निबोधत अस्यास्तूपोहनं कार्य कलाभिः पञ्चभिर्युतम् दिग्ले दिग्ले पुनश्चान्ते झण्टुमस्य प्रयोजयेत् अष्टावेव तु कार्याणि मध्ये लध्वक्षराणि तु तृतीयं चैव षष्ठं तु नवमैकादशे तथा पादे पञ्चदशं चैव षोडशं च भवेद्गुरु १. लय, यति, पाणि, तथा परिवर्त आदि के लक्षण ३१ में देखिये । वृषभ ही जिनका श्रेष्ठतम हैं, पार्वती

|| २०६ ॥

॥। २०७ ॥

॥ २०८ ॥

नाट्य शा ० अध्याय २. परिवर्तिनी ध्रुवा के उदाहरण में मात्राओं की गणना इस प्रकार है: -चन्द्रार्धभूषणजटं वरं वृषभकेतुं SSIS IT IS III SS १. परं - ग ० । २. वृषकेतनम् - ग ० । ३. निवास ग ० । ४. परमयोगिम् — घ ० । ५. अपकृष्टा - ० । ६. पुनश्चायं ग ० ।

पृष्ठ 337

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२०८ नाट्यशास्त्रम् ' ' yari स्वरूप सुनिये । इससे पाँच कलाओं से उपोहनविधान किया जाए । प्रारम्भ में दिरले दिग्ले तथा अन्त में झ का प्रयोग रहना चाहिए तथा मध्यवर्ती लघु अक्षरों की संख्या आठ रखनी चाहिए । इसमें ( एक ) पाद में तृतीय, षष्ठ, नवम, एकादश, पंचदश और षोडशाक्षर गुरु होता है ॥ २०६ - २०८ ॥

अष्टषष्टिगणैः ' " पातैरवकृष्टविधिर्बुधाः ।

चतुर्भिः सन्निपातैश्च पाणिभिस्त्रिभिरेव च ॥ २० ९ ॥

इस अवकृष्टा के पादों में अड़सठ ( ६८ ) पात ' भाग होते हैं जो चार सन्निपात तथा तीन पाणि के द्वारा किये जाते हैं ॥ २० ९ ॥

यथा-वरदं सगणं त्रिपुरान्तकं वृषभकेतुम् ।

गजचर्मपटं विषमेक्षणं भुवननाथम् ॥

भुजगाभरणं जगतां हितं भुवनयोनिम् ।

प्रणतोऽस्मि भवन्तमुमापतिं त्वसितकण्ठम् ॥ २१० ॥

जैसे — मैं उन वरद गौरीपति नीलकंठ भगवान शिव को प्रणाम करता हूँ जो प्रमथगणों से युक्त हैं, त्रिपुर के संहर्ता हैं, वृषभाषन तथा गजचर्म को धारण किये हैं, त्रिनेत्र और विश्वाधिपति हैं, सर्पों के भूषण धारण करते हैं, विश्व के कल्याण कर्ता एवं संसार के उत्पत्ति कर्ता हैं ॥ २१० ॥

१. पातभाग कला आदि का स्वरूप नाट्यशास्त्र के ३१ वें अध्याय ( तालाध्याय ) में देखिये । पात का अर्थ है सशब्दा क्रिया । इसी में सन्निपात तथा पाणि का प्रयोग होता है । २. अवकृष्टा ध्रुवा में मात्राओं की गणना का निम्न क्रम है: -वरदं सगणं त्रिपुरान्तकं वृषभकेतुं ॥ ऽ ॥ ऽ II SIS ISS 212 2 १. अष्टषष्ठगुणै ग ०, अष्टषष्ठगणैः - घ ० । २. पादैः - ग ० । ३. सहगणं ग ० । ४. त्रिपुरान्तकरं ग ० । ५. भुजङ्गाभरणं ग ० ।

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पञ्चमोऽध्यायः २० ९ अड्डिता - ध्रुवा- PE DEFE तृतीयञ्चैव षष्ठञ्च गुरुपादे त्रयोदशम् । 15 चतुर्गुणसमायुक्ता सा कार्या त्वडिता'ध्रुवा तत्राप्यपोहनं कार्ये चतुष्कलसमन्वितम् अडितायाः प्रयोगशैरन्ते झण्टुं विभूषितम् दिग्ले दिग्ले ततश्चैव कार्यमन्ते सदा बुधैः चत्वार्येव तु कार्याणि मध्ये लध्वक्षराणि तु कार एक ि ॥ २१२ ॥

॥ २१३ ॥

॥ २१४ ॥

' अड्डिता ' ध्रुवा में त्रयोदशाक्षर पाद के तृतीय तथा षष्ठ अक्षर गुरु रखे जाएँ तथा यह चार ' गुणों से युक्त हों । इसमें चार कलाओं से उपोहन-विधि की जानी चाहिए; अन्त में झण्टु तथा प्रारम्भ में दिग्ले दिग्ले रखा. जाए तथा मध्य में चार अक्षर लघु रहने चाहिए ॥ २१२-२१४ ॥

यथा'-प्रवरं वरदं प्रणमत सततम् ।

गजचर्मपरं मुनिजनसहितम् ॥

उमया सहितं भुजगवलयिनम् ।

प्रणतोऽस्मि शिवं त्रिभुवनमहितम् ॥ २१५ ॥

१. अड्डिताध्रुवा में चार गुण होते हैं । इनमें प्रथम गुण है चार कलाओं की उपोहनविधि, दूसरा है अन्त में झण्टु अर्थात् शुष्काक्षर का प्रयोग, तीसरा है ( आरंभ में ) दिग्ले - दिग्ले अर्थात् चार गुरु अक्षरों का प्रयोग और चौथा है मध्य में चार लघु अक्षरों का विधान । ये ही चार गुण मूल लक्षण में वर्णित हैं । २. अड्डिताध्रुवा में मात्राओं का क्रम इस प्रकार है: -प्रवरं वरदं प्रणमत सततं SISIISIIIIIIS १. स्वड्डिका - ग ० । २. कार्यं मानं ग ० । ३. मध्यलध्वक्षराणि तु ग ० । ४. प्रमथगणपतिम् - घ ० । ५. मुनिजनमहितम् - घ ०; ६. त्रिभुवनसहितम् — ०. १४ ना ० शा ० प्र ०

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२१ ९: नाट्यशास्त्रम् जैसे - मैं सदा उन शिव को प्रणाम करता हूँ जो देवाधिदेव तथा सदा प्रसन्न होकर वर देने वाले हैं, प्रथमगण के अधिपति हैं, गजचर्म ( को ) धारण करने वाले, मुनिजन से युक्त, पार्वती से सुशोभित, सर्पों के वलय - धारी तथा त्रैलोक्यवन्ति हैं ॥ २१५ ॥

प्रयोज्या त्वडिता ह्येवं पूर्वरङ्गे यथार्थतः: अतः परं प्रवक्ष्यामि विक्षिप्तायास्तु लक्षणम् ॥ पूर्वरंग में अड्डिता का प्रयोग इसी विधि से किया ' विक्षिप्ता ' ध्रुवा का स्वरूप बतलाता हूँ ॥ २१६ ॥

विक्षिप्ता ध्रुवा

तृतीयञ्चैव षष्ठश्च नवमं दशमं तथा ।

गुर्वक्षराणि पादे तु यस्यां विक्षिप्तका तु सा ॥

दिग्लैस्त्रिभिर्गुणैर्युक्ताः पातास्तस्य ' भवन्ति हि त्रिकलं चापि निर्दिष्टमुपोहनमतः परम् ॥ दिग्ले दिग्ले पुनः कार्यमन्ते झण्टुं प्रयोक्तृभिः लध्वक्षरैर्विहीनं तु विक्षिप्तोपोद्दनं भवेत् ॥ २१६ ॥ जाए । अब मैं २१७ ॥

२१८ ॥

२१ ९ ॥

जिसके पाद में तीसरा, छठा, नवम तथा दशम अक्षर गुरु हों उसे ' विक्षिप्ता ' ध्रुवा जानों । इसमें दिग्ले प्रयोग के तीन गुणों से युक्त पात होते हैं और इसमें तीन कलाएँ होती हैं । इसके बाद उपोहूनविधि होती है जिसमें आरम्भ में दिग्ले दिग्ले तथा अन्त में झण्टु का प्रयोग किया जाता है और इसमें उपोहन में लघु अक्षर नहीं रखे जाते ॥ १. इस विक्षिप्ताध्रुवा में तीन गुण हैं — दिग्ले का तीन बार पात अर्थात् सशब्दा क्रिया का प्रयोग, तीन कलाओं के अनन्तर उपोहन का प्रयोग, आरम्भ में दिग्ले - दिग्ले और अन्त में झण्टुं जैसे शुष्काक्षरों का प्रयोग तथा लघु अक्षरों के प्रयोग का निषेध । २. ' विक्षिप्तता ' ध्रुवा में मात्राओं का क्रम इस प्रकार है: । -त्रिपुरान्तकरं बहुलील IISIISIISS १. पादास्तस्य - ० ॐ OR 88

पृष्ठ 340

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पञ्चमोऽध्यायः २११

यथा-त्रिपुरान्तकरं बहुली, उमया सहितं बहुरूपम् ।

भुजगाभरणं त्रिपुरान्तं, ' प्रणमामि सदा परमीशम् ॥ २२० ॥

जैसे — मैं सदा उन परमेश्वर शिव को प्रणाम करता हूँ जो त्रिपुरासुर के नाशक, अनेकविध नृत्य - गीतादिलीला के विधाता, अनेक स्वरूप धारण करने वाले, पार्वती सहित हैं, जिसके सर्पों के आभरण हैं दैत्य के संहारक हैं ॥ २२० ॥

एवं सर्वा ध्रुवाः कार्या युग्मौजकृतगीतकाः ।

आचार्यबुद्धया कर्तव्या पूर्वरङ्गे यथाविधि ॥

एवं वः कथितं सम्यक्पूर्वरङ्गं त्रिधा मया ।

किमन्यत्संप्रवक्ष्यामि भूयोऽभीष्टं द्विजोत्तमाः ॥

इति भारतीये नाट्यशास्त्रे पूर्वङ्गविधानं नाम पञ्चमोऽध्यायः । इसी कथित विधि अनुसार ' चतुरस्र तथा त्र्यस्र ताल प्रयुक्त की जानी चाहिएँ और पूर्वरंग में इनका प्रयोग अनुसार विधिवत् रहना चाहिए ॥ २२१ ॥

और जो त्रिपुर SFE २२१ ॥ २२२ ॥ 1516 क वाली ये ध्रुवाएँ आचार्य - बुद्धि के

हे मुनिजन, तीनों प्रकार के पूर्वरंग का स्वरूप इस प्रकार मैंने बतलाया ।

अब आगे किस अभीष्ट वस्तु का वर्णन लक्षण आदि से किया जाए ॥३२२ ॥

भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र में ' पूर्वरंग - विधान ' नामक पाचवाँ अध्याय सम्पूर्ण । एक १. युग्म शब्द चतुरस्र ताल तथा ओज त्र्यत्र ताल का वाचक शब्द है । ( तदनुसार ही यहाँ अर्थ किया गया है ) । १. त्रिपुरान्तकं ग ० । २. गीतिका ग ०, घ ० । ३. पूर्व रङ्ग त्रिधा - ग ० । ४. यद्वोऽभीष्टं ग ० ।