भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 341–350
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 341–350
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षष्ठोऽध्याय मुनिजन का भरत से प्रश्न—
पूर्वङ्गविधि श्रुत्वा पुनराहुर्महर्षयः ।
भरतं मुनयः सर्वे प्रश्नान्पञ्चभिधत्स्व नः ॥ १ ॥
इस प्रकार पूर्वरंग विधि का श्रवण कर चुकने पर महर्षि गण पुनः ' भरत ' से जिज्ञासापूर्वक बोले- हे मुने, आप हमारे पाँच प्रश्नों ' का उत्तर दीजिए ।
ये रसा इति पठ्यन्ते नाट्यै नाट्यविचक्षणैः ।
रसत्वं केन वै तेषामेतदाख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
नाट्य - कला के मर्मज्ञ नाट्य में जिसे ' रस ' कहते हैं वह क्यों ' रस ' कहलाता है? इसका कारण बतलाने की कृपा करें ॥ २ ॥
१. नाट्यशास्त्र के प्रथमाध्याय में भी मुनियों ने नाट्य की उत्पत्ति, उसके प्रयोजन, विस्तार, विभाग या अङ्ग तथा प्रयोग के स्वरूप जानने की इच्छा से पाँच प्रश्न किये थे जिनका कुछ विवरण देते हुए उनका समाधान पिछले पाँच अध्यायों में दिखलाया जा चुका है । और इन्हीं प्रश्नों का विस्तार से व्याख्यान समग्र नाट्यशास्त्र में है भी तथापि यहाँ जो पाँच प्रश्न पूछे गये हैं । वे उपर्युक्त ( पाँच ) प्रश्नों से भिन्न हैं । इनमें प्रथम प्रश्न है- रसों का रसत्व किस प्रकार उत्पन्न होता है? ( अर्थात् इन्हें रस क्यों कहा जाता है ); दूसरा प्रश्न है - भाव क्या है और वे क्या करते हैं?; तीसरा प्रश्न है - संग्रह किसे कहते हैं; चौथा है — कारिका का लक्षण क्या है और पाँचवा प्रश्न है - निरुक्त ( अर्थात् उद्देश्य, लक्षण और परीक्षा का लक्षणगत निर्वचन ) का क्या स्वरूप है । २. नाट्य के जिन चार अङ्गों ( पाठ्य, गीत, अभिनय तथा रस ) का प्रथम अध्याय में [ का १७ में ] निदर्शन है इनमें चौथे अङ्ग रस का स्वरूप स्पष्ट नहीं हुआ । क्योंकि लोकप्रचलन में रसेन्द्रिय से ग्राह्य गुण को रस १. महत्तमाः - ग ० घ ० । २. मुनयो भरतं सर्वे पञ्च प्रश्नान् ब्रवीहि नः – ग ० ।
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२१३
भावाश्चैव कथं प्रोक्ताः किं वा ते भावयन्त्यपि ।
संग्रहं कारिका चैव निरुक्तं चैव तत्त्वतः ॥ ३ ॥
और भाव क्यों कहे गये हैं और वे किसे ' भावित ' करते ' हैं? उसके अतिरिक्त संग्रह, कारिका तथा निरुक्त को भी बतलाइये क्योंकि इन्हीं से भाव आदि का परिज्ञान किया जाता है ।
भरत का प्रत्युत्तर-तेषां तु वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो मुनिः ।
प्रत्युवाच पुनर्वाक्यं रसाभावविकल्पनम् ॥ ४
मुनिगण के इन वचनों को सुन कर भरतमुनि रस विशेषता बतलाते हुए पुनः बोले ॥ ५ ॥
अहं वः कथयिष्यामि निखिलेन तपोधनाः ।
संग्रहं कारिकां ' चैव निरुक्तं च यथाक्रमम् ॥
॥
तथा भावों की ५ ॥ कहा जाता है । ऐसी दशा में नाट्यांगों में आनेवाले रस का शृङ्गारादि शब्द के साथ प्रयोग करने पर उसमें रसत्व कैसे होगा यह जिज्ञासा रह जाती है । इसी जिज्ञासा को यहाँ प्रथम प्रश्न के द्वारा उपस्थित किया जा रहा है । १. अभिनव का कथन है कि मूल में ' भावाश्चैव ' इत्यादि के द्वारा भावों के विषय में चार प्रश्न होते हैं जिनमें ' कथं प्रोक्ताः ' से एक प्रश्न तथा ' किवा ते भावयन्ति ' के द्वारा दूसरा प्रश्न शब्दतः अभिहित किया गया है और भाव-शब्दगत व्युत्पत्ति - विषयक दो प्रश्न ' किं भवन्तीति भावाः ' अथवा ' भावयन्तीति भावाः ' अर्थाक्षिप्त हैं [ इस प्रकार से चार प्रश्न हैं । ] २. संग्रह का अर्थ है उद्देश्य, कारिका का अर्थ लक्षण तथा निरुक्त शब्द का अर्थ परीक्षा है । ३. क्रमानुसार प्राप्त होने तथा मुनिजन द्वारा पूछे जाने पर रस का निरूपण करने के लिये भरत मुनि बोले यह सूचित करने के लिये मूल में ' पुनः ' शब्द का प्रयोग किया गया है । १. कारिकाश्चैव क ० । २. यथाविधि - क ० ।
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२१४ नाट्यशास्त्रम्
न शक्यमस्य ' नाट्यस्य गन्तुमन्तं कथञ्चन ।
कस्माद्बहुत्वाज्ज्ञानानां शिल्पानां वाप्यनन्ततः ॥ ६ ॥
एकस्यापि न वै शक्यस्त्वन्तो ज्ञानार्णवस्य हि ।
गन्तुं किं पुनरन्येषां ज्ञानानामर्थतत्त्वतः ॥ ७ ॥
हे मुनिजन, मैं आपको विस्तारपूर्वक क्रमशः संग्रह, कारिका तथा निरुक्त के विषय में बतलाता हूँ ॥ ५ ॥
इस ' नाट्य - विद्या ' का किसी प्रकार अन्त ( निश्चयात्मक ज्ञान ' पाना संभव नहीं है; क्योंकि ज्ञान ' तथा शिल्पों का ( जो कि इस ' नाव ' से सम्बद्ध हैं ) कोई अन्त नहीं है ॥ ६ ॥
जब इनमें से किसी एक ( अंगभूत ) विषय का ही सामध्येण ज्ञान संभव नहीं जो समुद्र के समान विस्तीर्ण हैं, तब फिर सभी ज्ञानों के तात्त्विक आशय तथा उनके समय तत्वों अन्तिम छोर तक पहुँचना कैसे संभव हो सकता है ॥ ७ ॥
किन्त्वल्पसूत्र - ग्रन्थार्थं मनुमानप्रसाधकम् ।
नाट्यस्यास्य प्रवक्ष्यामि रसभावादिसंग्रहम् ॥ ८ ॥
मैं आपको ‘ नाट्य ' के रस तथा भाव के ( संग्राहक ) संग्रह ' को १. यहाँ ज्ञान पद से व्याकरण आदि शास्त्र तथा शिल्पशब्द से चित्रकला, पुस्तकादि कला का ग्रहण है । इन ज्ञान और शिल्प का कोई अन्त नहीं है । २. रस तथा भाव के संग्रह अर्थात् उद्देश्य को जिसके द्वारा प्रतिपाद्य विषय को संक्षिप्त कर ग्रहण किया जाता है यह नाममात्र के कथन से संक्षिप्त होकर उद्देश ( जिसका लक्षण हो उस ) के धर्मी को निश्चित करता हुआ अनुमान का प्रकृष्ट साधक होता है अर्थात् उद्देश अनुमान का महत्व-पूर्णं साधक बन कर रहता है । इस उद्देश या संग्रह के द्वारा हेतु का आश्रय अर्थात् पक्ष का निश्चय हो जाता है और यह आश्रयासिद्धि नामक हेत्वाभास का निराकरण कर अनुमान के पक्षधर्मता रूप मुख्य अङ्ग को पुष्ट कर अनुमान का प्रकृष्ट साधक बन जाता । ( अ ० भा ० ) १. शक्यमन्तं – ग ०; शक्यमिह – घ ० । २. किमुत सर्वेषां - घ ० । ३. गूढ़ार्थ - ग ०१
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षष्ठोऽध्यायः २१५ बतलाता हूँ जो अल्प परिमाण वाला, सूत्र भूत अर्थों वाला तथा अनुमान से सिद्ध होने वाला है ॥ ८ ॥
संग्रह आदि के लक्षण-विस्तरेणोपदिष्टानामर्थानां सूत्रभाष्ययोः ।
निबन्धो यः समासेन संग्रह तं विदुर्बुधाः ॥ ९ ॥
सूत्र ' तथा भाष्य के विस्तारपूर्वक निरूपित अर्थों का जो संक्षिप्त निबन्धन ( ग्रथन ) है, विद्वानों के मत में वही ' संग्रह ' कहलाता है ॥ ९ ॥
रसा भावा ह्यभिनयाः धर्मिवृत्तिप्रवृत्तयः ' ।
सिद्धिः स्वरास्तथातोद्यं गानं रङ्गश्च संग्रहः ॥ १० ॥
रस, भाव, अभिनय, धर्मी ( नाट्य तथा लोक ), वृत्ति, प्रवृत्ति, सिद्धि, स्वर, आतोद्य, गान तथा रंग ये ' संग्रह ' कहलाते हैं ॥ १० ॥
[ उपचारस्तथा विप्रा मण्डपाश्चेति सर्वशः । त्रयोदशविधो ह्येष ह्यादिष्टो नाट्यसंग्रहः ॥ ११ ॥ ]
[ और हे मुनियों, यह संग्रह तेरह भेदों वाला कहा गया है । इसके शेष प्रकार हैं उपचार तथा मंडप । ] I १. कारिका में आये हुए ' सूत्र ' पद का अर्थ है लक्षण और उस लक्षण की स्पष्टीकरणरूपा परीक्षा ' भाष्य ' कहलाती है । २. ' संग्रह ' के ११ अङ्ग इस कारिका में दिये गये हैं । आचार्य अभिनव-गुप्ताचार्य ने अपनी व्याख्या में बतलाया कि भरताचार्य सम्मत अङ्ग केवल पाँच हैं [ जिनमें आङ्गिक, वाचिक तथा आहार्य ( तीन प्रकार का ) अभिनय तथा गान और वाद्य मिलकर नाट्य के पाँच अङ्ग हो जाते हैं ] एकादश अङ्ग कोहलाचार्य के मत में ( होते ) हैं [ भरत के मत में नहीं ] पर यहीं कारिका में कोहल द्वारा निद्दिष्ट क्रम को बदल दिया गया है । ३. संग्रह के ये त्रयोदश अङ्ग किसी अन्य परम्परा से लेकर यहाँ समा-विष्ट कर दिये गये प्रतीत होते हैं तथा अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों से समर्थित न होने से प्रक्षिप्त हैं । १. धर्मी वृत्तिप्रवृत्तयः क ० । २. पद्यमिदं ग पुस्तके नास्ति ।
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नाट्यशास्त्रम्
अल्पाभिधानेनार्थो यः समासेनोच्यते बुधैः ।
सूत्रतः सा तु विज्ञेया कारिकार्थप्रदर्शिनी ' ॥ १२ ॥
जब किसी अर्थ का संक्षेप में परिमित शब्दों में ( सूत्र रूप में ) कथन किया जाए तो अर्थों की संक्षेप में बोधिका उक्ति को ' कारिका " कहते हैं ॥
नानानामाश्रयोत्पन्नं निघण्टुं निगमान्वितम् ।
धात्वर्थहेतुसंयुक्तं नानासिद्धान्तसाधितम् ॥ १३ ॥
जो अनेकविध संज्ञा के आश्रय से ( अर्थात् सुबंतों से ) उत्पन्न हो ( और ) कोश तथा व्याकरण के नियम के अनुकूल हो, जिसमें मूल धातु में निहित अर्थ सहेतु विद्यमान हो तथा जो अनेक प्रकार के सिद्धान्तों १. अभिनवगुप्ताचार्य ने लक्षणरूप अर्थ, उस लक्षण के वाचकसूत्र तथा उसके संक्षिप्त अर्थ के विवरण स्वरूप श्लोक सभी को ' कारिका ' माना है । [ अर्थात् सूत्र, उसके अर्थ को प्रतिपादन करने वाले श्लोक तथा उसका प्रति-पाद्य विषय या लक्षण इन तीनों को ' कारिका ' समझना चाहिये । ] पदार्थ के स्वरूप का बोध ' कारिका ' के द्वारा होता है अर्थात् लक्षण को ही कारिका कहते हैं । उस लक्षणरूप तत्त्वार्थ को निदर्शन करने से उपचार के द्वारा श्लोक ( पद्य ) भी ' कारिका ' कहलाते इस प्रकार कारिका के भेद ( प्रकार ) होते हैं । सूत्रात्मक तथा श्लोकात्मक । कारिका के द्वारा पद्यात्मक रूप के द्वारा सूत्ररूपेण प्राप्त लक्षणरूपी अर्थ का कथन होता है जो स्वल्पशब्दों के द्वारा निरूपित होने पर लक्षणीय अर्थ का अन्य धर्मियों से विभेद कराने वाले लक्षणरूप प्रकर्ष को प्रकाशित कराने वाला धर्म है । इस प्रकार अभिप्राय यह हुआ कि उद्दिष्टार्थं का अन्य धर्मियों से विभेदक धर्म ' लक्षण ' है । यह पहिले सूत्र के द्वारा किया जाता है फिर शङ्का समाधान के द्वारा उसी सूत्र के व्याख्यानात्मक प्रकार से श्लोकरूप कारिका के द्वारा प्रतिपादित होता है । इन दोनों [ सूत्र और श्लोक ] का प्रतिपाद्य विषय लक्षण होता है । यह लक्षण श्लोक के द्वारा प्रतिपादित अर्थ होकर, ' कारिका ' कहलाता है । ( अ ० भा ० ) १. प्रयोगिनी ग ० । २. निघण्डुनिगमान्वितम् -- ख ० ।
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षष्ठोऽध्यायः २१७ ( आक्षेप तथा प्रतिसमाधानों ) से ( परीक्षापूर्वक ) साधित हो तो उसे ' निरुक्त ' समझना चाहिए ॥ १३ ॥
स्थापितोऽर्थो ' भवेद्यत्र समासेनार्थसूचकः ।
निरुक्तं तत्प्रचक्षते ॥ १४ ॥
और जब किसी संज्ञा का अर्थ धातु के अर्थ का अनुसरण करता हो, तथा ( प्रकृति प्रत्यय के संयोग द्वारा ) प्रख्यात अर्थ ( प्रतीत होने वाला या कथित अर्थ ) संक्षेप में अपने आशय को प्रकट कर दे तो उसे ( भी ) " निरुक्त " कहा जाता हैं ॥ १४ ॥
१. निरुक्त का प्रयोजन है साररूप संक्षेप के द्वारा अर्थ का निश्चय करना । समास अर्थात् संक्षेप से अनेक लक्ष्यार्थों के भेद से भिन्न लक्षणीयार्थं का सूचक जो लक्षण रूप अर्थ हो वही आक्षेप प्रतिसमाधान रूप वाला [ खण्डनमण्ड-नात्मा ] ( जिस वस्तु के होने पर स्थापित किया जाए वह परीक्षात्मक स्वरूप वाला ) ' निरुक्त ' होता है । अर्थात् आक्षेप और प्रतिसमाधान के द्वारा लक्षण की परीक्षात्मक व्याख्या करना ' निरुक्त ' है । निरुक्त के द्वारा लक्षण की स्थापना कैसे की जाती है इसका प्रतिपादन १३ वें श्लोक में है । इसमें क्रियाविशेषणों के द्वारा आक्षेप प्रतिसमाधान प्रकार बतलाते हैं - नानाप्रकार के जो नाम ( सुबन्त शब्द ) उनके आश्रय से उत्पन्न अर्थात् आक्षेप प्रतिसमाधान की जिसमें उत्पत्ति हो वह निरुक्त [ अर्थात् सुबन्त पदों की इदमित्थं द्वारा परीक्षा करना ] कहलाता है । प्रश्न - नाम ( सुबन्त ) पदों में आक्षेप और प्रतिसमाधान कैसे होता है? उत्तर- निघण्टु अर्थात् शब्दकोश के द्वारा तथा निगम ( शब्द - शास्त्र ) के द्वारा । शब्दकोश के द्वारा रूढ़ि शब्दों की और निगम के द्वारा शब्दों के यौगिक या योगरूढ़ शब्दों की प्रकृतिप्रत्यय के विभाग द्वारा विवेचना होती है लक्षण वाक्य में ( जो ) धात्वर्थ अर्थात् क्रिया और क्रिया के निमित्तभूत कारकों का संयोग या विचार जहाँ स्थापना के लिये लिया जाए वह भी निरुक्त ( होता ) है । इसमें लक्षण-वाक्य में पहिले शब्द परीक्षा के अन्र्गत आक्षेप ( प्रश्न ) किया जाता है कि यह १. साधितो क ० । २. सूचकम् ग ० ।
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२१८ नाट्यशास्त्रम्
संग्रहो यो मया प्रोक्तः समासेन द्विजोत्तमाः ।
विस्तरं तस्य वक्ष्यामि सनिरुक्तं सकारिकम् ॥ १५ ॥
हे मुनिजन, मैंने संक्षेप में जो संग्रह ( उद्द ेश ) बतलाया उसे ही अब विस्तार ( विभाग ) " लक्षण ( कारिका ) तथा परीक्षा ( निरुक द्वारा बतलाव || पूर्वक ॥
रसों की संख्या तथा संज्ञा-शृङ्गारहास्य करुणा रौद्रवीरभयानकाः ।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः ॥ १६ ॥
अर्थ इस विशेष अर्थ में कैसे प्रयुक्त हुआ । फिर इस प्रकार यह शब्द इस अर्थ में प्रयुक्त हुआ ऐसा विवेचना करते हुए उत्तर देना प्रतिसमाधान कहलाता है । निर्वचनात्मा निरुक्त चार प्रकार का होता है ( १ ) प्रतिपादिक या नाम के द्वारा | जैसे उलूखल शब्द की ' उध्वं ' ' खमस्योलूखलः [ जिसके ऊपर आकाश है वह ] व्याख्या । ( २ ) धातु के द्वारा । जैसे ' रस्यते इति रसः ’ यहाँ रस्यते क्रिया पद से निर्वचन किया गया है । ( ३ ) नाम और धातु के द्वारा जैसे – ' पिशितमश्नातीति पिशाचः [ यहाँ पिशित शब्द और अश्नाति क्रिया के द्वारा निर्वचन किया गया है ] तथा ( ४ ) सङ्केत के द्वारा । इस चतुर्थ प्रकार के तीन भेद हैं- ( १ ) लौकिक शब्द जैसे भू सत्तायम् । ( २ ) वैदिक शब्द जैसे दीधीङ् धातु दीप्ति और देवन ( पासों से क्रीड़ा करना ) अर्थ में प्रयुक्त होता है । ( दीधीङ् आदि पाँच धातु वेद में ही प्रयुक्त होते हैं अतः यह वैदिक संकेत है ) । तथा ( ३ ) पारिभाषिक शब्द – जैसे गान्धर्ववेद में गीतविशेष के अर्थ में पठित ' ओवेणक ' शब्द । [ ऐसे शब्द प्रत्येक शास्त्र के पार्षद या अङ्गरूप में परिभाषित संकेत होते हैं पाणिनि के वृद्ध घिटि जैसे आदि संकेत ] । ( अ ० भा ० ) १. विस्तार या विभाग के द्वारा ही संग्रह ( उद्देश ) बतलाया जाता है और यह विभाग उद्देश्यान्तर्गत ही ( होता ) है । उद्देश, लक्षण और परीक्षा या संग्रह, कारिका और निरुक्त रूप त्रिविध शास्त्रप्रवृत्ति का विभाग केवल विस्तार करता है । अतएव विभाग पृथक नहीं है उसका अन्तर्भाव उद्देश में ही होता है । यही आचार्य भरत तथा अभिनवगुप्ताचार्य को इष्ट है । ( अ ० भा ० )
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षष्ठोऽध्यायः २१ ९ नाट्य ' में स्वीकृत रस आठ हैं - ( १ ) शृङ्गार, ( २ ) हास्य, ( ३ ) करुण, ( ४ ) रौद्र, ( ५ ) वीर, ( ६ ) भयानक, ( ७ ) बीभत्स तथा ( ८ ) अद्भुत ॥ १६ ॥
१. नट के द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले अभिनय के प्रभाव से प्रत्यक्षवत् प्रतीयमान, एकाग्रमन की निश्चलता के कारण अनुभव किया जाने वाला और नाटक ( या काव्य ) विशेष से प्रकाशित होने वाला अर्थ ' नाटच ' कहलाता है । यह नाटच आलम्बन तथा उद्दीपन विभावों के असंख्य होने के कारण अनन्त विभावादि रूप है, किन्तु समस्त विभागों के ज्ञान में पर्यवसित होने तथा उस ज्ञान का उपभोक्ता में पर्यवसान होने से और भोक्ताओं के भोक्ता ( नायक ) में पर्यसान होने से नायक की ( रत्यादि रूप ) स्थायीभावात्मक चित्तवृत्ति भी ' नाट्य ' है । अर्थात् ' रस ' ही ' नाट्य ' है एवं एवं नाट्य की सामग्र्येण उपलब्धि रस में ही होती है । नाटक के अन्तर्गत प्रयुक्त प्रधानचित्तवृत्तिरूप नायक की एक चित्तवृत्ति मेरे हैं या दूसरे के हैं इस प्रकार के भाव से रहित होकर लौकिक गीतों के गेयपदादि लास्य के दस अंग से युक्त और स्वीकृतलक्षणसम्पन्न गुण, अलंकार, गीत - वाद्य आदि के संयोग द्वारा अतिशय मनोहारित्व को प्राप्त होकर काव्य की महिमा एवं नट के द्वारा अनुष्ठित प्रयोग परम्परा एवं अभ्यास विशेष कें प्रभाव से साधारणीकरण की भूमि प्राप्तकर नायक की अपनी चित्तवृत्ति सामाजिकों को भी अपनी सीमा में समाविष्ट करा देती है और नायक तथा सामाजिक की चित्तवृत्ति के तादात्म्य [ अभेद ] होने के कारण ही अनुमान, आगम रूप परीक्षात्मक एवं इन्द्रिय - सन्निकर्ष के बिना ही उत्पन्न होने वाले योगिप्रत्यक्ष से उत्पन्न रसादि का अनुभव न करने वाले [ तटस्थ ] प्रमाता एवं प्रमेय से विलक्षण एवं लौकिक चित्तवृत्ति से भिन्न रूप में प्रतीत होने वाली नायक के अपने परिमित स्वरूप के आश्रय से प्रतीत न होने के कारण लौकिक अङ्गना आदि से उत्पन्न अपनी रति और शोक के समान अन्य चित्तवृत्ति को उत्पन्न करने में अक्षम होने से निर्बाध अनुभूति के विश्रान्ति स्वरूप आस्वादन नामक व्यापार के द्वारा गृहीत होने से ' रस ' शब्द से अभिहित होती है । अतएव जिस नाट्यरस की अभिव्यक्ति होती है, वह मुख्यभूत महारस है यह ( १ ) स्फोट के समान असत्यभूत अथवा ( २ ) अन्विताभिधान के समान उपायात्मक सत्यरूप या ( ३ ) अभिहितान्वय के समान — प्रधानरस
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२२० नाट्यशास्त्रम्
तेह्यष्टौ रसाः प्रोक्ता दुद्दिणेन महात्मना ।
पुनश्च भावान्वक्ष्यामि स्थायिसञ्चारिसत्वजान् ॥ १७ ॥
समुदायरूप है । यहाँ इस प्रकार के अन्य रस प्रधानरस के अंश रूप में अवस्थित से दिखाई देते और वर्णन किये जाते हैं । ( अर्थात् स्फोट सिद्धान्त के अनुसार वर्ण, पद और वाक्य अखण्ड हैं और वाक्य में पदों की और पदों में वर्णों की स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती । अखण्ड पदों को ' पदस्फोट ' तथा अखण्ड वाक्य को ' वाक्यस्फोट ' कहा जाता है तथा यह स्फोट ही अर्धबोधक होता है । इसका आशय यही कि नाट्य में रस की प्रतीति अखण्डाभिव्यक्तिरूप में ही होती है वाक्य तथा पद के समान उसमें अवयवों की प्रतीति असत्य कल्पना होगी । इस प्रकार अन्विताभिधानवाद का अभिप्राय यह है कि वाक्यार्थ बोध में ( पदों का अभिहित होने के बाद अन्वय नहीं होता किन्तु ) पदों के द्वारा अन्वित अर्थ ही अभिहित होता है । अतः अन्वित पदार्थ की ही प्रतीति होने से पदार्थ ही सत्य है उनकी अलग २ स्थिति उपायमात्र है । निष्कर्ष यह कि नाट्य रस के साथ अन्य रसों की स्थिति उपायभूत सत्य के समान है । अभिहितान्वयवाद में पदार्थों का बोध पहिले होकर उनके समुदाय रूप से वाक्यार्थ का बोध होता है । इसी तरह नाट्य रस के अन्तर्गत अन्य सब रसों की स्थिति पदार्थों के समान अङ्गभूत ( गौण होती ) है और ये प्रधानरस का बोध समुदाय रूप में करवाते हैं ) । ( अ ० भा ० ) अभिनवगुप्त के मत में रस नी हैं । अतएव ' बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव ' ऐसा पाठ है । परन्तु नाटक में जो शान्तरस को नहीं मानते उनके मत में ' अष्टौ रसः ' पाठ माना गया है । भरत ने आठ रसों को नाट्य में मान्यता दी थी । नाट्यशास्त्र के इस भरतोक्त क्रम का अभिनवगुप्ताचार्य ने बड़े ही सुन्दर रूप में उपपादन किया है । यथा - भरत द्वारा शृङ्गार रस को प्रथम स्थान देने का कारण है उसका जाति सकल सामान्य होना । उसके प्रति सभी का आकर्षण रहना और उसका अत्यन्त परिचित होना । इसी कारण प्रायः सभी आचार्यों ने उसकी प्रधानता मानी है । शृङ्गार का अनुसर्ता होने से ' हास्य ' द्वितीय स्थान पर है । शृङ्गार - निरपेक्ष तथा हास्य के प्रतिकूल होने से ' करुण '
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षष्ठोऽध्यायः २२१ ये आठ रस महामना ब्रह्मा के द्वारा कहे गए हैं । अब मैं आपको ' स्थायी ' संचारी तथा सात्विक भावों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
स्थायी भाव-रतिर्दासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा ।
जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिता ॥ १८ ॥
ये ( आठ ) स्थायी भाव हैं — रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा तथा विस्मय ' ॥ १८ ॥
का तीसरा स्थान है । करुण से उत्पन्न ( अर्थात् मूल में करुण होने ) से रौद्र का चतुर्थ स्थान है । ( क्योंकि यह अर्थ प्रधान है ) पांचवां है बीभत्स । यह धर्म प्रधान है और धर्म अर्थ का मूल है । वीरों का कार्य भयार्तजन को अभय प्रदान करना होता है अतएव छठाँ भयानक रस है । भय के विभावों से निर्मित बीभत्स का सातवां स्थान है । तथा आठवां अद्भुत है क्योंकि वीरता के परिणाम - भूत विस्मय ( कार्य ) से ' अद्भुत ' प्रतीत होता ही है । इस प्रकार आठ रस त्रिवर्गात्मक हैं तथा प्रवृत्ति धर्म से सम्बद्ध हैं इसी कारण ये ' नाट्य ' में उपयोगी रस हैं क्योंकि नाट्य स्वयं त्रिवर्गसाधक ( आचार्यगण मानते ) हैं । निवृत्ति धर्म से सम्बद्ध नवीं रस शान्त है जो उभय धर्मोपयोगी तथा मोक्षफलक होता है और इसी कारण इसका तत्त्वज्ञान से उत्पन्न ' निर्वेद ' स्थायी माना जाता है । ( अ ० भा ० ) १. रस का अनुभव विभावादि के द्वारा होने के कारण रस के बाद स्थायी, संचारी तथा सात्विक भावों का वर्णन [ उद्देश्य रूप में कथन ] यहाँ अवसर प्राप्त है । इनमें भी लौकिक रत्यादि रूप चित्तवृत्ति के परिचय के बिना कवि या अभिनेता रस के साथ सम्बद्ध विभावादि को उपस्थित करने में असमर्थ होते हैं अतएव भावों के वर्णन में सर्वप्रथम स्थायी भाव का निर्देश किया गया । ( अ ० भा ० ) २. ( शान्त रस मानने पर ) स्थायीभावों के पाठ को ' जुगुप्सा विस्मय-शमाः ' मान कर इस शान्तरस का ' शम ' स्थायीभाव कुछ विद्वान् मानते हैं । अन्य विद्वान् शान्तरस का स्थायीभाव ' उत्साह ' या ' जुगुप्सा ' मानते हैं तथा कुछ विद्वान् सभी स्थायीभाव शान्त के स्थायी हो सकते हैं अतः उसके विशेष स्थायीभाव का पृथक् उल्लेख आवश्यक नहीं मानते । ( परन्तु वास्तव