भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 351–360

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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२२२ नाट्यशास्त्रम् संचारी भाव- #IDE IFFIER STER fo fem is us the निर्वेदग्लानिशङ्काख्यास्तथास्यामदश्रमाः I आलस्यञ्चैव दैभ्यश्च चिन्ता मोहः स्मृतिर्धृतिः ॥ १ ९ ॥ व्रीडा चपलता हर्ष आवेगो जडता तथा गर्यो विषाद औत्सुक्यं निद्रापस्मार एव च ॥ २० ॥

' विबोधोऽमर्षश्चाप्यवद्दित्थमथोता ।

मतिर्व्याधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च ॥ २१ ॥

त्रासश्चैव वितर्कश्च विज्ञेया व्यभिचारिणः ।

त्रयस्त्रिंशदमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः ॥ २२ ॥

तैंतीस ' संचारी भाव ( इस प्रकार ) हैं । ( १ ) निर्वेद, ( २ ) ग्लानि, ( ३ ) शंका, ( ४ ) असूया, ( ५ ) मद, ( ६ ) श्रम, ( ७ ) आलस्य, ( ८ ) दैन्य, ( ९ ) चिन्ता, ( १० ) मोह, ( ११ ) स्मृति, ( १२ ) धृति, ( १३ ) व्रीडा, ( १४ ) चपलता, ( १५ ) हर्ष, ( १६ ) आवेग, ( २७ ) जडता, ( २८ ) गर्व, ( १ ९ ) विषाद, ( २० ) औत्सुक्य, ( २१ ) निद्रा, ( २२ ) अपस्मार, ( २३ ) सुप्त, ( २४ ) प्रबोध, ( २५ ) आमर्ष, ( २६ ) में ) तत्वज्ञान से उत्पन्न ' निर्वेद ' [ वैराग्य ] इसका स्थायी भाव है । निवेद में स्थायी भाव तथा संचारी भाव के ( दोनों के ) धर्म रहते हैं । इसी बात को संकेतित करने के लिये व्यभिचारी भावों की गणना में इसे प्रथम स्थान दिया है, जबकि यह अमंगल स्वरूप है और इसीलिये भरत ने स्थायी भावों की संख्या की गणना में संख्या का निर्देश नहीं किया । ये स्थायी भाव भिन्न रसों की व्यभिचारित्व को प्राप्त कर लेते हैं । [ अर्थात् स्थायी भाव भी अन्य रसों में संचारी भाव वन जाते हैं ] [ अ ० भा ० ] १. संचारी भाव ३३ ही होते हैं और ये ही व्यभिचारिभाव हैं । इसी नियम को निर्देशित करने के लिये मूलकारिका में ' त्रयस्त्रिंशत् ' तथा ' अमी ' पद दिये गये हैं । नाट्य में इन्हीं भावों का प्रयोग इष्ट है । १. प्रबोधोग ० ।

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२२३ अवहित्था, ( २७ ) उग्रता, ( २८ ) मति, ( २ ९ ) व्याधि, ( २० ) उन्माद, ( ३१ ) मरण, ( ३२ ) त्रास तथा ( सात्विक भाव-स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः वैवर्ण्यमश्रु प्रलयः इत्यष्टौ स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, आठ सात्विक ' भाव हैं ॥ २३ ॥

नाट्याश्रित अभिनय प्रकार-२३ ) वितर्क ।

स्वरभङ्गो'ऽथ वेपथुः ।

सात्त्विकाः स्मृताः ॥ २३ ॥

15 वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु तथा प्रलय नामक I

आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्विकस्था ।

चत्वारोऽभिनया ह्येते विज्ञेया ' नाट्यसंश्रयाः ॥ २४ ॥

नाट्यात अभिनय के चार प्रकार हैं । ( १ ) आंगिक ', ( २ ) वाचिक, ( ३ ) आहार्य तथा ( ४ ) सात्विक ॥ २४ ॥

४१ सात्विक भावों के द्वारा संचारी या व्यभिचारी भावों की अभिव्यक्ति में या अभिनय द्वारा उनके प्रस्तुतीकरण में सहायता प्राप्त होती है । इसी कारण संचारी भावों के उल्लेख के बाद ही सात्विक भावों का उद्देशरूप में कथन किया गया । अभिनवगुप्ताचार्य के अनुसार सात्विक भाव में व्यभिचारी भावों के तथा अभिनय के धर्म होते हैं इसलिये इनका अभिनय कला से सीधा सम्बन्ध होता है परन्तु ये अभिनय ( आदि के ( ही ) भेद नहीं होने ) से भिन्न होते हैं । २. आङ्गिक अभिनय का कार्य शरीर के द्वारा नाट्यशास्त्र में अभिहित लक्षणों से कार्य सम्पादन करना है । वाचिक का कार्य है विभिन्न रसभावपूर्ण नाट्य रचना या शब्दादली का उच्चारण करना या बोलना ( संवादों का पाठन ) । आहार्य का कार्य है नेपथ्य रचना ( साजसज्जा ) करना तथा सात्विक का कार्य है चेहरे पर प्रकट होने वाले आन्तरिक भावों के सभिव्यंजक स्वेद आदि का प्रस्तुतीकरण । अभिनवगुप्त का मत है इन चार अभिनयों में वेष-भूषा रूप आहार्य अभिनय की साक्षात्कार बुद्धि के उपयोग में अन्तरंगता १. स्वरसादोऽग ०, घ ० । २. येषु नाट्यं प्रतिष्ठितम् - क ०; विज्ञेया नाट्यकर्मणि — ख ० ।

पृष्ठ 353

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२२४ नाट्यशास्त्रम् धर्मी-लोकधर्मी नाट्यधर्मी धर्मीति द्विविधः स्मृतः ।

दो धर्मी होते हैं - लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी ' ।

चार वृत्तियाँ-भारती सावती चैव कैशिक्यारभटी तथा ॥ २५ ॥

चतस्रो वृत्तयो होता यासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् । तथा ( १ ) भारती, ( २ ) साखती, ( ३ ) कैशिकी और ( ४ ) आरभटी नामक चार वृत्तियाँ हैं जिन पर नाट्य - प्रयोग निर्भर है । सूचित होती है अतः यह उपयोगिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण ( माना जाता ) है । कारिका में आये हुए ' नाट्यसंश्रया ' पद का अभिप्राय यह है कि लोक में सहज परिचित होने के कारण इसका चाहे उपयोग न भी हो किन्तु नाट्य-प्रयोग में यह ( आहार्य अभिनय ) प्राणस्वरूप होता है । ( आङ्गिक अभिनय का विस्तृत विवरण ना ० शा ० अध्याय ८ से १२, वाचिक का विवरण ना ० शा ० अ ० १५-१७, आहार्य अभिनय का विवरण ना ० शा ० अध्याय २३, २४ तथा सात्वि अभिनय का विवरण ना ० शा ० अ ० २३, २४ में है ) । १. धर्मी का अर्थ है स्वभाव या परम्परानुकूल कार्य । जब अभिनय लौकिक उपयोगी तथा प्रतिष्ठित सामयिक परम्पराओं [ धर्मों ] का अनुगमन करता है तो इस आधार पर उसे लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी कहा जाता है । अभिनय के अनुगामी होने से धर्मियों का उल्लेख अभिनय कथन के बाद किया गया । संक्षेप में लोक के सहज जीवन का अनुकरण करने वाला अभिनय किया जाए तो उसे लोकधर्मी तथा शास्त्रीय पद्धति से जब स्त्रीपात्र पुरुष का या पुरुषपात्र स्त्रीपात्र का रूपधारण कर अभिनय करे तो उसे नाट्यधर्मी कहते हैं । लोकधर्मी और नाट्यधर्मी का लक्षण ना ० शा ० अध्या ० १।४ में ( ७०-७४ ) द्रष्टव्य । २. वृत्तियों का सम्बन्ध अभिनय की पद्धति से रहता है अभिनय अभि-नेतव्य के बिना सम्भव नहीं है 1 । रूपकों के दस प्रकारों को विविध शैलियों में प्रस्तुत करने के कारण वृत्तियों का रूपकों से सम्बन्ध होने से ये वृत्तियाँ रूपकों की उपकारक हैं । ( अ ० भा ० ) १. धर्मी तु द्विविधा स्मृता- ।

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षष्ठोऽध्यायः २२५ प्रवृत्तियाँ- VIER PISUS आवन्ती दाक्षिणात्या च तथा चैवोदमागधी ॥ २६ पाञ्चाली ' मध्यमा चेति विज्ञेयास्तु प्रवृत्तयः । ( १ ) आवन्ती, ( २ ) दक्षिणात्या तथा ( ५ ) मध्यमा को प्रवृत्तियाँ ' जानों सिद्धियाँ-दैविकी ' मानुषी चैव सिद्धिः नाट्य प्रयोग में प्राप्त होने वाली ( १ ) दैवी तथा ( २ ) मानुषी ॥ २७ , ( ३ ) औदमागधी, । ( ६ स्याद् द्विविधैव तु ॥ सिद्धियाँ दो प्रकार ॥ ॥ ( ४ ) पांचाली ) २७ ॥ की होती हैं । स्वर-शारीराश्चैव वैणाश्च सप्त षड्जादयः स्वराः । [ निषादर्षभगान्धार मध्यपञ्चमधैवताः ॥ ] षड्जादि सात स्वरों के शारीर तथा वैणव भेद से दो प्रकार ( वर्ग ) होते हैं । ( सात स्वरों के नाम हैं: - निषाद, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत तथा षड्ज ) १. प्रवृत्तियाँ — देश के आधार पर होने से इनका उल्लेख वृत्तियों के पश्चात् किया गया । इन प्रवृत्तियों का सम्बन्ध विविध प्रदेशों से रहता है । २. अभिनय की परिसमाप्ति सिद्धि में होने से प्रवृत्तियों के बाद सिद्धियाँ कही गयीं । ( सिद्धियों का वर्णन ना ० शा ० अध्याय २७ पर द्रष्टव्य । ) ३. पाठ्य या वाचिक अभिनय में स्वर का विवरण दिया गया है तथा इसी के गीत आदि प्रकार हैं अतः स्वर का पाठ्य तथा गान में अन्तर्भाव हो सकता है परन्तु स्वरों का स्वतन्त्र ग्रहण करने का अभिप्राय है कि केवल स्वरों के प्रयोग से भी नाट्यप्रयोग में सौन्दर्य परिलक्षित हो जाता है जो अन्तरालाप के नाम से प्रसिद्ध है । अतएव अन्तरालाप के ग्रहणार्थं यहाँ स्वरों का उद्देश्य कथन में पृथक् ग्रहण किया गया । ( अ ० भा ० ) १. पाञ्चाल मध्यमा चैव ज्ञेया नाट्यप्रवृत्तयः - ग ०, घ ० । २. देवीति - क ० । ३. एतत्पद्यार्धं ग —– पुस्तके नास्ति । १५ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 355

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२२६ नाट्यशास्त्रम् आतोद्य प्रकार-ततं चैवावनद्धं च धनं सुषिरमेव च ॥ २८ ॥

STRIP चतुर्विधं च विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम् । आतो ( वाद्यवृन्द · ) ) के चार प्रकार होते हैं — यथा ( १ ) ततळे, ( २ ) अवनद्ध, ( ३ ) घन तथा ( ४ ) सुषिर ॥ २८-२९ ॥ ततं तन्त्रीगतं ज्ञेयमवनद्धन्तु पौष्करम् ॥ २ ९ ॥ ' धनस्तु तालो विशेयः सुषिरो वंश एव च । १. आतोद्य - ' आद्यते इति आतोद्यम् ' इस व्युपत्ति के अनुसार वाद्यों को आतोद्य कहा जाता है; क्योंकि ये हाथ आदि से ताडित होते हैं । वाद्य - यन्त्रों के केवल चार ही प्रकार नहीं होते, वे अनन्त हो सकते हैं, परन्तु लक्षणों से युक्त वाद्यों के चार प्रकार या कोटियाँ ही होगीं । लोकवाघों के प्रकार अनन्त होने से उन्ही से शास्त्रीय वाद्यों की चार कोटियों का यहाँ विभेद दिखलाया गया है अतएव मल्लक, पट फलक, ज्वालामुख तथा पक्षवाद्य ( खंजरी ) जैसे • अभिनय के समय प्रचलित लोकवाद्यों का शास्त्रीय वाद्यों में अन्तर्भाव नहीं हो सकता है । ( अ ० भा ० ) । स्वर तथा आतोद्यविधान का विवरण ना ० शा ० अध्याय २८ पर भी द्रष्टव्य । २. वीणा आदि में तन्तुवाद्यों के माध्यम से स्वर निकाला जाने से वे तत वाद्य कहलाते हैं । चर्मावेष्टित वाद्य ' अवनद्ध ' कहलाते हैं । इन्हें मेघ के अनु-करण पर बजाये जाने के कारण ' पौष्कर ' भी कहा जाता है । पुष्करावर्तक मेघ के देवता हैं । उनके द्वारा अधिष्ठित होनेवाला, कमल पत्र के आकार बाला चमड़े से मढ़ा हुआ ( मृदंग आदि ) वाद्य ' पौष्कर ' कहलाता है । काल की समता के लिए तालानुसारी पीटा जाने वाला वाद्य ' धन ' कहलाता है, यह ताल की समता की दृष्टि से बजाया जाता है । कांसे से निर्मित घण्टा, घडि-याल, झाँझ आदि वाद्य ताल देने में अनुपम प्रमाण वाले माने जाते हैं और ये स्वर एवं वर्णों के उत्पादक होते हैं, अतः इन्हें ' ताल ' कहा गया है । छिद्र युक्त वाद्य ' सुषिर ' कहलाते हैं । काहल आदि वाद्य सुषिर वाद्य नहीं हैं यह बतलाने के लिये कारिका में ' वंश एव च ' कहा गया है:

पृष्ठ 356

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षष्ठोऽध्यायः २२७ तत उस वाद्य को कहते हैं जिस में तार हौं, पीटा जाने वाला तथा चारों ओर मढ़ा हुआ पुष्कर वाद्य ' अवनद्ध ' कहलाता है, तालोपयोगी मजीरा आदि ठोंककर बजने वाले वाद्य ' घन ' तथा बासुरी आदि फूँक

कर बजने वाले वाद्य ' सुषिर ' कहलाते हैं ।

ध्रुवागान के पाँच प्रकार-प्रवेशाक्षेपनिष्कामप्रासादिकमथान्तरम् ' ॥ ३० ॥

गानं पञ्चविधं ज्ञेयं ध्रुवायोगसमन्वितम् । ' ध्रुवा ' के संयोग से होने वाला गायन पाँच प्रकार का होता है - यथा-( १ ) प्रवेश ( २ ) आक्षेप ( ३ ) निष्क्राम ( ४ ) प्रसादिक तथा ( ५ ) आन्तर । चतुरस्रो विकृष्टश्च रङ्गरूयस्रश्च कीर्तितः ॥ ३१ ॥

ause प्रेक्षागृह के तीन प्रकार हैं- ( १ ) चतुरस्र ( २ ) विकृष्ट तथा ( ३ ) त्र्यत्र । १. गान के पाँच प्रकारों में जो पात्रों के मश्व पर प्रवेश करते समय उनके भाव, प्रकृति तथा अवस्था आदि का सूचक गान गाया जाए वह ' प्रवेशक ' गान कहलाता है । प्रविष्ट हुए पात्र की आन्तरिक चित्तवृत्ति को सामाजिकों के प्रति प्रकट करने लिये जो गीत गाया जाता है वह ' प्रासादिक ' गान कहलाता है । प्रकृत रस से भिन्न रस का आक्षेप करवाने वाला ' आक्षेप गान ' कहलाता है और पात्र के रङ्गमञ्च से निष्क्रमण करते समय गाया जाने वाला ' निष्क्राम गान ' कहलाता है । ध्रुवा कहते हैं गीत के आधारभूत निर्धारित पदसमूह को [ ' ध्रुवा गीत्याधारो नियतः पदसमूहः ' अभि ० ] । ध्रुवा में योग अर्थात् सम्बन्ध होने के कारण ( लोक ) साधारण गानरूप गान्धर्व संगीत से इस गान का प्रधानतायुक्त या विशेषगान होने के कारण ( ही ) यहाँ स्वतः विभेद ( हो जाता ) है । २. पात्रों की गतियों ( आना, जाना आदि क्रियाओं ) में, अभिनयों में - तथा गायन और वादन में प्रेक्षागृह की उपयोगिता होती है और मण्डप अपने श्रेणी विभाग रंगशीर्ष, रंगपीठ, नेपथ्यगृह आदि रूपों ) के द्वारा पात्रों के अभिनय आदि कार्यों का उपकारक होता है । अभिनवगुप्त कहते हैं कि रंग १. प्रासारिकमथा परम् — ग ० ।

पृष्ठ 357

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२२८ नाट्यशास्त्रम्

एवमेषोऽल्पसूत्रार्थी निर्दिष्टो ' नाट्यसंग्रहः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि सूत्रग्रन्थविकल्पनम् ॥ ३२ ॥

इस प्रकार मैंने आपको संक्षेप में ( सूत्र रूप में ) समस्त ' नाट्य ' विषयक संग्रह बतलाया ( जो कि संक्षिप्त या सूत्रात्मक प्रकार से है ) अब मैं सूत्र ' ( लक्षण ) तथा ग्रन्थ ( भाष्य ) द्वारा विषयों का विवरण प्रारम्भ करता हूँ । रस - निरूपण-तत्र रसानेव तावदादावभिव्याख्यामः । न हिरसाते कश्चिदर्थः प्रवर्तते । तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः । सर्वप्रथम हम रसों की ही ( विशेष ) व्याख्या करेंगे । क्योंकि रस के बिना ( अन्य नाट्यांग रूप ) अर्थ की प्रवृति नहीं होती । ( इसलिए प्रथम उसे ही बतलाते हैं ) विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के संयोग से रस निष्पन्न होता है । के अन्तर्गत श्रेणीविभाग ( अर्थात् रंगशीर्ष, नेपथ्य आदि के ) आ जाने से यहाँ कक्ष्याविभाग का पृथक् कथन नहीं किया गया । ( तथा कक्ष्याविभाग का विषय ना ० शा ० अध्याय १३ में विस्तार से दिये जाने से भी यहाँ कथन नहीं किया गया है । ) १. संग्रह में नाट्याङ्गों का सूत्ररूप ( संक्षेप ) में ( उद्देश्य तथा विभाग दो रूपों में ) कथन करने के बाद और कारिका के द्वारा सूत्ररूप में कथन हो चुकने पर अब यहाँ ' सूत्र ' रूप में अभिहित नाट्यांगों की लक्षण तथा भाष्य रूप में व्याख्या की जाएगी । ' ग्रन्थ ' भाष्य है उनके द्वारा होने वाला विकल्पन ' निरुक्त ' है । इससे आक्षेप - समाधानरूपा ' परीक्षा ' की प्रतीज्ञा की गयी है । २. मूल के ' तावत् ' पद क्रम का सूचक है तथा ' अभिव्याख्यास्यामः ' का अर्थ है विभज्य ( अलग अलग करके ) व्याख्यान करना । ३. रस को प्रथम स्थान देने के लिये मूल में ' नहि ' पद दिया गया है । क्योंकि रस के बिना विभावादि अर्थ व्याख्येय रूप से बुद्धि में नहीं आ ( सक ) ते हैं और रस से बिना आनन्दपूर्वक कृत्यों में प्रवृत्ति तथा अकृत्यों से निवृत्ति १. व्यादिष्टो - ग ० । २. कश्चिदप्यर्थः - ग ० ।

पृष्ठ 358

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षष्ठोऽध्यायः अभिनवभारती'-एवं क्रम हेतुमभिधाय रसविषयं नुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः । " यस्तावदेवं व्याचख्युः-: - विभावादिभिः रसनिष्पत्तिः । तत्र विभावश्चित्तवृत्तेः कारणम् । अनुभावाश्च न रसजन्या कारणत्वेन गणनानर्हत्वात्, अपि तु २२ ९ ० लक्षणसूत्रमाह- " विभावा अत्र भट्टलोल्लटप्रभृत-संयोगोऽर्थात् स्थायिनस्ततो स्याय्यात्मिकाया उत्पत्तौ अत्र विवक्षिताः, तेषां रस भावानामेव । येऽनुभावा रूप उपदेश या ज्ञान रूप प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती तथा ( इस ) रस के ( ही ) प्रति आदर बुद्धि रखने वाले और केवल रसनात्मक प्रतीति में आनन्द का अनुभव करने वाले सामाजिक रस से भिन्न भाव आदि का स्पष्टतः ग्रहण नहीं करते हैं । और क्योंकि स्थायीभाव के रूप में समस्त अचेतन वर्ग की विभावादि रूप अन्य प्रतीतियों ( चित्तवृत्तियों ) से उपकृत प्रधान चित्तवृत्ति के अन्तर्गत रूप से ही अचेतन विभावादि वर्ग की प्रतीति होती है तथा व्या-ख्यात, नट एवं सामाजिक की दृष्टि से ( भी ) रस की प्रधानता स्वीकृत है अत-एव इन सभी कारणों से यहाँ रस का अभिघात सर्वप्रथम किया गया है । यहाँ रस के एकवचन में प्रयोग करने का आशय यह है कि समस्त नाटक में सूत्ररूप से स्थित रहने वाला प्रधान रस एक ही होता है और उसी के अन्तर्गत अवान्तर रस रूप विभाग होते हैं । ये विभाग उस प्रधानरस के आश्रित या मुखापेक्षी होते हैं । रसनिष्पत्ति: -१. नाट्यशास्त्र ( के मूल ) में ' निष्पत्ति ' तथा ' संयोग ' शब्दों का स्पष्ट व्याख्यान या लक्षण नहीं दिया गया और न ही रस - लक्षण में स्थायी भाव का समावेश किया गया । इसी कारण ' नाट्य शास्त्र ' की परवर्ती व्याख्याओं को विभिन्न मत प्रस्तुत करने का अवसर मिल गया तथा इसी कारण भट-लोल्लट, श्रीशंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्ताचार्य ने नाट्य शास्त्र पर अपनी मान्यताओं का निर्वचन प्रस्तुत किया । ' रसनिष्पत्ति ' पर इन्हीं विभिन्न आचार्यों की मान्यताओं का आपेक्षित वर्णन देने की दृष्टि से हम यहाँ अभिनव भारती के मूल अंश और उसके अविकल अनुवाद को भी दे रहे हैं । ( सम्पा ० )

पृष्ठ 359

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२३०४ नाट्यशास्त्रम् व्यभिचारिणश्च चित्तवृत्त्यात्मकत्वात् यद्यपि न सहभाविनः स्थायिना, तथापि वासनात्मते तस्य विवक्षिता । दृष्टान्तेऽपि व्यञ्जनादिमध्ये कस्यचिद्वासनात्मकता स्थायिवदन्यस्योद्भूतता व्यभिचारिवत् । तेन स्थाय्येव विभावानुभावादिभिरुपचितो रसः । स्थायी [ भव ] त्वनुपचितः । स चोभयोरपि मुख्यया वृत्त्या रामादावनुकार्येऽनु-कर्तरि च नटे रामादिरूपतानुसन्धानबलाद् इति । इस प्रकार उद्देश्य में क्रम ( रखने ) के कारण को बतला कर अब रस विषयक लक्षण का सूत्ररूप में अभिधान कहते हैं ' तत्र ' इत्यादि से । ' उनमें विभाव अनुभाव तथा संचारी ( व्यभिचारि ) भावों के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है । ' उत्पत्तिवाद-भट्टलोल्लट आदि ने इस सूत्र की व्याख्या इस प्रकार की है- है-विभावादि के साथ जो स्थायीभाव का संयोग होता है उसी से रसनिष्पत्ति ( अर्थात् उत्पत्ति ) होती है । उनमें स्थायीभाव रूप चित्तवृत्ति की उत्पत्ति में विभाव कारण होते हैं । अनुभाव शब्द से यहाँ रसजन्य कटाक्षादि स्वरूप अनुभाव नहीं लिये गये हैं क्योंकि उनकी गणना रस के कारणों में नहीं की जाती है किन्तु भावों की ही की जाती है । और जो अनुभाव और व्यभिचारिभाव चित्तवृत्ति स्वरूप होने के कारण यद्यपि ( एक ही क्षण में ) स्थायीभाव के साथ नहीं रह सकते किन्तु यहाँ रत्यादि स्थायीभाव के साथ वासना ( संस्कार ) रूप में निर्वेदादि व्यभिचारी भाव रह सकते हैं, यह स्पष्ट है । रस के उत्पादन हेतु भरत द्वारा दिये गये दृष्टान्त में भी व्यंजन आदि के बीच में किसी की स्थायीभाव के समान वासनात्मक ( अनुद्भूत ) और कुछ की व्यभिचारिभाव के समान उद्भूत रूप में स्थिति होती है । इसीलिये विभाव, अनुभाव आदि से परिपुष्ट किया हुआ स्थायीभाव ही रस है । केवल स्थायीभाव परिपुष्ट नहीं होता और वह दोनों [ अनुकर्ता और अनुकार्य ) में रहता है । मुख्यरूप से वह अनुकार्य

पृष्ठ 360

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२३१ रामादि में तथा रामादिरूपता की प्रतीति करवाने के कारण गौ रूप में अनुकर्ता [ नट ] में भी अनुसन्धान के बल से अवस्थित रहता है । चिरन्तनानां चायमेव पक्षः । तथा हि दण्डिना स्वालङ्कार-लक्षणेऽभ्यधायि । रतिः शृङ्गारतां गता रूपबाहुल्ययोगेने ' ति ( काव्यादर्शे २-१८१ ) । ' अधिरुह्य परां कोटिं कोपो रौद्रात्मतां गतः ' ( का ० दर्श ० २-२८३ ) इत्यादि च । एतन्नेति श्रीशङ्कुकः । विभावाद्ययोगे स्थायिनो लिङ्गाभावेनाव-गत्यनुपपत्तेर्भावानां पूर्वमभिधेयताप्रसङ्गात्, स्थितदशायां लक्षणा-म्तरवैयर्थ्यात्, < मन्दतरतममाध्यस्थ्याद्यानन्त्यापत्तेः हास्यरसे षोढात्त्वाभावप्राप्तेः, कामावस्थासु दशस्व सङ्ख्य रसभावादिप्रसङ्गात्, शोकस्य प्रथमं तीवत्वं कालात्तु मान्द्यदर्शनं क्रोधोत्साह रतीनाम-मर्षस्थैर्य सेवाविपर्यये ह्रासदर्शनमिति विपर्ययस्य दृश्यमानत्वाच्च । तस्माद्भेतुभिर्विभावाख्यैः कार्यैश्चानुभावात्मभिः सहचारिरूपैश्च व्यभिचारिभिः प्रयत्नार्जिततया कृत्रिमैरपि तथानभिमन्यमानैरनुकर्तृ-स्थत्वेन लिङ्गबलतः प्रतीयमानः स्थायिभावो मुख्यरामादिगतस्थाय्य-नुकरणरूपः, अनुकरणरूपत्वादेव च नामान्तरेण व्यपदिष्टो रसः । दण्डी आदि प्राचीन आचार्यों का भी यही मत है । इसीलिये दण्डी ने अपने काव्यादर्श नामक अलङ्कार - ग्रन्थ में कहा है कि ' रूपबाहुल्य ( उपचय ) के कारण ' रति ' ( स्थायीभाव ) शृङ्गार रस को प्राप्त कर जाती है ' तथा ' अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होने पर क्रोध [ स्थायी भाव ] रौद्ररसरूपता को प्राप्त करता है । ' इत्यादि भी । अनुमितिवादः— यह सिद्धान्त [ अर्थात् उपचित रत्यादि स्थायीभाव को रस मान लेना ] ठीक नहीं है । श्रीशङ्कुक का कहना है कि विभावादि के योग के