भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 361–370

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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२३२ नाट्यशास्त्रम् बिना [ या उसके अभाव में ] स्थायीभाव के अनुमापक हेतु के न होने के कारण स्थायीभाव की प्रतीति नहीं हो सकती और यदि शब्द से स्थायी-भाव की परोक्ष प्रतीति मानें तो विभावादि के प्रयोग के पूर्व भावों को अभिधेय मानना पड़ेगा तथा विभावादि के प्रयोग के पूर्व भी रस की स्थिति [ या रस की विद्यमानता ] को मानें तो अन्य लक्षणों की आवश्यकता ही न रहेगी, और यदि [ रत्यादि स्थायीभाव की मात्रा में न्यूनाधिक्य या तारतम्य को सम्भव मानें तो ] रस में मन्द, मन्दतर, मध्यम आदि अनन्त भेद होने लगेंगे । और हास्यरस में स्थायी के तारतम्य से जो छः भेद किये गये हैं उन छः भेदों का अभाव प्राप्त होने लगेगा; और यदि स्थायी के तारतम्य से रसभेद मानें तो काम की दस अवस्थाओं में असंख्य रस भाव मानने पड़ेंगे; और शोकादि स्थायीभावों में आरम्भ में शोक तीव्र होता है और बाद में क्रमशः मन्द होता जाता है तथा क्रोध, उत्साह और रति आदि स्थायी भावों में अमर्ष, स्थैर्य और सेवा आदि पोषक सामग्री के अभाव में ह्रास दिखाई देता है । इसलिये उपचय के स्थान पर उपचय रूपी विपर्यय के प्राप्त होने के कारण उपचित स्थायी-भाव रस होता है यह कथन उचित नहीं हैं । और इसीलिये कारण रूप विभावों, कार्य रूप अनुभावों तथा सहकारी ' रूप निर्वेदादि व्यभिचारिभावों के द्वारा ( नट के अपने अभ्यास, शिक्षा आदि रूप में ) प्रयत्न से उत्पन्न होने के कारण कृत्रिम होने पर भी कृत्रिम से न प्रतीत होने वाले [ कारण, कार्य, सहकारीरूप विभाावदि से ] कारण या चिह्न की सामर्थ्य द्वारा अनुकर्त्ता [ नट ] में स्थित रूप के द्वारा अनुमान से प्रतीत होने वाला मुख्य [ अनुकार्य ] राम में विद्यमान रहने वाला रत्यादि स्थायीभाव का यह अनुकरणरूप होता है तथा इसी अनुकरणरूप होने के कारण ही यह स्थायीभाव उससे भिन्न नाम के द्वारा व्यवहृत होता है । यही भिन्न नाम से व्यवहार किया जाने वाला पदार्थ ' रस ' है । विभावा हि काव्य बलानुसन्धेयाः, अनुभावाः शिक्षातः, व्यभिचारिणः कृत्रिमनिजानुभावार्जनबलात्, स्थायी तु काव्यबलादपि

पृष्ठ 362

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षष्टोऽध्यायः २३३ नानुसन्धेयः । रतिः शोक इत्यादयो हि शब्दा रत्यादिकमभिधेयी-कुर्वन्त्यभिधानत्वेन, न तु वाचिकाभिनयरूपतयावगमयन्ति । न हि वागेव वाचिकं, अपि तु तथा निर्वृत्तं, अङ्गैरिवाङ्गि-कम् । तेन-' विवृद्धात्माप्यगाधोऽपि दुरन्तोऽपि मद्दानपि । -बाडवनेव जलधिः शोकः क्रोधेन पीयते ' इति, क तथा-' शोकेन कृतस्तम्भः तथा स्थितो योऽनवस्थिताक्रन्दैः । हृदयस्फुटनभयार्ते रक्षितुमभ्यर्ध्यते सचिवैः ’ इत्येवमादौ न शोकोऽभिनेयोऽपि त्वभिधेयः । ' भाति पतितो लिखन्त्यास्तस्या वाष्पाम्बुशीकरकणौघः । स्वेदोद्गम इव करतलसंस्पर्शादेष मे वपुषि । ( रत्ना २–११ ) इत्यनेन तु वाक्येन स्वार्थमभिदधतोदयनगतः सुखात्मा रति-स्थायी ( यि? ) भावोऽभिनीयते न तूच्यते । अवगमनशक्तिभि-नयनं, वाचकत्वादन्या । अत एव स्थायिपदं सूत्रे भिन्नविभक्ति-कमपि नोक्तम् । तेन रतिरनुक्रियमाणा शृङ्गार इति तदात्मकत्वं तत्प्रभवत्वश्च युक्तम् । विभावों का काव्य के द्वारा, अनुभावों का शिक्षा के द्वारा तथा व्यभिचारिभावों का अपने कृत्रिम अनुभावों के द्वारा अनुसन्धान ( प्रतीति ) होता है, परन्तु स्थायीभाव काव्य - बल से भी प्रतीत नहीं होता । रति, शोक आदि शब्द रति तथा शोक आदि विषयों का अभिधा शक्ति के द्वारा [ परोक्षरूप में ] कथन करते हैं, वाचिक अभिनय के रूप में उनको बोधित नहीं करते । क्योंकि वाणी का नाम वाचिक अभिनय नहीं होता किन्तु उस वाणी

पृष्ठ 363

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२३४- नाव्यशास्त्रम् के द्वारा किया जाने वाला अभिनय वाचिक कहलाता है । जैसे अंगों से किया जाने वाला अभिनय आङ्गिक होता है । अतएव जैसे अतिशय बढ़े हुए, अगाध तथा अनन्त होने पर भी समुद्र को वाडवाग्नि पी जाती है उसी प्रकार ( अतिशय बढ़े हुए, अगाध तथा अनन्त होने पर भी ) शोक को क्रोध नष्ट कर देता है । यहाँ, तथा-शोक के कारण चेष्टाहीन एवं निरन्तर क्रन्दन करते हुए ऐसा पड़ा हुआ है कि कहीं इसका हृदय न विदीर्ण हो जाए, इस आशंका से भयभीत मन्त्री केवल उसके संरक्षण की ( ईश्वर से ) प्रार्थना कर रहे हैं । इत्यादि उपर्युक्त उदाहरणों में शोक अभिनेय नहीं है, किन्तु यहाँ वह स्त्रशब्द वाच्य होने से अभिधेय है । ( परन्तु चित्र - निर्माण की वेला में उस चित्र पर उसके आँसुओं के जो क गिरे वे उसके हस्तस्पर्श के द्वारा मेरे शरीर में आए हुए स्वेद के समान शोभित हो रहे हैं । ( २० २१११ ) इस पद्य से उसके वाच्यार्थ से भिन्न उदयनगत सुखस्वरूपा रति स्थायीभाव का यहाँ अभिनय किया जा रहा है, शब्द से अभिहित मात्र नहीं किया जा रहा । शब्द की वाचकशक्ति से भिन्न बोध करवाने वाली अन्य शक्ति अभिनय है । इसीलिये स्थायीभाव की प्रतीति अभिनय के द्वारा होने से विभाव- अनुभाव आदि के साथ सूत्र में स्थायीभाव का भिन्नविभक्ति में भी प्रयोग नहीं किया गया है [ आशय यह कि उपचित स्थायीभाव रस नहीं होता, अनुक्रियमाण स्थायीभाव ही रसत्व को प्राप्त करता है ] और इसीलिये अनुक्रियमाण रति ही शृङ्गाररस होती है । अतएव उसका स्थायी-भावरूप ( तदात्मकत्व त्व ) ) और स्थायीभावमूलक ( दोनों ) होना ( तत्प्रभवत्व ) उचित है । अर्थक्रियापि मिथ्याज्ञानदृष्टा-' मणिप्रदीपप्रभर्योर्मणिबुद्ध याभिधावतोः । मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ' इति । न चात्र नर्तक एव सुखीति प्रतिपत्तिः । नाप्ययमेव राम इति, न चाप्ययं न सुखीति, नापि रामः स्याद्वा न वायमिति, न

पृष्ठ 364

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षष्ठोऽध्यायः २३५ चापि तत्सदृश इति । किन्तु सम्यङ् मिथ्यासंशयसादृश्यप्रतीतिभ्यो विलक्षणा चित्रतुरगादिन्यायेन यः सुखी रामः, असावयमिति प्रतीति-रस्तीति । तदाह-' प्रतिभाति न सन्देहो न तत्त्वं न विपर्ययः । धीरसावयमित्यस्ति नासावेवायमित्यपि ॥ विरुद्धबुद्धिसम्भेदादविवेचितसंप्लवः । युक्त्या पर्यनुयुज्येत स्फुरन्ननुभवः कया ॥ ' इति । तदिदमप्यन्तस्तत्त्वशून्यं न विमर्दक्षममित्युपाध्यायाः । तथा हि-अनुकरणरूपो रस इति यदुच्यते तत्किं सामाजिकप्रतीत्यभि प्रायेण, उत नटाभिप्रायेण । किं वा वस्तुवृत्तिविवेचकव्याख्यातृ-बुद्धिसमवलम्बनेन, यथाहुर्व्याख्यातारः खल्वेवं विवेचयन्तीति ' । अथ भरतमुनिवचनानुसारेण? E मिथ्याज्ञान से भी ( रसास्वादादि रूप ) अर्थ को व्यक्त करने वाली क्रिया या फल - प्राप्ति देखी जा सकती है । ( जैसे— ) मणि और प्रदीप के समान प्रभा को देखकर और उसे मणि समझ कर लेने के लिये दौड़ने वाले दो व्यक्तियों में मिथ्याज्ञान के समान होने पर भी फलप्राप्ति [ अर्थक्रिया ] में भेद पाया जाता है । और यहाँ नर्तक ही सुखी है यह प्रतीति नहीं होती और न यहीं राम है इस प्रकार की प्रतीति भी नहीं होती, न यह सुखी नहीं है यह प्रतीति होती है और नहीं यह राम है या नहीं इस प्रकार की और नहीं यह उसके समान है इस प्रकार की प्रतीति होती है । किन्तु सम्यक, मिथ्या, संशय तथा सादृश्य ( इन ) रूप समस्त प्रतीतियों से विलक्षण ( भिन्न प्रकार की ) ' जो सुखी राम है वह यह है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है । जैसा कि निम्न दो कारिकाओं में बतलाया भी गया है. -न सन्देह की प्रतीति होती है, न यथार्थ स्थिति की और न भ्रान्ति की प्रतीति होती है । यही वह है ऐसी बुद्धि भी नहीं होती और यह

पृष्ठ 365

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२३६ नाट्यशास्त्रम् वह नहीं है ऐसा भी लगता है । इसलिये विरुद्ध प्रतीतियों के सम्मिश्रण के कारण पृथक् स्वरूप में भ्रम आदि का तात्त्विक निर्णय न होने के कारण उस पुरःस्फुरित अनुभव को कैसे भ्रम आदि कहा जाए यह निश्चय नहीं किया जा सकता है । आचार्य भट्टतोत के मत से शंकुक का यह अनुकरणवाद सारहीन सिद्धान्त है जो परीक्षाकाल में टिक नहीं सकता । क्योंकि यदि रस को [ शंकुक की तरह ] अनुकरणरूप कहा जाए तो यह सामाजिक के अभिप्राय से कहा जा रहा है या नट के अभिप्राय से अथवा वस्तु तथा वृत्त का विवेचन करने वाले व्याख्याताओं के अभिप्राय से कहा जा रहा है? । कहा जाता है कि व्याख्याताजन रससूत्र की इस प्रकार विवेचना करते हैं । या फिर भरतमुनि के वचनों के अनुसार ' स्थायीभाव के अनुकरण को रस कहा जा रहा है? आद्यः पक्षोऽसङ्गतः । किञ्चिद्धि प्रमाणेनोपलब्धं तदनुकरण-मिति शक्यं वक्तुम् । यथा, ' एवमसौ सुरां पिवतीति ' सुरापाना-नुकरणत्वेन पयःपानं प्रत्यक्षावलोकितं प्रतिभाति, इह च नटगतं किं तदुपलब्धं तदनुकरणतया भातीति चिन्त्यम् । तच्छरीरं, तन्निष्ठं प्रतिशीर्षकादि, रोमाञ्चकगद्गदकादिभुजाक्षेपवलनप्रभृति भ्रूक्षेपकटाक्षादिकं च न रतेश्चित्तवृत्तिरूपतयानुकारत्वेन कस्यचित् प्रतिभाति । जडत्वेन, भिन्नेन्द्रियग्राह्यत्वेन च ततोऽतिवैलक्षण्यात् । मुख्या मुख्यावलोकने च तदनुकरणप्रतिभासः । न च रामगतां रतिमुपलब्धपूर्विणः केचित् । एतेन ' रामानुकारी नटः ' इत्यपि निरस्तः प्रवादः । ( इनमें उपाध्याय के अनुसार ) यहाँ प्रथमपक्ष असंगत है । क्योंकि अनु-करण वह कहा जाता है जो किसी वस्तु के प्रमाण से गृहीत होता हो । जैसे ' इस प्रकार यह मदिरा पान करता है ' कह कर कोई दूध पीता है तो यहाँ मदिरा - पान के अनुकरणरूप में दुग्धपान प्रत्यक्ष अवलोकित हो रहा है । पर यहाँ अभिनय के अन्तर्गत रस के प्रसंग में अभिनेता में ऐसी कौन

पृष्ठ 366

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२३७ सी बात देखी जाती है जो प्रमाणरूप में उपलब्ध होने के कारण अनुकार्य • के अनुकरणरूप में प्रतीत होती हो यह विचारणीय है । क्या उसका शरीर अथवा उसके शरीर पर स्थित मुखोटे ( प्रतिशीर्षक ) आदि अथवा रोमांच गद्गद आदि या भुजाक्षेप, वलन आदि और भ्रूकटाक्ष आदि रति आदि चित्तवृत्तिरूप स्थायीभाव के अनुकरणरूप में किसी को भासित नहीं ( से कटाक्षादि पर्यन्त ) सभी वस्तुओं तथा अनुभावों के जड़ होने से, दूसरों की इन्द्रियों से गृहीत होने तथा आधार की भिन्नता के कारण यह सब उन रत्यादि स्थायीभावों से विलक्षण हैं । दूसरे मुख्य [ अनुकार्य ] तथा अमुख्य [ अनुकरण ] का विचार कर दोनों को देखने पर यह इसका अनुकरण है, यह प्रतीत होता [ प्रतिभासित होता ] है । परन्तु यहाँ रामगत रति [ मुख्य अनुकार्य रूप ] का किसी सामाजिक ने प्रथम साक्षात्कार नहीं किया अतः नट राम का अनुकरण करता है यह मत [ अनुकरणरूप न होने के कारण ] निरस्त हो जाता है । अथ नटगता चित्तवृत्तिरेव प्रतिपन्ना सती रत्यनुकारः शृङ्गार इत्युच्यते, तत्रापि किमात्मकत्वेन सा प्रतीयते इति चिन्त्यम् । ननु प्रभदादिभिः कारणैः कटाक्षादिभिः कायैः धृत्यादिभिश्व सहचारिभिर्लिङ्गभूतैर्या लौकिकी कार्यरूपा सहचारिरूपा च चित्तवृत्तिः प्रतीतियोग्या, तदात्मकत्वेन ला नटचित्तवृत्तिः प्रति-भाति । हन्त! तर्हि रत्याकारेणैव सा प्रतिपन्नेति दूरे रत्यनुकरणता-वायुक्तिः । ननु ते विभावादयोऽनुकार्ये पारमार्थिकाः, इह त्वनुकर्त्तरि न तथेति विशेषः । अस्त्वेवम्; किन्तु ते हि विभावादयोऽ-तत्कारणातत्कार्यातत्सहचारिरूपा अपि काव्यशिक्षादिबतोपकल्पिताः कृत्रिमाः सन्तः किं कृत्रिमत्वेन सामाजिकैः गृह्यते न वा? यदि गृह्यन्ते तदा तैः कथं रतेरवगतिः?

पृष्ठ 367

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२३८ नाट्यशास्त्रम् तब श्रीशङ्कुकपक्ष की ओर से यदि यह कहा जाए कि नटगत रत्यादि चित्तवृत्ति ही प्रतीत या ग्रहण होने पर रति का अनुकरणरूप शृङ्गार रस है तो उपाध्याय - पक्ष पूछता है कि किस रूप में उसकी प्रतीति G स्वीकार की जाएगी इसका यहाँ विचार करना होगा । और यदि यह कहा जाए कि प्रमदादि विभावरूप कारणों, कटाक्षादि अनुभावरूप कार्यों तथा धृति आदि व्यभिचारिभावरूप सहकारियों के चिह्नों [ हेतुओं ] से विभावादि कारणों से कार्य रूप, अनुभावादि कार्यों से कारणरूप तथा व्यभिचारीभाव के सहकारीरूप से जो लौकिक चित्तवृत्ति साक्षात्कार की योग्यता ले लेती है उसी रूप में नट की चित्तवृत्ति प्रेक्षकों को प्रतीत या प्रतिभासित होती है [ और यही रत्यादि - प्रतीति रस है ] । [ यदि यही माना जाए तो ] ऐसी स्थिति में रतिरूप में ( ही ) उसकी गृहीति न मान कर रति की अनुकृति के रूप में उसकी स्वीकृति का कथन कहाँ तक उपयुक्त होगा यही दुःख की बात है । अच्छा, अनुकार्य में जो आलम्बन — उद्दीपन आदि विभाव उपस्थित होते हैं वे वास्तविक हैं किन्तु यहाँ प्रयोगकर्त्ता नट [ अनुकर्त्ता ] में वैसे ( वास्तविक विभावादि ) प्रतीत नहीं होते यही दोनों में भेद या वैशेष्य है । और यदि ऐसा मान भी लिया जाय तो वे विभाव आदि उसन रति विभाव [ कारण ], अनुभाव [ कार्य ] तथा था व्यभिचारिभाव [ सहकारी ] न होते हुए भी काव्य तथा शिक्षा आदि से उपकल्पित होने के कारण वास्तविक विभावादि की अपेक्षा कृत्रिम होने पर सामाजिकों के द्वारा विभावादि के रूप में प्रतीत होते हैं अथवा नहीं? और यदि सामाजिक के द्वारा वे कृत्रिमरूप से ही ग्रहण किये जाते हैं तो उसे कृत्रिम साधनों से वास्तविक रति का उद्बोध कैसे हो सकता है? एक नन्वत एव प्रतीयमाना रतिरनुकरणबुद्धेः कारणम् तन्न । कारणान्तरप्रभवेषु हि कार्येषु सुशिक्षितेन तथा ज्ञाने वस्त्वन्तर-स्यानुमानं तावद्युक्तम् । असुशिक्षितेन तु तस्यैव प्रसिद्धस्य कारणस्य । यथा वृश्चिकविशेषाद् गोमयस्यैवानुमानम् । तत्परं मिथ्याज्ञानम् ।

पृष्ठ 368

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२३ ९ यत्रापि लिङ्गज्ञानं मिथ्या तत्रापि न तदाभासानुमानमयुक्तम् । नहि बाष्पा धूमत्वेन ज्ञातादनुकारप्रतिभासमानादपि लिङ्गात् तदनु-कारानुमानं युक्तम् । धूमानुकारत्वेन हि ज्ञायमानान्नीहारान्नाग्न्य-नुकारा जपापुष्पप्रतीतिर्दृष्टा । ( और शंकुकपक्ष की ओर से पुनः कहा जा सकता है कि ) इसलिये तो कृत्रिम साधनों से ज्ञात रति अनुकरणात्मक रत्यादि की बुद्धि का कारण होती है । [ यह अनुकरणात्मक रति आदि की प्रतीति ही रस मानी जा सकती है ] । यह ठीक नहीं है । ( प्रसिद्ध कारणों से भिन्न ) “ कारणों से उत्पन्न कार्यों में उनका ज्ञान होने पर उस विषय के विशेषज्ञ व्यक्ति के द्वारा दूसरी वस्तु का प्रसिद्ध कारणों को छोड़कर ठीक अनुमान करना उचित हो सकता है । पर साधारणपुरुष के द्वारा तो उसी प्रसिद्ध कारण का अनुमान किया जाता है । जैसे किसी विशेष बिच्छू को देखकर उसके कारणभूत विशेष गोबर का अनुमान करना । ऐसा करना सामान्य पुरुष के लिये मिथ्याज्ञान होगा । और जहाँ धूलिपटल में धूमादि लिङ्गका मिथ्याज्ञान होता है वहाँ भी अन्य वस्तु ( अग्नि ) का आभास मानना उचित नहीं । क्योंकि वाष्प के धूम के समान ज्ञात होने पर भी ज्ञात वस्तु से अनुकरण में समान लगने वाली वस्तु से उसके समान बनावटी वस्तु का अनुमान किया जाए तो यह अनुचित होगा । अथवा धूम के समान प्रतीत होने वाले कुहरे से अग्नि के समान आकार रहने के कारण अग्निवत् प्रतीत होने वाले जपापुष्प की प्रतीति अनुमिति हो जाए [ तो यह भी अनुचित होगा ] नम्वक्रुद्धोऽपि नटः क्रुद्ध इव प्रतिभाति । सत्यम् । क्रुद्धेन सादृश्यं च भ्रुकुय्यादिभिः, गौरिव गवयेन मुखादिभिरिति । नैतावतानुकारः कश्चित् । चापि सामाजिकानां सादृश्यमतिरस्ति । सामाजिकानां न भावशून्या नर्तके प्रतिपत्तिरित्युच्यते, अथ च तदनुकार-प्रतिभास इति रिक्ता वाचोयुक्तिः । यच्चोक्तं रामोऽयमित्यस्ति प्रतिपत्तिस्तदपि यदि तदात्वेति

पृष्ठ 369

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२४० नाट्यशास्त्रम् निश्चितं तदुत्तरकालभाविबाधकवैधुर्याभावे कतं न तत्त्वज्ञानं स्यात् । -बाधकसद्भावे वा कथं न मिथ्याज्ञानम् । वास्तवेन च वृत्तेन बाध-कानुदयेऽपि मिथ्याज्ञानमेव स्यात् । तेन विरुद्धबुद्धि ( द्वय ) संभेदादित्यसत् नर्तकान्तरेऽपि च रामोऽयमिति प्रतिपत्तिरस्ति । ततश्च रामत्वं सामान्यरूपमित्यायातम् । यच्चोच्यते विभावाः काव्यादनुसन्धीयन्ते तदपि न विद्मः न हि ममेयं सीता काचिदिति स्वात्मीयत्वेन प्रतिपत्तिर्नटस्य । अथ सामाजिकस्य तथा प्रतीतियोग्याः क्रियन्त इत्येतदेवानुसन्धान-मुच्यते, तर्हि स्थायिनि सुतरामनुसन्धानं स्यात् । तस्यैव हि मुख्यत्वेनास्मिन्नयमिति सामाजिकानां प्रतिपत्तिः । ( पूर्व पक्ष ) क्रुद्ध न होने पर भी अभिनेता क्रुद्ध सा प्रतीत होता है । [ अर्थात् वह स्वयं क्रुद्ध न होकर क्रुद्ध पुरुष के क्रोध का अनुकरण कर रहा है । इसीलिये रत्यादि के अनुकरण को रस माना जाता है ] ( उत्तर पक्ष ) ठीक है । वह क्रुद्ध के सदृश प्रतीत होता है और यह सादृश्य भ्रुकुटि आदि के द्वारा होता है; जैसे गौ का नीलगाय के साथ मुखादि के द्वारा सादृश्य होता है । [ परन्तु इस सादृश्य से अनुकरणात्मकत्व सिद्ध कैसे होगा? ] और सामाजिक को राम के सादृश्य की वास्तव में प्रतीति ( ही ) नहीं होती है । परन्तु उनकी नट के विषय में भावावेश हित प्रतीति नहीं मानी जा सकती है तो फिर उस रत्यादि के अनुकरण .के प्रतिभास ( प्रतीति ) का अभिधान सारहीन है । यदि यह कहा जाए कि ‘ यह राम है ' ऐसी नट को देख कर प्रतीति होती है तो इस प्रतिपत्ति के उत्तरकाल में बाधक का अभाव होने से उसकी तात्त्विक प्रतीति क्यों नही मानी जाए? और बाघ होने वर उसे मिथ्या-ज्ञान क्यों नहीं माना जाए? इसके अतिरिक्त वास्तविक दृष्टि से आख्यान वस्तु में बाधक के अनुपस्थित होने पर भी मिथ्या ज्ञान होगा । अतएव दो विरुद्ध बुद्धियों के सम्बन्ध के कारण यह कहना भी असंगत होगा । अन्य अभिनेता में भी ' यह राम है ' इस प्रकार की प्रतिपत्ति होती है; अतः

पृष्ठ 370

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२४१ रामत्व एक सामान्य रूप है यही सिद्ध होता है । [ आशय यह है कि जैसे ब्राह्मणत्व एक सामान्यधर्म है और उससे युक्त सभी ब्राह्मण होते हैं. इसी प्रकार ' रामत्व ' विशिष्ट या वैयक्तिक धर्म होकर भी आदर्श व्यक्तित्व के कारण सामान्य धर्म हो जाने से अनेक अभिनेताओं में ' रामत्र ' की प्रतिपत्ति या भान हो सकता है । ] और जो यह कहा जाता है कि ' काव्य के द्वारा विभावों का ( उपस्थापन या ) अनुसन्धान किया जाता है यह भी प्रतीत नहीं होता । क्योंकि ' यह मेरी सीता है ' ऐसी किसी नट को प्रतीति नहीं होती । यदि ' काव्य के द्वारा विभावादि सामाजिक की प्रतीति के योग्य बनाए जाते हैं और ऐसा करना ही अनुसन्धान होता है ' ऐसा माना जाए तो उनकी अपेक्षा स्थायीभाव के विषय में वह अनुसन्धान और अधिक उचित होगा । क्योंकि इस स्थायीभाव के ही मुख्य होने से ' इस राम में यह रत्यादि स्थायीभाव हैं ' ऐसी ही सामाजिकों को प्रतिपत्ति होती है [ अतः रत्यादि को ही रस मानना उचित होगा इनके अनुकरण को नहीं । ] यत्तु वाग्वाचिकमित्यादिना भेदाभिधानसंरम्भगर्भमहीयान-भिनयरूपताविवेकः कृतः स उत्तरत्र स्वावसरे ( अ ० १४ ) चर्चयि-ष्यते । तस्मात्सामाजिकप्रतीत्यनुसारेण स्थाय्यनुकरणं रस इत्यसत् । न चापि नटस्येत्थं प्रतिपत्तिः ' रामं तश्चित्तवृत्ति वानुकरोमी ' ति । सहशकरणं हि तावदनुकरणमनुपलब्धप्रकृतिना न शक्यं कर्तुम् । अथ पश्चात्करणमनुकरणम्, तल्लोकेऽप्यनुकरणात्मतातिप्रसक्ता । अथ न नियतस्य कस्यचिदनुकारः, अपि तूत्तमप्रकृतेः शोक-मनुकरोति । तर्हि केनैति चिन्त्यं न तावच्छोकेन, तस्य तदभावात् । न चाश्रुपातादिना शोकस्यानुकारः तद्वैलक्षण्यादित्युक्तम् । इयत्तु स्यात् उत्तमप्रकृतेर्ये शोकानुभावाः ताननुकरोमीति । तत्रापि कस्योत्तमप्रकृतेः यस्य कस्य चिदिति चेत्सोऽपि विशिष्टतां १६ ना ० शा ० प्र ०