भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 371–380
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 371–380
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२४२ नाट्यशास्त्रम् विना कथं बुद्धावारोपयितुं शक्यः । य एवं रोदितीति चेत्स्वा त्मापि मध्ये नटस्यानुप्रविष्ट इति गलितोऽनुकार्यानुकर्तृभावः । और श्रीशङ्कुक महोदय ने जो वाग् और वाचिक का भेद प्रदर्शित करते हुए अपनी अभिनय की विशेषज्ञता को प्रस्तुत किया है उसकी हम आगे ( अध्याय १४ में ) यथावसर विवेचना करेंगें । अतएव सामाजिक की प्रतीति के अनुसार ' स्थायीभाव का अनुकरण रस कहलाता है ' यह मानना ठीक नहीं है । और न नट को इस प्रकार की प्रतिपत्ति ( अनुभव, बोध ) ही होती है कि मैं राम की चित्तवृत्तियों का अनुकरण कर रहा हूँ यदि सहश करण अनुकरण है तो जिसे प्रकृति ( अनुकार्य ) का ज्ञान नहीं है वह उसका अनुकरण नहीं कर सकता । और यदि पश्चात् करण अनुकरण है तो लोक में वैसी अनुरणात्मकता अतिव्याप्ति - दोषग्रस्त हो जाएगी [ अर्थात् लौकिक इत्यादि के अनुकरण को देखने पर भी रस की अनुभूति मानी जाने लगेगी ] और यदि यह कहा जाए कि अनुकरण किसी विशेष ( नियत ) व्यक्ति का न हो कर सामान्यतः उत्तम प्रकृति का होता है और नट अपने शोक से उत्तम प्रकृति के शोक का अनुकरण करता है तो यह किस साधन सा से अनुकरण करता है यह विचारणीय है । यदि यह कहा जाए कि नट शोक से अनुकरण करता है तो उसे वास्तव में कोई शोक नहीं होता [ अनुकर्त्ता में शोक का अभाव है ] । और वह अश्रुपात आदि से शोक का अनुकपण करता है यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि अनुकरण का स्वरूप विलक्षण होता है [ अर्थात् शोक मानस चित्तवृत्ति भूत है और अश्रुपातादि दैहिक व्यापार है अतएव अश्रुपातादि से शोक भिन्न हो जाने से यहाँ स्वरूप गत विलक्षणता है ] केवल इतना कहा जा सकता है कि जो उत्तम प्रकृति के शोकगत अनुभाव हैं उनका ' मैं ( नट ) अनुकरण करता हूँ ऐसी अभिनेता कल्पना कर सकता है । किन्तु इसमें भी वह किस उत्तम प्रकृति के शोक का अनुकरण करता है [ यह निश्चित नहीं हैं ] और ' जिस किसी के ' ऐसा
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षष्ठोऽध्यायः २४३ कहा जाय तो यह भी विशेष के बिना समझना कठिन है । और यदि ' जो मुझ नट की तरह रोता है उसका मैं अनुकरण करता हूँ ' ऐसा कहा जाए तो अनुकार्य की प्रतीति में नट का अपना स्वरूप भी समाविष्ट हो जाने से अनुकार्य और अनुकर्त्ता का भाव समाप्त होकर व्यर्थता प्राप्त कर लेता है । किश्च नटः शिक्षावशात्स्वविभावस्मरणाश्चित्तवृत्तिसाधारणी-भावेन हृदय संवादात्केवलमनुभावान्प्रदर्शयन् काव्यमुपचितकाकु-प्रमृत्युपस्कारेण पठंश्चेष्टत इत्येतावन्मात्रेऽस्य प्रतीतिर्नत्वनुकारं वेदयते । कान्तवेषानुकारवद्धि न रामवेष्टितस्यानुकारः । एतच्च प्रथमाध्यायेऽपि दर्शितमस्माभिः । नापि वस्तुवृत्तत्वानुसारेण तदनुकारत्वमनुसंवेद्यमानस्य वस्तु-वृत्तत्वानुपपत्तेः । यच्च वस्तुवृत्तं तद्दर्शयिष्यामः । न च मुनिवचनमेवंविधमस्ति क्वचित्स्थाय्यनुकरणं रस इति । नापि लिङ्गमत्रार्थे मुनेरुपलभ्यते प्रत्युत ध्रुवागानतालवैचित्र्य- लास्या-झोपजीवननिरूपणादिविपर्यये लिङ्गमिति सन्ध्यङ्गाध्यायान्ते वितनिष्यामः । ' सप्तद्वीपानुकरणम् ' ( ना ० शा ० १/११७ ) इत्यादि स्त्वन्यथापि शक्यगमनिकमिति । तदनुकारेऽपि च क नामान्तरं कान्तवेषगत्यनुकरणादौ । और नट शिक्षा के तथा अपने विभावों के स्मरण द्वारा चित्तवृत्ति के साधारणीभाव के कारण हृदय की संवाद या एकरूपत्ता से केवल अनुभावों का प्रदर्शन करता हुआ काव्य को अनुभावारूप उचित कण्ठध्वनि ( काकु ) के द्वारा उच्चारित करते हुए तदनुरूप चेष्टा करता है । केवल इतने अंश में यह प्रतीति सम्भव होती है पर यह प्रतीति अनुकरण का बोध तो नहीं करवाती । क्योंकि स्त्री के वेष के अनुकरण के समान राम की चेष्टाओं का अनुकरण नहीं हो सकता यह हमने प्रथमाध्याय में भी बतलाया है ।
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२४४ नाट्यशास्त्रम् और न वस्तुवृत्त के अनुसार उन स्थायीभावों का अनुकरण हो सकता है । क्योंकि बाद में प्रतीत होने वाले स्थायीभावों का वृस्तुवृत्तत्व सिद्ध कैसे होगा? जो वास्तव में वस्तुवृत्तत्व है उसे हम आगे दिखलाएँगें । और न भरतमुनि के द्वारा ऐसा कहीं कहा गया कि ' स्थायीभाव का अनुकरण रस है ' । और भरत द्वारा इस विषय में निर्दिष्ट आधार भी नहीं -दिया गया जिसके आधार पर अनुमान किया जासके कि मुनि स्थायीभाप के अनुकरण को ही रस मानते हैं । इसके बजाय अभिनय के परिपोष के लिये ध्रुवा, गान, तालवैचित्र्य और लास्यांगों का निरूपण विपरीत पक्ष के समर्थन का अनुमानक बन जाता है इस बात को हम सन्ध्यङ्गों के अध्याय ( ना ० शा ० अ ० २१ ) के अन्त में विस्तार से दिखलाएँगे । प्रथम अध्याय में नाट्य को जो सप्तद्वीप का अनुकरण बतलाया है । उस अनुकरण की व्याख्या दूसरे प्रकार से होती है [ स्थायीभाव के अनुकरण रूप में नहीं ] और स्थायीभाव का अनुकरण मानने पर भी कान्ता आदि के वेश अथवा गति आदि के अनुकरण में नामान्तर की आवश्यकता कहाँ होगी [ अर्थात् स्थायीभाव का अनुकरण मानने पर उसके लिये ' रस ' इस दूसरे नाम का उप्रयोग कहाँ तक उचित होगा । ] यच्चोच्यते वर्णकैर्हरितालादिभिः संयुज्यमान एव गौरित्यादि । तत्र यद्यभिव्यज्यमान इत्यर्थोऽभिप्रेतस्तदसत् । न हि सिन्दूरादिभिः पारमार्थिको गौरभिव्यज्यते प्रदीपादिभिरिव, किन्तु तत्सदृशः समूहविशेषो निर्वर्त्यते । अतएव हि सिन्दूरादयो गवावयवसन्निवेश-सदृशेन सन्निवेशविशेषेणावस्थिता गोसदृगिति प्रतिभासस्य विषयः । नैवं विभावादिसमूहो रतिसदृशताप्रतिपत्तिग्राह्यः । तस्माद् भावानुकरणं रस इत्यसत् । स्वभ्यधायि सुखदुःखजननशक्तियुक्ता विषय सामग्री बाह्यैव । साङ्ख्यदृशा सुखदुःखस्वभावो रसः । तस्याञ्च सामग्र्यां दलस्थानीया विभावाः । संस्कारका अनुभावव्यभिचारिणः । स्था-यिनस्तु तत्सामग्रीजन्या आन्तराः सुखदुःखस्वभावा इति ।
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२४५ और जो यह कहा जाय कि जैसे चित्र में हरिताल आदि रंगों के तूलिका द्वारा सम्मिश्रण से गौ आदि की प्रतीति होती है उसी प्रकार विभावादि के मिश्रण या संयोग से रस की उत्पत्ति हो जाती है । और विभावादिक से भिन्न उसका ' रस ' यह नया नाम भी हो जाता है । इसमें यदि अभिव्यज्यमान अर्थ अभिप्रेत हो तो वह ठीक नहीं है । क्योंकि सिन्दूर आदि रंगों से वास्तविक गौ की अभिव्यक्ति नहीं होती । जैसी प्रदीप के प्रकाश में वास्तविक गाय व्यक्त हो जाती है वैसी सिन्दूर आदि रंगों से उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती केवल गाय सदृश अंगों की रचना स्पष्ट होती है । और इसलिये चित्र में सिन्दूर आदि गाय के अवयवों के सन्निवेश के समान सन्निवेशविशेष के रूप में स्थित होकर ' यह आकृति गौ जैसी है ' ऐसा भान ( या प्रतीति का विषय ) होता है । किन्तु इस प्रकार विभावादि - समूह रति के सदृश हैं यह ग्राह्य नहीं है [ या इस ज्ञान से गृहीत नहीं होते हैं ] अतएव इत्यादि स्थायीभावों का रस अनुकरण होता है यह मत ठीक नहीं । और जो यह स्वीकार करता है कि सुख, दुःख मोह को उत्पन्न करने वाली शक्ति से युक्त विषय - सामग्री बाह्य ही होती है । सांख्य दर्शन के इस सिद्धान्तानुसार संसार के सभी पदार्थ त्रिगुणात्मक होने से रस भी सुख, दुःख, मोह स्वभाव वाला [ त्रिगुणात्मक ] माना जाए । और उस सामग्री में दाल के स्थानीय विभाव और उनके संस्कार करने वाले छौंक के समान अनुभाव और व्यभिचारिभाव हैं और विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव आदि सामग्री से उत्पन्न आन्तरिक सुख दुःख एवं मोहरूप ( रत्यादि ) स्थायीभाव है । तेन ' स्थायिभावान् रसत्वमुपनेष्यामः ' इत्यादावुपचारमङ्गी-कुर्वता ग्रन्थविरोधं स्वयमेव बुध्यमानैन दूषणाविष्करणमर्थ्यात् प्रामाणिको जनः परिरक्षित इति किमस्योच्यते । यत्त्वन्यत् प्रतीति-वैषम्यप्रसङ्गादि तत् कियदत्रोच्यताम् । और उससे ' स्थायी भावों को रसत्व प्राप्त करवाएँगे ' इत्यादि मुनिवचन में उपचार [ लक्षणा ] मान कर रसग्रन्थ के साथ अपने विरोध
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२४६- नाट्यशास्त्रम् को स्वयं जान कर हमारे समान प्रामाणिकपुरुषों को दोषप्रदर्शन की मूर्खता से बचा लिया इसलिये उसे कितना धन्यवाद दें । और रसप्रतीति को सुख-दुःखमोहात्मक ( त्रिगुण ) मानने पर एक ही ज्ञान में विरुद्ध प्रतीतियों का मिश्रण हो जाने से प्रतीतिवैषम्यादि दोष ( भी ) होंगें । इसलिये रस को त्रिगुणात्मक मानने के विषय में और कितना अनौचित्य दिखलावें । भट्टनायकस्त्वाह- रसो न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते । स्वगतत्वेन हि प्रतीत करुणे दुःखित्वं स्यात् । न च सा प्रतीतिर्युक्ता सीतादेरविभावत्वात् स्वकान्तास्मृत्य संवेदनात् । देवतादौ साधारणो-करणायोग्यत्वात् समुद्रलङ्घनादेरसाधारण्यात् । न च तद्वतो रामस्य स्मृतिरनुपलब्धत्वात् । न च शब्दानु मानादिभ्यस्तत्प्रतीतौ लोकस्य सरसता प्रयुक्ता प्रत्यक्षादिव । नायक-युगलावभासे दि प्रत्युतलज्जा - जुगुप्सा - स्पृहादिस्वोचितवृत्त्यन्तरोदयः अव्यग्रताकाशरसत्वमपि स्यात् । तन्न प्रतीतिरनुभवस्मृत्यादिरूपा रसस्य युक्ता । उत्पत्तावपि तुल्यमेतदूषणम् । शक्तिरूपत्वेन पूर्व स्थितस्य पश्चादभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यापत्तिः । स्वगतपरगतत्वादि च पूर्ववद् विकल्प्यम् । तस्मात् काव्ये दोषाभावगुणालङ्कारमयत्व लक्षणेन, नाट्ये चतुर्विधाभिनयरूपेण निविडनिजमोहसङ्कटतानिवारणकारिणा विभावादिसाधारणीकरणात्मना, अभिधातो द्वितीयेन भावकत्व-व्यापारेण भाव्यमानो रसोऽनुभवस्मृत्यादिविलक्षणेन रजस्तमोऽ नुवेधवैचित्र्यबलाद्धृदि विस्तार - विकासलक्षणेन सत्वोद्रेकप्रकाशानन्द-मयनिजसंविद्विश्रान्तिविलक्षणेन परब्रह्मास्वोदसविधेन भोगेन परं भुज्यत इति ।
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ध्यायः २४७ भुक्तिवाद -poste भरत के एक अन्य व्याख्यता भट्टनायक रससूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि - रस न तो प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है और न अभिव्यक्त होता है । स्वगत रूप से [ अर्थात् सामाजिक द्वारा अपने में ] रस की प्रतीति मानने पर करुणरस में सामाजिक को दुःख की प्रतीति होना चाहिये किन्तु यह प्रतीति उचित नहीं है । [ दुःख के मूल कारण वास्तविक ] सीता आदि के विभाव रूप में उपस्थित न होने के कारण, अपनी पत्नी आदि की नाट्य - प्रसंग में स्मृति न होने के कारण, देवता आदि के विभाव होने पर उनके साधारणीकरण के अयोग्य होने के कारण और हनुमान आदि के समान विभावों के द्वारा किये गये समुद्रलंघन आदि का साधारणीकरण असंभव होने से सामाजिक को स्वगत रूप में रस प्रतीति नहीं होती । और उस रत्यादि युक्त राम आदि विभावों की स्मृति ही होती है क्योंकि रत्यादियुक्त राम पूर्व में उपलब्ध नहीं है । शब्द और अनुमान प्रमाणों से उस ( रस ) की प्रतीति मानने पर प्रत्यक्षज्ञान के जैसी सरसता नहीं रहेगी । इसलिये शब्द या अनुमानप्रमाण से रस का ज्ञान नहीं होता ] और प्रत्यक्ष रूप से सम्भोगादि में रत नायक - नायिका के युगल को देखने पर रस के स्थान पर लज्जा, जुगुप्सा, स्पृहा आदि दूसरे प्रकार की चित्तवृत्तियों का उदय हो जाने से अव्ययता या तन्मयता न होगी और ऐसा होने पर रस प्रतीति का आकाशरस ( आकाशपुष्प ) के समान अभाव हो जायगा । अतएव अनुभव, स्मृति आदि के रूप में रस की प्रतीति मानना ठीक नहीं । और रस की उत्पत्ति मानने में भी ये सब दोष समान ही हैं [ इस लिये रस की स्त्रगत या परगत उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती ] । शक्तिरूप में पूर्वस्थित रस की विभाव- अनुभाव आदि के द्वारा बाद में अभिव्यक्ति मानने पर विषयों की वृद्धि आदि से रसानुभूति में न्यूनाधिक रूप तारतम्य होने लगेगा । और फिर पहले पक्ष के समान पुनः यह विचारणीय हो जायेगा कि रसाभिव्यक्ति सामाजिक को स्वगत रूप से होती है अथवा परगत रूप से ।
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२४८ नाट्यशास्त्रम् अतएव काव्य में दोषाभाव तथा गुणालंकारमयत्व लक्षण के कारण और नाटक में चारप्रकार के अभिनय सामाजिक के अपने अन्तःस्थित समस्त मोह तथा संकट का निवारण करने वाले एवं विभावादि के साधारणीकरण रूप अभिधा शक्ति के पश्चात् द्वितीय अंश पर होने वाले भावकत्व व्यापार के द्वारा भाव्यमान [ साधारणीकृत ] होकर अनुभव तथा स्मृति आदि से भिन्न ( विलक्षण ) प्रकार के रजोगुण और तमोगुण के मिश्रण ( अनुवेध ) के वैचित्र्य बल के कारण वृद्धि, ( द्रुति ) विकास तथा विस्तार स्वरूप सत्वगुण के प्राधान्य द्वारा प्रकाशमान् आनन्दमय साक्षात्कार में विश्रान्त स्वरूप वाला एवं परब्रह्म के आस्वादन सदृश होकर यह रस भोजकत्व व्यापार के द्वारा [ भोग ] किया जाता है । तत्र पूर्वपक्षोऽयं भट्टलोल्लट पक्षानभ्युपगमादेव नाभ्युपगत इति तद्दूषणमनुत्थानोपहतमेव । प्रतीत्यादिव्यतिरिक्तश्च संसारे को भोग इति न विद्मः । रसनेति चेत्, सापि प्रतिपत्तिरेव । केवल-मुपायवैलक्षण्यानामान्तरं प्रतिपद्यताम् । दर्शनानुमितिश्रुत्युपमिति-प्रतिभानादिनामान्तरवत् । निष्पादनाभिव्यक्तिद्वयानभ्युपगमे च नित्यो वा असद्वा रस इति तृतीया गतिः स्यात् । चाप्रतीतं वस्त्वस्ति व्यवहारे योग्यम् । अथोच्यते - प्रतीतिरस्य भोगीकरणं तच्च रत्यादिस्वरूपं, तदस्तु तथापि न तावन्मात्रम् । यावन्तो हि रसास्तावन्त एव रसना ( रसा? ) त्मनः प्रतीतयो भोगीकरणस्वभावाः । सत्वादिगुणानां चाङ्गाङ्गिवैचित्र्यमनन्तं कल्पयमिति का त्रित्वेनेयत्ता-भट्टनायक का यह मत पहले किये गये भट्टलोल्लट के पक्ष के खण्डन से ही खण्डित हो जाता है अतएव उनके मत के प्रत्याख्यान ( खण्डन, निराकरण ) की आवश्यकता नहीं रह जाती । इसके अतिरिक्त प्रतीति,
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१४ ९ उत्पति, अभिव्यक्ति के अतिरिक्त ( भिन्न ) संसार में भोग कौन पदार्थ हो सकता है [ अर्थात् विषयवस्तु की प्रतीति अथवा उसके अनुभव को भोग कहते हैं परन्तु भट्टनायक जब रस की प्रतीति नहीं मानते तो उसका ' भोग ' किस पदार्थ को माना जायेगा ] यदि रसन ( आस्वादन ) ही भोग पद का अभिप्राय है तो यह रसना भी प्रतीति रूप ही है । केवल उपाय की विलक्षणता के कारण इसका भिन्न नाम रखा जा सकता है यह दूसरी बात है । जैसे साधन तथा प्रमाण भेद के कारण एक ही ज्ञान के प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान तथा प्रतिभान आदि भिन्न नाम दिये जा सकते हैं । और रस की उत्पत्ति तथा अभिव्यक्ति दोनों ही न मानने पर वह नित्य होगा अथवा असत् । इसके अतिरिक्त उसकी अन्य गति ( तीसरी स्थित्ति ) नहीं है, क्योंकि जिसकी प्रतीति न होती हो ऐसी कोई वस्तु व्यवहार के योग्य नहीं होती । यदि यह कहा जाय कि रस की आन्तर प्रतीति ही भोगीकरण रूप है [ उसका बाह्यरूप मान्य नहीं ] और वह रत्यादि रूपा है । तो ऐसा मान लेने पर भी केवल वह नाट्यसम्बन्धी एक दोष ही तो रह नहीं जाता है [ न तावन्मात्रम् ] । जितने शृङ्गारकरुण आदि रस हैं उतने ही प्रकार की आस्वादन स्वभाववाली भोगात्मक प्रतीतियाँ हैं और उनके भी सत्त्व, रंज, तम आदि के प्रधान- अप्रधानभागवत जो वैचित्र्य है उनके कारण रस के अनन्त भेद या व्यापारों की कल्पना करनी पड़ेगी तब अभिधा; भावकत्व तथा भोजकत्व रूप तीन व्यापारमात्र ही कैसे स्वीकार किये जा सकेंगे [ या तीन व्यापार की सीमा कैसे रह पायेगी! ]
अभिधा भावना चान्या तद्भोगीकृतमेव च ।
अभिधाधामतां याते शब्दार्थालङ्कृती ततः ॥
भावनाभाव्य एषोऽपि शृङ्गारादिगणो मतः ।
तद्भोगीकृतरूपेण व्याप्यते सिद्धिमन्नरैः ॥ १ ॥
यत् ' काव्येन भाव्यन्ते रसा ' इत्युच्यते, तत्र विभावादिजनित-१. सिद्धिमान्नरः इति ख पुस्तके पाठः ।
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२५० नाट्यशास्त्रम् चर्वणात्म कास्वादरूप प्रत्यवगोचरतापादनमेव यदि भावनं तदभ्यु-पगम्यत एव । यदुक्तम्-" संवेदनाख्यया व्यङ्ग्य ( स्व ) परसंवित्तिगोचरः । आस्वादनात्मानुभवो रसः काव्यार्थ उच्यते ॥ ” इति तत्र व्यज्यमानतया व्यङ्गयो लक्ष्यते । अनुभवेन च तद्विषय इति मन्तव्यम् । एक अभिधा, दूसरी भावना और तीसरी भोगीकृतरूपा शक्ति [ अर्थात् भोजकव्त्र ] ये तीन शब्द के व्यापार माने गये हैं । उनसे पहले शब्दार्थ और अलंकार अभिधा के विषय वाच्य रूप में उपस्थित हो जाते हैं । इसके बाद दूसरे ( भावना नामक ) व्यापार से साधारणीकरण द्वारा जो भावित होता है वह शृङ्गारादि - समूह भी भोगीकृत रूप में भावुक सामाजिक द्वारा विशेष रूप से अनुभव किया जाता है ( आप्यते ) या आस्वादित होता है । यह जो कहा जाता है कि ' काव्य में रसों की भावना की जाती है । * उसमें यदि विभावादि से उत्पन्न चर्वणात्मक आस्वाद रूप प्रतीति को विषय बनाना ही यदि भावना है तो यह हमें भी स्वीकार्य है ( पर इस प्रकार भावकत्व व्यापार की सिद्धि नहीं होती ) । और जो यह कहा गया है कि: -" संवेदनात्मक व्यङ्गय पर ( प्रधान ) संवित्ति ( दूसरे व्यक्ति की प्रत्यक्ष प्रतीति ) का विषय और आस्वादनरूप में साक्षात्कृत ( अनुभव किया जाने वाला ) रस काव्य का प्रयोजन है । " इनमें व्यज्यमान रूप से व्यङ्गय का बोध होता है और अनुभव पद से ( रस या व्यङ्ग्य का अनुभव या अर्थव्यञ्जनारूप से ) उसी का विषय रस है यह बोध होता है ( अतएव व्यञ्जना शक्ति के अतिरिक्त भोजकत्व व्यापार मानने की आवश्यकता नहीं । ) * अभिव्यक्तिवाद -नन्वेवं कथं रसमास्ताम् । किं कुर्मः?
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२५१ तो फिर ऐसी स्थिति में रसतत्त्व कहाँ रहेगा? ( कैसे सिद्ध होगा? ) । ( और इस प्रकार खण्डन होने पर रसतत्त्व तथैव विद्यमान ही रहे तो फिर ) हम क्या कर सकते हैं! क्योंकि: -आम्नायसिद्धे किमपूर्वमेतत् संविद्विकासेऽधिगतागमित्वम् इत्थं स्वयं ग्राह्यमहार्हहेतुद्वन्द्वेन किं दूषयिता न लोकः ऊर्ध्वोर्ध्वमारुह्य यदर्थतत्त्वं धीः पश्यति श्रान्तिमवेदयन्ती फलं तदाद्यैः परिकल्पितानां विवेकसोपानपरम्पराणाम् ॥ चित्रं निरालम्बनमेव मन्ये प्रमेयसिद्धौ प्रथमावतारम् । तन्मार्गलामे सति सेतुबन्धपुरप्रतिष्ठादि च विस्मयाय तस्मात्सतामत्र न दूषितानि मतानि तान्येव तु शोधितानि पूर्वप्रतिष्ठापितयोजनासु मूल प्रतिष्ठाफलमामनन्ति । ॥ [ क ] । [ ख ] ॥ [ ग ] । ॥ [ घ ] यह शास्त्रसिद्ध ( आम्नायसिद्ध ) विषय की विवेचना के विषय में कोई नयी बात नहीं है ( क्योंकि वैदिकसिद्धान्त का खण्डन करने से नित्य सिद्धान्तों का खण्डन तो नहीं होता किन्तु ) बुद्धि का विकास होकर ( प्रतिपाद्य ) वस्तु का स्वरूप अधिकाधिक प्रामाणिक और स्पष्ट होता है । अन्यथा तर्क - वितर्क से विषय का स्पष्टीकरण न हो तो जो स्वतःप्रमाण रूप बहुमूल्य रस है उसके सम्बन्ध में विरोध करने से क्या लौकिक प्रमाण दूषित नहीं होगा? [ आशय यह कि स्वतःप्रमाण वेद का विरोधी प्रमाण ही शब्दात्मक स्वतःप्रमाण वेद के सामने बाधित या दूषित हो जायेगा । ] [ क ] विवेचक विद्वानों की बुद्धि अधिकाधिक ऊँचे प्रदेशों पर आरोहण करने पर भी शान्ति का अनुभव नहीं करते हुए जिस अर्थतत्त्व का अन्वेषण करती है वही मुख्य है । और विवेक की प्रारम्भिक सीढ़ी परम्परागत रूप में ( इसमें ) सहायक होकर उस तत्त्व तक पहुँचाती है । क्योंकि उनका ही यह परिणाम ( फलम् ) होता है । [ ख ]