भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 381–390

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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२५२ नाट्यशास्त्रम् यह आश्चर्य की बात है कि प्रमेय की सिद्धि में रचना का प्रथम आधार बिना किसी आलम्बन जैसा होता है; किन्तु एक बार आधार बन जाने पर ऊपर उनके पुलों की रचना या नगरों का निर्माण आश्चर्यजनक नहीं होता । [ ग ] अतएव आरम्भ से ही प्राचीन आचार्यों के मतों में दूषण दिखला कर उनका खण्डन करना हमारा उद्देश्य नहीं है अपि तु विशेषपरीक्षा द्वारा उन्हें ही संशोधित किया गया है । इस प्रकार पूर्वाचार्यों द्वारा स्थापित मतों की विवेचना करने के कारण हमें भी मूलसिद्धान्त की स्थापना जैसा ही फल प्राप्त होता है । [ अर्थात् पूर्वाचार्यों के व्याख्यान में रस - निष्पत्ति का सोपानवत् क्रमिक - विकास दृष्टिगत होने से उनका निदर्शन तथा विवेचन दोनों ही रस - सिद्धान्त की मौलिक स्थापना के आधार है । ] [ घ ] तह्युर्च्छतां परिशुद्धतत्त्वम् । उक्तमेव मुनिना न पूर्व किञ्चित् । तथाह्याह " काव्यार्थान् भावयन्ती ” ति ( अ -७ ) तत्काव्यार्थी रसः । तथा द्दि ' सत्रमासत ' ' तामग्नौ प्रादादि ' त्यादावर्थितादि-लक्षितस्याधि कारिणः प्रतिपत्तिमात्रादतितीव्रप्ररोचितात्प्रथमप्रवृत्ता-दनन्तरमधिकेवोपात्तकालतिरस्कारेणैवास्ते प्रददातीत्यादिरूपासंक्र-मणादिस्वभावा यथादर्शनंप्रति भावनाविधिनियोगादिभाषाभिर्व्यवहृता प्रतिपत्तिस्तथैव काव्यात्मकादपि शब्दादधिकारिणोऽधिकास्ति प्रतिपत्तिः । अधिकारी चात्र विमलप्रतिभानशालिहृदयः । तस्य च " ग्रीवाभङ्गाभिराम " मिति ( शाकु - अ -१७ ) “ उमापि नीलाल के " ति ( कुमा - ३-६२ ) ' हरस्तु किञ्चि ' ( कुमा - ३-६७ ) दित्यादिवाक्येभ्यो वाक्यार्थप्रतिपत्तेरनन्तरं मानसी साक्षात्कारात्मिकापहसिततत्त द्वाक्योपात्त कालादिविभागा तावत्प्रतीतिरुपजायते ।

पृष्ठ 382

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२५३ तस्यां च यो मृगपोतकादिर्भाति तस्य विशेषरूपत्वाभावाद्भीत इति वासकस्यापारमार्थिकत्वाद्भयमेव परं देशकालाद्यनालिङ्गितं तत पव भीतोऽहं भीतोऽयं शत्रुर्वयस्यो मध्यस्थो वेत्यादिप्रत्ययेभ्यो दुःख सुखादिकृतभानादिबुद्धयन्तरोदयनियमवत्तया विनबहुलेभ्यो विलक्षणं निर्विघ्रप्रतीतिग्राह्यं साक्षादिव हृदये निविशमानं चक्षुषोरिव विपरिवर्तमानं भयानको रसः । तथाविधे हि भये नात्मात्यन्तं तिरस्कृतो न विशेषत उल्लिखितः । एवं परोऽपि । प्रश्न- तब फिर रस का परिशुद्ध या निर्दुष्ट तत्त्व ( स्वरूप ) क्या है? उत्तर - यह तो भरतमुनि ने कह दिया है और वह कोई अपूर्व या नयी बात नहीं है जो कही जाय । जैसा कि भरतमुनि ने कहा भी है- ' काव्य के अर्थों को ( जो ) प्रकाशित करते हैं । ' और ये काव्यार्थ ही रस हैं । जैसा कि ब्राह्मणग्रन्थों के ' वनस्पतयः सत्रमासत ' ' प्रजापतिः आत्मनो वपामुदास्त्रिदत् तामग्नौ प्रादात ( तै ० ना ० । ' ) [ ' वनस्पतियाँ आदि यज्ञ में बैठी ' तथा ' प्रजापति ने अपनी चर्बी निकाली और उसे अग्नि में हवन कर डाला ' ] इत्यादि अर्थवाद वाक्यों में सामर्थ्यादि से लक्षित अधिकारी को मन्त्रों का आह्नान करते समय पहले तो अत्यन्त प्रशंसित सामान्य अर्थ की प्रतीति मात्र होती है पर उसके बाद वर्णित भूतकाल की उपेक्षा कर प्रत्यक्ष या वर्तमान अनुभव रूप में संक्रान्त होने वाली विधि नियोग आदि शब्दों के द्वारा व्यवहृत होने वाली भावना ही अधिक प्रतीत होती है । इसी प्रकार काव्यात्मक काव्य से भी अधिकारी सहृदय सामाजिक को प्रत्यक्ष सामान्य वाक्यार्थज्ञान मात्र से रसात्मक व्यङ्ग्यार्थ का अधिक या अतिरिक्त बोध हो जाता है । ( काव्यादि के प्रदेश में ) निर्मल प्रतिभाशील हृदय वाला सामाजिक व्यक्ति अधिकारी माना जाता है । और उसे ( शाकुन्तल के ) ' ग्रीवा-भङ्गाभिरामम् ' और ( कुमारसंभव के ) ' उमापि नीलालक ' तथा ' हरस्तु किञ्चित् ' इत्यादि काव्यवाक्यों द्वारा वाक्यार्थ की प्रतीति के बाद उक्त प्रकार

पृष्ठ 383

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२५४ नाट्यशास्त्रम् के वाक्यों में गृहीत कालादि ( देश - कालादि ) के विभाग की उपेक्षा करने वाली मानसी साक्षात्कारात्मिका प्रतीति होती है । और उस प्रतीति में मृगशावक आदि का जो विषयरूप में भान होता है उसके साधारणीकरण हो जाने के कारण विशेषरूप के अभाव हो जाने से ' यह मीत है ' ऐसी प्रतीति होती है और भय के उत्पादक ( दुष्यन्तादि ) के अवास्तविक होने से भय की देश - काल से असम्बद्ध प्रतीति होती है । और इसीलिये ' मैं भीत हूँ, यह भीत है अथवा यह शत्रु, मित्र या मध्यस्थ भीत है । ' इत्यादि सुख - दुःख आदि की प्रतीति से नियमतः अन्य प्रतीति को उत्पन्न करने वाले विनबहुल ( लौकिक ) ज्ञानों से भिन्न, निर्विघ्न बोध के द्वारा हृदय में साक्षात् प्रविष्ट होता हुआ सा और नेत्रों के सामने घूमता हुआ सा ' भयानकरस ' आ जाता है । इस प्रकार के भय में सामाजिक की आत्मा न अत्यन्त उपेक्षित ही होती है और न विशेष रूप उल्लिखित [ अर्थात् संसक्त ] ही रहती है [ कि उनके भावावेश में चलने लगे ] इसी प्रकार शृङ्गार के अन्य उदाहरण भी समझना चाहिए । तत एव न परिमितमेव साधारण्यमपि तु विततं, व्याप्तिग्रह वधू माग्न्योर्भय कम्पयोरेव वा तदत्र साक्षात्कारायमाणत्वेन परि-पोषिका नटादिसामग्री, यस्यां वस्तुसतां काव्यार्पितानां च देश-काल मात्रादीनां नियमहेतू नामन्योन्यप्रतिबन्धबलादत्यन्तमपसरणे स एव साधारणीभावः सुतरां पुष्यति अत एव सर्वसामाजिका-नामेकवनतैव प्रतिपत्तेः सुतरां रसपरिपोषाय सर्वेषामनादिवासना-चित्रीकृतचेतसां वासनासंवादात् । सा चाविघ्ना संवित्, चमत्कार-स्तजोऽपि कम्पपुलकोल्लुक सनादिर्विकारश्चमत्कारः । यथः—

अजवि हरिणो चमक्कइकहाइ ण मंदरेण कलिआइ ।

चंदकलाकंदलसच्छहाई लच्छिए अंगाई ॥

[ अद्यापि हरेः चमकृतिकराणि न मन्दरेण कलितानि । चन्द्रकला - कन्दलसच्छायाि लक्ष्म्या अङ्गानि ॥ ]

पृष्ठ 384

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षष्टोऽध्यायः २५५ और फिर ( विभावादि का उसी देश काल में ) साधारणीकरण परिमित नहीं होता अपितु विस्तृत होता है । धूम और अग्नि के व्याप्तिग्रह ( साहचर्य नियम ) के समान भय और कम्प आदि के व्याप्तिग्रह समान विस्तार लिये होते हैं । जौर यहाँ साक्षात्कारात्मक रूप से नटादि सामग्री पोषण करने वाली होती है । जिसमें काव्यवस्तु में निबद्ध देश, काल तथा प्रमाता आदि को वास्तविक देश, काल आदि के नियामक कारणों के पारस्परिक बन्धन से अत्यन्त अलग कर देने पर साधारणीकरण व्यापार अत्यन्त पुष्ट हो जाता है । और इसीलिये अनादि वासना से चित्रित चित्त वाले समस्त सामाजिक सहृदयों की समान वासना हो जाने के कारण सभी को समान रस - प्रतीति होती है । यह विघ्नों से सर्वथा रहित आनन्दपरक चमत्कारात्मक प्रतीति होती है और उससे उत्पन्न होने वाले कम्प, रोमाञ्च तथा शरीर को उछाल कर कम्पित करना ( उल्लुकसनम् ) आदि अनुभावात्मक विकार भी चमत्कार कहलाते हैं । जैसे: -आज भी मन्दराचल ने अपने स्पर्श से श्रीविष्णु के शरीर में चमत्कार उत्पन्न करने वाले चन्द्र की कला के समान लक्ष्मी के सुन्दर अंगों को नहीं पहचाना जान पड़ता है । तथा हि स चातृप्तिव्यतिरेकेणाच्छिन्नो भा ( भो? ) गावेश इत्युच्यते । भुञ्जानस्याद्भुतभोगात्मस्पन्दाविष्टस्य च मनः करणं चमत्कार इति । स च साक्षात्कारभावो मनसाध्यवसायो वा सङ्कल्पी वा स्मृतिर्वा तथात्वेन स्फुरत्य ( न्न? ) स्ति ( स्तु? ) । यदाह-यहाँ चमत्कार शब्द पुलकादि के लिये प्रयुक्त किया गया है और इससे निर्विघ्न बोध रूप अतृप्ति से भिन्न ( अर्थात् पूर्णतृप्ति रूप ) भावावेश [ भोगावेश? ] उत्पन्न होता है । इस प्रकार भोगात्मक व्यापार में संलग्न मन का भोग करने वाले के अद्भुत व्यापार से ( आविष्ट मन का ) चमत्कृत हो उठना ही ' चमत्कार ' है [ जो सामान्य से भिन्न असाधारणात्मा होता है । ] और चमत्कृत मानस की यह साक्षात्कारात्मक ( रस ) अनुभूति अध्यवसाय, संकल्प या स्मृति के रूप में प्रतीत होती है । जैसा कि निम्न पद्य में ( कालिदास ने ) कहा भी है

पृष्ठ 385

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२५६ नाट्यशास्त्रम् " रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पर्युत्सुको भवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः । तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि " ( शाकु ०५ / २ ) इत्यादि, अत्रहि स्मरतीति या स्मृतिरुपदर्शिता सा न तार्किक-प्रसिद्धा, पूर्वमेतस्यार्थस्याननुभूतत्वात् । अपि तु प्रतिभानापरपर्याय-साक्षात्कारस्वभावेयमिति । सर्वथा तावदेषास्ति प्रतीतिरा-स्वादात्मा, यस्यां रतिरेव भाति । तत एव विशेषान्तरानुपहित-स्वात्सा रसनीया सती न लौकिकी न मिथ्या नानिर्वाच्या न लौकिकतुल्या न तदारोपादिरूपा । तथैव चोपचयावस्थासु देशाद्यनियन्त्रणादनुकारो s [ प्यस्तु भाषा ] नुगामितया कारणाद् विषयसामग्रथापि वा भवतु विज्ञानवादाव-लम्बनात्, सर्वथा रसनात्मकवीतविघ्नप्रतीतिग्राह्यो भाव एव रसः । रमणीय पदार्थों को देख अथवा मधुर शब्दों को सुनकर सुखी व्यक्ति भी उत्कण्ठित हो उठता है ( जैसे किसी प्रिय जन से उसका विछोह हो गया हो ) अतः यह निश्चय ही वासना रूप से अन्तःकरण में स्थित अज्ञातपूर्व पिछले जन्म के परिचय या मैत्री वाले अपने किसी सुहृद्जन का स्मरण करता है । ( अभि ० शा ० अ ०५ / २ ) यहाँ कवि ने जिस स्मृति को ' स्मरति ' पद से प्रदर्शित किया है वह नैयायिकों की ‘ ज्ञातविषय ज्ञानं स्मृतिः ( अर्थात् पूर्वानुभवजन्य संस्कार से बोधित ज्ञान का स्मरण होना ) नहीं है । क्योंकि पहले से इस अर्थ का अनुभव नहीं हुआ है [ अतः मनोवैज्ञानिक स्मृति सम्भव नहीं । ] किन्तु यहाँ स्मरण शब्द प्रतिभान नामवाले प्रसिद्ध साक्षात्कारात्मक स्वभाव रूप अर्थ को ही प्रतीत करवाता है । और आस्वादन स्वरूपा यह ऐसी प्रतीति है जिसमें निर्विघ्न रूप से रति आदि भावों का ही भान होता है । अतएव अन्य

पृष्ठ 386

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षष्ठोऽध्यायः २५७ विशेष भेदक धर्मों से उपहित न होने के कारण आस्वादन के योग्य होकर भी वह न लौकिक, न मिथ्या, न अनिर्वचनीय और न लौकिक सदृश या उसके आरोपादि के रूप में यह काव्यात्मक अनुभव नहीं समझा जा सकता है । इस प्रकार [ विभावादि से उपचित स्थायीभाव को रस मानने वाले भट्टलोल्लट के मतानुसार ] रत्यादि की उपचयावस्था में देशादि के अनियन्त्रित होने से अनुकरण भी भावानुगामी रूप में वैसा ही देशकाल से अनालिङ्गित होता है । तथा विज्ञानवाद का अवलम्बन करने से बाह्य विषय सामग्री [ विभावानुभावादि ] भी वैसी ही [ देश काल से अस्पष्ट ] हो जाती है । प्रत्येक अवस्था में आस्वादनात्मा एवं निर्बाध प्रतीति से ग्रहण किया हुआ भाव ही रस है । तत्र विघ्नापसारका विभावप्रभृतयः । तथा हि - लोके सकल-विघ्नविनिर्मुक्ता संवित्तिः । एवं चमत्कारनिर्वेशर सनास्वादनभोग-समापत्तिलयविश्रान्त्यादिशब्दैरभिधीयते । विघ्नाश्वास्यां ( सप्त ) । ( १ ) प्रतिपत्तावयोग्यता सम्भावनाविरहो नाम, ( २ ) स्वगत-परगतत्व नियमेन देशकालविशेषावेशः, ( २ ) निजसुखादिवशीभावः, ( ४ ) प्रतीत्युपायवैकल्यम्, ( ५ ) स्फुटत्वाभाव:, ( ६ ) अप्रधानता ( ७ ) संशययोगश्च । इस प्रसङ्ग में विघ्नों को दूर करने वाले विभाव आदि होते हैं । जैसे लोक में विघ्नों से रहित जो प्रतीतियाँ हैं उन्हें चमत्कार, निवेश, रसन, आस्वादन, भोग, समापत्ति, लय तथा विश्रान्ति शब्दों से जाना जाता [ कहा जाता है ] है । इन रस प्रतीति में ( ये ) सात विघ्न होते हैं: -( १ ) ज्ञान या प्रतिपत्ति के अयोग्य होना अर्थात् ( रस की ) सम्भावना का अभाव, ( २ ) स्वगत या परंगत रूप से देशकाल विशेष का आवेश [ सम्बन्ध ], ( ३ ) अपने निजी सुख - दुःखादि का वशवर्ती हो जाना, ( ४ ) प्रतीति के उपायों का अभाव, ( ५ ) स्पष्ट ( स्फुट ) प्रतीति का न होना, ( ६ ) अप्रधानता तथा ( ७ ) संशय का योग । १७ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 387

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२५८ नाट्यशास्त्रम् तथाहि - ( १ ) संवेद्यमसम्भावयमानः संवेद्ये संविदं विनि-वेशयितुमेव न ( यो ) शक्नोति का तत्र विश्रान्तिरिति प्रथमो विघ्नः । तदपसारणे हृदयसंवादो लोकसामान्यवस्तुविषयः । अलोक सामान्येषु तु चेष्टितेष्वखण्डितप्रसिद्धिजनितगाढ़ारूढप्रत्यय- प्रसर-कारी प्रख्यात रामादिनामधेयपरिग्रहः [ चोपायः ] । अतएव निस्सा-मान्योत्कर्षोपदेशव्युत्पत्तिप्रयोजने नाटकादौ प्रख्यातवस्तुविषयत्वादि नियमेन निरूप्यते न तु प्रहसनादौ । तच्च स्वावसर एव वक्ष्याम इत्यास्तां तावत् । ( १ ) प्रतिपत्तावयोग्यता-जैसे कि - ज्ञान के विषय को असम्भव समझने वाला व्यक्ति उस विषय में अपनी प्रतीति को निश्चित नहीं कर पाता है और बिना इस निश्चय के विश्रान्ति ( आनन्दानुभूति ) की सम्भावना कहाँ हो सकती है । इसलिये रसास्वाद का यह प्रथम विन है । उसके निराकरण का उपाय अन्य सामाजिकों के साथ लौकिक सामान्य वस्तुओं के विषय में हृदय का तदात्म्य है । ( समुद्रवंधनादि ) लोकोत्तर व्यापारों में [ असम्भावना के निराकरण हेतु ] परम्परागत प्रसिद्धि से होने वाले ( बद्धमूल ) विश्वास को परिपुष्ट करने वाले प्रख्यात आदि का अभिनेता में ग्रहण करना । इसीलिए लोकोत्तर उत्कर्ष के प्रदर्शन के द्वारा उपदेश तथा ज्ञान का प्रयोजन रखने वाले नाटकादि में नियमपूर्वक प्रख्यात विषय [ नायक तथा वस्तु ] आदि का निरूपण रखा जाता है [ क्योंकि इन नाटकों में रसात्मक माध्यम से आदर्श की प्रतिष्ठा करना इष्ट होता है ] इसके विपरीत प्रहसन आदि में प्रख्यात वस्तु या नायक ग्रहण न करके लोक सामान्य में प्रचलित कथानकों को प्रस्तुत किया जाता है । इनका निरूपण हम नाटक, प्रहसन आदि के लक्षणों के व्याख्यान स्थल ( ना ० शा ० अ ० २० ) पर करेंगे अतएव यहाँ इसका विस्तार अपेक्षित है । ( २ ) स्वैकगतानाश्च सुखदुःख संविदामास्वादे यथासम्भवं तदपगमभीरुतया वा, तत्परिरक्षाव्यप्रतया वा, तत्सदृशार्जिजीविषया ORI

पृष्ठ 388

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षष्ठोऽध्यायः २५ ९ चा, तजिहालया वा तत्प्रचिख्यापयिषया वा, तद्गोपनेच्छया वा, प्रकारान्तरेण वा संवेदनान्तरसमुद्रम एव परमो विघ्नः । ( २ ) स्वगतपरगतत्वनियमेन देशकालविशेषावेशः— जब सामाजिक अपने निजी - दुःख का अनुभव ( आस्वादन ) करने लगता है तो कभी उसके नष्ट होने के भय से, और कभी उसकी रक्षा के लिए व्यय होने से उसी की स्थिति जैसी स्थिति ( जीवनेच्छा ) प्रकट करता है । अथवा उसके ( दुःख के ) परित्याग की इच्छा से, अथवा उसे प्रकट करने की या छिपाने की इच्छा से अथवा अन्य किसी प्रकार से अन्य ज्ञानों ( संवेदान्तर ) के उत्पन्न होने से रसास्वाद में अतिशय विघ्न होता है । [ अर्थात् ये विविध भावात्मक दशाएँ रसानुभूति में विन उत्पन्न करती हैं ] । परगतत्वनियमभाजामपि सुखदुःखानां संवेदने नियमेन स्वात्मनि सुखदुःखमोहमाध्यस्थ्यादिसंविदन्तरोद्गमनसम्भावनादव-श्यम्भावी विघ्नः । तदपाकरणे ' कार्यो नातिप्रसङ्गोऽत्र ' ( ना ० शा ० ५- १५८ ) इत्यादिना ' पूर्वरङ्गविधिं प्रति ' इति पूर्वरङ्गानिगूहनेन ' नटी विदूपको वापि ' ( ना ० शा ० २२।३० ) इति लक्षितप्रस्ता-' वनावलोकनेन च यो नटरूपताधिगमस्तत्पुरस्सरः प्रतिशीर्षका दिना तत्प्रच्छादन प्रकारोऽभ्युपायः, अलौकिक भाषादि - भेद लास्याङ्ग - - रङ्ग-पीठ - मण्डप - कक्ष्यादिपरिग्रह- नाट्यधर्मि सहितः । तस्मिन् हि सति अस्यैव अत्रैव एतर्ह्येव च सुखं दुःखं चेति न भवति । प्रतीति-स्वरूप निह्नवात्, रूपान्तरस्य चारोपितस्य प्रतिभासंविद्विश्रान्ति-वैकल्येन स्वरूपे विश्रान्त्यभावात् । सत्ये तदीयरूपनिहवमात्र एव पर्यवसानात् । और यदि यह मान लिया जाए कि रस की स्थिति नटगत : ( अनुकार्यगत ) है तो परगतत्व नियम से युक्त होने से उसके सुख दुःख आदि के संवेदन से सहृदय सामाजिक को भी अपने अन्दर निश्चय रूप से

पृष्ठ 389

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२६० नाट्यशास्त्रम् सुख - दुःख मोह या मध्यस्थता का ज्ञान होगा; यह अन्यज्ञानात्मक स्वरूप रसानुभूति में विघ्न है । इन विनों के निराकरण के लिए नाट्यप्रयोग के विषय में ' कार्यों नातिप्रसङ्गोऽत्र ' ( ना ० शा ० ५/१५८ ) ' पूर्वरङ्गविधि प्रति ' इत्यादि से पूर्वरङ्ग के दर्शन एवं ' नटी विदूषको वापि ' ( ना ० शा २२/३० ) इत्यादि से लक्षित प्रस्तावना के अवलोकन से जो नटस्प्ररूप की प्रतीति होती है उसके साथ ही अभिनेता ( अनुकार्य ) की बेशभूषा के अनुरूप मुकुट आदि के द्वारा अलौकिक भाषादि के प्रकार, नृत्यादि ( लास्य ) के अंग, रङ्गपीठ तथा मण्डप के कक्षाविभागों आदि के परिग्रह रूप नाट्यधर्मी सहित नट के स्वरूप का आच्छादन करना भी एक उपाय है । और उसके होने पर इसी को यहाँ ही और इसी के द्वारा सुख या दुःख होता है यह नहीं कहा जा सकता है । ( नट की ) प्रतीति के स्वरूप का ( मुकुट आदि से ) आच्छादन होने से आरोपित रूपान्तर का प्रतिभा से उत्पन्न ज्ञान बना रहने से, अपने स्वरूप में विश्रान्ति का अभाव होने से और स्वरूप में विश्रान्ति होने पर नट के स्त्ररूपाच्छादन में ही समाप्त हो जाने से विन्नों का निराकरण हो जाता है । तथाहि - आसीन पाठ्यपुष्पगण्डिकादि लोके न दृष्टम् । न च तन्न किञ्चित् कथञ्चित् सम्भाव्यत्वादिति स एष सर्वो मुनिना साधारण भावसिद्धया रसचर्वणोपयोगित्वेन परिकरबन्धः समाश्रित इति तत्रैव स्फुटीभविष्यतीति तदिह तावन्नोद्यमनीयम् । ततः स एष स्वपरनियतताविघ्नापसारणप्रकारो व्याख्यातः । और आसीनपाट्य तथा पुष्पगण्डिका आदि लोक में तो दिखाई नहीं देते । इससे वे नहीं होते यह बात नहीं है, क्योंकि उनकी नाट्य में किसी प्रकार सम्भावना तो हो ही सकती है । रसास्वादन के उपयोगी इन सभी कारणों को भरतमुनि ने साधारणीकरण की सिद्धि के द्वारा संग्रहीत कर दिया है यह बात यथास्थान स्पष्ट करेंगे अतएव यहाँ उसके विचार की आवश्यकता नहीं है । इस प्रकार यह स्वगत परगतत्व नियम से विघ्नों के निराकरण का भेद बतलाया गया ।

पृष्ठ 390

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२६१ ( ३ ) निजसुखादिविवशीभूतश्च कथं वस्त्वन्तरे संविदं विश्रामये-दिति तत्प्रत्यूहव्यपोहनाय प्रतिपदार्थनिष्ठैः साधारण्यमहिम्ना सकल-भवसहिष्णुभिः शब्दादिविषयमयीभिः ( यै? ) आतोद्यगान-विचित्र मण्डपपदविदग्धगणिकादिभिरुपरञ्जनं समाश्रितम् येनाहृदयो-ऽ पहृदयवैमल्यप्राप्या सहृदयीक्रियते । उक्तं हि " दृश्यं श्रव्यं चे ” ( ना ० शा ० १।२२ ) ( ४ ) किञ्च प्रतीत्युपायानामभावे कथं प्रतीतिभावः । ( ५ ) अस्फुटप्रतीतिकारिशब्दलिङ्गसम्भवेऽपि न प्रतीतिर्वि आम्पति स्फुटप्रतीतिरूपप्रत्यक्षोचितप्रत्यय साकाङ्क्षत्वात्, यथाहु: -' सर्वा चेयं प्रमितिः प्रत्यक्षपरेति ' ( म्या ० सू ० भा ० १-३ ) । स्वसाक्षात्कृते आगमानुमानशतैरप्यनन्यथाभावस्य स्वसंवेदनात् । अलातचक्रादौ साक्षात्कारान्तरेणैव बलवता तत्प्रमित्यवधारणादिति लौकिकस्तावदयं क्रमः । तस्मात्तदुभयविघ्नविधातेऽभिनया लोकधर्मवृत्तिप्रवृत्त्युपस्कृताः समभिषिच्यन्ते । अभिनयनं हि सशब्द लिङ्गव्यापार [ वि ] सदृशमेव प्रत्यक्षव्यापार कल्पमिति निश्चेष्यामः । ( ३ ) निजसुखादिविवशीभावः-जो पुरुष अपने निजी सुख दुःख से अक्रान्त हो जाता है वह अन्य वस्तु में अपना ध्यान कैसे लगा सकता है? इसलिये रसानुभूति के इस विघ्न के निराकरण के लिये ( नाटक आदि में ) प्रत्येक पदार्थ में साधारणी-करण के प्रभाव की स्थिति रखी जाती है जिसके प्रभाव से सब भोग्य, शब्दादि विषयों से युक्त, विविध वाद्ययन्त्रों के प्रयोग, गायन एवं आश्चर्यकारी नृत्य आदि में निपुण नर्तकी आदि के द्वारा प्रस्तुत नृत्यादि प्रयोगों का आश्रय लेकर सामाजिक के मनोरंजन का आश्रय लिया जाता है । इससे शुष्क व्यक्ति भी हृदय की निर्मलता और सरसता प्राप्त कर सहृदय बन