श्रीगणेशाय नमः।

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 391–400

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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२६२ नाट्यशास्त्रम् जाता है । अतएव कहा है कि ' दृश्य और श्रव्य ' दोनों काव्य के प्रकार रसास्वाद के उपाय हैं । ( ४ ) प्रतीत्युपायवैकल्यम् तथा ( ५ ) स्फुटत्वाभावः-( ४ ) प्रतीति के उपायों के अभाव में प्रतीति कैसे हो सकेगी । ( ५ ) और अस्पष्ट या परोक्ष प्रतीति के जनक शब्द और अनुमान के होने पर भी साक्षात्कारात्मक स्पष्ट ( स्फुट ) प्रतीति रूप प्रत्यक्ष की आकांक्षा होने के कारण उनसे उत्पन्न प्रतीति की विश्रान्ति नहीं होती । जैसा कि कहा भी हैं कि ' यह सारी प्रमिति ( अनुभूति ) प्रत्यक्ष परक है ' ( न्या ० सू ० १-३ ) । जिस वस्तु का स्वतः प्रत्यक्ष या साक्षात्कार होता है उसे सैकड़ों शब्द और अनुमान प्रमाण परिवर्तित नहीं कर सकते । और अलातचक्र आदि में प्रबल साक्षात्कारात्मक ज्ञान के कारण ही प्रतीति का लौकिक क्रम निश्चित होता है । अतएव दोनों से उत्पन्न विघ्नों के निराकरण के लिये लोकधर्मी, वृत्ति तथा प्रवृत्तियों से युक्त अभिनयों को रखा गया है । क्योंकि अभिनय शब्द तथा अनुमान प्रमाण से भिन्न प्रकार का प्रत्यक्ष - ( जैसा ) व्यापार हैं यह आगे निश्चय करेंगे । ( ६ ) अप्रधाने च वस्तुनि कस्य संविद्विश्राम्यति । तस्यैव प्रत्ययस्य प्रधानान्तरं प्रत्यनुधावतः स्वात्मन्यविश्रान्तत्वात् । अतोऽप्रधानत्वं जडे विभावानुभाववर्गे व्यभिचारिनिचये च संविदा-त्मकेऽपि नियमेनान्यमुखसंप्रेक्षिणि संभवतीति तदतिरिक्तः स्थाय्येव तथा चर्वणापात्रम् । तत्र पुरुषार्थनिष्ठाः काश्चित्संविद इति ( एव ) प्रधानम् । तद्यथा-रतिः कामतदनुषङ्गिधर्मार्थनिष्ठा । क्रोधस्तत्प्रधानेष्वर्थनिष्ठः काम-धर्मपर्यवसितोऽयुत्साहः, समस्तधर्मादिपर्यवसितस्तत्त्वज्ञानजनित-निर्वेदप्रायो विभावो मोक्षोपाय इति तावदेषां प्राधान्यम् । ( ६ ) अप्रधानता -अप्रधान वस्तु में किसकी अनुभूति विश्रान्त हो सकती है? और अप्रधान ( प्रतीत ) प्रधान की ओर अग्रसर होकर भी अपने आप में विश्रान्त

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२६३ नहीं हो सकता है । [ इसलिये रस की अनुभूति में अप्रधानता विन है ] । यह अप्रधानत्व अचेतन विभाव, अनुभाव के समुदाय में और ज्ञान-रूप होने पर भी नियमतः स्थायीभाव का मुँह जोहने वाले व्यभिचारिभाव से भी हो सकता है; अतएव इन विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों से अतिरिक्त स्थायीभाव ही चर्वणा के योग्य होता है । उनमें पुरुषार्थ से सम्बद्ध होकर कुछेक ही रसानुभूति प्रधान हो जाती है । जैसे की रति स्थायीभव अर्थ पुरुषाथों से गौणरूप पुरुषार्थ से सम्बद्ध होता काम में होती है पर यह सम्बद्ध होता है । और आदि विभावों वाले शान्त है । इसलिये इन ( रति, की प्रधानता होती है काम -पुरुषार्थ से मुख्यरूप से तथा धर्म और से सम्बद्ध होता है । क्रोध प्रधान रूप में अर्थ है और यद्यपि उत्साह स्थायी की परिसमाप्ति धर्म और अर्थ आदि सभी पुरुषार्थों से ( भी ) तत्त्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद स्थायी और मुनि रस में मोक्ष पुरुषार्थ मुख्यरूप से सम्बद्ध होता क्रोध, उत्साह और निर्वेद आदि ) स्थायीभावों यद्यपि चैषामप्यन्योन्यं गुणभावोऽस्ति, तथापि तत्तत्प्रधाने रूपके तत्तत्प्रधानं भवतीति रूपकभेदपर्यायेण सर्वेषां प्राधान्यमेषां लक्ष्यते । अदूरभागाभिनिविष्टदृशस्त्वेकस्मिन्नपि रूपके पृथक्प्राधान्यम् । और यद्यपि इन चारों स्थायीभावों का एक दूसरे के प्रति गौणभाव भी होता है पर [ अर्थात् किसी एक नाटक में विभिन्न रसों की स्थिति में चारों स्थायीभावों की संयोजना की जा सकती है और ऐसी स्थिति में ] धधान होग उसी रस प्रधानता रहेगी [ क्योंकि समग्र नाटक में एक रस ही मुख्य होता है ] इसलिए रूपकों के भेदों के अनुसार उनमें प्रधान रस की स्थिति कुछ आचार्य मानते हैं पर सूक्ष्मविवेचकों के लिए एक रूपक में भी इन स्थायीभावों की अलग - अलग प्रधानता भी हो सकती है । तत्र सुखप्रधानाः स्वसंविश्चर्वणरूपस्यैकघनस्य प्रकाशस्यानन्दसारत्वात् । तथा द्दि -एकघनशोकसंविच्चर्वणेऽपि लोके स्त्रीलोकस्य हृदयविश्रान्तिरन्तरायशून्यविश्रान्तिशरीरत्वात्,

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२६४ नाट्यशास्त्रम् अविश्रान्तिरूपतैव दुःखम् । तत एव कापिलैर्दुःखस्य चाञ्चल्यमेव प्राणत्वेनोक्तं रजोवृत्तितां वदद्भिरित्यानन्दरूपता सर्वरसानाम् । किन्तू-परञ्जकविषयवशात्तेषामपि किं नास्ति कटुकितास्पर्शोऽस्ति वीरस्येव स हि क्लेशसहिष्णुतादिप्राण एव । एवं रत्यादीनां प्राधान्यम् । उनमें ये सभी रस सुखप्रधान होते हैं क्योंकि स्वसाक्षात्कारात्मक आस्वादस्वरूप ज्ञान आनन्दमय होता है । और शोकानुभव भी निर्विघ्न विश्रान्ति रूप अनुभूति कारण आनन्दपरक होता है, क्योंकि मन की अविश्रान्ति ही दुःख है । इसलिये सांख्यदर्शन के आचार्यों ने दुःख को रजोगुण की वृत्ति बतला कर चञ्चलता ( अविश्रान्ति को ) दुःख का मूलतत्त्व ( प्राण ) माना है । अतएव सभी रसों में ( हृदय विश्रान्ति की स्थिति होने के कारण ) आनन्दरूपता ही है । प्रश्न - किन्तु कुछ रसों में वीर रस के समान उपरंजक ( मिश्रित ) स्थिति के कारण दुःख का स्पर्श क्या नहीं होता? उत्तर - पर वीर रस में क्लेशसहिष्णुतादि प्रधान होती है । इसी कारण रति आदि स्थायीभाव वाले चारों रसों ( शृङ्गार, वीर, रौद्र तथा शान्त ) की अन्य रसों की क्ष प्रधानता ( होती ) है । हासादीनां तु सातिशयं सकललोकसुलभविभावतयो परञ्जक-त्वमिति न प्राधान्यम् । अत एवानुत्तमप्रकृतिषु बाहुल्येन न हासा-दियो भवन्ति । पामरप्रायः सर्वोऽपि हसति शोचति विभेति परनिन्दा-माद्रियते अल्पमुखभाषित्वेन च सर्वत्र विस्मयते । रत्याद्यङ्गतया तु मर्थोपयोगित्वमपि स्यादेषाम् । एतद्गुणप्रधानभावाकृत एव च दशरूपकादिभेद इति वक्ष्यामः । और हास आदि ( हास्य, करुण बीभत्स, भयानक तथा अद्भुत ) रसों की सर्वसाधारण में पाये जाने वाले विभावों के अधिक उपरंजक होने के कारण अप्रधानता होती है; इसीलिए उत्तम प्रकृति के पात्रों में • हास आदि अधिकता से नहीं रखे जाते । तथा निम्न प्रकृति के सभी पात्र

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२६५ [ विशेषरूप से ] हंसते हैं, शोक करते हैं, भयभीत होते हैं, दूसरों की निन्दा ( भी ) करते हैं और थोड़ा सुख प्राप्त करने की प्रकृति होने से ( दूसरे के अधिक वैभव या सुख को देख कर ) विस्मित भी होते हैं । अतः रति आदि के अङ्ग - रूप में इनकी पुरुषार्थ के प्रति उपयोगिता हो सकती है । इन रसों के गौण मुख्य भाव से ही रूपकों के दस भेद होते हैं । इसे हम आगे [ अध्याय ५० में ] बतलाएँगे । स्थायित्वञ्चैतावतामेव । जात एव हि जन्तु - रियतीभिः संविद्भिः परीतो भवति । तथाहि – “ दुःख संश्लेषविद्वेषी सुखास्वाद-नसादरः " इति न्यायेन सर्वो रिरंसया व्याप्तः स्वात्मन्युत्कर्षामानि-तया परमुपहन्नभीष्टवियोगसन्तप्ततद्धेतुषु कोपपरवशोऽशक्तौ च ततो भीरुः किञ्चिदार्जिजीषुरप्यनुचितवस्तु - विषयवैमुख्यात्मक-तयाकान्तः किञ्चिदनभीष्टतयाऽभिमन्यमानस्तत्तत्स्व कर्तव्य - दर्शन-. समुदित - विस्मयः किञ्चिश्च जिहासुरेव जायते । स्थायीभाव-स्थायीभाव इतने ही [ अर्थात् नौ ही ] होते हैं; क्योंकि प्राणी उत्पत्ति के साथ इतनी ही वासनाओं से युक्त होता है । जैसा कि कहा भी है कि- ' दुःख की प्राप्ति से द्वेष करने वाला और सुख के आस्वादन में लीन ' इस न्याय के अनुसार - ( १ ) प्रत्येक व्यक्ति अपने आन्तरिक उत्कर्ष से प्राप्त रमण की इच्छा रखता है ( इससे रति का स्थायी भाव प्रकट होता है ) ( २ ) वह दूसरे का उपहास करता है, ( इससे हास का ), ( ३ ) प्रिय के वियोग से दुःखी होता है ( इससे शोक का ), ( ४ ) उस ( वियोग ) के कारणों के प्रति क्रोध करता है ( इससे कोध का ), ( ५ ) शक्ति के अभाव में उनसे डरता है. ( इससे भय का ) ( ६ ) किसी की प्राप्ति की इच्छा करता है ( इससे उत्साह का ), ( ७ ) अनुचित विषय के प्रति घृणा से भर जाता हैं और किसी को अनभीष्ट सा मानता है, ( इससे जुगुप्सा का ) ( ८ ) आश्चर्य जनक अपने तथा दूसरों के कार्य देखकर विस्मित होता है ( इससे विस्मय का ) तथा ( ९ ) किसी के त्याग

पृष्ठ 395

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२६६ नाट्यशास्त्रम् करने की इच्छा करता है ( इससे निर्वेद का स्थायीभावत्व प्रकट होता है ) । न ह्येतच्चित्तवृत्तिवासनाशून्यः प्राणी भवती । केवलं कस्यचित् काचिदधिकाचित्तवृत्तिः काचिदूना । कस्यचिदुचितविषयनियन्त्रिता कस्यचिदन्यथा । तत् काचिदेव पुमर्थोपयोगिनीत्युपदेश्याः तद्वि-भावकृतश्चोत्तमप्रकृत्यादिव्यवहारः । इन चित्त वृत्तियों के संस्कारों से शून्य कोई प्राणी नहीं होता, केवल इतना ही अन्तर होता है कि किसी प्राणी में कोई चित्तवृत्ति अधिक मात्रा में होती है और किसी में कम । किसी की चित्तवृत्ति उचित विषय में नियन्त्रित होती है और किसी की इसके विरुद्ध विषय में । इसलिये कोई एक चित्तवृत्ति ही पुरुषार्थों में उपयोगी ( उपयुक्त ) होने से उपदेश के योग्य होती है और इन उपयुक्त चित्तवृत्तियों के विभाव के अनुसार नायकों की उत्तमादि प्रकृति का ( निश्चय करके ) व्यवहार प्रवृत्त होता है । ये पुनरमी ग्लानिशङ्काप्रभृतयश्चित्तवृत्तिविशेषास्ते समुचित- ' विभावाज्जन्ममध्ये S पि न भवन्त्येव । तथाहि - रसायनमुप-युक्तवतो मुनेग्लन्यालस्यश्रमप्रभृतयो नोत्तिष्ठन्ति । यस्यापि भवन्ति विभावबलात्तस्यापि हेतुप्रक्षये क्षीयमाणाः संस्कारशेषतां तावत् नावश्यमनुबध्नन्ति | उत्साहादयस्तु सम्पादितस्वकर्त्तव्यतया प्रलीन कल्पा अपि संस्कारशेषतां नातिवर्तन्ते । कर्तव्यान्तरविषयो-स्योत्साहादेरखण्डनात् । यथाह पातञ्जलेः " न हि चैत्र एकस्यां स्त्रियां रक्त इत्यन्यासु विरक्तः " ( पात ० सू ० व्यास ० भा ० २२४ ) इत्यादि और ये जो ग्लानि, शंका आदि विशेष प्रकार की चित्तवृत्तियाँ हैं वे अपने उपयुक्त विभावादि के अभाव के कारण जन्म लेने के अनन्तर शरीर में सदा विद्यमान नहीं रहतीं ( किन्तु सदा उत्पन्न और विलीन होती रहती हैं ) ।

पृष्ठ 396

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२६७ जैसे कि रसायन का सेवन करने वाले मुनियों में आलस्य, श्रम तथा ग्लानि आदि उत्पन्न नहीं होती । और विभावों का आश्रय से कुछ समय के लिये जिसमें उत्पन्न होते भी हैं तो कारण के दूर होने पर पुनः नष्ट हो जाते हैं, ये संस्कार रूप में निश्चित ही विद्यमान नहीं रहते । [ अतः ये व्यभिचारिभाव हैं ] ( परन्तु ) उत्साह आदि अपने कर्तव्य को पूर्ण करने के बाद विलीनप्राय हो जाने पर भी संस्काररूप से विद्यमान रह जाते हैं [ अर्थात् वे निश्शेष नहीं होते ] और विभिन्न कार्यों का विषय होने से ( तत्तत्संबंधों में स्थित रहने से ) उत्साह ( स्थायी ) भाव की अखण्डता बनी रहती है । जैसा कि पतञ्जलि के योगसूत्र - भाष्य में कहा भी है कि — चैत्र किसी एक स्त्री में अनुरक्त है इसका अभिप्राय यह नहीं कि वह अन्य स्त्रियों के प्रति विरक्त है " [ अर्थात् अव्यक्त रूप से उनमें भी उसका अनुराग हो सकता है ] इत्यादि । तस्मात् स्थायीरूपचित्तवृत्तिसूत्रस्यूता एवामी व्यभिचारिणः स्त्रात्मानमुदयास्तमयवैचित्र्यशतसहस्रधर्माणं प्रतिलभमाना रक्त-सहस्रगर्भस्फटिक -नीलादिसूत्रस्यूतविरलभावोपलम्भनसम्भावितभङ्गी तस्मिन् सूत्रे काचाभ्रकपद्मरागमरकतमहानीलादिमयगोलकवत् स्वसंस्कार वैचित्र्यमनिवेशयन्तोऽपि तत्सूत्रकृतमुपकारसन्दर्भ विश्वतः स्वयञ्च विचित्रार्थस्थायिसूत्रञ्च विचित्रयन्तोऽन्तरान्तरा शुद्धमपि स्थायिसूत्रं प्रतिभासावकाशमुपनयन्तोऽपि पूर्वापरव्यभिचारिरत्न-च्छाया - शबलिमानमवश्यमानयन्तः प्रतिभासन्ते इति व्यभिचारिण उच्यन्ते । संचारीभाव-अतएव स्थायीभाव रूप चित्तवृत्ति के सूत्र में ग्रथित ये ( ग्लानि आदि ) व्यभिचारिभाव उत्पत्ति और लय होने अनेक विचित्रताओं [ विशिष्ट-ताओं ] से युक्त अपने स्वरूप को प्राप्त कर, ताल, नीले आदि वर्णों के सूत्रों में पिरोये हुए विरलभाव से प्राप्त होने के कारण सहस्रों विभेदों के सम्भव होने से स्फटिक, काच, अभ्रक, पद्मराग, मरकत तथा महानील

पृष्ठ 397

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२६८ नाट्यशास्त्रम् आदि मणियों के दोनों के समान उस ( स्थायीभाव ) सूत्र में अपने संस्कार गत वैचित्र्य का सन्निवेशन कराते हुए भी उस सूत्र के द्वारा किये जानेवाले अनेक उपकार के सन्दर्भ में स्वयं अपने को विचित्र अर्थों में व्यक्त कर उस स्थायीगावरूपी सूत्र को अनेक रूपों में प्रकट करते हुए और बीच - बीच में कहीं - कहीं उस शुद्ध स्थायीभावात्मक सूत्र को प्रकाशित होने का अवसर देते हुए भी पूर्वापर सम्बन्ध से व्यभिचारिभावरूपी रत्नों की प्रतिच्छवि से मिश्रित रूप दिखलाते हुए से प्रतीत ( प्रतिभाषित ) होते हैं तथा इसी कारण ( वे ) व्यभिचारिभाव कहलाते हैं । तथा हि - ग्लानोऽयमित्युक्ते कुत इति हेतुप्रश्नेन स्थायी तस्य सूच्यते । न तु राम उत्साहशक्तिमानित्यत्र हेतुप्रश्नमाहुः । अतएव - विभावास्तत्रोद्बोधकाः सन्तः स्वरूपोपरञ्जकत्वं विदधाना रत्युत्साहादेरुचितत्वमात्रमावहन्ति । न तु तदभावे सर्वथैव ते निरुपाख्याः, वासनात्मना सर्वजन्तूनां तन्मयत्वेनोक्तत्वात् । व्य-भिचारिणां तु स्वविभावाभावे नामापि नास्तीति । वितनिष्यते चैत-द्यथायोगं व्याख्यावसरे । एवमप्रधानत्वनिरासः स्थायिनिरूपणायां " स्थायिभावान् रसत्वमुपनेष्याम ( ना ० शा ० अ ० ६ ) इत्यनया सामान्य लक्षण शेषभूतया विशेषलक्षणनिष्ठया च मुनिना कृतः । जैसे कि — ‘ इसे ग्लानि हो रही है ' ऐसा कहने पर भी प्रश्न उठता है कि उसकी ग्लानि का विषय क्या हैं? और हेतु विषयक ऐसे प्रश्न की उपस्थिति से ही ग्लानि की अस्थायिता सूचित होने से ' व्यभिचारिभावत्व ' संकेतित हो जाता है । किन्तु राम उत्साह शक्ति से युक्त है ' ऐसा कहने पर ( पूर्ववत् ) हेतु विषयक प्रश्न उपस्थित नहीं होता [ अतः उत्साह की स्थिति स्थायी है, व्यभिचारी भावों की नहीं ] और इसीलिए विभावादि उन उत्साहादि स्थायीभावों के उद्बोधक होकर उनके स्वरूप को उपरंजित करते हुए रति, उत्साह आदि के उचित अनुचित रूप को निर्धारित करने वाले कारण बनते हैं । किन्तु उनके [ विभावादि के ] अभाव में वे रत्यादि स्थायीभाव

पृष्ठ 398

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२६ ९ सर्वथा असत्या लुप्त नहीं हो जाते । ( क्योंकि विभावादि से ) वासनारूप में रक्षित स्थायीभाव सभी प्राणियों में रहते ( हुए जाग्रत हो जाते ) हैं ( यह कहा जा चुका है ) । व्यभिचारि भावों का अपने विभावों की अनुपस्थिति में नाम भी नहीं रहता [ वे तो स्थायीभाव की भूमिका पर ही अवतरित होते और अवस्थित रहते हैं ] यह हम इनकी व्याख्या के अवसर पर प्रतिपादन करेगें । इस प्रकार स्थायी भावों के निरूपण के अवसर पर ' स्थायी भाव को सरूपत्व प्राप्त करावेंगे ' इस रस सामान्य के लक्षण के शेष भूत [ अंगभूत ] शृङ्गारादि रसों के विशेष लक्षणों के निरूपण द्वारा भरतमुनि ने ' अप्रधानत्व ' रूप छठे विघ्न का निराकरण किया है । ( ७ ) तत्रानुभावानां विभावानां व्यभिचारिणां च पृथकस्थायिनि नियमो नास्ति वाष्पादेरानन्दाक्षिरोगादिजत्वदर्शनात्, व्याघ्रादेश्च क्रोधभयादिहेतुत्वात्, श्रमचिन्तादेरुत्साहभयाद्यनेकसहचरत्ववि-लोकनात् एवं संशयोदये शङ्कात्मकविघ्नशमनाय संयोग उपात्तः । सामग्री तु न व्यभिचारिणी । तथा हि - बन्धुविनाशो यत्र विभावः परिदेविताश्रुपातादिस्त्वनुभावः चिन्तादैन्यादिव्यभिचारी सोऽवश्यं शोक एवेति । 221 ( ७ ) संशयोगः-स्थायीभावों के अन्तर्गत विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारियों का अलग - अलग रहने या प्रयोग का कोई नियम नहीं है । क्योंकि करुण रस के अनुभाव आँसू निकलना आदि है पर आँसू आँख के रोग से भी उत्पन्न होते ( देखे जाते ) हैं । इसी प्रकार व्याघ्र आदि विभाव रौद्ररस के स्थायीभाव क्रोध तथा भयानक रस के स्थायीभाव भय के भी हेतु देखे जाते हैं [ अतएव व्याघ्रादि को देखकर रौद्र या भयानक रस की उत्पत्ति में सन्देह हो जाता है । ] [ इसी प्रकार ] श्रम, चिन्ता आदि संचारी भाव उत्साह तथा भय आदि स्थायी भावों के साथ देखे जाते हैं [ अतएव श्रमादि को देखकर उत्साह या भय ( स्थायी ) की उत्पत्ति में सन्देह हो जाता है ] । अतएव संशय के आधार पर संशययोग रूप इस सातवें विघ्न के निराकरण के लिये भरतमुनि ने रससूत्र में ' संयोग शब्द का प्रयोग ( ग्रहण )

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२७० नाट्यशास्त्रम् किया है । क्योंकि विभाव, अनुभाव आदि पृथक् - पृथक् तो संशय जनक हो सकते हैं किन्तु उनकी समग्रता ( सामग्री ) अर्थात् संयोग संशयजनक नहीं होने से व्यभिचारी ( दुष्ट ) नहीं है [ अर्थात् संयोगात्मक स्थिति संशयजनक नहीं होती ] । उदाहरण के लिये यदि विभावरूप में बन्धु विनाश हो तो विलाप, रोदन आदि अनुभाव तथा चिन्ता, दैन्य आदि के व्यभिचारिभाव के रूप में रहने पर निश्चितरूप से इनके इस प्रकार के संयोग " के द्वारा ' शोक ' ही है यह माना जाएगा । 5ppis रस की विलक्षणता-तत्र लोकव्यवहारे कार्यकारणसहचारात्मकलिङ्गदर्शने स्थाय्यात्म परचित्तवृत्त्यनुमानाभ्यास एव पाटवादधुना तैरेवोद्यान-कटाक्षवृक्षादिभिलौकिकीं कारणत्वादिभुवमतिकान्तैर्विभावनानुभावना-समुपरञ्जकत्वमात्र प्राणैः, अतएवालौकिकविभावादिव्यपदेशभाग्भिः • प्राच्य कारणादिरूपसंस्कारोपजीवनाख्यापनाय विभावादिनामधे यव्यपदेश्यैर्भावाध्यायेऽपि वक्ष्यमाणस्वरूपभेदैर्गुणप्रधानता पर्यायेण सामाजिकधियि सम्यग्योगं सम्बन्धमैकाग्रथं वाऽऽसादितवद्भिरलौ-किकनिर्विघ्नसंवेदनात्मकचर्वणागोचरतां नीतोऽर्थश्चर्व्यमाणतैकसारो न तु सिद्धस्वभावस्तात्कालिक एव न तु चर्वणातिरिक्तकालावलम्बी स्थायिविलण एव रसः । लोक व्यवहार के क्षेत्र में कार्य, कारण सहकारीरूप अनुमापक हेतुओं को देखकर रत्यादि रूप स्थायी भावात्मक, अन्य व्यक्ति की चित्तवृत्ति के अनुमान के अभ्यास की तीव्रता के कारण, उन्हीं उद्यान, कटाक्ष विलोकन आदि अनुभावों के द्वारा जो कि नाटक के कारणत्व का परित्याग कर विभावन, अनुभावन एवं उपरंजकत्व के स्वरूप को प्राप्त कर अलौकिक विभावादि नामों से कहे जाने वाले, कारणादि रूप पूर्व संस्कारों पर आधारित होने को व्यक्त करने के लिये विभावादि नाम से निर्दिष्ट किये जाने वाले और भावों से सम्बन्ध अध्याय में भी जिनका विवेचन है ऐसे

पृष्ठ 400

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षष्ठोऽध्यायः २७१ प्रकारों वाले, सामाजिक सहृदय की बुद्धियां हृदय में उचित प्रकार से संयोग या सामंजस्य प्राप्त करने के पश्चात् उसके द्वारा अलौकिक तथा निर्विघ्न, संवेदन रूप चर्वणा का विषय बनाये जानेवाले रत्यादि रूप अर्थ जिनका चर्वणा ही एक मात्र सार है न कि विद्यमान स्वरूपवाला अर्थात् चर्वण के काल में ही विद्यमान रहनेवाला और इसके अतिरिक्त समय में न रहनेवाला और स्थायीभाव से विलक्षण स्वरूप वाला ही ' रस होता है । न तु यथा शङ्कुकादिभिरभ्यधोयत, “ स्थाय्येव विभावादि-प्रत्याय्यो रस्यमानत्वाद्रस उच्यत " इति । एवं हि लौकिकेऽपि किं नरसः, असतोऽपि हि यत्र रसनीयता स्यात्तत्र वस्तुसतः कथं न भविष्यति । तेन स्थायिप्रतितीरनुमितिरूपा वाच्या, न रसः । अत एव सूत्रे स्थायिग्रहणं न कृतम् । तत्प्रत्युत शल्यभूतं स्यात् । केवल मौचित्यादेवमुच्यते स्थायी रसीभूत इति । औचित्यं तु तत्स्थायिगतत्वेन कारणादितया प्रसिद्धानामधुना चर्वणोपयोगितया विभावादित्वावलम्बनात् । तथा हि - लौकिक-चित्तवृत्त्यनुमाने का रसता । तेनालौकिक चमत्कारात्मा रसास्वादः स्मृत्यनुमानलौकिक स्वसंवेदन - विलक्षण एव । और जैसा शङ्कुक ने बतलाया कि ' विभावादि के द्वारा प्रतीत कराया हुआ स्थायीभाव ही आस्वाद्यमानता को प्राप्त करने से ' रस ' कहलाता है ' संगत नहीं है । ऐसा मानने पर लौकिक जीवन ( के अनुभवों ) में भी रस व्यवहार या अनुभूति क्यों नहीं होगी? क्योंकि जब बिना उपस्थिति के रत्यादि की रसनीयता हो जाती है तो वास्तव में जहाँ रत्यादि स्थायी विद्यमान हों वहाँ ( लौकिक पुरुष में ) रस की स्थिति क्यों नहीं मानी जाएगी । इसलिये लोक में होने वाली स्थायीभाव की जो प्रतीति अनुमिति रूप में होती है यह रस नहीं कही जा सकती । ( क्योंकि स्थायीभाव रस नहीं है ) और इसी कारण रससूत्रकार भरतमुनि ने रस लक्षण में स्थायीभाव ' का ग्रहण नहीं किया । यदि स्थायी पद का