भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 431–440
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 431–440
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३०२ नाट्यशास्त्रम् सम्भोगो विप्रलम्भश्च । तत्र सम्भोगस्तावद्द्तु - माल्यानुलेपनालङ्कारे-विभावों के ) विषय की मानसिक उद्भावना होती है और इसी उद्भावना के द्वारा वर्णित विभावों से तादात्म्य स्थापित करते हुए अभेद रूप में वे रसा-स्वाद करते हैं । अनुभुति के प्रधान होने से यह ' संवित् ' ( प्रतीति ) ही प्रमुख है और अनुभूति के अतिरिक्त अन्य जडों के भोग्य होने से ' अनुभूति ' ही रस-स्वरूपा है । जैसा कि कहा भी है: ' श्वासायासविडम्बनैव वपुषि प्राणाः पुन-जानकी ' ' प्रश्वास व श्वास की आवागमन प्रक्रिया तो विडम्बना मात्र है ( पर ) वास्तविक प्राण तो जानकी [ विषयक रति ] ही है ' ( अर्थात् विभावादि श्वास-प्रश्वास की तरह शरीर धारण में सहायक है परन्तु रति ही प्राणस्वरूप होने से स्थायी है ) । कुछ व्याख्याकारों ने अनुकार्य तथा सामाजिक के भिन्न व्यक्ति होने से आधार भेद हो जाने के कारण अनुकार्य के अनुभवों की सामाजिक को प्रतीति कैसे होगी? ऐसी आशंका की है । यह अज्ञानमूलक है । क्योंकि दोनों में स्थित रति एक है और अन्योन्य अनुभव के आधार पर ( अर्थात् परस्पर तादा-रम्य या साधारणीकरण के द्वारा ) परस्पर अभेद रहता है [ अर्थात् अनुकार्य तथा सामाजिक - निष्ट रति अभिन्न या एक होती है ] । इसी कारण भरत ने शृंगार रस को ' उत्तमयुवप्रकृतिः ' कहा है । यहाँ उत्तम पुरुष और उत्तम स्त्री दोनों मिलकर दो उत्तम हुए । इसी प्रकार एक युवक पुरुष और एक युवती स्त्री मिलकर दो युवक [ युवानी ] हुए । ' उत्तमश्च उत्तमा च उत्तमो तथा ' युवाच युवती च युवानी ' इन द्वन्द्व समासों में एकशेष होकर ' उत्तमौ च तो युवानी इति उत्तमयुवानी, तो प्रकृतिर्यस्य इति ' उत्तमयुवप्रकृतिः ' ऐसी व्याख्या होती है । यहाँ उत्तम युव शब्द से उन दोनों स्त्री - पुरुषों की संवेदनशक्ति का संकेत दिया गया है शारीरिकसौष्ठव ( उत्तमता ) का नहीं, क्योंकि उत्तमत्वरूप विशेष धर्मं चैतन्य का होता है ( वही विशेष धर्म माना जाता है ) और वह उसका यौवनावस्था सम्पन्न शरीर सर्वत्र युवक व्यवहार के अनुरूप होने से उस रति का कारण उत्तमयुवक होता है । और वही रति - संवित् आस्वादन योग्य होने से श्रृंगाररस हो जाती है । स्त्री - पुरुष के उत्तम न होने पर रति स्थिर नहीं होती तथा इसी प्रकार युवक न होने पर भी । अतएव ऐसी दशा में वह रति संवित्
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३०३ ष्टजनविषयवरभवनोपभोगोपवनगमनानुभवनश्रवणदर्शन कीडालीलादि-भिर्विभावैरुत्पद्यते । नहीं कहला सकती क्योंकि उन दोनों में वियोग की सम्भावना हो सकती है । और श्रृंगाररस का प्राण ही संयोग ( या वियोग का अभाव ) युक्त रति संवित् होती है । ( अर्थात् स्थायी भाव और रसप्रतीति परस्पर एक दूसरे को अनु-प्राणित करती है यही यहाँ व्याख्यान किया गया है ) । ' वेष ' उसे कहते हैं जो चित्तवृत्ति को व्याप्त करता है और अपनी प्रतीति द्वारा रसरूप में संक्रान्त होता है वह विभाव तथा अनुभाव रूप ' वेष होता है और जो व्यभिचारीभाव रत्यादि स्थायीभाव में व्याप्त हो जाते हैं वे भी ' वेष ' हैं । उन्हीं के उत्कृष्ट प्रकार के प्रयोग को यहाँ उज्ज्वल शब्द से संकेतित किया गया है । रससूत्र में जिन विभावादि का संकेत से निरूपण किया था अब उनकी विभाग पूर्वक व्याख्या करने के अभिप्राय से ' शृंगाररस की दो अवस्थाओं का ' तस्य द्वे ' इत्यादि से भेद बतलाते हैं ‘ अधिष्ठाने ' का अर्थ है अवस्थाएँ । अवस्था शृङ्गाररूप में अवस्थित रहती है इसलिए ' अवस्था ' है । अतएव गो के शाबलेयत्व [ दुरंगापन ] और बाहुलेयत्व ( बहुरंगापन ) के समान ये दो अवस्थाएँ दो भेद नहीं हैं । प्रस्तुत दोनों दशाओं में रति का ही आस्वादन होता है और शृङ्गारस होता है । जैसा कि कालिदास के ( मेघदूत के ) निम्न पद्य में है एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा मा कोलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भः । स्नेहानाहुः किमपि विरहध्वंसिनस्ते त्वभोगा-दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशी भवन्ति ॥ आस्वाद्यमान रूप : -[ मेघ ० २।३५ ] [ हे श्यामलनयने, मेघ से दिये गये समाचारों से मैं कुशल पूर्वक हूँ ऐसा समझकर लोकप्रवाद से मेरे ( जीवन के ) प्रति अविश्वासिनी मत बन जाना । विरह से प्रेम का ह्रास हो जाता है यह बात लोग यों ही कहते हैं परन्तु भोग अभाव में प्रियजन के प्रति तृष्णा बढ़ जाने से प्रणय और भी गहरा हो जाता है । ]
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३०४ नाट्यशास्त्रम् तस्य नयनचातुरीभ्रूक्षेपकटाक्षसञ्चारललितमधुराङ्गहारवाक्या दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । यहाँ वियोगावस्था में प्रेम के विकास का कथन है । इसीलिये सम्भोगावस्था में विप्रलम्भ की सम्भावना से भय रहता है और विप्रलम्भ में सम्भोग की कामना बनी रहती है । इतना ही [ अर्थात् सम्भोग तथा विप्रलम्भ ही ] शृङ्गाररस का क्षेत्र या स्वरूप है । विप्रलम्भ शृंगार के जो अभिलाष, ईर्ष्या, प्रयास आदि पाँच प्रकार हैं उनका रति की स्थिरता के कारण ( भोग के अभाव में भी ) इन्हीं शृङ्गार के भेदों में अन्तर्भाव हो जाता है । अतएव प्रेम होने पर तथा भोग के न होने पर भी सम्भोगशृङ्गार आदि का व्यवहार उपचार के द्वारा किया जाता है और दोनों दशाओं के मिश्रण से अतिशय चमत्कार उत्पन्न होता है । जैसा अमरुक के निम्न पद्य में: -एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो-रन्योन्यं हृदय स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् । दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो-भग्नो मानकलिः सहासरभसव्यासक्तकण्ठग्रहम् ॥ ( अ ० श ० २३ ) [ पारस्परिक कलह के कारण एक ही शय्या पर मुँह फेर कर लेटे हुए, पारस्परिक उत्तर प्रत्युत्तर न देने से खिन्न दोनों के हृदयों में एक दूसरे को मना लेने की इच्छा रहने पर भी अपने गौरव की रक्षा करने वाले दम्पति के धीरे - धीरे कनखियों के चलाने से ( दोनों की ) आँखें मिल जाने पर हँसकर एक दूसरे के गले लग जाने से मान क्रीड़ा भंग हो गयी । प्रस्तुत उदाहरण में ईर्ष्या- विप्रलम्भ और सम्भोग के मिलन से दम्पति के विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभावों के द्वारा अतिशयता के साथ शृङ्गार-रस की अनुभूति ( होती ) है । अतएव श्रीशंकुक आदि ने जो आशंका की है कि पुरूरवा को उन्मादा-वस्था के समय और वत्सराज उदयन की तपस्या के समय विप्रलम्भ शृङ्गार में भी अनुज्ज्वल वेष पाया जाता है । यह संगत होगा? परन्तु इनकी यह शंका वस्त्रालंकारादि रूप भोग के रस होने ये अनुचित है और जैसे स्नानादि १. चातुर्य - ग ० ।
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३०५ व्यभिचारिणश्वत्रासालस्थौप्रयजुगुप्सावर्जाः । विप्रलम्भकृतस्तु निर्वेदग्लानिशङ्कास्याश्रमचिन्तौत्सुक्यनिद्रा सुप्त स्वप्नविबोधन्याध्युन्मा दापस्मारजाड्य [ मोह ] मरणादिभिरनुभावैरभिनेतव्यः ॥ अवस्था उज्ज्वल होने पर भी रस नहीं होती, इसी प्रकार अनुज्ज्वल वस्त्रा-लङ्कारादि न रस होते और न रस में बाधक ही होते हैं । और शंकुक ने ही इस आशंका का जो यह उत्तर दिया कि उज्ज्वलवेष के न रहने पर भी उदयन आदि उत्तम रति का परित्याग नहीं करते अतः वहीं शृङ्गार रस रहता है यह भी असंगत है क्योंकि इससे शंका का परिहार नहीं होता यहाँ यह शंका तो नहीं है कि उज्ज्वल वेष न रहने पर श्रृंगार क्यों रहता है? और यदि यह शंका मान भी ली जाए तो क्या दोष है? और यह प्रश्न करें तो आप कुछ भी कह लें किन्तु भरत मुनि ने यह कहा है कि श्रृंगार उज्ज्वलवेष वाला होता है, पर इसके विपरीत होने पर शृंगार नहीं होता ऐसा तो नहीं कहा [ अतएव ' वेष ' का तात्पर्य वस्त्रादि नहीं है ] । सम्भोग तथा विप्रलम्भ अवस्थाओं में पहिले सम्भोग दशा को ' तत्र ' इत्यादि से बतलाते हैं । इसमें परस्पर स्त्री - पुरुष विभाव ( अर्थात् आलम्बन विभाव ) होते हैं और ऋतु आदि उनके उत्कर्षाधान में उपयोगी होने से उद्दीपन विभाव होते हैं क्योंकि उत्तम प्रकृति में अवसर के अनुकूल न होने पर रति का उदय नहीं होता । ऋतु से वसन्त आदि ऋतुएँ, माल्य से कुसुम की मालाएं, अंगराग आदि अनुलेपन पदार्थ ये सभी काम के उद्दीपक हैं । अंगद आदि अलङ्कार और विदू-षक आदि इष्टजन से नायक नायिका की उत्तम प्रकृति के परिचायक हैं । विषय का अर्थ है गीत आदि । उनके अन्तर्गत माल्यादि का निवेश हो सकता था किन्तु इनके प्राधान्य द्योतनार्थं अलग ग्रहण किया गया है । वरभवन अर्थात् महल आदि । यह प्रदेश विशेष का उपलक्षण है । इनका उपभोग श्रृंगार के अन्तर्गत मान्य है । उपवन में जाना, अनुभव या श्रवण करना अथवा महल आदि में बैठकर श्रवण आदि करना यह संकल्पादि का उपलक्षण है । क्रीडा का अर्थ जलावगाहन करना आदि है । लीला अर्थात् लोकवृत्ति या चेष्टाओं का अनुकरण करना । इसके अतिरिक्त आदि ग्रहण से हंसमिथुन, चित्र एवं २० ना ० शा ० प्र ०
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३०६ नाट्यशास्त्रम् यह रस उत्तम प्रकृति ( उदात्तप्रकृति या स्वरूप ) के नायक तथा नायिका को लेकर ( ( प पारस्परिक अनुराग द्वारा ) अपने स्वरूप को प्रकट कलाकौशल के अवलोकन आदि को लिया जा सकता है । ये सभी शृङ्गार रस के विभाव समझना चाहिए । अभिनय के अन्तर्गत इन सभी के आयोजित होने पर पूर्ण रूप में उत्तम प्रकृति में रति का उदय होता है । # रसनीयता को प्रत्यक्षरूप में अभिव्यक्त करने के लिये नेत्रों के चातुर्य इत्यादि के द्वारा अभिनय करना चाहिए । क्योंकि उनके द्वारा रस को आस्वादन के योग्य बनाया जाता है । इसलिये उन नयन चातुर्य आदि को अभिनय और क्रियाओं को अनुभाव कहा जाता है । क्योंकि वे ही आभिमुख्य नयन और अनुभावन स्वरूप हैं । रस को आस्वादन में समर्थ बनाना उद्दीपन विभाव है । अतएव अनुभाव और उद्दीपन के अभाव में केवल विभावादि वर्णन के प्रमुख रूप से रहने पर ( श्रव्य ) काव्य में दृश्य के समान चमत्कार की प्रतीति नहीं होती क्योंकि उनमें नाट्य के समान आस्वादन नहीं होता । ' यह नयन चातुर्य आदि से कान्ता दृष्टि ( ना ० शा ० ८।४१ ) का तात्पर्य लक्षणा से बोधित होता है । श्रूक्षेप से ' चतुर ' नामक भ्रू अभिनय ( ८।१२१ ) का तथा नेत्रों के घुमाने से कटाक्ष के द्वारा तासकर्म ( ८।१०० ) का बोध होता है । आङ्गिक अभिनय में नयन चातुर्य, भौहों का कटाक्ष युक्त परि-चालन और ललित अर्थात् मन्दगति से उचित अवसर पर अंगों की चेष्टाएँ आती हैं और ललित तथा सुकुमार अर्थ वाले श्रवणमधुर वाक्यों का उच्चा-रण वाचिक अभिनयान्तर्गत है । अतएव यहाँ इन आङ्गिक और वाचिक उपाङ्गों से होनेवाले अभिनयों को सूचित किया गया है । इसी से सामान्या भिनयाध्याय ( अ ० २४ ) में कहे गये चेष्टा तथा अलङ्कारों का भी ग्रहण हो जाता है । अतएव ललित तथा मधुर शब्दों की चेष्टा तथा अलङ्कार का बाचक मानना उचित नहीं है । आदि शब्द से मुखराग, रोमाश्व आदि सात्विक भावों का समावेश होता है और मूल में नयनचेष्टा आदि को अनुभावात्मक कहकर उनको क्रियात्मक स्थिति में स्वीकार कर उनकी तटस्थता या उदासीनता का निषेध किया गया है और आभिमुख्यनयन ( रूप अभिनय ) के कथन से अनुकार्य या अनुकर्त्तागत रसप्रतीति की विश्रान्ति रूप आशंका का परिहार किया गया है । OR OF SIF of
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षष्ठोऽध्यायः ३०७ करता है । इसके दो ( मुख्य, मूल ) विभेद हैं - ( १ ) संयोग तथा ( २ ) विप्रलम्भ । इनमें संयोग - ( सम्भोग ) शृंगार ऋतु; पुष्पमालाओं तथा अलंकारों के धारण, इष्टजन का साहचर्य, विषय या अर्थ, सुन्दर आलस्य, उग्रता और जुगुप्सा के अतिरिक्त शेष तीस व्यभिचारी भाव शृङ्गाररस में प्रयुक्त होते हैं । मूल में ' अस्य ' से संभोग तथा विप्रलंभ नामक दशाओं वाले ' शृंगाररस ' से अभिप्राय है । जुगुप्सा बीभत्सरस का स्थायीभाव है और उसके शृङ्गाररस में निषेध के द्वारा न्यायसिद्ध स्थायीभावों का भी अन्यरसों में व्यभिचारिभावत्व सिद्ध होता है । और यहाँ जो आलस्य का निषेध किया गया है वह प्रमदा आदि विभावों के विषय में रहने वाले आलस्य का निषेध है इसका आशय यह नहीं कि आलस्य मात्र का निषेध किया गया अतएव ' वपुरलसलसन्दा हुलक्ष्म्या: ' ( वे ० सं ० १।२ ) [ ' अलस बाहु से युक्त लक्ष्मी का शरीर ' ] और ' कतिचिदहानि वपुरभूत् केवलमलसेक्षणं तस्याः ' ( विक्र ० व ० ५। ) [ ' उसका शरीर कुछ दिनों तक अलसाई आँखों से युक्त रहा ' ] इस प्रकार के वर्णनों में जो आलस्य को स्वीकार किया गया है वह निर्दोष है । काव्य नाट्यादि में विभावादि के पूर्वनिर्द्धारित क्रम का ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि प्रथमोत्पन्न वस्तु स्थिर होती है और यह स्थिरवस्तु अपने अनु-भाव आदि सहायक ( परिवार ) का संगठन करती है, और यही ( रस ) प्रतीति का क्रम है । इन निद्दिष्ट तीस व्यभिचारिभावों में निर्वेद आदि सम्भोग श्रृंगार में व्यभिचारिभाव नहीं होने से उन्हें शृङ्गार में व्यभिचारिभाव कैसे निद्दिष्ट • किया गया ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विप्रलम्भशृङ्गार में उनका प्रयोग किया जाता है । यही बात आगे ' विप्रलम्भकृत ' इत्यादि से भरतमुनि ने कही हैं यहाँ ' तु ' शब्द सम्भोग की अपेक्षा विप्रलम्भ के विशिष्ट प्रकार की सूचना दे रहा है । और वह भेद यह है कि निर्वेदादि व्यभिचारि-भावों की विप्रलम्भ के प्रतिपादक वाक्य के साथ एकवाक्यता होने से विप्र-लम्भ से सम्बन्ध दुःखप्रधान निर्वेदादि को और श्रृंगार में वर्जित आलस्य की अवस्था को छोड़कर अन्य सभी सुख प्रधान धृति आदि व्यभिचारियों के द्वारा सम्भोग शृङ्गार का प्रदर्शन होता है । सम्भोग तथा विप्रलम्भ श्रृंगार में एक का दूसरे पर अंशतः आश्रित रहना अपरिहार्य है । इसी बात को सूचित करने के मूल ' में ' अस्य ' पद का अस्पष्ट प्रयोग किया गया है ।
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३०८ नाट्यशास्त्रम् भवन का उपभोग, उद्यानगमन विहरण तथा अनुभव करने, ( प्रिय जन के दर्शन, श्रवण तथा क्रीड़ा लीला आदि ( विभावों के संयोग ) से उद्भूत होता है । इसका अभिनय ( रंगमंच पर प्रस्तुतीकरण ) नयन-चातुर्य, भ्रूविक्षेप, कटाक्ष संचार, मधुर तथा ललित अंगों के परिचालन, मधुर शब्दों तथा ऐसी ही अन्य वस्तु के द्वारा किया जाता है । इसमें शृङ्गार रस के अन्तर्गत इन दोनों प्रकारों का आस्वादन मिश्रित हो जाता है जिसे ( मिश्रित रसास्वाद को ) कालिदास ने रघुवंश में श्रीराम के अपने कर्म और पूर्वावस्था के वर्णन को करते हुए प्रस्तुत किया है । [ आशय यह है कि रघुवंश के त्रयोदशसर्ग में विमान से लौटते हुए श्रीराम ने गत जीवन की विविध दशाओं और प्रदेशों को श्रीसीता को बतलाते हुए जो वर्णन किये हैं उनमें सम्भोग तथा विप्रलम्भ शृङ्गार की व्यामिश्र प्रतीति होती है ] । और निद्रा के अन्तर्गत होने पर स्वप्न को मिश्रित प्रतीति करवाने के कारण प्रधान होने से व्यभिचारिभावों में पृथक् स्वरूप में स्वीकृत किया है । जैसे ' क्व नीलकण्ठ व्रजसी ' ( कु ० सं ० ५:५४ ) [ हे नीलकण्ठ, तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रहे हो? ] इसमें तथा " सिवणवए " इत्यादि में और ' आहृतोऽपि सहायः ' इत्यादि उदाहरणों में सम्भोग तथा विप्रलम्भ की मिश्रित प्रतीति ही प्राणस्वरूप है । सम्भोग दशा में विभावादि के समीप होने के कारण और के अभाव रूप होने से ' विबोध ' भी व्यभिचारिभाव है । सम्भोग श्रृंगार में सुरतश्रम के कारण यद्यपि निद्रा आदि उत्पन्न होती है पर उससे रति में कोई वैचित्र्य की स्थिति निर्माण नहीं होती अतः सम्भोग में इसे अनुभाव नहीं माना जा सकता है परन्तु विप्रलम्भ शृंगार में निद्रा के आधिक्य से रति भावना विशिष्ट होने से उसे अनुभाव माना गया है । काव्य या नाटक में उन्माद, अपस्मार और व्याधि का अत्यन्त कुत्सित अवस्था में प्रयोग नहीं दिखलाना चाहिए । प्राचीन आचार्यों का मत है कि इनकी कुत्सित दशा ( मृत्यु के ) सम्भव होने पर भी प्रदर्शित न की जाए । आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार जीवन की इस कुत्सित अवस्था में जहाँ जीवन निन्दनीय हो जाता है — रति की अवस्था का ही विच्छेद हो जाता है । क्योंकि इसका देह द्वारा उपभोग ही सार होता है और कुत्सित दशा के
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३० ९ त्रास, आलस्य, उग्रता तथा जुगुप्सा नामक संचारी भावों को छोड़कर शेष सभी प्रयुक्त किए जाते हैं । शृंगार के विप्रलम्भ ( नामक भेद ) का अ निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, श्रम, चिन्ता, औत्सुक्य, निद्रा, स्वप्न, बिब्बोक, व्याधि, उन्माद, अपस्मार, जाड्य तथा मरण [ मोह ] आदि संचारी भावों द्वारा किया जाता है । प्रदर्शन करने पर शृङ्गार का क्षेत्र ही समाप्त हो जाता है । अतः मरण संचारी का वर्णन इष्ट भी हो तो सम्भावना मात्र का या जिसमें शीघ्र पुन-मिलन हो जाए ऐसे मरण का वर्णन करना चाहिए जिससे शोक की दशा को उत्पन्न होने का अवसर न मिले ( अन्यथा करुण रस की अवतारणा हो जाएगी ) । अन्य व्याख्याकारों का इस विषय में यह मत है कि मरण ( व्यभिचारि-भाव ) से जीवन की समाप्ति अभिप्रेत नहीं है, किन्तु इससे प्राणत्याग कर्तृत्व रूप चैतन्यावस्था का ही ग्रहण इष्ट है । यह भावदशा सम्बन्ध तथा अवसर के अनुसार व्यभिचारिभाव के रूप में समझना चाहिए [ अर्थात् विप्रलम्भदशा में प्राणत्याग के लिये उद्यत होने के वर्णन में ' मरण ' संचारी का विनियोजन हो सकता है ] जिसके उदाहरण काव्यादि में अनेक मिल सकते हैं । आदि शब्द से भरतमुनि ने दैन्य, मोह आदि का समाहार किया है । ये व्यभिचारिभाव अपने अनुभावों के द्वारा अनुभूत होकर विप्रलम्भ की प्रतीति करवाते हैं । इसीलिये मुनि ने ( यहाँ ) ' अनुभावः ' पद का प्रयोग किया है । अन्य आचार्य आदि शब्द को करुणावाचक मानकर विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अनुभावों को प्रधानरूप से प्रस्तुत करने का समर्थन करते हैं तो अन्य पक्ष के आचार्य आदि शब्द को ' एकशेष ' मानकर दोनों पक्षों को मान्य करते हैं । विप्रलम्भ में आशा के दूरगामी होने पर छलना स्वीकार्य रहती है पर सम्भोग शृङ्गार में उपचार से उसका विरहात्मक फल ग्रहण किया जाता है । क्योंकि रतिदशा में प्रेमी - प्रेमिका परस्पर प्रवंचना नहीं करते, इसी कारण शृङ्गार में विरह के द्वारा सौन्दर्य को बतलाते हुए भरतमुनि ने यह सूचित किया है कि बिना विरह के श्रृंगाररस का प्रयोग न काव्य में और न नाटक में हृदयग्राही हो सकता है । इसीलिये सम्भोग शृङ्गार के अन्तर्गत मीठे स्वाद की निरन्तर एकरसता के परिहारार्थ गोत्रस्खलन आदि से उत्पन्न ईर्ष्या या अन्य कारणों से उत्पन्न ( विप्रलम्भ के कारण भूत ) कलह के द्वारा विषम दशा
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३१० नाट्यशास्त्रम् अत्राह - यद्येवं रतिप्रभवः शृङ्गारः, कथमस्य करुणाश्रयिणो भावा भवन्ति? अत्रोच्यते- पूर्वमेवाभिद्दितं सम्भोगविप्रलम्भकृतः शृङ्गार इति । वैशिकशास्त्रकारैश्व ' दशावस्थोऽभिहितः । ताच सामान्याभिनये वक्ष्यामः । यहाँ ' प्रश्न हो सकता है कि यदि शृङ्गार रति ( भाव ) से उद्भूत है की कविगण सृष्टि करते हैं ( जिससे एकरसता के कारण वैरस्य का परिहार होता है और चमत्कार बना रहता है ) क्योंकि वात्स्यायन ने ' काम को विपरीतकारी ' ( का ० सू ० २।७।१ ) कहा है और भरतमुनि ने भी ' यद्वामा-भिनवेशित्व ' ( ना ० शा ० २४।२०७ ) कहकर अपनी वात्स्यायन से सहमति दिखलायी है । व्यभिचारिभाव अस्थिर होते हैं और बिजली के चमकने और विलुप्त होने के समान हैं और ये स्थायीभाव रूपी सूत्र की निरन्तरता में प्रकट और लुप्त होकर सौन्दर्याभिवृद्धि करते हैं । यद्यपि स्थायीभाव भी स्थिर नहीं होते फिर भी संस्काररूप से तथा धारावाही सजातीय प्रवाह रूप से स्थिर माने जाते हैं परन्तु व्यभिचारिभाव इस रूप में कुछ देर तक भी स्थिर नहीं रहते और वे अपने संस्कारों को स्थायीभाव के संस्कार में लीन कर उसी को पुष्ट करते हैं । यहाँ इसी रूप में इनका निरूपण किया है । १. सम्भोग तथा विप्रलम्भ शृङ्गार के प्रतिपादक पूर्वोक्त वाक्यों की एकवाक्यता से दोनों दशाओं में वर्तमान शृङ्गार का जो स्वरूप बतलाया गया उसे और स्पष्ट करने के लिये भरतमुनि ' अत्राह ' इत्यादि से पूर्वपक्ष उद्भावित करते हैं । ( करुणरसे आश्रयणं विद्यते येषां भूम्ना इति ) करुण रस में जिनका अधिकतर आश्रय रहता है ऐसा ' करुणाश्रयिण ' पद का विग्रह करना चाहिए । पूर्वपक्षी के द्वारा अप्रामाण्य की आशंका के परिहारार्थं मुनि ' वंशिक * इत्यादि से काम शास्त्रकारों का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । वैशिक शब्द का विग्रह है! " वेशः वेश्यावर्गः करणं प्रयोजनं वास्य शास्त्रस्य तत् वैशिकं काम-शास्त्रम् " ( अर्थात् वेश शब्द का अर्थ है वेश्यावर्ग और कारण का अर्थ है ११. वैशिक शास्त्र: - ग ० २. ताश्वावस्थाः - ग ० ।
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३११ तो फिर इसके करुण रसाश्रित ( निर्वेद, ग्लानि आदि ) सञ्चारी भाव क्यों माने गये? ( उत्तर ) पहिले ही बतलाया जा चुका है कि श्रृंगार के संयोग तथा विप्रलम्भ दो भेद होते है । वैशिक ( वात्स्यायन आदि काम ) शास्त्रकारों ने इन विप्रलम्भ की दस अवस्थाएँ बतलाई हैं जिन्हें हम सामान्याभिनय-निरूपण के अवसर पर ( ना ०, शा ० अ ० २४ में ) बतलाएँगे सम्भोगात्मक प्रयोजन । यह जिस शास्त्र में हो उसे वैशिक या कामशास्त्रः कहते हैं ) इन कामशास्त्रकारों ने ( भी शृङ्गाररस को अभिलाष से लेकर मरण पर्यन्त दस अवस्थाओं वाला बतलाया है । वैशिक का विस्तृत विवरण ना ० शा ० अध्याय २५ में स्वयं भरत ने किया है ] । अवस्यापद से विप्रलम्भ के अलग - अलग प्रकारों का निराकरण किया गया है । अतएव चिन्ता आदि को रतिस्थायी के व्यभिचारिभाव माना गया हूँ और ' च ' के प्रयोग से इस बात का संकेत दिया है कि नायक - नायिका मिलन की आस्था से युक्त होकर रतिस्थायी के अन्तर्गत विप्रलम्भशृंगार की अंगभूत दस अवस्थाओं का अनुभव करते हैं । करुण और विप्रलम्भशृङ्गार ( दोनों ) में एक ही प्रकार के ( समान ) व्यभिचारिभावों का प्रयोग होने पर करुण का विप्रलम्भ से भेद कैसे स्पष्ट होगा इस आशंका के परिहारार्थ ' करुणस्तु ' इत्यादि से भरतमुनि कहते हैं । 18 अधम प्रकृति के स्त्री - पुरुषों में स्थायीभाव की स्थिति नहीं होने से विप्र-लम्भशृङ्गार नहीं होता और आलम्बन आदि विभावसामग्री के न होने पर भी रत्यादि स्थायीभाव की स्थिति नहीं होती ( अत एव ) अधम पुरुष का अपनी ( प्रेयसी या ) स्त्री के साथ स्थायी सम्बन्ध न रहने से वियोगावस्था में रतिस्थायी भी नहीं रहता अतः विप्रलम्भ शृंगार नहीं होता किन्तु उनमें शोक स्थायी भाव वाला करुणरस हो सकता है ( अतः करुणरस विप्रलम्भ से भिन्न है ) । पर उत्तरप्रकृति के स्त्री - पुरुषों में रति के विपरीत शोक स्थायी भाव करुणरस में होता है अतः करुण का विप्रलम्भ से भेद करने के लिये मूल में ' निरपेक्षभाव: ' विशेषण दिया है । इसका आशय यह है कि बन्धुजन आदि के विषय में ( विप्रलम्भ शृङ्गार में ) रति ( स्थायी ) होने पर अपेक्षा ( आशा ) बनी रहती है अतः वह सापेक्ष है, परन्तु करुण में प्रिय की मृत्यु हो जाने से