भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 441–450
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 441–450
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३३२ नाट्यशास्त्रम् करुण तथा श्रृंगार रस के पारस्परिक विभेद करुणस्तु ' शापक्लेशविनिपतितेष्टजनविभवनाशवबन्ध समुत्थो निरपेक्षभावः औत्सुक्यचिन्तासमुत्थः सापेक्षभावो विप्रलम्भकृतः । एवमन्यः करुणोऽन्यञ्च विप्रलम्भ इति । एवमेव सर्वभावसंयुक्तः शृङ्गारो भवति । आशा के न रहने से उसे ' निरपेक्ष भावः ' कहा है । आशा का उल्लेख महाकवि कालिदास ने भी मेघदूत में किया है । यथा- ' आशाबन्धः कुसुमसदृशः प्रायशो ह्यङ्गनानाम् ' इत्यादि ( मे ० पू ० । १० ) ( अर्थात् स्त्रियों का आशा बन्धन सूत्र प्रायः कुसुम के समान कोमल होता है । ) सापेक्षभाव से रहित अर्थात् निरपेक्षभाव रूप करुण रस होता है । इस निरपेक्षभाव की उत्पत्ति शाप के कष्ट में पड़े हुए या बन्धन आदि से होती है । उत्तम प्रकृति के अवस्था प्राप्त करने पर उसके प्रतीकार का कोई लिये वह केवल शोकोदय का ही कारण बनता है को गयी है; क्योंकि प्रतीकार की सम्भावना या क्रोध का विभाव बन कर बीर या रौद्ररस सकता था । प्रियजन के विभवनाश, वध व्यक्तियों के द्वारा शाप की मार्ग नहीं रहता अतः उनके यह बात भी इसी से सूचित बनी रहने पर वह उत्साह की उत्पत्ति का कारण हो और विक्रमोर्वशीय में करुण की अपेक्षा विप्रलम्भ की अवस्था को रखने के लिये उर्वशी में शापवश स्वर्ग चले जाने पर भी पुरूरवा के शोक को हटाने के लिये कालिदास ने उर्वशी को शाप प्राप्ति का पुरूरवा को पता न लगने ( पाए इस प्रकार ) का उल्लेख किया है । इस प्रकार करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार के विभावों तथा स्थायीभावों में अन्तर स्पष्ट है और करुणरस में जो निर्वेदादि व्यभिचारिभाव होते हैं वे रतिभाव से असम्बद्ध निरपेक्ष शोकस्वरूप होने से भिन्न हैं । इसलिये भी यहाँ ' करुण ' को ' निरपेक्षभावः ' कहा गया है । ( इस प्रकार प्रस्तुत प्रसंग में ) करुण रस के स्वरूप को कहने के उपरान्त विप्रलम्भ में उसका अन्तर स्पष्ट करने के लिए ' औत्सुक्यचिन्ता ' इत्यादि के १. विनिपातनेष्टजन विप्रयोग ग ० । २. बन्धनसमुत्थो - ग ० ।
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३१३ करुण रस में शाप तथा क्लेश में पड़ने से वियुक्त प्रिय या इष्ट व्यक्ति के रहने, विभव नाश, वध तथा बन्धन ( के समान रूप में दोनों में ) प्राप्त होने पर भी वह रति से निरपेक्ष रहता है और विप्रलम्भ श्रृंगार में ( ये ही ) औत्सुक्य तथा चिन्ता से उत्पन्न होकर, रति से सापेक्ष भाव रखते हुए स्थित रखते हैं । इसी कारण विप्रलम्भ रस और करुण रस एक दूसरे से पार्थक्य रहते हैं । यह शृङ्गार रस सभी ( कथित ) अनुभावों, भावों ( आदि ) से युक्त होता है । अपि च-1738
सुखप्रायेष्टसम्पन्न ऋतुमाल्यादिसेवकः ।
पुरुषः प्रमदायुक्तः शृङ्गार इति संज्ञितः ॥ ४७ ॥
कहा भी है कि- शृङ्गार तभी कहलाता है जब वह सुख - बहुल प्रियजनों से युक्त हो, ऋतु तथा माल्यादि उद्दीपक पदार्थों के द्वारा मनो-द्वारा उसकी योजना करते हैं । यहाँ ' चिन्ता ' शब्द निर्वेदादि समस्त व्यभि चारिभावों का उपलक्षण है । औत्सुक्यप्रधान चिन्ता आदि व्यभिचारिभावों से विप्रलम्भ की उत्पत्ति होती है । अतः औत्सुक्य तथा चिन्ता के कारण विप्र-लम्भ शृङ्गार में रतिभाव सापेक्ष होता है और वह सापेक्षता रतिभाव से रहती है इसी कारण सम्भोग तथा विप्रलम्भ श्रृंगार के विभाव तथा स्थायी-भाव समान होते हैं । औत्सुक्य का अर्थ होता है विषय के प्रति उन्मुख होना और यह विषय ( आलम्बन ) के नष्ट हो जाने पर नहीं रह सकती है ( क्योंकि आलम्बन के नाश के साथ विप्रलम्भ शृङ्गार की स्थिति कैसे रह सकेगी! ) अतएव समस्त भावों से युक्त शृङ्गाररस एक ही होता है । इस प्रकार परीक्षा करके उसके फल का यहाँ उपसंहार किया गया है । इस प्रकार परीक्षा के पश्चात् सूत्रार्थ की स्थापना कर लेने पर विवरण रूप से तथा सूत्रार्थ के विस्तृत पाठ रूप होने से ' अपि च ' इत्यादि से ' कारिका ' को दिया जा रहा है । यह कारिका केवल सूत्रार्थ कथन रूप ही नहीं है अपि तु परीक्षा स्वरूपा भी है यही ' अपि च ' के चकार का सांकेतित अर्थ है । सुखप्रायेष्ठेति: - यहाँ पुरुष शब्द से अनुभव करने वाले भोक्ता का ग्रहण
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३१४ नाट्यशास्त्रम् रंजन किया जाता हो तथा ( जिसमें ) नायिका और नायक का योग ( मिलन ) हो ॥ ४७ ॥
होता है और भोक्ता ही स्थायीभाव का संवित् स्वरूप है ( अर्थात् यही स्थायी-भाव का आस्वादनकर्त्ता या अनुभावक है ) रतिरूप पुरुष के व्यभिचारिभाव. योग्य होते हैं अतएव रतिरूप ही ' पुरुष ' हैं । उपनिषद् पुरुष को ' श्रद्धामयोऽयं पुरुष: ' इत्यादि से श्रद्धामय कहते ( भी ) हैं तो उसी प्रकार स्त्री भी यहाँ रति रूपिणी है । भोक्तृत्व में पुरुष की प्रधानता होती है तथा स्त्री भोग्या होती है । प्रधान होने से पुरुष भोग्या ( स्त्री ) के अधीन नहीं होता । अतएव नायक के साथ अन्य नायिकाओं के सम्बन्ध होने पर भी शृङ्गाररस की हानि नहीं होती । इसके विपरीत भोग्य होने से नायिका परतन्त्र मानी जाती है और उसके पुरुषान्तर से सम्बन्ध होने पर शृङ्गाररस की हानि हो जाती है । प्रस्तुत कारिका में ' सुखप्रायेष्ट ' इत्यादि पुरुष के विशेषण रूप से इष्ट होने से सभी के मेल - जोल से शृंगार का विभावत्व दिखलाया गया है और रसोदय और उसके आस्वादन के द्वारा ( विभावादि भोक्ता में अन्तर्भूत हो जाते है; इससे ) भोक्ता की प्रधानता को भी सूचित किया गया है । आवश्यक सामग्री की समग्रता या पूर्णता के निश्चय होने पर ही रति-भाव का उपचय ( विस्तार ) होता है । रत्नावली नाटिका में जब नायिका ( सागरिका ) को यह ज्ञात होता है कि ' उसके पिता ने उसे उदयन को सम-र्पित कर दिया था ' तभी सामग्री की सर्वसम्पन्नता प्रतिपादित होती है तथा ' इस प्रकार कर्णपूर के दर्शन से ' इत्यादि से उसकी कुलीनता भी प्रतिपादित होती है । इन सभी से वहाँ नायिका का सर्वसम्पन्नत्व दिखलाया गया अन्यथा उसकी रति उत्तम नहीं होती । क्योंकि जाति तथा सम्पत्ति की समानता के अभाव में असदृश रति का उचित विकास नहीं होता और सहृदयों के मन में ( रस ) प्रतीति के सम्बन्ध में विरसता उत्पन्न होने लगती है । जो श्रीशंकुक आदि विषय सामग्री की ही पूर्णता को रस मानते हैं उनकी भ्रान्ति का आधार यही कारिका है परन्तु उपर्युक्त पद्धति से व्याख्या करने
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३१५ अपि चात्र सूत्रानुविद्धे ' आयें भवतः -ऋतुमाल्यालङ्कारैः प्रियजनगान्धर्व काव्य सेवाभिः । उपवनगमनविद्दारैः शृङ्गाररसः समुद्भवति ॥ ४८ ॥
नयनवदनप्रसादैः स्मितमधुरवचोधृतिप्रमोदैश्च ।
मधुरैश्चाङ्गविहारैस्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ ४ ९ ॥
[ इति शृङ्गाररसप्रकरणम् ॥ ] इसी विषय को बतलाने वाली सूत्र - भूता दो आर्याएँ भी हैं-अनुकूल ऋतु, पुष्पमाला ( आदि ) के सेवन, अलंकारों के धारण, प्रियजन सहकार, गायन, काव्य श्रवण, सेवा तथा उद्यान में विनोद विहार आदि के द्वारा शृङ्गार रस उद्भूत होता है । इसका अभिनय आँखों पर यह भ्रान्ति नहीं होगी । कारिका में ' संज्ञितः ' शब्द से शृंगार शब्द की अन्वर्यता का निराकरण किया गया है, क्योंकि शृङ्गार शब्द केवल रूढ़ है ( यह बतला चुके हैं ) ' अपि च ' इस भिन्न क्रमवाले पद का आशय यह है कि ऐसा यह केवल श्लोक का ही अर्थ नहीं किन्तु इस विषय में सूत्रार्थ का समर्थन करने वाली दो आर्याओं का भी है । ऋतुमाल्या- यहाँ मूलकारिका में ' प्रियजन ' का अर्थ विदूषक आदि है; गान्धर्वशब्द का अर्थ है संगीत आदि मनोहर विषयों का प्रयोग तथा ' काव्य-सेवा ' शब्द से विभाव के अर्थ में विषय के सङ्कल्प या स्वरूप को सूचित किया गया है । और जो यह कहते हैं कि ' काव्य के अन्तर्गत निहित रस काव्यार्थं को ग्रहण करने वाले सहृदय के चित्त में भिन्नभाव स्तर पर गृहीत होता है । और इसीलिये सुखात्मक या सुखजनक होने से काव्यार्थ रसरूप है ' इसका खण्डन ( हमारे विवेचन ) से हो गया है । दूसरी कारिका में ' धृति ' तथा ' प्रमोद ' शब्दों से व्यभिचारिभावों की सूचना दी गयी है । तथा इस प्रकार श्रृंगार की दो अवस्थाओं से एक ही
शृङ्गाररस होता है इस तथ्य का उपसंहार ( भी ) किया गया है ।
॥ इति श्रृंगाररस प्रकरणम् ॥
१. सूत्रानुबन्धे - क; सूत्रार्थानुविद्धे – क ( अ ); चात्रानुविद्धे - ख
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३१६ नाट्यशास्त्रम् के विस्फारित करने, मुख की प्रसन्नता, मधुर एवं सस्मित वचनों, धैर्य, आमोद तथा ललित अङ्ग परिचालन ( आदि ) के द्वारा किया जाना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥ हास्य ( अथ हास्यरसप्रकरणम् ) अथ हास्यो नाम हासस्थायिभावात्मकः । स च विकृतपरवे-बालङ्कारधा लौल्यकुहका ' सत्प्रलापव्यङ्गयदर्शन दोषोदाहरणादिभि-विभावैरुत्पद्यते । तस्योष्ठनासाक पोल स्पन्दनदृष्टिव्या कोशा कुञ्चन स्वेदा-स्यरागपाश्र्व ग्रहणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । व्यभिचारिण-श्वास्यावहित्थालस्य तन्द्रानिद्रास्वप्नप्रबोधासूयादयः । द्विविधश्चाय-मात्मस्थः परस्थश्च । यदा स्वयं इसति तदात्मस्थः । यदा तु परं हासयति तदा परस्थः ॥ ( गद्य भाग ) हास्य - रस ' का स्वरूप ' हास ' नाम स्थायी भाव वाला १. हास्यरस का लक्षण करने के लिये ' अथ ' इत्यादि से आरंभ करते हैं । मूललक्षण में दिये गये ' आत्म ' शब्द से हास्यरस को ' तदात्मकः ' माना गया है; इसका अभिप्राय यह है कि श्रृंगाररस के निरूपण में आचार्य भरत ने ( उसके ) लक्षण में तो ' रति प्रभवः ' कहा और ' हास्य के लक्षण में ' हास-स्थायिभावात्मकः ' बतलाया । रसों के लक्षणों में ये अन्तर क्यों रखे गए? इस आशंका के उत्तर में आचार्य - अभिनवगुप्त पाद ने बताया कि शृंगार तथा करुणरस के लक्षण में जो आचार्य में ' रतिप्रभवः ' तथा ' शोकप्रभवः ' कहा है इसका कारण है हास्यादि रसों के स्थायीभाव सजातीय हास्यात्मक प्रतीति को उत्पन्न करते हैं जब कि श्रृंगार तथा करुण के स्थायीभाव सजातीय प्रतीति को उत्पन्न नहीं करते । श्रृंगार के रति स्थायीभाव से होने वाली प्रतीति रति रूप में न होकर सुखात्मक होती है तथा करुण रस के स्थायी १. कलहासत्प्रलाप ग ० । २. समुत्पद्यते - ग ० । ३. तस्योष्टदशननासा - ग ० । ४. यदापरं ग ० ।
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३१७ होता है । यह अन्य व्यक्ति के विकृत वेष अलंकार, ठिढाई, चंचलता, कुहक ( कोख तथा गले को छूकर हंसाने ), व्यर्थ वकवास, हीन अवयवों के दर्शन, दोषों के ( हीनता या अन्य ऐसे ही दुर्गुणों के ) देखने तथा इसी प्रकार की अन्य बातों वाले विभावों के द्वारा उत्पन्न ( व्यंजित ) शोक से होने वाली प्रतीति शोकात्मक न होकर दुःखात्मक होती है । इस प्रकार रति तथा शोक स्थायी से विजातीय प्रतीति उत्पन्न होने से वे ' स्थायी-भाव - प्रभव ' कहे गए । पर शेष हास आदि स्थायीभाव सजातीय प्रतीति के उत्पादक ( मात्र ) होने से ' स्थायीभावात्मक ' बतलाए गए यही भेद का एक कारण है, और दूसरा कारण है विभावादिकों का साधारण और असाधारण होना । शृङ्गार तथा करुण के विभाव असाधारण होते हैं जबकि हास्यादि रसों के विभावादि लोकसाधारण होते हैं । यह भी स्थायीभाव प्रभव तथा स्थायीभावात्मक के भेद का दूसरा कारण है । इनमें वेष का अर्थ केशरचना आदि है । अलङ्कार से बाजूबन्द आदि का ग्रहण करना चाहिए । ये दोनों ( वेष और अलङ्कार ) विकृत अर्थात् देश काल, प्रकृति, आयु तथा अवस्था के विपरीत होने पर हास्यरस के विभाव हो जाते हैं । सभी रसों में प्रयुक्त विभाव हास्यरस के विभाव हो सकते हैं अतः समस्त रसों का हास्य में अन्तर्भाव हो सकता है [ यह बात दिखलाई भी गयी है ] । विदूषक हास्यजनक वेष के द्वारा हास्यात्मक ( १ ) ही प्रदर्शित करता है । पर वेष शब्द में ' पर ' शब्द ' दूसरे से सम्बन्ध रखने वाले ' अर्थ को बतलाता है । इस प्रकार देवदत्त आदि अन्य व्यक्तियों के वेष या अलङ्कार को धारण कर उद्धट्टक ( अङ्गहार ) आदि से भाण्डों के द्वारा जो उसका नृत्य प्रदर्शन होता है वह हास्य उत्पन्न करता है । वेष और अलङ्कार शब्द दूसरे की गति ( चलने-फिरने ) तथा बोल - चाल आदि के भी उपलक्षण है । घाष्टर्य का अर्थ है निर्ल-ज्जता । विषयों में अनियमिता लौल्य ( लोलुपता होती ) है । बालकों के लिये उनकी आँख या गर्दन को गुदगुदाना ' कुहक ' है । व्यंग का अर्थ अंगहीनता या नकटापन है । दोष का अर्थ है जो जैसी प्रकृति का नहीं है उसे वैसे प्रदर्शन में लेना जैसे कोई डरपोक प्रकृति का न हो तो उसे डरपोक दिखलाना या उसके अनुचित कार्यों को प्रदर्शित करना । ये सभी दोष हैं । अथवा जिन
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३१८ नाट्यशास्त्रम् होता है । इसका अभिनय ओठ, ' नाक तथा गले के फड़काने, दृष्टि को सिकुड़ाने या फैलाने, स्वेद, मुंह के लाल होने तथा बगली झांकने आदि अनुभावों के द्वारा किया जाय । इसमें रहने वाले संचारी भाव हैं - आलस्य, अवहित्था, तन्द्रा, निद्रा, स्वप्न, प्रबोध तथा असूया ( आदि ) । यह ( हास्य ) दो प्रकार का होता है - आत्मस्थ तथा परस्थ । जब मनुष्य स्वयं हंसने लगे तो आत्मस्थ तथा दूसरों को हंसावे तो परस्थ होता है । अनुचित कार्यों का मुनि ने निषेध किया उनका उल्लेख या कथन करना दोष है । आदि शब्द से उन दोषों का मङ्कल्प या स्मृति करना लिया जाता है । १. मूल के ' ओष्ठनासा ' आदि शब्दों का ' स्पन्दन ' शब्द से सम्बन्ध है । ' व्याकोशन ' शब्द का अर्थ है आँखों का खोलना तथा बन्द करना तथा ' आकु-वन ' का अर्थ आँखों को थोड़ा बन्द करना है । इनकी दृष्टि के साथ योजना होती है । ' आस्यराग ' का अर्थ है मुख की लालिमा । पार्श्वों के पीड़न का अर्थ है उनको पकड़ना या दबाना ' तन्द्रा ' शब्द का अर्थ है मोह ( मूर्च्छा ) । ये विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभाव स्मित आदि आगे कहे जाने वाले प्रकारों के साथ उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति से यथायोग्य सम्बद्ध किये जाते हैं २. हास्यरस के दो प्रकार हैं । अपने में स्थित विकृत वेष आदि विभावों से जब विदूषक ( आदि पात्र ) स्वयं हँसता हो तो वह आत्मस्थ हास्य होता है और यदि वह महारानी आदि अन्य पात्र को हंसाता है तो वह परस्य हास्य हो जाता है ऐसा श्रीशंकुक आदि प्राचीन आचार्यों ने माना है पर यह ग्राह्य नहीं है क्योंकि ऐसा मानने पर विभावों का आत्मस्थ तथा परस्थ विभाग होता है हास्यरस का नहीं । और स्वामी का शोक परिजनों में भी शोक उत्पन्न करता है तो इस प्रकार शोक के प्रसङ्ग में [ करुणादिरस में ] भी परस्थता मानी जानी चाहिए । और यदि महादेवी आदि अन्य व्यक्ति में व्यक्त होने वाला हास्य परस्थ माना जाए तो गम्भीर प्रकृति के स्वामी में सेवकों के अनुभावों से उत्पन्न होने वाला क्रोध [ रौद्ररस ] भी परस्थ होने लगेगा । अतः आत्मस्थ और परस्थ की यह व्याख्या दोषपूर्ण है । तथा स्वयं जिसमें विभाव हो वह हास्य आत्मस्थ तथा दूसरा जिसमें विभाव हो वह परस्थ होता है यह व्याख्या भी ठीक नहीं है । क्योंकि दूसरे का हास्य भी
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योऽध्यायः ३३ ९ अत्रानुवंश्ये आयें भवतः -विपरीतालङ्कारैर्विकृताचाराभिधानवेषैश्च । ' विकृतैरङ्गविकारैर्ह सतीति रसः स्मृतो हास्यः विकृताचारैर्वाक्यैरङ्गविकारैश्च विकृतवेषैश्च हासयति जनं यस्मात्तस्माज्ज्ञेयो रसो हास्यः H.FA इस विषय में दो आनुवंशी आर्यायें हैं: -॥ ५० ॥
।
॥ ५१ ॥
विपरीत स्थान पर अलंकारों के धारण करने; विकृत व्यवहार, वाक्य तथा वेष के प्रदर्शन करने और विकृत अङ्गों ( विकारों तथा ) चेष्टाओं आदि के द्वारा हंसाने पर ' हास्य ' कहलाता है ॥ ५० ॥
क्योंकि यह अपने विकृत व्यवहार, वाक्य अंगों की क्रियाओं एवं चिकृत वेष ( आदि ) के द्वारा मनुष्यों को हंसाता है अतएव इसे ' हास्य ' कहते हैं ॥ ५१ ॥
स्त्रीनीच प्रकृतावेष भूयिष्ठं दृश्यते रसः ।
षड्भेदाश्चास्य विज्ञेयास्तांश्च वक्ष्याम्यहं पुनः ॥ ५२ ॥
यह रस ( अधिकांश में ) स्त्री तथा नीच प्रकृति मनुष्यों में अधिक दिखाई देता है । इसके छः प्रकार होते हैं जिन्हें अब मैं बतलाता हूँ ॥ ५२ ॥
( उस ) आत्मस्थ हास्य में विभाव होता है और [ ऐसा यदि आत्मस्थ और परस्थ का विभाजन करें तो ] रति आदि सभी स्थायी भावों में यह संभव हो सकता है । अतएव यहाँ दो विभागों का आशय यह है कि स्वयं विभावों को न देखने पर भी दूसरे को हंसते देखकर लोग हँसने लगते हैं ऐसा लोक व्यवहार में दृष्टिगत होता है और गम्भीर प्रकृति होने के कारण विभावादि से भी जो नहीं हँसते वे भी दूसरों को हँसता देखकर थोड़ा मुसकुरा ही देते हैं, क्योंकि मनुष्यों का ऐसा स्वभाव दृष्टिगत होता है । जैसे खट्ट े - अनार ( नीबू या इमली ) १. विकृत रर्थ विशेष - ग ० । २. विकृताकार - ग ० ।
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३२० नाट्यशास्त्रम्
हास्य - भेद-स्मितमथ हसितं विहसितमुपहसितं चापहसितमतिहसितम् ।
द्वौ द्वौ भेदौ स्यातामुत्तममध्याधमप्रकृतौ ॥ ५३ ॥
हास्य के छः भेद हैं- ( १ ) स्मित, ( २ ) हसित, ( ३ ) विहसित, ( ४ ) उपहसित, ( ५ ) अपहसित तथा ( ६ ) अतिहासित । ये प्रत्येक दो ( दो ) प्रकार के होकर उत्तम, मध्यम तथा अधमप्रकृति के व्यक्तियों में प्रयुक्त किये जाते हैं ॥ ५३ ॥
तत्र-स्मितहसिते ज्येष्ठानां मध्यानां विहसितोपहसिते च ।
अधमानामहसितं ह्यतिहसितं चापि विज्ञेयम् ॥ ५४ ॥
का स्वरूप ही ऐमा संक्रमणशील है कि उसके देखने मात्र से दर्शक के मुँह में पानी आ जाता है इसी प्रकार हास भी सङ्क्रमणशील है जो सूखी लकड़ी में अग्नि के समान शीघ्र अन्यों में फैल जाता है । अतएव स्वगतरूप हास्य आत्म-स्य और अन्यत्रसङ्क्रान्त रूप हास्य परस्थ होता है यही समझना चाहिए । स्मितमथ हसितम् —ये हास्य के छः भेद हैं जो उत्तम, मध्यम तथा अधम के दो - दो क्रम में रखे गये हैं । ये दो - दो के क्रम विभावादि के तारतम्य के कारण न्यूनाधिक होते रहते हैं ऐसा कुछ आचार्य मानते हैं पर यह उचित नहीं क्योंकि इस प्रकार तो विभाव के तारतम्य के आधार पर अनेक भेद बनाए जा सकते हैं । अतएव ये भेद सङ्क्रमण के अभिप्राय से ही यहाँ मानना चाहिए । उत्तम प्रकृति के व्यक्ति में जो ' स्मित ' है वही व्यापक होने पर ' हसित ' हो जाएगा । इसी प्रकार शेष द्विकों को भी समझना चाहिए । और इसी कारण हास की तीन अवस्थाएं कही जाएगी अन्यथा छः प्रकार का हास्य हो जाता है । हास को मन्दता होने पर ' स्मित ', उसके बढ़ जाने पर ' हसित ', इसके बाद आगे बढ़ा हुआ ' विहसित ' और उसमें भी आगे बढ़कर दूसरों के समीपगत हो ' उपहसित ' हो जाता है; और ऐसे ही ' उपहसित ' तथा ' अति-हसित ' प्रकार भी हो जाते हैं । इस प्रकार यहाँ उपसर्गों के मेल या माध्यम से सूक्ष्म अन्तर करते हुए भेदों की व्यवस्थित कल्पना की गयी है । १. तथा ति हसितश्व ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः ३२१ उत्तम प्रकृति के मनुष्यों में स्मित तथा हसित, मध्यजन में विह-सित तथा उपहसित एवं अधमप्रकृति में अपहसित तथा अतिहासित प्रयुक्त किये जाते हैं ॥ ५४ ॥
अत्र श्लोकाः-' ईषविकसितैर्गण्डैः कटाक्षैः सौष्ठवान्वितैः ।
अलक्षितद्विजं धीरमुत्तमानां स्मितं भवेत् ॥ ५५ ॥
उत्फुल्लाननने गण्डैर्विकसितैरथ ।
किञ्चिलक्षितदन्तं च हसितं तद्विधीयते ॥ ५६ ॥
उत्तम प्रकृति के मनुष्यों में स्थित ' स्मित ' ( के लक्षण ) में गालों का थोड़ा ( हास्य के कारण ) खिल जाना, नेत्रों का कटाक्ष एवं सौष्ठवयुक्त ' होना तथा मुसकान रहने पर भी दाँतों का दिखाई न देना होता है ५५ ॥ ( तथा ) ' हसित ' में मुख एवं नेत्र थोड़े खिल जाते हैं, गाल फैल जाते हैं तथा मुस्कान के साथ कुछ कुछ दाँत भी दिखाई देने लगते हैं ॥ ५६ ॥
मध्यम प्रकृति के मनुष्यों का हास्य
अथ मध्यमानाम्-आकुञ्चिताक्षिगण्डं यत्सस्वनं मधुरं तथा ।
कालागतं सास्यरागं तद्वै विहसितं भवेत् ॥ ५७ ॥
उत्फुल्लनासिकं यत्तु जिह्मदृष्टिनिरीक्षितम् ।REIFE “ निकुञ्चिताङ्गकशिरस्तश्चोपहसितं भवेत् ॥ ५८ ॥
१. सौष्ठव का अर्थ है उज्ज्वलता । धीर शब्द का अर्थ है धीरे - धीरे । जिससे यहाँ स्वल्पता का निर्वाह किया गया है । ' विकसितैरथ ' में अथ पद का आशय है स्मित के पश्चात् सङ्क्रमण काल में । ' तत् ' शब्द से यह सूचित किया है कि ' स्मित ' ही आगे चलकर ' हसित ' हो जाता है । १. विहसितैः -- ग ० । २. नेत्रैस्तु — ग ० । ३. सस्वरं - ग ० । ४. निरीक्षणम् - ग ० । ५. निहञ्जितांसक - घ ० । SRIPT २१ ना ० शा ० प्र ०