श्रीगणेशाय नमः।
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 421–430
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 421–430
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२ ९ २ नाट्यशास्त्रम् मनोरंजन या आह्लाद के साधन बनते हैं ( या एक दूसरे को भावित करते हैं ) ॥ ३८ ॥
यथा बीजाद्भवेद् वृक्षो वृक्षात् पुष्पं फलं यथा ।
तथा मूलं रसाः सर्वे तेभ्यो भावा व्यवस्थिताः ॥ ३ ९ ॥
जैसे ' बीज से वृक्ष और फिर क्रमशः उससे पुष्प तथा फल उत्पन होते हैं; वैसे ही रस मूल है, उसी पर भावों की स्थिति अवस्थित है ॥ ३ ९ ॥ में आस्वादन, ये ( दोनों ) क्रमशः कर्त्ता और कर्म रूप में स्थित होकर जैसे कर्मभूत एक दूसरे को परस्पर सुस्वादु वनाते हैं, इसी प्रकार रस तथा भाव कर्त्तारूप में स्थित होकर कर्मभूत एक दूसरे को भावित कराते हैं । अर्थात् भाव रसों को निष्पन्न या भावित करते हैं और रस भावों को भावित करते हैं ( भाव बनाते हैं अर्थात् भावपद से कथन करने योग्य बनाते हैं ) । यहाँ इसका अभिप्राय यह है कि एक विषय में एक क्रिया होने पर अन्यो-न्याय दोष होता है किन्तु क्रियामेद होने पर नहीं, जैसे प्रस्तुत प्रसंग में दधि कांजी आदि उपसेचन द्रव्य के संयोग से अन्न में अम्लादि रस उत्पन्न होता है, पर ऐसा नहीं कि आधारभूत अन्न से व्यञ्जन को आस्वादन के योग्य बनाया जाता हो । इसी प्रकार भावों के द्वारा स्थायीभाव की रस्यमानता होती है । और रसों के द्वारा कारणादि रूपों [ सीता, रामादि ] को विभाव पद से अभिहित किया जाता है ( अतः यहाँ क्रियाभेद के कारण अन्योन्याश्रय नहीं ) । जैसे पट की अपेक्षा से तन्तु ' कारण कहे जाते हैं और तन्तु की अपेक्षा से ' पट ' कार्य कहलाता है तो अन्योन्याश्रय दोष नहीं होता इसी प्रकार यहाँ भी क्रिया-भेद के कारण अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ऐसा समझना चाहिए । १. यथा बीजाद्यदि भावों से उत्पन्न रसों को स्वीकार किया जाए तो आपने यह कैसे कहा कि ' न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते ' अतएव पहिले उन्हीं का कथन करना उद्देश्य है, यह कथन कैसे सिद्ध होता है— इस आशंका के समाधानार्थं प्रस्तुतपद्य ' यथा बीजाद् ' इत्यादि कहा गया है । जैसे बीज वृक्ष के मूल में कारणरूप होकर स्थित होता है इसी प्रकार रस काव्य के मूल में स्थित रहता है, अतएव उसी के द्वारा आनन्दास्वादपूर्वक प्रवृत्ति निवृत्ति का ज्ञान होता है । इसी कारण रस का व्याख्यान सर्वप्रथम करने
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२ ९ ३ चार मूल रसों से आठ रसों का उद्गम तदेषां रसानामुत्पत्ति वर्ण दैवत निदर्शनान्यभिव्याख्यास्यामः । तेषामुत्पत्तिहेतवञ्चत्वारो रसाः । तद्यथा— शृङ्गारो रौद्रो वीरो बीभत्स इति । अत्र-योग्य है । कवि के मानस में साधारणीभूत रससंवितमूलक काव्य के द्वारा अभिनेता भी अभिनय प्रस्तुत करता है । यह कविगतसंवित् ही वास्तव में मूलभूत रस है । उसी के वशीभूत सामाजिक को अन्वयव्यतिरेक के द्वारा बाद में दिभावादि की प्रतीति होती है । अतएव मूल ( बीज ) स्थान पर कविगत रस भावादि का कारण है । काव्यगत उद्भावना में कवि सामाजिक के समान है जिसका समर्थन ध्वन्यालोककार के निम्न कथन से होता है । ' शृङ्गारी चेत् कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् ' ( ध्व ० ३।४२ ) [ यदि कवि ' शृङ्गारी है । तो सारा जगत् रसमय है ] इत्यादि । बीजस्थानीय उसी रस से वृक्षस्थानीय काव्य उत्पन्न होता है; जिसमें पुष्प स्थानीय अभिनयादिरूप ( नट का ) व्यापार है तथा फलस्थानीय ( सामाजिक का ) रसास्वाद है । इसीलिये सामाजिक के लिये काव्यजगत् रसमय होता है । प्रस्तुत रसप्रसंग में विज्ञानवाद, द्वैतवाद, स्फोटवाद, सत्कार्यवाद तथा अद्वैतवाद के आधार पर रस की व्याख्या करने वाले आचार्यों के सिद्धान्तों का जो वर्णन हुआ है उसे विस्तार से जानने के लिए उन्हीं ग्रन्थों में देखना चाहिए, अनुपयोगी होने से उनके सिद्धान्तों की हम यहाँ चर्चा नहीं करना चाहते क्योंकि रस की व्याख्या में उनकी उपयोगिता नहीं है । [ अर्थात् दार्शनिक मतों का प्रयोग रसनिष्पत्ति में अधिक सहायक नहीं है ] । दूसरे व्याख्याता इस श्लोक की अन्य प्रकार से व्याख्या करते हैं वे कहते हैं कि बीज स्थानीय भाव से रसरूप वृक्ष उत्पन्न होता है, जिसमें अभिनय रूप पुष्प से सुन्दरता को प्राप्त रसरूप वृक्ष से प्रतीति रूप भाव ही फल स्थानीय भोग को प्राप्त करता है । यह व्याख्या प्रकरण के विरुद्ध है क्योंकि यहाँ इस प्रकार मानने पर आदि और अन्त में भाव आ जाता है जो सम्भव नहीं है । इस प्रकार ' भाव से रस की उत्पत्ति ही सिद्धान्तपक्ष है परन्तु अभिप्राय वैचित्र्य की दृष्टि से किसी स्तर पर तीनों पक्ष कथञ्चित् संगत माने जा सकते हैं ।
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२ ९ ४ नाव्यशास्त्रम्
शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः ।
वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानकः ॥ ४० ॥
( इसि ) अतएव ( अब ) इन रसों की उत्पत्ति, वर्ण, देवता ( तथा इनके उदाहरणों ) का वर्णन करते हैं । इन रसों की उत्पत्ति ' के हेतु ( स्रोतभूत ) रस चार हैं । यथा - शृङ्गार, रौद्र वीर तथा बीभत्स । इनमें शृङ्गार से हास्य की, रौद्र से करुण की, वीर से अद्भुत की तथा बीभत्स से भयानक रस की उत्पत्ति होती है ॥ ४० ॥
१. उद्दिष्टलक्षण और विभक्त ( कर ) व्याख्या किये गये रम्र की परीक्षा द्वारा परिष्कृत सामान्यलक्षण को बतला कर अब उत्पत्ति आदि के द्वारा विशेष लक्षण कथन करने के लिये ' तदेषाम् ' इत्यादि से पुनः कहते हैं । उत्पादकों [ अन्य रसों को उत्पन्न करने वाले ] तथा उत्पाद्यों [ श्रृंगारादि रस से उत्पन्न हास्यादि रस ] का एक दूसरे से भेद होने से दोनों का विशेष-लक्षण होता है । उत्पादकों का उत्पादकत्व दुसरे उत्पादकों से विलक्षण होता है और वह उत्पाद्य के कारण ही होता है । इसी प्रकार उत्पाद्यरसों की विशिष्टता अपने उत्पादक रसों पर आधारित है और इसी कारण इनमें अन्तर रहता है । यहाँ ' निदर्शन ' व्युत्पत्ति के अनुसार होता इसलिये उनसे ' विशेष- निदर्शन ' है हो सकते हैं, वे सब २. चार मुख्य पद से श्रृंगारादि नाम अभिप्रेत है । निश्चयेन दर्शनम् ' इस निश्चय से दर्शन का उपायत्व उत्पत्ति आदि में संगत नहीं भिन्न ( विलक्षण ) होने के कारण विभावादि का संयोग । रसों के जितने भी ऊत्पाद्य उत्पादक भाव सम्बन्धी भेद इन्हीं चार प्रकारों से सूचित किये गये हैं । रसों से चार ( गौण ) रसों की उत्पत्ति का आशय है उनके विभावों द्वारा इन रसों की उत्पत्ति ( या पुष्टि ) होना । किन्तु यह निश्चय नहीं है कि इसके अतिरिक्त विभावों से ( इन ) रसों की उत्पत्ति नहीं हो सकती, वीर ( तथा वासल्य ) रस के विभाव से भी हास्यरस की उत्पत्ति हो जाती है । अतएव उत्पत्ति का विशेष अर्थ लेकर उसमें तन्मूलक शब्द जोड़ना चाहिए । इससे यह अर्थं होगा कि हास्य शृङ्गार मूलक होता है इत्यादि ।
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२ ९ ५
शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यस्तु ' प्रकीर्तितः ।
रौद्रस्यैव च यत् कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः ॥ ४१ ॥
वीरस्यापि च यत्कर्म सोऽद्भुतः परिकीर्तितः ।
बीभत्सदर्शनं यच्च ज्ञेयः स तु भयानकः ॥ ४२ ॥
शृङ्गारे ' का अनुकरण करने वाली प्रवृत्ति ( अनुकृति ) ' हास्य ' कही जाती है, रौद्र का कर्म करुण, वीर का कार्य अद्भुत तथा बीभत्स वस्तु या उसे देखने का कार्य भयानक ' रस ' समझना चाहिए ॥ ४१-४२ ॥ अथ वर्णाः
श्यामो भवति शृङ्गारः सितो हास्यः प्रकीर्तितः ।
कपोतः करुणश्चैव रक्तो रौद्रः प्रकीर्तितः ॥ ४३ ॥
१. शृङ्गार की जो अनुकृति है वह हास्य है ऐसा कहा जाता है अर्थात् शृङ्गारानुकृति रूप विभावों वाला हास्य रस उत्पन्न होता है । जैसे शृंगार प्रथमरस है तो श्रृंगाररस से युक्त अनुकरणभूत ' हास्य ' ( द्वितीय रस ) हुआ यहाँ यही अभिप्राय है । तथा रौद्र रस का जो कार्य अर्थात् वधादि रूप फल है वह करुण है । वीररस का सम्यक् अर्थात् अव्यवहित जो फल है वह ' अद्भुत ' रस है । मूलस्थ ' परिकीर्तितः ' का आशय है सब ओर से कीर्ति, यश, प्रताप आदि के कारण उत्पन्न होनेवाला वीररस । अर्थात् वीररस से महापुरुषों की यश, प्रताप, कीर्ति चारों ओर फैलती है जो विस्मय का कारण होती है । और ' अपि ' शब्द से शृंगार भी वीर का अव्यवहित फल होता है यह सूचित किया है । यहाँ जो ' बिभत्सदर्शन होता है वह भयानक होता है ' कह कर बीभत्स तथा भयानक के अभेद का जो प्रयोग किया गया है वह औपचारिक है तथा इस उपचार का फल है दोनों के सहभाव का ज्ञान होना । यहाँ शृङ्गारादि चार रस हास्यादि चार रसों की उत्पत्ति के कारण कहे गये हैं वे यथायोग्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूप पुरुषार्थं चतुष्टय से व्याप्त हैं और सौन्दर्यातिशय के ( भी ) जनक हैं । १. स हास्य इति संज्ञितः - ग ० ६० । २. रौद्रस्यापि — ग ० । ३. भवेत्तु — ग ०, भवेत् स तु घ ० ।
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२ ९ ६ नाट्यशास्त्रम्
गौरो वीरस्तु विज्ञेयः कृष्णश्चैव ' भयानकः ।
नीलवर्णस्तु बीभत्सः पीतश्चैवाद्भुतः स्मृतः ॥ ४४ ॥
रसों के वर्ण शृङ्गार रस का श्यामवर्ण ) ( नीला ), हास्य का सफेद, करुण का कपोत ( घटेरिया ) रौद्र का लाल, वीर का गौर ( चमकीला सफेद ), भयानक का काला, बीभत्स का नीला तथा अद्भुत का पीला अथाधिदैवतानि शृङ्गारो विष्णुदैवत्यो हास्यः प्रथमदैवतः । रौद्रो रुद्राधिदैवत्यः करुणो यमदैवतः
बीभत्सस्य महाकालः कालदेवो भयानकः ।
वीरो महेन्द्रदेवः स्यादभुतो ब्रह्मदेवतः ॥
रसों के अधिकारी देवता-वर्ण होता है ॥
॥ ४५ ॥
४६ ॥
शृङ्गार रस के अधिकारी देवता विष्णु ( कामदेव ), हास्यरस के प्रमथ १. रसों के वर्णों का कथन ( उनकी ) पूजा आदि के अवसर पर उसके ध्यान करने में उपयोगी है । अन्य व्याख्याकारों का मत है कि पात्रों के मुँह रंगने में इन निद्दिष्ट वर्णों की उपयोगिता है । शान्त रस का वर्णन मूल कारिका में नहीं बतलाया गया अतएव नवरसवादियों के मत में मूल के अन्तिम चरण का पाठ ' स्वच्छपीतौ शमाद्भुतो ' होगा । उनके अनुसार शान्तरस का पीतवर्ण माना गया है । २. तत्तत् रस की सिद्धि के लिए उस उस देवता के पूजन को बतलाने के लिये रसों के अधिकारी देवताओं का निरूपण किया गया है । यहाँ विष्णु का अर्थं कामदेव है अर्थात् कामदेव रूपी विष्णु श्रृंगाररस का अधिदेवता है । प्रमथ शिव के क्रीडा करने वाले गणों को हास्यरस का देवता माना गया है । तीनों लोकों के संहारकर्ता रुद्र रौद्ररस के देवता हैं । रुद्र की प्रेरणा से प्रेरित यम प्राणियों का वध करता है जिसके सम्पादन होने पर करुणरस उत्पन्न होता है । अतः करुण के यम देवता हैं । बीभत्सरस के महाकाल अधिष्ठातृ देव हैं जो बीभत्स के श्मशान, कंकाल आदि विभावों का सेवन करते हैं । वीररस का १. कृष्णश्चापि - घ ० । २. अथ देवतानि ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः २ ९ ७ गण, रौद्ररस के रुद्रदेव, करुण रस के यम, बीभत्स रस के महाकाल, भयानक रस के काल, वीर रस के महेन्द्र तथा अद्भुत रस के ब्रह्मा हैं । एवमेतेषां रसानामुत्पत्तिवर्णदेवताभ्यभिव्याख्यातानि । [ एषां तु ] इदानीं विभावानुभावव्यभिचारिसंयुक्तानां लक्षणनिदर्शनान्य-भिव्याख्यास्यामः । स्थायिभावांश्च रसानामनुक्रमिष्याम ' इति । ( वृत्ति ) इस प्रकार रसों की उत्पत्ति, वर्ण तथा अधिकारी देवताओं का वर्णन किया गया । अब विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव से युक्त होने पर इनके लक्षण तथा उदाहरण ( सामान्य तथा विशेष ) बतलाता हूँ " । तथा यहाँ रसों के स्थायि भावों का भी ( इस सन्दर्भ में ) निदर्शन किया जायगा । देवता महेन्द्र है, महेन्द्र शब्द से त्रैलोक्य के स्वामी का ग्रहण होता है । अद्भुत-रस का देवता ब्रह्मा है क्योंकि ब्रह्मा अचिन्त्य प्रकारों के आश्चर्यजनक पदार्थों का रचयिता है । शान्तरस को मानने वाले आचार्यों के मत में ' बुद्धः शान्तेऽ-जजोऽद्भुते ' पाठ रखा जाता है । उनके मत में बुद्धदेव जो परोपकार में रत तथा ज्ञानी है वे ही शान्तरस के अधिदेवता हैं । १. रसों के विशेष लक्षण कहने के लिये ग्रन्थकार ' इदानीम् ' इत्यादि से प्रस्ताव बनाते हैं । विशेष लक्षण सजातीय से अन्तर बतलाने के लिये होता हैं क्योंकि विजातीय से भिन्न हुए बिना सजातीय का ज्ञान नहीं होता और ' विजातीय का स्पष्टीकरण सामान्यलक्षण के बिना सम्भव नहीं होता अतएव विभावानुभाव ' इत्यादि के द्वारा संयोगरूप रस सामान्य लक्षण दिया गया । लक्षणरूप जो निदर्शन अर्थात् विशेषलक्षण का यहाँ भरत ने जो प्रस्ताव किया है वह प्रत्येक रस के विशेषलक्षण कथनार्थं है । अथवा सामान्यलक्षण के उदाहरण विशेष लक्षण के कथनार्थ होते हैं क्योंकि प्रत्येक सामान्य का पर्यव-सान किसी विशेषलक्षण में ही होता है और उसके विना सामान्यलक्षण
स्वीकार नहीं किया जा सकता ।
१. रसत्वमुपनेष्यामः क; ग ० ॥
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२ ९ ८ नाट्यशास्त्रम् ( अथ शृङ्गाररसप्रकरणम् ) तत्र शृङ्गारो नाम रतिस्थायिभावप्रभव उज्ज्वलवेषात्मकः । यथा - यत्किञ्चिल्लोके शुचि मेध्यमुज्ज्वलं दर्शनीयं वा तच्छृङ्गारेणो-पमीयते ' । यस्तावदुज्ज्वलवेषः स शृङ्गारवानित्युच्यते । यथा च गोत्रकुलाचारोत्पन्नान्यापदेशसिद्धानि पुंसां नामानि भवन्ति तथै-वैषां रसानां भावानाश्च नाट्याश्रितानाञ्चार्थानामाचारोत्पन्नान्याप्तो-पदेशसिद्धानि नामानि भवन्ति । एवमेष ' आचारसिद्धो हृद्योज्ज्वल-वेषात्मकत्वाच्छृङ्गारो रस इति । जो स्थायीभाव ( लोक में ) सामान्यतः चित्तवृत्तिरूप होते हैं और अनेक-विध काव्य नाट्य में प्रयोजकों के अनेकविध व्यापारों से बोधित होने वाले होते हैं उन्हें भी विश्रान्ति के एकान्तधाम रसत्व को प्राप्त करवाने की व्याख्या की जाएगी । क्योंकि कवियों और अभिनेताओं के द्वारा स्थायीभाव यथोचित विभावों के प्रस्तुतीकरण के द्वारा रसत्व को प्राप्त करवाए जाते हैं । जैसा ध्वन्यालोककार के निम्न पद्य में कहा गया है । ' या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा, दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती । अवलम्ब्य विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं, श्रान्ता नैव च लब्धमब्धिशयन त्वद्भक्तितुल्यं सुखम् ॥ ", अर्थ – हे समुद्रशायिम् विष्णो, रसों के आस्वादन के लिये प्रयत्नवान् कवियों कीं जो अपूर्व ( नवीन ) दृष्टि है और परिनिष्ठित अर्थ को प्रकाशित करने वाले विद्वानों की जो वैपश्चिती दृष्टि है उन दोनों के द्वारा इस विश्व को अहर्निश देखते - देखते हम श्रान्त हो चुके परन्तु आपकी भक्ति जैसा सुख अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं हो पाया । ( ध्व ० ३।४३ ) इस पद्य में ' नवा ' शब्द से कवियों की अपूर्व दृष्टि का अभिधान किया गया है । अभिनेताओं के रचनाकार कवियों के आश्रित होने से उनमें अपूर्व या नवीन दृष्टि नहीं होती जो अपूर्व अर्थ का अवलोकन या आस्वादन कर सके, १. अनुमीयते - ग ० । २. तदेवमेव गुर्वाचारसिद्धो हृद्योज्ज्वलवेषात्मकः - ग ० ।
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षष्टोऽध्यायः २ ९९ शृंगार - रस - प्रकरण ' ( गद्य भाग ) इनमें शृङ्गार रस ' रति ' नामक स्थायी भाव से उत्पन्न होता है । प्रवृत्त होता है ) तथा यह उज्ज्वल वेषात्मक ( स्वरूप का वह तो कवि को ही होती है । अतएव कवि तथा उन पर आश्रित अभिनेता के समान हम भी रसों के आस्वादनार्थ जिस प्रकार विभाव आदि की संयोजना कर रसत्व को प्राप्त कराते हैं वैसा ही वर्णन करेंगे । इस प्रकार लक्षणरूपग्रन्थ का फल [ रसास्वाद ] बतलाया गया । १ शृंगाररस - प्रकरण इन रसों में सर्व प्रथम काम के पुरुषार्थरूपी फल होने और समस्त प्राणि-जात के हृदयसंवादी होने के कारण कामप्रधान शृङ्गाररस का लक्षण ' तत्र ' से लेकर ' उज्ज्वलवेषात्मक ' तक से बतलाते हैं । यहाँ तत्र पद क्रम के निश्व-यार्थ प्रयुक्त है अथवा ' ऐसा होने पर ' इस अर्थ में रखा गया है । इस सूत्र के भाष्य से जिस लक्ष्यपद की प्रतीति होती है उसका नाम ' शृङ्गार ' है । उसी की ' यत् किञ्चित् ' से व्याख्या की गयी है । वस्तु के सौन्दर्य आदि से मण्डित ' शृङ्गार ' होता है उसी के साथ मूलग्रन्थ में शुचि, मेध्य आदि की समानता दर्शायी गयी है । और इसीलिये उज्ज्वलवेषात्मा के लिये शृङ्गार शब्द प्रयुक्त किया गया है । यहाँ उपमान और उपमेय [ अर्थात् उज्ज्वलवेष और शृङ्गार ] में विषयगत विशेष विभेद की प्रतीति नहीं होने से अभेद मानकर इस प्रकार का व्यवहार होता है । अतएव आस्वादन की जाने वाली रति ही मुख्यरूप से ' शृङ्गार ' शब्द का अर्थ होती है एवं रति के आस्वादक सामाजिक के द्वारा रति के उपभोग में विशेषरूप से आसक्त नायकादि को ' शृंगारी ' कहा जाता है । परन्तु उस रति के उत्पादक विभावादि में ( व्यासक्त ) सामाजिक पुरुष ( में शृंगार ) की जो व्यवसनिता ( लगाव, आकर्षण ) पायी जाती है वह रसा-स्वादन अवस्था लोक में विद्यमान होकर भी चिरकाल तक स्थिर नहीं रहती है । अतः आस्वाद्यमान रति शृंगार शब्द से गृहीत है और उस रति के आस्वादन में यथोचित विभावादि का उपयोग किया जाता है । शास्त्र में अनिषिद्ध, अनिन्दित, सुष्पष्ट एवं मनोहारी शब्द से श्रृङ्गार के अभिधान करने ( का मुख्य रूप में ) और शृङ्गार से उपमा देने का ( गौणरूप से ) यही कारण है ।
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३०० नाट्यशास्त्रम् होता ) है । संसार में जो शुभ, पवित्र, उज्ज्वल ( तेज सम्पन्न ) तथा दर्श-नीय हो वह ' श्रृंगार के द्वारा निदर्शित ( उपमा दिया हुआ ) होता है । उदाहरणार्थ — जो व्यक्ति उज्ज्वल ( ललित ) वेशधारी होता है उसे शृङ्गारी वहा जाता है । जैसे गोत्र ', कुल तथा आचार के अनुसार तथा आप्त पुरुष और यही बात मूलग्रन्ध में ' उपमीयते ' पद से कही है । अर्थात् इन वस्तुओं की विभाव आदि रूप में रस प्रतीति के अन्तर्गत उपयोगिता बोधित या लक्षित होती है । यह लक्षित होना ' यस्तावत् ' इत्यादि से दिखलाया गया हैं । अव-धारणार्थक ' तावत् ' शब्द के द्वारा शृङ्गार का मुख्य वाच्यार्थ उज्ज्वलवेष में गृहीत नहीं है अतएव उज्ज्वल वेषधारी शृङ्गारवान् होता है इत्यादि प्रयोगों में शृंगार शब्द का उज्ज्वलवेष में औपचारिक प्रयोग किया गया है । मुख्यरूप से श्रृंगार शब्द के प्रयोग का प्रयोजन बतलाने के लिए- ' यथा च ' इत्यादि ( भरत ने ) कहा है । १. यहाँ ' गोत्र ' शब्द का अर्थ पितृकुलपरम्परा तथा ' कुल ' शब्द का अर्थ मातृकुलपरम्परा है । ' आचार ' का अर्थ है व्यवहार । किसी पुरुष या स्त्री का जो नाम पितृ या मातृकुल परम्परा के आधार पर या व्यवहार को दृष्टिगत करते हुए रखा जाता है वही नाम लोक व्यवहार में प्रसिद्ध हो जाता है । इसके अतिरिक्त जो गुरुजन पुरुषादि के नाम रखते हैं वे भी प्रसिद्ध होकर प्रचलित हो जाते हैं । इसी प्रकार रस आदि के नाम प्राचीन ब्रह्मा आदि आत पुरुषों के द्वारा रख रये हैं या शास्त्रवेत्ताओं के द्वारा व्यवहार में लाये गये हैं; शृङ्गार आदि नाम भी इसी व्यवहाराश्रित प्रकार पर समझना चाहिए । और वह आचार अर्थात् व्यवहार से इसी रूप में लोक में प्रसिद्ध है । यथा अपने उज्ज्वल-वेषादि के कारण यह शब्द लौकिक प्रसंग में भी प्रयुक्त होने लगता है । शास्त्रों में प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट शब्द भी वृद्धजनों के द्वारा व्यवहार किये जाने पर लोक में प्रसिद्ध होकर उपचार से भिन्न अर्थों में ( भी ) प्रयुक्त किये जाते हैं । जैसे यह सांख का पुरुष कुछ नहीं करता ' ' उसने मेरे लिये इस पूर्वरंग की निर्मिति कर डाली ' तथा ' इन दोनों में महत्ता इसकी अधिक है ' इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त ' पुरुष ' ' पूर्वरंग ' तथा ' महत् ' शब्द क्रमशः सांख्य, नाट्यशास्त्र तथा वैशेषिक दर्शनशास्त्र के विशेषशब्द हैं
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३०१ के उपदेश द्वारा मनुष्यों का नामकरण किया जाता है; वैसे ही रस, भाव तथा अन्य नाट्याश्रित पदार्थों के व्यवहाराश्रित एवं परम्परा प्राप्त ( आप्त पुरुष द्वारा उपदिष्ट ) नाम होते हैं । ( अतएव ) अनेक आचार व्यवहार से सम्पन्न यह रस मनोहारी तथा ललित - वेश वाला होने के कारण ( आप्तोपदेश तथा व्यवहारसिद्ध दोनों रूप में ) सुधार कहलाता है । स च स्त्रीपुरुषहेतुक ' उत्तमयुवप्रकृतिः । तस्य द्वे अधिष्ठाने परन्तु इनका लौकिक प्रयोग भी अन्यार्थ में होता है । इसी प्रकार शृङ्गारादि शब्दों का विशिष्ट प्रयोग रस के विषय में मुख्य ( रूप से होता ) है और हृदयहारी उज्ज्वलवेषादि रूप लौकिक अर्थ में औपचारिक है । ' शृङ्गार ' शब्द की व्युत्पत्ति में मत्वर्थीय ' आरकन् ' का विधान नहीं है क्योंकि ' शृङ्गवृन्दाभ्यामारकन् ' वार्तिक से आरकत् प्रत्यय करने पर शृङ्गार शब्द निष्पन्न होता है वृन्दारकशब्द के समान । अतएव ' शृङ्गार ' शब्द उणादि से ( निष्पन्न या ) निपातित है । अब ' रतिस्थायी प्रभवः ' में आये हुए ' रतिस्थायी ' आदि शब्द को ' सच ' इत्यादि से स्पष्ट करते हैं । स्त्री - पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध के आधार पर ' यह इसकी स्त्री है ' इस प्रकार के वाक्य में अभिलाषा तथा सम्भोग विषयक लौकिक बुद्धि का ग्रहण होता है । यह स्थायीभावस्वरूपा रति अभिलाषा मात्र ( कामावस्था में विद्यमान रहने वाली ) व्यभिचारि भावस्वरूपा रति से भिन्न होती है और आरंभ से लेकर फलाप्राप्ति की अवस्था तक रहने वाली और परिपूर्ण सुखरूपी फल प्रदायिनी रति होकर ( इस ) श्रृंगार रस का कारण मानी जाती है । कवि लौकिक रति की वासना से युक्त होकर विभावादि को इस प्रकार प्रस्तुत करता है और अभिनेता उसको इस प्रकार नाट्य में ( अभि-नयादि के द्वारा ) अनुभव करवाता है कि रति के आस्वादन होने पर श्रृंगार-रस का अनुभव होने लगता है । शृङ्गार की अनुभूति में ( सामाजिक ) का पूर्वकालीन संस्कार उपयोगो होता है यह कहा जा चुका है । इसी आधार पर इस सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि परमार्थतः रतिक्रीडा की स्थिति कामियों में ही होती है, क्योंकि उन्हीं में कामसुख की धारा विश्रान्ति लेती है । अन्य सामाजिक आदि को तो कवि के द्वारा वर्णित ऋतु, माल्य आदि ( उद्दीपन .१ स्त्रीपुंस ग ० । २. उत्तमयुवति ग ० । FIR B