भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 451–460
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 451–460
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३२२ नाट्यशास्त्रम् जिसमें आँखें तथा गाल कुछ सिकुड़न लिए हों, ध्वनि अल्पता तथा मधुरता लिए हो एवं समय के अनुकूल हो और जिसमें मुख प्रसन्नता के कारण लाल हो जाए तो उसे ' विहसित ' हास्य जानिये । ' उपहसित ' हास्य में नासिका फूल जाती है, टेढ़ीदृष्टि ( जिह्नर ) से देखना होता है और मस्तक सिकुड़ जाता है ॥ ५७-५८ ॥ अथाधमानाम्
अस्थानहसितं यत्तु ' साश्रुनेत्रं तथैव च ।
उत्कम्पितां सकशिरस्तच्चापहसितं भवेत् ॥
अमप्रकृति के मनुष्यों का हास्य जिसमें वेमौके हंसना होता हो, आँखों में ( हंसते जाए तथा कन्धा और मस्तक जोरों से हिलने लगे तो हास्य कहते हैं ॥ ५ ९ ॥
संरब्धसाश्रुनेत्रं च विकृष्टस्वर ' - मुद्धतम् ।
करोपगूढपार्श्व च तच्चातिहसितं भवेत् ॥
५ ९ ॥
हंसते ) आँसू आ उसे ' अपहसित ' ६० ॥ जिसमें हंसते हंसते आंसुओं से आँखें भर जायँ, कर्णकटु ( विकृष्ट * ) और उद्धत शब्दों का उच्चारण हो और पसलियों को हाथों से दबाना पड़े तो ऐसे हास्य को ‘ अतििहसित ' जानिये ॥ ६० ॥
हास्यस्थानानि यानि स्युः कार्योत्पन्नानि नाटके ।
उत्तमाधममध्यानामेवं तानि प्रयोजयेत् ॥ ६१ ॥
१. कालागतम् = जो सभा आदि में समयगत औचित्य के अनुकूल हो । २. जिह्मनामक दृष्टि से ( अर्थात् तिरछे देखकर ) भावपूर्ण निरीक्षण करते । [ जिह्म दृष्टि का लक्षण आगे ना ० शा ० ८।६१ पर द्रष्टव्य ] ३. अस्थान अर्थात् अनुचित अवसर पर या शोकादि के अवसर पर । ४. विकृष्ट अर्थात् सुनने में बुरा लगने वाला । १. यत्र साम्रनेत्रं - ग ० २. सास्र - ग ० । ३. विक्रुष्ट - ग ० । ४. हासस्थानानि - घ ० । OR OF OFF
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षष्ठोऽध्यायः ३२३ ' नाटकों में कार्यवश ( प्रसंगवश ) जो हास्य स्थान आते हों उन्हें इसी प्रकार उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों द्वारा प्रस्तुत करना चाहिये ॥ ६१ ॥
' इत्येष स्वसमुत्थस्तथा परसमुत्थश्च विज्ञेयः ।
द्विविधास्त्रिप्रकृतिगतत्रयवस्थभावो रसो हास्यः ॥ ६२ ॥
' हास्यरस ' दो प्रकार का है ( १ ) आत्म- समुत्थ तथा ( २ ) पर-समुत्थ जो कि ( मनुष्यों की ) तीन प्रकार की प्रकृति में प्रयुक्त किया जाता है और इस प्रकार ( परिगणना अनुसार कुल ) छः प्रकार का हो जाता है ॥ ६२ ॥
१. यहाँ नाटक शब्द से रूपकसामान्य का ग्रहण समझना चाहिए । २. हास्य के स्वसमुत्थ से संक्रान्त न होने वाले स्मित, विहसित तथा अपहसित प्रकारों का और परसमुत्य से तीनों प्रकृतियों के संक्रान्त होने वाले हसित, विहसित तथा अतिहासित प्रकारों का ग्रहण समझना चाहिए । हसि-तादि से रूप संक्रमण के द्वारा उत्कृष्ट प्रकृति में स्मितादि होते हैं । रति, शोक, क्रोध आदि का अन्यत्र संक्रमण नहीं होता यह बात पहिले कही जा चुकी है । वहाँ उनमें ( उस प्रकार की चित्तवृत्ति के व्यक्ति में ) जो विभाव विश्रान्ति को प्राप्त करता है वह विभाव हास्य के समान उस चित्तवृत्ति वाले पुरुष से अन्यत्र संक्रमण नहीं करवाता । कुछ आचार्यों ने आत्मस्थ तथा परस्थ सभी रसों के भेद माने हैं और हास्य में इनका अभिधान उपलक्षण मात्र है ऐसा कहा है परन्तु यह उचित नहीं है क्योंकि हास का अन्यत्र संक्रमण होता है जो अनुभव सिद्ध है । दूसरे व्याख्याकार इस श्लोक की इस प्रकार व्याख्या करते हैं- ' तीन प्रकार की प्रकृतियों में, तीन अवस्था वाला हास्य विभावगत तारतम्य से दो प्रकार का होने पर छः प्रकार हो जाता है यही आत्मस्थ तथा परस्थ भेद से प्रत्येक दो भेद होकर बारह प्रकार का हो जाता है और इन भेदों में पृथक् पृथकृ विभाजन व्यापार होता है । ' यह मत अतिशय विस्तारकारी होने से स्थाना-भाव के कारण हम यहाँ विवेचित नहीं कर रहे हैं । इति हास्यरसप्रकरणम् । १. एवंसात्मसमुत्थश्च तथा परसमुत्थितः । द्विविधविप्रकृतिकः षड्भेदोऽथ रसः स्मृतः ॥ इति ग - पु ० ।
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३२४ नाट्यशास्त्रम् करुणरस अथ करुणो नाम शोकस्थायिभावप्रभवः । स च शापक्लेश-विनिपतितेष्टजनविप्रयोगविभवनाश वधबन्धविद्रवोपघातंत्र्यसन संयो-गादिभिर्विभावैः समुपजायते 1 । तस्याश्रुपात परिदेवन मुखशोषण-वैवर्ण्यस्नस्तगात्रतानिश्श्वास स्मृतिलोपादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्त-व्यः । व्यभिचारिणश्चास्य निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्यावेग भ्रममोहश्रम-भयविषाद दैन्यव्याधिजडतोन्मादापस्मारत्रासालस्य मरणस्तम्भवेपथु-वैवस्वरभेदादयः । अत्रायें भवतः । अब ' करुणरस ' बतलाता हूँ जो कि शोक स्थायी भाव से उत्पन्न अथ करुणरसप्रकरणम् १. क्रमानुसार ( अवसर उपस्थित होने पर ) अब ' अथ करुणो नाम ' इत्यादि के द्वारा ' करुणरस ' का वर्णन करते हैं । यहाँ ' अर्थ ' शब्द क्रमबोधन के लिये ( रखा गया ) है । कुछ टीकाकार ऐसा मानते हैं कि ' इस क्रम का कारण यह है कि सम्भोग शृङ्गार में अङ्गरूप से हास्य की अपेक्षा होने से शृङ्गार बाद हास्य का निरूपण किया गया और विप्रलम्भ श्रृंगार तथा करुणरस में व्यभिचारिभावों की समानता होती है इसलिए हास्य के बाद करुणरस को क्रमिक रूप से अवसर प्राप्त हुआ है । ' परन्तु यह पूर्वापर विरुद्ध मत है । उद्देश्य विभाग के अवसर पर क्रम का निर्देश किया जाने से तदनुकूल क्रम प्राप्त रस का ही यहाँ वर्णन उपयुक्त है । श्री शङ्कुक का मत है कि ' संसार में दयायुक्त हृदय का भाव ' करुण ' के नाम से प्रसिद्ध है । यह करुण अपने दृश्यमान रोदन आदि अनुभाव वाले लिङ्गों द्वारा अभिनेता में स्थित शोक को अनुभव करने वाले सामाजिक सहृदयों में रहने से इसका ' करुण ' ( यह ) सार्थक नाम है । " परन्तु ऐसा कथन पूर्वापर सम्बन्ध को भुला देने का परिणाम है क्योंकि इस मत में शोक का १. स्पर्शन संयोगा - ख ० । २. तस्य चाश्रुपातन - ग ० । ३. चिन्तोत्सुक्या वेगमोहश्रम - - ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः ३२५ होता है । यह शाप, क्लेश, पतन, प्रियजन वियोग, सम्पत्तिहानि, मृत्यु, ( कारागार में ) बन्धन, भगदड़, ( दुर्भाग्यवश ) चोट लग जाना तथा अन्य कष्टों की उपलब्धि होने आदि विभावों से उत्पन्न होता है । इसका अभिनय अश्रुपात, प्रलाप, मुख का सूख जाना, मुँह का उत्तर जाना अनुकरण करने वाली ' करुणा ' ही ' करुणरस ठहरती है पर दया तो दूसरों की रक्षा करने की भावना का नाम है और वह शोक का अनुकरण रूप कैसे होगी? और सामाजिकों की दशा किसके प्रति होकर करुणरस की जनक होगी यह स्पष्ट नहीं है अतः यह मत अस्वीकार्य है । वस्तुतः पूर्वोक्त युक्ति से साधारणीकरण व्यापार द्वारा सर्वसाधारण रूप से आस्वाद्यमान शोक का नाम करुणरस है । मूल में इसी कारण भरतमुनि ने ' नाम ' शब्द का प्रयोग किया है । करुणरस ' शोकप्रभव ' है यह शृङ्गार के रतिप्रभव ' के समान समझ लेना चाहिए । मूल में शाप पद का ग्रहण अशक्य प्रतीकाररूपहेतु का उपलक्षण है अर्थात् शाप कारण क्लेश में पड़े हुए इष्ट जन की जो विप्रयोग आदि दशाएं होगी उनसे करुणरस की उत्पत्ति होती है । विप्रयोग का अर्थ है वियोग । विभव-नाश सर्वविदित है । विद्रव का अर्थ है अपने देश से निर्वासन, यह निर्वासन केवल करुण में ही नहीं परन्तु विप्रलम्भ शृंगार में भी होता है; यही इस प्रसङ्ग में विशेष उल्लेख्य है । उपघात का अर्थ है अग्नि आदि से मरण । श्रीशङ्कुक ने जो अग्नि आदि के द्वारा होने वाली हानि को ' विद्रव ' तथा चोर आदि के द्वारा किया गया सम्पत्ति नाश ' उपघात ' बतलाया यह असंगत है, क्योंकि ये सभी कार्य विभवनाश के अन्तर्गत आ जाते हैं । ' व्यसन ' का अर्थ मृगया या जुआ आदि अनर्थजनक कार्य के साथ सम्बन्ध हो जाना । विभव-नाश बादि होने पर भी उत्तम प्रकृति के पुरुष में आत्मगत शोक उत्पन्न नहीं करते तथा मध्यम और अधम प्रकृति के मनुष्यों में शोक उत्पन्न करते हैं यही बतलाने के लिए ' आदि ' पद का ग्रहण किया गया है । स्वयं को, भाग्य को ज्या दूसरे को उलाहना देना ' परिदेवन ' है । ' निःश्वास ' पद से उसके बाद होने वाले ऊध्वंश्वास रूप उच्छ्वास को लक्षित किया गया गया है । ' स्मृतिलोप ' शब्द से स्तम्भ तथा प्रलय का ( लक्षणों के द्वारा ) ग्रहण होता है ।
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३२६ नाव्यशास्त्रम् ( विवर्ण ) शरीर की शिथिलता उसाँसे लेना तथा स्मृति लोप आदि अनुभावों के द्वारा किया जाय । इससे निर्वेद, ग्लानि, चिन्ता, औत्सुक्य, आवेग, भ्रम, मोह, श्रम, भय, विषाद, दैन्य, व्याधि, जड़ता, उन्माद, अपस्मार, त्रास, आलस्य, मरण, स्तम्भ, वेपथु, वैवर्ण्य अश्रु तथा स्वर मैद आदि संचारी ( तथा सात्विक ) भाव होते हैं । इस विषय की दो आर्याएँ हैं-इष्टवदर्शनाद्वा विप्रियवचनस्य संथ'वाद्वापि । एभिर्भावविशेषैः करुणरसो नाम सम्भवति ॥ ६३ ॥
२ सस्वनरुदितैर्मोद्दागमैश्च परिदेवितैर्विलपितैश्च ।
अभिनेयः करुणरसो देहायासाभिघातैश्च ॥ ६४ ॥
प्रिय व्यक्ति की मृत्यु ' अथवा अमंगलकारी समाचार या शब्दों के श्रवण तथा चित्त को आघात पहुँचाने वाले भावों के द्वारा करुणरस उत्पन्न होता है ॥ ६३ ॥
वैवण्य, अश्रु तथा स्वरभेद आदि के सात्विक भावों में परिगणित करते के बाद यहाँ पुनः उनका उल्लेख व्यभिचारिभाव के अन्तर्गत हुआ है । ये सात्त्विक भाव चित्तवृत्ति रूप ही हैं परन्तु इनका बाहर से प्रकाशित होने के कारण अनुभावरूप में ग्रहण किया गया है । जैसे कि कहा भी जाता है कि-' इनका कण्ठ आंसुओं से भर गया है पर आंखों में आंसू नहीं दिखलाई देते । इन अश्रु आदि स्थितियों में सूक्ष्मचित्तवृत्तियों के अभिनय का प्रदर्शन करना इष्ट होने से इनका व्यभिचारि रूप में बीच में दो बार कथन किया गया और आगे भी किया जायगा । अतएव एक बार अनुभाव तथा दूसरी वार व्यभि-चारिभाव में कथन होने से यहाँ पुनरक्ति नहीं है । इसी प्रकार आगे भी जान लेना चाहिए । उन्माद और अपस्मार ( सामान्य ) व्याधि से भिन्न होते हैं इसे आगे बतलाया जायगा । १. यहाँ ' वध ' शब्द बन्ध आदि का उपलक्षण है । विप्रिय शब्द का अर्थ है इष्टजन के वध आदि के वाक्यों का श्रवण करना [ जिससे करुणरस १. संश्रयाद्वा - ग ० । २. श्वसनविरुदितं महोद्गमैश्व – ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः ३२७ मंच पर इसे प्रदर्शित करते समय जोर से रोना, मूर्च्छा, पश्चात्ताप, विलाप, देह को पटकने तथा पीटने के अनुभावों को प्रस्तुत किया जाय ॥ रौद्रर अथ रौद्रो नाम कोधस्थायिभावात्मको रक्षोदानवोद्धतमनुष्य-प्रकृतिः ' संग्रामहेतुकः । स च कोधाधर्षणाधिक्षेपावमानानृतवच'-। तस्य च नोपघातवाक्पारुष्याभिद्रोद्दमात्सर्यादिभिर्विभावैरुत्पद्यते ताडनपाटनपीडनच्छेदनप्रहरणशस्त्र -- सम्पातसम्प्रहाररुधिरा-की उत्पत्ति हो ] । अतएव इष्टजन के दृश्यमान या श्रूयमाण विभवनाश आदि को करुणरस के विभाव के रूप में कविजन अङ्कित करें यही आशय है । यहाँ भावशब्द का विभाव अर्थ है । अनुभाव और ( उनके द्वारा ) व्यभिचारिभावों को लक्षित करने के लिये दूसरी आर्या दी गयी है । इसमें प्रकृति, देश, काल, दशा, हेतु आदि के भेद से अनुभावादि के अनेक प्रकार होते है इसे सूचित करने के लिए बहुवचन दिया गया है । ' मोह ' का अर्थ जड़ता है, रससे अन्य व्यभिचारिभाव भी उपलक्षित होते हैं । देह का आयासन अर्थात् शरीर को गिराना या मरोड़ना आदि । अभिघात अर्थात् छाती ( आदि ) पीटना । ये अनुभाव उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति आदि भेद को दृष्टिगत रखते हुए प्रयुक्त किये जाँय । इति करुणरसप्रकरणम् । अथ रौद्रप्रकरणम् १. करुणरस के बाद ' रौद्रो नाम ' इत्यादि से ' रोद्ररस ' का लक्षण बतलाते हैं । यहाँ भी आत्कशब्द का प्रयोग ( मूल में ) किया गया है जिसका आशय है कि प्रधानतः किसी अन्यायकारिता के प्रति क्रोध होता है । सामान्यतः लोगों के मन में अन्यायकर्त्ता के प्रति उग्र भावना होती है और उस आततायी के रुधिरपान तक कर डालने की भावना मन में उठती है और लोग यह कहते भी हैं कि ' यदि ऐसा आततायी पुरुष मिल जाय तो उसका रुधिरपान करने पर भी सन्तोष नहीं होगा । ' महाकवि भास ने अपने नाटक में एक स्थान पर कहा भी है कि-१. मनुष्यप्रभवः - ग ० २. नानृतवचना वाक्पारुष्य ग ० । ३. समुपजायते— ग ० ।
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३२८ नाट्यशास्त्रम् कर्षणाद्यानि कर्माणि । पुनश्च रक्तनयनस्वेदभ्रुकुटीकरणावष्टम्भदन्ती-प्रयोक्तव्यः ॥ ष्ठपीडनगण्डस्फुरण हस्ताग्रनिष्पेषादिभिरनुभावैरभिनयः व्यभिचारिभावाश्वास्या सम्मोहोत्साहावेगामर्षचपलतौग्यगर्व-[ विकृतेक्षण ] ' स्वेदवेपथुरोमाञ्चगद्गदादयः । -'आज न वह त्रेतायुग है न श्रीराम की प्रियभूमि जानकी है न उनका सा कोमल मन ही । पर आज भी यदि लोग रावण को पा जायें तो उसके तिल के बराबर टुकड़े करने पर भी सन्तुष्ट नहीं होंगे । ' इस प्रकार हास्यरस के समान रौद्ररस के विभाव होने पर भी रौद्ररस का आस्वादन क्रोधमय होता है, अतएव उसके आस्वादन करने पर क्रोधात्मक रौद्ररस होता है, जिन पुरुषों में हिंसाभाव प्रधान रहता है उन्हें ' उद्धत ' कहा गया है, अतः उद्धत मनुष्यों का वेष धारण करने वाले अभिनेता इस रस के आस्वादन के हेतु होने से प्रकृति माने जाते हैं । प्राचीन व्याख्याकारों का मत हैं कि युद्ध के कारण उद्धत प्रकृति के भीम-सेन आदि मनुष्यों में रौद्र की सम्भावना होती है और यह रुधिरपान आदि रूप में परिलक्षित होता है । [ मूलस्थ ' संग्रामहेतुक ' पद का यही आशय है ] राक्षसों और दानवों की प्रकृति स्वभावतः रौद्र होती है [ उनमें संग्राम हेतुक रौद्रता नहीं रहती ] । यह मत अनुचित है । क्योंकि भीमसेन के द्वारा किया हुआ रुधिरपान युद्ध के कारण नहीं किन्तु उसके विपरीत स्वभाव के कारण किया गया है और उद्धत स्वभाव होने से क्रोध में आकर उन्होंने रुधिरपान की अनुचित प्रतिज्ञा कर डाली थी । उसके निर्वाह के लिये ही वेणीसंहार में - में कवि ने भीम पर राक्षस के आवेश की योजना की । अतः प्रकृत्या क्रोधी होने से ही ऐसा कार्य हुआ है संग्राम के कारण नहीं । और इन्हीं का अनुकरण अभिनेता भी करता है अतः उसमें रौद्ररस पाया जाता है और इसी कारण - उसे मनुष्य प्रकृति भी कहा गया है । अतएव ' संग्राम हेतुक ' का अर्थ यह है १. कार्याणि ग ० । २. ध्रुटीकरदन्तोष्ठ —ग ०.। ३. व्यभिचारिणश्चास्य ग ० । ४. सम्मोह – ग ० । ५. स्वेदवेपथु – ग ० ।
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३२ ९ रौद्ररस का क्रोध स्थायीभाव होता है । इसका उद्भव राक्षस, दानव तथा उद्धत प्रकृति के मनुष्यों से संग्राम के द्वारा होता है । यह क्रोध, बलात् खींचना ( आघर्षण ), दुर्वचन, अपमान, असत्य वचनों द्वारा आरोप, कठोर वचन, द्रोह, मात्सर्य आदि विभावों द्वारा उत्पन्न होता है । इसके पीटना, फाड़ना, पीड़ा देना, छेदन, शस्त्रों का ( छीनना या ) लाना ( प्रह-रणाहरण ) शस्त्रों का फेंकना, शस्त्रों से प्रहार, रुधिर निकालना और इसी प्रकार के अन्य कार्य हैं । इसका अभिनय रक्तनयन, स्वेद प्रसार, भ्रुकुटी ' चढ़ाना, दाँत और ओठों का चबाना, गालों का फुलाना, हाथों का मसलना आदि अनुभावों द्वारा किया जाय । इसमें मोह, उत्साह, आवेग, अमर्ष, चपलता, उग्रता, स्वेद, कम्पन, रोमांच एवं गद्गद आदि संचारी भाव होते हैं । कि कवि या नट द्वारा वर्णित या प्रदर्शित संग्राम का ' क्रोध ' कुत्सित हेतुक है । संग्राम का उचित हेतु क्रोध नहीं होता यही बतलाने के लिये मूल में कुत्सितार्थक क प्रत्यय लगाया गया है इसीलिए ' युद्ध से प्रधानतः वीररस प्रधान रूप को ही ग्रहण करना चाहिये । [ तथा युद्ध में वीररस का उत्साह क्रोध में परिणत होकर रौद्र रस सकता है यह भी यहाँ संकेतित किया गया है ] । स्वभावतः क्रोधी व्यक्ति को उद्दीपन की अपेक्षा होती है या नहीं इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अपेक्षा होती है । यही बात मूल में ' सच ' इत्यादि के द्वारा कही गयी हैं — क्रोध आदि दूसरों के द्वारा उत्पन्न होता है अतः उद्दी-पन की स्थिति आवश्यक या सहज है । ' आधर्षण ' का अर्थ है स्त्रियों आदि का अपमान करना । देश जाति, कुल, विद्या तथा कर्म आदि की निन्दा करना या उन पर आक्षेप लगाना ' अधिक्षेप ' है । झूठ बात को कहना ' अनृतवचन ' है । अपने घर के भृत्यों को पीड़ा देना ' उपघात ' कहलाता है । वाणी की कठोरता या मारने की धमकी देना ' वाक्पारुष्य ' पद का अर्थ है । ' अभिद्रोह ' का अर्थ है— मारने की इच्छा । गुणों में दोष दर्शन ' मात्सर्य ' है । आदि शब्द से राज्य के अपहरण आदि को लिया जाता है । उद्दीपन विभाव के रूप में कवि द्वारा प्रस्तुत इन विभावों से ' रौद्ररस ' अभिव्यक्त होता है ।
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३३० नाट्यशास्त्रम् अत्राह - यदभिहितं ' रक्षोदानवादीनां रौद्रो रसः किमन्येषां नास्ति । उच्यते - अस्त्यन्येषामपि रौद्रो रसः । किन्त्वधिकारोऽत्र गृह्यते । ते हि स्वभावत एव रौद्राः । कस्मात् । बहुबाहवो बहु-मुखाः प्रोद्धूतविकीर्णपिङ्गलशिरोजाः रक्तोवृत्तविलोचना भीमासित. रूपिणश्चैव । यश्च किञ्चित्समारभन्ते स्वभावेन ' चेष्टितं वागङ्गादिकं तत्सर्वं रौद्रमेवैषाम् शृङ्गारश्च तैः प्रायशः प्रसभं सेव्यते । तेषां चानुकारिणो ये पुरुषास्तेषामपि संग्रामं सम्प्रहारकृतो रौद्रो रसोऽ-नुमन्तव्यः । ताडन आदि इसके कार्य हैं तथा नेत्रों की रक्तता आदि अनुभाव हैं यह दोनों अनुभाव रूप होने पर भी दोनों में भेद प्रदर्शनार्थं यहाँ उन्हें पृथक् कहा गया है । भेद यह है कि ताडन आदि अनुभावों को मंच पर प्रत्यक्षतः प्रदर्शित नहीं किया जाता है और इनकी केवल वर्णना या वचनमात्र से सूचना दी जाती है । जैसा कि आगे कहा भी है-युद्धं राज्यभ्रंशो मरणं नगरोपरोधनञ्चैव । अप्रत्यक्ष कृतानि प्रवेशकैः संविधेयानि ॥ ( ना ० शा ० २०१३८ ) [ युद्ध, राज्यनाश, मरण, नगर पर घेरा डालना आदि प्रत्यक्षतः मंच पर प्रदर्शित न किये जाने वाले कार्यों को प्रवेशकों के द्वारा सूचित करना चाहिए । ) परन्तु रक्तनयन आदि जो अनुभाव हैं उन्हें मंच पर प्रत्यक्षतः प्रस्तुत किया जा सकता है । कुछ व्याख्याकारों के मत में मूल में प्रहरण तथा आहरण का पाठ प्रमादवश आ गया है और इनके विभागों के पृथक् कथन का प्रयो-जन महत्वपूर्ण नहीं है । यहाँ इसका अभिप्राय यह है कि राक्षस, दानव तथा उद्धत प्रकृति के १. राक्षसादीनां -- -ग ० । २. समारभान्ते - ग ० । ३. स्वभाव चेष्टितं ग ० । ४. रौद्रमेवेति - ग ० । ५. वाक्यमेतन्नोपलक्ष्यते ग - पु ० । ६. चानुगामिनोग ० । ७. तेषामपि सम्प्रहारकृतो ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः ३३१ ( प्रश्न ) - यदि राक्षस दानव आदि में रौद्ररस होता है तो क्या वह अन्य व्यक्तियों में नहीं होता? ( उत्तर ) —- हाँ यह अन्य व्यक्तियों में भी उत्पन्न हो सकता है परन्तु राक्षस आदि को विशेष रूप से यहाँ इस रस का अधिकारी माना गया है । उद्दीपक कारणों के बिना भी जो सामान्य चेष्टाएँ या कार्य करते हैं. मनुष्य ( यहाँ तक कि नर्मगोष्ठी के वार्तालाप तक उनमें ताडन आदि की प्रमुखता रहती है । यही बात आगे ' यच्च किञ्चित् समारभन्ते ' इत्यादि से कही जायगी । ताडनादग्रस्त पुरुष में उद्दीपन के होने पर रक्तनयन आदि और इसी कारण अधिक हो जाते हैं यही बात ' पुनः शब्द से कही गयी है । शरीर के ऊपरी तले पर चोट करना ' ताडन ' है । ' पाटन ' का अर्थ है दो टुकड़े कर डालना । ' पीडन ' का अर्थ है दबाना या मलना । ' छेदन ' का अर्थ काटना और ' भेदन ' का अर्थ एक दूसरे को अलग करना है । इन शब्दों में भाव में ' ल्युट् ' प्रत्यय किया गया है । शस्त्रों का सभी ओर से प्रहार करना ' प्रहरणाहरण ' है । शस्त्रों का ऐसा प्रहार करना जिससे कोई अंग विदीर्ण न हो ' सम्प्रहार ' कहलाता है और शरीर का शस्त्र प्रहार से विदीर्ण होता ' पातन ' है, इससे रक्तस्राव भी होता है [ अंग भंग नहीं ] । राक्षस आदि परस्पर परिहास के समय भी प्रहार करते हैं पर इससे रक्त निकलता है [ अङ्ग-भङ्ग नहीं होता ] । ' रक्तनयन ' का अर्थ है लाल आँखें हो जाना । भौहों का नीचे से ऊपर उठना ' भ्रुकुटी कहलाती है । दाँत और ओठों का पीडन अर्थात् दाँतों से को चबाना ' पीडन ' कहलाता है और दोनों हाथों के अगले भागों को ओठों का एक दूसरे के द्वारा मसलना ' सङ्घर्ष ' कहलाता है । मूल में दिये गये ' भाव ' शब्द से व्यभिचारिभाव का ग्रहण होता है । ' असम्मोह ' को सम्मोह के विपरीत परिज्ञान के अर्थ में लिया गया है । यहाँ विरोध में ' नन् ' का प्रयोग है ( अर्थात् ' न सम्मोह ' असम्मोहः सम्मोहविपरीतः इत्यर्थः ) सम्मोह में रहने वाला अर्थात् उससे असंगृहीत ज्ञान या सम्यक् ज्ञान ' असम्मोह ' है । यहाँ क्रोध के प्रधान रूप से अनुभव या आस्वाद्य होने के कारण ( वीर रस का स्थायी भाव स्वरूप ) उत्साह व्यभिचारिभाव है । विष के स्पर्श या ज्वरादि के कारण आभ्यन्तर या आन्तरिक भाव के बिना भी बाह्य स्वेद