भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 461–470

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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३३२ नाट्यशास्त्रम् इसका कारण यह है कि वे स्वाभावतः रौद्र स्वरूपवाले हुआ करते हैं, क्योंकि उनकी अनेक भुजायें एवं अनेक मुख होते हैं, वे चारों ओर बिखरे हुए अपने पीले केशों, लाल और घूमते हुए नेत्रों तथा काले वर्ण वाले होने से भयंकर होते हैं । ( इसके अतिरिक्त उनके जो भी कार्य, सम्भाषण तथा आदि देखे जाने से ये व्यभिचारिभाव हैं, ये अव्यक्त होने पर आन्तर ( सात्विक ) भाव कहे जाकर पंखा आदि के ग्रहण करने आदि क्रियाओं के द्वारा व्यक्त किये जाते हैं । यहाँ बाह्य स्वेदादि से प्रकट रूप में दिखाई देने वाले ( सात्त्विक-भाव ) व्यभिचारिभाव के रूप में कहे गये हैं । राक्षस आदि में ही रौद्ररस की स्थिति मानने पर ( फिर ) मनुष्यों में उसकी स्थिति नहीं रहनी चाहिए ऐसी आशंका से पूर्वपक्षी ' यदभिहितम् ' इत्यादि से अपना प्रस्तुत करता है कि जो रौद्ररस राक्षस आदि में बतलाया गया है वह क्या मनुष्यों में नहीं होता? उत्तर में भरत ने बतलाया कि मान-वादि में रौद्ररस की स्थिति होती है यही बतलाने के लिए मूल में ' अन्येषां ' पद दिया गया है । ' अन्य ' शब्द का आशय है कवि या अभिनेता के द्वारा राक्षस आदि के अनुकरण कर्ता मनुष्य ( जो राक्षस आदि के कार्यों का अनु-करण कर रौद्ररस की अभिव्यक्ति करते हैं ) है । ' अधिकार ' शब्द का अर्थ यहाँ ' अनुवृत्ति ' ( प्रवृत्ति ) है । स्वभाव शब्द के बाद ' एव ' पद के प्रयोग से राक्षस आदि में रौद्ररस अवश्य रहता है यह भाव अयोग व्यवच्छेदक से सूचित किया गया है । ' स्वभावतः ' का अर्थ है उनका अपना स्वरूप ( भाव ) अतएव उनमें आङ्गिक रौद्ररस का वर्णन ( भी ) उचित होता है अन्यथा लाल आँखें इत्यादि से स्वाभाविक रौद्र का ही अभिनय होगा, अनेक बाहु मुखादि के द्वारा आङ्गिक रौद्र का अभिनय नहीं होगा । ( प्रश्न ) अपने सेवक आदि के प्रति राक्षस आदि सदा क्रुद्ध नहीं देखे जाते फिर उन्हें स्वभाव रौद्र क्यों कहा गया? ( उत्तर ) उनका आकार लोक पसिद्ध मनुष्यादि के आकार से भिन्न होता है, यही मूल में ' बहुबाहवः ' से उत्तर दिया है और ' बहुबाहवः ' होने का कारण कोई तपश्चर्या या कोई इष्टकर्म होता है, जिसका उद्देश्य दूसरे ( शत्रु आदि ) का नाश करना होता है । इसी कारण राक्षस आदि स्वाभाविक रूप में भी क्रोधात्मक आशय से युक्त प्रतीत होते हैं और उनसे सामाजिकों को रौद्ररस का ही आस्वादन होता है ।

पृष्ठ 462

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षष्ठोऽध्यायः ३३३ शारीरिक चेष्टायें होती हैं वे भी प्रकृत्या रौद्र ( ही ) होती हैं । इसलिए सरलता पूर्वक यही मानना उचित है कि जो इनके अनुकर्ता पुरुष हों उनके युद्ध तथा प्रहार आदि से विहित रौद्र रस उत्पन्न होता है । ) और इन्हों उपर्युक्त कारणों से उनमें राग के समान क्रोध के अवसर पर जो रक्तनेत्र आदि लक्षण दिखलायी देते हैं वे सहज होने से सदैव विद्यमान रहते हैं! उनके नेत्र लाल और चढ़ी हुई पुतलियों वाले होते हैं और उनका रूप भी सदा काला और अत्यन्त भयानक होता है । इस प्रकार केवल उनका शरीर ही क्रूर नहीं होता किन्तु उनके दृश्यमान कार्य भी रौद्ररस का आस्वादन करवाने वाले होते हैं इसे मूल में - ' यच्चेति ' इत्यादि से बतलाया गया है । ' स्वभावेन ' पद से चित्त में क्रोधजन्य विकार न होने पर भी उनका वाचिक या कायिक व्यापार क्रोधात्मक का ताडन आदि प्रधान होता है और इसलिए काव्य या नाट्य में वर्णन या पदर्शन होने पर वह रौद्ररस के आस्वादन का कारण हो जाता है । ' वागङ्गादिक ' का अर्थ है - ऐसे वाचिक तथा कायिक व्यापार जिनके कारण वाणी या शरीर हों - का रौद्ररस प्रधान हो जाना स्वाभाविक है । प्रत्यक्ष नहीं होने के कारण मानस व्यापार का यहाँ उल्लेख नहीं किया गया ( पर वह भी रौद्र रस प्रधान होता है यह मानना चाहिए ) । यहाँ मूल में ' सर्वमिति ' के द्वारा कहे गये विषय की ' श्रृंगारश्च ' इत्यादि से स्पष्ट किया जाता है । शृङ्गार शब्द से यहाँ उसके प्रमदा, उद्यान आदि विभावों का ग्रहण होता है । उनका भी ये बलात् अर्थात् भयङ्कर आकार के द्वारा ही उपभोग करते हैं । जिस श्रृंगार में उग्रता का निषेध हो उसे भी जब क्रूरता या उत्तेजना वश सेवन करते हैं तो फिर दूसरों की तो बात ही क्या है, यही ' च ' शब्द का तात्पर्य है और ' प्रायशः ' शब्द से यह सूचित किया गया है कि कभी - कभी अनुनय से भी ये शृङ्गार रस का उपभोग करते हैं । ' तो फिर उद्धत पुरुषों में रौद्र आदि आवेग ( विकार ) कैसे उत्पन्न होते हैं? क्योंकि वे तो अनेक बाहु आदि से युक्त नहीं होते हैं? ) ऐसी आशङ्का के समाधानार्थ मूल में ' तेषाञ्च ' इत्यादि से कहा गया है । अर्थात् उन राक्षसों के कार्य, प्रकृति आदि का अनुकरण करने वाले मनुष्य भी तामसप्रकृति के कारण उन्हीं के समान समझे जाने चाहिए ।

पृष्ठ 463

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३३४ नाट्यशास्त्रम् और वे जो स्वाभाविक रूप में वाचिक या आंगिक व्यापार प्रारम्भ करते हैं वे भी रौद्र ही होते हैं । ये शृङ्गार का भी बलात्कारपूर्वक सेवन करते हैं । इनकी चाटुकारिता, सेवा या स्तुति करने वाले जो मनुष्य हों उनमें भी युद्ध तथा चोट करने की वृत्ति के सहज ( कारणीभूत ) होने से रोद्ररस मान लेना चाहिए । अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः ' युद्धप्रहारघातनचि कृतच्छेदनविदारणैश्चैव 1 ' सञ्जायते रौद्रः ॥ ६५ ॥

संग्रामसम्भ्रमाद्यैरेभिः

नानाप्रहरणमोक्षैः शिरः कबन्ध भुजकर्तनैश्चैव ।

प्रयोक्तव्यः ॥ ६६ ॥

एभिश्चार्थविशेषैरस्याभिनयः रौद्ररस कैसे होता है इसे ' संग्राम ' आदि से कहते हैं । ' सम्प्रहार " उनमें ताडन तथा पाटन आदि का ग्रहण होता है । इसलिये बहुबाहुत्व पद से पूर्वोक्त मनुष्य क्रोध के उपयुक्त वाचिक तथा शारीरिक आदि के न होने पर भी उद्धत है । इस प्रकार व्यापार से रौद्रस्वभाव ही हो जाते हैं यह सूचित किया गया आदि में रौद्ररस का अयोग व्यवच्छेद निश्चित होता है पर राक्षस तथा दानव उद्धत प्रकृति के पुरुषों से भिन्न वीर रस प्रधान अश्वत्थामा, परशुराम आदि इन पाया जाने पर भी उसका हैं । इनमें कारण विशेष से रौद्ररस के अनुकूल क्रोध से क्रोधा-सम्बन्ध नहीं होता । और राक्षस आदि से भी विभिन्न कारणों नित्य करने वाले हास्य, करुण आदि का भी प्रदर्शन भिनय के समय में क्रोधाभिनय ही रहता है यह नहीं कहा जा देखा जाता है अतः इनमें केवल रौद्ररस सकता है । ( प्रश्न ) तो फिर इस प्रकार के ( रूप तथा स्वभाव वाले ) राक्षस आदि को क्रोधात्मक आस्वाद की प्रतीति कैसे होती है? को देखकर सामाजिकों ) ही आस्वाद रूप होता है तथा क्रोध में ( उत्तर ) हृदय - संवाद ( तादात्मक है, अतः वे अन्याय करने तामस प्रकृति वाले सामाजिकों का ही तादात्म्य होता वाले के विषय में क्रोध का ( रौद्र रस के रूप में ) आस्वादन करते हैं, अतएव इसमें दोष नहीं माना जायगा । १. सत्वप्रहार- ग ०; युद्धप्रहारपातन - ख ० । २. सम्भ्रमोत्थं – ग ० । ३. शेषस्तस्याभि -४० ।

पृष्ठ 464

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३३५ इस विषय में ये अनुवंशीय आर्याएँ हैं: -रौद्ररस युद्ध, प्रहार, चोट, विकार, छेदन, विदारण, ( युद्ध में ) त्वरित व्यापार ( अथवा घबड़ाहट ) आदि के द्वारा प्रकट होता है ॥ ६५ ॥

इसके अभिनय में अनेक शस्त्र प्रहार, सिर, भुजायें तथा घड़ काटना तथा इसी प्रकार अन्य विशेष कार्यों द्वारा किया गया कार्य उपयुक्त होता हैं ॥ ६६ ॥

इति रौद्ररसो रौद्रवागङ्गचेष्टितः ।

' शस्त्रप्रहारभूयिष्ठ उग्रकर्मक्रियात्मकः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार उम्र वाचिक तथा कायिक व्यापारों से युक्त - शस्त्रप्रहार की मात्रागत अधिकता लिए हुए और भयानक ( कार्य और ) क्रियाओं से परिपूर्ण रौद्ररस देखा जाता है ॥ ६७ ॥

१. ' विकृतच्छेदन ' का अर्थ है अङ्गहीन करना आदि । ' युद्ध ' पद से दूसरों के द्वारा किये गये छेदनादि व्यापार का औचित्य सूचित पोता है । • इसीलिये युद्ध आदि के प्रसङ्ग में अनुमित के आधार पर अन्य व्यक्तियों के कोधादि का विभावत्व सूचित होता है । ' संग्राम सम्भ्रम ' का आशय है शस्त्र के ग्रहण करने में शीघ्रता करना । ( दूसरी आर्या में ' नाना ' इत्यादि से अनुभाव को बतलाते हैं । ) यहाँ ' नानाप्रहण ' पद के द्वारा रौद्ररस में मारण की प्रमुखता बतलायी गयी है । और क्रोधातिशय के कारण युद्धस्थल पर मृतशत्रु के मस्तक काटने आदि की सूचना से रौद्र का वीररस से भेद दिखलाया गया है, क्योंकि युद्धवीर में ऐसा कार्य नहीं होता है । रौद्र रस में मृतशरीर के शिरच्छेदन आदि कार्य को ' उप-कर्मक्रियात्मकः ' के द्वारा कहा गया है, क्योंकि रौद्ररस में क्रोधावेश में आकर उपकर्म अर्थात् शत्रु के मस्तकच्छेदन आदि भयङ्कर कृत्यों से ( अर्थात् उनकी ( अभिनय क्रिया से ) पूर्ण ' रौद्र ' रस अभिव्यक्त होता है । इति रौद्ररसप्रकरणम् । १. प्रहरण सङ्कुल शिरः —ग ०:

पृष्ठ 465

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३३६ नाट्यशास्त्रम् वीररस ' अथ वीरो नामोत्तममप्रकृतिरुत्साद्दात्मकः । स चासंमोदाध्य-वसाय - न'यबलपराक्रमशक्तिप्रतापप्रभावादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तस्य स्थैर्यधैर्यशौर्यत्याग वैशारद्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । भावाश्वास्य ' धृति - मति गर्वावे गौप्रथामर्षस्मृतिरोमाञ्च प्रतिबोधादयः । अत्रायें [ रसविचारमुखे ] -वीररस उत्तम प्रकृति के पुरुषों में अवस्थित तथा उत्साह स्थायीभाव अथ वीररसप्रकरणम् १. ( अब ) क्रम प्राप्त वीररस का लक्षण बतलाते हैं: -रौद्ररस के समान युद्धवीर में भी संग्राम, सम्प्रहार आदि रहते हैं इसी कारण रौद्ररस के पश्चात् वीररस का क्रम निधारित किया गया है और इसी आनन्तर्य को मूल में ' अथ ' शब्द के द्वारा कहा गया है । उत्साह उत्तमजन की प्रकृति या स्वभाव होने से उत्साह स्थायीभाव वाला वीररस ( भी ) उत्तम प्रकृति है । अथवा काव्य या नाट्य में स्थित उत्तम प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण इसे ' उत्तम प्रकृति ' समझना चाहिये । क्योंकि उत्तम वर्णों का उत्साह सर्वत्र आस्वाद्य होता है । ( नाट्य व काव्य में ) चार प्रकार के नायकों को धीर शब्द के अनुगत कहा गया हैं ( जैसे ' धीरोदात्त ' इत्यादि । ) इन वर्गों में प्रायः सभी उत्साहवान् होते हैं किन्तु जिनका वर्णन कवि द्वारा विवक्षित नहीं उनके चरित्र का वर्णन नहीं होता । जिनका चरित्र किसी उपदेश या आदर्श को प्रकट करने के योग्य होता है उनके उत्साह की अभिव्यक्ति उचित अवसर पर होती है, और अवसर का ओचित्य असम्मोह आदि दशायें हैं इसलिए ये ही विभाव रूप में यहाँ कही गयी हैं । ' असम्मोहाध्यवसाय ' का अर्थ है, निर्भ्रान्त वस्तु के तत्व का निश्चय, जिससे मनुष्य की विचार शक्ति को प्रकट किया गया है । १. नयविनय बहुल - ग ० । २. सञ्चारिभावा ग ० । ३. अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः:

पृष्ठ 466

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३३७ वाला होता है । यह प्रत्युत्पन्न मतित्व, असम्मोह, अध्यवसाय, नीति ( विनय ), बल ( सैन्य ), पराक्रम, शक्ति, प्रताप, प्रभाव आदि विभावों द्वारा उत्पन्न होता है । इसका अभिनय स्थिरता, धैर्य, शौर्य, त्याग, चातुर्य आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । इसमें धृति; मति, गर्व, आवेग, औग्य, अमर्ष, स्मृति, रोमांच आदि संचारी तथा साविक भाव होते हैं । ( प्रश्न ) यदि ' असम्मोहाध्यवसाय ' को उत्साह का कारण माना जाय तो फिर रावणादि में असद्वस्तुविषयक आग्रह रूप सम्मोह ही उत्साह का जनक देखा गया है ( अतः असम्मोहादि को उत्साह का कारण कैसे माना जा सकता है ) ( उत्तम ) यह कथन ग्रन्थकार के शब्दों से भिन्न होने के कारण इष्ट नहीं है ( क्योंकि ' असम्मोहाध्यवसाय ' को ही उत्साह का जनक माना गया है, सम्मोह को नहीं ) और जिस सम्मोह को उत्साहजनकत्व ( आप ) समझ रहे हैं वहाँ भी पराक्रम और नीति आदि उत्साह के जनक विद्यमान होने से ये ही विभाव हैं [ अर्थात् ऐसी दशा में सम्मोह के स्थान पर पराक्रम तथा नीति आदि विभाव होते हैं ] । नीति में सन्धि आदि छः गुणों का उचित प्रयोग ' नय ' कहलाता है । इन्द्रियों का नियमन या विजय ' विनय ' है । जिसमें हाथी, घोड़े तथा पैदल सैन्य सम्मिलित हों वह सेना ' बल ' है । शत्रुसैन्य को आक्रमण कर पराजित कर ' देना ' पराक्रम ' हैं । यहाँ ' शक्ति का अर्थ है युद्ध आदि का सामर्थ्यं । शत्रु को सन्तप्त करने वाली प्रसिद्धि ' प्रताप ' है । कुलमर्यादा, सम्पत्ति तथा मन्त्रि आदि की पूर्णता ' प्रभाव ' कहलाता है । मूल में दिये गये ' आदि ' शब्द से यश आदि को लेना चाहिये । सब मिल कर ही वीररस के जनक ' विभाव ' कहलाते हैं । उत्तम पुरुषों में इनमें से कोई कभी अधिक या न्यून हो सकता है । इसका वास्तविक उदाहरण श्रीराम का समग्रचरित है । जिन नाटकों में नायक अपने मन्त्रि पर आश्रित रहे तो मन्त्रि में भी ये गुण रखे ( माने ) जा सकते हैं और प्रतिनायक में ये गुण रहने पर भी उत्साह के व्यञ्जक हो सकते हैं । अतएव कवि को अलग अलग गुणों वाले तथा सम्मिलित गुणों वाले विभिन्न चरित्रों ( चरितों वाले पात्रों ) की स्वयं यथोचित कल्पना कर लेना चाहिए । ' स्थैर्य ' का अर्थ है अविचल रहना । गम्भीरता के कारण अपने मानसिक भावों का आच्छादन करना ' धैर्य ' है । युद्ध आदि की क्रिया ' शौर्य ' और दान २२ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 467

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३६८ नाट्यशास्त्रम्

उत्साहाव्यवसायादविषादित्वादविस्मयान्मोहात् ।

विविधादर्थविशेषाद्वीररसो नाम सम्भवति ॥ ६८ ॥

' स्थितिधैर्यवीर्यंगर्वैरुत्साह पराक्रम प्रभावैश्च ।

वाक्यैश्चाक्षेपकृतैर्वीररसः ' सम्यगभिनेयः ॥ ६ ९ ॥

इस विषय में ये ( दो ) आनुवंशीय आर्यायें हैं: -अध्यवसाय, विषाद, विस्मय एवं मोह - शून्यता, सतर्कता तथा इसी प्रकार के अन्य विशिष्ट अर्थों के द्वारा उत्साहात्मा वीररस उत्पन्न होता है ॥ ६८ ॥

देना ' त्याग ' है । साम, दान आदि चारों उपायों का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना ' वैशारद्य ' है । धर्मादि रूप विभिन्न पुरुषार्थों को लक्ष्य में रखते हुए विषाद, विस्मय तथा मोह से रहित होकर अध्यवसाय रूप जो निश्चय होता है वह उत्साह का जनक होने से ' उत्साह ' कहलाता है और यही वीररस का स्थायीभाव माना जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि आपद्ग्रस्तता, अल्पसन्तोष तथा मिथ्याज्ञान को छोड़कर जो तत्व सम्बन्धी निश्चय किया जाता हैं उनमें उत्साह मूलतः मुख्य कारण होता है और रौद्ररस में तमोगुण को प्रमुखता होने से, अनुचित तथा अशास्त्रीय बन्धनादि होने से वहाँ मोह तथा विस्मय की ही प्रधानता होती है यही पार्थक्य है । ' स्थिति ' का अर्थ स्थिरता है । ' वीर्य ' का अर्थ है शौयं । ' गर्व ' पद से वीररस के अनुभावों का अर्थ ग्रहण करना चाहिए । ' उत्साह ' पद से निर्बल या निराश पुरुष को उत्साह देना उत्तेजित करना अभिप्रेत है, जैसे सेतुबन्ध में है । दूसरे ( शत्रु ) पर आक्रमण करना ' पराक्रम ' है । युद्ध में सैनिकों को कार्य बतलाते नियोजित करना तथा सैन्य संचालन ' प्रभाव ' सम्पादन समझना चाहिये । शत्रु पर अन्यथा आरोप करना ' आक्षेप ' कहलाता है । ऐसे आक्षेप-पूर्ण वचनों के कथन से भी ' वीररस ' की उत्पत्ति होती है ( और इससे आक्षेप वचनों के अर्थों की गम्भीर और दुर्ज्ञेय होने की सूचना भी मिलती है । ) इति वीररसप्रकरणम् । १. स्मृति धेयं वीर्य शौर्योत्साह- 5

पृष्ठ 468

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३३ ९ इस वीररस का अभिनय स्थिरता, धैर्य, वीर्य, गर्व, उत्साह, पराक्रम, प्रभाव तथा आक्षेग्पूर्ण कथोपकथन द्वारा किया जाय ॥ ६ ९ ॥ भयानक रस अथ भयानको नाम भयस्थायिभावात्मकः । स च विकृतरव-सत्त्वदर्शनशिवोलूकत्रासोद्वेगशून्यागारार'ण्यगमनस्वजनवधबन्धदर्श-नश्रुतिकथादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तस्य प्रवेपितकरणचरणनयनच पल-प्रयोक्तव्यः ॥ पुलकमुखवैवर्ण्यस्वरभेदादिभिरनुभावैरभिनयः व्यभिचारिभावाश्चास्यर, स्तम्भस्वेदगद्गदरोमाञ्चवेपथुस्वरभेद-वैवर्ण्यशङ्कामोहदैन्यावेग ' चापल जडता त्रासापस्मारमरणादयः । अथ भयानकरस प्रकरणम भयभीत पुरुष को मुख्यरूप से अभयप्रदान करने वाला वीररस होता है अतः उसी के बाद क्रमशः भयानक रस आता है । इसका ' अर्थ ' इत्यादि से स्वरूप बतलाते हैं - ' विकृतत्व ' अर्थात् अट्टहासादि शब्द, सत्वों का अर्थात् भूत, प्रेत, पिशाच आदि का दिखलाई देना । दूसरे में स्थित भय और घबरा-हट भी भयानक रस के कारण होते हैं । शून्य गृह या शून्यवन में पहुँचना, अपने सम्बन्धियों का वध या बन्धन प्रत्यक्षतः देखना या उसका किसी के द्वारा श्रवण करना । ' कथादि ' का आशय है कि स्वजन की बीती घटनाओं के पुनः चिन्तन या स्मरण होने आदि कारणों से भी भयानकरस की उत्पत्ति होती है । ' प्रवेपित ' का अर्थ है हाथ पैर का कांपने लगना, आदि कर्म से व्याधि आदि में होने वाले कम्प के भिन्नत्व की सूचना द्वारा यहाँ भय की व्यञ्जकता बतलायी है । पुलक का अर्थ हैं रोंगटे खड़े हो जाना । स्वर का भेद अर्थात् स्वर का ( स्वाभाविक ) परिवर्तन हो जाना भय के अनुभाव हैं । प्रथम आर्या में दिये गये गुरु तथा नृत्य इत्यादि शब्दों का आशय यह है कि स्त्री, नीच तथा बालक आदि में सहज भय होता है यह आगे कहेंगे पर १. रण्य प्रवेश घ ० । २. भावाश्वास्य ग ० । ३. वेगचापलत्रासापस्मार ग ० ।

पृष्ठ 469

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३४० नाट्यशास्त्रम् आनुवंश्या अत्रार्याः भवन्ति-भयानक रस का स्थायीभाव भय होता है । यह ( अट्टहासादि ) विकृत-शब्द, हिंसक - जन्तुओं के दर्शन ( शब्द तथा रुदन ), सियार तथा उल्लू ( या पिशाच, भूत, प्रेत आदि के ) द्वारा त्रास, उद्वेग, शून्य अरण्य एवं गृह में प्रवेश, आत्मीय व्यक्ति के वस्त्र तथा बन्धन का दर्शन श्रवण तथा कथन आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होता है । इसका अभिनय धूजते हुए हाथ पैर तथा फड़कते हुए नेत्रों, रोमांच, मुँह का उत्तर जाना तथा स्वरभेद आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । इसमें स्तम्भ, स्वेद, गद्गद हो जाना, रोमांच, वेपथु, स्वरभेद, वैवर्ण्य, शंका, मोह, दैन्य, आवेग, जड़ता, त्रास, अपस्मार तथा मरण आदि संचारी ( तथा सात्त्विक ) भाव होते हैं । इस विषय में ये आनुवंशीय आर्याएँ हैं:

विकृतरवसत्वदर्शनसंग्रामारण्यशून्यगृहगमनात् ।

गुरुनृपयोरपराधात्कृतकश्च भयानको ज्ञेयः ॥ ७० ॥

उत्तम तथा मध्यम प्रकृति ( उन्हें भी गुरु तथा राजा से भी उनका उत्तमत्व रहता का अभूत्व या विनय ही भीत एवास्मि भर्तृः ( र ० भय लगता है ' ] इत्यादि यहाँ उपर्युक्त भावना के पुरुषों ) में यह स्वाभाविक नहीं होता, परन्तु भय दिखलाना पड़ता है एवं उस भय के होने पर ही है तथा राजा से भयभीत होने के द्वारा मन्त्रियों सूचित होता है । जैसे रत्नावली में ' स्वेच्छाचारी १।७ ) [ ' स्वेच्छाचार करते हुए मुझे स्वामी से मन्त्री ने कहा है । से ऐसे सुसंगत रूप से कार्य ( अनुभाव ) किये जाते हैं जिससे गुरु आदि को यह प्रतीति हो जाय कि यह सचमुच डर रहा है । अस्वाभाविकता रहने से इसे कृत्रिम ( कृतक ) भाव कहा गया है । यह भाव बहुत समय तक विद्यमान रहकर आस्वाद्ययोग्य होने के कारण ' भयानकरस ' कहलाता हैं । यहाँ ' भय ' संचारी ( या व्यभिचारिभाव ) नहीं है क्योंकि व्यभिचारिभाव तो तभी होगा जब वह स्वभावतः क्षणस्थायी हो ( पर भय वैसा नहीं है, अतः वह व्यभिचारिभाव नहीं किन्तु स्थायी है । )

पृष्ठ 470

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३४१

गात्र मुखदृष्टिभेदैरुरुस्तम्भाभिवीक्षणोद्वेगैः ।

सन्नमुखशोषहृदयस्पन्दनरोमोन्नमैश्च भयम् ॥ ७१ ॥

एतत्स्वभावजं स्यात्सत्वसामुत्थं तथैव कर्तव्यम् ।

पुनरेभिरेव भावैः कृतकं मृदुचेष्टितैः कार्यम् ॥ ७२ ॥

मात्रमुख इत्यादि कारिका से अब अनुभावों का उल्लेख करते हैं । गात्र का अर्थ है - मुख और दृष्टि आदि का भेद उनके रंग ( कार्य ) और स्थिति आदि में परिवर्तन हो जाना । ' अभिवीक्षण ' का अर्थ है- भय के कारण इधर उधर देखने लगना जिसमें किसी एक स्थान पर चक्षुः नहीं ठहरते हों । ' उद्वेग ' का अर्थ है – विचलित हो जाना । ' साद ' का अर्थ है अंगों का सुन्न या शिथिल हो जाना । मुखशोषण का तात्पर्य है तालु का सूख जाना । ' हृदय-स्पन्दन ' का अर्थ है हृदय की गति का ( वेग ) बढ़ जाना । ' भयम् ' का सम्बन्ध वीररस की आर्या में प्रयुक्त पद ' अभिनेयम् ' क्रियापद से लेकर अर्थ होगा । इसका कारण यह है कि ये आर्यायें आचार्यों ने भयानकरस के साथ वीररस के लक्षण को लिखते हुए एक साथ पढ़ी थीं, जिन्हें भरतमुनि ने उचित स्थान ' पर समाविष्ट कर दिया । अतः ' अभिनेयम् ' क्रियापद का दोनों वर्ण्य रसों के साथ अन्वय करना उचित है । एतत्स्वभावजम् इत्यादि । यहाँ ' सत्व ' शब्द का अर्थ है मन की आन्त रिक दशा । उससे उत्पन्न भय ' सत्वसमुत्थ ' होता है । अभिनयादि का निर्देश यहाँ केवल नट के लिए ही नहीं किन्तु दर्शक, सामाजिक आदि सभी के लिए है ऐसी शंकुक आदि प्राचीन टीकाकारों की व्याख्या है परन्तु ऐसा मानना उचित नहीं क्योंकि यह सारा प्रकरण ( तथा नाट्यशास्त्र भी ) कवि तथा अभिनेताओं के शिक्षण के हेतु ही निर्मित है । और विभाव, अनुभाव तथा संचारी आदि का व्यवहार लोक में नहीं होता, अतः स्पष्ट है कि इनकी योजना रसबोध के लिए होती है और लोकजीवन में उनकी समानता नहीं मिल सकती । ' स्वाभाविक ' आदि का आशय यह है कि स्वाभाविक भय राजस और तामस प्रकृति के अर्थात् नीच प्रकृति के व्यक्तियों में होता है पर जो सात्विक प्रकृति के व्यक्ति हैं उनमें स्वाभाविक भय नहीं रहता किन्तु मनः कल्पित या प्रयत्नकृत भय होता है । इसका अभिनय भी इन्हीं वर्णित