भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 471–480

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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३४२ नाट्यशास्त्रम् करचरणवेपथुस्तम्भगात्रसंकोच हृदयकम्पेन ' शुष्कोष्ठ तालु कण्ठैभयानको नित्यमभिनेयः ॥ ७३ ॥

विकृत शब्द, भयंकर जन्तुओं के दर्शन, युद्ध, अरण्य एवं सूने घरों में जाने तथा गुरुजन एवं राजा के अपराध आदि हो जाने के कारण भयानक रस उत्पन्न होता है ॥ ७० ॥

शरीर ( हाथ ( पैर आदि ) के अवयवों, मुख तथा नेत्रों के परिवर्तन, पिण्डलियों के जड़ होने, चारों ओर देखने, उद्विग्न होने, झुके हुए मुँह के अनुभावों के द्वारा किया जाए किन्तु चेष्ठायें यह ' कृत्रिम ' भय ' है । यहाँ ' पुनः ' शब्द से निर्देशित किया गया है । ( प्रश्न ) शक्तिशाली होने पर भी राजा क्यों दिखलाते हैं? और भय दिखलाने पर प्रकट करते हैं? और केवल भयानकरस को प्रकार सभी रस कृत्रिम हो सकते हैं थोड़ी मृदु रहनी चाहिए क्योंकि सहज और कृत्रिम भय में भेद आदि गुरु आदि से कृत्रिम भय मृदु गात्रकम्पन आदि को क्यों ही कृत्रिम क्यों कहा गया जब । जैसे कि वेश्या धन की अभि कि इस प्रेम प्रदर्शित करती है । ऐसी आशंकाओं का एक सामान्य लाषा से कृत्रिम उत्तर यह है कि ' इसका इसी प्रकार अभिनय करना चाहिए । ' क्योंकि अपने भय प्रदर्शित करने पर राजा को गुरु विनयशील मानते हैं । गुरु के सम्मुख प्रस्तुत या प्रदर्शित करने पर उसे अधम और यह भय मृदु चेष्टाओं के द्वारा प्रकृति का नहीं समझा जाता । कृत्रिम शृङ्गार के प्रसङ्ग में कहा गया है कि वेश्या विषयक रति से पुरुषार्थ की सिद्धि वेश्यासक्तों को नहीं होती । पर यहाँ उक्त प्रकार के कार्य से प्रयोजन या पुरुषार्थ की सिद्धि होती है । पर पर अनुग्रहार्थं राजा कृत्रिम क्रोध आदि को प्रदर्शित करे वहाँ जहाँ दूसरों समझना चाहिए । चिरकाल तक स्थित न होने के कारण वह व्यभिचारिभाव इसी अर्थ को बतलाने के लिए अपनी गुरु एवं वंश परम्परा में प्रसिद्ध आर्या को भरत यहाँ प्रस्तुत करते हैं । ' यहाँ नृत्य ' पद से ' करचरण ' इत्यादि होने पर एक ही प्रकार से अभि-भय के स्वाभाविक ( अकृत्रिम ) तथा कृत्रिम नय किया जाने का आशय प्रकट होता है । इति भयानक रसप्रकरणम् । १. हृदयप्रकम्पेन - ग ०:

पृष्ठ 472

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षष्ठोध्यायः ३४३ सूखने, हृदय के धड़कने तथा रोमांच आदि से ' भय ' अभिनीत होता है । यह स्वाभाविक भय का लक्षण है । किसी हिंसक पशु के देखने से उत्पन्न भय भी ऐसा ही होता है अथवा सात्विक भावों से प्रकट होने वाला भय भी इसी प्रकार प्रकट किया जाना चाहिए तथा इन्हीं भावों से ' बनावटी ' भय ' का प्रदर्शन भी होता है, परन्तु उसमें चेष्टाएँ थोड़ी हलकी ( मृदु ) होती हैं ॥ ७२ ॥

भयानक रस का अभिनय हाथ - पैरों के कम्पन, शरीर के स्तम्भन तथा संकोच, हृदय के कम्पन, तालु के शोषण तथा ओष्ठ और हृदय के कम्पन के द्वारा किया जाय ॥ ७३ ॥

अथ बीभत्सो नाम जुगुप्सास्थायिभावात्मकः । स चाद्या [ प्रशस्ता ] ' प्रियाचोष्यानिष्ट श्रवणदर्शनोद्वेजन ' [ परि ] कीर्तनादिभि-विभावैरुत्पद्यते । तस्य च सर्वाङ्गसंहारमुखविकूणनोन्नेखन - निष्ठीवनो-द्वेजनादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः भावास्त्रास्यापस्मारोद्वेगा'-वेगमोहव्याधिमरणादयः । अत्रानुवंश्ये आयें भवतः-अथ बीभत्सरस प्रकरणम् अब अवसर प्राप्त ' बीभत्सरस ' का लक्षण ' अथ इत्यादि से करते हैं । ' अहृद्य ' का अर्थ है अग्राह्य । कोई वस्तु हृद्य होने पर भी दूसरों के लिए स्वभाव से ही अत्यन्त अप्रिय [ अग्रह्य ] होती है, जैसे ब्राह्मणों के लिए लहसुन । धातुदोष अर्थात् वात, पित्त या कफ के कुपित होने पर भी कुछ वस्तुएँ अप्रिय लगती हैं । ' अचोष्य ' का अर्थ है — अपने स्वरूप से दुष्ट न होने पर भी मलादि से सक्त । ' अनिष्ट ' का अर्थ हैं — जिसके निरन्तर सेवन से अधिक सेवन की इच्छा न रहना । सर्वाङ्ग - संहार अर्थात् उनको एकत्र करना या सिकोड़ना । ' मुखविकूणन ' अर्थात् मुख के अवयव नाक, भौहें आदि को सिकोड़ना । ' उल्लेखन ' का अर्थ वमन करना है । कफ का थूकना ' निष्ठीवन ' है तथा ' उद्वेजन ' का अर्थ है शरीर को हिलाना । १. प्रियावेक्षा - ग ०, प्रियाचोक्षा - घ ० । २. दर्शनपरिकीर्तनादि - ग ० । ३. सर्वाङ्गहारमुखनेत्र विघूर्णनं हृल्लेखनिष्ठीवन - ग ० । ४. स्यापस्मारावेग घ ० ।

पृष्ठ 473

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३४४ नाट्यशास्त्रम् ( गद्य भाव ) अब बीभत्सरस बतलाते हैं । इसका ' जुगुप्सा ' स्थायी भाव होता है । यह असुन्दर एवं अप्रिय पदार्थों के अवलोकन, अनिष्ट वस्तु के दर्शन तथा कथन आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होता है । इसका अभिनय सभी अह्नों के संकोच, मुख को सिकोड़ने, घुमाने, ऊपर की ओर ले जाने और थूकने तथा अंगों के घुमाने आदि अनुभावों के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए । इनमें अपस्मार, उद्वेग, आवेग, मोह, व्याधि तथा मरण आदि संचारीभाव होते हैं । इस विषय की प्रतिपादक भिन्न आर्याएँ हैं: -अनभिमतदर्शनेन च गन्धरसस्पर्शशब्ददोषैश्च । उद्वेजनैश्च बहुभिर्बीभत्सरसः समुद्भवति ॥ ७४ ॥

' मुख नेत्र विघूर्णननयन नासाप्रच्छादनावनमितास्यैः ।

अव्यक्तपादपतने बीभत्सः सम्यगभिनेयः ॥ ७५ ॥

( यह ) अप्रिय घिनौने पदार्थ के दर्शन, तथा अप्रिय - गन्ध, रस, स्पर्श शब्द तथा दोषों से पूर्ण अनेक प्रकार की त्रासादायक वस्तुओं के अनुभव करने पर ' बीभत्स ' रस उत्पन्न होता है ॥ ७४ ॥

मुँह ' एवं नेत्रों को घुमाने, नाक और आँखों के वक्र करने, मुँह को झुकाने और अकस्मात् ( बिना जाने ) पैरों को टिकाने, उठाने आदि के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ७५ ॥

१. अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त स्थानों या घृणित पदार्थ देखने पर नाक का दबाना प्रायः लोक में देखा जाता है । ' अव्यक्तपादपतन ' का अर्थ है परस्पर टकराने, उठाने आदि के द्वारा पैरों का गिरना या हड्डी और कङ्कालों से भरे हुए श्मशान में घूमते हुए व्यक्ति के द्वारा अस्पष्ट अर्थात् कहीं लम्बे और कहीं छोटे डग भरना । इति बीभत्सरसप्रकरणम् । १. मुखनेत्र विकूणनया – घ ० । २. सम्यगभिनयः प्रयोक्तव्यः ग ० ।

पृष्ठ 474

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षष्टोध्यायः ३४५ अद्भुतरस-अथाद्भुतो नाम विस्मयस्थायिभावात्मकः स च दिव्यजन-दर्शनेप्सितमनोरथावा पत्यु पवन देवकुलाभिगमनसम्भा ' विमानमायेन्द्र-" जालसम्भावनादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तस्य नयनविस्तारानिमेषप्रेक्षण-रोमाञ्श्चाश्रुस्वेदहर्षसाधुवाददानप्रबन्धहाहाकार बाहुवदनचे लाङ्गुलि'-भ्रमणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ' भावाञ्चास्य स्तम्भाश्रुस्वेद् * -गद्गदरोमाञ्चावेगसम्भ्रमप्रहर्ष - चपलतोन्माद धृतिजडताप्रलयादयः । अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः— ( गद्य भाग ' ) अब अद्भुतरस बतलाते हैं, जो ' विस्मय ' स्थायीभावात्मक है । यह दिव्य जन के दर्शन, इष्ट मनोरथों की प्राप्ति, उद्यान तथा सभा-भवन, सतमंजिले भवन ( विमान ) माया तथा इन्द्रजाल के दर्शन आदि विभावों द्वारा उत्पन्न होता है । इसका नेत्रों के विस्तार, इकटक देखना अथ अद्भुतरसप्रकरणम् १. ' सभी नाट्यप्रदर्शन के अन्त में अद्भुतरस रखा जाता है ' इस वचन के अनुसार ' अर्थ ' इत्यादि से अब अद्भुतरस का लक्षण करते हैं: - -दिव्यजन का अर्थ है गन्धर्व आदि । जिसकी प्राप्ति सम्भव हो वह ' ईप्सित ' तथा जिसकी प्राप्ति असम्भव हो वह ' मनोरथ ' कहलाता है; इन दोनों को प्राप्त करना अर्थात् इनके समीप आ जाना । जिसने सुन्दर भवन आदि न देखे हों उनके लिये ' देवकुल ' ( मन्दिर ) में जाना ' अद्भुतरस ' का विभाव है । एक विशेष प्रकार से निर्मित मण्डप या गृह को ' सभा ' कहते हैं । विमान अर्थात् दिव्यरथ । रूप परिवर्तन आदि की कला ' माया ' कहलाती है । मन्त्र, द्रव्य या वस्तु के रखने आदि की युक्ति से असम्भव वस्तु को प्रदर्शित करना ' इन्द्रजाल ' है । मूल में आये ' तस्य ' पद का अर्थ है अद्भुत रस का । ' हर्ष ' शब्द से १. सम्भाव्यमान माहेन्द्रजाल – ग ० । २. जालसाधनादिभिः घ ० । ३. चरणाङ्गुलि - ग ० । ४. व्यभिचारिभावाश्चास्य – ग ० । ५. अश्रुस्तम्भ ग ० । ६. सम्भ्रमजडताप्रलयादयः -- ग ० ।

पृष्ठ 475

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३४६ नाट्यशास्त्रम् रोमाञ्च, अश्रु, स्वेद, हर्ष, साधुवाद, दान ( दान प्रबन्ध ) ( निरन्तर ) हाहाकर चिल्लाना, बाहु, मुँह अंगुलि या वस्त्र के एक कोने को घुमाने आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय करना चाहिए । इसमें अश्रु, स्तम्भ, स्वेद, गद्गदवाणी, रोमांच, आवेग, सम्भ्रम, हर्ष, चपलता, उन्माद, धृति, जड़ता तथा प्रलय आदि संचारी ( तथा सात्विक ) भाव हैं । इस विषय में दो अनुवंशीय आर्याएँ हैं: -यत्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्म रूपं वा । तत्सर्वमद्भुतरसे विभावरूपं हि विज्ञेयम् ॥ ७६ ॥

स्पर्शग्रहोल्लुकसनैर्हाहाकारैश्च साधुवादैश्च ।

वेपथु गद्गदवचनैः स्वेदाद्यैरभिनयस्तस्य ॥ ७७ ॥

जो भी अतिशयोक्तिपूर्ण ' वाक्य, शिल्प, कर्म तथा रूप हों वे सभी अद्भुतरस में विभाव समझने चाहिए ॥ ७६ ॥

इसका स्पर्श, ग्रहण, शरीर को आनन्द के अतिरेक में ऊपर उछालने अद्भुत रस के अनुभावों का ग्रहण होता है । साधु - साधु कहना ' साधुवाद ' है तथा उससे प्रसन्न होकर दान ( पुरस्कार ) आदि देना ' विस्मय ' के कार्य या अनु-भाव है । विस्मयकारी या अद्भुत वस्तु को देखकर निरन्तर हा हा करना, हाथ, वस्त्र या अंगुली आदि का घुमाना ( आदि भी ) अद्भुतरस के अनुभाव हैं । १. जो दूसरों का अतिक्रमण करे वह ' अतिशय ' कहलाता हैं, जो अन्य अर्थों की अपेक्षा उत्कृष्ट हो और उसका प्रतिपादक वाक्य जो कला या उत्तम कार्य रूप हो उसे भी ' अतिशयार्थयुक्त ' समझना चाहिए । ' कर्मरूप ' पद में प्रशंसा के अर्थ में ' रूपप् ' प्रत्यय किया गया है । यह सभी अद्भुत रस का विभाव होता है । ' स्पर्शग्रह ' इत्यादि से आगे अद्भुतरस के विभावरूप में कहे जाने वाले अभिनय का ग्रहण करना चाहिए । जैसाकि आगे कहा भी है: -किञ्चिदाकुञ्चिते नेत्रे कृत्वा भ्रूक्षेपमेव च । तथांसगण्डयोः स्पर्शात् स्पर्शमेवं विनिर्दिशेत् ॥ ( २४-८३ ) १. शीलश्व – ग ० । २. एभिस्तर्थविशेष रसोद्भुतो नामचयोद्भवः- ग ०, रसोद्भुतो नाम विज्ञेयः घ ० । ३. स्पर्शग्रहोत्क हसन ः-: -ग ० ।

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षष्ठोध्यायः ३४७ उल्लुकसनम् ' ) हा हा शब्द को उच्चारण, साधुवाद, कम्पन, गद्गद वचन तथा स्वेदादि के द्वारा अभिनय करना चाहिए ॥ ७७ ॥

रसों के तीन प्रकार

शृङ्गारं त्रिविधं विद्याद्वाङनेपथ्य क्रियात्मकम् ।

अङ्गनेपथ्यवाक्यैश्च द्वास्यरौद्रौ त्रिधा स्मृतौ ॥ ७८ ॥

धर्मोपघातश्चैव ' तथार्थापचयोद्भवः ।

तथा शोककृतश्चैव करुणस्त्रिविधः स्मृतः ॥ ७ ९ ॥

दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च ।

रसं वीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधमेव हि ॥ ८० ॥

[ आँखों की थोड़ा सिकुड़ा कर भौंहों को ऊपर उठाकर और कपोलों को कन्धे से लगाकर ' स्पर्श ' का अभिनय करना चाहिए । ( ना ० शा ० २४-८३ ) ' उल्लुकसनम् ' का अर्थ है शरीर को प्रसन्नता से ऊपर उछालना । यहाँ ' उल्लुकसनैः ' आदि में बहुवचन के प्रयोग से विभिन्न पुरुषों की विविध प्रकृति के अन्तर को सूचित किया गया है । इति अद्भुतरसप्रकरणम् । ' शृङ्गार ' इत्यादि कारिकाओं के द्वारा रसों के विभेद बतलाने के व्याज से प्रधानभूत विभाव के कारणानुरूप सांख्यदर्शन के अभिमत त्रिगुणात्मक भावों को प्रतिपादित किया गया है । रौद्ररस के भेदों में जिसे ' स्वभाव रौद्र ' कहा गया है उसे ही यहाँ ' वाक्य-रौद्र ' समझना चाहिए, क्योंकि स्वभाव के अनुसार ही ' वाक्य ' रहते हैं । उत्तम प्रकृति के पुरुषों में ' धर्मोपघातज ' शोक हो सकता है और धर्महानि तो उत्तम नहीं होती पर उसका मूल भाव धर्मरक्षण उत्तम होने के कारण ' शोभन हेतु ' कहा जा सकता है । ' शोक ' शब्द से स्वजन के नाश से उत्पन्न करुण का ग्रहण करना चाहिए । तीनों करुणरस के विभाव होते हैं । धर्म शब्द से यहाँ अग्निहोत्र आदि कार्यकलाप के सम्पादन करने का अर्थ समझना चाहिए । १. तथा त्वप ग ० घ ० । २. प्राहुस्तज्ज्ञास्त्रिविधसम्मतम् - ग ० प्राहु-स्तज्ज्ञा स्त्रिविधमेव च घ ० ।

पृष्ठ 477

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३४८ नाट्यशास्त्रम्

व्याजाच्चैवापराद्धाच्च वित्रासितकमेव च ।

पुनर्भयानकं चैव विद्यात्रिविधमेव हि ॥। ८१ ॥

बीभत्सः क्षोभणः ' शुद्ध उद्वेगी स्यात् तृतीयकः ।

विष्ठाकृमिभिरुद्रगी क्षोभणो रुधिरादिजः ॥ ८२ ॥

शृङ्गाररस वाणी, नेपथ्य तथा क्रिया भेद से तीन प्रकार का होता है । हास्य और रौद्ररस भी अंग, नेपथ्य तथा वाक्य के भेद से तीन प्रकार के होते हैं । करुणरस धर्मोपघातज, अपचयोद्भव तथा शोधकृत भेद से तीन प्रकार का होता है । वीररस के दानवीर, धर्मवीर तथा युद्धवीर नामक तीन भेद होते हैं ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है । व्याज से अर्थात् बनावटी । इसके द्वारा अनुभावों की मृदुता सूचित की गई है । यहाँ ' अपराध ' शब्द से अपराध करने वालों से ( चोरों आदि से ) होने वाले भय का संकेत है । तीसरे भेद के अन्तर्गत ' वित्रासितकम् ' जाता है । स्वभाव से ही डरपोक स्त्री बालक आदि को किसी तिनके के हिलने से भय होने लगे तो उसे ' वित्रासितक ' कहते हैं । जो विशेषरूप से भोत हैं वे बालक आदि ' वित्रासित ' कहलाते हैं और उनमें रहने के कारण ' भय ' भी ' वित्रासित ' होता । यहाँ वित्रासित शब्द को संज्ञा के अर्थ में ( ' संज्ञाया क ' सूत्र से ) " कन् ' प्रत्यय लगाकर ( ' वित्रासितक ' शब्द ) निष्पन्न किया गया है । कुछ प्राचीन टीकाकारों के अनुसार गुरुजन आदि के प्रति अपराध करने पर उत्तम प्रकृति के व्यक्तियों में भी वास्तविक भयावेश हों जाता है । यह उचित नहीं है क्योंकि अपने विनाश की आशंका से वास्तविक भय उत्पन्न होता है जो उत्तम प्रकृति के पुरुषों में नहीं होता । अतः स्त्री तथा नीच प्रकृति के लोगों में यथार्थं ( सामान्य ) भय देखा जाता है ( यही सामान्यतः कहा गया है । ) रुधिर तथा आंतों को देखने से जो बीभत्स उत्पन्न होता है बह क्षुब्ध करने के कारण ' क्षोभण ' और शुद्ध कहलाता है और जो विष्ठा आदि के देखने से उत्पन्न होता है वह उद्वेगजन तथा हृदय को विचलित करने वाला होने से उगी है । यह अशुद्ध विभावों से उत्पन्न होने के कारण अशुद्ध कहलाता है । १. क्षोभज: ० । २. क्षभजो ग ० घ ० ।

पृष्ठ 478

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३४ ९ भयानकरस व्याज ( कृत्रिम, प्रदर्शन ); अपराध तथा त्रास द्वारा उत्पन्न होकर तीन प्रकार का होता है । बीभत्सरस क्षोभज, शुद्ध तथा उद्वेगी भेद से तीन प्रकार का होता है । मूल तथा कीड़े आदि सड़ी वस्तुओं के देखने से ' उद्वेगी ', रुधिरादि वस्तु के देखने से ‘ क्षोभज ' ॥ ७८-८२ ॥

अद्भुत रस के दो भेद-दिव्यश्चानन्दजश्चैव द्विधा ख्यातोऽद्भुतो रसः ।

दिव्यदर्शनतो दिव्यो हर्षादानन्दजः स्मृतः ॥ ८३ ॥

परन्तु ( केवल ) अद्भुतरस के दो भेद होते हैं - दिव्य ' तथा आनन्दज । अलौकिक या दिव्य वस्तुओं तथा व्यक्तियों के दर्शन से ' दिव्य ' तथा हर्षादि से उत्पन्न ' आनन्दज ' होता है ॥ ८३ ॥

इस विषय में ( अभिनवगुप्त के उपाध्याय ) भट्टतौत का मत है कि इन दोनों प्रकार के बीभत्सों को क्षोभज अर्थात् अशुद्ध समझना चाहिए । संसार को संचालित करने वाले राग द्वेष आदि का विरोधी होकर जो मोक्ष का साधक हो उसे ही वस्तुतः ' शुद्ध बीभत्स ' माना जाना चाहिए । बीभत्स का स्थायी भाव जुगुप्सा है जो योगांग होने से मोक्ष में उपयोगी है । जैसा कि पतञ्जलि ने कहा भी है कि " शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा " ( यो ० सू ० २।४० ) ( शौच के सिद्ध होने पर अपने शरीर से भी घृणा हो जाती है ) अतः शौच से बीभत्स का स्थायी भावजुगुप्सा भी. मोक्ष साधन में उपयोगी है और ' विपक्ष बाधने प्रतिपक्षबाघनम् ' ( यो ० सू ० २।३३ ) वित्तकों के द्वारा बाधा उपस्थित होने पर प्रतिपक्ष की भावना का समाहार आवश्यक है ) अतः उक्त दो भेदों के अतिरिक्त बीभत्सरस की यह तीसरी कोटि भी स्वीकार्य होने के कारण बीभत्सरस के तीन प्रकार हो जाते हैं । कारिका में दिये गये ' द्वितीयकः ' पद से मोक्षोपयोगी बीभत्स की दुर्लभता होने से उसकी न्यूनता को संकेतित किया गया है । १. दिव्य शब्द से जिसमें सभा, विमान आदि हो ऐसे विभावों का ग्रहण होता है । जिसमें मनोरथ आदि आनन्द प्रदान करते हों उसे ' आनन्दज ' समझना चाहिए । प्रथम में दिव्यता विस्मयकारी और दूसरे में हर्ष आनन्द-प्रदाता होता है ।

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३५० नाट्यशास्त्रम् FEB शान्तरस अथ ' शान्तो नाम शमस्थायिभावात्मको मोक्षप्रवर्तकः । स तु यहाँ श्रृंगार इत्यादि में आये हुए अन्य विभावों तथा अनुभावों के अभाव की शंका के निराकरण के लिए ' च ' कार है [ अर्थात् इनके अतिरिक्त अन्य विभाव और अनुभाव भी हो सकते हैं । और उनमें से इतने ही यहाँ सङ्गत हो सकते हैं इसे दिखलाने के लिये चकार के बाद ' एव ' शब्द का प्रयोग किया गया है और ' तथा ' शब्द से अनुक्त विभावादिकों का संग्रह करने का निर्देश भी किया गया है । अथ शान्तरसविचारः अब नवरसवादियों के मत के अनुसार ' शान्तरस ' का प्रतिपादक स्वरूप बतलाया जा रहा है । इस विषय में कुछ के अनुसार - शान्त शमस्थायी भाव वाला है और इसकी उत्पत्ति तप और योगिसम्पर्क आदि विभावों से होती है और काम, क्रोध आदि अभावरूप अनुभावों से इसका अभिनय किया जाता है तथा घृति, मति आदि इसमें व्यभिचारिभाव होते हैं । पर ( इस मत के ) विपक्षी जन इसे स्वीकार नहीं करते । उनके मत में शम और शान्त शब्द समानार्थक ( पर्याय ) है जिनमें एक को स्थायी और दूसरे को रस मानना अनुचित होगा । इसके अतिरिक्त भावों की उनचास संख्या नियत होने से यदि यहाँ ' शम ' को माना जाय तो यह संख्या का परित्याग होगा अतः संख्यावृद्धि के आपादक होने से शान्त को रस कैसे माना जाय । और ऋतुमाल्य आदि विभाव अपने पश्चात् उत्पन्न होने वाले शृङ्गारादि रस में कारण रूप से प्रतीत होते हैं पर यहाँ तप और स्वाध्याय आदि विभाव अपने उत्तरवर्ती शान्त या शम में कारणरूप से प्रतीति नहीं होते । अब यदि यह कहें कि ( तप, अध्ययन आदि ) तत्वज्ञान के बाद में आने वाले हेतु हैं तो पहले उत्पन्न होने वाले तत्व ज्ञान के प्रति कारण होने से शम के विषय में तप, अध्ययन आदि को विभावता नहीं रहेगी । और कामादि के • अभाव को भी शान्तरस का अनुभाव नहीं माना जा सकता है क्योंकि कामादि का अभाव शान्त के विरोधी वीर आदि अन्य रसों में भी होता है अतः यह १. अथ शमो - ख ० /

पृष्ठ 480

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षष्टोऽध्यायः ३५१ तत्वज्ञानवैराग्याशयशुद्धयादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य यमनियमा अभाव की स्थिति शान्त की बोधक नहीं हो सकती, ऐसी दशा में वीर आदि रसों से शान्त रस का पार्थक्य स्पष्ट नहीं होता । ( शान्तरस का ) अभिनय में भी समावेश नहीं हो सकता क्योंकि चेष्टा के अभाव का अभिनय करना सम्भव नहीं । सोने तथा मूच्छित होने पर निश्चे-ष्टता मानी गयी है पर इसका अभिनय श्वास प्रश्वास लेने, शयन करने गिरने आदि से किया जाता हैं [ अतः ' शम ' की व्यापार - शून्यता की दशा का अभि-नय कैसे होगा ] विषयों के उपभोग से प्राप्त तृप्ति रूप धृति शान्तरस में कैसे सम्भव है? ( और फिर उसमें धृति व्यभिचारी भाव नहीं बन सकता ) शम प्रधान पुरुष के निश्चेष्ट बैठ जाने पर उसके द्वारा तत्वज्ञान के उपायों का उपयोग या अनुष्ठान कैसे होगा? ( और तत्वज्ञान के न होने से मोक्ष रूप फलप्राप्ति भी उसे नहीं होगी ) साधक पुरुष तत्वज्ञान की प्राप्ति के उपरान्त भी संसार में दूसरों के दुःख से दुःखी देखे जाते हैं [ अतः शान्तरस सुख-दुःख से रहित भी नहीं है ] इसलिए शान्तरस को स्वीकार नहीं किया जा सकता । [ इस प्रकार पूर्वपक्ष उपस्थित करने के बाद उसके समाधान के लिये सिद्धान्त पक्ष का आरम्भ करते हैं ] संसार में जैसे धर्मादि तीन पुरुषार्थ कहे ये हैं उसी प्रकार शास्त्र, स्मृति तथा इतिहास आदि में मोक्ष भी चतुर्थ पुरुषार्थ माना गया है । और जैसे काम आदि के उपयुक्त रति आदि शब्दों से अभिहित चित्तवृत्तियाँ कवि तथा अभिनेताओं के कार्य तथा अभिनय के द्वारा उस प्रकार की हार्दिक भावनाओं वाले सामाजिक के लिए शृंगार आदि के रूप में आस्वाद्य बनाई जाकर रसत्व को प्राप्त करवाई जाती है उसी प्रकार मोक्ष पुरुषार्थ के अनुरूप या उपयुक्त शम ( रूप ) चित्तवृत्ति रसत्व को क्यों नहीं प्राप्त करवायी जा सकेंगी यह कहिये? और जो जहाँ शम रूप चित्तवृति बतलाई गयी है वही शान्तरस का स्थायी भाव है यहाँ विचारणीय यही है कि इसका स्थायीभाव कौन है? कुछ लोगों का " मत है कि तत्वज्ञान से उत्पन्न ' निर्वेद ' ही शान्तरस का स्थायीभाव है । निर्धनता आदि से उत्पन्न निर्वेद से शान्तरस का स्थायी निर्वेद भिन्न है, क्योंकि यहाँ तत्वज्ञान कारण रूप में होने से भिन्न स्थिति उत्पन्न कर रहा है । इसी-लिये भरतमुनि ने इसे स्थायी तथा संचारिभावों के मध्यवर्ती रखा है । मुनि