भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 481–490

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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३५२ नाट्यशास्त्रम् ध्यात्मध्यानधारणोपासन सर्वभूतदयालिङ्गग्रहणादिभिरनुभावैरभिनयः ने स्थायी भावों में निर्वेद को न रखकर उसका व्यभिचारिभावों में ही सर्व-प्रथम उल्लेख किया है । यदि ' निर्वेद ' मोक्ष का साधन न होकर केवल दरि-व्रता आदि से सम्बद्ध होता तो मंगल की कामना से भरत मुनि इसका सर्व प्रथम उल्लेख नहीं करते । और जब भरतमुनि ने " निवेद ' को व्यभिचारि-भाव माना है तो उसे स्थायीभाव कैसे माना जाय? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि भरतमुनि ने बीभत्स रस के स्थायी भाव जुगुप्सा को श्रृंगार में व्यभिचारिभाव रूप में निषेध करते हुए सभी स्थायीभावों का अपने रस में स्थायीभावत्व तथा अपने से भिन्न रसों में व्यभिचारिभावत्व स्वीकार करने की अनुमति दी है । यदि कोई भाव स्थायी है तो वही व्यभिचारिभाव हो सकता है । अतः तत्वज्ञानजन्य ' निर्वेद ' भी स्थायी तथा व्यभिचारिभाव होकर शान्त रस का स्थायीभाव बन सकता है । और तत्वज्ञानजन्य निर्वेद केवल स्थायीभाव ही नहीं है वह रत्यादि अन्य स्थायी भावों का उपमर्दक भी है । और जो व्यभिचारिभावों के वैचित्र्य को सहन करने वाले रत्यादि से भी अधिक स्थायी स्वभाव वाला है, वही अन्य रसों के स्थायीभावों का विमर्दक होता है [ अतः निर्वेद ही शान्तरस का स्थायीभाव है ] अन्य आचार्य इस मत पर यह आक्षेप करते हैं कि तत्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद शान्तरस का स्थायीभाव है तो तत्वज्ञान को उसका कारण स्वीकारा जाय । पर वैराग्य के मूलभूत तत्वज्ञान को शान्तरस का विभावत्व ( कारणत्व ) कैसे माना जाय? यदि कही कि परम्परया उनका उपाय होने से विभावत्व तो कारण के कारण में विभावत्व का व्यवहार होने से अतिप्रसङ्ग या अन विस्था दोष होगा । [ अतः तत्वज्ञानजन्य निर्वेद को स्थायी नहीं माना जा सकता ] । इसके अतिरिक्त सब विषयों में अनुपादेय बुद्धि रूप ' निवेद ' वैराग्य स्वरूप है । वह तत्वज्ञान के लिए विपरीत रीति से उपयोगी है क्योंकि विरक्त मनुष्य ऐसा प्रयत्न करता है जिससे उसे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो और तत्वज्ञान से मोक्ष उत्पन्न होता है । इस प्रकार पहिले वैराग्य और फिर तत्वज्ञान होता है यह नहीं कि तत्वज्ञान से निर्वेद और निर्वेद से मोक्ष होता हो । अत तत्वज्ञानजन्य निर्वेद को शान्तरस का स्थायीभाव कैसे माना जा सकत है ।

पृष्ठ 482

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३५३ प्रयोक्तव्यः । व्यभिचारिणश्चास्य निर्वद - स्मृति धृति - सर्वाश्रम - शौच-स्तम्भरोमाञ्चादयः । अत्रार्याः श्लोकाश्च भवन्ति-अतएव ( आत्मज्ञानरहित ) केवल ' वैराग्य से प्रकृतिलय होता है ' ऐसा श्रद्धेय ईश्वरकृष्ण ने अपनी सांख्यकारिका ( का ० सं ० ४५ ) में भी कहा है । ( प्रश्न ) यह देखा जाता है कि तत्वज्ञानी पुरुष को दृढ़तर वैराग्य होता है । पतञ्जलिमुनि ने भी कहा है कि ' तत्परं पुरुषख्याते गुणवतृष्ण्यम् ' ( यो ० सू ० १।१६ ) [ आत्मज्ञान होने पर प्राकृतिक पदार्थों के प्रति जो वितृष्णभाव हो जाता है वही परवैराग्य है ] अतः तत्वज्ञानजन्य निर्वेद शान्तरस का स्थायी-भाव माना जा सकता है । ( उत्तर ) यह ठीक है पर इस प्रकार के वैराग्य को ज्ञान की पराकाष्ठा माना गया है और यही बात स्वयं पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र ( १।१६ ) के द्वारा स्पष्ट भी की है । इस रूप में तत्वज्ञान अपनी ही श्रृंखला द्वारा परिपोषित होकर परवराग्य हो जाता है । अतः निर्वेद स्थायीभाव नहीं है किन्तु तत्व-ज्ञान ही शान्तरस का स्थायीभाव है । और व्यभिचारिभावों की व्याख्या के अवसर पर ( अ ० ७ ) तत्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद कहा गया है, पर वहाँ तत्व-ज्ञान से उत्पन्न निर्वेद को इसलिये कारण कहा गया है कि ( जिन ) सांसारिक पुरुषों द्वारा भ्रान्तिवश धोखा खाया जाता है उनके विषयभोगादि में उपादेयता-बुद्धिरूप भ्रम को दूर करने के लिये ही निवेद के कारण को तत्वज्ञान कहा गया है । जैसा निम्न पद्य में: -वृथा दुग्धोऽनड्वान् स्तनभरनता गौरिति परं परिष्वक्तः षण्ढो युवतिरिति लावण्यरहितः । कृता वैदूर्याशा विकचकिरणे काचशकले मया मूढेन त्वां कृपणमगुणज्ञं प्रणमता ॥ [ अर्थ - गुणों को न जानने वाले एवं कृपण स्वरूप के कारण प्रणाम कर मैंने अयन के भार से झुकी हुई गौं आपको अपनी मूढ़ता समझकर अब तक यों ही बैल दुहने का व्यर्थ प्रयास किया, लावण्यहीन नपुंसक को युवती मानकर व्यर्थ ही आलिङ्गन किया और किरणों को प्रतिफलित करने वाले काँच के टुकड़े में वैदूर्यमणि की व्यर्थ ही आशा रखी । ] यहाँ यह गौणरूप से तत्वज्ञान को निर्वेद का कारण मान कर जो कहा है । वह मोक्ष के उपपादक निर्वेद के प्रति नहीं है, परन्तु खेदरूप निर्वेद के कारण २३ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 483

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३५४ नाट्यशास्त्रम् ( गद्य भाग ) अब मैं शान्त रस बतलाता हूँ, जिसका ' शम ' स्थायीभाव है तथा जो मोक्ष का आपादक है । यह तत्त्वज्ञान, वैराग्य, चित्त शुद्धि ( विभाव ) रूप में कहा गया है । यह बात व्यभिचारिभावों की व्याख्या के अवसर पर विस्तार से पुनः ( ना ० शा ० अध्या ० ७ पर ) कहेंगे । ( पूर्वपक्षी - प्रश्न ) - मिथ्याज्ञानमूलक विषयों के साथ रागादि सम्बन्ध तत्वज्ञान से नष्ट हो जाता है यह अक्षपाद ने दुःखजन्मप्रवृत्ति ' ( न्या ० सू ० १।१२ ) इत्यादि सूत्र से कहकर मिथ्याज्ञान के नाशक तत्वज्ञान को दोषाभाव रूप वैराग्य का कारण कहा है । ( सिद्धान्ती प्रतिप्रश्न ) तो इससे क्या हो गया? ( पूर्वपक्षी ) यह कि वैराग्य ही निवेद है । ( सिद्धान्ती ) यह कैसी बात है? दोनों कैसे समान हो सकते हैं, क्योंकि शोकप्रवाह के प्रसार रूप चित्तवृत्ति का नाम ' निर्वेद ' और रागादि भावों का विनाशक रूप ' वैराग्य ' होता है । और वैराग्य को निर्वेद का रूप मान भी लिया जाय तो भी अपने कारण से उत्पन्न उस दोषाभाव रूप वैराग्य के मध्यवर्ती मिथ्याज्ञान के नाश के बाद होने वाले वैराग्य को मोक्षरूप फल की सिद्धि में साक्षात् कारण नहीं माना जा सकता । तथा ' तत्वज्ञान से निर्वेद की उत्पत्ति होती है ' ऐसा कहने से ' राम ' का ही दूसरा नाम ' निर्वेद ' है यह सिद्ध हो जाता है फिर शम को ही क्यों न स्थायी भाव माना जाय । यदि यह कहा जाय कि शम और शान्त दोनों पर्याय हैं तो हास और हास्य शब्द की पर्या-यता से ही उसका परिहार हो जाता है और सिद्ध साधनता दोष का निरा-करण स्थायीभाव के लौकिक तथा रस के अलौकिक होने से हो जाता है । तथा स्थायीभाव तथा रस में साधारण तथा असाधारण का भेद होने से शम और शान्त में वैलक्षण्य [ भेद ] भी है । अतएव शान्तरस का निर्वेद स्थायी-भाव नहीं है किन्तु शम ही स्थायीभाव माना जाना चाहिये । कुछ अन्य आचार्यो का यह मत है कि जिन रत्यादि आठ चित्तवृत्तियों का पहले उल्लेख किया गया वे ही पूर्व अभिहित शृङ्गार आदि में उपयोगी या प्रयुक्त विभावों से भिन्न, श्रुत ( आध्यात्मिक चर्चा ) आदि अलौकिक विभावों के आश्रय से भिन्न रूप में व्यक्त होतीं हैं । अतएव उनमें से ही कोई एक यहाँ स्थायीभाव हो सकता है । तब अखण्डानन्द स्वरूप आत्मविषयक रति ही जो

पृष्ठ 484

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षट्टोऽध्यायः ३५५ आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होता है । इसका यम, नियम, अध्यात्म-ज्ञान, ध्यान, धारणा, उपासना, सभी प्राणियों पर दया, यति - वेशःग्रहण कि मोक्ष का साधन कही गयी है - यहाँ ( शान्तरस में ) स्थायीभाव रूप है । जैसा कि ( भगवद्गीता में ) कहा गया हैं: -यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ ( गी ० ३।१७ ) [ अर्थः- जो आत्मा में रति रखने वाला, आत्मा में ही आनन्द का अनु भव ' करने वाला तथा अपने में ही सन्तुष्ट रहने वाला व्यक्ति है उसके लिए कोर्ड कर्तव्य शेष नहीं होता । ] यहाँ मोक्षविषयक शान्तरस का रति स्थायी-भाव कहा गया है । इसी प्रकार समस्त वस्तुओं के विषयों में विकार देखकर ( विकृतदर्शन-जन्य हास्यरस का ' हास ' स्थायी ), समस्त संसार को शोचनीय रूप में देखकर करुण का ' शोक ' स्थायी ] सांसारिक घटनाओं को [ आत्मज्ञान में | अपकारी देखने वाले को [ रौद्र का ' क्रोध ' स्थायी ], अत्यन्त ज्ञानप्रधान वीर्यं [ उत्साह ] का आश्रय लेने वाले को [ वीर का ' उत्साह ' स्थायी ], सारी विषय वस्तुओं से भय का अनुभव करने वाले को [ भयानक का ' भय ' स्थायी ], सभी के लिए स्पृहणीय प्रमदादि से घृणा करने वाले को [ बीभत्स का ' जुगुप्सा ' स्थायी ] और अपने आत्मस्वरूप के अपूर्वं साक्षात्कार से विस्मय का अनुभव करने वाले [ अद्भुत का ' विस्मय ' स्थायी ] साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है । अतः यहाँ रति से लेकर विस्मय पर्यन्त विभिन्न स्थायीभावों का शान्त के स्थायी-भाव के रूप में निरूपण किया गया है और यह मत भरत के अनुकूल भी ( हो सकता ) है क्योंकि ( जब ) भरत विशिष्ट विभावों को गिनाने के साथ ' आदि ' शब्द का प्रयोग कर अन्य विभावों का समाहार करते हैं तो उसी से ' उन सामान्य हेतुओं से भिन्न ( श्रुतादि रूप ) अलौकिक हेतुओं से उत्पन्न रत्यादि से भी मोक्ष की सिद्धि मानी है । [ यह अन्य आचार्यों का व्याख्यान है ] । इस प्रकार सभी रसों के स्थायीभाव शान्तरस के स्थायीभाव हो सकते हैं यह स्वीकार करने वालों में परस्पर विचार करने पर किसी एक की भी स्थायी भाव रूप में स्थित निश्चित नहीं हो सकेगी । उन विभावों के भेद से

पृष्ठ 485

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३५६ नाव्यशास्त्रम् आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय करना चाहिये । इसमें निर्वेद, स्मृति, धृतिः ( सभी आश्रमों में ) पवित्रता, स्तम्भ, रोमांच आदि संचारी भाव होते हैं । उस - उस रत्यादि का शान्तरस में स्थायिभावकत्व होता है यह कहना भी अनु-चित है क्योंकि भिन्न - भिन्न व्यक्तियों में भिन्न - भिन्न स्थायीभावों की स्थिति मानने पर एक शान्तरस के ही अनन्त भेद होने लगेंगे । और यदि यह कहा जाय कि मोक्ष रूप फल के एक होने से शान्तरस भी अभिन्न होगा तो ऐसी दशा में वीर तथा रौद्ररस का भी किसी एक धर्मादि पुरुषार्थ से अभिन्न फल होने से उनका भी अभेद होगा । अतः रत्यादि आठों या उनमें से कोई एक शान्तरस का स्थायीभाव नहीं हो सकता । एक दूसरे मत के अनुसार पाकरस के आस्वाद के समान शान्तरस में सभी स्थायीभाव मिलकर स्थायीभाव हो जाते हैं । किन्तु रत्यादि विविध चित्तवृत्तियों के एक साथ सम्भव न होने तथा हास, क्रोध आदि चित्तवृत्तियों में एक दूसरे का विरोध होने से यह मत भी स्वीकार्य नहीं है । ( प्रश्न ) तो फिर शान्तरस का स्थायीभाव कौन है? ( उत्तर ) इसके उत्तर में कहना यह है कि इस विषय में सबसे मुख्य बात है कि तत्वज्ञान ही मोक्ष का साधन होता है अतः उसे ही स्थायीभाव मानना उचित है । ऐन्द्रिकज्ञान से भिन्न आत्मज्ञान ही ' तत्वज्ञान ' है । इस रूप में आत्मपदार्थ अनात्म से भिन्न होता है अतः ज्ञान, आनन्द आदि विशुद्ध धर्मों से युक्त और विषयोपभोग की परिकल्पना से हीन आत्मा ही शान्तरस में स्थायीभाव स्वरूप है । इस आत्मतत्व के स्थायीभाव होने पर रत्यादि को अस्थायीभाव नहीं समझना चाहिए क्योंकि रत्यादि अपने कारणों के उपस्थित या अनुपस्थित होने के कारण उत्पन्न और विलीन होकर भी आत्मतत्वरूप स्थायी भिति के आश्रित होकर अधिक काल तक स्थिर रहने के कारण स्थायी कहलाते हैं [ अतः इनका स्थायित्व सापेक्ष है ], परन्तु तत्वज्ञान रत्यादि अन्य समस्त भावों का आश्रय रूप है, अन्य स्थायी स्वभाव वाला है, जो रत्यादि वृत्तियों को व्यभिचारिभावत्व प्राप्त करवाता है और जो स्वभावतः स्थायीभाव रूप में स्वयं सिद्ध हैं । यहीं कारण है कि भरतमुनि ने इसकी अलग से स्थायी भावों में गणना नहीं की; जैसे किसी मस्तक और घड़ के मध्यवर्ती गोत्व या प्राणित्व की अलग गणना नहीं की जाती । अतः उनचास भावों का ही कथन उचित है

पृष्ठ 486

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षष्टोऽध्यायः ३५७ इस विषय में आर्याएँ तथा श्लोक हैं । F मोक्षाध्यात्मसमुत्थस्तत्त्वज्ञानार्थहेतु संयुक्तः नैःश्रेयसोपदिष्टः शान्तरसो नाम सम्भवति ॥ ८४ ॥

यदि यह प्रश्न किया जाय कि ऐसा होने पर शान्तरस की पृथक गणना क्यों की गयी है तो इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इसका आस्वाद इन सभी से मित्र ( प्रकार का ) है । अन्य भावों का आस्वाद विभिन्न प्रकार का होता है पर रति आदि के समान आत्मस्वरूप से अमिश्रित होकर लौकिक प्रतीति का विषय नहीं होता । इस समाधि दशा में आत्मस्वरूप निर्विकल्पक रूप से साक्षात्कारात्मक होने पर भी व्युत्थानकाल या समाधि भंग होने पर अन्य चित्तवृत्तियों से कलुषित हो जाता है । यही कारण है कि शान्तरस को भिन्न रस माना गया है । अथवा लोक में आत्मा की अनुभूति सम्भव होने पर भी सम्भावना के आधार पर उनकी स्थायीभावों में गणना नहीं की जा सकती, क्योंकि सम्भावित स्थानीभावों का रसों की निष्पत्ति में उपयोग नहीं होता । क्षणि-कता के कारण इनमें व्यभिचारित्व और अलक्षणीयत्व का ही बोध होगा; अतएव ' उनचास भावों के द्वारा ' इत्यादि जो कहा गया है वह ( उचित या ) उपपन्न हो जाता है । और इस आत्मस्वरूप को भरत मुनि ने व्यभिचारिभाव के रूप में सम्भव न होने, विभिन्न अनुभूतियों के उत्पादक न होने तथा अनौचित्य पूर्ण होने से ' शम ' शब्द से अभिहित नहीं किया है । पर यदि उसी विशुद्ध ' आत्मस्वरूप ' ' को ' शम ' या ' निर्वेद ' शब्द से कहा जाय तो भी कोई दोष नहीं है । केवल इतना ही है कि ' शम ' एक विशिष्ट चित्तवृत्ति है । यहाँ निर्वेद दीनता आदि से उद्भुत ' निर्वेद ' नहीं है अपि तु उससे भिन्न प्रकार का है । यदि यह कहा जाय कि दारिद्रयादि से उत्पन्न तथा तत्वज्ञान से उत्पन्न ' निर्वेद ' को एक ही नाम से अभिहित करने पर विजातीय क्यों माना जाता है? इसका उत्तर यह कि कारणभेद होने पर भी समानजातीय पदार्थ को समान नाम से अभि-हित किया जाता है । यही बात रति आदि अन्य भावों में भी पायी जाती है । अतएव आत्मस्वरूप को ही शान्तरस के स्थायी भाव के रूप में शमता या तत्व-

पृष्ठ 487

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३५८ नाव्यशास्त्रम् मोक्षप्राप्ति में उपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान से उत्पन्न होने वाला, तत्र ज्ञान में हेतुभूत अर्थ ( निर्वेद ) से युक्त रहने वाला तथा मोक्षज्ञान के लिए कहे गये वचनों के द्वारा शान्तरस ( उत्पन्न ) होता है ॥ ८४ ॥

ज्ञान कहा जायगा जिसके विभिन्न विकारों से रत्यादि भाव उत्पन्न होते हैं । उन रत्यादि भावों के विद्यमान रहने पर समाधि द्वारा उनके अव्यवहित विशुद्ध स्वरूप का अनुभव कर समाधि के न रहने पर भी चित्त की प्रशान्तवाहिता ( शान्ति का विकास ) बनी रहती है । जैसा कि योगसूत्र में कहा है ' तस्थ प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ' ( यो ० सू ० ३।३० ) [ संस्कारों के कारण उस चित की समाधि के उपरान्त भी प्रशान्तस्वरूपा अवस्था बनी रहती है । ] अतः आत्मस्वरूप या तत्वज्ञान ही शान्तरस का स्थायीभाव है । तथा यह लौकिक एवं अलौकिक चित्तवृत्तियों का समस्त समुदाय तत्व-ज्ञानरूपी स्थायीभाव का व्यभिचारिभाव रूप हो जाता है । उस तत्वज्ञान के अनुभव ही यम, नियम आदि के द्वारा समर्थित या उपकृत होकर शान्तरस के अनुभाव होते हैं । तथा आङ्गिक अभिनय के प्रतिपादक अध्यायों [ ना ० शा ० ६- ११ ] में जो स्वभावाभिनय बतलाये जायेंगे वे भी इसी शान्तरस में सम्बद्ध हो जाते हैं । शान्तरस ' स्वभाव ' कहलाता है तथा शेष रस विकार रूप हैं । इसके ईश्वरानुग्रह आदि विभाव हैं तथा विनष्ट होते हुए रत्यादि का भी शान्तरस में आस्वादन हो जाता है । केवल यही बात ( विशिष्ट ) है कि विप्रलम्भ शृङ्गार में या सम्भोग श्रृंगार में ' औत्सुक्य ' व्यभिचारिभाव होने पर भी प्रधान रूप में सम्भव होता है । इसी प्रकार रोद्र में उग्रता या करुण, वीर, भयानक और अद्भुत रसों में क्रमशः निर्वेद, धृति, त्रास और हर्ष आदि व्यभिचारिभाव होने पर भी प्रधान रूप से प्रतीत होते हैं । केवल जुगुप्सा में राग के सर्वया विपरीत होने के कारण व्यभिचारिभाव की प्रधान रूप से प्रतीति नहीं होती । जैसे कि महा-व्रत में कपाल आदि का धारण, मद्य या अङ्गना प्रभृति का न्यूनाधिक रूप में सेवन भी धर्म में जुगुप्सा का ही कारण बनता है । इसी प्रकार स्मृतिग्रन्थों में विहित विधान से नियोग द्वारा घृताभ्यक्त देवर से विधवा में पुत्रोत्पादन कार्य भी जुगुप्साजनक है ।

पृष्ठ 488

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३५ ९

बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियसंरोधाध्यात्मसंस्थितोपेतः ।

सर्वप्राणिसुखद्दितः शान्तरसो नाम विज्ञेयः ॥ ८५ ॥

इसके अतिरिक्त अपने में कृतकृत्य पुरुष का उद्योग परोपकार करने का रहता है इसी कारण परोपकारविषयक अभिलाष तथा प्रयत्न रूप उत्साह-जिसका दूसरा नाम दया या करुणा है- शान्त रस का विशेष रूप से अन्तरङ्ग होता है । इसीलिए कुछ विद्वान् उसे दयावीर और कोई धर्मवीर नाम से व्यवहृत करते हैं । ( प्रश्न ) अहंकार से उत्साह प्रेरित किया जाता है और शामरस में अहंकार का शैथिल्य रहता है अतः विरुद्ध प्रकृतिबाला उत्साह शान्तरस का अन्तरङ्ग कैसे होगा? ( उत्तर ) विरुद्ध भावों का व्यभिचारिभाव के रूप में वर्णन अनुचित नहीं माना जाता ( अर्थात् सर्वदा अनुकूल व्यभिचारिभावों का ही प्रयोग नहीं होता ) है और श्रृंगाररस में निर्वेदादि विरुद्धभावों का वर्णन होने पर अनु-चित नहीं है । जैसे नागानन्द नाटक के निम्न वर्णन में । शय्या शाद्वलमासनं शुचिशिला सद्म द्रुमाणामधः शीतं निर्झरवारि पानमशनं कन्दाः सहाया मृगाः । इत्यप्रापाथितलभ्य सर्वं विभवे दोषोऽयमेको बने दुष्प्रार्थिनि यत् परार्थघटना वन्ध्यवृथा स्थीयते ॥ ( नागा ० ४।२ ) [ अर्थ - जहाँ हरी घास के मैदान ही शय्या हैं, पवित्र शिलातल ही आसन, पेड़ों के नीचे ही घर हैं, पीने के लिए झरनों का शीतल जल और कन्द का भोजन है, जहाँ मित्र रूप में हरिण हैं । इस प्रकार बिना याचना के ही जहाँ सब वैभव प्राप्य है उस वन में केवल यही दोष है कि धन की प्राप्ति दुर्लभ होने से परोपकार की सामर्थ्य नहीं रहती, अतः वहाँ रहना व्यर्थ हो जाता है । ] इत्यादि-उपर्युक्त उदाहरण में परोपकार के लिए उत्साह का अतिरेक दिखलाया गया है । उत्साह शान्तरस का विरोधी नहीं होता क्योंकि कोई भी अवस्था ऐसी नहीं होती जो उत्साहशून्य रहती हों और इच्छा तथा प्रयत्न से रहित मनुष्य पाषाणवत् जड़ है । ( दूसरे ) परात्पर ब्रह्म और अपर आत्मा जीव का तात्विक ज्ञान हो जाने पर फिर कोई अन्य कर्तव्य शेष नहीं रह जाता है ।

पृष्ठ 489

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३६० नाट्यशाखम् ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रियों के विरोध तथा आत्मिक स्थिति से युक्त सभी प्राणियों के सुख तथा हित का आपादक शान्त रस जानो ॥ ८५ ॥

इसलिये प्रशान्तमनाः साधक के द्वारा दूसरों के उपकारार्थ अपने सर्वस्व तथा शरीर का दान कर देना शान्तरस का विरोधी ( कार्य ) नहीं है । जो ' आत्मानं गोपायेत् ' ( गौत ० ध ० सू ० ६।३५ ) [ आत्मा की सदा रक्षा करना चाहिए ] इत्यादि से मनुष्यों को आत्मसंरक्षण का आदेश दिया गया है वह सांसारिक पुरुषों के लिए उपदेश है । संन्यासियों का उस रक्षण के उपदेश से कोई प्रयो-जन नहीं है । क्योंकि -" धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणाः संस्थितिहेतवः । तान् निघ्नता कि न हतं रक्षता किन्न रक्षितम् ॥ ' मानव जीवन धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की स्थिति को प्राप्त करने के लिये होता है । उनको नाश करने वाले ने क्या नहीं नष्ट कर दिया और उनकी रक्षा करने वाले ने क्या नहीं बचाया! ] यहाँ देह - रक्षा का कारण चतुवर्ग की साधना बतलाया गया है । संन्यासी के लिये तो किसी प्रकार से शरीर का त्याग करने का विधान है फिर उसे परोपकार के लिए त्याग किया जाय तो इससे और क्या उत्तम बात होगी? [ अतएव ऐसे प्रसङ्ग में उत्साह शान्तरस के अन्तर्गत माना जायया । ] और यदि यह प्रश्न किया जाय कि जीमूतवाहन तो यति नहीं है फिर शान्तरस की अवस्थिति कैसे होगी? इसका उत्तर यह है कि इस प्रसंग में तत्वज्ञानित्व तो वहाँ विद्यमान है ही । अथवा देह को ही आत्मा मान लेने वाले मनुष्य के लिए तो देह सर्वस्व होता है और उस शरीर को धर्म आदि के सदुद्देश्य से त्यागना ऐसे पुरुषों के लिये कैसे सम्भव होगा । ( और जीमूतवाहन ने परार्थ के लिए अपने शरीर का परित्याग किया तो वह तत्त्वज्ञानी अवश्य माना जाना चाहिए ) । यदि यह माना जाय कि शरीर त्याग के लिये तत्वज्ञानी होना आवश्यक नहीं है क्योंकि अज्ञानी पुरुष भी युद्ध में परोपकारार्थं अपने शारीर का त्याग कर देते हैं तो इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है । कि युद्ध में शरीर त्याग की प्रवृत्ति तो होती है परन्तु वह तत्वज्ञान से प्रेरित होकर नहीं होती अपितु शत्रु को पराजित करने की भावना से होती है । इसी तरह भृगुपतन आदि में भी दूसरे उत्तम शरीर की प्राप्ति की इच्छा प्रधानरूप से विद्यमान

पृष्ठ 490

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पोऽध्यायः ३६१

न यत्र दुःखं न सुखं न द्वेषो नापि मत्सरः ।

समः सर्वेषु भूतेषु स शान्तः प्रथितो रसः ॥ ८६ ॥

रहती है । अतएव परोपकारार्थं निस्वार्थ भाव से कार्य करने से लेकर शरीर पर्यन्त जितनी चेष्टाएँ हैं वे विना तत्वज्ञान के सम्भव नहीं हो सकतीं हैं ( इसी कारण जीमूतवाहन आदि भी तत्वज्ञानी ही हैं ) । और तत्वज्ञान से ही पुरुष को सभी आश्रम में मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है यह श्रुति, स्मृति में बतलाया गया है । जैसा कि कहा भी है " देवार्चन रतस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः । श्राद्धं कृत्वा ददद् द्रव्यं गृहस्थोऽपि हि मुच्यते ॥ ” [ अर्थ देवताओं की अर्चना एवं भक्ति में लीन रहने वाला, तत्वज्ञानी अतिथि की सेवा करते हुए, श्राद्धादि कर दान देते हुए गृहस्थी होकर भी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । ] - इनमें अन्तर केवल यह है कि परोपकार रूप ( सकाम ) कर्म एवं परार्थ-साधन से उपार्जित धर्म के द्वारा बोधिसत्व जैसे तत्वज्ञानी को भी उसके अनु-रूप पुनः शरीर आदि की प्राप्ति हो जाती है यह देखा गया है [ जब कि निष्काम कर्म से उपार्जित धर्म से संन्यासी जन्ममरण के बन्धन से छूट जाता है । ] अन्य रसों के प्रसङ्ग में भी अपने कर्तव्य का पालन करने के औचित्य से सुख की प्राप्ति होती है । जैसे श्रीराम का अपने पिता की आज्ञा पालन करना वीररस का अङ्गभूत होकर सुख की प्राप्ति का कारण बन जाता है । इसी प्रकार शृङ्गार आदि में भी यही क्रम समझना चाहिए । इसी कारण नागा-नन्द में जीमूतवाहन में परोपकार प्रधान त्रिवर्ग की प्राप्ति रूप फल के अभीष्ट होने से शान्तरस का स्थायित्व होने पर भी उसकी प्रमुखता नहीं है । इसी आशय से नाटक के लक्षण में ' ऋद्धिविलासादिभिर्गुणैः ' ( ना ० शा ० २०।११ ) कहा जाएगा । इससे स्पष्ट है कि ऋद्धि तथा विलासयुक्त, काम तथा अर्थ से सम्पन्न सहृदयों की हृदय - भावना के अनुरूप सुन्दर प्रयोजन ( उद्देश्य ) वाले चरित्रों को ( ही ) नाटक में प्रस्तुत करना चाहिए । और इसी अभिप्राय से भरतमुनि ने इन ऋद्धि आदि अंगों का शान्तरस के अन्तर्गत विनियोग नहीं