भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 491–500
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 491–500
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३६२ नाट्यशास्त्रम् जिसमें न दुःख हो, न सुख हो, न द्वेष, न मत्सर हो । जो सभ प्राणियों में समता बुद्धि रखे उसे शान्त रस समझना चाहिये ॥ ८६ ॥
किया । पर शान्तरस में ऋद्धि आदि अंगों के विनियोग नहीं किये जाने के कारण उनका शान्तरस में अभाव प्रतिपादित नहीं किया जा सकता । अन्य आचार्य नागानन्द के प्रसंग को लेकर यह कहते हैं कि जीमूत-वाहन ने ' कस्ते पुत्र त्राता भविष्यति ' [ हे पुत्र, ( शंखचूड ) जब तुम्हारे राजा ने ही रक्षा नहीं की तो अब तुम्हें कौन बचाएगा ] ऐसा कहने वाली वृद्धा माता की ही रक्षा की है । परन्तु इस रक्षा करने में उसने कहीं शक्तिप्रदर्शन नहीं किया और न ( शत्रुबधादि रूप ) परहिंसा दिखलाई देती है । शक्ति का प्रयोग तथा परहिंसा वीररस में होती है, तब नागानन्द के नायक में इनके अभाव में दया या धर्मवीर नाम देना अनुचित है । ' इसका उत्तर यह है कि बोधिसत्वों के मन में शत्रुवध के कार्य द्वारा पुनः अभ्युदय प्राप्त करने की भावना नहीं होने से शक्ति का प्रयोग अभीष्ट ष्ट नहीं होता । अतः सिद्ध है कि यहाँ नागानन्द में दयारूप उत्साह प्रधान है तथा ( इसके साथ ) अन्य व्यभि-चारभाव भी यथोचितरूप से रह सकते हैं । जैसा कि योगदर्शन में ' तच्छि द्वेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ' ( यो ० सू ० ४।२७ ) [ उस समाधि के रन्ध्रों में ( समाधि खुलने पर बीच - बीच में ) संस्कारों के कारण अन्य प्रत्यय ( ज्ञान ) भी कहते हैं ] अतएव शान्तरस में व्यापारशून्य होने से अनुभावों का अभाव रहेगा यह कथन असंगत है । पर जब मोक्ष की चरमभूमि में पहुँच जाने पर उत्साहादि भावों का अभाव हो जाता है तब यह शान्तरस अनभिनेय हो जाता है । और चरमपरिणति या अन्तिम भूमि पर रति, शौक आदि भी अनभिनेय हो जाते हैं । हृदय की तन्मयता स्थायीभावों के संस्कार के कारण जैसे श्रृंगा-रादिरसों में होती है उसी प्रकार तत्वज्ञान के मूल ( भूत ) संस्कारों से संस्कृत अन्तःकरण वालों को शान्तरस में भी होती है । जैसा कि आगे नाट्यशास्त्र में कहेंगे- ' मोक्षेष्वपि विरागिणः ' ( ना ० शा ० २७।५८ ) [ मोक्ष के विषय में भी वैराग्य सम्पन्न रहने वाले ] इत्यादि । ( प्रश्न ) शान्तरस प्रधान नाटकों में वीररस का आस्वादन कैसे संगत होगा? ( उत्तर ) जहाँ शान्तरस का प्रयोग किया जाता है वहाँ फुरुषार्थोपयोगी शृङ्गारादि रसों की स्थिति अवश्य रहती है और शान्त के अन्तर्गत उनका
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३६३
भावा विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः ।
विकारः प्रकृतेर्जातः पुनस्तत्रैव लीयते ॥ ८७ ॥
आस्वादन होता है । जिन प्रहसन आदि में हास्यादि रसों की प्रमुखता होती है वहाँ भी बाद में अभ्यरस अन्तरनिष्ठ होकर आस्वाद्य होते हैं [ और आस्वा-रस ) की मित्रता के कारण रूपक भेद तथा रूपकों में रसों की अभिन्न दन स्थिति बतलायी जाती है ] अतः सिद्ध हो गया कि ' शान्तरस ' ( का अस्तित्व ) है । इसलिये वाट्य-शास्त्र की प्राचीन पुस्तकों में ' स्थायिभावान् रसत्वमुपनेष्यामः ' के बाद ' शान्तो-नाम शमस्थायिभावात्मकः ' इत्यादि से शान्तरस का लक्षण दिया गया है । सभी रसों के चरम आस्वाद में तद्विषयों की विमुखता के होने के कारण प्रमुखता प्राप्त कर प्रायः निर्व्यापार स्वरूप ही होता है । अन्य रसों शान्तरस की दशा में स्थायीभावात्मक वासनाएं अवस्थित रहती हैं पर शान्तरस में अपनी चरमावस्था में ये वासनाएं शान्त हो जाती हैं । इसलिये ( करिका में ) शान्तरस सभी रसों की प्रकृति होकर सर्वप्रमुख या प्रथम रूप में कहा गया । जिसकी सामान्यतः सर्वत्र स्थिति रहती हो उसकी अलग गणना नहीं की जाती है अतः शान्तरस का अलग स्थायीभाव नहीं कहने या गणना न करने से भी कोई दोष नहीं है । परन्तु विवेचकजन सामान्य का भी अलग निर्धारण करते हैं अतः उनकी दृष्टि से सामाजिकगत आस्वादनरूप प्रतीति के विषयरूप इस शान्तरस का स्थायीभाव पृथक होगा ही । इतिहास, पुराण, कोश आदि में नवरसों का वर्णन पाया जाता है । इसके अतिरिक्त प्रत्यभिज्ञादर्शन के श्रीमत्सिद्धान्तशास्त्र में भी कहा है कि " अष्टानामिह देवानां शृंगारादीन् प्रदर्शयेत् । मध्ये च देवदेवस्य शान्तं रूपं प्रकल्पयेत् ॥ ” इति । [ अर्थ चारों ओर स्थित आठ देवों में श्रृंगारादि आठ रसों को प्रद-शित करे तथा उनके बीच में महादेव के शान्तरूप की रचना की जाए । ] इससे भी स्पष्ट है कि नवरस स्वीकार करना युक्तिसंगत है । इस शान्तरस के विभाव हैं लोक के प्रति वैराग्यभावना तथा संसार से भीति आदि । इन वैराग्य आदि के उपनिबन्धन से शान्तरस की प्रतीति होती
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३६४ नाट्यशास्त्रम् स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्भावः प्रवर्तते । पुनर्निमित्तापाये च शान्त एवोपलीयते 1 एवं नवरसाः दृष्टा नाट्यज्ञैर्लक्षणान्विताः ॥ ८८ ॥
( अन्य रसों के ) रति आदि स्थायीभाव वैकारिक भाव हैं किन्तु शान्त प्रकृति है । विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं तथा फिर उसी में लीन हैं । मोक्षशास्त्र ( उपनिषद् आदि ) का चिन्तन करना शान्तरस के अनुभाव हैं और निर्वेद, मति, स्मृति, धृति आदि व्यभिचारिभाव हैं । अतएव स्मृति, धृति तथा उत्साहमूलक ईश्वरप्रणिधान विषयिणी भक्ति तथा श्रद्धा शान्तरस की अंगभूता है और उसकी अलग परिगणना भी इसी कारण नहीं की गयी । इस विषय में एक अन्य संग्रह कारिका इस प्रकार है मोक्षाध्यात्मनिमित्तस्तत्त्वज्ञानार्थहेतु संयुक्तः । निःश्रेयसधमंयुतः शान्त रसो नाम विशेयः ॥ ( ना ० शा ० ६२८३ ) यही ' मोक्षाध्यात्मनिमित्तः ' से विभाव ' तत्वज्ञानार्थहेतु संयुक्तः से स्थायी-भाव तथा निःश्रेयस धर्मयुतः पद से अनुभावों का सम्बन्ध क्रमशः तीन विशेषणों के द्वारा दर्शाया गया है । तथा स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद् भावः प्रवर्तते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥ ( ना ० शा ० ६।८७ ) इत्यादि कारिका से शान्तरस ही अन्यरसों का मूलभूत है यह बतलाते हुए उपसंहार किया गया है । और जो ' डिम ' में हास्य तथा शृङ्गाररस को छोड़कर ' षड्रसत्त्व ' कहा जाएगा उसका अभिप्राय यह निकला कि ' दीप्तरसकाव्ययोतिः ' कहलाने वाले ' डिम ' के लक्षण के अनुसार रौद्रप्रधान डिम में उसके विरोधी शान्तरस की सम्भावना न रहने से उसका निषेध भी व्यर्थ मानकर नहीं किया गया । पर शान्तरस का नाम न रहने से उसका अभाव नहीं मानना चाहिए । क्योंकि वैसा मानने पर उसे ' दीप्तरसकाव्ययोनिः ' विशेषण से कैसे व्यवच्छिन्न किया जाएगा? ' शृङ्गार तथा हास्य से रहित और छः रसों से युक्त ' कहने पर ( और ) किसकी प्राप्ति होती है जिसका भेद करने को विशेषण दिया गया । यदि इस पद से करुण तथा अद्भुत के प्राधान्य का निराकरण मानें तो यह ठीक नहीं है । क्योंकि ' डिम ' के लक्षण ने ' सात्वती तथा आरभटी
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३६५ हो जाते हैं । शान्तरस से अपने - अपने हेतुओं को प्राप्त करते हुए सभी भाव उद्भूत होते हैं तथा निमित्त ( हेतु ) के दूर हो जाने पर पुनः उसी में 1 ' नव रसों का वर्णन किया गया है ॥ ८७-८८ ॥ वृत्ति से युक्त ' ऐसे विशेषण के कारण ही इन दोनों वृत्तियों से हीन करुण तथा अद्भुत रसों का निवारण हो जाता है । शान्तरस में सात्वतीवृत्ति रहने से ' दीप्तरस काव्य योनि ' आदि विशेषण इसी का व्यवच्छेदक है । अतः ' डिम ' के लक्षण से भी शान्तरस की पुष्टि होती है । बलात् सेवित शृङ्गार ' डिम ' के अन्तर्गत प्रयुक्त होता है और हास्य उसके अंग रूप में मान्य है, इसीलिए इन्हीं दोनों का यहाँ निषेध किया गया है । मूलभूत या आत्मपरक रस होने के कारण इसके रंग तथा अभिमानी देवता की कल्पना अनुचित होने पर भी अन्य रसों से समानता लाने के कारण यहाँ भी ऐसा किया गया है । अतः यमनियम तथा ईश्वरप्रणिधान आदि के उपदेश पर आश्रित, महाफल, से सभी रसों में प्रधान और समस्त इतिहासादि में व्याप्त रहने वाले युक्त, शान्तरस की सत्ता युक्तिसंगत है । ( प्रश्न ) तो फिर इसका आस्वादन कैसे होता है? ( उत्तर ) आत्मस्वरूप के आच्छादक उत्साह, रति आदि ( स्थायी भावों ) से आच्छादित जो आत्मतत्त्व है वह दूर - दूर पिरोई गयी मणियों के मध्य उज्ज्वल-मूत्र के समान इन भावों के बीच उद्भासित होता है और जब यह आत्मतत्व रति आदि समस्त आकर्षणों के अपने रूप में उपस्थित रहने पर भी प्रकाशित रहता है तब विषयों से त्रिमुखता रूप समस्त दुःखजाल से मुक्ति मिल जाती है और परमानन्द की प्राप्ति के साथ अभिन्नरूप में यह प्रतीति काव्य तथा नाट्य आदि के द्वारा समानरूप से प्रतीति आन्तरिक अवस्था के भेद से लोकोत्तर आनन्द का प्रदाता होकर हृदय को भी इसी प्रकार आनन्दमय बना देता है । इस प्रकार नौ ही रस सिद्ध होते हैं । क्योंकि पुरुषार्थ में उपयोगी होने के अथवा प्रतीति की अधिकता के कारण केवल नौ रस ही माने जा सकते हैं । श्रीशङ्कुक आदि ने जो यह कहा कि ' स्नेह, भक्ति आदि अन्य रसों के सम्भव होने पर भी प्रसिद्धि के कारण ही यहाँ संख्या का निर्देश किया गया है ' यह खण्डित हो जाता है । भावाध्याय ( ७ अ ० ) में आगे यही बात और विस्तार
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३६६ नाट्यशास्त्रम्
एवमेते रसा ज्ञेयाः नव लक्षणलक्षिताः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भावानामपि लक्षणम् ॥ ८६ ॥
इस प्रकार अपने लक्षणों से युक्त नौ रस समझना चाहिए । अब आगे भावों के लक्षण बतलायेंगे ॥ ८ ९ ॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे रसाध्यायः षष्ठः । से कहेंगे । और ' आर्द्रता नामक स्थायीभाव वाला स्नेह ( वात्सल्य ) रस होता है ' यह कहना भी अनुचित है । क्योंकि स्नेह एक प्रकार के आकर्षण का नाम है जो रति तथा उत्साह का माता - पिता आदि के का लक्ष्मण आदि भाइयों विष्ट हो जाता है । में भी समझना चाहिए । में भी यही पद्धति ग्रहण रस में उसका अन्तर्भाव आदि सभी में समाया रहता हो । जैसे कि बालक प्रति, युवकों का अपने मित्रों के प्रति और राम के प्रति जो स्नेह का उदय है वह रति में समा-बात वृद्धजन की पुत्रादि के प्रति स्नेह के विषय गन्ध स्थायीभाव वाले लौल्यरस के खण्डन विषय करना चाहिए क्योंकि हास, रति या अन्य किसी हो सकता है । इसी प्रकार भक्तिरस के विषय में भी खण्डन पद्धति रखी जाए और उसका शान्तरस में अन्तर्भाव मान लिया जाए । ( अ ० मा ० ) १. प्रस्तुत अध्याय के विषय का उपसंहार कर अगले अध्याय के विषय की अवतारणा करते हुए अध्याय संगति को भरतमुनि प्रदर्शित करते हैं-' एवमेते ' इत्यादि कारिका से । यहाँ लक्षणलक्षिताः ' पद से रसादि का व्यव-हार सहेतुक होता है यह सूचित किया गया है । भाव आदि के लक्षणों से भी रस के लक्षण की ही पूर्ति होती है अतः यह कहना कि रति स्थायी भाव से युक्त, ऋतु माल्यादि विभावों से युक्त और नयनविक्षेप ( कटाक्ष ) आदि अनु-भावों से युक्त शृङ्गाररस होता है, पूर्ण नहीं है । इस कथन में आकांक्षा बनी रह जाती है कि रति कैसी होती है? विभाव किसे कहते हैं तथा अनुभाव क्या हैं । अतएव यद्यपि आपाततः ये भावों के लक्षण प्रतीत होते हैं पर वाय-क्यवाक्यता के द्वारा रस के भी पूरक लक्षण हैं । यह बात मूल में प्रयुक्त ' अपि ' शब्द से बतलायी गयी है । इति शिवम् । १. स्त्वष्ठी क ० ।
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सप्तमोऽध्यायः भाव-भावानिदानीं व्याख्यास्यामः । अत्राह - भावा इति कस्मात् किं भवन्तीति भावाः, किं वा भावयन्तीति भावाः । उच्यते-चागङ्गसवोपेतान्काव्यार्थान्भावयन्तीति भावा इति । भू ' इति करणे धातुस्तथा च भावितं वासितं कृतमित्यनर्था-न्तरम् । लोकेऽपि च सिद्धम् अहो ह्यनेन गन्धेन रसेन वा सर्वमेव भावितमिति । तच्च व्याप्त्यर्थम् । श्लोकाश्चात्र-अब मैं भावों को बतलाता हूँ । इस विषय में प्रष्टव्य है कि इन्हें भाव क्यों कहा जाता है? उत्तर — यह इसलिये कि वे भावन करने या १. पिछले अध्याय में भावों की चर्चा हो जाने पर पुनः यहाँ उसी बात को उठाने की आवश्यकता क्या है, क्योंकि वहीं ' भावाश्चापि कथं प्रोक्ताः ' ( ६।३ ) इत्यादि के द्वारा भावविषयक प्रश्न किया जा चुका है, फिर इस अध्याय में ' कि भवन्तीति ' के द्वारा उसकी पुनरुक्ति क्यों की जा रही है । इस पर कुछ आचार्य अपनी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- " पिछले अध्याय में भावाश्चापि ' इत्यादि से रसभाव आदि के प्रसंग में विभावादि की प्रश्न और प्रतिज्ञा के रूप में चर्चा सामान्य रूप में की गयी थी । यहाँ विभावादि के स्वरूप निरूपण हेतु सर्वप्रथम प्रधान होने के कारण चित्तवृत्तिरूप स्थायी-भाव एवं व्यभिचारिभावों के लक्षण बतलाना इष्ट है अतएव यहाँ इसी से सम्बन्धित विशेष प्रश्न और प्रतिज्ञा करना आवश्यक है । " पर हमारा मत इससे भिन्न है । हमारे मत में यहाँ भाव शब्द से चित्त-वृत्ति विशेष ही ग्रहण की गयी है और उनचास भावों का कथन करते हुए उपसंहार भी इसी आधार पर किया गया है । उनको अपनी योग्यता के अनु-सार स्थायी, संचारी, विभाव या अनुभाव माना जाता है तथा जो ऋतु माल्य १. वक्ष्यामः घ ० । २. भावः इति करणसाधनं यथा भावितं - घ ० । ३. ह्यन्योन्यगन्धेन - घ ० । ४. अपि च व्याप्त्यर्थम् ग ० ।
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३६८ नाट्यशास्त्रम् स्थित होने से ' भावयन्तीति भावाः ' ( व्युत्पत्ति ) के अनुसार भाव कहे जाते हैं । प्रश्न - और वे भाव किसका भावन करते हैं? उत्तर — ये शब्दों ( वाणी ), शरीर के अवयवों तथा सात्त्विक भावों के द्वारा दृश्य - काव्य के अभिप्राय को दर्शकों को बतलाते हैं । ' भाव ' शब्द ' भू ' धातु से करण ( हेतु ) अर्थ में निष्पन्न ( शब्द ) है । भावित, वासित तथा कृत भी इसी अर्थ को प्रकट करनेवाले ( समान ) शब्द हैं । लौकिक व्यवहार में भी ये एक दूसरे की सुगन्ध से या रस से भावित हैं, इत्यादि प्रयोग होते देखे जाते हैं । यहाँ ' भावन ' का अर्थ है व्यापना । इसी विषय के प्रतिपादक निम्न श्लोक हैं ।
विभावैराहृतो योऽर्थो ह्यनुभावैस्तु ' गम्यते ।
वागनसत्वाभिनयैः स भाव इति संज्ञितः ॥ १ ॥
आदि ( उद्दीपन विभाव तथा आँसू बहाना आदि बाह्य क्रियारूप अनुभाव हैं । वे अपने जड़ स्वभाव के कारण ' भाव ' कहे जा सकते हैं । और यदि यह मानों कि वे रसप्रतीति को काव्य नाट्य आदि के प्रसंग में सम्पन्न करवाते हैं और भावमग्न भी करते हैं अतः प्रतीति परक क्यो न माने जायें? तो फिर विज्ञानवाद के अनुसार तो उपचार से सारा समग्र विश्व भावमय माना जाए क्योंकि नाट्य में उसी का अभिनय प्रस्तुत किया जाता है । तो फिर इनमें पार्थक्य कैसे होगा? इसलिये स्थायी, व्यभिचारि तथा सात्विक ही ' भाव ' होते हैं अन्य नहीं । यहाँ विभाव तथा अनुनावों की चर्चा प्रासंगिक रूप ( अंगरूप ) में ही की जाएगी [ प्रधानरूप से नहीं ] । और यहाँ जो ' पुनरुक्ति ' की आशंका की गयी है वह भी अनुचित है । क्योंकि रसाध्याय के आरम्भ में भावों का अंग रूप में कथन किया गया है, यह कथन उद्देश कथन नहीं है क्योंकि वहाँ केवल उल्लेख मात्र है, नाम लक्षण आदि का अभिधान नहीं [ अतएव भावों का कथन अवसर प्राप्त है ] और पूर्वाध्याय में जो भावों की चर्चा है वह रसों के लक्षणों के अन्तर्गत गौणरूप में आयी हैं क्योंकि वहाँ मुख्य रूप में रस लक्षण ही इष्ट है अतएव अब यहाँ भावों का कथन अवसर प्राप्त है । [ अ ० भा ० ] १. ह्यनुभावेन - घ ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३६ ९ जो अर्थ विभावों के द्वारा प्रस्तुत होते हुए अनुभावों से बोध्य होते है वे ही वाणी, अंग, तथा सात्विक भावों के अभिनयों से युक्त होने पर ' भाव ' कहे जाते हैं ॥ १ ॥
१. भाव चित्तवृत्तिस्वरूप होते हैं अतः इनकी दो प्रकार से व्युत्पत्ति की जा सकती है । ' भवन्तीति भावा: ' । यहाँ ' भवति ' को रतिभाव के प्रकट होने की स्थिति में मानकर एक अर्थ, कि ये स्थित होने के कारण भाव हैं, व्युत्पन्न हो जाता है । इसमें भाव अपने उत्कर्ष या विस्तार को प्राप्त करता है । और पुनः ' भावयन्तीति भावा: ' से ' भाव ' का यह आशय लिया जायगा कि यह धीरे - धीरे, अधिकतर अधिकतम रूप में विकसित होता रहता है और एक क्षण के लिये भी स्थित नहीं होता । इससे ये भाव सीमित समय में अनुभाव की प्रतीति के द्वारा चित्तवृत्तियों को भावित करते हैं [ यह आशय ' भावयन्तीति भावाः ' के अनुसार ( भी दूसरी तरह से ) व्युत्पत्ति करने पर निकलता है ] और इस प्रकार हृदय में व्याप्त होकर आस्वादनीय स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं । दोनों व्युत्पत्तियों की संभावना के कारण यहाँ ' भवन्ति ' तथा ' भावयन्ति ' ( दो व्युत्पत्तियों ) को प्रस्तुत किया गया है । यहाँ दो व्युत्पत्तियाँ दिखला कर प्रश्न की उद्भावना भी मूल में की गयी है कि भाव ' भवन्ति ' के अनुसार स्थित होने के कारण है या ' भावयन्ति ' के अनुसार है । और यदि ' भावयन्ति ' के अनुसार है तो ये व्याप्त हो कर क्या अनुभावन करते हैं? इस प्रकार प्रश्न उपस्थित कर भरतमुनि इसके उत्तर में ' वागङ्ग ' इत्यदि से कहते हैं । काव्य के पदों तथा वाक्यों में असाधारणता तथा प्रधानता रहने से उनका पर्यवसान रस में होता है अतः काव्य का अर्थ यहाँ रसरूप है । यहाँ अर्थ शब्द का आशय है जो प्रधानतः प्रतिपाद्य या इष्टतम होकर भावना कर-वाता हो । यहाँ ' अर्थ ' शब्द का केवल शब्दार्थ या वाच्यार्थ नहीं लेना चाहिए । क्योंकि रसादि अर्थों का स्वशब्द से अभिधान न करना ही ध्वनिकार आदि सभी आचार्यों ने दिखलाया है । इस प्रकार काव्य के अर्थरूप रस की भावना या आस्वादन कराना ही यहाँ इष्ट है । यह लौकिक अर्थरूप आस्वादन स्थायी तथा व्यभिचारि आदि भावों के समूह से सम्भव या सम्पन्न किया जाता है । पहले स्थायी आदि की प्रतीति होकर फिर सर्वसाधारण भावों का आस्वादन सम्भव होता है । यह २४ ना ० शा ० प्र ०
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३७० नाट्यशास्त्रम् आस्वादन पूर्व परिचित भाव का प्रत्यक्षभूत हो कर अगली आस्वादन भूमिका का निष्पादक होने से ( आस्वादन की ) भावना करवाने वाला कहा जाता है । अतः भाव का निष्पादक या उत्पादक रसास्वादन है । वाणी आदि इसी के ( निष्पादक ) कार्य रूप में अवस्थित रहते हैं । इसलिये वर्णनात्मकतारूपी वाचिक, निवेश स्थिति या घुमाव आदि शारीर क्रियात्मक आङ्गिक तथा आत्मा के अन्तर्गत भाव तथा बाह्यक्रियारूपी सात्विक अभिनय के द्वारा काव्यार्थ अर्थात् रसानुभव को अभिव्यक्त किया जाता है । यहाँ यद्यपि नृत्य कला, ध्रुवा आदि का अन्तरंग भूत ' आहार्य ' अभिनय भी होता है तथापि चित्तवृत्तिरूप भावों का भावन करवाने में वाचिकादि तीनों अभिनयों का ही सहकार आवश्यक है. यही दिखलाने के लिये ( कारिका में ) तीन अभिनयों का उल्लेख किया गया है । ( क्योंकि काव्य का अनुभावन आहार्य के बिना भी होते देखा गया है । ) वाचिक आदि अपनी अभिनय प्रक्रिया से सम्पादित ये अलौकिक चित्त-वृत्तियाँ अपनी आत्मस्थ लौकिक अवस्था का आस्वादन न करवाते हुए रसरूप का आस्वादन या भावन करवाती हैं अतः चित्तवृत्तियाँ ही भाव हैं । यहाँ भू धातु अंतर्भावित व्यर्थ है जो प्रकृत में ' करोति ' या स्थित अर्थ को बतलाती-है । यही मूल में ' भू इति ' इत्यादि से कहा गया है । भू धातु का ' णिचू ' से सम्बन्ध होकर ' भावित ' शब्द बनाया गया है । भावित, कृत तथा बासित आदि शब्द समानार्थक है । वाचिक आदि अभिनयों के अंगों के द्वारा अभिव्यक्त होकर ' भाव ' रस-प्रतीति रूप भावना सम्पन्न करता है इस शास्त्रीय अर्थ का प्रमाण लोकप्रचलित • आधार पर भी दिया जा सकता है इस आशय से मूल में ' लोकेऽपि ' इत्यादि से कहा गया है । केवल लोक में ( ही ) रस के भावित तथा कृत शब्द के अर्थ ही प्रसिद्ध नहीं हैं [ अर्थात् लोक में इस रस के द्वारा यह पदार्थ भावित कर दिया गया इत्यादि अर्थ ही प्रसिद्ध नहीं है ] किन्तु पूर्णतः व्याप्त है, ऐसा अर्थ भी लिया जाता है । यह परिव्याप्त होना अर्थ मूल में ' च ' शब्द से दर्शाया गया है । ' सर्व ' शब्द से गन्ध रस आदि का ग्रहण समझना चाहिए । ' परिव्याप्ति ' का यह अर्थ ( एक ) उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है । कस्तूरी की गन्ध से वस्त्र उसकी गन्ध नहीं बन जाता है किन्तु उसके गुण से पूर्णतः
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सप्तमोऽध्यायः ३७१
चागङ्गमुखरागेण ' सत्त्वेनाभिनयेन च ।
कवेरन्तर्गतं भावं भावयन्भाव उच्यते ॥ २ ॥
काह संक्रान्त हो जाता है और न उसके समान अन्य गुण की ( वस्त्र में ) उत्पत्ति हो जाती है । जैसे ( भोज्य आदि ) पदार्थ गन्ध आदि से भावित होते हैं उसी प्रकार वस्त्रादि में कस्तूरी की परिव्याप्ति समझना चाहिए । इसी प्रकार प्रकृत विषय में वाचिक आदि अभिनय देश काल की प्रमुख एवं विशिष्ट अवस्थाओं को प्रस्तुत करते हैं और अभिनेता में रामादि के वास्तविक गुण न होने पर भी भ्रान्तज्ञान न होकर साधारणीकरण के द्वारा पात्रों को भूमिका में उनकी उन्हीं चित्तवृत्तियों को प्रस्तुत करते हुए अनुभावन करवाया जाता है ( यह कस्तूरीगन्ध के समान अनुभावन समझना चाहिए ) । तथा इससे सामाजिक अपने आत्मरूप भाव को भावित करता है अतः ' भावयन्तीति भावाः अर्थात् भावित करने से भाव हैं, यह भावित होने का प्रमुख तात्पर्य माना जाना चाहिए । [ अ ० भा ० ] इसके अतिरिक्त और भी प्राचीन आचार्यों ने ' भाव ' शब्द की व्युत्पत्ति दिखलाई है जिसे संग्रह कहने के लिए भरतमुनि निम्न श्लोक प्रस्तुत करते हैं-१ - विभावैराहतो - विभाव का अर्थ है आलम्बन आदि विषय, क्योंकि उसी से भाव निष्पन्न होता है । अतः विभाव की अपेक्षा से जो भावित ( निष्पा-दित ) किये जाते हैं ' वे भाव ' हैं । दूसरे आचार्य विभाव और अनुभाव के साथ संचारी भाव को भी अन्तर्गत करते हैं । उनके मत व्यभिचारिभाव के साथ भी भक्ति होने अर्थात् मिश्रीभाव की प्रक्रिया सम्पन्न की जा सकती है और व्यभिचारिभाव से अन्य व्यभिचारिभावों की उत्पत्ति हो सकती है । जैसे निर्वेद से चिन्ता, श्रम से निर्वेद इत्यादि । यह कथन उचित नहीं । क्योंकि स्थायीभाव व्यभिचारिभाव हो जाते हैं पर व्यभिचारिभाव स्थायीभाव नहीं होते । क्योंकि ऐसा मानने पर उसके आस्वाद में अन्यरस की प्रतीति माननी पड़ेगी । और जहाँ स्थायीभाव के अन्तर्गत व्यभिचारिभाव में अन्य व्यभिचारि-भावों की उत्पत्ति दिखाई देती है ( जैसे पुरूरवा के उन्माद में तर्क या चिन्ता आदि संचारी भावों की उत्पत्ति ) वहाँ भी व्यभिचारिभाव रति स्थायीभाव १. मुखरागेश्र्च - ग ०, घ ० ।