भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 501–510
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 501–510
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३७२ नाव्यशास्त्रम् नाट्यकार के नाट्य - रचना में निगूढ़ भावों को दर्शकों को बोधगम्य बनाने के लिये जो वाणी, शरीर के अवयवों तथा चेहरों के रंगों द्वारा भाव का प्रदर्शन किया जाता है उसे ' भाव ' जानो ॥२ ॥
के साथ मिल कर उसी को पुष्ट करते हैं । और यहाँ उन्माद केवल अमात्य स्थानीय होकर अन्य व्यभिचारिभावों से पुष्ट है परन्तु मुख्य तो रति ही है, जैसा कि आगे ' यथा नरेन्द्र ' ( ७११० ) इत्यादि से भरतमुनि ने स्वयं कहा है । ( २ ) वागङ्गमुख -इस — इस! प्रकार लोकवृत्त का अनुकरण नाट्य में बतला कर कवि तथा अभिनेता के द्वारा क्रमशः उद्भावना या शिक्षा अभ्यास से उद्भावित या प्रस्तुत किये जाने वाले सामाजिक के अभिप्राय से भावित या निरूपित होने वाले ' भाव ' का निरूपण संग्रहरूप में बतलाने के लिये संग्रहरूप दो पद्य कहे गये हैं । अर्थात् वाचिक, आङ्गिक, मुखरागात्मक तथा सात्त्विक अभिनयों के द्वारा कवि के काव्यकौशल से युक्त वर्णन के अन्तर्गत जो अन्तः-करण में स्थित भाव को अनादि काल से पूर्वजन्म के संस्कार आदि के कारण तज्जन्य वासना से युक्त लौकिक होकर भी प्रतिभाप्रसूत रहने वाले मनोभाक का देश, काल आदि भेदों से मुक्त साधारणीकृत रूप में जो आस्वादन योग्यता का निर्माता है वह भाव है । चित्तवृत्ति स्वरूप भाव होता है । सत्त्व का अर्थ है चित्त की एकाग्रता का भाव, उससे उत्पन्न सात्त्विक भाव है, जिनमें कृत्रिम आँसू आदि की उपलब्धि होती है और संचारीभाव में अतिशय उसकी प्राप्ति या उपलब्धि होती है ऐसा अपनी - अपनी अवस्था या संयोग के अनुसार समझना चाहिए । मुखराग यद्यपि सात्त्विक भाव के अन्तर्गत आ जाता है । परन्तु अभिनय में इसका महत्त्व होने से विवर्णं भाव वाला मुखराग भी यहाँ प्रधानतः अभिहित किया है । जैसा कि आगे कहा जाएगा-" शाखाङ्गोपाङ्ग संयुक्त्तः कृतोऽप्यभिनयः शुभः । मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् ॥ " ( ना ० शा ० ८।१६५ ) क्योंकि इसी के कारण अनेक सूक्ष्म भावों की अभिनय में अभिव्यक्ति की जा सकती है । ( ३ ) नानाभिनय - क्योंकि ये भाव आस्वादन के योग चित्रवृत्ति विशेष को भावित करते हैं, ले जाते हैं, प्रतीत करवाते हैं या बुद्धि के गोचर करवाते
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सप्तमोऽध्यायः ३७३
नानाभिनय संबद्धान्भावयन्ति रसानिमान् ।
यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः ॥ ३ ॥
क्योंकि ये अनेक विध अभिनयों से ( युक्त ) रसों का भावन करते हैं अतएव इन्हें नाट्य निर्माता ( या प्रयोक्ता ) गण ' भाव ' कहते हैं ॥ ३ ॥
विभाव-अथ विभाव इति कस्मात् । उच्यते - विभावो नाम विज्ञानार्थः । विभावः कारणं निमित्तं हेतुरिति पर्यायाः । विभाव्यतेऽनेन वागङ्गसच्चाभिनय इति विभावः । यथा विभावितं विज्ञातमित्यनर्था-न्तरम् । ( प्रश्न ) ' विभाव " शब्द का प्रयोग किस हेतु होता है? ( उत्तर ) ' विभाव ' शब्द का प्रयोग विशिष्ट ( स्पष्ट ) ज्ञान के लिए किया जाता है । हैं ( अतः भाव हैं ) । ' इमान् ' का अर्थ है सामाजिकों को रसप्रतीति करवाने के कारण । यहाँ ' अभिनय सहितान् ' के द्वारा यह दर्शाया गया है कि अभिनय भी सामाजिकों को बुद्धि गोचर करवाया जाता है । यही भावना रसों को अपने उपयुक्त स्वरूप द्वारा भावित करती है और लौकिक जीवन में विद्यमान रति आदि भावनाओं को स्थायी भावों के रूप में अभिव्यक्त कर शृङ्गारादि रसों की अभिव्यक्ति या बोध करवाती है । [ अ ० भा ० ] १. पूर्व कारिका में भाव को विभाव से प्रस्तुत बतलाया था; वहाँ यद्यपि प्राकरणिक रूप में चित्तवृत्तियों से उत्पन्न होने वाला कारण रूप विषय विभाव शब्द का अर्थ है ऐसा बतलाया था फिर भी उसके शास्त्रीय अर्थ के विषय में जिज्ञासा बनी ही रहती है । अतः उसी जिज्ञासा के कारण ' विभाव इति कस्मात् ' इत्यादि के द्वारा यहाँ स्वरूप विषयक प्रश्न किया गया है । ' कस्मात् ' शब्द से उसी प्रश्न को विस्तार देकर पूछा गया है कि ऋतु, माल्य आदि को विभाव शब्द द्वारा क्यों कहा गया है । भरतमुनि विभाव्यन्ते ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । जिन ( वाचिक आदि अभिनयों ) के द्वारा स्थायी एवं व्यभिचारिभावों का विभावन अर्थात् विशेषरूप से ज्ञान करवाया जाता है वे विभाव कहलाते हैं । १. सम्बन्धान् ग ० ।
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३७४ नाट्यशास्त्रम् इसके कारण, निमित्त या हेतु पर्याय हैं । ( या ये शब्द एकार्थक हैं ) । क्योंकि जिसके द्वारा वाणी, अंग तथा सात्त्विक अभिनय का स्पष्ट ज्ञान होता है उसे विभाव जानो । विभावादि तथा विज्ञात शब्द समानार्थक हैं ।
अत्र श्लोकः--बहवोऽर्था विभाग्यन्ते वागङ्गाभिनयाश्रयाः ' ।
अनेन यस्मात्तेनायं विभाव इति संज्ञितः ॥ ४ ॥
इस विषय में एक श्लोक है: -क्योंकि इसके द्वारा वाणी, अंग तथा अभिनय में स्थित अनेक अर्थों का अवबोध होता है अतएव इसे ' विभाव ' संज्ञा से अभिहित किया गया है ॥ ४ ॥
अनुभाव ': -अथानुभाव इति कस्मात्? उच्यते-अनुभाव्यतेऽनेन वागङ्गसस्वकृतोऽभिनय इति । ( प्रश्न ) ' अनुभाव ' शब्द का प्रयोग क्यों होता है? ( उत्तर ) क्योंकि ये अभिनय को वाणी, अंग तथा सात्त्विक भावों के द्वारा अनुभूति योग्य बनाते हैं, अतः ' अनुभाव ' कहलाते हैं । ज्ञापन करने वाले हेतु विभाव हैं जिन्हें कारण पदवाच्य कहा जाता है । क्योंकि एक ही भाव का अभिनय अनेक कारणों से प्रस्तुत किया जा सकता है । जैसे-हर्ष आदि से हास तथा धूप, धुआँ या रोग आदि से आंसू उत्पन्न होते हैं । तो इनकी प्रतीति ठीक से कैसे होगी इसलिये कारण स्वरूप विभाव को देखकर शीघ्र ही सन्देह दूर होकर निश्चय हो जाता है । अतः विभाव ज्ञापक हेतु हैं । १. अनुभाव - ' वाचिक, आङ्गिक तथा सात्विक क्रियायें अभिनय को अनुभूति योग्य बनाते हैं ' का आशय है वाणी, अङ्ग तथा सत्व से युक्त चेष्टायें या व्यापार ही ' अनुभव ' हैं । अनुभाव अंगभूत होने से या सहायक होने के १. भिनयाश्रिताः - ग ० । २. ' यदयमनुभावयति नानार्थाभिनिष्पन्नो वागङ्गसत्वः कृतोऽभिनयः ' इति ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३७५ अत्र श्लोकः- TLPR BE IPIS SE
" वागङ्गाभिनयेनेह यतस्त्वर्थोऽनुभाव्यते ।
शाखाङ्गोपाङ्ग संयुक्तस्त्वनुभावस्ततः स्मृतः ॥ ५ ॥
इस विषय में एक श्लोक ( भी ) है । क्योंकि ( यह ) दर्शकों को वाणी तथा अंग के अभिनय के द्वारा अर्थ की अनुभूति ( या ज्ञान ) को सम्पन्न करता है अतः शाखा, अङ्ग, एवं उपांग से संयुक्त यह ' अनुभाव ' कहलाता है । ( अथवा वाचिक, तथा आंगिक एवं उपांगों के अभिनय से सम्बद्ध रहने के कारण इसे ' अनुभाव ' कहते हैं ) ॥ ५ ॥
एवं ते विभावानुभावसंयुक्ता भावा इति व्याख्याताः । अतो ह्येषां भावानां सिद्धिर्भवति । तस्मादेषां भावानां विभावानुभाव-संयुक्तानां लक्षणनिदर्शनाम्यभिव्याख्यास्यामः । तत्र विभावानुभावौ लोकप्रसिद्धौ । लोकस्वभावानुगतत्वाश्च ' तयोर्लक्षणं नोच्यतेऽति प्रसङ्गनिवृत्त्यर्थम् । कारण भावों के साथ ही उत्पन्न तथा तिरोहित होते रहते हैं; अतः ये सहाव स्थिति की दशा में रहने पर सहायक ही माने जाने चाहिए । साहित्यदर्पणकार ने इसका व्युत्पत्ति परक अर्थ लेकर ' अनु - पश्चाद् भवन्तीति अनुभावाः ' कहकर उन्हें भावों के पश्चाद् उत्पन्न होने वाले ' कार्यरूप ' माना है । परन्तु भावों तथा अनुभावों की कारण कार्य परक स्थिति तात्विक नहीं है क्योंकि अनुभाव स्थायी आदि भावों से भी उत्पन्न हो सकते हैं और उनके साथ भी रह सकते हैं अतः ऐसी आशंकाओं की व्यर्थ उत्पत्ति करवाने वाले लक्षण की अपेक्षा भरतमुनि के क्रिया रूप व्यापार या अभिनय के अन्तर्गत होनेवाली चेष्टाओं को ' अनुभाव ' मानना सुगम होगा । १. वागङ्गसत्वाभिनये यंस्मादर्थो विभाव्यते - ख ० । २. वागङ्गोपाङ्ग -- ग ०, घ ० । एक ३. ' एवं ते ' इत्यारभ्य ' सिद्धिर्भवति ' इत्यन्तः पाठः ग— पुस्तके नास्ति । ४. एतेषां — ग ० । ५. लोकस्वभावोपगतत्वात् — ग ० ६. चैषां ग ० । ७. निवृत्यर्थञ्च ष ० ।
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३७६ नाट्यशास्त्रम् ( इस प्रकार ) हमने विभाव तथा अनुभाव से संयुक्त ' भावों ' को बतलाया क्योंकि इसी प्रकार इन भावों की उत्पत्ति होती है । अब हम विभाव तथा अनुभाव से संयुक्त ( इन ) मावों का लक्षण तथा उदाहरण देते हुए व्याख्या करेंगे । इनमें विभाव तथा अनुभाव के लोक प्रसिद्ध और मानव प्रकृति के अतिशय अनुगामी होने के कारण लक्षण नहीं बतलाए गए । इनके लक्षण न बतलाने का यही हेतु है । भवति चात्र श्लोकः—
लोकस्वभावसंसिद्धा लोकयात्रानुगामिनः ।
अनुभावा ' विभावाश्च ज्ञेयास्त्वाभिनये बुधैः ॥ ६ ॥
इस विषय में एक श्लोक ( भी ) है-लोक प्रकृति से उत्पन्न होने वाले और लोक व्यवहार के अनुसर्त्ता इन अनुभाव तथा विभावों को स्वयं विद्वजन लोकप्रचलित कार्य द्वारा ( अभिनय में ) समझ लें । भावों के तीन प्रकार ( स्थायी, संचारी तथा सात्विक ) तत्राष्टौ भावाः स्थायिनः त्रयस्त्रिशद्व्यभिचारिणः । अष्टौ सात्विका इति भेदाः । एवमेते काव्यरसाभिव्यक्तिहेतव एकोनपञ्चा-शद्भावाः प्रत्यवगन्तव्याः । एभ्यश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते । इन भावों में आठ स्थायीभाव, तैतींस संचारी ( व्यभिचारि ) भाव तथा आठ सात्विक भाव हैं । इस प्रकार भाव तीन ( प्रकार के होते ) हैं । काव्य की रसाभिव्यक्ति में करणीभूत ये ही उनचास भाव हैं । इन्हीं के सामान्यगुणों ' के संयोग द्वारा रसादि निष्पन्न होते हैं । ( रस - निष्पत्ति का पिछले अध्याय में वर्णन हो चुका है ) १. सामान्य गुणयोगेन का अर्थ है- इन विभिन्न भावों के द्वारा या इनके माध्यम से रसप्रतीति करवाना । अर्थात् विशिष्ट या व्यक्तिनिष्ट भावों का साधारणीकरण की भूमि पर प्रतिष्ठापित कर बोधगम्य या प्रतीतियोग्य बनाना । १. अनुभाव विभावाश्च – ग ० ।
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सतमोऽध्यायः ३७७
अत्र ' श्लोकः-योऽर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भवः ।
शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्टमिवाग्निना ॥ ७ ॥
इस विषय में निम्न श्लोक भी है: -जो वस्तु या पदार्थ हृदयस्पर्शी हों, उनका ( हृदयस्पर्शी होने में ) रस से उत्पन्न होनेवाला कारण ' भाव ' है । यह ( भाव ) सम्पूर्ण शरीर में ( तत्काल ) उसी प्रकार व्याप जाता है जैसे सूखी लकड़ियों में अभि ॥७ ॥
स्थायीभाव का अन्य भावों से पार्थक्य— अत्राह - यदि काव्यार्थ - संश्रितैर्विभावानुभावव्यञ्जितैरेकोनपञ्चा शद्भावैः सामान्यगुणयोगेनाभिनिष्पद्यन्ते रसास्तत्कथं स्थायिन ' एव भावा रसत्वमाप्नुवन्ति । उच्यते - यथा हि समानलक्षणास्तुल्य-पाणि - पादोदरशरीराः समानाङ्गप्रत्यङ्गा " अपि पुरुषाः कुलशीलविद्या-कर्मशिल्प विचक्षणत्वाद्राजत्वमाप्नुवन्ति - तत्रैव चान्येऽल्पबुद्धयस्ते-पामेवानुचरा भवन्ति, तथा विभावानुभावव्यभिचारिणः स्थायिभावा-नुपाश्रिता भवन्ति । वह्नाश्रयत्वात्स्वाभिभूताः स्थायिनो भावाः तद्वत्स्थानीय पुरुषगुणभूता ' अन्ये भावास्तान्गुणतयोऽऽश्रयन्ते [ तत्र स्थायिभावाः रसत्वमाप्नुवन्ति ] परिजनभूता व्यभिचारिणो भावाः ( तान् गुणतया श्रयन्ते ) । यह कार्य सभी भावों के संयोग द्वारा सम्पन्न किया जाता है जिसका विश्लेषण ' रसनिष्पत्ति ' के प्रसंग में विस्तार से किया जा चुका है । १. भवति चात्र ग ० । २. यदान्योन्यार्थसंश्रितैः ग ० । ३. कथमिदानीमेते स्थायिनोऽग ० । ४. पादोदरसमानाः ग ० । ५. समानप्रत्ययाः – ग ० ६. विचक्षणत्वयुक्ता ग ० । ७. इत्याश्रयत्वात् – ग ० । ८. तद्वत् स्थायिनि वपुषि गुणीभूताः - ग ० । ६. गुणवत्तया - ग ० ।
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३७८ नाव्यशास्त्रम्-( प्रश्न ) यदि काव्य के अर्थों के आश्रित विभाव, अनुभाव ( तथा संचारी भाव ) द्वारा -जो कि ( कुछ ) उनचास हैं- -रस निष्पन्न होते हैं । और रस इन भावों के सामान्य गुणों के संयोग से ( ही ) जब निष्पन्न होते हैं तो फिर स्थायीभाव ही रसत्व की अवस्था को कैसे प्राप्त करते हैं, अन्य भाव ( विभाव, अनुभाव तथा संचारीभाव ) रसावस्था को क्यों नहीं प्राप्त करते? ( उत्तर ) जैसे एक जैसे लक्षणवाले हाथ, पैर, उदर तथा शरीर के समान होने पर और अङ्ग प्रत्यंग के समान रहने पर भी ( कुछ ) पुरुष अपने कुल, शील, विद्या, कर्म तथा शिल्प - गत विलक्षणता के कारण आधिपत्य प्राप्त करते हैं और शेष अपनी न्यूनता के कारण ( वहीं ) सेवक रह जाते हैं, वैसे ही संचारीभाव स्थायीभाव के आश्रित होकर रहते हैं अनेक भावों द्वारा आश्रित रहने के कारण मुख्य है सेवकों के समानगौणता को लिये हुए अन्य संचारी का आश्रय ग्रहण करते हैं और गौणभूत ये संचारी परिवार के समान ( स्थायीभाव के पारिवारिक भाव ) बौद्धिक ( या अन्य ) विभाव, अनुभाव तथा । ( क्योंकि स्थायीभाव । ( इसी प्रकार जो ) भाव हैं वे मुख्य भाव ( भावादि ) राज्य के हैं । ' १. स्थायी भाव की प्रधानता का एक अन्य कारण यह भी है कि यह प्रकर्ष को प्राप्त कर अन्य ( अनुभावादि भावों ) का प्रच्छादक हो जाता है! आचार्य रामचन्द्र गुणचन्द्र ने स्थायीभाव का अन्य विभावादि से पार्थक्य बत-लाते हुए विशेष विचार प्रस्तुत किये हैं । तदनुसार रत्यादि स्थायीभाव ज्ञान-स्वरूप होने से चेतनात्मक या चेतनास्वरूप होते हैं । वेदान्तशास्त्रादि के अनु-सार ज्ञानात्मकता चैतन्य स्वरूप होती हैं । धैर्यादि ( मानस क्रियाएँ ) अनु-भाव ज्ञानरूप होने से अजड़ तथा स्वेदादि अनुभाव शारीरिक या बाह्य क्रियायें होने से जड़ हैं इसलिये अनुभाव उभयरूप हैं । इसी प्रकार वनितादि आलम्बन विभाव चेतनरूप और ऋतुमात्यादि उद्दीपन विभाव जड़रूप होने से और निर्वेदादि व्यभिचारिभाव ज्ञानरूप होने से चेतनरूप तथा व्याध्यादि शरीर-धर्मा होने से जड़ात्मक हैं । इस प्रकार विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारि ( एवं सात्विक ) भाव ज्ञानरूप ( अजड़ ) और शरीरधर्मादिरूप ( जड़ ) होने से उभयरूप होते हैं और यह भी स्थायी और अन्य विभावादि में परस्पर अन्तर ( होता ) है । अन्य विद्वान् स्थायी और व्यभिचारिभाव के अन्तर को एक दूसरे उदाहरण से स्पष्ट करते हैं । तदनुसार जैसे सूत्र प्रत्येक मणि के साथ
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सप्तमोऽध्यायः ३७ ९ अत्राह - को दृष्टान्त इति । यथा नरेन्द्रो बहुजनपरिवारोऽपि सन् स एव नाम लभते नान्यः सुमहानपि पुरुषः । तथा विभावानु-स्थायी भावो रसनाम लभते नरेन्द्रवत् । भावव्यभिचारिपरिवृतः ( प्रश्न ) इस विषय में दृष्टान्त क्या होगा? ( उत्तर ) जैसे बड़े परिवार ( या अनेक परिजन ) से युक्त होने पर भी केवल राजा का ही नाम रहता है । उससे बड़े ( कुटुम्बी - जन ) का भी नाम नहीं रहता । वैसे ही विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों से युक्त स्थायीभाव ही नरेन्द्र के समान रस - दशा को प्राप्त करता है ( अन्य भाव नहीं । ) स्थायीभाव ( लक्षण ) भवति चात्र श्लोकः—
तथा नराणां नृपतिः शिष्याणाञ्च यथा गुरुः ।
एवं हि सर्वभावानां भावः स्थायी महानिह ॥ ८ ॥ 135
इस विषय में एक ( परम्परा प्राप्त ) श्लोक है । जैसे मनुष्यों में राजा तथा शिष्यों में गुरु मुख्य होते हैं वैसे ही सब भावों में स्थायी ' भाव मुख्य ( श्रेष्ठ ) माना गया है ॥ ८ ॥
लक्षणं खलु पूर्वमभिद्दितमेषां रस - संज्ञकानां निदर्शनं तु । इदानीं भावसामान्यलक्षणमभिधास्यामः । तत्र स्थायिभावान्वक्ष्यामः-इनमें रसदशा को प्राप्त करने वाले रसों के लक्षण तथा द्रष्टान्त बतलाए जा चुके हैं । अब हम भावों के सामान्य लक्षण बतलाएँगे । ( इनमें भी ) सर्वप्रथम स्थायीभावो के लक्षण बतलाते हैं-रह कर रत्नमाला बनाता है इसी प्रकार स्थायीभाव प्रत्येक संचारी से सम्बद्ध होकर रसावस्था को प्राप्त करता है । १. स्थायीभाव रत्यादि परिणाम के उत्पादक होने से रसादि के परिणामि कारण हैं । ये रत्यादि जिस रस के स्थायीभाव माने गये हैं उनसे भिन्न रसों अनुभावरूप भी हो सकते हैं । परन्तु दूसरे रसों में में व्यभिचारिभावया स्वरूप में रहने से ( उनका ) स्थायीभावत्व नहीं होता है । रत्यादि के आगन्तुक इति ग पुस्तके नास्ति । २. तत्रादौ - ग ० । १. निदर्शनन्तु
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३८० नाट्यशास्त्रम् रति - गएक तत्र रतिर्नाम प्रमोदात्मिका ' लतुमाल्यानुलेपनाभरणभोजन-वरभवनानुभवनाप्रातिकूल्यादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेत् स्मित वदनमधुरकथनभ्रूक्षेपकटाक्षादिभिरनुभावैः । आमोदात्मक - भाव रति ' कहलाता है । यह ऋतु, माल्य, चन्द्रलेपन, अलंकार धारण, [ प्रियजन सेवन ] इष्ट भोजन, सुन्दर भवन का उपभोग तथा प्रतिकूल आचरण न करने आदि विभावों द्वारा उद्भूत होता है । इसका मुसुकुराते मुँह, मधुरवाक्य, भ्रूविक्षेप और कटाक्षपात आदि अनुभावों से अभिनय किया जाता है ।
अत्र श्लोकः-इष्टार्थ विषय प्राप्त्या रतिः समुपजायते ।
सौम्यत्वादद्भिनेया सा ' वाङ्माधुर्याङ्गचेष्टितैः ॥ ९ ॥
इस विषय में निम्न श्लोक है-इष्ट पदार्थ की प्राप्ति से ' रति ' उत्पन्न होती है । इसका अभिनय सौम्यता, वाणी के माधुर्य तथा उपयुक्त आंगिक चेष्टाओं द्वारा किया जाए ॥ ९ ॥
१. ' रति ' का व्यापक अर्थ है – अनुराग या प्रेम । पर यहाँ भरतमुनि ने उसका नाट्यप्रसंग में श्रृंगार के साथ सीमित अर्थ ही ग्रहण किया है । केवल अभिलाष मात्र के प्रदर्शन से रति व्यभिचारिभाव भी बन जाती है तथा देवता, बन्धु, गुरुजन आदि के प्रति प्रेम रहने पर इसका रूप भिन्न या उदात्त हो जाता है । अतः ये दोनों प्रकार ' रति ' के शृङ्गाररस के स्थायीभाव से पृथक् हैं । यहाँ रति को आमोदात्मक कह कर भरत ने उसे कान्ताविषयक ही संकेतित किया है जिससे स्पष्टतः वह श्रृंगाररस का स्थायीभाव बन कर रहे । २. आमोदात्मको भावः ग ० । २. प्रियजन परभावना ग ० । ३. भवति चात्र — ग ० । ४. रतिरित्युप- -ग: ० । ५. दभिनेयासो ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३८१ हास-दासो नाम- - परचेष्टानुकरण कुछ कासम्बद्धप्रलाप ' - पोरो-अथ भाग्यमौ -दिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तमभिनयेत् पूर्वोक्तैर्हसिता-दिभिरनुभावैः । ' हास ' ( नामक स्थायीभाव ) अन्य व्यक्तियों की चेष्टाओं के अनुकरण, आँख या गर्दन का स्पर्श ( बेसिर - पैर की ) बकवास ( असम्बद्ध प्रलाप ), दोषोद्भावन ( पौरोभाग्य ), मूर्खता के प्रदर्शन आदि अनुभावों से उद्भूत ( अभिव्यक्त ) होता है । इसका पूर्व निदर्शित हसितादि अनुभावों के द्वारा अभिनय किया जाए । "
भवति चात्र श्लोकः-परचेष्टानुकरणाद्धासः समुपजायते ।
स्मितद्दासातिहसितैरभिनेयः स पण्डितैः ॥ १० ॥
इस विषय में निम्न श्लोक है:: -अन्य व्यक्तियों की चेष्टाओं की नकल करने पर ' हास ' उत्पन्न होता है । इसे पण्डितजन स्मित, हसित तथा अतिहसित ( भेदों ) के द्वारा अभिनीत करें || १० || शोक-शोको नाम - इष्टजनवियोगविभवनाश - व बबन्धदुःखानुभव-नदिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्याश्रुपातपरिदेवितविलपित ' वैवर्ण्य-स्वरभेदनस्त गात्रता भूमिपतन सस्वनरुदिताक्रान्दितदीर्घनिःश्वसित जड-तोन्मादमोहमरणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । १. मन की प्रसन्नता तथा उन्मादादि से भी चित्त का विकार होने पर ' हास ' कहलाता है । कुहक का अर्थ है - आँख या गर्दन का स्पर्श करना । १. चेष्टानुकरणासम्बद्धप्रलाप ग ० । २. सौख्यादि - ग ० । २. वधबन्धनदुःखा– ग ० । ४. तस्याश्रुपातविलपितपरिदेवित ग ० । ५. भूमिपाताक्रन्दितविचेष्टितदीघं - निश्वसित - ग ० ।