भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 511–520

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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३८२ नाट्यशास्त्रम् ' शोक ' ( नामक स्थायी भाव ) का उद्भव प्रियजन के वियोग ( नाश ) सम्पत्तिनाश, ( प्रिय या ) इष्ट व्यक्ति के वध, बन्धन तथा दुःख के अनुभव करने आदि विभावों से उत्पन्न होता है । इसका अभिनय अश्रुपात,, विलाप, पश्चात्ताप ( परिदेवित ), विवर्ण ( मुँह के उतरने ), स्वरभेद ( कण्ठ के रुँघजाने ), अंगशैथिल्य, भूमिपतन, विलाप, दीर्घ - निश्वास, जड़ता, उन्माद, मोह तथा मरण आदि अनुभावों के द्वार किया जाता है । रुदितमत्र त्रिविधम् - आनन्द जमार्तिजमीर्ष्या समुद्भवश्चेति । भवति चात्रार्या: -इस दशा में सामान्यतः विलाप ( रुदित ) तीन प्रकार का होता है । ( १ ) आनन्द से, ( २ ) पीड़ा से तथा ( ३ ) ईर्ष्या से उद्भूत रुदित । इस विषय में ये आनुवंशिक आर्याएँ हैं: -हर्षोत्फुल्लकपोलं सानुस्मरणादपाङ्गविसृतास्त्रम् ' रोमाञ्चगात्रमनिभृतमानन्दसमुद्भवं भवति ॥ ११ ॥

१. स्थायीभाव के विशिष्ट लक्षणों के कारण यहाँ सर्वत्र उनमें होने वाले विभाव, अनुभाव या सात्विकभावों का विभागपूर्वक निदर्शन किया गया है । यह नाट्य में किये जाने वाले अभिनय को दृष्टिगत रखते हुए भरत मुनि ने यहाँ बतलाया है; अतः पूर्वाध्याय में रसाभिव्यक्ति को मुख्य मानकर दिखलाये गये स्थायी, संचारी के विवरण से यह व्यापक है । शोक - प्रियजन के मरणादि से हृदय में जो आकुलता उत्पन्न हो जाए वही चित्तवृत्ति ' शोक ' है । इस दशा में जबतक इष्टजन की जीविताशा का ज्ञान रहता हो तबतक प्रेम की प्रधानता रहने से ' विप्रलम्भ ' शृङ्गार ही रहता है और ऐसी दशा में व्याकुलता से उद्भूत ' शोक ' संचारीभाव बन जाता है । पर जब इष्टजन के मरण का ज्ञान हो जाए तब ' रतिभाव ' शोक की पुष्टि करता है और व्याकुलता के प्रधान हो जाने से वहाँ ' करुणरस ' का उद्भव होता है । १. आनन्देर्ष्यातिकृतं त्रिविधं रुदितं सदा बुधैर्ज्ञेयम् । तस्य त्वभिनययोगान् विभावगतितः प्रवक्ष्यामि ॥ इति ख- पुस्तकेऽधिकम् । २. सानुस्मरणञ्च वागनिभृतास्त्रम् - ग ० । ३. रोमावातिगण्डं रोदनमानन्दर्ज - ग ० ।

पृष्ठ 512

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सप्तमोऽध्यायः ३८३ जिस रोदन में कपोल हर्ष के कारण फूल जाए, स्मरण वाक्यों के साथ नेत्रों के प्रान्त भागों से अश्रु ढलकने लगें और बार - बार शरीर रोमांचित होने लगे तो उसे ' आनन्दज रोदन ' समझें ॥। ११ ॥

पर्याप्त विमुक्तास्त्रं सस्वनमस्वस्थगात्रगतिचेष्टम् ।

भूमिनिपातनिवर्ति ' विलपितमित्यार्तिजं भवति ॥ १२ ॥

जिसमें जोरों की आवाज करते हुए अश्रुप्रवाह अधिकता से हो रहा हो. शरीर की अवस्था, गति तथा चेष्टाएँ अव्यवस्थित हो, भूमि पर गिरकर बार - बार रोदन तथा तदनुकूल चेष्टाएँ हों तो उसे ' आर्तिजरोदन ' समझिए ॥ १२ ॥

प्रस्फुरितौष्ठ कपोलं सशिरःकम्पं तथा सनिःश्वासम् ।

भ्रुकुटीकटाक्ष कुटिलं स्त्रीणामीयकृतं भवति ॥ १३ ॥

स्त्रियों का वह जोरों से रोना जिसमें ओठ तथा गाल बार - बार फड़कते हों, मस्तक हिलता हो, लम्बी साँसे ली जाती हों, भ्रुकुटी और दृष्टि क्रोध से चढ़ जाए ( कुटिल हो जाए ) तो उसे ' ईर्ष्या जन्य रोदन ' जानों ॥ १३ ॥

स्त्रीनीच प्रकृतिष्वेष ' शोको व्यसनसम्भवः ।

धैर्येणोत्तम मध्यानां नीचानां रुदितेन च ॥ १४ ॥

स्त्री तथा नीच प्रकृति के पात्रों में ही कष्ट से होने वाला ' शोक ' होता है । उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों में धैर्ययुक्त तथा नीच प्रकृति के पात्रों में रोदन के द्वारा यह शोक उद्भूत होता ( या दिखाई देता ) है ॥ १४ ॥

क्रोध-क्रोधो नाम – आधर्षणाकुष्टकलह विवाद प्रतिकूलादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । अस्य ' विकृष्टनासापुटो वृत्तनयन सन्दष्टोष्ठपुटगण्ड-स्फुरणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । १. भूमिनिपातितचेष्टित- ग ० । २. अनयोर्मध्ये - कारणमपेक्षमाणः प्रायेणायासलिङ्गसंयुक्तः । वीररसान्तर-चारी कार्यः कृतको भवेच्छोकः । इति अधिकंग - पुस्तके । स्त्रीनीच प्रकृतिः ह्येष - घ ० । ३. तमभिनयेत् उत्फुल्लनासापुटोद्धतनयन – ग ० ।

पृष्ठ 513

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३८४ नाट्यशास्त्रम् " क्रोध " ( शत्रु आदि को ) पकड़ने, गाली देने, झगड़ने या लड़ने तथा विरोध करने आदि विभावों से उत्पन्न होता है । इसका अभिनय नथुनियों के फूलने, त्यौरी चढ़ाने, आँखों के घुमाने, ओठों के चबाने तथा गालों के फड़कन आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है । रिपुजो ' गुरुजश्चैव प्रणयिप्रभवस्तथा भृत्यजः कृतकश्चेति क्रोधः पञ्चविधः स्मृतः ॥ १५ ॥

कोष के पाँच प्रकार होते हैं । यथाः- ( १ ) रिपुज ( शत्रु पर आनेवाला ), ( २ ) गुरुज ( पूज्यजन पर होनेवाला ), ( ३ ) प्रणयिजन्य ( प्रिया पर होने वाला ), ( ४ ) भृत्यज ( सेवक पर होनेवाला ) तथा ( ५ ) कृतक बनावटी ) ॥ १५ ॥

अत्रार्या भवन्तिः-भ्रुकुटीकुटिलोत्कटमुखः सन्दष्टोष्टः स्पृशन्करेण करम् ।

स्वभुजप्रेक्षी रात्रौ नियन्त्रणं रुभ्येत् ॥ १६ ॥

इस विषय में ये आनुवंशी आर्याएँ हैं । १. क्रोध में मुख्यतः जल उठने या उत्तेजित हो जाने की भावना प्रबल रहती है । यदि यही भाव किसी छोटे अपराध या अन्य कारणों से होता है तो इसमें कठोर वचन या मौन रखना भी होता है । ऐसी दशा में ' क्रोध ' अमर्ष नामक संचारीभाव बन जाता है । यही ' क्रोध ' स्थायी तथा ' अमर्ष ' संचारी-भाव में अन्तर है । यहाँ क्रोध के भरत ने पाँच प्रकार बतला कर उसी का परम्परागत आर्याओं के द्वारा विस्तार वर्णन दिया है । २. यहाँ क्रोध के ( पांच ) प्रकारों में विविध आलम्बन निर्देशित किये गये हैं तथा उन्हीं के विभेद से क्रोध के प्रकार तथा उसके विभाव, अनुभाव आदि में अन्तर बतलाया गया है । इनमें शत्रु पर होनेवाले क्रोध में जलन या उत्ते-जना के भाव की तीव्रता या जल उठना बतलाया गया है । गुरुजन के प्रति होनेवाले उसको विनयच्छन्न बतलाया गया है तथा प्रिया के प्रति यही भाव १. अयं श्लोकः पुस्तके नास्ति । २. मुखसन्दष्ठौष्ठः घ ० । ३. स्पष्टभुजशिरवक्षाः - ग ०; धृष्टभुज शिखरवक्षाः घ ० । ४. शत्रोर्विनियन्त्रणं कुप्येत् — ग ० ।

पृष्ठ 514

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सप्तमोऽध्यायः ३८५ शत्रु पर होने वाले क्रोध में भ्रुकुटी का चढ़ाना, मुँह का टेढ़ा ( कुटिल ) या ऊँचा करना, ओठों का चबाना, हाथों का ( एक दूसरे से लगाकर ) मलना और स्त्रयं के मस्तक और छाती को बार - बार स्पर्श करना होता है ॥ १६ ॥

किञ्चिदवाङ्मुखदृष्टिः सास्रस्वेदापमार्जनपरश्च ' ।

अव्यक्तोल्बणचेष्टो गुरोर्विनययन्त्रितो रुष्येत् ॥ १७ ॥

पूज्यजन ( के द्वारा नियन्त्रित होने ) पर जब क्रोध आता है तो उसमें मुँह तथा दृष्टि थोड़ी झुक जाती है, आँसू और पसीने का कुछ - कुछ आना और उसे पोछने लगना रहता है तथा अपनी उद्धत चेष्टाएँ स्पष्ट प्रकट नहीं होने पाती है ॥ १७ ॥

अल्पतरप्रविचारो विकिरन्नश्रूण्य पाङ्गविक्षेपैः ।

सभ्रुकुटीस्फुरितोष्टः प्रणयोपगतो " प्रियां रुष्येत् ॥ १८ ॥

सानुराग प्रिया पर आनेवाले क्रोध में धीरे - धीरे कुछ दूर चलना, आँसुओं का टपकाना, आँखों को तिरछे रखना, भ्रुकुटी चढ़ाना तथा ओठों का चबाना होता है ॥ १८ ॥

होने पर उसमें थोड़ी मृदुता का भाव निर्देशित किया गया है । जब कि अपने सेवक आदि पर यही भाव आने पर क्रूरता नहीं रहती, क्योंकि वहाँ अपना पराक्रम दिखलाना इष्ट नहीं होता केवल मनकी क्षोभपूर्ण वृत्ति ही वहाँ मुख्य रहती है । और जो क्रोध कृत्रिम होता है अर्थात् किसी कारण से उद्भुत होता है उसकी स्थिति दो रसों के अन्तर्गत मानी गयी है । यह वीर रस तथा रौद्र-रस के अन्तर्गत होता है । ऐसी अवस्था में वीररस के अन्तर्गत क्रोध संचारी होकर भी ' कृत्रिम ' हो सकता है क्योंकि वहाँ यह नियोजित एवं व्यवस्थित रूप में किसी कारण से ही उत्पन्न होता है । जब कि रौद्ररस में क्रोध किसी कारण विशेष से उत्पन्न होता है तथा वह अपने समकक्ष भावों का अतिक्रमण कर मुख्यता प्राप्त करता है; अतः वहाँ स्थायीभाव प्राप्त करता है तथापि व्यवस्थित नियोजन न होने से ( अनिश्चय के कारण ) ' कृत्रिम ' भी हो जाता है । यही आशय यहाँ ' द्विरसान्तरसञ्चारी ' से संकेतित किया है । १. किञ्चित् स्वेदापमार्जन — घ ० । २. विहरन् - क ० । ३. गुरोर्विनियन्त्रणं - ० । ४. स्फुरदोष्ठः - ग ० । ५. प्राणायाभिगतां - ग ० । २५ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 515

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३८६ नाट्यशास्त्रम्

अथ ' परिजने तु रोषस्तर्जननिर्भर्त्सनाक्षिविस्तारैः ।

विप्रेक्षणैश्च विविधैरभिनेयः क्रूरतारहितः ॥ १ ९ ॥

सेवक पर होने वाले क्रोध में तर्जना, डाँटना, आँखों को निकालते हुए देखना तथा ऐसे ही कई प्रकार से देखना होता है ॥ १ ९ ॥

कारणमवेक्षमाणः प्रायेणायासलिङ्गसंयुक्तः ।

द्विरसान्तरसञ्चारी कार्यः कृमको भवति कोपः ॥ २० ॥

जो किसी कारण को लेकर होनेवाला हो तथा जिसमें प्रायः आयास के लक्षण सम्मिलित रहते हौं, जो दो रसों के मध्य में विद्यमान रहता हो तो उसे ' कृतक ' क्रोध जानों ॥ २० ॥

' उत्साह-उत्साहो नाम - उत्तमप्रकृतिः । स चाविषादशक्ति ' - धैर्यशौर्या-दिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तस्य स्थैर्यधैर्यत्याग - वैशारद्यादिभिरनुभावै-रभिनयः प्रयोक्तव्यः । ' उत्साह ' उत्तम प्रकृति के पात्रों में होता है । यह विषादहीनता शक्ति, धैर्य, शौर्य आदि विभावों से उत्पन्न होता है । स्थिरता, धैर्य ( धारण ) तथा चातुर्य ( अथवा अङ्गीकृत अनुभावों के द्वारा किया जाता है । अत्र श्लोकः-असम्मोहादिभिर्व्यक्तो व्यवसायनयात्मकः उत्साहस्त्वभिनेय ' स्यादप्रमादोत्थितादिभिः ॥ १. उत्साह — यहाँ उत्साह को स्थिरचित्तता आदि से नायक आदि में विद्यमान सक्रिय और कर्मठवृत्ति को निर्देशित की गयी है । १. यः परिजने - ग ० इसका अभिनय निर्वाह ) आदि उद्भुत बतला कर आवश्यक स्थिति २. स्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ग ० । ३. मवेक्षमाणः । ४. वीररसान्तरचारीक ०, उभयरसान्तर ग ० । ५. धैर्यशीर्यत्यागादिभि - ग ० । ६. तस्य धैर्यत्यागारम्भवैशारद्या - ग ० । ७. स्त्वभिनेयोऽसावप्रमादक्रियादिभिः – ग ० ।

पृष्ठ 516

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सप्तमोऽध्यायः ३८७ इस विषय में एक श्लोक है: -स्थिर - चित्तता ( असम्मोह ) आदि के द्वारा उद्भूत व्यवसाय तथा नीति से सम्पन्न उत्साह को प्रमाद- हीनता, उत्थान आदि क्रियाओं ( अनुभावों ) के द्वारा अभिनीत किया जाए ॥ २१ ॥।

' भय-भयं नाम - स्त्रीनीचप्रकृतिकम् । गुरुराजापराधश्वापद ' शून्यागा-राटवी - पर्वत गहनगजाहि दर्शननिर्भर्त्सन कान्तारं दुर्दिननिशान्धकारोलूक-नक्तञ्चरारावश्रवणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्यै प्रकम्पितकरचरण-हृदय कम्पनस्तम्भमुखशोषजिह्वापरिलेह नस्वेदवेपथुत्रा ' सपरित्राणान्वे-पण ' - धावनोत्क्रुष्टादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ' भय ' स्त्री तथा नीच प्रकृति के पात्रों में होता है । यह गुरुजन तथा राजा के अपराध करने; हिंसक जन्तुदर्शन, शून्य ग्रह, अरण्य तथा पर्वत में भ्रमण, हाथी तथा सर्प के दर्शन, धौस, डपट, दुर्गम मार्ग, मेघों तथा रात्रि के अन्धकार, उल्लू तथा राक्षसों की ध्वनियों के श्रवण आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होता है । इसका अभिनय धूजते हुए हाथ तथा पैरों, हृदय के घड़कने, स्तम्भ, मुँह के सूखने, जीभ के चाटने, पसीना पोंछने, कम्पन, त्रास, रक्षकजन की तलाश, भागना, रोना आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है ।

अत्र श्लोकाः-गुरुराजापराधेन रौद्राणाञ्चापि दर्शनात् ।

श्रवणादपि घोराणां भयं मोहेन जायते ॥ २२

१. भय – प्रबल अनर्थ आदि से होने वाली घबराहट ( वैक्लव्य ) को ही ' भय ' माना जाता है । यदि प्रबल अनर्थ के कारण व्याकुलता न हो तो फिर यह ' त्रास ' नामक व्यभिचारिभाव हो जाता उत्पात आदि से जो उत्पन्न होता हैं वह ' त्रास जो उत्पन्न हो उसे ' भय ' समझना चाहिए । भय विभेद है । १. श्वापद इति -ग पुस्तके नास्ति । २. गहनगजाहि इति — ग पुस्तके नास्ति । ३. कान्तार इति -ग पुस्तके नास्ति ॥ अन्य आचार्यों का मत है कि ' है तथा अपने अपराधादि से और त्रास में यही पारस्परिक ४. प्रवेपित - ग ० । ५. शोषण - ग ० । ६. परिलेह - ग ० । ७. त्रास इति - ग पुस्तके नास्ति । ८. परिलाभान्वेषण ग ० ।

पृष्ठ 517

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३८८ नाव्यशास्त्रम् इस विषय में ये श्लोक हैं ।: - घिन गुरुजन एवं राजापराध, रौद्र ( भीषण ) वस्तुओं के अवलोकन तथा उत्प घोर ध्वनि के श्रवण से मोहवश ' भय ' उत्पन्न होता है ॥ २२ ॥

गात्रकम्पनवित्रासैर्वक्त्रशोषणसम्भ्रमैः ।

विस्फारितेक्षणैः कार्यमभिनेय क्रियागुणैः ॥ २३ ॥।

शरीर कम्पन, त्रास, मुँह का सूखना, कार्य में शीघ्रता आँखे फाड़कर देखना आदि क्रियाओं के द्वारा इसका अभिनय चाहिए ॥ २३ ॥

सत्त्ववित्रासनोद्भूतं भयमुत्पद्यते नृणाम् ।

स्वस्ताङ्गाक्षिनिमेषैस्तदभिनेयं तु नर्तकैः ॥ २४ ॥

मनुष्यों में भय तभी उत्पन्न होता है जबकि सत्व ( भूत - प्रेत ) ( त्रास ) हो रहा हो; कुशल अभिनेता इसे ढीले अंगों तथा शंकित के द्वारा अभिनीत करें ॥ २४ ॥

अत्रर्या भवति-करचरणहृदयकम्पैस्तम्भनजिह्नोपलेपमुखशोषैः ।

' स्रस्तसुविषण्ण गात्रैस्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ २५ ॥

इस विषय में एक आर्या भी है: -हाथ, पैर तथा हृदय के काँपने, जिह्वा के बार - बार चाटने ( मुँह थूकन द्वारा करना, करना से भय दृष्टियों चाहि विद्य निमेष प्रयो सूखने ) स्तम्भ और ढीले तथा अव्यवस्थित अवयवों के द्वारा इस ( भय ) का असा अभिनय करना चाहिए ॥ २५ ॥ कला

इसक जुगुप्सा-जुगुप्सा नाम - स्त्रीनीचप्रकृतिका । सा चाहृद्यदर्शनश्रवण-परिकीर्तनादिभिर्विभवैः समुत्पद्यते । तस्याः सर्वाङ्गसङ्कोच निष्ठीवन- विवर मुखविकूर्णनहृल्लेखादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । १. गात्रादिकम्पवित्रासैः ग ० । २. अभिनेय - ग ० । ३. तत्र विवासनों - ग ० । ४. निमेषैश्च व्यभिने यस्तु ग ० ५. मुखशोषणवदनलेहनस्तभैः - क ० । ६. सम्प्रान्तवदनवेपथुसन्त्रासकृत रभिनयोऽस्य - क ० । ७. या ग ० । ८. विघूर्णन - ग ० । हृदय तथा । अतिश

पृष्ठ 518

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सप्तमोऽध्यायः ३८ ९ " जुगुप्सा ' नीच पुरुष तथा स्त्री ( पात्रों ) में उत्पन्न होती है । यह घिनौनी वस्तुओं के दर्शन, श्रवण तथा कथन आदि विभावों के द्वारा टोकन तथा करना, य करना ) से भय तदृष्टियों उत्पन्न होती है । इसका अभिनय शरीर के सभी अवयवों के सिकुड़ाने, थूकने, मुँह घुमाने तथा हृदय के धड़कने या दुखने आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है ।

भवति चात्र श्लोकः -नासाप्रच्छादनेनेह ' गात्रसङ्कोचनेन च ।

उद्वेजनैः सहृल्लेखैर्जुगुप्सामभिनिर्दिशेत् ॥ २६ ॥

इस विषय में एक श्लोक भी है: नाक ढँकने, शरीर के अवयवों को संकुचित करने, उद्वेग तथा हृदय की पीड़ा होने ( आदि ) अनुभावों के द्वारा जुगुप्सा ' को प्रदर्शित करना चाहिए ॥ २६ ॥

विस्मय: -विस्मयो नाम - मायेन्द्रजाल मानुषकर्मातिशय - चित्रपुस्तशिल्प-विद्यातिशयादिभिर्विभावै समुत्पद्यते । तस्य नयनविस्तारा-॥ निमेषप्रेक्षित ' भूक्षेप रोमहर्षणशिरःकम्प - साधुवादादिभिरनुभावैरभिनयः सूखने ) भय ) का निश्रवण-निष्ठीवन-प्रयोक्तव्यः । " विस्मय ' की उत्पत्ति माया, इन्द्रजाल, मनुष्यों के द्वारा विहित असाधारण ( विचित्र ) कार्य, महान् आश्चर्य - कारिणी चित्रकला, शिल्प-कला तथा पुस्त - विद्या की अतिशयता आदि विभावों के द्वारा होती है । इसका आँखों को फैलाने, इकटक देखने, भौंहें घुमाने ( भू - विक्षेपण ) १. जुगुप्सा — इसका बीभत्स रस के प्रसङ्ग में विवेचन हो चुका है, वही विवरण फिर से प्रसङ्गवश यहाँ भी दे दिया गया है । ' हृल्लेखन ' का अर्थ है हृदय की पीड़ा या उसका धड़कना । २. विस्मय - चित्रकला, शिल्पकला तथा पुस्तविद्या, की ( अर्थात् जो लकड़ी तथा धातु की कारीगरी का शिक्षण देने वाली विद्या हो ) असाधारणता या प्रतिशयता से ही मनुष्य आश्चर्यान्वित हो जाता है । १. प्रच्छादनेनापि ग ० । २. विद्यातिशयाद्यै - ग ० । ३. प्रेक्षण - ग ० ।

पृष्ठ 519

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३ ९ ० नाट्यशास्त्रम् रोमांचित होने, मस्तक कँपाने, प्रशंसा करने आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय करना चाहिए ।

भवति चात्र श्लोकः-कर्मातिशयनिर्वृत्तो विस्मयो हर्षसम्भवः ।

सिद्धिस्थाने त्वसौ साध्यः प्रहर्षपुलकादिभिः ॥ २७ ॥

एवमेते स्थायिनो भावा रससंज्ञाः प्रत्यवगन्तव्याः । इस विषय में एक श्लोक है: -अपनी सीमा के अतिक्रमणकारी ( अतिशय ) हर्ष से ' विस्मय ' उत्पन्न होता है । इसका अभिनय द्वारा करना चाहिए ॥ २७ ॥

इसी प्रकार रसदशा को प्राप्त होने वाले ( या समझना चाहिए ) । ' सञ्चारीभाव-व्यभिचारिण इदानीं व्याख्यास्यामः ' । कार्यों द्वारा होनेवाले हर्ष, रोमाञ्च आदि के स्थायीभाव होते हैं ' अत्राह - व्यभिचारिण इति कस्मात् । उच्यते -वि अभि इत्येतानुपसर्गौ । चर् इति गत्यर्थी धातुः विविधमाभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः । वागङ्गसत्त्वोपेताः प्रयोगे रसान्नयन्तीति व्यभिचारिणः । चरन्ति नयन्तीत्यर्थः । अत्राह कथं नयन्तीति । उच्यते - लोकसिद्धान्त एषः - यथा सूर्यइदं दिनं नक्षत्रं वा नयतीति । न च तेन बाहुभ्यां स्कन्धेन वा नीयते । किंतु लोकप्रसिद्धमेतत् । यथेदं सूर्यो नक्षत्रं दिनं वा नयतीति एवमेते व्यभिचारिण इत्यवगन्तव्याः । तानिह सग्रहाभिहितांस्त्रयस्त्रिंशद्वयभिचारिणो भावान् वर्णयिष्यामः । अब हम व्यभिचारी ( संचारी ) भावों को निरूपित करते हैं । प्रश्न-इन्हें व्यभिचारी भाव क्यों कहा जाता है? उत्तर- इसमें ' वि ' तथा ' अभि ' १. संचारी भाव - संचारीभाव की अन्य संज्ञा है व्यभिचारिभाव । व्यभि चारिभाव की भरत ने व्युत्पत्ति भी दी है विशेषात् अभि मुख्येन चरन्तीति १. वक्ष्यामः ग ० । २. धात्वर्थ वागङ्गसत्वोपेतान् - ग ०; यथायं सूर्यो घ ० । ३. यथा सूर्य इदं नक्षत्रममुं वासरं नयतीति — ग ० । ४. त इमे सङ्ग्रहाभिहितास्त्रयस्त्रिंशद्भावाः तान् वर्णयिष्यामः - घ ० ।

पृष्ठ 520

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सप्तमोऽध्यायः ३ ९ १ उपसर्ग है और ' चर ' धातु है । जिसका अर्थ है - जाना, हिलना । तब ' व्यभिचारी ' शब्द का अर्थ हुआ - ' वे जो रसों की ओर विभिन्न प्रकारों से आगे बढ़ते हों ' और यह भी कि ' वे शब्दों ( वाणी ), शारीरिक मुद्राओं तथा सात्विक ( आदि ) भावों से युक्त होकर रसों तक पहुँचने के कारण व्यभिचारिभाव हैं । प्रश्न - ये ( रसों को ) किस प्रकार वहन करते हैं? " ( या उन्हें लेकर आगे बढ़ते हैं ), उत्तर- इसे लौकिक व्यवहार में आने वाले सिद्धांत के समान समझ लेना चाहिए । जैसे सूर्य इस नक्षत्र या इस दिन को प्राप्त करता है । यहाँ यह आशय नहीं कि यह अपनी भुजाओं या कन्धे पर उन्हें वहन करता हो किन्तु यह संसार में प्रसिद्ध है कि सूर्य नक्षत्र और दिन को ले जाता है । इसी प्रकार ये भी प्रयोग को आगे बढ़ाने या ले जाने के कारण व्यभिचारी भाव कहलाते हैं ऐसा समझलेना चाहिए । ये भाव पूर्व संग्रह में निदर्शित तैंतीस हैं । अब हम ( क्रमशः ) इन्हीं का वर्णन प्रारम्भ करते हैं । ' निर्वेद– निर्वेदो नाम - दारिद्रयोपगमनाधिक्षेपा ' क्रुष्टको धताडने-तत्र समुत्पद्यते । स्त्रीनीचकुसत्त्वानाम् ष्टजनवियोगतत्त्वज्ञानादिभिर्विभावैः । रुदिता निःश्वसितोच्छ्वसित ' की उत्पत्ति दारिद्रय सम्प्रधारणादिभिरनुभावैस्तमभिनयेत - प्राप्ति, अपमान, गाली या अशिष्ट ' निर्वेद हो प्रताड़ना करना, इष्ट ( प्रिय ) जन का वियोग तथा बकवास, कोधित व्यभिचारिणः ' अर्थात् ये व्यभिचारिभाव इसलिये कहलाते हैं, क्योंकि वे विविधस्वरूपों या विषयों की ओर अभिमुख रसों के सम्बन्ध में या रसों में संचार करते हैं । अर्थात् ये विविध अनुभावों के अभिनय के द्वारा भाव को रसोद्बोध तक पहुँचा देते हैं । संचारी या व्यभिचारिभाव के स्वरूप को पण्डित-राज ने ' यानिसह चरन्ति तानि व्यभिचारिशब्देन व्यपदिश्यन्ते ' कहा है अर्थात् स्थायी भावों के साथ रहने वाली चित्तवृत्तियाँ जैसे चिन्ता आदि व्यभिचारि-भाव १. है निर्वेद । - शान्त रस का स्थायीभाव ' निर्वेद ' नित्य तथा अनित्य वस्तुओं के विवेक से उत्पन्न होता है अतः वहाँ ' स्थायीभाव ' है । परन्तु यहाँ दारिद्रयादि से उत्पन्न होने के कारण ' संचारीभाव ' है । यहाँ निर्वेद की उत्पत्ति में तत्व-ज्ञान को विभाव बतलाया गया है यह यद्यपि अन्य कोटियों से भिन्न है तथापि १. व्याध्यवमानाधिक्षेप क ० ।