श्रीगणेशाय नमः।
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 521–530
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 521–530
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३ ९ २ नाट्यशास्त्रम् तत्वज्ञान आदि विभावों के द्वारा होती है । स्त्री तथा नीच एवं कुत्सित पात्रों में होनेवाला इस भाव का अभिनय रोना, साँसे भरना, उसांसे लेना निश्चय करना ( सम्प्रधारण ) आदि अनुमावों के द्वारा किया जाता है ।
भवति चात्र श्लोकः-दारिद्र्येष्ट वियोगाद्यैः निर्वेदो नाम जायते ।
सम्प्रधारणनिःश्वासैस्तस्य त्वभिनयो भवेत् ॥ २८ ॥
इस विषय में इलोक है । दरिद्रता की प्राप्ति तथा प्रियजन के वियोग आदि से निर्वेद ' उत्पन्न होता है | इसका चिन्तन करने तथा ऊँची सांस लेने ( निःश्वास ) आदि के द्वारा अभिनय किया जाए ॥ २८ ॥
अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः -इष्टजनस्य वियोगाद्दारिद्रयाद्वयाधितस्तथा दुःखात् ।
ऋद्धि परस्य दृष्ट्वा निर्वेदो नाम सम्भवति ॥ २२ ॥
इस विषय में अनुवंशीय आर्याएँ भी हैं-इष्टजन के वियोग, दरिद्रता, व्याधि तथा दूसरों की वृद्धि देखकर होने वाले दुःख से निर्वेद भाव उत्पन्न होता है ॥ २ ९ ॥
वाष्पपरिप्लुतनयनः पुनश्च निःश्वासदीन मुखनेत्रः ।
योगीव ध्यानपरो भवति हि निर्वेदवान्पुरुषः ॥ ३० ॥
निर्वेदयुक्त पुरुष की आँखे आँसुओं से लबालब होती हैं, वह लम्बी उससे लेता है, उसके चेहरे और आँखों पर दीनता छायी होती है और वह योगी की तरह ध्यानस्थ - सा लगता है या ध्यान में मग्न दिखाई देता है ॥ ३० ॥
संसार के प्रति वैराग्य या अनास्था उत्पन्न करवाने मात्र से साधनभूत है और मोहजन्य भी अन्य दशाओं में होता है अतः संचारीभाव है । ' निर्वेद ' का विशेष विवरण शान्तरस प्रकरण में ( ना ० शा ० अ ० ६ ) दिया चुका है । १. इष्टजनविप्रयोगात् – ग ० । २. परवृद्धि वा दृष्ट्वा - ग ० । ३. दीर्घमुख- -ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३ ९ ३ ग्लानि-ग्लानिर्नाम - वान्तविरिक्तव्याधितपोनियमोपवासमनस्तापाति-शयपान - ' मद्यसेवनातिव्यायामाध्व - गमनक्षुत्पिपासानिद्राच्छेदादिभि-र्विभावैः समुत्पद्यते । तस्याः क्षामवाक्यनयनक पोलोदरमन्द ' पदोत्क्षेपण-प्रयो-वेपनानुत्साहतनुगात्र वैवर्ण्यस्वरभेदादिभिरनुभावैरभिनयः क्तव्य उल्टी ।, जुलाब, व्याधि, तप, नियम, उपवास, मन का सन्ताप, कामाभिभूतता, ( छककर ) मद्य - पान, अतिशयव्यायाम, दूर तक अतिशय, क्षुधा, प्यास, निद्रा भंग आदि विभावों के द्वारा ' ग्लानि ' की रास्ता चलना अभिनय धीमी आवाज से बोलने, आँखों के उत्पत्ति होती है । इसका होने, कपोलों के पीले पड़ जाने, धीरे - धीरे डग भरने, काँपने कान्तिहीन बतलाने, शरीर के क्षीण होने, मुँह के उतरने और स्वर उत्साह हीनता के भर्राने आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है ।
अत्रायें भवतः -वान्त विरिक्तव्याधिषु तपसा जरसा च जायते ग्लानिः ।
काश्येन साभिनेया मन्दभ्रमणेन कम्पनेन ॥ ३१ ॥
गदितैः क्षामक्षामैर्नेत्रविकारैश्च दीनसञ्चरैः ।
श्लथभावेनाङ्गानां मुहुर्मुहुर्निर्दिशेद् ग्लानिम् ॥ ३२ ॥
१. ग्लानि - यहाँ ग्लानि मानसिक स्थितियों की अपेक्षा शारीरिक स्थितियों से उत्पन्न भी निर्देशित की गयी है इसका कारण यह प्रतीत होता है कि शारीरिक स्थितियाँ मानसिक शिथिलता आदि को उत्पन्न कर देती हैं । पण्डितराज ने ग्लानिको मानसिक कष्ट तथा रोग आदि से उत्पन्न शारीरिक दुर्बलता माना है । कुछ प्राचीन आचार्यों ( भरतमुनि नहीं ) ने ' बलस्यापचयो ग्लानिराधिव्या-धिसमुद्भवः ' [ " अर्थात मानसिक कष्ट और रोगों से उत्पन्न होने वाली शक्ति-हीनता का नाम ' ग्लानि ' है " । ] माना है । यहाँ ' अपचय ' शब्द बल के नाश को प्रतीत करवाता है अतः ऐसे कष्ट की अपेक्षा रोगजन्य निर्बलता से होनेवाली विवर्णता आदि दिखाई देने वाले भाव विशेष को ' ग्लानि ' मानना चाहिए । १. मदनसेवा दिव्यायाम घ ० । २. कपोलमन्दमन्दपदोपरामानुत्सा हतनुगात्रवैवर्ण्यादिभिरनुभाव – ग ०; पदोपक मानुत्साह - घ ० । ३. वातविरिक्तव्याधि - ग ० । ४. मन्दक्रमणानुकम्पेन -- ग ० । ५. श्लथ भावाच्चाङ्गानां घ ० ।
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२ ९ ४ नाव्यशास्त्रम् इस विषय में आर्याएँ हैं— उल्टी, जुलाब लगने, बीमारी, तप और बुढ़ापे आदि से ग्लानि उत्पन्न होती है । इसका अभिनय कमजोरी, धीरे - धीरे चलने तथा शरीर के काँपने आदि के द्वारा किया जाए ॥ ३१ ॥
धीमी आवाज में टूटे शब्दों के बोलने, नेत्रों में कमजोरी, दीनभाव से संचरण तथा अंगों की शिथिलता के द्वारा ग्लानि का अभिनय होता है ॥ ३२ ॥
शंका-शङ्का नाम – सन्देहात्मिका स्त्रीनीचप्रभवा ' । चौर्याभिग्रहण'-नृपापराधपापकर्मकरणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्या मुहुर्मुहु-लोक नावगुण्ठन मुखशोषणजिह्वापरिलेद्दनमुखवैवर्ण्य - ( वैस्वर्य ) -स्वरभेद - वेपथु - शुष्कोष्ठकण्ठावसादसाधर्म्या दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ' शंका ' सन्देहात्मक स्वरूपवाली तथा स्त्री एवं नीचपात्रों में ( रहने और उनसे ) उत्पन्न होने वाली भी होती है । यह चोरी से सम्पत्ति ग्रहण करने, नृपापराध तथा पाप कर्म के करने आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होती है । इसका अभिनय बार - बार देखने, संकुचित होने ( अवगुण्ठन ), मुँह सूखने, ओठों को जीभ से चाटने, मुँह पर हवाई उड़ने ( या उसके फीका पड़ने ), स्वर के बदल जाने, कम्पन, ओंठ सूखने, कण्ठ से प्रयास करने पर भी शब्द न निकलने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । १. शङ्का —यह भाव सन्देह मूलक होता है और इसकी स्त्री तथा नीच प्रकृति के पात्रों में अधिक व्याप्ति देखी जाती है, यही दर्शाया गया है । शङ्का से भय आदि की उत्पत्ति होती है अतः कम्प आदि का यह कारण होती है परन्तु चिन्ता से भय आदि की उत्पत्ति नहीं होती यही इन दोनों में पार्थक्य है । १. सन्देहात्मिका स्त्रीनीचप्रभवा इति - ग पुस्तके नास्ति; स्त्रीनीचानां घ ० । २. चौर्याद्यभिग्रहण – ग ० । ३. नावकुण्ठन - ख ० वकुण्ठित मुख - ग ० । ४. कण्ठायाससाधर्म्या – ख ०, कण्ठावसादादिभिरनुभावैरभिनीयते घ ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३२५
अत्र श्लोकः-चौर्यादिजनिता शङ्का प्रायः कार्या भयानके ।
प्रियव्यलीकजनिता तथा शृङ्गारिणी मता ॥ ३३ ॥
इस विषय में एक श्लोक है । ' शंका ' को भयानक रस में प्रायः चोर से उत्पन्न होने वाली तथा शृङ्गार रस में प्रियतम के अप्रिय आचरण से ( प्रायः ) होने वाली रखना चाहिए ॥ अत्राकारसंवरणमपि केचिदिच्छन्ति । तच्च कुशलैरुपाधिभि-रिङ्गितैश्चोपलक्ष्यम् । कुछ आचार्यों के अनुसार इस स्थिति में आकार का छिपाना भी ( एक विभाव ) माना जाता है । उसे चातुर्य - पूर्ण क्रियाओं तथा चेष्टाओं द्वारा यहाँ प्रदर्शित करना चाहिए ।
अत्रायें भवत: -द्विविधा शङ्का कार्या ह्यात्मसमुत्था च परसमुत्था च ।
सा ज्ञेया दृष्टिचेष्टाभिः ॥ ३४ ॥
या तत्रात्मसमुत्था ' वीक्षते च पार्श्वानि । किञ्चित्प्रपिताङ्गत्वधोमुखो श्यामास्य ' शङ्कितः पुरुषः ॥ ३५ ॥
गुरुसज्जमानजिह्नः इस विषय में ( दो ) आर्याएँ ( भी ) हैं: शङ्का दो प्रकार की होती है- ( १ ) आत्मसमुत्था तथा ( २ ) पर-। इनमें प्रथम ( आत्कसमुत्था शङ्का ) का दृष्टि तथा चेष्टाओं से ज्ञान समुत्था हो जाता है ॥ ३४ ॥
पुरुष के अंग कुछ - कुछ काँपते हैं, वह नीचा मुँह किये होता और शङ्कित बगलियाँ झाँकता है, उसकी जिह्वा ( जोरों से ) अटकती है है ( सज्जमानजिह्वः ) और मुह काला पड़ जाता है ॥ ३५ ॥
असूया -असूया नाम - नानापराध द्वेषपरैश्वर्य भाग्य मेधाविद्यालीला-दिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्याश्च परिषदि दोषप्रख्यापनं गुणोप-मुहुर्मुहुर्वीक्षते - ग ०; स्तथोन्मुखो वीक्षते - घ ० । १. किञ्चित्प्रपिताङ्गो २. श्लावास्यः ग ० श्यावास्यः घ ० । १३. ' मेधा ' इति -ग पुस्तके नास्ति ।
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३ ९ ६ नाट्यशास्त्रम् घातेर्ष्याचक्षुःप्रदानाधोमुखभ्रुकुटीक्रियावज्ञानकुत्सनादिभिरनुभावैर-भिनयः प्रयोक्तव्यः । अनेक अपराध, द्वेष, अन्य व्यक्तियों की सम्पत्ति, सद्भाग्य, बुद्धिमत्ता, विद्यार्जन तथा क्रीड़ा ( लीला ) आदि के अवलोकन आदि विभावों से " असूया ' उत्पन्न होती है । इसका अभिनय सभा में दोषों की उद्घोषणा करना गुणों को दबाना या उपेक्षा करना, ईर्ष्या, नीचा मुख रखना, भ्रुकुटी चढ़ाना, अवज्ञा करना तथा अन्य व्यक्तियों की निन्दा या उनको गाली देना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रार्ये भवतः -परसौभाग्येश्वरता मेघालीला समुच्छ्रयान्दृष्ट्वा उत्पद्यते ह्यसूया कृतापराधो भवेद्यश्च ॥ ३३ ॥
भ्रुकुटिकुटिलोत्कटमुखैः ' सेर्ष्याक्रोधपरिवृत्तनेत्रैश्च ' ।
गुणनाशनविद्वेषैस्तत्राभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ ३७ ॥
इस विषय में निम्न आर्याएँ हैं.: -दूसरे व्यक्ति के सौभाग्य, समृद्धि, बुद्धि, क्रीड़ा एवं उत्कर्ष को देख कर अपराधी मनुष्य के हृदय में ' असूया ' उत्पन्न होती है ॥ ३६ ॥
भ्रुकुटी चढ़ाने, मुँह घुमाने ( या टेढ़ा करने ), मुँह ऊँचा करने, चेहरे की घबराहट, ईर्ष्या एवं क्रोध से मुँह फेरने, गुणों के नाश करने या उनसे घृणा करने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ३७ ॥
मद-मदो नाम - मद्योपयोगादुत्पद्यते । स च त्रिविधः पश्वविध भावश्च । १. असूया - -द्वेषादि से किसी के सद्गुण को सहन न करना ' असूया ' है, इसमें सदा दूसरों के दोष ही देखे जाते हैं । ' असूया ' में कभी विद्यमान तथा कभी अविद्यमान दोषों को देखा जाता है । यह नाव जब किसी के अपराध दर्शन से उद्भूत होता है तो इसमें क्रोध या उत्तेजना का थोड़ा मिश्रण या अंश रहता है । १. कुटिलोत्कटमुख – ग ० । २. वक्त्राद्यैः - ग ० । ३. रस्याभिनयः - घ ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ३ ९ ७ मद्यपान से ' मद ' उत्पन्न होता है । यह तीन प्रकार का तथा पाँच भावों से युक्त होता है ।
अनार्या भवन्ति-ज्ञेयस्तु ' मदस्त्रिविधस्तरुणो मध्यस्तथावकृष्टश्च ।
करणं पञ्चविधं स्यात्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ ३८ ॥
इस विषय में ये आर्याएँ हैं-" मद ' तीन प्रकार का होता है । ( १ ) तरुण, ( २ ) मध्य तथा ( ३ ) अवकृष्ट । इसका अभिनय पाँच प्रकार के हेतुओं ( भावों ) के ( प्रदर्शन ) द्वारा प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ३८ ॥
कश्चिन्मत्तो गायति रोदिति कश्चित्तथा हसति कश्चित् ।
परुषवचनाभिधायी कश्चित्कश्चित्तथा स्वपिति ॥३ ९ ॥
इस मद से मत्त कोई पुरुष गाता, कोई रोता, कोई हँसता, कोई कठोर शब्दों ( गालियों ) को बकता तथा कोई सोता है ॥ ३ ९ ॥
उत्तमसत्वः शेते इसति च गायति च मध्यमप्रकृतिः ।
परुषवचनाभिधायी रोदित्यपि चाधमप्रकृतिः ॥ ४० ॥
इसमें उत्तम प्रकृति का व्यक्ति सोता है, मध्यम प्रकृति हँसता और गाता है और अधमप्रकृति गाली वकता तथा रोता है ॥ ४० ॥
स्मित मधुररागो हृष्टतनुः किञ्चिदाकुलितवाक्यः ।
सुकुमाराविद्धगतिस्तरुणमदस्तूत्तमप्रकृतिः ॥ ४१ ॥
१. मद - मद्यपान आदि के सेवन से ' मद ' उत्पन्न होता है । साहित्यदर्पण के अनुसार सम्मोह और आनन्द की दशा में भी ' मद ' होता । इसमें मद्योप-भोगादि आलम्बन विभाव होते हैं । इसके मनोरथों की प्राप्ति हो जाना, इष्ट-पदार्थ का दर्शन, गीत वाद्य तथा नृत्य का वर्णन या अनुष्ठान विभाव होते हैं । क्रोधपूर्ण वचन, घबड़ाहट पूर्ण संभाषण, प्रसन्न शरीर, स्खलित एवं ललित गति, नेत्रों का घूरना आदि अनुभाव होते हैं । रंगमश्व पर मनोरंजनार्थं मद्यपान का अभिनय किया जाता है पर यदि कोई अभिनेता वास्तव में मद्यपान कर मञ्च पर ' मद ' का अभिनय प्रस्तुत करने लगे तो उसका नशा भयादि उपायों से उतार देना चाहिए अन्यथा अभिनय में विघ्न हो सकता है । १. त्रिविधश्व मदः कार्यंस्तरुणो - घ ० । २. धृष्टतनुः - ग ० ।
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३ ९ ८ नाट्यशास्त्रम् उत्तम प्रकृति के मनुष्य में ' तरुणमद ' होने पर ( उसका ) मुसकुराता हुआ मुँह, मधुर राग, प्रसन्न शरीर, ( थोड़े ) लड़खड़ाते शब्द, सुकुमार एवं तिरछी गति हो जाती है ॥ ४१ ॥
स्खलिताघूर्णितनयनः स्त्रस्तव्याकुलित बाहुविक्षेपः कुटिलन्याविद्धगतिर्भवति ' मदो मध्यमप्रकृतिः मध्यमप्रकृति के मनुष्य में मद होने पर ( उसके ) ( उसका ) शरीर लड़खड़ाता है, ( वह ) बाहुओं को ढीला घबराकर उन्हें पटकने लगता है, और ( उसकी ) गति ( पैरों के भूमि पर ठीक न टिकने से ) अस्थिर हो जाती है
।
॥ ४२ ॥
नेत्र घूमते हैं, कर देता है या तिरछी तथा ॥ ४२ ॥
नष्टस्मृतिर्हत गतिश्छर्दितहिक्काक फैः सुबीभत्सः ।
गुरुसज्जमानजिह्नो निष्ठीवति चाधमप्रकृतिः ॥ ४३ ॥
अधम - प्रकृति मनुष्य में ' मद ' होने पर ( उसकी स्मृति नष्ट हो जाता है, गति रुक जाती है, यह उल्टी, हिचकी तथा कफ को मुँह से गिराने के कारण घिनौना हो जाता है, उसकी जीभ खिंचने लगती है तथा वह थूका करता है ॥ ४३ ॥
रङ्गे पिबतः कार्या मदवृद्धिर्नास्ययोगमासाद्य ।
कार्यो मदक्षयो वै यः खलु पीत्वा प्रविष्टः स्यात् ॥ ४४ ॥
रङ्गमञ्च पर प्रवेश के उपरान्त मद्य पीने वाले पात्र की मदवृद्धि उसकी भूमिका के अनुसार रखनी चाहिये ( अर्थात् उस का ' मद ' मञ्च पर नाट्य-कथा के अनुरूप प्रदर्शित करना चाहिए । ) किन्तु जो पात्र मद्यपान करके मञ्च पर अभिनय हेतु प्रवेश करे उनका नशा उतार ( या चाहिये ॥ ४४ ॥
सन्त्रासाच्छोकाद्वा भयात्प्रहर्षाश्च ' कारणोपगतः यहि कार्यो मदप्रणाशः क्रमात्तज्ज्ञैः एभिर्भावविशेषैर्मदो द्रुतं सम्प्रणाशमुपयाति अभ्युदयसुखैर्वाक्यैर्यथैव ' शोकाः क्षयं यान्ति १. मध्यमदोग ० । २. प्रकर्षाच्च घ ० । ३. भयप्रकर्षाच्च ग ० । ४. उद्यम्यापि — ग ० ५. तथैव शोकः क्षयं याति ग ० । उतरवा ) देना ॥। ४५ ॥
।
॥ ४६ ॥
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सप्तमोऽध्यायः ३ ९९ अनुभवी जन इस बढ़े हुए ' मद ' को क्षीण करने के लिए क्रमशः त्रास, शोक, भय, हर्ष आदि कारणों को रखें । इस प्रकार की विशिष्ट अवस्था से शीघ्र वैसे ही मद उतर जाता है जैसे उन्नति तथा आनन्द के समाचार सुनने से शोक मिट जाता है ॥ ४५-४६ ॥ ' श्रमः-श्रमो नाम - अध्वव्यायाम ' सेवनादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य गात्रपरिमर्दनसंवाहननिःश्वसितविजृम्भितमन्दपदोत्क्षेपण'-नयनवदनविकूणन सीत्कारादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । लम्बी यात्रा, व्यायाम, सेवन आदि विभावों के द्वारा ' श्रम ' उत्पन्न होता है । शरीर के मालिश करने या दबाने, जोर - जोर से साँस लेने, जंभाई लेने ( विजृम्भित ), पैरों को धीमीगति से रखने, मुँह और आँखों को घुमाने ( विकूणन ) आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ।
अत्रार्या -नृत्ताध्वव्यायामान्नरस्य सञ्जायते श्रमो नाम ।
निःश्वासखेदगमनैस्तयाभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥
इस विषय में एक आर्या है --नृत्त, लम्बी यात्रा तथा व्यायाम करने से मनुष्य के शरीर में ' श्रम ' उत्पन्न हो जाता है । इसका अभिनय लम्बी साँस लेने तथा थकावट के कारण धीमि गति से चलने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ४७ ॥
आलस्यः-आलस्य नाम – खेदव्याधिगर्भस्वभावाश्रमसौहित्यादिभि विभावैः समुत्पद्यते स्त्रीनीचानाम् । तदभिनयेत्सर्वकर्मानभिलापशय-नासननिद्रा तन्द्रासेवनादिभिरनुभावैः । १. श्रम - शारीरिक आयासों से उत्पन्न होने वाली थकावट या खेद को ' श्रम ' कहा जाता है | श्रम बल के विद्यमान रहने पर भी होता है पर ' ग्लानि नहीं होती यही, दोनों में पार्थक्य है । १. अध्वगतिव्यायाम - ग ० । २. निःश्वसितमुख विकू जनजृम्भणाङ्ग-मर्द मन्दपादोत्क्षेपण - घ ० । ३. विघूर्णन - घ ० । ४. अध्वगतिव्यायामैर्नरस्य ग ० । ५. स्वभावखेदव्याधिसौहित्य गर्भादिभिः घ ० । ५. सर्वकर्म प्रद्वेषशयना - ग ० ।
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४०० नाट्यशास्त्रम् " आलस्य ' की उत्पत्ति थकावट, व्याधि, गर्भावस्था, स्वभाव, श्रम, अतितृप्ति विभावों के द्वारा होती है । यह स्त्री तथा नीच प्रकृति के पात्रों में आदि है । किसी भी कार्य में रुचि न लेने, विछौने पर लेटने, बैठने, उत्पन्न होता युक्त रहने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय किया सोने तथा तन्द्रा जाता है ।
अत्रार्या-आलस्यं त्वभिनेयं खेदोपगतं स्वभाव ' चापि ।
अहारवर्जितानामारम्भाणामनारम्भात् ॥ ४८ ॥
इस विषय में एक आर्या है— ' आलस्य ' थकावट से उत्पन्न होता है तथा यह स्वाभाविक भी होता तथा सभी आवश्यक कार्यों के आरम्भ न करने आदि है । आहारपरित्याग अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय किया जाता है ॥ ४८ ॥
दैन्य-दैन्यं नाम - दौर्गत्यमनस्तापादिभिर्विभाषैः समुत्पद्यते । तस्याधृतिशिरोरोगगात्रगौरवान्यमनस्कतामृजापरिवर्जनादिभिरनुभावे-रभिनयः प्रयोक्तव्यः । • दैन्य की उत्पत्ति दुर्गति तथा मानसिक सन्ताप आदि विभावों के द्वारा होती है । इसका अभिनय, धैर्य - त्याग ( अधृति ) शिरोपीड़ा १. आलस्य- -खेदादि के कारण चित्त का कार्य विमुख होजाना ' आलस्य ' है । इस दशा में न अशक्ति होती है, न कर्तव्या कर्तव्य के ज्ञान का अभाव, अतः किसी कार्य के न करने आदि अनुभाव के समान रहने पर भी ' ग्लानि ' तथा ' जडता ' से इसका विभेद स्पष्ट है । ' आलस्य ' श्रम से उत्पन्न होता है इसका आशय यह नहीं है कि ' श्रम ' ही आलस्य का विभाव हो जाए क्योंकि यह अत्यन्त तृप्त होने आदि अनुभावों से भी उत्पन्न हो सकता है । २. दैन्य- दुःख, दरिद्रता तथा अपराधादि से भी ' दैन्य ' उत्पन्न होता है । तथा इसमें स्वयं के विषय में हीनता का भाव तक उत्पन्न हो जाता है । दैन्य का अन्य लक्षण इस प्रकार है: -१. खेदव्याधिस्वभावजं – ग ०, घ ० । २. गात्र स्तम्भमनः स्तम्भ मृजा - ग ० ।
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सप्तमोध्यायः ४०१ ( सरदर्द ), शरीर के भारी होने, अन्यमनस्कता तथा शुद्धता के ( शरीर आदि की सफाई के ) परित्याग आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रार्या-चितौत्सुक्यसमुत्था ' दुःखाद्या भवति दीनता पुंसाम् सर्वमृजा परिहारैर्विविधोऽभिनय भवेत्तस्य इस विषय में एक आर्या है— चिन्ता, औत्सुक्य तथा दुःख आदि से मनुष्यों में ‘ दैन्य ' होता है । सभी प्रकार की शुद्धता का निषेध आदि विविध द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ४ ९ ॥
चिन्ता-॥। ४ ९ ॥
भाव उत्पन्न अनुभावों के चिन्ता नाम- म - ऐश्वर्यभ्रंशेष्टद्रव्यापहारदारिद्रयादिभिर्विभाषै-रुत्पद्यते । तामभिनयेन्निःश्वासितोच्छ्वसित सन्तापध्यानाधोमुख-चिन्तनतनु कार्यादिभिरनुभावैः । चिन्ता की उत्पत्ति, ऐश्वर्य नाश, अभीष्ट वस्तु की चोरी तथा दरिद्रता आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय निःश्वास, उसाँस लेना, सन्ताप, ध्यानस्थ हो कर नीचा मुँह कर सोचना तथा शरीर का कुश होना आदि अनुभावों के द्वारा किया जाए । चित्तौत्सुक्यान्मनस्तापाद्दौर्गत्याच्च विभावतः ।
अनुभावात्त शिरसोऽव्यावृत्तेर्गात्रगौरवात् ।
देहोपस्करणत्यागात् दैन्यं भावं विभावयेत् ॥
चित्त की उत्सुकता, मनस्ताप, दरिद्रता आदि विभावों से और मस्तक कंपन, शरीर का भारीपन होना और शरीर के संस्कार का त्याग करना आदि अनुभाव ' से ' दैन्य ' का ज्ञान करना चाहिए । चिन्ता - वाञ्छित वस्तु के प्राप्त न होने तथा अनिष्ट वस्तु के प्राप्त हो जाने पर जो चित्तवृत्ति विशेष बनती है वही ' चिन्ता ' है । प्रारब्ध की असिद्धि, इष्ट जन की अप्राप्ति तथा देश भ्रमण आदि इसके कारण होते हैं । १. समुत्थाद् दुःखाद्वा दीनता भवेत् पुंसाम् - ग ० । २६ ना ० शा ० प्र ०