भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 541–550
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 541–550
पृष्ठ 541
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१२ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में एक आर्या है: -विद्या की प्राप्ति, रूप, वैभव, तथा घन आदि के ( आकस्मिक ) लाभ से नीचप्रकृति के पुरुषों में गर्व उत्पन्न होता है । दृष्टि तथा शरीरावयों के चालन द्वारा इसे अभिनीत करना चाहिए ॥ ६७ ॥
' विषाद --विषादो नाम - कार्यानिस्तरण दैवव्यापत्तिसमुत्थः । तमभिन-येत्सहान्वेषणोपायचिन्तिनोत्साह विघातवैमनस्यनिःश्वसितादिभिरनु-भावैरुत्तममध्यमानाम् । अधमानां तु विपरिधावनालोकनमुखशोषण-। सृक्कपरिलैहननिद्रानिःश्वसितध्यानादिभिरनुभावैः प्रारम्भ किये हुए कार्य के समान न होने तथा दैव की प्रतिकूलता रहने ' विषाद ' उत्पन्न होता है । उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों में सहायक ढूँढने, उपाय सोचने, उत्साह नाश, चित्त में मलिन होने तथा दीर्घ निःश्वास लेने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय किया जाय तथा अधम - प्रकृति के व्यक्तियों में ( स्थित ) विषाद का अभिनय दूर भागने, नीचे देखने, मुँह सूखने, ओंठ चाटने, सोने, दीर्घ उसाँसे भरने तथा ध्यान करने आदि अनुभावों के द्वारा किया जाए ।
अत्रायश्लोकौ -कार्यानिस्तरणाद्वार चौर्याभिग्रहणराजदोषाद्वा ।
दैवादर्थविपत्तेर्भवति विषादः सदा पुंसाम् ॥ ६८ ॥
इस विषय में एक आर्या तथा श्लोक है: -प्रारम्भ किये हुए कार्य के न निपटने, चोरी के कारण बन्धन प्राप्त १. विषाद - वाञ्छित सिद्धि के न होने से चित्त में जो एक अनुत्साह का प्रसार हो जाता है वही खिन्नना ' विषाद ' है । इससे पश्चात्ताप आदि भी होते हैं । यहाँ कार्यानिस्तरण का अर्थ है प्रारम्भ किये गये कार्य को पूरा न कर पाना या कार्य का निर्वाह न कर पाना । देव व्यापत्ति का अर्थ है देवात् प्राप्त कष्ट या भाग्य की प्रतिकूलता । विपरिधावन का अर्थ है दूर भागना । १. कार्यारम्भा निस्तरण – ग ०, घ ० । २. कार्यानिस्तरणकृत शौर्यादिग्रहण - ग ०, घ ० । ३. देवादिष्टो योऽर्थस्तदसम्प्राप्तो विषादः स्यात् ग ०, घ ० ।
पृष्ठ 542
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तमोऽध्यायः ४१३ करने, सम्पत्ति ले, राजा के द्वारा क्षति पहुँचाने तथा दुर्भाग्य के कारण अर्थनाश होने से ‘ विषाद ' उत्पन्न होता है ॥ ६८ ॥
' वैचित्र्योपायचिन्ताभ्यां कार्यमुत्तममध्ययोः ।
निद्रानिःश्वसितध्यानैरधनमानां तु योजयेत् ॥ ६ ९ ॥
इस विषाद को उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों में विभिन्न उपायों के चिन्तन द्वारा तथा अधम प्रकृति के मनुष्यों में निद्रा, दीर्घ निःश्वास तथा ध्यान करने आदि के अनुभावों के द्वारा अभिनीत करना चाहिए ॥ ६ ९ ॥ ' औत्सुक्य-औत्सुक्यं नाम - इष्टजनवियोगानुस्मरणोद्यानदर्शनादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य दीर्घनिःश्वसिताधोमुख विचिन्तननिद्रातन्द्रीशय-नाभिलाषादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । प्रियजन के वियोग एवं उनकी याद आना तथा उद्यान दर्शन आदि से ' औत्सुक्य ' उत्पन्न होता है । दीर्घनिःश्वास, नीचा मुँह कर सोचने, निद्रा, तन्द्रा तथा भूमि पर लेट जाने की अभिलाषा करने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ।
अत्रार्या भवति-इष्टजनस्य वियोगादौत्सुक्यं जायते ह्यनुस्मृत्या ।
चिन्तानिन्द्रा तन्द्री गात्र गुरुत्वैरभिनयोऽस्य ॥ ७० ॥
१. औत्सुक्य - अभीष्ट वस्तु या कार्य की तात्कालिकपूर्ति करने की अभिलाषा भी ' औत्सुक्य ' कहलाती है । अर्थात् इष्ट के प्रति शीघ्रता से अभिमुख होना ' औत्सुक्य ' है । पण्डितराज द्वारा दिया गया औत्सुक्य का निम्न लक्षण भी
भरत के अनुरूप है । यथा: -' सञ्जातमिष्टविरहादुद्दीप्तं प्रियसंस्मृतेः ।
निद्रया तन्द्रया गात्रगौरवेण च चिन्तया ॥
अनुभावित मारव्यात मौत्सुक्यं भावचिन्तया । " [ २० गं ० अर्थात् इष्टजन के विरह से उत्पन्न होने वाला और उद्दीप्त होने वाला भाव ' औत्सुक्य ' है । इसके अनुभाव शरीर का भारीपन और चिन्ता करना । १. विचित्रो - ग ० । २. दर्शयेत् – घ ० । नि ० ला ० पृ ० ११२ ] प्रियजन की स्मृति से हैं — निद्रा, आलस्य,
पृष्ठ 543
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१४ नाटयशास्त्रम् इस विषय में एक आर्या है: । -इष्टजन के बिछुड़ने तथा उनकी याद आने से ' औत्सुक्य ' उत्पन्न होता है । चिन्ता, निद्रा, तन्द्रा तथा शरीर के भारीपन द्वारा इसे अभिनीत करना चाहिए ॥ ७० ॥
निद्रा-निद्रा नाम- - दौर्बल्यश्रमक्लममदालस्य ' चिन्ताऽस्याहारस्वभा-वादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेद्वदनगौरवशरीरावलोकननेत्र-घूर्णनगात्रविजृम्भणमान्यो च्छ्वसित सन्नगात्रताक्षिनिमीलनादिभिरनु-भावैः । दुर्बलता, श्रम, मद, आलस्य, ( अतिशय ) चिन्ता, अति आहार तथा स्वभाव आदि विभावों से ' निद्रा ' उत्पन्न होती है । ( शरीर के ) मुँह के भारीपन, शरीर के लोटाने, नेत्रों को घुमाने, अँगड़ाई लेने, गहरी साँस लेने, शरीर के सुन्न हो जाने तथा आँखें बन्द करने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय किया जाए ।
अत्रार्ये भवतः-आलस्याद्दौर्बल्याखलमाच्छ्रमाच्चिन्तनात्स्वभावाच्च ।
रात्री जागरणादपि निद्रा पुरुषस्य सम्भवति ॥ ७१ ॥
इस विषय में दो आर्याएँ हैं आलस्य, दुर्बलता, क्लेश, ( अतिशय ) श्रम, चिन्तन, स्वभाव तथा रात्रि में जागरण के कारण मनुष्य को ' निद्रा आती है ॥ ७१ ॥
' तां मुखगौरवगात्र परिलोडन- नयनमीलन जडत्वैः ।
जृम्भणगात्रविमर्देरनुभावैरभिनयेत्प्राज्ञः + ॥ ७२ ॥
१. निद्राश्रम आदि के कारण इन्द्रियों के व्यापार की विरति ' निद्रा ' है । ( मूल के ) व्यापारविरति का आशय यह है कि इस समय ज्ञानेन्द्रियाँ विषय ग्रहण से हट जाती हैं परन्तु मन का व्यापार निद्राजाल में भी होता रहता है । १. श्रममदालस्य - ग ० । २. गात्रपरिलोडननेत्र विघूर्णनजृम्भण गात्र विमर्द नोच्छ्वसित - ग ० । ३. निमीलनसम्मोहनादिभि ग ० । ४. तस्या मुखगौरवगात्रं नयननिमीलनविघूर्णनजडत्वः ग ० । ५. रभिनयः प्रयोक्तव्यः - ग ० ।
पृष्ठ 544
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तमोऽध्यायः ४१५ इस ( निद्रा ) का अभिनय चेहरे के भारीपन, शरीर के हिलाने डुलाने, आँखों को बन्द करने, जड़ता, जम्माई लेने तथा शरीर के दबाने ( मर्दन करने ) आदि अनुभावों से किया जाए ॥ ७२ ॥
' अपस्मार: -अपस्मारो नाम- - ' ' देवयक्षनागब्रह्मराक्षसभूतप्रेतपिशाचग्रहणानु-स्मरणोच्छिष्ट ं शून्यागारसेवनाशुचि कालान्तर । परिपतनव्याध्यादिभि-विभावैः समुत्पद्यते । तस्य स्फुरितनिःश्वसितोत्कम्पितधावपतनस्वेद-स्तम्भनवदनफेन जिह्वापरिलेहनादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । देव, यक्ष, नाग, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत तथा पिशाच के लगने तथा उनके स्मरण हो जाने, उच्छिष्ट भोजन तथा शून्य भवन के सेवन करने, अपवित्र एवं दुर्गम अरण्यमार्ग पर चलने और धातु की विषमता आदि विभावों के कारण ' अपस्मार ' उत्पन्न होता है । इसका अभिनय कम्पन, निश्वास निकालने, जोर से धूजने, दौड़ने, गिरने, स्वेद, ( जड़वत ) स्थिर हो जाने ( स्तम्भन ) मुँह में झाग आ जाने, हिचकी तथा जीभ चाटने आदि अनुभवों के द्वारा किया जाता है । अत्रायें भवतः
भूतपिशाचग्रहणानुस्मरणोच्छिष्टशून्यगृहगमनात् ।
कालान्तरातिपातादशुचेश्व भवत्यपस्मारः ॥ ७३ ॥
१. अपस्मार - यह एक व्याधि के रूप में होता है जिसे मिर्गी कहते हैं परन्तु यहाँ इसे एक आवेशात्मक भाव मानकर प्रस्तुत किया गया है । इसका विशेष रूप से उल्लेख इस बात को समझाने के लिये किया है कि बीभत्स और भयानक रसों की यही व्याधि अंग होती है और विप्रलम्भ शृङ्गार की अन्य व्याधियाँ भी अंग हो सकती हैं । १. देवनागयक्ष पिशाचादीनां ग्रहणाद्- ग ० । २. अनुस्मरणाद् — ग ० । ३. धातुवैषम्यादिभि - ग ० । ४. दुरितकम्पिनिःश्वसित — ग ० । ५. हिक्का जिह्वाग ० । ६. भवेदव - ग ० ।
पृष्ठ 545
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१६ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में दो आर्याएँ हैं— भूत पिशाच के लग जाने या उनका स्मरण करने, उच्छिष्ट वस्तु तथा शून्य गृह में जाने, उचित समय के बीत जाने ( चूक जाने ) तथा अपवित्र रहने से ' अपस्मार ' होता है ॥ ७३ ॥
सहसा भूमौ पतनं प्रवेपनं ' वदनफेन मोक्षश्च ।
' निःसंज्ञस्योत्थानं रूपाण्येतान्यपस्मारे ॥ ७४ ॥
अपस्मार में पृथ्वी पर सहसा गिरना, कम्पित होना, मुँह से फेन निकलना, निश्चेष्ट स्थिति में ( बेहोशी में ) उठ जाना ( आदि ) अनुभाव होते हैं ॥ ७४ ॥
सुप्त: -सुप्तं नाम - निद्राभिभवः । इन्द्रियविषयोपगमन- मोहनक्षिति-समुत्पद्यते । निद्रासमुत्थं तलशयनप्रसारणानुकर्षणादिभिर्विभावैः तदुच्छ्वसित सन्नगात्राक्षिनिमीलन सर्वेन्द्रियसम्मोहनोस्वप्नायितादि-भिरनुभावैरभिनयेत् । ' सुप्त ' भाव निद्रा से उत्पन्न होता है ( निद्राभिभव ) यह इन्द्रियों के द्वारा अपने अपने विषय का सेवन, इन्द्रियों की सुन्नता ( मोहन ), पृथ्वी पर लोट जाना ( जाना ) या फैल कर लेटना तथा सिकुड़जाना ( अनुकर्षण ) आदि विभावों में ' सुप्त ' उत्पन्न होता है । इसका अभिनय गहरी साँस लेने, शरीर के चेष्टा हीन रखने, आँखों के मीचने, सभी इन्द्रियों के सुन्न हो जाने, ( नींद में ) बड़बड़ाने आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है । १. सुप्त - यह भाव निद्रा से उत्पन्न ज्ञान है । अर्थात् प्रबल निद्रा का आ जाना ' सुप्त ' है । ' निद्रा में मन की अवधानता वृत्ति विद्यमान रहती है परन्तु वही ' सुप्त ' भाव में बिलकुल अवरुद्ध हो जाती है । यही निद्रा और सुप्त में विभेद है फिर भी निद्रा के सभी विभाव ' सुप्त ' में कारण रूप में समझने चाहिए । इन्द्रियमोहन का अर्थ है विषयों से अत्यन्त विमुख हो जाना या इन्द्रियों का सुन्न हो जाना । १. प्रकम्पनं ग ०; । २. निस्संज्ञाभ्युत्थानं – ग ० निद्रासमुत्यम् - घ ० । ३. ‘ निद्राभिभवः ' इत्यारभ्य ' समुत्पद्यते ' इत्यन्तं पाठ: ग - पुस्तके नास्ति । ४. निश्वसितसन्नगात्रा - ग ० ।
पृष्ठ 546
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तमोऽध्यायः ४१७
अत्रार्ये ' भवतः -निद्राभिभवेन्द्रियोपरमणमोहनैर्भवेत् सुप्तम् ।
अक्षिनिमीलोच्छ्वसनैः स्वप्तायितजल्पितैः कार्यः ॥ ७५ ॥
इस विषय में दो आर्याएँ हैं: -निद्रा के व्याघात, इन्द्रियों के चेष्टाहीन होने, ( इन्द्रियों के ) अपने विषय का अनुभव न करने ( मोहन आदि ) से ' सुप्त ' होता है । इसे आँखें मूँदने, गहरी साँस लेने, सपना देखने तथा नींद में बड़बड़ाने के द्वारा अभिनीत किया जाता है ॥ ७५ ॥
सोच्छ्वासैर्निःश्वासैर्मन्दाक्षिनिमीलनेन सर्वेन्द्रियसम्मोहात्सुतं स्वप्नैश्च जोर से साँसे लेने, आँखों को धीरे धीरे बन्द रखने, सभी इन्द्रियों के सुन्न हो जाने तथा स्वप्न ' सुप्त ' भाव को अभिनीत करे ॥ ७६ ॥
विबोध-निश्चेष्टः ।
युञ्जीत ॥ ७६ ॥
करने, शरीर को निश्चेष्ट देखने के अनुभावों द्वारा विबोधो नाम - आहार परिणामनिद्राच्छेदस्वप्नान्ततीवशब्दस्पर्श * -श्रवणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तमभिनयेजृम्भणाक्षिपरिमर्दन-शयनमोक्षणादिभिरनुभावैः । निद्रा का नाश ( ही ) ' विबोध " कहलाता है । यह भोजन के पचने, नींद के टूटने, खराब स्वप्नों के देखने, जोर की आवाज, स्पर्श तथा श्रवण आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होता है । इसका अभिनय जंभाई लेने, आँखें मलने, बिछौना छोड़ने इत्यादि अनुभावों के द्वारा किया जाता है । १. विबोध - निद्रा के भंग होने पर जो ' बोध ' होता है अर्थात् शब्दादि से होने वाला निद्राभंग या आरम्भिकरूप में जाग उठना ( वही ) ' विबोध ' है । १. अत्रार्या - ग ० । २. इयमार्या ग - पुस्तके नास्ति । १३. स्वप्नैः प्रयुञ्जीत ग ० । ४. शब्द रूपादिभिग ० । ५. शयनमोक्षाङ्गवदनभुजावक्षेपणाङ्गुलित्रोटनादिभि - ग ० । २७ ना ० शा ० प्र ०
पृष्ठ 547
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१८ नाट्यशास्त्रम्
अत्रार्या भवति-आहारविपरिणामाच्छन्दस्पर्शादिभिश्च सम्भूतः ।
प्रतिबोधस्त्वभिनेयो जृम्भणवदनाक्षिपरिमदैः ॥ ७७ ॥
इस विषय में आर्या है: -भोजन के पच जाने, शब्द तथा स्पर्श आदि से ' बिबोध ' उत्पन्नं होता है । इसे जंभाई लेने, मुँह तथा आँखों को मलने ( आदि ) अनुभावों के द्वारा अभिनीत करे ॥ ७७ ॥
अमर्ष-अमर्षो नाम - विद्यैश्वर्य शौर्यबलाधिकैरधिक्षिप्तस्यावमानितस्य वा समुत्पद्यते । तमभिनयेच्छिरः कम्पनप्रस्वेदनाधो ' मुखचिन्तनध्याना-व्यवसायोपायसहायान्वेषणादिभिरनुभावैः । अपने से अधिक विद्या, ऐश्वर्य तथा शक्ति सम्पन्न व्यक्तियों के द्वारा निन्दित या तिरस्कृत व्यक्तियों में ' अमर्ष " भाव उत्पन्न होता है । मस्तक हिलाने, पसीना आ जाने, नीचा मुँह कर सोचने और देखने, निश्चय करने ( अध्यवसाय ), उपाय तथा सहायक ढूँढ़ने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय किया जाता है । अत्र श्लोकौ -आक्षिप्तानां सभामध्ये ' विद्याशौर्यबलाधिकैः नृणामुत्साह संयोगादमर्षो नाम जायते १. अमर्ष - अपमानित होने पर प्रतिकार की भावना है । अमषं भाव में प्रतिपक्षों के प्रति कार्यं करने की ॥। ७८ ॥ जाग्रत होना ' अमर्ष ' प्रवृत्ति नहीं रहती चुप रहना या नीचा मुख करना होता है और ' क्रोध ' में प्रतिपक्षी के केवल नाश करने की प्रवृत्ति हो जाती है अर्थात् जब भावना कोमल अवस्था में हो तो ' अमर्ष ' और वही उत्कट अवस्था प्राप्त कर ले तो ' क्रोध ' हो जाती है । आशय यही है कि अपकारी के प्रति अपकार की भावना रखना ' अमर्ष ' तथा अपकार न करने पर भी दूसरे को हानि पहुँचा देने की भावना ' क्रोध ' है । १ धनबला - ग ० । २. स्वेदाधोग ० । प्रयोक्तव्यः - ग ० । ३. चिन्तनाध्यवसायोपायान्वेषणादिभिरनुभावैरभिनयः ४. विद्येश्वर्य घ ० । ५. मुत्साहसम्पन्नो- - ग ०, घ ० ।
पृष्ठ 548
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तमोऽध्यायः ४१ ९ इस विषय में दो श्लोक हैं-' अमर्ष ' भाव उस उत्साह युक्त व्यक्ति में उत्पन्न होता है जो सभा में किसी विद्या, ऐश्वर्य तथा बल में अधिक व्यक्ति द्वारा तिरस्कृत ( पराभूत या निन्दित ) किया गया हो ॥ ७८ ॥
उत्साहाध्यवसायाभ्यामधोमुखविचिन्तनैः ।
शिरःप्रकम्प स्वेदाद्यैस्तं प्रयुञ्जीत पण्डितः ॥ ७ ९ ॥
उत्साह, अध्यवसाय, नीचा मुँह कर सोचने, मस्तक कँपाने तथा पसीना आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ७ ९ ॥ अवहित्थ -अवद्दित्थं नाम - आकारप्रच्छादनात्मकम् । तच्च लजाभयापज-गौरव जैह्मवादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्यान्यथाकथनावलोकित'-कथाभङ्गकृतक ' धैर्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । अपने स्वरूप का आच्छादन " अवहित्थ ' कहलाता है । यह लज्जा, भय, पराजय, गौरव, छल या कुटिलता ( जैह्मय ) आदि विभावों से उत्पन्न होता है । इसका अभिनय अन्यथा कथन, दूसरी ओर ( या नीचे ) देखने, कथन के ( सहसा ) बन्द कर देने और बनावटी धीरज धारण करने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।
अत्र श्लोको भवति -धार्यजैह्मयादिसम्भूतभवहित्थं भयात्मकम् ।
तच्चागणनया कार्य नातीवोत्तर भाषणात् ॥ ८० ॥
१. अवहित्य - हर्ष आदि को लज्जादि के कारण छिपाने के लिए जिस चित्तवृत्ति को निर्माण करना होता है वह है ' अवहित्थ ' । अर्थात् बाहर प्रका - शित न होने वाली चित्तवृत्ति ' अवहित्य ' है । इसकी व्युत्पत्ति है ' न बहिःस्था चित्तवृत्तिरिति पृषोदरादित्वात् अवहित्यम् ' । इसमें प्रस्तुत क्रिया से भिन्न कथन, दर्शन, वार्तालाप का विच्छेद, कृत्रिम स्थिरता दिखलाना आदि अन्य क्रियाएँ होती हैं । अन्यत्र भी आचार्यों ने इसका लक्षण ' अनुभावविधानार्थोऽवहित्थं भाव उच्यते ' कहा है । जिसका आशय है ( हर्ष आदि ) अनुभाव को छिपाने के लिये जो उत्पन्न किया जाए वह भाव ' अवहित्य ' है । १. नाट्यवित् ग ०, घ ० । २. कथनाविलोकित - ग ० । ३. कृतैरनुभाव – ग ० । ४. भयानकम् ग ० । ५. तानि चोत्तर ग ०; नातिचोत्तर — घ ० ।
पृष्ठ 549
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२० नाट्यशास्त्रम् इस विषय में एक श्लोक है: -धृष्टता तथा कुटिलता ( आदि ) से उत्पन्न ' अत्रहित्थ ' भयमूलक होता है । इसका ( किसी ) कार्य के प्रति लापरवाही रखने, उत्तर में अधिक न कहने या बोलने आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय किया जाता है ॥ ८० ॥
उग्रता-उग्रता नाम - चौर्याभिग्रहणनृपापराधा सत्प्रलापादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तां च वधबन्धनताडननिर्भत्सनादिभिरभावैरभिनयेत् । चोरी में पकड़े जाने, राजा का अपराध करने तथा झूठ बकवास करने ( असत्प्रलाप ) आदि विभावों से ' उग्रता " उत्पन्न होती है । वध, बन्धन, ताड़न तथा निर्भर्त्सन ( डाटने ) आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ।
अत्रार्या भवति-' चौर्याभिग्रहणवशान्नृपापराधादयोग्रता भवति ।
वधबन्धताडनादिभिरनुभावैरभिनयस्तस्याः ॥ ८१ ॥
इस विषय में आर्या ( भी ) है.: -चोरी में पकड़े जाने तथा राजा के अपराधी बनने के कारण ' उग्रता " उत्पन्न होती है । इसे वध, बन्धन तथा ताड़न करने आदि अनुभावों द्वारा अभिनीत करना चाहिए ॥ ८१ ॥
मति-मतिर्नाम - नानाशास्त्रविचिन्तनोहापोहादिभिर्विभावैः समुत्प-द्यते । तामभिनयेच्छिष्योपदेशार्थं विकल्प न संशयच्छेदादिभिरनुभावैः । अनेक शास्त्रार्थों के विचिन्तन, अनेक विषयों पर तर्क - वितर्क करने आदि विभावों से ‘ मति ” उत्पन्न होती है । इसका अभिनय शिष्य को उपदेश देने, १. उग्रता - यह भाव निर्दयता स्वरूप होता है । अपराध के कारण दुष्ट पुरुष के प्रति बध बन्धादि द्वारा जो निर्दयता का प्रकाशन है वही ' उग्रता ' है । २. मति - शास्त्रादि के विचार से किसी तथ्य का विनिश्चय करना ' मति ' है । इसके द्वारा भ्रमोच्छेदन आदि कार्य होने से यह ' भाव ' मात्र माना गया १. चौर्याभिग्रहयोगात् — क ०; चौर्यग्रहणनिरोधात् — ग ० । २. नानाशास्त्रार्थ चिन्तन ग ० । १३. संशयच्छेदना - ग ० ।
पृष्ठ 550
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तमोऽध्यायः ४२१ अर्थों के अन्वेषण ( विकल्पन ) तथा संशयापनोदन करने आदि अनुभाव के द्वारा करना चाहिए । • भवति चात्र श्लोकः
' नानाशास्त्रार्थबोधेन मतिः संज्ञायते नृणाम् ।
शिष्योपदेशार्थकृतस्तस्या स्त्वभिनयो भवेत् ॥ ८२ ॥
इस विषय में निम्न श्लोक है: । -अनेक शास्त्रों के अर्थबोध द्वारा मनुष्यों में ' मति ' उत्पन्न होती है । इसका अभिनय शिष्योपदेश देने तथा अर्थावबोध ( अर्थज्ञापन ) आदि के द्वारा करना चाहिए ॥ ८२ ॥
व्याधि-व्याधिर्नाम - वातपित्तकफसंनिपातप्रभवः । तस्यः ज्वरादयो विशेषाः । ज्वरन्तु द्विविधः सशीतः सदाहश्च । तत्र सशीतो नाम-प्रवेपितसर्वाङ्गोत्कम्पन निकुञ्जनाग्न्यभिलाषरोमाञ्चद्दनुवलननासा विकू-जनमुखशोषणपरिदेवितादिभिरनुभावैरभिनेयः । सदाहो नाम-" विक्षिप्ताङ्गकरचरणभूम्यभिलाषानुलेपनशीताभिलाष परिदेवन " मुखशो-षोत्कुष्टादिभिरनुभावैः । ये चान्ये व्याधयस्तेऽपि खलु मुखविकूणन'-गात्रस्तम्भस्रस्ताक्षिनिःश्वसनस्तनितोत्कुष्टवेपनादिभिरनु नावैरभिनैयाः ॥ इसका काव्यों में सन्निवेश उपयोगी होता है क्योंकि कई घटनाओं को इसी माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है । अतएव यह केवल विचार मात्र न होकर एक संगत एवं निश्चित विचार को ( निर्णयस्वरूप विचारों को ) लेकर प्रवृत्त होता है और ऐसी मानसिक दशा का निर्माण करना ही ' मति ' का प्रयोजन होने से इसकी संचारी भाव में गणना की गयी है । १. नानाशास्त्रार्थं निष्पन्ना – क ०; नानाशास्त्रविनिष्पन्ना - ग ० । २. कुञ्चितनु विचलननासा - क ०; कुश्चित हनुचालननासा विघूर्णन- ग ० । ३. रभिनयः प्रयोक्तव्यः- ग ० । ४. विक्षिप्तकरचरणभूम्यभिलाषा – ग ० । ५. परिदेवितोत्कृष्टादिभिः - ग ० । ६. विघूर्णन - ग ० ।