श्रीगणेशाय नमः।

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 531–540

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

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४०२ नाट्यशास्त्रम्

अत्रार्ये भवतः -ऐश्वर्य भ्रंशेष्टद्रव्यक्षयजा ' बहुप्रकारा तु ।

' हृदयवितपगता नृणां चिन्ता समुद्भवति ॥ ५० ॥

इस विषय में दो आर्याएँ हैं— मनुष्यों में ' चिन्ता ' कई प्रकार से उत्पन्न होती है । जैसे — ऐश्वर्य के नाश हो जाने, प्रिय वस्तु के चोरी या नाश हो जाने पर तथा हृदय में उत्पन्न होने वाली अनेक आशंकाओं के होने पर भी ॥५० ॥

सोच्छ्वासैर्निःश्वसितैः सन्तापैश्चैव हृदयशून्यतया ।

अभिनेतव्या चिन्ता मृजाविहीनैरधृत्या च ॥ ५१ ॥

उसाँस तथा साँस लेने, सन्ताप, हृदय - शून्यता होने, शरीर की उचित सफाई न करने तथा धैर्यहीनता आदि अनुभावों के द्वारा इस ( चिन्ता ) का अभिनय करना चाहिए ॥ ५१ ॥

' मोह-मोहो नाम- दैवोपघात व्यसनाभिघातव्याधिभयावेगपूर्ववैरानु-स्मरणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य निश्चैतन्य भ्रमण ' पतनाघूर्णना-दर्शनादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । मोह की उत्पत्ति आकस्मिक ( दैवी ) चोट लगने; दुःख, चोट, व्याधि-भय, आवेग, पूर्व - शत्रुता का स्मरण होने आदि विभावों से होती है । इसका निश्चेष्टता, चक्कर आना, गिरना, आँखे घुमाना तथा ठीक से न देखना आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय करना चाहिए । १. मोह - चित्त का दैवोपघातादि कारणों से अस्तव्यस्त हो जाना ' मोह ' है । इसमें चेतनाहीन अवस्था भी हो जाती है तथा अन्तःकरण के शून्य होने से किसी परिचित व्यक्ति को पहचाना नहीं जा सकता । ' चिन्ता ' या यह ( मोह ) परिणाम होता है अत: इसे ( इसी कारण ) चिन्ता से भिन्न समझना चाहिये । १. ऐश्वर्येष्टद्रव्यापहारजनिता – ग ० । २. हृदयोत्सुक्योपगता चिन्ता तु नृणां समुद्भवति – ग ० । ३. निश्चेटिताङ्गभ्रमण – ग ० । ४. घूर्णनदर्शनादिभिग ० ।

पृष्ठ 532

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सप्तमोऽध्यायः ४०३

अत्र श्लोकस्तावदार्या च-अस्थाने तस्करान् दृष्ट्वा त्रासनैर्विविधैरपि ' ।

तत्प्रतीकारशून्यस्य मोहः समुपजायते ॥ ५२ ॥

इस विषय में एक श्लोक तथा एक आर्या है-( श्लोक ) – अतर्कित स्थान पर चोरों के देखने पर एवं विभिन्न त्रासों के प्राप्त होने तथा उनको रोकने में अक्षम होने पर ' मोह ' उत्पन्न हो जाता है ॥ ५२ ॥

व्यसनाभिघातभयपूर्ववैरसंस्मरणरोगजोर मोहः ।

सर्वेन्द्रियसम्मोहात्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ ५३ ॥

व्यसन ( दुःख ) की आकस्मिक प्राप्ति होने पर, चोट, भय तथा पिछली शत्रुता के स्मरण से ' मोह ' उत्पन्न होता है । सभी इन्द्रियों की शून्यता प्रदर्शन द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ५३ ॥

' स्मृति-स्मृतिर्नाम – सुखदुःखकृतानां भावानामनुस्मरणम् । सा च स्वास्थ्यजघन्यरात्रिनिद्राच्छेदसमानदर्शनोदाहरण चिन्ताभ्यासादिभि-विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेच्छिरः कम्पनावलोकन - भ्रूसमुन्न-मनादिभिरनुभावैः * सुख तथा दुःख से पूर्ण बीती घटनाओं का याद करना ' स्मरण या स्मृति ' कहलाता है । यह स्वास्थ्य, रात्रि के पिछले प्रहर में निद्रानाश, समान व्यक्ति के दिखने तथा सम्भाषण करने, चिन्ता तथा अभ्यास आदि विभावों से उत्पन्न होती है । इसका अभिनय सिर के धुजाने, देखने, भौंहों के ऊपर चढ़ाने ( या ऊँचा करने ) आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । १. स्मृति - किसी समान पदार्थ के देखने आदि से पूर्वदृष्ट अर्थ का मन में जो संस्कार उद्बुद्ध हो जाता है वही ' स्मृति ' कहलाता है । इनमें पहिले किसी ज्ञातवस्तु का पुनः ज्ञान होता है । मूल में दिया गया ' जघन्य ' पद रात्रि का " विशेषण है । जिसका अर्थ होगा रात्रि का अन्तिम या पिछला प्रहर । इसी समय निद्राभंग होने से स्मृतियाँ अधिक जाग्रत होती हैं । १. त्रासनैर्वा पृथम्बिधः - ग ०; घ ० । २. संस्मरणजो भवति मोह: - ग ०, घ ० । ३. सममुन्नमनप्र हर्षादिभि - ग ० ।

पृष्ठ 533

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४०४ नाट्यशास्त्रम्

अत्रये भवतः-' सुखदुःखमतिक्रान्तं तथा मतिविभावितं यथावृत्तम् ।

चिरविस्मृतं स्मरति यः स्मृतिमानिति वेदितव्योऽसौ ॥ ५४ ॥

जो व्यक्ति बुद्धिद्वारा विभावित अतीत के सुख दुःख का तथा भूली हुई बातों का स्मरण करता हो उसे ' स्मृतिमान् ' मानना चाहिए ॥५४ ॥

श्रुतिदर्शनसम्भवा स्मृतिर्निपुणैः । स्वास्थ्याभ्याससमुत्था शिरउद्वाहनकम्पैभ्रक्षेपैश्चाभिनेतव्या ॥ ५५ ॥

स्वास्थ्य, ( निरन्तर ) अभ्यास, श्रवण तथा दर्शन से ' स्मृति ' उत्पन्न होती है । मस्तक उठाने, उसे कम्पाने तथा भौंहों को ऊपर उठाने ( आदि ) अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ५५ ॥

' धृति: -धृतिर्नाम शौर्य विज्ञानश्रुतिविभवशौचाचारगुरुभक्त्यधिकमनो-रथार्थलाभ - क्रीडादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेत्प्राप्तानां विष-। याणामुपभोगादप्राप्तातीतोपहतविनष्टानामननुशोचनादिभिरनुभावैः धृति की उत्पत्ति शौर्य, विज्ञान, विद्या ( शास्त्र ज्ञान ), समृद्धि, पवित्रता, सदाचार ( या सचरित्रता ), गुरुजन में भक्ति, अधिक अर्थलाभ तथा क्रीड़ा, विनोद आदि विभावों के द्वारा होती है । इसका अभिनय सम्प्राप्त सुखों का उपभोग, अप्राप्त, अतीत तथा विनष्ट सुखों के प्रति शोक न करने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

' अत्रार्ये भवतः-विज्ञानशौचविभवश्रुतिशक्तिसमुद्भवा धृतिः सद्भिः ।

भयशोकविषादाद्यै रहिता तु सदा प्रयोक्तव्या ॥ ५६ ॥

१. धृति - ( इस चित्तवृत्ति में ) शोक, भय और लोभ से होने वाले उपद्रव ज्ञान, शक्ति और सन्तोष से शान्त कर दिये जाएँ तो वह भी ' धृति ' कहलाती है । यह सन्तोषस्वरूपा होती है । १. अत्र श्लोकार्ये भवतः - सुखदुःखमतिक्रान्तं तथा मतिविभावितम् । विस्मृतञ्च यथावृत्तं स्मरेद्यः स्मृतिमानसी ॥ - ग ० । २. भक्त्यधिकार्य लाभ - ग ० ।

पृष्ठ 534

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सप्तमोऽध्यायः १०५ इस विषय में दो आर्याएँ हैं: -विज्ञान, शौच ( पवित्रता ), वैभव, श्रुति तथा शक्ति से ' धृति ' उत्पन्न होती है । इसका भय, शोक तथा विषाद से रहित अनुभावों के द्वारा अभिनय किया जाए ॥ ५६ ॥

प्राप्तानामुपभोगः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानाम् ।

अप्राप्तैश्च न शोको यस्यां हि भवेद्धृतिः सा तु ॥ ५७ ॥

जिसमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के प्राप्त होने पर उसका उपयोग किया जाता हो तथा उनके न प्राप्त होने पर ( भी ) जब शोक न होता हो तो उस दशा को ' धृति ' जानो ॥ ५७ ॥

' व्रीडाः-व्रीडा नाम - अकार्यकरणात्मिका । सा च गुरुव्यतिक्रमणा-वज्ञानप्रतिज्ञानिर्वहणपश्चात्तापादिभिर्विभावादिभिः समुत्पद्यते । तां निगूढवदनाधोमुख- विचिन्तनोर्वी लेखन - वस्त्राङ्गुलीयकस्पर्शन ' नख-• निकृन्तनादिभिरनुभावैरभिनयेत् । अकार्यों ( अयोग्य या अनुचित कार्यों ) के करने की वृत्ति मूलतः ' व्रीडा ' में होती है । यह गुरुजन की आज्ञाओं ( या स्थिति ) उल्लंघन, अपमान, प्रतिज्ञा की अपूर्णता तथा पश्चात्ताप आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होती है । इसका अभिनय मुँह छिपाने, सर झुकाकर विचार करने, पृथ्वी पर लिखने, वस्त्र और अंगूठी को पलेटने, पृथ्वी को नख से कुरेदने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

अत्रायें भवतः -किञ्चिदकार्यं कुर्वन्नेवं यो दृश्यते शुचिभिरन्यैः ।

पश्चात्तापेन व्रीडित इति वेदितव्योऽसौ ॥ ५८ ॥

१. व्रीडा - अपने द्वारा किये गये दुराचरण ( अकार्यं या अनुचित कार्य ) से ' व्रीडा ' उत्पन्न होती है । यह चित्तवृत्ति भरतोक्त विभावों से उत्पन्न होती है । इसमें पश्चात्ताप आदि मानसज्ञान भी होते हैं । १. रसरूप - घ ० । २. अप्राप्ते न हि शोको – ग ०, अप्राप्तो; न हि घ ० । ३. प्रतिज्ञानानिर्वहण कृतप्रत्यादिष्टपश्चात्तापादिभिर्विभावैरुत्पद्यते - ग ० । ४. संस्पर्शन - ग ० । ५. नखनिस्तोदनादिभिख ० । ६. यो हि नरो - ग ० ।

पृष्ठ 535

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४०६ नाट्यशास्त्रम् हस विषय में निम्न दो आर्याएँ हैं: --जब कोई अकर्मण्य व्यक्ति अन्य पवित्र या निर्दोष पुरुषों को दिखाई देता है और वह ( अपनी स्थिति को ) उन व्यक्तियों के द्वारा जान लेने पर पश्चात्ताप करता है तो उसे ' ब्रीडा ( भाव ) से युक्त समझना चाहिए ॥ ५८ ॥

लज्जानिगूढ़वदनो भूमिं विलिखन्नखांश्च ' विनिकृन्तन् ।

वस्त्राङ्गुलीयकानां संस्पर्श वीलितः कुर्यात् ॥ ५ ९ ॥

व्रीडायुक्त पुरूष लज्जा के कारण मुँह नीचा किए रहता है । वह पृथ्वी पर हाथ या नख से कुरेदता है तथा वस्त्र ( के कोने ) और अंगुठी को बार - बार स्पर्श करता है ॥ ५ ९ ॥ ' चपलता-चपलता नाम - रागद्वैषमात्सर्यामर्षेर्ष्याप्रतिकूलादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्याश्च वाक्यारुष्यनिर्भर्त्सन वधबन्धसम्प्रहारताडना दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ' चपलता ' राग, द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या तथा विरोध या प्रतिकूलता आदि विभावों के द्वारा उत्पन्न होती है । इसका अभिनय कठोर शब्दों के कहने, डाँटने, मारने, बाँधने, प्रहार करने, पीटने ( ताडन ) और अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

आचार्या भवति-अविमृश्य तु यः कार्य पुरुषो वधताडनं ' समारभते ।

अविनिश्चितकारित्वात्स तु खलु चपलो धैर्ज्ञेयः ॥ ६० ॥

इस विषय में एक आर्या है: -जो व्यक्ति बिना विचार के किसी का वध या ताडन कर डालता है तो उसे बिना निश्चय के कार्य करने के कारण ' चपल ' कहा जाता है ॥ ६० ॥

१. चपलता यह बिना सोचे विचारे काम करने वाली वृत्ति होती । इसमें • भावना के आवेग की अधिकता रहने से विचार की शक्ति अवरुद्ध हो जाती है । यह अमर्ष आदि से उत्पन्न होने से कार्य रूप होने के कारण ' अमर्ष ' नाम संचारी भाव से स्वतः भिन्नता रखती है । १. नखैश्च - ग ० । २. रुत्पद्यते ग ० । ३. वाक्पारुष्यादिभत्र्सन – ग ० । ४. ताडनज्ञापनादिभि - ग ० । ५. वधबन्धनादिकं ग ० ।

पृष्ठ 536

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सप्तमाऽध्यायः ४०७ ' हर्ष-हर्षो नाम - मनोरथ - लाभेष्टजनसमागमनमनः परितोष देवगुरु-समुत्पद्यते । राजभर्तृप्रसाद भोजनाच्छादनधनलाभोपभोगादिर्विभावैः तमभिनयेन्नयनवदनप्रसादप्रियभाषणालिङ्गनकण्टकितपुलकितास्त्रस्व-दादिभिरनुभावैः । ' हर्ष ' का उद्भव मनोरथों की पूर्ति, इष्ट या प्रिय व्यक्ति का मिलन, मानसिक तुष्टि, देव, गुरु, राजा तथा स्वामी की कृपा, श्रेष्ठ भोजन, वस्त्र तथा सम्पत्ति की प्राप्ति तथा उसका उपभोग आदि विभावों से होता है । इसका अभिनय नेत्र तथा मुँह की रौनक ( प्रसादन ) प्रिय भाषण, आलिङ्गन, रोमांच, अश्रुपतन तथा स्वेद आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रायें भवतः

अप्राप्ये प्राप्ये वा लब्धेऽर्थे प्रियसमागमे वाऽपि ।

हृदयमनोरथलाभे हर्षः सञ्जायते पुंसाम् ॥ ६१ ॥

१. हर्ष - इष्ट वस्तु की प्राप्ति आदि से चित्त में जो एक प्रसन्नता या विकास का भाव होता है वही चित्तवृत्ति ' हर्ष ' कहलाती है । कुछ आचार्य मनोरथ आदि के पूर्ण होने की सम्भावना या प्राप्ति की दशा में भी हर्ष को मानते । पण्डितराज जगन्नाथ ने हर्ष के विषय में एक प्राचीन उद्धृत कियाहै " देवभर्तृ गुरुस्वाभिप्रसादः प्रियसङ्गमः मनोरथाप्तिरप्राप्यमनोहरधनागमः 11

तथोत्पत्तिश्च पुत्रादविभावो यत्र जायते ।

नेत्र वक्तृप्रसादश्च प्रियोक्तिः पुलकोद्गमः ॥

अश्रुस्वेदादयश्चानुभावा हर्षं तमादिशेत् ॥

( २० ग ० नि ० सा ० मत इस प्रकार संस्क ० पृ ० १४ ) अर्थात् देवता, गुरु और स्वामी की प्रसन्नता, इष्ट समागम, मनोरथ की पूर्ति, दुर्लभ एवं विलोभनीय सम्पत्ति की उपलब्धि, पुत्र आदि का जन्म जिसके विभाव होते हैं तथा नेत्र एवं मुख की प्रसन्नता, प्रियवचन, रोमाञ्च, अश्रु तथा स्वेद आदि जिसमें अनुभाव होते हैं उसे ' हर्ष ' कहते हैं । १. कण्टकितास्त्रस्वेदोद्गमललित ताडनादिभि - ग ० ।

पृष्ठ 537

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४०८ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में दो आर्याएँ हैं: -' हर्ष ' मनुष्य में तब उत्पन्न होता है जब अप्राप्य या प्राप्य वस्तु की प्राप्ति, प्रिय समागम अथवा अभिलषित मनोरथ की प्राप्ति हो ( जाए ) ॥ ६१ ॥

नयनवदनप्रसादप्रियभाषालिङ्गनैश्च रोमाञ्श्चैः ।

ललितैश्चाङ्गविहारैः स्वेदाद्यैरभिनयस्तस्य ॥ ६२ ॥

नेत्र तथा चेहरे के खिलने, प्रिय भाषण, आलिङ्गन, रोमांच, शरीर के अवयवों का सुन्दरता से घुमाना ( ललिताङ्गविहार ) तथा स्वेद आदि के द्वारा ( इस ) ' हर्ष ' का अभिनय करना चाहिए ॥ ६२ ॥

आवेग-आवेगो नाम - उत्पातवातवर्षाग्निकुञ्जरोद् भ्रमणप्रियाप्रियश्रवण-व्यसनाभिघातादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तत्रोत्पातकृतो नाम विद्यु-दुल्कानिर्घातप्रपतनचन्द्र सूर्योपराग के तुदर्शन कृतः । ' तमभिनयेत्सर्वाङ्ग-स्स्रस्ततावैमनस्य ' मुखवैवर्ण्यविषादविस्मयादिभिः । वातकृतं पुनरव-गुण्ठनाक्षिपरिमार्जन वस्त्र सङ्ग्रह नत्वरितगमनादिभिरनुभावैः । वर्षकृतं पुनः सर्वाङ्गसम्पिडनप्रधावनच्छन्नाश्रय मार्गणादिभिः अग्निकृतं तु धूमाकुलनेत्रताऽङ्गसङ्कोचनविधूननातिक्रान्तादिभिः । कुञ्जरोभ्रमण-कृतं नाम त्वरितापसर्पणचञ्चलगमनभयस्तम्भवेपथुपश्चादवलोकन-विस्मयादिभिः । प्रियश्रवणकृतं नामाभ्युत्थानालिङ्गनवस्त्राभरणप्रदा-नाश्रुपुलकितादिभिः । अप्रियश्रवणकृतं नाम भूमिपतन विषमविवर्तन-परिधावनविलापनाक्रन्दादिभिः । प्रकृतिव्यसनकृतं नाम सहसाप-सर्पण शस्त्रचर्मवर्मधारणगजतुरगरथारोहणसम्प्रहारणादिभिः । १. दर्शनादिभिर्विभावे रुत्पद्यते – ग ० । २. सर्वाङ्गस्रस्त विषण्ण वैमनस्य – ग ० । ३. नाक्षिमर्दन ग ० । ४. छन्नाश्रय - ख ०, छन्नाश्रयणादि - घ ० । ५. प्रोद्यताश्रुपुल कादिभिः - ग ० । ६. भूमिपतनपरिदेवित विषमपरिवर्तिकपरिधावितविलापरुदितादिभिः ग ०, घ ० । ७. व्यसनाभिघातकृतं तु ग ० । ८. सहसापक्रमण – ग ० ।

पृष्ठ 538

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सप्तमोऽध्यायः ४० ९ उत्पात, हवा, वर्षा, अग्नि, हाथी का उत्पात, प्रिय या अप्रिय वृत्त का श्रवण विपत्ति तथा प्रहार आदि विभावों से ' आवेग ' की उत्पत्ति होती है | (, अब क्रमशः ) इन कथित कारणों से उत्पन्न होने वाले आवेगों में उत्पात से होने वाला आवेग - विजली या उल्काओं का घात, तारों का टूटना, सूर्य तथा चन्द्रग्रहण तथा केतु - दर्शन आदि विभावों से उद्भूत होता है । इस आवेग का प्रदर्शन सभी अंगों की शिथिलता, मनकी खिन्नता ( अस्थिरचित्त ), चेहरे का उतरना, विषाद तथा विस्मय आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । बात से उत्पन्न आवेग का प्रदर्शन मुँह ढँकने, आँखें मलने, वस्त्रों को समेटने तथा शीघ्र चलने आदि अनुभावों से होता है । वर्षा से उत्पन्न आवेग का अभिनय शरीर के सभी अंगों के सिकुड़ाने, दौड़ने, छाया वाले प्रदेश के देखने, ढूँढ़ने आदि अनुभावों से होता है । अग्नि से उत्पन्न आवेग का अभिनय धूएँ से घबराई आँखों, अंगों के सिकुड़ाने या भुकाने, धुएँ को झाड़ने या हाथों से हटाने, शीघ्रता से उछलने या पीछे हटनें ( अपक्रान्त ) आदि अनुभावों से होता है । हाथी के उपद्रव से उत्पन्न आवेग का अभिनय शीघ्रता से भागने, चपल गति, भय, स्तम्भ, कम्पन, घूमकर पीछे देखने तथा विस्मय आदि - आदि अनुभावों से होता है । प्रिय श्रवण से उत्पन्न आवेग का अभिनय अगवानी करने, आलिंगन करने, वस्त्र तथा अलंकारों को देने, हर्षाश्रु तथा रोमांच आदि अनुभावों से करना चाहिए । अप्रिय श्रवण से उत्पन्न आवेग का अभिनय पृथ्वी पर गिरने विषमभूमि पर लोटने, भागने, विलाप करने, रोने, चिल्लाने आदि अनुभावों से होता है | प्रकृतिव्यसन- प्रसिद्ध या ( प्रकृति द्वारा होने वाला कष्ट ) से उत्पन्न आवेग का अभिनय सहसा ( आगे आने ) दौड़ने, शस्त्र तथा कवचों के धारण हाथी, घोड़ा, रथ पर चढ़ने तथा प्रहार करने आदि अनुभावों से होता है ।

' पवमविकल्पोऽयमावेगः सम्भ्रमात्मकः ।

स्थैर्येणोत्तममध्यानां नीचानां चापसर्पणैः ॥। ६३ ॥

इस प्रकार सम्भ्रमात्मा यह ' आवेग " आठ प्रकार का होता है । इसमें १. आवेग – अनर्थाधिक्य से उद्भुत होने वाली संभ्रमात्मा चित्तवृत्ति ' आवेग ' कहलाती है । भरतमुनि ने इसके आठ हेतु उपस्थित करते हुए अलग - अलग उनके लक्षण देकर ' आवेग ' के आठ भेद भी बतलाये हैं । १. इत्येषोष्टविधो ज्ञेयः - ग ० । २. चापसर्पणात् — ग ० ।

पृष्ठ 539

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४१० नाट्यशास्त्रम् उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के व्यक्ति स्थैर्ययुक्त तथा अधमप्रकृति के व्यक्ति भागने वाले होते हैं ॥ ६३ ॥

अत्रायें भवतः -अप्रियनिवेदनादिश्रवणादवधारितवचनस्य ' । शस्त्राक्षेपास्त्रासादावेगो नाम सम्भवति ॥ ६४ ॥ •

इस विषय में दो आर्याएँ भी हैं: -आवेग की उत्पत्ति अप्रिय समाचार को सुनकर, सहसा वचनों के उच्चारण एवं शस्त्रों के प्रहार तथा त्रास से होती है ॥ ६४ ॥

अप्रियनिवेदनाद्यो विषादभावाश्रयोऽनुभावोऽस्य ।

सहसारिदर्शनाच्चेत्प्रहरण परिधट्टनैः * कार्यः ॥ ६५ ॥

अप्रिय समाचार से उत्पन्न आवेग होने पर - उसमें विषाद, सहसा शत्रु का दिखाई देना आदि होते हैं । इसका अभिनय शस्त्रों के प्रहार तथा टक्कर देना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ६५ ॥

' जड़ता-जडता नाम - सर्वकार्याप्रतिपत्तिः इष्टानिष्टश्रवणदर्शनव्याध्या-दिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेदकथनाभिभाषण " - तूष्णीम्भा-वानिमेषनिरीक्षण परवशत्वादिरनुभावैः । सभी कार्यों में प्रवृत्ति न होना ' जड़ता ' कहलाता है । यह इष्ट या अनिष्ट वस्तु के दर्शन, श्रवण अथवा व्याधि आदि विभावों से उत्पन्न होती है । १. जड़ता - मन के शिथिल हो जाने पर योग्य कार्यों के अनुसन्धान से हीन जो चित्तवृत्ति बनती है वही ' जड़ता ' है । इसमें किसी भी कार्य को करने की प्रवृत्ति नहीं होती । ' मोह ' में वस्तु के नेत्रादि से देखने आदि के कार्य नहीं हो पाते हैं परन्तु इस भाव में वस्तु के दर्शन आदि तो होते हैं पर उनका विशेष रूप में परिचय या परिज्ञान नहीं हो पाता । अर्थात् न जानना मोह और यथा-तथ्य रूप में वस्तु का अज्ञान ' जड़ता ' है । यही दोनों भावों में पार्थक्य है । १. निवेदनाद्वा सहसा ह्यभिधारितारिवचनेन क ० । २. शस्त्रक्षेपत्रासा - ग ० । ३. सहसा निदर्शनं चेत् — ग ० । ४. परिघट्टनं कार्यम् - ग ० । ५. कथनाभाषणतूष्णीं ग ० । ६. भावाप्रतिभ निमेषनिरीक्षण - ग ० ।

पृष्ठ 540

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सप्तमोऽध्यायः ४१ ( पूछने पर ) कुछ भी न कहने ( अकथन ) मौन रखने, अपलक देखते रहने तथा पराधीन होने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ।

अत्रार्या भवति-इष्टं वाऽनिष्टं या सुखदुःखे वा न वेत्ति यो मोहात् ।

तूष्णीकः परवशगो भवति स जडसंज्ञितः पुरुषः ॥

जो मनुष्य मोहवश इष्ट या अनिष्टकारी वस्तु तथा अच्छे ( सुख ) और बुरे के भेद को ( दुःख ) को नहीं जानता तो चुप चाप और पराधीन ऐसे व्यक्ति को जड़ ' ' कहते हैं ॥ ६६ ॥

भगर्व: -गर्यो नाम - ऐश्वर्यकुलरूपयौवनविद्या- बलधनलाभादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्यासूयावज्ञाधर्षणा ' नुत्तरदानासम्भाषणाङ्गावलोकन'-विभ्रमापद्दसनवाक्पारुष्य - गुरुव्यतिक्रमणाधिक्षेपवचनविच्छेदादिभि-रनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ऐश्वर्य, उच्चकुल, रूप, यौवन, विद्या, बल तथा ( आकस्मिक ) धन - लाभ आदि विभावों से ' गर्व ' उत्पन्न होता है । इसका अभिनय असूया, अवज्ञा, ( अनादर ) दूसरों को टक्कर देना या पीसना ( आघर्षण ), उत्तर न देना, न बोलना, अपनी बाजू आदि अङ्गों को देखना, उतावलापन बतलाना ( विभ्रम ), हँसी उड़ाना, कड़े शब्द बोलना, पूज्यजन ( की मर्यादा ) का अतिक्रमण करना एवं उनका अपमान करना तथा संभाषण बन्द करना ( या व्यङ्ग करना ) आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

अत्रार्या भवति-विद्यावा रूपादैश्वर्यादथवा धनागमाद्वापि ।

गर्वः खलु नीचानां दृष्ट्यङ्गविचालनैः कार्यः ॥ ६७ ॥

१. गर्व - ऐश्वर्य, रूप, विद्यादि के कारण अपना उत्कर्ष बतलाना या दूसरों की अवज्ञा करना और अपने को बड़ा मान लेना ( ' आधिक्यधीः ' ) ' गर्व ' नामक संचारी भाव है । १. सुखदुःखं – ग ० । २. संज्ञकः ग ० । ३. तस्यावज्ञाधर्षणा ग ० । ४. णांसावलोकन ग ० । ५. विक्षेपादिभिरनुभाव – ग ० । ६. विद्यायोवनरूपादश्च - ग ० । ७. विचारणः ० ।