भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 551–560
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 551–560
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४२२ नाट्यशास्त्रम् वात, पित्त तथा कफ ( में से किसी एक की विकृति ) के कारण ' व्याधि ” उत्पन्न होती है । ज्वर आदि इसके विभेद हैं । ज्वर के दो प्रकार हैं - एक शीतज्वर तथा अन्य पित्तज्वर । शीतज्वर का अभिनय सम्पूर्ण अंगों के धूजने ( काँपने ), ( शरीर के ) सिकुड़ाने, आग की अभिलाषा करने, रोमांच, ठुड्डी के हिलाने, नाक को घुमाने, मुख सूखने तथा विलाप करने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । पित्तज्वर ( सदाहज्वर ) का अभिनय वस्त्रों के फेकने, हाथ पैरों के पटकने, भूमि पर लोटने की इच्छा करने, चन्दन लेपन के उपयोग करने, शीतलवस्तु की इच्छा रखने, विलाप करने तथा जोर से चिल्लाने ( उत्कोश ) आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । इसके अतिरिक्त यदि अन्य व्याधियाँ ( भी ) हों तो उनका अभिनय मुँह को नीचे झुकाने या घुमाने, शरीर के निष्क्रिय होने, आखों के शिथिल हो जाने; निःश्वास लेने, चीत्कार करने ( स्तनित ), रोने तथा कम्पन आदि अनुभावों से करना चाहिए ।
अत्र श्लोको भवति -समासतस्तु ' व्याधीनां कर्तव्योऽभिनयो बुधैः ।
स्वस्ताङ्गगात्रविक्षेपैस्तथा मुखविकूणनैः ॥ ८३ ॥
इस विषय में एक श्लोक है-सामान्यतः व्याधि का अभिनय अंगों की शिथिलता, अंगों के पटकने, मुँह घुमाने या नीचा करने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ८३ ॥
उन्माद-उन्मादो नाम - इष्टजनवियोग - विभवनाशाभिघात वातपित्तश्लेष्म-प्रकोपादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तमनिमित्तहसितरुदितोत्कुष्टासम्बद्धम-१. व्याधि - रोग या वियोग से उत्पन्न मानसिक या शारीरिक ताप ही ' व्याधि ' है । यहाँ ' व्याधि ' को अभिनय की अपेक्षा से एक दशाविशेष के चित्रण हेतु ही संचारीभाव के रूप में रखा गया है । इसमें शारीरिक या मानसिक स्थिति का ऐसा चित्रण किया जाए जिससे स्वस्थता परिलक्षित न हो । और यह शरीर दोनों के कारण अद्भुत भी दिखलाई जा सकती है जैसा भरत मुनि ने बतलाया भी है । १. सामान्यतस्तु ग ० । २. रुजा मुख विघूर्णन:: - - ग ०, घ ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४२३ लापशयितोपविष्टो स्थितप्रधावितनृत्तगीत पठितभस्म पांस्वं वधूलन - तृण-निर्माल्य कुचेलचीरघटक पाल शरावाभरणधारणोपभोगैरनेकैश्वावस्थितै-श्चेष्टानुकरणादिभिरनुभावैरभिनयेत् ' । इष्टजन के त्रियोग, सम्पत्ति की हानि, ( दुःख से ) धक्का या चोट लगना, पित्त एवं कफ के प्रकोप होने आदि विभावों से ' उन्माद " उत्पन्न होता वात, हँसने, रोने, गाली देने ( उत्कृष्ट ) तथा ( वे सिर पैर की बातें ) है । अकारण , नीचे सो जाने, बैठ जाने, उठ भागने, नाचने, गाने, ( तथा ) पढ़ने, बकने अपने शरीर पर ) राख और मिट्टी को उछालने, तृण, फेंकी ( अकारण ( या चढ़ाए हुए पुष्प ); फटे या गन्दे वस्त्र, टुटे हुए सरावले हुई वस्तुएँ मिट्टी के घड़े आदि को इकट्ठा करने, ( धारण ) और ( शराब ) तथा की अन्य अनेक अव्यवस्थित चेष्टाओं के उनका उपभोग आदि इसी प्रकार । अनुकरण आदि अनुभावों के द्वारा इनका अभिनय करना चाहिए अत्रायें भवतः -। इष्टजनविभवनाशादभिघाताद्वातपित्तकफकोपात् नाम सम्भवति ॥ ८४ ॥
विविधाश्चित्तविकारादुन्मादो इस विषय में निम्नलिखित ) दो आर्याएँ हैं । प्रियजन के बिछुड़ने, वैभव - नाश होने; चोट लगने, वात, पित्त एवं कफ के प्रकोप होने तथा अनेकविध चित की विकृतियों के कारण ' उन्माद ' होता है ॥ अनिमित्तरुदित इसितोपदिष्टगीतप्रधावितोत्कुष्टैः विकारकृतैरुन्मादं सम्प्रयुञ्जीत ॥ ८५ ॥
१. उन्माद —— दोषादि के कारण मन का पथभ्रष्ट हो जाना अथवा अनुचित विवेकहीन कार्य करना ' उन्माद ' है । ' अपस्मार ' में चित्त की विकलता होती है और ' उन्माद ' में चित्त की अस्थिरता । ' उन्माद ' उत्तमपात्र के विप्रलम्भ-में और अधमपात्र के करुण रस में संचारिभाव रहता है और ' अप-शृङ्गार और भयानकरस में संचारिभाव होता है । यही दोनों में स्मार ' बीभत्स पार्थक्य है । १. शयनोपविष्ट – ग ० । २. पांस्वतिधूलन निर्माल्यवीरघट चक्रश रावाभरणस्पर्शनोपभोगैश्वानवस्थित-चेष्टा क ० । ३. रन्यैश्वानव हित चेष्टा करणादिभिरनुभावैरभिनेयाः – ग ० । ४. हसितरुदितो ख ० । ५. अन्योन्यविकारकृतै- क ० ।
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-४२४ नाव्यशास्त्रम् अकारण रोने, हँसने, बैठने, गाने, दौड़ने, गाली देने ( उत्कृष्टैः ) तथा इसी प्रकार के अन्य विकारजन्य कार्य करने आदि के द्वारा ' उन्माद ' का अभिनय करना चाहिए ॥ ८५ ॥
मरण-मरणं नाम – व्याधिजमभिघातजञ्च । तत्र यदान्त्र - यकृच्छ्रल-दोषवैषम्यगण्डपिटकज्वरविषूचिकादिभिरुत्पद्यते तद्व्याधिप्रभवम् । अभिघातजन्तु - शस्त्राद्दिदंश विषपानश्वापद्गजतुरगरथपशुयान -पात- प विनाशप्रभवम् । एतयोरभिनय विशेषान्वक्ष्यामः । तत्र व्याधिजं - विष-पण गात्रान्यायताङ्गविचेष्टित - निमीलित - नयनहिक्काश्वासोपेतानवेक्षित-परिजनाव्यक्ताक्षरकथनादिभिरनुभावैरभिनयेत् । रोग तथा आकस्मिक दुर्घटना - जन्य चोट के द्वारा ' मरण " होता है । इन दो प्रकारों में रोगजन्य - मरण – अन्त्र, यकृत- रोग, शूल, त्रिदोष, गण्ड, पिटक, ज्वर तथा हैजा ( विसूचिका ) आदि से होता है तथा दुर्घटना- जन्य ( चोट से होने वाला ) मरण - शस्त्र, सर्पदंश, विषपान, हिंसक जन्तुओं के प्रहार, हाथी घोड़ा, रथ, पशु तथा यान से ( नीचे ) गिरने आदि से उत्पन्न होता है । अब इन दोनों प्रकारों के अभिनय बतलाता हूँ । व्याधि - जन्य मरण का अभिनय शरीर के सुत्र हो जाने, ( शरीर के ) अवयवों के फैल जाने या गति - हीन हो जाने, आँखे खुली ( या बन्द ) रखने, हिचकी और साँस चलने, परिजनों को देखने पर टूटे शब्दों के उच्चारण करने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । १. मरण - भरतमुनि ने मरण के दो प्रकार बतला कर विस्तार से उसका विवरण दिया है । इनमें प्रथम व्याधिज और दूसरा अभिघातज मरण है । ' मरण ' की दशा चित्तवृत्ति विशेष या मानसिक दशा ही नहीं है वह स्थायी-भाव के अधिक समीप आकर सहायक दशा के रूप में पहुँच जाती है । भरतोक्त दोनों प्रकारों के उदाहरण भास तथा शूद्रक की रचनाओं में मिल जाते हैं । भास के प्रतिमानाटक में महाराज दशरथ का व्याधिज ' मरण ' प्रस्तुत किया १. रथयानपवनविनाश ग ० । २. रिदानीमभिनय विशेषं वक्ष्यामि ग ० । ३. श्वासोत्पतनमनपेक्षित ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४२५ अत्र श्लोको भवति-व्याधीनामेकभावो हि मरणाभिनयः स्मृतः विषण्ण गात्रैर्निश्चेष्टैरिन्द्रियैश्च विवर्जितः इस विषय में एक श्लोक है:: -मरण का अभिनय सभी व्यधियों के एक साथ प्रकार ( माना गया ) है । इसे शिथिल शरीर, चेष्टाहीन के द्वारा प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ८६ ॥
।
॥ ८६ ॥
घनीभूत होने का इन्द्रियाँ तथा अर्थों अभिघातजे तु - नानाप्रकारा अभिनयविशेषाः शस्त्रक्षताहिदष्टवि । यथा तत्र शस्त्रक्षते तावत्सहसा -पीत गजादिपतितश्वापदहताः प्रयोक्तव्यः । अहिदष्टविषपीत-भूमिपतनवेपनस्फुरणादिभिरभिनयः तथा इसी प्रकार ' उरूभंग ' नाटक में दुर्योधन का अभिघातज मरण दिख-है है । इसका आशय केवल इतना ही है कि प्रधान नायक या नायिका लाया गया पर वर्जित है । यदि कथावस्तु में ऐसी मरण दशा आही का मरण नाट्यमंच होना चाहिये । जैसे ' मृच्छकटिक ' में जाए तो उसके पुनर्जीवन का उल्लेख होना । शकार द्वारा ‘ वसन्तसेना ' का वध कर देना और उसका पुनरुज्जीवित इसी लिये मरण की पूर्वावस्था को ' मरण ' भाव मानने के पक्ष कुछ आचार्य आचार्यों ने ऐसा माना भी है परन्तु कुछ अन्य उत्तरवर्ती में हैं तथा उत्तरवर्ती ' का मंच पर प्रदर्शन ही वर्जित बतलाया । जब नाट्यशास्त्रीय लेखकों ने ' मरण आचार्य को इष्ट है न कि कि प्रख्यात नायक से वध का निषेध ही भरत पात्रों या नायकेतरपात्र की मृत्यु का । पर यही विषय उत्तरवर्ती सामान्य गंभीरता से ग्रहण न कर सके । आचार्य अभिनवगुप्त ने इसकी नाट्यशास्त्रकार की है- " मरणमिति न जीवित - वियोग उच्यते । अपि तु चैतन्या-निम्न व्याख्या मन्तव्या । मरणमचिर-वस्यैव प्राणत्याग - कर्तृकालिका या सम्बन्धाद्यवसरगता न लभते । " ( अभि ० कालप्रत्यापत्तिमयमत्र मन्तव्यम् । येन शोकावस्थानमेव भा ० ) - अर्थात् मरण का आशय जीवन की एकान्त समाप्ति नहीं लेना चाहिए करने की वह अवस्था जो अनेक सम्बन्ध या अवसर से उप-किन्तु प्राणत्याग । यहाँ ' मरण ' थोड़े समय तक रहने वाला भाव ही लिया लब्ध होती हो की निरन्तर दशा को अवसर न देने पाए । जाए जिससे वह शोक १. अहिदष्टे तु विषपीते वा ।
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४२६ नाट्यशास्त्रम्-योर्विषवेगो यथा - कार्य वेपथुविदाहहिक्का फेनस्कन्धभङ्गजडतामरणा-नोत्यष्टौ विषवेगाः । आकस्मिक दुर्घटनाजन्य मरण को —- शस्त्रक्षत होने, सर्पदंश, विषपान, हाथी से गिरने तथा हिंसक पशुओं से मारे जाने आदि विभिन्न विधाओं के द्वारा अभिनीत किया जाता है । जैसे — शस्त्र से आहत होकर मरने में सहसा भूमि - पतन, कम्पन तथा फड़कने आदि के द्वारा । सर्पदंश सेविषभक्षण से या उसके चढ़जाने से होने वाले मरण में विषवेग की आठ दशाएँ होती हैं । यथा - ( १ ) शरीर के कृश हो जाने, ( २ ) कम्प, ( ३ ) दाह, ( ४ ) हिचकी, ( ५ ) मुँह में फेन आ जाने, ( ६ ) गले के ढीले होने, ( ७ ) जड़ता ( बेहेशी ) तथा अन्तिम दशा ( ८ ) मरण ।
अत्रानुवंश्यौ श्लोकौ भवतः -काय तु प्रथमे वेगे द्वितीये वेपथुर्भवेत् ' ।
दाहं तृतीये हिक्कां च चतुर्थ सम्प्रयोजयेत् ॥ ८७ ॥
फेनञ्च पञ्चमे कुर्यात्षष्ठे स्कन्धस्य भञ्जनम् ' ।
जडतां सप्तमे कुर्यादष्टमे मरणं भवेत् ॥ ८८ ॥
इस विषय में दो अनुवंशीय श्लोक हैं: -विष भक्षणोपरान्त प्रथमवेग में शरीर में कृशता, दूसरे में कंपन, तीसरे में दाह, चौथे में हिचकी, पाँचवें में मुँह में फेसूट ( फेन ) निकलना, छठें में गले की ढल जाना, सातवें में बेहोशी तथा आठवें अन्तिम वेग में मरण हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥
अश्रार्या भवति-श्वापदगजतुरगरथोद्भवंतु पशुयानपतनजं वाऽपि ।
शस्त्रक्षतवत्कुर्यादनवेक्षित गात्र सञ्चारम् ॥। ८ ९ ॥
इस विषय में आर्या ( भी ) है: -हिंसक जन्तुओं के प्रहार, हाथी, घोड़ा, रथ, पशु तथा अन्य सवारी से गिरने पर हो जाने वाले मरण का अभिनय शस्त्रक्षत मरण के समान ही करना चाहिए ॥ ८ ९ ॥ १. वेपथुस्तथा — घ ० । २. षष्ठे तु स्कन्धभञ्जनम् — घ ० । ३. श्वापदगजतुरगोद्भव पशुयान पतनजं चापि – ग ० । ४. दनपेक्षित ग ०, घ ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४२७
इत्येवं मरणं ज्ञेयं नानावस्थान्तरात्मकम् ।
प्रयोक्तव्यं बुधैः सम्यग्यथा भावाङ्गचेष्टितैः ॥ ९ ० ॥
इस प्रकार मरण अनेक अवस्थाओं से युक्त होता है । इसका अभिनय बुध जन योग्य ( उपयुक्त ) भावों तथा आङ्गिक क्रियाओं द्वारा प्रस्तुत करें । त्रास-त्रासो नाम - विद्युदुल्काशनिनिपातनिर्घाताम्बु ' धरमहासत्त्वपशु-रवादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तमभिनयेत्संक्षिप्ताङ्गोत्कम्पन वेपथुस्तम्भ-रोमाञ्चगगदप्रलापादिभिरनुभावैः । बिजली, उल्का तथा वज्र के पतन, भूकम्प ( निर्घात ) मेघध्वनि तथा हिंसक पशु ( आदि ) के शब्दों आदि विभावों से ‘ त्रास " उत्पन्न होता है । शरीर के अवयवों को सिकुड़ाने, सिहरने, धूजने, जाने ( स्तम्भ ), रोमाञ्च, गद्गद् भाषण तथा असम्बद्ध अनुभावों के द्वारा इनका अभिनय करना चाहिए । अत्र श्लोको भवति -महाभैरवनादायैखासः समुपजायते । स्वस्ताङ्गाक्षिनिमेषैश्च तस्य त्वभिनयो भवेत् इस विषय में निम्न एक श्लोक है: -शरीर के जड़ हो प्रलाप करने आदि ॥ ९ १ ॥ अनेक विभीषक ध्वनि आदि के उत्पन्न होने से ' त्रास ' उत्पन्न होता है । इसे शरीर के भागों को ढीला छोड़ने तथा आँखों को ( आधा ) बन्द करने के अनुभावों के द्वारा अभिनीत करना चाहिए ॥ ९ १ ॥ १. त्रास – किसी भयंकर वस्तु को देखने पर जो चकित या क्षुब्ध मनोवृत्ति हो जाती है वही ' त्रास ' है । घोर दर्शनादिजन्य ' त्रास ' होता है तथा अनर्थ की सम्भावना से मानसिक बल का क्षीण हो जाना ' भय ' है । ' भय ' की स्थिति दीर्घकाल तक चलकर पूर्वापर विचार तथा भावों से सम्बद्ध होती है अतः स्थायी है और ' त्रास ' एक आगन्तुक दशा होकर उद्विग्न मनोदशा मात्र रहने से सवारी है । यही इन दोनों में पार्थक्य है । १. भाषाङ्गचेष्टितैः क ०; वागङ्गचेष्टितैः - ग ० । २. ताम्बुधरसनवातमहासत्त्वदर्शन - क ०; ताम्बुद - रव - सत्वदर्शनपश्वारवा दिभिग ० । ३. स्रस्ताङ्गार्द्ध निमेषाद्यैस्तस्य – क ०, ग ० ।
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४२८ नाट्यशास्त्रम् वितर्क— वितर्को नाम - सन्देहविमर्शविप्रतिपत्यादिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तमभिनयेद्विविधविचारितंप्रश्न सम्प्रधारणमन्त्र सङ्ग्रहनादिभिरनुभावैः । आशंका, विमर्श तथा ऊहापोह ( विप्रतिपत्ति ) आदि विभावों के द्वारा ' वितर्क ' उत्पन्न होता है । अनेक वादविवाद, विचार, प्रश्न एवं परिभाषाओं के स्थापन तथा रहस्य मंत्रणाओं के छिपा लेने आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए ।
अ श्लोको भवति-विचारणादिसम्भूतः सन्देहातिशयात्मकः ।
वितर्कः सोऽभिनेयस्तु शिरोभ्रूक्षेप कम्पनैः ॥ ९ २ ॥
इस विषय में एक आनुवंशीय श्लोक है: -विचार मिमर्श आदि से उत्पन्न तथा अतिशय सन्देहयुक्त स्वरूपवाले " वितर्क ' का अभिनय सिर, भौंहें तथा पलकों के घुमाने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ९ २ ॥ एवमेते त्रयस्त्रिशद्वयभिचारिणो भावा देशकालावस्थानुरू " -प्येणात्मगत परगत मध्यस्था उत्तममध्यमाधमैः स्त्रीपुंसैः स्वप्रयोगव-शादुपपाद्य इति । इस प्रकार ( ये ) तैंतीस संचारीभाव होते हैं । इनका ( कसी भी ) ( नाट्य रचना में ) उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति के सभी स्त्री तथा १. वितर्क - सन्देह आदि के अनन्तर उत्पन्न होने वाली तर्कना ' वितर्फ कह-लाती है । यह अनुकूल निर्णय में सहायक होता है । ' चिन्ता ' से इसका भेद यही है कि चिन्ता किसी निश्चय को उत्पन्न नहीं करती तथा चिन्ता का स्वरूप होता है ' क्या होगा ' ' कैसा होगा ' इत्यादि परन्तु ' वितर्क ' निश्चय का आपादक होता है और उसका स्वरूप होता है ' ऐसा करना उचित होगा ' इत्यादि । १. प्रत्ययादिभि - ग ० । २. प्रज्ञासम्प्रधारण क ०, संज्ञासम्प्रधारण ग ०, घ ० ३. ससन्देह क्रिया - ०; सन्देहजनना- ग ० । ४. वितर्कस्त्वभिनेयः स्या ग ०, घ ० । ५. देशकालावस्थानुगत - ग ० । ६. पुरुषप्रयोगवशादुत्पाद्या - ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४२ ९ पुरुषों के द्वारा देश, काल, अवस्था तथा कार्य के अनुसार ( तथा प्रयोग की आवश्यकता आदि को ध्यान में रखते हुए ) प्रयोग करना चाहिए । अत्र श्लोकः—
त्रयस्त्रिंशदिमे भावा विज्ञेया व्यभिचारिणः ।
सात्त्विकांस्तु पुनर्भावाम्प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ९ ३ ॥
इस प्रकार ये तैंतीस व्यभिचारी भाव होते है अब मैं सात्विक भावों का क्रमशः वर्णन करता हूँ ॥ ९ ३ ॥ सात्त्विकभाव-अत्राह - किमन्ये भावाः सत्वेन विनाऽभिनीयन्ते यस्मादु-च्यन्ते ते साविका इति? अत्रोच्यते- एवमेतत् । कस्मात्? इह हि सत्यं नाम मनः प्रभवम् । तच्च समाहितमनस्त्वादुच्यते । मनसः समाधौ सत्त्वनिष्पत्तिर्भवति । तस्य च योऽसौ स्वभावो रोमाञ्चाश्रवैवर्ण्यादिलक्षणो " यथाभावोपगतः स न शक्योऽन्यमनसा कर्तुमिति लोकस्वभावानुकरणत्वाच्च नाट्यस्य सत्त्वमीप्सितम् । अत्राद - को दृष्टान्तः? -इह हि नाट्यधर्मिप्रवृत्ताः " सुखदुः-खकृता भावास्तथा ' सत्त्वविशुद्धाः कार्याः यथा सरूपा भवन्ति! तत्र दुःखं नाम रोदनात्मकम् । तत् कथमदुःखितेन सुखञ्च प्रहर्षात्मकम सुखितेन चाभिनेयम् एतदेवास्य सत्त्वं यद् दुःखितेन सुखितेन वाऽश्रुरोमाञ्चौ दर्शयितव्यौ इति कृत्वा सात्त्विका भावा इत्यभिव्याख्याताः । १. व्याख्यास्याम्यनपूर्वशः ग ० । २. विनाभिधीयन्ते यत एते क ०; ग ० । ३. उत्पद्यते - ग ० । ४. मनःसमाधानाच्च सत्त्वनिवृत्तिर्भवति - ग ० । ५. स्तम्भस्वेदरोमाश्वास्र – ग ० । ६. न दृश्यते मनसा कर्तुमिति - ग ० । ७. नाट्यधर्मः प्रवृत्तः – ग ० । ८. कृतो ग ० । ६. भाव - ग ० । १०. सत्त्वविशुद्धाधिष्ठितः कार्यों यथास्वरूपो भवति - ग ० ।
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४३० नाट्यशास्त्रम् प्रश्न: —क्या अन्य भाव सत्त्व के बिना ( या उससे रहित ) होते हैं, जो इन्हें ही सात्त्विक कहा गया? उत्तर: - इन्हें सात्त्विकभाव ' कहे जाने में हेतु है । क्योंकि ' सत्त्व ' मन के आत्यन्तिक सम्बन्ध से उत्पन्न होता है । मन की एकाग्रता से ' सत्त्व ' आदि की उत्पत्ति होती है । इसका जो रोमांच अश्रु तथा वैवर्ण्य आदि से युक्त स्वरूप है उसका अनुकरण अन्यमनस्क भाव से ठीक नहीं हो सकता । अतएव नाटक में लोक स्वभाव के अनुसार स्थिति सत्त्व ही अपेक्षित है । ( प्रश्न ) इस विषय में क्या दृष्टान्त दिया जा सकता है? ( उत्तर ) नाट्यप्रयोग के समय नाट्यधर्म में प्रवृत्त सुख - दुःख के भावों को इस प्रकार सात्त्विक भावों से उत्पन्न होने वाले बतलाना चाहिए कि वे यथार्थ स्वरूप वाले प्रतीत होने लगें । रोदनात्मक भाव दुःख कहलाता है । इस दुःख भाव को जो कभी दुःखी न हुआ हो ऐसा सुखी प्रयोक्ता तथा प्रहर्षात्मक सुख को दुःखी प्रयोक्ता कैसे अभिनीत कर सकेगा? इस सम्बन्ध में यही ' सत्त्व ' है जो कि अभिनेता दुःखी हो या सुखी हो उस अश्रु या रोमाञ्च को अभिनय द्वारा प्रस्तुत करना होता है । इस प्रकार सात्त्विक भावों की व्याख्या की गयी ।
न इमे-स्कम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ ' वेपथुः ।
वैवर्ण्यम प्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः ॥ ९ ४ ॥
इस सात्विक भावों की संख्या आठ है । यथा - ( १ ) स्तम्भ, ( २ ) स्वेद, १. सात्त्विकभाव - सात्त्विक शब्द की व्युत्पत्ति है- ' अवहितं मनः सत्त्वं तत्प्रयोजनं हेतुरस्येति सात्त्विकः ' अर्थात् एकाग्रमन का नाम सत्त्व है, यह सत्त्व जिसका प्रयोजन अर्थात् हेतु हो वह ' सात्त्विक ' कहलाता है । मानसिक स्थिरता के अभाव में अभिनेता के द्वारा स्वरभेदादि का प्रदर्शन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है अतः एकाग्र मन से स्वरभेदादि का प्रदर्शन करना सात्त्विक अभिनय है जो सात्त्विक भावों का आश्रय लेकर किया जाता है । यद्यपि ये अनुभाव हैं किन्तु ' सत्त्व ' से उद्भुत होने के कारण इनकी पृथक् गणना की गयी । इन स्वेदादि सात्त्विकभावों के भरतमुनि ने प्रथम लक्षण बतलाये हैं और फिर इनके अभिनय की प्रक्रिया दिखलायी है । १. स्वरसादोऽथ - घ ० । २. मताः ख ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ( ३ ) रोमांच, ( ४ ) स्वरभंग, ( ५ ) वेपथु, ( ६ ) वैवर्ण्य, ( ८ ) प्रलय ॥ ९ ४ ॥
अनार्याः तत्र-क्रोधभयहर्षलज्जा दुःखश्रमरोगतापघातेभ्यः ।
व्यायामक्कुमघमैः ' स्वेदः सम्पीडनाच्चैव ॥ ९ ५
इस विषय में ये आर्याएँ हैं: -स्वेद – क्रोध, भय, हर्ष, लज्जा, दुःख, श्रम, रोग, ताप, क्लेश, घाम तखा अंगों के दबाने ( सम्पीडन ) आदि में होता है ॥ ९ ५ ॥ ४३१ ( ७ ) अश्रु तथा ॥ चोट, व्यायाम, ' स्वेद ' उत्पन्न
हर्षभयशोक विस्मयविषादशेषादिसम्भवः स्तम्भः ।
शीतभयहर्षशेषस्पर्शजरारोगजः कम्पः ॥ ९ ६ ॥
स्तम्भ तथा वेपथु - हर्ष, भय, शोक, विस्मय ( हैरानी ) दुःख तथा क्रोध आदि से ' स्तम्भ ' उत्पन्न होता है तथा शीत, भय, हर्ष, क्रोध, स्पर्श, जरा ( चुढ़ापा ) तथा रोग से ' कम्प ' ( वेपथु ) उत्पन्न होता है ॥ ९ ६ ॥
आनन्दामर्षाभ्यां धूमाञ्जनजृम्भणा द्भयाच्छोकात् ।
६ अनिमेषप्रेक्षणतः शीताद्रोगाद् भवेदश्रु ॥ ९ ७ ॥
अश्रु – ( अस्त्र ) --आनन्द या क्रोध से, आँखों में धुआँ या अंजन लगने से, जंभाई से, भय, शोक तथा एकटक देखने तथा शीत और रोग से ' अश्रु ' उत्पन्न होता है ॥ ९ ७ ॥
शीतकोधभयश्रमरोगक्लमतापजश्च वैवर्ण्यम् ।
स्पर्शभयशीत हर्षेः क्रोधाद्रोगाच्च रोमाञ्चः ॥ ९ ८ ॥
वैवर्ण्य ( मुँह का फीका पड़ जाना ) शीत, क्रोध, भय, थकावट, रोग, क्लेश ( क्लम ) तथा घास ( ताप ) से ' वैवर्ण्य ' उत्पन्न होता है । ' रोमांच - स्पर्श, भय, शीत, हर्ष, क्रोध तथा रोग से ' रोमांच ' उत्पन्न होता है ॥ ९ ८ ॥ १. धर्मात् - ग ० । २. रोग - ग ० । ३. मदरोषसम्भवः ग ० । ४. सम्भवः ग ० । ५. जम्भणभयाच्च ग ० । ६. शोका निमिषप्रेक्षण शीताद् – ग ० । ७. भवेदस्रम् — घ ० । ८. गीतहर्षात् - क ०; शीतहर्षात्- - ग ० ।