भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 561–570
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 561–570
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४३२ नाट्यशास्त्रम्
स्वरभेदो ' भयहर्षक्रोधजरारौक्ष्यरोगमदजनितः ।
श्रममूर्च्छा मदनिद्राभिघात मोहादिभिः प्रलयः ॥ ९९ ॥
स्वरभंग - भय,, हर्ष क्रोध, बुढ़ापा, गले के सूखने ( रौक्ष्य ) रोग तथा ' से ' स्वरभंग ' होता है । प्रलय - श्रम, मूर्च्छा, मद, निद्रा, चोट, तथा मद मोह आदि से ' प्रलय ' की उत्पत्ति होती है ॥ ९९ ॥
एवमेते बुधैर्ज्ञेया भावा ह्यष्टौ तु सात्त्विकाः ।
कर्म चैषां प्रवक्ष्यामि रसभावानुभावकम् ॥ १०० ॥
( इस प्रकार ) आठ सात्त्विकभाव ( होते ) हैं जिन्हे ( विज्ञजन को ) जानना चाहिए । रस तथा भावों के अनुसार अब मैं इन भावों की अभिनय-प्रक्रिया ( कार्य ) कतलाता हूँ ॥१०० ॥
सात्त्विकभावों का अभिनय विधान-निःसंज्ञो निष्प्रकम्पश्च स्थितः शूभ्यजडाकृतिः ।
स्कन्नगात्रता चैव स्तम्भं त्वभिनयेद्बुधः ॥। १०१ ॥
' स्तम्भ ' का अभिनय संज्ञाहीन, चेष्टाहीन, गतिहीन, ( शून्य ) जड़-आकृति के स्तब्ध और संज्ञाहीन अंगो से ( बुद्धिमान जन ) प्रयुक्त करें ॥
व्यञ्जनग्रहणाच्चापि स्वेदापनयनेन च ।
स्वेद एवाभिनैतव्यस्तथा वाताभिलाषतः ॥ १०२ ॥
‘ स्वेद ' का अभिनय पंखा उठा लेने, पसीना पोंछने तथा वायु की अभिलाषा रखने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ १०२ ॥
मुहुः कण्टकितत्वेन तथोल्लुकसनेन च ।
पुलकेन ' च रोमाञ्चं गात्रस्पर्शेन दर्शयेत् ॥ १०३ ॥
‘ रोमांच ' का अभिनय रोएँ खड़े हो जाने, पुलक की आवृत्ति ( या बार-बार रोंगटे खड़े होने ) तथा गात्र स्पर्श के द्वारा किया जाता है ॥ १०३ ॥
१. स्वरसादो - ग ० । २. जयहर्ष क्रोधजरामोहमद - क ०; ज्वर रोग - ग ० । ३. ह्यनुभावा – ग ० । ४. निश्चेष्टो - ख ० । ५. स्मितशून्य - ग ० । ६. निःसंज्ञस्तब्धगात्रश्च – ग ० । ७. व्यञ्जन ग ० । ८. स्वेदस्याभिनयो योज्यस्तथा क ०, ग ० । ६. रोमाश्वस्त्वभिनयोऽसौ गात्रसंस्पर्शनेन च - ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४३३
स्वरभेदोऽभिनेतव्यौ ' भिन्नगद्गद निस्वनैः ।
वेपनात्स्फुरणात्कम्पाद्वेपथुं सम्प्रदर्शयेत् ॥ १०४ ॥
' स्वरभेद ' का अभिनय भिन्न तथा गद्गद् स्वरों से करना चाहिए । तथा ' वेपथु ' का अंगों के काँपने, फड़कने, हिलने आदि अनुभावों से किया जाए || १०४ ॥
मुखवर्णपरावृत्त्या नाडीपीडनयोगतः ।
वैवर्ण्यमभिनेतव्यं प्रयत्नात्तद्धि दुष्करम् ॥ १०५ ॥
' वैवर्ण्य ' का अभिनय चेहरे के रंग के परिवर्तन और नाड़ी के दबाने के द्वारा प्रयत्नपूर्वक किया जाए । यह अंगाश्रित अभिनय होने से कठिनाई से प्रस्तुत होता है ॥ १०५ ॥
" बाप्पाम्बुप्लुतनेत्रत्वान्नेत्रसम्मार्जनेन च ।
मुरकणापातैरा - त्वभिनयेद्बुधः ॥ १०६ ॥
' अश्रु ' का अभिनय नेत्रों को आँसुओं भरते ( हुए ), आँखें पोंछने, तथा बार - बार आँसुओं को गिराने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ १०६ ॥
निश्चेष्टो निष्प्रकम्पत्वादव्यक्तश्वसितादपि ।
महीनिपातनाच्चापि प्रलयाभिनयो भवेत् ॥ १०७ ॥
' प्रलय ' का अभिनय चेष्टाहीन, निष्कम्प ( बिना हिलने डुलने ), श्वास के बन्द करने ( या साँस की गति न दिखाई देने ) और पृथ्वी पर गिरने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ १०७ ॥
१. स्वरभेदं तथा चैव ग ० । २. विस्वरैः - घ ० । ३. सम्प्रयोजयेत् — ग ०, घ ० । ४. सार्धमेतत् पद्यं ख — गपुस्तकयोर्नास्ति । ५. मेदिनीपतनाच्चापि ग ० । २८ ना ० शा ० प्र ०
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४३४ नाट्यशास्त्रम् ( संचारी आदि ) भावों की रसों में विनियोजना-एकोनपञ्चाशदिमे यथावद्
भावास्त्रयवस्था ' ह्युदिता मयेह ।
भूयश्व ' ये यत्र रसे नियोज्या-स्ताँच्छ्रोतुमर्हन्ति च विप्रमुख्याः ॥ १०८
इन तीन प्रकार के इन उनचास भावों की मैंने यथावत् ॥ व्याख्या की । अब मैं विभिन्न रसों में होने वाले इनके प्रयोग बतलाता हूँ जिन्हें मुनिजन ध्यानपूर्वक सुनें ॥ १०८ ॥
आलस्यौग्रथजुगुप्साख्यैरेवं ' भावैस्तु वर्जिताः ।
उद्भावयन्ति शृङ्गारं सर्वे भावाः स्वसंज्ञया ' ॥ १० ९ ॥
आलस्य, उग्रता तथा जुगुप्सा को छोड़कर शेष सभी भाव ( अपने नामों से ) ‘ शृङ्गार " रस को उत्पन्न करते हैं ॥ १० ९ ॥ १. आलस्यादि तीन संचारियों के अतिरिक्त कुल ४६ भाव ऐसे हैं जो शृङ्गार को उद्भावित करते है । इन भावों की गणना एक भिन्न पाठ में इस
प्रकार दी गयी है: -शङ्का व्याधिस्तथा ग्लानिश्चिन्ताऽसूया भयं तथा ।
विस्ययश्च वितर्कश्च स्तम्भश्चपलता तथा ॥
रोमा हर्षो निद्रा च तथोन्मादमदावपि ।
स्वेदश्चैवावहित्यश्व प्रलयो वेपथुस्तथा ॥
विषादश्रमनिर्वेदा गर्वावेगो धृतिः स्मृतिः ।
मतिर्मोहो विबोधश्च सुप्तमौत्सुक्यकं तथा ॥
१. व्यवस्था गदिता मया वः ग ० । २. येषाश्च ये यत्र रसे नियोज्यास्तान् — ग ०, ३. जुगुप्साभिर्भावैस्तु परिवर्जिताः - ग ० ।
४. यथावसरमेते हि स्थायिसञ्चारितत्त्वजाः ।
उद्दीपयन्ति शृंगार रसमासाद्य संज्ञितम् ॥
इति क - पुस्तकेऽधिकम् ।
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सप्तमोऽध्यायः ४३५
ग्लानिः शङ्का ह्यसूया च श्रमश्चपलता तथा ।
सुप्तं निद्रावहित्थं च हास्ये भावाः प्रकीर्तिताः ॥ ११० ॥
ग्लानि, शंका, असूया, श्रम, चपलता, सुप्त, निद्रा तथा अवहित्थ नामक भाव ‘ हास्यरस ' में होते हैं ॥ ११० ॥
निर्वेदश्चैव चिन्ता च दैन्यं ग्लानत्रमेव च ।
जडता मरणं चैव व्याधिश्च करुणे स्मृताः ॥ १११ ॥
निर्वेद, चिन्ता, दैन्य, ग्लानि, अस्र, जड़ता, मरण तथा व्याधि नामक भाव ' करुण ' रस में होते हैं ॥ १११ ॥
गर्वोऽसूया मदोत्साहावावेगोऽमर्ष एव च ।
क्रोधश्चपलतोयं च विज्ञेया रौद्रसम्भवाः ॥ ११२ ॥
क्रोधामर्षौ च हासश्च शोकोऽपस्मार एव च ।
दभ्यश्व मरणञ्चैव रतिरुत्साहसंयुता ।
त्रासर्ववर्ण्य रुदितैः स्वरभेदः शमोऽपि च ॥
जडता च तथा षट् च चत्वारिंशत् प्रकीर्तिताः ॥
[ ना ० शा ० G. O. S. Vol. I, पृ ० ३७७ ] अर्थात् शंका, व्याधि, ग्लानि, चिन्ता, असूया, भय, विस्मय, वितर्क, स्तम्भ, चपलता, रोमाश्च, हर्ष, निद्रा, उन्माद, मद, स्वेद, अवहित्थ, प्रलय, वेपथु, विषाद, श्रम, निर्वेद, गर्व, आवेग, धृति, स्मृति, मति, मोह, विबोध, सुप्त, औत्सुक्य, क्रोध, अमर्ष, हास, शोक, अपस्मार, दैन्य, मरण, रति, उत्साह, त्रास, वैवर्ण्य, रुदन, स्वरभेद, शम और जड़ता ये छियालिस भाव कहे गये हैं । परन्तु शृङ्गार में जिन छियालिस भावों को लिया है उनमें केवल तीन संचारी भावों का ही भरत ने निषेध किया है - अतः यह उल्लेख पुनरुक्त - सा होने पर संग्रह की दृष्टि से ही किया गया प्रतीत होता है । उल्लेख होने से यह प्रक्षिप्त भाग है, यह स्पष्ट हो जाता है १. ग्लान्यास्रमेव — क ० । २. रसे - ग ० । ३. तथोत्साह - ग ० । ४. मद एव ग ० । ५. क्रोधश्चपलता हर्षो रौद्रे तूग्रत्वमेव च - ग ० । इसमें ' शम ' का ।
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४३६ नाट्यशास्त्रम् गर्व, असूया, उत्साह, आवेग, मद, क्रोध, चपलता, हर्ष तथा उग्रता नामक भाव ‘ रौद्र ' रस में होते हैं ॥ ११२ ॥
असम्मोहस्तथोत्साह आवेगो हर्ष एव च ।
मतिश्चैव तथोप्रत्वममर्षो ' मद एव च ॥ ११३ ॥
रोमाञ्चः स्वरभेदश्च क्रोधोऽसूया धृतिस्तथा ।
गर्वश्चैव वितर्कश्च वीरे भावा भवन्ति हि ॥ ११४ ॥
असम्मोह ( प्रत्युत्पन्नमतित्त्व ), उत्साह, आवेग, हर्ष, मति, उग्रता, अमर्ष, मद, रोमांच, स्वरभेद, क्रोध, असूया, धृति, गर्व तथा वितर्क ' वीर ' रस में होते हैं ॥ ११३-११४ ॥
वेपथुः स्वरभेदश्च रोमाञ्चो गद्गदस्तथा ।
स्तम्भश्च मरणं स्वेदो वैवर्ण्य च भयानके ॥ ११५ ॥
वेपथु, स्वरभेद रोमांच, गद्गद्, स्तम्भ, मरण, स्वेद तथा वैवर्ण्य नामक भाव ' भयानक ' रस में होते हैं ॥ ११५ ॥
अपस्मारस्तथोन्मादो विषादो मद एव च ।
मृत्युर्व्याधिर्भयं चैव भावा बीभत्ससंश्रयाः ॥
अपस्मार, उन्माद, विषाद, मद, मरण व्याधि तथा ' ' बी ' रस में होते हैं ॥ ११६ ॥
स्तम्भः स्वेदश्च मोहश्च रोमाञ्चो विस्मयस्तथा आवेगो जडता हर्षो मूर्च्छा चैवाद्भुते रसें स्तम्भ, स्वेद, मोह, रोमांच, विस्मय, आवेग, जड़ता, नामक भाव ‘ अद्भुत ’ रस में होते हैं ॥११७ ॥
११६ ॥ भय नामक भाव
।
॥ ११७ ॥
हर्ष तथा मूर्च्छा-१. हर्ष उन्माद एव च - ग ० । २. प्रतिबोधश्च क्रोधासूये- - ग ० । ३. त्रासश्च मरणञ्चैव-- ग ० । ४. संश्रिताः - ग ० । ५. चैवाद्भुताश्रयाः -ग ० ।
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सप्तमोऽध्यायः ४३७
ये त्वेते साविक मावा नानाभिनय संश्रिताः ।
रसेवेतेषु सर्वेषु ते ज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः ॥ ११८ ॥
ये तथा अन्य जो सात्त्विक भाव हों उन्हें अनेक अभिनयों से युक्त इन सभी रस भावों में नाट्यप्रयोक्ता जन प्रयुक्त करें ॥ ११८ ॥
नोकरसजं काव्यं किंचिदस्ति प्रयोगतः ।
भावो वापि रसो वापि प्रवृत्तिवृत्तिरेव वा ॥ ११ ९ ॥
व्यवहार ( प्रयोग ) में कोई भी नाट्य - प्रयोग एक रस वाला नहीं होता और फिर वह चाहे भाव, रस, प्रवृत्ति या वृत्ति हो वह भी एक रस युक्त नहीं होती ॥ ११ ९ ॥
बहूनां समवेतानां रूपं यस्य भवेद्बहु ।
समन्तव्यो रसः स्थायी शेषाः संचारिणो मताः ॥ १२० ॥
अनेक समवेत रसों में जिस एक का स्वरूप मुख्य हो ( अधिक रहे ) उसे स्थायी तथा शेष को संचारी भाव समझना चाहिए ॥ १२० ॥
दीपयन्तः प्रवर्तन्ते ये पुनः स्थायिनं रसम् ।
ते तु सञ्चारिणो ज्ञेयास्ते हि स्थायित्वमागताः ॥ १२१ ॥
जो स्थायीभाव अन्य रस को उद्दीपित करते हुए प्रवृत्त हों उन्हें संचारी समझना चाहिए ( पर ) ये अपने प्रकृतरस के प्रसंग में स्थायी होते हैं ।
विभावानुभावयुक्तो ह्यङ्गवस्तु समाश्रयः ।
संचारिभिस्तु संयुक्तः स्थाय्येव तु रसो भवेत् ॥ १२२ ॥
विभाव तथा अनुभावों से युक्त ( हस्तादि - अवयवों के समान ) अंगों के निवेश तथा कथावस्तु का सहकार पाकर एवं संचारी भावों से युक्त होकर स्थायीभाव रस - दशा को प्राप्त करता है ॥ १२२ ॥
१. ये चान्ये –क ० । २. विज्ञेयाः - ग ० । ३. सर्वेषां - ग ० ।
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४३८ नाट्यशास्त्रम्
स्थायी सत्त्वातिरेकेण प्रयोक्तव्यः प्रयोक्तृभिः ।
संचार्याकारमात्रेण स्थायी यस्मादवस्थितः ' ॥
प्रयोक्ता जन स्थायी भाव को अतिशय सात्विक भावों हुए प्रस्तुत करें, ( किन्तु ) संचारी भावों को आकृतिमात्र
में प्रस्तुत करें क्योंकि ये स्थायीभात्र के सहायकमात्र हैं ।
अधिक विस्तार प्राप्त नहीं करावें ) ' ॥ १२३ ॥
चित्राणि न विरज्यन्ते लोके चित्रं हि दुर्लभम् विमर्दे रागमायाति प्रयुक्तमपि यत्नतः ( या विभिन्न रसों का १२३ ॥ से संयुक्त करते से ही गौणरूप ( अतएव इन्हें
।
॥ १२४ ॥
प्रदर्शन ) विराम ( दर्शकों में ) विचित्रता दुर्लभ रहती है । किन्तु उत्पन्न नहीं करती क्योंकि ( व्यवहार में ) विविधता १२४ तथा १२५ के मध्य निम्न पद्य भी बड़ौदा संस्करण १. पद्य संख्या में मिलते हैं ॥ ये त्वेते सात्त्विका भावा नानाभिनययोजिताः रसेष्वेतेषु सर्वेषु ते ज्ञेया नाट्यकोविदः ॥ अनेकविध अभिनयों में योजित जो ये सात्त्विक समस्त रसों में प्रयुक्त करने का ज्ञान नाट्यप्रयोग में रखना चाहिए ॥ न ह्येकरसजं काव्यं नैकभावकवृत्तिकम् विमर्दे रागमायाति प्रयुक्तं हि प्रयत्नतः ॥ भावा वापि रसा वापि प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव वा । नहीं जिसमें एक ही रस, भाव या भाव हैं उन्हें इन कुशल पुरुषों को वृत्ति हो, पर चाहे ऐसा कोई काव्य प्रयोग करने पर इन सभी के भाव, रस प्रवृत्ति या वृत्ति हों उनके प्रयत्नपूर्वक
संयोग से ही रसत्व की दशा का निर्माण होता है ।
त्रैविध्यं नात्र कथ्यते ॥
बीभत्साद्भुतशान्तानां रसानां त्रैविध्यं नानाभाव रसान्वितम् । षष्णां ह्यर्थः; प्रयोगोऽत्र विराजते । सत्त्वप्रयोजितो विदित्वा हि विराजन्ते लोके चित्रं हि दुर्लभम् ॥ १. यस्माद् व्यवस्थितः - ग ०, घ ० । १. प्रयुक्तं हि प्रयत्नतः ।
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सप्तमोऽध्यायः ४३ ९ प्रयत्नपूर्वक किया हुआ विभिन्न वस्तुओं का मिश्रण ( विमर्द ) बड़ा ही मनोरंजक होता है ॥ १२४ ॥
नानाभावार्थसम्पन्नाः स्थायिसत्त्वाभिचारिणः ।
पुष्पावकीर्णाः कर्तव्याः काव्येषु हि रसा बुधैः ॥ १२५ ॥
नाट्य में अनेक अर्थों तथा भावों से पूर्ण स्थायी, सात्त्विक तथा संचारी भावों की योजना माला में पिरोये हुए पुष्पों की तरह ( अपेक्षित रूप में ) ठीक से करनी चाहिए १२५ ॥ एवं रसाश्च भावाश्च व्यवस्था " नाटके स्मृताः य एवमेताञ्जानाति स गच्छेत् सिद्धिमुत्तमाम् ॥ १२६ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे भावविकल्पो नाम सप्तमोऽध्यायः । इस प्रकार नाटक में रसों तथा भावों की तीन अवस्थाओं का निरूपण किया गया है । जो ठीक से समझता है वह अतिशय सफलता प्राप्त करता है ॥ १२६ ॥
भरतनाट्यशास्त्र ' भावाध्याय ' समाप्त । सप्तमाध्याय समाप्त । बीभत्स, अद्भुत और शान्त रस की त्रिविधता का यहाँ कथन नहीं किया जा रहा है किन्तु अनेक भावों तथा रसों से युक्त छः रसों का त्रिविध प्रयोग ही कहा गया है । यहाँ प्रयोग का अर्थ है सात्त्विकभाव के प्रयोज्य विषय । इसे जान लेने पर नाट्यप्रयोक्ताजन प्रतिष्ठादि प्राप्त कर शोभित होते हैं, यद्यपि संसार में विचित्रता या विविध रसों का मिश्रित प्रयोग दुर्लभ होता है । १. नानार्थ भाव निष्पन्ना - घ ० । २. स्थायी सत्त्वविचारिणः - ग ० । ३. पुंसावकीर्णा — ग ० । ४. काव्ये सत्त्वरसाश्रये - - ग ०; काव्येषु हि रसाश्रयाः घ ० । ५. व्यवस्था ग ० । ६. भावव्यञ्जकोनाम - घ ० ।
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परिशिष्ट ( नाट्यशास्त्र: अध्याय १-७ ) अतिरिक्त टिप्पणियाँ प्रथम अध्याय . ( संकेत - टिप्पणियों के आरम्भ में दी गयी
श्लोकों की है । )
१. ' नाट्यशास्त्र ' - शब्द की व्याख्या अति विस्तीर्ण है संख्या अध्यायगत । कुछ आचार्य कहते हैं - ' नाट्यस्य नटवृत्तस्य ' शास्त्रं शासनोपायं ग्रन्थम् ' अर्थात् नटों की अभिनय प्रक्रिया का विवरण देकर जिसे पठनीय ( ग्रन्थ ) बनाया जाए ऐसा शास्त्र ही ' नाट्यशास्त्र ' है । कर्त्तव्य एवं अकर्तव्य की शिक्षा देने के कारण इसका शास्त्रत्व निर्विवाद है । अन्य व्याख्याकार कहते हैं कि नाट्यशास्त्र शब्द नाट्य-वेद शब्द का पर्याय है अतः - नाट्यश्च तत् शास्त्रम् इति नाट्यशास्त्रम् ' व्याख्या ही उचित है । यह नाट्यवेद अर्थात् यह नटकर्मों की शिक्षा प्रदान करने वाला ग्रन्थ । पर इस व्याख्यान में आपत्ति यह है कि नाट्यपद से जिस नाट्यकला होता है वह शब्दरूप होने के कारण प्रवचन के योग्य नहीं है । इसके का ग्रहण नाट्य शब्दात्मक नहीं जिसका प्रवचन किया जा सके । अतिरिक्त कलारूप केवल नाट्य के व्यवस्थित रूप में निरूपित कर देने पर इससे भिन्न एवं बाह्य-रूपों का ( जो अशास्त्रीय है ) स्वतः निराकरण हो जाता है इसलिये ' शास्त्र ' शब्द का नाट्यपद के साथ प्रयोग भी निरर्थक है । इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के अन्त में ' य इदं शृणुयात् प्रोक्तं नाट्यवेदं स्वयं भुवा ' ( ना ० शा ० ३६।७४ ) इत्यादि जो कहा गया है वह भी असंगत हो जाएगा क्योंकि बिना शब्दात्मक रूप के ' शृणुयात् ' शब्द उसका वाचक कैसे हो सकेगा । अतएव भरतमुनि गुरुभूत एवं सभी के अधिपति ब्रह्मा एवं महेश्वर विष-यक स्मृति, औत्सुक्य, मति आदि व्यभिचारि भावों और बाह्य विषयों से असम्बद्ध या अवृत्तिरूपी जडता, अवहित्था आदि के साथ ( धर्म - ) वीर रस से अनुगत होकर तदनुकूल नमस्कार - ( आदि ) स्वरूप शिरोनमन रूप आङ्गिक एवं वाचिक अनुभावों को प्रकट करते हुए नाट्यशास्त्र के प्रवचनभूत प्रयोजन को ही प्रदर्शित कर रहे हैं; क्योंकि प्रयोजन ही प्रत्येक व्यक्ति का प्रयोजन होता है ।