भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 571–580

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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४४२ नाट्यशास्त्रम् नाट्य आस्आदनात्मा एवं साक्षात्कारात्मक प्रत्यक्षज्ञान से ग्राह्य होने वाला रसात्मक पदार्थ है और इस अलौकिक रसात्मक नाट्य का जो शास्त्र अर्थात् शासन है वही ' नाट्यशास्त्र ' कहलाता है, जो अशास्त्रीय भांड आदि के प्रदर्शनों से भिन्न है । अतः ब्रह्मा आदि के अन्य शिष्यों ने जिसे अनुपयोगी तथ्यों एवं तत्वों के मिश्रण से अनुपयुक्त विस्तार दे दिया था उस ' नाट्यशास्त्र ' का उपयोगी एवं यथार्थ निरूपण ही मैं ( भरतमुनि ) यहाँ करूँगा यह तथ्य मूल में ' प्रवक्ष्यामि ' पद से संकेतित किया गया है क्योंकि इसी ' नाट्य ' को पितामह ब्रह्मा ने मुझे प्रदान किया था । यही तथ्य नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत अध्याय में आगे भी दिखलाया गया है । अतएव ' नाट्यस्य वेदः शास्त्रम् वा ' ऐसा समास ही उचित है । यदि ' नाट्यवेद ' पद से नाट्यशास्त्र को ग्रहण नहीं किया गया तो फिर इसका परम्परा सम्पन्न अध्यापन सम्भव नहीं होगा क्योंकि ब्रह्मप्रोक्त नाट्यवेद ही यहाँ परम्परा के अनुसार निरूपित किया गया है । इसके अतिरिक्त चारों वेदों से पितामह ब्रह्मा ने क्रमशः पाठ्य, गीत, अभिनय तथा रसरूप अंगों को लेकर जिस नाट्यवेद की सर्जना की उसी नाट्यवेद ( या नाट्यशास्त्र ) का निरूपण यहाँ इष्ट है अतः तद्विषयक शास्त्र ही यहाँ ' नाट्यशास्त्र ' शब्द से अभिहित किया गया है । यदि ' विद् ' धातु के ज्ञान, सत्ता, लाभ तथा विचार ( सभी ) अर्थों को ध्यान में रख कर ' नाट्यस्य वेदनं सत्ता लाभों विचारश्च यत्र स नाट्यवेदः ' एसी व्याख्या करे तो नाट्यवेद शब्द रूपक के दस प्रकारों का ग्राहक हो जाता है । इस व्याख्या के अनुसार ' ब्रह्मणा यदुदाहृतम् ' का अर्थ होगा उस नाट्य-वेद का - जिसका ब्रह्मा ने प्रथम रूपक ( अमृतमन्थन नामक समवकार ) लिख कर उदाहरण प्रस्तुत किया था- मैं निरूपण करूंगा । ( या प्रवचन या वर्णन करता हूँ । ) पर अन्य व्याख्याकार - नटकर्म अथवा अनुकरणीय होने के कारण नाट्यशब्द से नाटकादि रूपक ही लेते हैं अतएव इनके लक्षणादि का प्रतिपादक शास्त्र ' नाट्यशास्त्र ' माना जाए । ( आशय यह कि दशरूपकों का निरूपण जिस शास्त्र में हो उसे ही ' नाट्यशास्त्र ' समझना चाहिये । ) इसी नाट्यशास्त्र का ब्रह्मा ने निरूपण किया था और स्वयं रूपक रचना लिख कर नटों से उसका अभिनय प्रयोग भी प्रस्तुत करवाया था । ( इसके अतिरिक्त ) अन्य विद्वान् ब्रह्मणा यदुदाहृतम् ' की एक अन्य व्याख्या करते हैं । उनका कहना है कि वेद नामक शब्दराशि से प्राप्त होने वाले विधि एवं प्रतिषेध के आदेशात्मक शिक्षण को यह नाट्यं के द्वारा शासन

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४४३ योग्य बना देता है अतएव वेदवत् होने और विधिनिषेध का शिक्षण प्रयोजन रहने के कारण इसकी शास्त्रवत्ता स्वतः स्पष्ट है । भट्टनायक के अनुसार इसकी व्याख्या भिन्न है - परब्रह्म परमात्मा ( ब्रह्मणा ) ने जिसको ( यत् ) अविद्या कल्पित मिथ्या जगद्रूप भेद के ग्रहण करने हेतु उदाहरण बनाया ( उदाहृतम् ) वह ' नाट्यशास्त्र ' जैसे नाटकादि में रामादि का चरित कल्पित, एकरूप में स्थिर न रहने वाला, स्वप्नादि से विलक्षण, अद्भुतरूप में प्रतीत होता हुआ धर्मादि पुरुषार्थ का साधन वन जाता है । इसी प्रकार यह जगद् भी नाम रूपात्मक प्रपञ्च लिये हुए है तथा इससे नाट्य का मोक्षसाधनात्मक पारमार्थिक प्रयोजन भी बन जाता है । का प्रवचन प्रयोजन, नाट्यवेद अभिधेय ( विषय ) यहाँ नाट्यशास्त्र प्रयोजन एवं विधिवत् जिज्ञासु भाव से शास्त्र तत्व का व्युत्पाद्य व्युत्पादकभाव ग्राहक अधिकारी का भी प्रकृत पद्य से संकेत मिलने से अनुबन्धचतुष्टय की भी अनायास पूर्ति हो जाती है । २- ५ भरतमुनि ने नाट्यवेद की उत्पत्ति की पुराकथा दिखलाते हुए ब्रह्मप्रोक्त नाट्यवेद की स्वयं के नाट्यशास्त्र से भिन्नता मानकर यहाँ उसे दिखलाने का निश्चय सूचित किया है । क्योंकि विधिनिषेध के उपदेशों का वेदों के समान प्रदाता होने के कारण नाट्यवेद या नाट्यशास्त्र भी जब वेद या ज्ञानराशि भूत है तो इसके गुह्य रहस्यों का तात्विकस्वरूप ज्ञात करना हो जाता है तथा सहज इच्छा होती है, इसकी संज्ञागत प्रसिद्धि के आवश्यक कारण भी कि इसका स्वरूप क्या है? इत्यादि । इस सन्दर्भ में सर्व प्रथम प्रश्न यह है कि नाट्यवेद की उत्पत्ति का प्रयो-जन क्या है- क्योंकि यदि वेद से ही नाट्य के प्रयोजन की पूर्ति हो जाए तो इसकी आवश्यकता नहीं रहेगी और यदि यह उत्पन्न हुआ है तो फिर जन्य होने से ( वेद के समान जब ) नित्य नहीं है तो फिर वेदों की समानता कैसे धारण करेगा । इस पर यदि आप यह कहें कि प्रत्यक्षतः जिन्हें वेदों का उप-देश नहीं किया जा सकता हो ऐसे व्यक्तियों के लिये नाट्यवेद जी रचना की गयी है तो इससे किस प्रयोजन का सम्पादन होगा । क्या जिन्हें वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त है ऐसे त्रैवर्ण इसके अधिकारी होंगे या फिर उनसे भिन्न शूद्रादि ही । यह दूसरा प्रश्न है । ' इसके कितने अङ्ग हैं या अंगों की संख्या किती है ' इस प्रश्न का आशय यह है कि यदि नाट्यवेद के अंग अधिक या अनेक हों तो उनकी निश्चित संख्या का विनिश्चय ( अवधारण ) न होने से कठिन होगा । इसी सन्दर्भ

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४४४ नाट्यशास्त्रम् में इसी से लगा हुआ प्रश्न यह भी उपस्थित होगा कि इस नाट्य के गीत, वाद्य, नृत्य एवं अभिनय आदि दिखलाई देने वाले अंग कितने हैं तथा यह नाट्य इन अंगों से पृथक् वेदवत् अङ्गी रूप में विद्यमान रहने वाला भी है या फिर अङ्गों का समुदाय मात्र होकर स्थित रहने वाला? यह तीसरा प्रश्न है । इस नाट्यवेद में कितने प्रमाण ग्राह्य हैं या प्रमाण कौन - कौन से हैं । यह चौथा प्रश्न है । इस पर यदि आशंका की जाए कि नाट्य के प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा गृहीत होने के कारण प्रमाण विषयक चर्चा का प्रश्न अतिरिक्त धर्मादि श्रेय प्राप्ति के उपायों का बोधक ( भी अतः इन्हें बतलाने वाले नाट्य के लिये ( फिर अन्य ) प्रमाणों है और यदि ऐसा माना जाए तो फिर प्रमाण विषयक प्रश्न स्थापन क्यों किया गया । ( इस प्रकार ) इन आशंकाओं ( के उत्थापन ) के बाद गुप्त ने इन्हीं का ( विवेचनात्मक ) उत्तर देते हुए बतलाया कि एक प्रकार से प्रश्न का उपस्थापन व्यर्थ हो परन्तु यहाँ यह है कि नाट्य के जो भी अङ्ग हैं उनका ज्ञान किस व्यर्थ है । इसके ) नाट्य होता है । की क्या अपेक्षा का मूल में उप-आचार्य अभिनव कि- ' यह ठीक है । प्रश्न का आशय प्रमाण से किया जायगा? इसी से दूसरा अभिप्राय यह भी निकलता है कि नाट्य की अङ्गिता या अङ्गभाव का बोध किस प्रकार से होगा? इसी प्रश्न का एक अंश यह भी है कि इसमें अङ्गाङ्गिभाव का नियम किस प्रमाण से ज्ञात होता है । इस व्याख्या में प्रमाणपद निश्चय के जनक प्रमाण - साधन का ग्राहक होगा । अन्य व्याख्याकारों का मत है कि नाटयगत रूपकादि प्रभेदों एवं पाठ्य, अभिनय, रस एवं गीत आदि नाटयाङ्गों के उपपादक इस नाट्यवेद ग्रंथ का परिमाण कितना है ( या ग्रन्थ संख्या कितनी है? ) । इस प्रकार यहाँ चतुर्थ प्रश्न विभाग विषयक है जिससे परिमाण जिज्ञास्य है । अब इसी क्रम में आगे पांचवां प्रश्न आता है- ' इस नाट्य का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिए? ' इस प्रकार पूछने का उद्देश्य यह है कि जब नाट्यादि में अभिनय, गीत एवं पाठ्यादि अंगों का एक साथ एवं एक ही समय प्रयोग हो रहा हो तब चक्षु, श्रोत्र आदि विभिन्न इन्द्रियों को एक साथ इसकी प्रतीति सम्भव नहीं होगी तो समवेत नाट्य की एकात्मक प्रतीति कैसे सम्भव होगी? इसके अतिरिक्त विभिन्न अंगों का पृथक् - पृथक् प्रयोग प्रस्तुत करने पर एकात्मप्रतीति और भी कठिनाई उत्पन्न करेगी । ऐसी दशा में नाट्य प्रयोग सम्पन्न कैसे हो पाएगा?

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४४५ इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि इस नाट्य का प्रयोग किसी सुनिश्चित अङ्गाङ्गिभाव द्वारा होता है या अनिश्चित अङ्गाङ्गिभाव से । इस प्रकार इस प्रश्न के द्वारा सामान्याभिनय, चित्राभिनय एवं रूपक-भेदों के विषय में ( पंचम ) प्रश्न उपस्थापन किया गया और इन पाँच प्रश्नों के उपस्थापन द्वारा यह भी सूचित किया गया है कि ' नाट्यशास्त्र ' कवि ( नाट्यकार ) तथा अभिनेता ( प्रयोक्ता ) की उनके अपने कर्तव्यों के शिक्षार्थं रचित है यह भी सूचित होता है । ६. मूल में प्रयुक्त ' तु ' शब्द एव के अर्थ में है जिसका आशय है बिना विलम्ब किये हुए । पूर्वकालतामात्र में ' समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ' ( अ ० २।४।२ ९ ) के द्वारा श्रवण एवं प्रतिवचन रूप दो क्रियाओं में से श्रवण किया की पूर्व-कालता क्त्वा प्रत्यय से सूचित होती है जो श्रवण एवं प्रतिवचनगत व्यवधान रहने पर भी हो सकती है । ' ततः ' पद से हेतुता सूचित होती है और ' कथा ' पद यथातत्व के अर्थ को स्पष्ट करने ( अर्थात् उचितरीति से विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने ) के लिये प्रयुक्त किया गया है । कुछ आचार्यों के मत में पिछले पांच प्रश्नों के उपस्थापन के अनन्तर उनका विनिश्चय इसी अध्याय में कर दिया गया है और फिर उद्देश्य क्रम से उनके विभाग, लक्षण तथा परीक्षा के लिए नाट्यशास्त्र के शेष अध्याय रचे गये हैं । अन्य विद्वानों का मत यह है कि पूर्व रङ्गविधान तक के पाँच अध्यायों में दो प्रश्न का निश्चयपूर्वक उत्तर दिया गया और शेष तीन प्रश्नों का चित्रा-भिनय पर्यन्त अवशिष्ट बाईस अध्यायों में । आचार्य अभिनवगुप्त ने इस प्रकार के अन्य सभी व्याख्यानों की समीक्षा करते हुए बतलाया कि इन पाँच प्रश्नों के विवेचन हेतु विभागपूर्वक अध्यायों का क्रम निश्चित नहीं होने से किसी विशेष क्रम का अवलम्बन कैसे सम्भव हो सकता है । अतएव प्रश्नपश्वक से निरूपक नाट्यशास्त्र रूपी महावाक्य के द्वारा यथावसर सभी तत्वों का विनि-श्चय कर समग्र प्रश्नों का निश्चयपूर्वक उत्तर दिया गया है । ७. नाट्यवेद की उत्पत्ति कुलाल द्वारा घटादि के निर्माण के समान प्रत्यक्ष नहीं क्योंकि यह तो पुराकाल में पितामह ब्रह्मा द्वारा सम्पन्न की गयी थी जिसे अब केवल शब्दों से सुना जा सकता है । इसी आशय को मूल में ' श्रूयताम् ' पद से सुचित किया गया है । ८. पौराणिक मान्यता के अनुसार चतुर्दश मन्वन्तरों का एक कल्प होता

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४४६ नाट्यशास्त्रम् है जो एक ब्राह्म दिन कहलाता है । इन चौदह मन्वन्तरों में स्वायम्भुव मन्त्र-न्तर प्रथम था । आज वर्तमान चैवस्वत मन्वन्तर इस कल्पक्रम में सातवाँ होता है । इन सभी मन्वन्तरों के त्रेतायुग के आदि में ब्रह्मा ' नाट्यवेद ' का निर्माण करते हैं और सभी मन्वन्तरों में देवगण की प्रार्थना पर ब्रह्मा नाट्यवेद की रचना करते हैं । ६- ११. ' क्रीडनीयक ' पद की व्याख्या होगी ' क्रीड्यते विक्षिप्यतेऽनेनेति क्रीडनीयकम् । यहाँ बाहुलक से अनीयर प्रत्यय द्वारा क्रीडनीयक शब्द निष्पन्न होता है | अथवा ' क्रीडनाय हितं क्रीडनीयकम् ' करें तो यहाँ अज्ञातार्थक ' क ' प्रत्यय द्वारा भी क्रीडनीयक शब्द निष्पन्न जाएगा । १२. ' सार्ववणिक ' पद से वेदाध्ययन के अधिकारी एवं अनाधिकारी दोनों ही प्रकार के सुकुमारमति गृहीत हैं । आशय यह कि शास्त्रों के अध्येता या अनधिकारी सभी नाट्य द्वारा शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं । अन्य व्याख्या-कार इसका अर्थ करते हैं - जिस नाट्य में सभी वर्गों के अपने - अपने कर्तव्य का निरूपण किया जाए उसे सार्ववणिक समझना चाहिए तथा उसके आधार पर जिसकी रचना हो ऐसा नाट्यवेद सार्ववणिक है जिससे कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान सुदृढ़ होता है । ' १३. देवताओं को सामान्यतः बिदा करने के बाद यहाँ पुनः इन्द्र का पृथक् उल्लेख देवराज के प्रति विशेष सम्मान प्रदर्शनार्थ है । समाधि लगा कर वेदों का स्मरण करने का उद्देश्य है सभी वेदों का एक साथ आभान सम्भव होना । इन्हीं के साथ यहाँ एक प्रक्षिप्त श्लोक भी मिलता है । यथा-नेमे वेदाः यतः श्राव्याः स्त्रीशूद्राद्यासु जातिषु । वेदमन्यत्ततः स्रक्ष्ये सर्वश्राव्यन्तु पञ्चमम् ॥ [ क्योंकि स्त्री तथा शूद्र आदि जातियों के द्वारा वेद सुने नहीं जा सकते हैं अतएव सभी के द्वारा सुने जाने वाले एवं इन पूर्व वेदों से भिन्न ( अभिनव ) पाँचों वेद का निर्माण करता हूँ । ] १४-१५. धर्मादि का साधक होने से ' नाटच ' धर्म्यं है । यहाँ धर्म पद पुरुषार्थी के उपलक्षणार्थं प्रयुक्त समझना चाहिए । वेद, शास्त्र आदि से भी चतुर्विध पुरुषार्थ साधनों का ज्ञान हो जाता तब फिर नाटय में ही कौन सी विशेषता है? ऐसी आशंका के निवारणार्थ ही मूल में ' ससङ्ग्रह ' पद रखा गया है । ठीक तरह से जिससे ग्रहण होता हो उसे कहते हैं ' संग्रह ' अर्थात्

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४४७ निश्चित प्रतीति के लिये किसी अन्य प्रमाण पर भी आश्रित न रहता हो या जिसे अपेक्षा न रहे । ऐसा प्रतीति प्रत्यक्ष ज्ञानात्मिका ही होती है क्योंकि किसी अर्थ के प्रत्यक्ष हो जाने की दशा में तद्विषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है । नाट्य भी ऐसी ही ( प्रत्यक्षज्ञानात्मिका ) एवं निश्चित प्रतीति है । यहाँ नाट्य शब्द से दशरूपकों के अभिनय प्रशिक्षक शास्त्र को समझना चाहिए जिसकी रचना करने का ब्रह्मा द्वारा संकल्प किया गया । नाट्य प्रयोग - प्रधान होता है अतः केवल बुद्धि द्वारा ग्रहण करने मात्र से इसे ( प्रत्यक्ष अभिनयादि ) कार्य के बिना बोधगम्य नहीं बनाया जा सकता है । १६. मूल में दिये गये ' चतुर्वेदाङ्गसम्भव ' पद की व्याख्या दो प्रकार से होती है । जिसमें प्रथम - ' चतुर्भ्यो वेदेभ्योऽङ्गानां सम्भवः यस्य ' ( अर्थात् जिस नाट्य के अङ्गों की उत्पत्ति चारों वेदों से हुई हो ) । तथा दूसरी - चत्वारो वेदा अङ्गानां पाठ्चादीनां सम्भवाः यस्य ' अर्थात् चारों वेद जिस नाट्यवेद के पाठ्य आदि अंगों के कारण अथवा उद्भवभूमि हैं । १७. ' पाठ्यम् ' शब्द पठ् धातु के ' व्यक्त वाणी के उच्चारण करने अर्थ को ध्यान में रख कर निष्पन्न किया गया है । वाणी अर्थात् वाक्यों की स्पष्टता ही व्यक्तत्व है जिसे विवक्षाविशिष्ट अर्थबोधन की क्षमता कहते हैं । यह क्षमता आगे काकुस्वर आदि निरूपण ( ना ० शा ० अध्याय १७ ) अध्याय में बतलाये गये स्वर, अलङ्कार आदि के समन्वय से आती है और उस काकु, अलङ्कार आदि सामग्री की योजना से युक्त संवाद का ही नाम ' पाठ ' है । नाट्य में इसकी प्रमुखता होती है अतः सर्वप्रथम यहाँ भी इसी का उल्लेख किया गया । जैसा कि आगे कहेंगे-वाचि यत्नस्तु कर्त्तव्यो नाट्यस्यैषा तनूः स्मृता । अङ्गनेपथ्यसत्वानि वाक्यार्थ व्यज्जयन्ति हि ॥ ( ना ० शा ० १५।२ ) [ नाट्य को प्रस्तुत करते समय अभिनेता को वाणी के विषय में विशेष प्रयास करना चाहिए क्योंकि यही नाट्य का ( विशेष ) शरीर मानी जाती है । तथा नाटय के आङ्गिक, आहार्य तथा सात्विक अभिनय जैसे अन्य अङ्ग भी वाणी के अर्थ को ही अभिव्यक्त करते हैं । ] इसी कारण अभिनय से पृथक् करते हुए पाठ्य को सर्वप्रथम बतलाया गया । इस पाठ्यरूप प्रधान अंश को ऋग्वेद से ग्रहण किया गया । ऋग्वेद के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों से युक्त पाठ्य भाग को ( जो वैस्वर्य युक्त कहा गया है ) नाट्य में लिया गया । इसलिये पाठ्य में तीनों स्वर विद्यमान

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४४८ नाट्यशास्त्रम् विषयक स्वर के प्रसङ्ग से पाठ्य के उपरान्त सामवेद से गीत को हैं । पाठ्य । यहाँ ' च ' कार से पाठ्य और गीत को समान महत्व का दर्शाया लिया गया यह भी सूचित किया है कि सामवेद से केबल गया है तथा ' एव ' के द्वारा कहा जाता है । गीत मात्र का ग्रहण किया गया है क्योंकि गीत को ही साम अतिरिक्त गीत के आधारभूत ध्रुवा तथा पद को ऋग्वेद से ही लिया गया, इसके यह भी ' एव ' पद के द्वारा मूल में सूचित किया गया है । अध्वर्यु के प्रधान कर्मोपपादक यजुर्वेद से प्रदक्षिणा, गमन आदि के क्रम एवं प्रसङ्गों में अङ्गकर्मों के होने के कारण आङ्गिक अभिनय का एवं उस या स्थिति में धारण किये जाने वाले वेष के कारण आहार्य अभिनय अवस्था कर्मों में प्रयत्न करने वाले व्यक्तियों के द्वारा विहित धैर्य आदि का और उन अभिनय की प्राप्ति हो जाने के कारण मानसिक व्यापार के कारण सात्विक यजुर्वेद से सभी अभिनयों का ग्रहण बतलाया गया । अथर्ववेद में प्रतिपादित शान्ति तथा अभिनय कर्मों में नट के समान ऋत्विज् को शम और कम्प आदि अनुभावों, प्रजा के शुभ चिन्तन तथा शत्रु आदि विभावों और वास्तव में होने वाले धृति, प्रमोद आदि सञ्चारी मारण से संयोग रहने के कारण विभावादि सामग्री से निष्पन्न भावों का मुख्यरूप रसों का अथर्ववेद से ग्रहण बतलाया गया । रसास्वाद के होने से वाद्य आदि से अनुसृत एवं इस प्रकार पाठ्य आदि से प्रारब्ध, गीत रसचर्वणासमन्वित आह्लादात्मस्वरूप ' नाट्य ' होता है । अभिनय से परिपुष्ट को वेद के समान ही विधिनिषेध या कर्तव्या-इस नाट्य के द्वारा सामाजिकों कर्त्तव्य का बोध होने से शिक्षाप्रदाता नाट्य वेद - स्वरूप है । इसलिए बलात् कार्य कराने वाले राजाज्ञा रूप वेदादि शास्त्र से भिन्न स्वरूपवाले एवं अना-ही कर्त्तव्याकर्त्तव्य के ज्ञानबोधक नाट्य का वेदत्व उपपन्न हो जाता है । यास १८. वेदों का अर्थ समझने में सहायक होने के कारण जिनसे अर्थ भान होता हो उन्हें उपवेद कहते हैं । इनमें प्रजा के स्वाथ्यरक्षण का उपायदर्शन करने वाला आयुर्वेद ऋग्वेद का उपवेद है । इसके अतिरिक्त यजुर्वेद का उप-धनुर्वेद, सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद एवं अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद या वेद में यही उपवेदों का क्रम ( दिखलाया गया ) है । शिल्पशास्त्र है । चरणव्यूह आदि आचार्यों ने आयुर्वेद को अथर्ववेद का भी उपवेद ( परन्तु ) सुश्रुत माना है । से गुरुमुख से विद्या का अध्ययन, धारण पद से २२. यहाँ ग्रहण पद द्वारा भली भांति उसका स्मरण रखना; ज्ञान पद से उसका विविध तर्कवितर्क

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४४ ९ मनन करना तथा प्रयोग पद से अभिनय के द्वारा सामाजिकों के समक्ष रङ्ग-शाला में उसको प्रस्तुत करने का अर्थ सूचित किया गया है । इसके अतिरिक्त यहाँ ' च ' पद से उसका बार - बार प्रयोग कर श्रम, अभ्यास आदि को भी निर्देशित किया गया है । ३६. पद्य ३६ तथा ३७ के बीच निम्न पद्य प्रक्षिप्त बड़ौदा संस्करण ) प्राप्त होते हैं । किरीटिनश्च माषञ्च तथा धन्विनमेव च । शिलापट्ट स्वर्णंगुञ्ज शिलालिनमथापि च । अग्निवेशं शिवञ्चैव ध्यानं जप्यं सुमङ्गलम् । जंगिषव्यं कुण्डिनञ्च तथा कलशमेव च । विद्वाक्षं घूर्णनासञ्चाप्यसितं सितमेव च । रूप में ( पाठ ' त ' क ॥ ख ॥ ( किरीट, माष, धन्विन्, शिलापट्ट, स्वर्णगुञ्ज, शिलालिन्, अग्निवेश, शिव, ध्यान, जप, सुमंगल, जैगिषव्य, कुण्डिन, कलश, विद्वाक्ष, घूर्णनास, असित तथा सित ) । • ४६-४७ सौन्दर्याधायक होने के कारण शृङ्गार रस में कैशिकी वृत्ति की उपयुक्तता तो ( उचित ठहरायी जा सकती ) है परन्तु इसका उपयोग इसके अतिरिक्त भी है । यह वृत्ति कवि, अभिनेता तथा सामाजिकों के हृदय . में रसों की भावना या व्याप्ति रूप तथा रसोत्पादक शैली का एक प्रकार होने से इन्हीं दोनों स्वरूपों वाली भी मानी जाती है । इसके अतिरिक्त रौद्रादि रसों को प्रस्तुत करने के लिये जो अभिनय किया जाता है यदि उसमें अनु-प्रासादि अलङ्कार एवं बलन, वर्तना आदि व्यापार का ठीक से जमाव न हो तो रसोत्पत्ति में बाधा भी उपस्थित होगी । ( पर जब ये शब्दसौन्दर्य और अङ्गसौष्ठव भी कैशिकी वृत्ति के प्रकार होकर रसानुकूलता के आपादक हो जाएँ तो अबाध रस प्रतीति होगी ही ) अतएव सभी रसों के उपयुक्त होने से कैशिकीवृत्ति का एक विशिष्ट उपयोग भी है । मूल में प्रयुक्त ' स्त्रीजनाद्रते ' पद का अभिप्राय यह है कि भगवान् शिव के समान हृदय में जब तक उद्दामआनन्द से पूर्ण पवित्रता एवं रसप्रसूत सौन्दर्य का उद्रेक नहीं हो तब तक अभिनय में अपेक्षित सहजसौन्दर्यं लाना कठिन होता है और यह विषयों से सहज विमुख रहने वाले मुनियों में तो बड़ी कठिनाई पैदा करता है क्योंकि ऐसी वृत्तियों से वे सर्वथा अपरचित होते. हैं तथा दूर रहते हैं । अतएव मुनियों से स्त्री पात्र का सहज अभिनय सम्भव २६ ना ० शा ० प्र ०

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नाट्यशास्त्रम् र ४५०. ही नहीं है । इसके अतिरिक्त शृङ्गारादि के अभिनय में अपेक्षित तन्मयता को प्रवचन तथा अभ्यास के द्वारा इन मुनिजन में उत्पन्न भी नहीं किया जा सकता है । स्त्रियों के सम्पर्क में आने से एक तो उन मुनिजन में भी ऐसी भावनाएं लायी जा सकती हैं एवं इनके सम्पर्क से ये भी सुकुमार भावनाओं का अनायास बोध एवं यथार्थ प्रस्तुतीकरण कर लेंगे । यहाँ मुनि ने स्त्रियों के बिना कैशिकी वृत्ति के अभिनय की बात सामान्य जन के लिये बतलायी है । क्योंकि भगवान् शिव एवं पुरुषोत्तम विष्णु असामान्य देवता होने से पुरुष होकर भी सभी वृत्तियों के अभिनय का सामर्थ्य रखते हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ वृत्तियों का जातिपरक एक अन्य पक्ष भी है । ये वृत्तियां विभिन्न श्रेणियों या जातियों से सम्बद्ध भी है । जैसे तदनुसार भरत जाति में प्रचलित शैली की वृत्ति का नाम ' भारती ' हो गया । भरत जाति में कुछ लोग नाटक खेलते हुए जीवन यापन करते थे तथा नटवंशीय या भरत कहलाते थे । सात्वत जाति सम्भवतः अभारतीय जाति थी । कहते हैं कि भावप्रवण भक्तितत्व का सात्वतों के कारण भारत में प्रचलन हुआ और भागवतसम्प्रदाय इन्हीं की देन हैं । इसी प्रकार कैशिकी ओर आरभटी वृत्तियाँ भी विभिन्न जातियों से सम्बद्ध है । इनमें कैशिक जाति पश्चिम के कास्पियन-तट पर बसी हुई जाति का नाम है तथा आरभट जाति ग्रीक लेखकों द्वारा उल्लिखित Arbitus से अभिन्न है जो सिन्धुघाटी में विद्यमान थी । श्री घोष का यह पक्ष साधार है क्योंकि जब रीतियों का सम्बन्ध और विकास भारतीय प्रदेशों से सम्बद्ध है - जैसे विदर्भ की वैदर्भी, गौड की गोडी, लाट की लाटी तथा पञ्चाल की पञ्चाली तो फिर जातियों से सम्बद्ध भारती आदि वृत्तियों के मानने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए । ५६-५७. पूर्वरङ्ग का मुख्य माङ्गलिक अंग ' नान्दी ' माना गया है । कुछ व्याख्याकारों के मत में इसे समस्त अंगों का उपलक्षण समझना चाहिए । अन्य व्याख्याकार कहते हैं कि पूर्वरङ्ग में अकेले नान्दी का प्रयोग भी किया जा सकता है केवल यही इस कथन का यहाँ आशय है । उपाध्याय भट्टतोत का मत है कि जब तक प्रस्तुत नाट्यप्रयोग में दैत्यों ने विघ्न उपस्थित नहीं किया था तब तक विधिवत् पूर्व रङ्ग के समग्रभाव में प्रस्तुत करने का अवसर ही उपस्थित नहीं होता क्योंकि मुख्यतः नाट्यमण्डप के रक्षक देवताओं के स्थापन एवं उनके परितोषार्थं यह पूर्वरङ्ग सम्पन्न किया जाता है तथा गौणरूप से दैत्यों के असन्तोष का भी यही कारण बनता है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४५१ अतएव जब दैत्यों ने इसमें विघ्न उपस्थित किया तभी से पूर्वरङ्ग विवान का प्रारम्भ हुआ है । इसलिये यहाँ पूर्व रङ्ग का जब अपने सभी अङ्गों के साथ प्रयोग ही नहीं हुआ था तब केवल नान्दी को ही प्रस्तुत किया गया ऐसा समझना चाहिए । नान्दी के प्रस्तुत करने में अन्य हेतु बतलाने के लिये मूल में ' वेदनिर्मिता ' विशेषण दिया गया है । वेद में सभी कार्यों के आरम्भ में मंगलाचरण - विधान है इसलिये ( नाट्यवेद के वेदनिस्सृत होने के कारण ) यहाँ भी नान्दी का प्रयोग किया गया । विघ्नों की इस समय तक न उपस्थिति थी और न सम्भावना ही अतएव विघ्नों के निवारक पूर्वरङ्ग के साङ्ग अनुष्ठान का प्रसंग ही यहाँ उपस्थित नहीं होता । वाक्य तथा महावाक्य के प्रति आठ अङ्गभूत पदों से या महावाक्य के अङ्गभूत अवान्तर वाक्यों से युक्त रहने के कारण नान्दी दोनों प्रकार की हो सकती है । इसके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार भी इसके हो सकते हैं यह बतलाने के लिए इसे विचित्रा कहा गया है । आचार्य भट्टतोत का मत है कि मूल में अङ्गपद के ग्रहण से अवान्तर वाक्यों का ही उपादान होगा । जिससे चतुरस्र नाट्यमण्डप में प्रस्तुत प्रयोग में अष्टपदा नान्दी तथा त्र्यत्र नाट्यमण्डप में द्वादशपदा नान्दी का प्रयोग करने का निर्देश मानना ही उचित होगा । जैसा कि आगे भी ' नान्दी पदैर्द्वादशभिः ' अष्टभिर्वा परपि ' ( ना ० शा ० ५।१०४ ) [ ' आठ या बारह पदों से युक्त ' नान्दी को ' ] इत्यादि से कहा गया है । यहाँ प्रयुक्त ' अपि ' शब्द से अष्टपदा एवं द्वादशपदा नान्दी के अतिरिक्त चतुरस्र नाट्यमण्डप में चतुष्पदा तथा षोडषपदा नान्दी को भी लिया जाना ( इष्ट है यही ) संकेतित है । और इस प्रकार त्र्यत्र नाट्यमण्डप में तीन या छः पदों की नान्दी को लिया जा सकेगा । इस प्रकार थोड़े भेद के कारण नान्दी के तीन भेद प्रत्येक नान्दी के मोटे तौर पर हो सकते हैं और फिर इस प्रकार नान्दी की अनन्त विधाएँ कल्पित करना सम्भव हो जाता है । ५७. मूल के ' अनुकृतिर्बद्धा ' पद का आशय है अभिनय का आरम्भ करना । किन्हीं व्याख्याकारों ने इसका अर्थ अभ्यास आरम्भ करना भी किया है जो असंगत है । आशय यही कि प्रस्तावना के उपरान्त नाट्य का आरम्भ अभिनय के साथ होता है । अन्य आचार्य यहाँ अनुकृति पद का अर्थ करते हैं- ' नाट्य की अनुकरण स्वरूपा प्रस्तावना ' । इन्होंने मूल पाठ भी माना है-' कृता तदन्तेऽनुकृतिः ' ' उस नान्दी के पश्चात् प्रस्तावना सम्पन्न की ' ] ।